अंक विद्या का गणित

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अंक विद्या का गणित

—अशोक सहजानन्द
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सारांश
अंकों के व्युत्पत्तिजनक अर्थ, महत्व, उपयोग की चर्चा के उपरांत ज्योतिषीय दृष्टि से अंक विद्या की चर्चा यहां की गई है।
—सम्पादक

संख्या, गणित, अंक जैसे शब्द मात्रा या परिमाण के सूचक हैं किन्तु इनका व्युत्पत्ति सिद्ध अर्थ भिन्न है इसलिये ये क्रिया या विधि में अंर्तिहत सूक्ष्म अंतर को प्रकट करने वाले शब्द हैं। संख्या का अर्थ होता है सम्यक प्रकार से ख्यान अर्थात् किसी भी मापक को अव्याप्ति—अतिव्याप्ति जैसे दोषों से रहित करके एक नियत निश्चित संकेत से व्यक्त करना। अंक शब्द का अर्थ होता है चिन्ह। प्रकृति के स्वयंप्रभ विस्तार को किसी चिन्ह से व्यक्त करना ही अंक है। संस्कृत में अंक शब्द का गणितीय अथवा संख्यात्मक चिन्ह के सूचक के रूप में ही प्रयोग नहीं किया गया है, चिन्ह के अर्थ में भी प्रयोग किया गया है। जैसे—मृगांक, व्रणांक आदि। किन्तु कालान्तर में विशेषतया हिन्दी भाषा में अंक शब्द का अर्थ संकोच होता गया और ‘अंक’ शब्द गणित के संख्यात्मक संकेत में रूढ़ हो गया।

गणित शब्द एक प्रक्रिया का सूचक होता है। अंक और संख्या जहाँ घटकों की नियत अवस्था व परिणाम को सूचित करते हैं वहाँ गणित उन संख्याओं में हो रही क्रिया को परिभाषित करता है। गणित में गणना है और गणना में गण है। गण का अर्थ होता है—घटक। जिस तरह काल में कलन क्रिया है उसी तरह गणित में गणन क्रिया है और उस क्रिया की परिणतिस्वरूप गणित कहलाता है।

जिस तरह अर्थ शब्द से समन्वित होकर एक समग्र प्रवृत्ति परक घटक बनता है वैसे ही आकार की संख्यान, अंक बनता है। संख्याओं का विस्तार नौ तक है किन्तु इनके वर्गीकरण में एक, दो, पाँच और सात के ही चार वर्ग बनते हैं। एक का विस्तार तीन, छ: और नौ होता है। दो का चार, आठ होता है। छ: उभयवर्गीय (अर्थात् द्वित्व और त्रित्व के वर्ग में) है। पाँच शून्य का मध्य है। मध्य और शून्य का अर्थ है कि उद्भव और विनाश की परवर्ती और पूर्ववर्ती अवस्था। पाँच वह स्थिति है जहाँ उद्भव अपने चरम (विकास) को प्राप्त करता है तद्न्तर विनाश का क्षेत्र प्रारम्भ हो जाता है।

संसार का विकास पंचीकरण विधि से होता है। इस विधि में पाँच के घटकों की ही मूल भूमिका रहती है। संसार के व्यक्त उपादान पाँच तत्व इसी प्रक्रिया के मूल आधार हैं। सात तन्वत: पाँच के अधिक निकट है। उदाहरण के लिए यह समझ लिया जाय कि जिस प्रकार पाँच तत्त्वों में तैजस तत्व मध्यमार्गी है, उसी प्रकार सात, पाँच और दस का मध्य है। सात लोक एवं तत्प्रतीक व्याहृतियों में जहाँ पंच तत्वों के स्थूलतम विस्तार के सूचक भूलोक है वहीं सूक्ष्म लोक, महलोंक और तपोलोक जैसे भी है। तीन और छ: का जो विस्तार है उसी में अग्रसर स्थिति नौ आती है जिसमें तीन—तीन से गुणित होता है अर्थात् गण में गुणन क्रिया होती है। संसार चक्र में गति ही प्रकृति है और गति के लिए गणित आवश्यक है। स्थिरता में एकरूपता है उसे गणित की अथवा अंकों और संख्याओं की आवश्यकता नहीं रहती। अंक और संख्याओं की परिणति को गणित कहते हैं। गणित में अंक, बीज और रेखा ये तीन प्रकार आते हैं अर्थात् गणित एक प्रक्रिया है क्रिया की सिद्ध अवस्था है। इस साधना को हम अंकों, संख्या अथवा रेखा के माध्यम से सम्पादित कर सकते हैं। ये परस्पर विनिमेय भी होती है और अपने स्वतंत्र रूप में ही रह सकती हैं तदपि अंक का सर्वत्र प्रयोग होता है। एक ही क्रिया की तीन अवस्थाएँ अनिवार्य रूप में व्यक्त होती हैं।

गणित का आश्चर्यजनक विस्तार हमें भाषा में देखने को मिलता है। संस्कृत में विभाजन का प्रायोगिक और सुसंगत उदाहरण है विभक्ति। हिन्दी में जो कारक हैं वे ही संस्कृत में विभक्ति हो जाती हैं अर्थात् क्रिया किसी माध्यम के सहारे कारक बनकर सात रूप धारण करती है। अंक और संख्या वैसे ही घटक हैं जैसे अक्षर और शब्द। प्रकृति की क्रमिक गति और आवर्तनशीलता को मापने के लिए संख्यापरक गणना आवश्यक होती है और यही आवृत्तिपरकता हमारे जीवन में संख्या को प्रविष्ट भी करती है और फलित भी। आधुनिक अंक शास्त्र ने हमारे जीवन में संभावित सुखद या दुखद परिस्थितियों का पूर्वानुमान करने की एक विश्वसनीय पद्धति दी है।

समष्टि तरंगों का फलित है और उसमें कोई भी तरंग निरपेक्ष नहीं है। लघु से लघु तरंग विराट से जुड़ी हुई और तरंगों का यह व्यापार ही संसार के वैचित्रय का कारण बनता है। इसके साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि गति केवल वृतबद्ध नहीं होती इसमें कोणिक स्थितियाँ भी बनती हैं। वस्तुत: कोण गति की मूल अवस्था है, वह स्वयं में गति होकर भी अपनी ही विशिष्ट भंगिमा (जो वर्तुल है) को प्रेरित करती है। गति के समीकरण में कोण भी आते हैं जो सहज रूप से बन जाते हैं और वे अप्रत्यक्ष रूप से हमारे गणित को अधिक सारवान बना देते हैं।

व्यवहार में संख्या की ऊध्र्वाधर अथवा दक्षिण गति होती है। पहाड़ों या गिनती के क्रम में लिखने पर हम ऊपर से नीचे चलते हैं किन्तु क्रियाशीलता में हम दक्षिणावर्त गति से अर्थात दाहिने से बायें चलते हैं। अंग्रेजी भाषा की सी विचित्रता हमें गणित में भी मिलती है कि लिखते समय हम वामावर्त गति से लिखते हैं। गणित में तीन तरह की गति व्यवहार में देखने में आती है ऊध्र्वाधर। गिनती व पहाड़े लिखते हैं तो उन्हें क्रमिक युति, अंकों के विकास किंवा वृंहण की परिपाटी है। संख्या लेखन अथवा गुणा भाग में वह वामावर्त एवं दक्षिणावर्त विधि से विकसित होती है। सामान्य व्यवहार के अनुसार ऊध्र्वाध: अथवा पूर्व पश्चिम एक गणना क्रम का विकास ही है। वह परिवर्तन से क्षुण्ण नहीं होता। हमारे यहाँ पृथ्वी की पूर्वाभिमुखी गति के कारण सूर्य पश्चिम गति दिखता है। इसी का हम ऊध्वार्ध: मान लेते हैं, ये केवल क्रम हैं, सूचक हैं, कारक नहीं। वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार भी पूर्व पश्चिम न्यूट्रल रहते हैं जबकि उत्तर—दक्षिण से धन—ऋण प्रकृति की धारायें प्रवाहित होती है। हमारे पिण्ड पृथ्वी में उत्तर गोलक से धनात्मक धारा निर्गत होती है और दक्षिण से ऋणात्मक। व्यक्ति के पिण्ड में सिर धनात्मक और पैर ऋणात्मक विद्युत धारा के निर्गम स्थान माने जाते हैं। यही सोचकर हमारे ऋषिजनों ने उत्तर की तरफ सिर करके सोने का निषेध किया था क्योंकि समान प्रकृति की अलक्ष्य धाराओं में परस्पर आकर्षण होने से व्यक्ति की शक्ति में ह्रास हो सकता है और उत्तर की ओर पैर करने से दोनों धाराओं में प्रकृति वैषम्य होने से आकर्षण नहीं होगा।

व्यवहार में हम दक्षिण को निर्गम की और उत्तर को आगम की दिशा मानते हैं। यही सिद्धांत गणित के गुणन और भजन की गति में भी प्रकट होता है। ह्रास में वृद्धि की ओर बढ़ने की सूचना हम वामावर्त गति से देते हैं अर्थात् निरन्तर वृद्धि व विकास की कामना करने वाला दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता है। ऐसी ही स्थिति गुणन क्रिया में होती है। वहाँ अंकों को गुणित करने का क्रम बांये से दांये चलता है। यह क्रम जब परार्वितत होता है तो भजन क्रिया कहलाता है। किन्तु तब इसका गतिक्रम भी परिवर्तित हो जाता है अर्थात् उत्तर से दक्षिण की ओर, दाहिने से बाएं।

संख्याओं का प्रारम्भ शून्य से होता है। संसार का प्रारंभ भी इसी बिन्दु से होता है। वर्णमयी मातृका में तो संसार अवस्थित ही नहीं गतिशील भी है। जिसका प्रमाण आत्मा शब्द स्वयं है। आत्मा का अर्थ होता है गतिशील अत् धातु जो गत्यर्थक है उससे आत्म शब्द बनता है यही स्थिति काल शब्द की है और ऐसा ही अर्थ सरस्वती शब्द का होता है अर्थात् संसार (जो व्यवस्थित क्रम से चलता हे, उसे संसार कहते हैं) गति का परिचय है स्थिरता इसमें आकाश तत्व की तरह निगूढ़ एवं आवृत रहती है। भाषा के आधार पर विकासकथा का परीक्षण करने पर हमें कुछ तथ्य प्राप्त होते हैं जैसे शब्दावली में दो परस्पराभिमुख अवस्थाओं का अभिव्यक्त करने वाली क्रिया या संज्ञा प्राप्त होती है। अंकों में यह स्थिति चिन्हों में अभिव्यक्त होती है। ये चिन्ह विपरीत वृत्ति एवं क्रिया के बोधक बनते हैं और ये क्रियाएं भी द्वन्द्व रूप में वर्गीकृत हैं। भाषा किंवा संख्याओं को द्वन्द्वमयी अवस्था में मुक्त करने के लिए हम जिस संकेतक का प्रयोग करते हैं—वह संख्या में शून्य और भाषा में अतीत, पर, परम जैसे पदों से व्यक्त होता है। अंकों में व्यवहित शून्य को पूर्णत्व का प्रतीक भी मानते हैं और वह बिंदु का ही चरित्र है कि वह गति की किसी भी क्रिया से व्याहत नहीं होती। यह स्थिति इस तथ्य की सूचक है कि द्वन्द्वात्मक अवस्था के मूल में एक ही प्रकट द्वित्व का प्रारंभिक होता है यह रेखा वलय। विस्तृत अर्थ में इसे ब्रह्माण्ड का रेखांकन भी कहा जा सकता है कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड की ऐसी ही आकृति होती है।

रेखा का अस्तित्व उस निरपेक्ष अव्यव सत् की विशुद्ध अवस्था है और यही से गणित का विभाग होता है। शून्य की रेखायें विविध आयामों का परिमापन प्रकाशन करती हुई अनन्तता की ओर अग्रसर होती है। यही प्रस्तार क्रम रेखागणित के इस सिद्धान्त का आधार है कि िंबदु का विकास त्रिकोण में होता है। वर्ण मातृका में स्वर और व्यंजन के रूप में दो वर्ग है, उभयरूपता है। व्यंजन व्यक्त होते हैं और स्वर उन्हें विकसित करते हैं। यद्यपि वर्णमातृका का विस्तार व्यंजन से अधिक होता है पर उस विस्तार में स्वरों की अनिवार्य भूमिका रहती है। स्वर विस्फारक होते हैं इसलिए वे पुरुष प्रतीक और व्यंजन विस्फारणीय अतएव प्रकृति प्रतीक होते हैं। स्वरों में भी ह्रस्वपुरुष और दीर्घ प्रकृति सूचक होते हैं।

स्वरों का साम्य यदि संख्याओं में देखें तो ज्ञात होगा कि तीन, छ: और नौ पुरुष और दो, चार, आठ प्रकृति प्रतीक है। स्वर वर्णों में ऋ और ऌ को हम नपुंसक मान लें तो वे स्थिर प्रवृत्ति होते हैं अर्थात् वे समभावापन्न पुं और स्त्री की परिणति हैं। अनुस्वार और विसर्ग का एक और पाँच में अंतर्भाव हो जाता है। अनुस्वार नदन क्रिया हैं और विसर्ग परिणाम र्धिमणी प्रकृति का स्वरूप है। ती, छ: और नौ क्रमश: अ, इ, उ में समाविष्ट होते हैं। इस परिकल्पना का व्यावहारिक उदाहरण है कि अकारान्त शब्द पुल्लिंग ही होते हैं, किन्तु इकार अंत वाले शब्द उभयिंलगी होते हैं जिसका तात्विक अर्थ यह है कि त्रिभुज में ऊध्र्व शीर्ष ही वह स्थल होता है जिसमें से प्रवेश अथवा निर्गम संभव हो पाता है। दो, चार और आठ दीर्घ आ, ई, ऊ के प्रतीक बनते हैं क्योंकि जहाँ तीन किसी भी द्वित्व या विभक्ति के प्रभाव से मुक्त है वही नौ केवल अपने ही स्वरूप से गुणित हुआ करता है। ३ ३ ९ जबकि छ: उभयनिष्ट होता है ३ + ३ ६ और र्३ २ ६ । छ: का यही चरित्र इसे त्रिकोण का ऊध्र्वशीर्ष िंबदु अतएव तीन और नौ के मध्य की स्थिति प्रदान करता है। इस प्रकृति के विपरीत ये युगल संख्याएं हैं जो मुक्त रूप में ही प्रयुक्त होती हैं। दीर्घ अथवा संधिकृत ए और ओ छ: और आठ में अन्तर्निहित होते हैं। ऋ सात और ऌ दस में समाहित हो जाता है। दस का अर्थ शून्य होता है। इकाई तक के वर्ग क्रम में १,३,५,७ ही ऐसे अंक हैं जो विभक्ति वा गुणित जैसी क्रियाओं से प्रभावित नहीं होते हैं। इसके पश्चात् व्यंजनों का वर्गक्रम आता है जो पंचीकरण पद्धति से चलता है। स्वरों का वर्तन विकास त्रिवृत क्रम से चला था, व्यंजन क्रम में पाँच का घटक प्रमुख विद्यायक बनता है। जो प्रकृति में पाँच तत्व, पांच तन्मात्रा, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और पंचकोशमय व्यष्टिगत एवं समष्टिगत विस्तार का वितान बनता है। आगे की स्थितियां भी इन्हीं अंकों के चिन्हों से र्नििमत, अभिव्यक्त होती हैं जिनमें युति—वियुति, गुणित—विभक्त की क्रिया से इनका विस्तार होता है। वे संख्याएँ जो अभ्राज्य हैवे ऋकारादि नपुंसक स्वरों के ही विकसित र्विघत रूप हैं।

पंजीकरण के सिद्धांत का संबंध भी चतुष्कोण की तरह ही है क्योंकि पांच उस एक का क्रमिक स्थूलीकरण है। स्थूलीकरण में एक—एक करके पांच तक प्रबुद्ध होने का क्रम है। यही क्रम जब संहरित होता है तो प्रतिलोम विधि से पाँच पदक्षेपों में चलता है जिसका योग दस होता है। शेष का मूलांक या भाग्यांक मानने की पद्धति भी है।

सुविधा के लिए वर्णांकों का चक्र दिया जा रहा है।

वर्ण अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ऌ ऌ ए

वर्णांक २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२

वर्ण ऐ ओ औ अं अ:

वर्णांक १३ १४ १५ १६ १७

वर्ण क ख ग घ ङ

वर्णांक ३ ४ ५ ६ ७

वर्ण च छ ज झ ञ

वर्णांक ४ ५ ६ ७ ८

वर्ण ट ठ छ ढ ण

वर्णांक ५ ६ ७ ८ ९

वर्ण त थ द ध न

वर्णांक ६ ७ ८ ९ १०

वर्ण प फ ब भ म

वर्णांक ७ ८ ९ १० ११

वर्ण य र ल प

वर्णांक ८ ९ १० ११

वर्ण श ष स ह

वर्णांक ९ १० ११ १२

अनेक बार जिज्ञासाएं आती हैं कि फलित विचार के लिए कौन—सा नाम ग्राह्य हो। एक व्यक्ति का घर नाम कुछ है और संस्थागत कोई और। मेरे अपने विचार से जिस व्यक्ति का जो नाम सर्वाधिक प्रचलित हो वही फलित के लिए विचारणीय रहना चाहिए।’ अंक—विद्या’ के प्रामाणिक अध्ययन के लिए पाठकों को निम्न पुस्तकों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।

अर्हत वचन जनवरी से जून २०११