०७. राज श्रीपाल का राज जामाता होनेसे चिंता, श्रीपाल एवं मैनासुन्दरी का वार्तालाप

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(अंक ०७. से पुनर्निर्देशित)
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७ - राज श्रीपाल का राज जामाता होनेसे चिंता, श्रीपाल एवं मैनासुन्दरी का वार्तालाप

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राजा श्रीपाल मैनासुंदरी के साथ उज्जैन में सुखपूर्वक अपना समय व्यतीत कर रहे थे, एक बार रात्रि में श्रीपाल की निद्रा भंग हो गई और वे गहरी चिंता में निमग्न हो गए। इसी मध्य मैनासुंदरी की निद्रा भी भंग हो गई और उसने पति के पैर दबाते हुए विनय से प्रश्न किया—

‘स्वामिन्! आज आपको आकस्मिक ही क्या चिंता हो रही है? क्या मेरे पिता के द्वारा कुछ कटु अनुभव आया है या मेरे से कुछ अपराध हुआ है? अथवा आपको अपनी जन्मभूमि की याद आ रही है? जो भी हो, सो आप मुझे स्पष्ट करने का कष्ट करें?’

मैनासुंदरी के इन कोमल और मधुर जिज्ञासा भरे प्रश्नों को सुनकर श्रीपाल ने कुछ क्षण विचार कर कहा—

‘प्रिये! मेरी चिंता का ऐसा कोई विशेष कारण नहीं है। आपके पिता का जो कुछ और जितना मुझे स्नेह मिल रहा है, वह विशेष ही कहा जाएगा। फिर भी मेरी चिंता का जो कारण है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। मुझे यहाँ सब लोग राज- जामाता के नाम से ही जानते हैं। मेरे पिता के नाम का कोई उल्लेख नहीं करता। पुत्र से यदि पिता का नाम लुप्त हो जाए, तो क्या उसे ‘पुत्र’ कहा जा सकता है? वास्तव में वह पुत्र कहलाने का अधिकारी नहीं है। देखो, पुत्र और पुत्री में केवल इतना ही अंतर है कि पुत्री अन्य कुल की वृद्धि करती है और पुत्र अपने पिता के वंश को बढ़ाता है। पुत्र यदि पुत्री के समान ही श्वसुरालय में रहने लगे तो वह कुपुत्र है, निर्लज्ज है। अब हमें यहाँ एक पल भी रहना एक वर्ष के समान दिख रहा है।’

पति की बातो को सुनकर मैनासुंदरी प्रभावित हुई और कहने लगी—

‘स्वामिन्! आप सच कह रहे हैं, पुरुष के श्वसुरगृह में निवास को भला कौन उत्तम कहेगा? आपका विचार अति उत्तम है चूँकि पुत्र को ‘कुलदीपक’ कहा गया है अत: आप अब अपने देश चलकर अपना राज्य संभालिए।’

मैनासुंदरी के अपने अनुकूल वचन सुनकर श्रीपाल को बहुत ही संतोष हुआ और मन ही मन उसके विवेक की सराहना की पुन: बोले—

‘प्रिये! आपने बहुत ही सुंदर कहा है परन्तु तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि क्षत्रिय वीर कभी किसी के आगे हाथ नहीं पसारते। याचना उनके लिए मरण के समान है। मैंने अपने चाचा को यद्यपि अपने अस्वस्थ रहने तक ही राज्य सौंपा था फिर भी आज यदि मैं पहुँचकर उनसे राज्य माँगूँ तो क्या वे सहजभाव से दे देंगे?......अथवा कोई उदार पुरुष हो दे भी देवें तो क्या उसे स्वीकर कर लेना उचित होगा? यदि ऐसा किया तो अपना पराक्रम एवं बाहुबल दिखाने का अवसर कैसे प्राप्त होगा? कहने का मतलब यही है कि न तो मैं चाचा से राज्य माँग ही सकता हूँ और यदि कदाचित् वो दे भी दें तो न मैं उसे स्वीकार ही कर सकता हूँ।

मैंने तो यह निश्चय कर लिया है कि अब मैं अन्यत्र जाकर अपने बाहुबल से राज्य और ऐश्वर्य प्राप्त करुँगा। हे बल्लभे! मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि मेरी अनुपस्थिति में तुम अपनी सास की सेवा तन, मन से करना और नित्य ही देवपूजा, गुरुवंदना आदि धर्म कार्यों में अपने समय को बिताना। कभी किसी प्रकार की चिंता नहीं करना।’

इतना सुनते ही मैना का हृदय आकस्मिक वियोग की व्यथा से आहत हो गया। उसने जैसे-तैसे अपने धैर्य को बटोरकर कहा—

‘स्वामिन्! मैंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि आपके वियोग का दु:ख कभी देखने को मिलेगा। आप आज सहसा इतने कठोर कैसे हो गए? मैं आपके वियोग में कैसे जीवित रहूँगी?’

मैनासुंदरी के ऐसे मोहयुक्त वचन सुनकर श्रीपाल ने कहा—

‘प्रिये! तुम विवेक सम्पन्न हो, तुम्हें मैं क्या अधिक समझा सकता हूँ। इस संसार का मूल कारण तो मोह ही है। यह मोह मनुष्य को कर्तव्य पथ से च्युत कर देता है अत: आपको ऐसा मोह कथमपि नहीं शोभता। देखो, मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि आज से ठीक बारहवें वर्ष के बाद इस अष्टमी के दिन मैं तुमसे आकर पुन: मिलूँगा। इसमें किसी प्रकार का अंतर नहीं आ सकता।’

मैनासुंदरी ने यद्यपि अनेक प्रकार से पति के साथ चलने का अनुरोध किया किन्तु श्रीपाल ने उस बात को नहीं स्वीकारा। जब मैना को धैर्य धारण करने के सिवाय और उपाय नहीं दीखा, तब वह बोली—

‘हे नाथ! यदि आप बारह वर्ष के पूरे होने पर अष्टमी को नहीं आए तो नवमी के दिन ही प्रात: मैं आर्यिका की दीक्षा ले लूँगी।’

यह सुनकर श्रीपाल ने हँसकर कहा—

‘ठीक है, यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार नहीं आया तो आपको दीक्षा लेने का पूर्ण अधिकार है।’

इत्यादि प्रकार से जाने का निर्णय हो जाने के बाद मैना ने अपने स्वभाव के अनुसार कहा—

‘यद्यपि आप स्वयं प्रबुद्ध हैं फिर भी मेरी यही प्रार्थना है कि प्रवास में आप कहीं पर क्यों न रहें, देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति को अपने हृदय से दूर न करें और सतत सिद्धचक्र मंत्र का स्मरण करते रहें। प्रत्येक कार्य के प्रारंभ में पंचपरमेष्ठी के महामंत्र को जप लेवें। अपने माता-पिता और बड़े जनों के वचनों को सदा स्मरण में रखें। चाटुकार लोगों पर विश्वास न करें और अपने कुल की मर्यादा के विरुद्ध कोई भी कार्य न करें।’

इत्यादि रीति से अनेक शिक्षास्पद वचनों से मैना ने पति के मन को संतुष्ट किया किन्तु पुन: उसके मन में गहरी वेदना होने लगी और सोचने लगी कि– ‘अहो! पतिदेव के बिना मैं इस महल में बारह वर्ष का समय कैसे निकालूँगी?’

वह अधीर हो उठी, उसकी आँखों में आँसू आ गए और बहुत कुछ रोकने पर भी नहीं रुक सके। तब भावावेश में आकर उसने कहना शुरू किया—

‘स्वामिन्! अब तक मैं समझ रही थी कि आप मुझसे परिहास कर रहे हैं। क्या आप सचमुच में परदेश जाने को तैयार हैं? आपका यह निर्णय भला मैं कैसे देख सकूगी? अत: आपको अपने देश चलने के लिए कुछ अन्य ही उपाय सोचना चाहिए।....’

इस प्रकार मैनासुंदरी के वचन सुनकर श्रीपाल को ऐसा लगा कि—

‘मेरी भार्या मैनासुंदरी मोह के वश होकर अब मेरे निर्णय में बाधक बन सकती है।’

अत: उन्होंने बनावट क्रोध से आकृति बिगाड़ कर उच्चस्वर से कहा—

‘लोग सच कहते हैं कि स्त्रियाँ जो हठ पकड़ लेती हैं, वह मुश्किल से ही छोड़ पाती हैं। मैंने तुम्हें उन साधारण स्त्रियों से बढ़कर विशेष बुद्धिमती ही समझा था लेकिन आज तो तुम भी उन अविवेकी महिलाओं के सदृश ही दिख रही हो। भला अब रोकने की बात करना कहाँ तक उचित है?’

पति के द्वारा इस प्रकार भत्र्सना के वचन सुनकर मैनासुंदरी के दिल पर गहरा आघात पहुँचा। वह धैर्य से अपने अश्रुओं को रोककर एक तरफ खड़ी हो गई। तब श्रीपाल ने करुणाद्र्र मन से अनेक वचनों द्वारा मैनासुंदरी को पुन: समझाया और कहा—

‘प्रिये! अब सर्व चिंताओं को छोड़कर हमें अपने अभीष्ट कार्य के लिए सहर्ष अनुमति प्रदान करो। तुम्हारी यह स्थिति मेरे परदेश प्रवास में विघ्न करने वाली हो सकती है। तुम सम्यक्त्व, विवेक और शील की साक्षात् मूर्ति हो। तुम्हें इस अवसर पर अपने धैर्य का परिचय देना चाहिए। यद्यपि कुछ दिन के लिए वियोग है फिर भी वह सुखद भविष्य के लिए ही है।’

इतना सुनकर मैनासुंदरी ने जैसे-तैसे अपने मन को संतोष कराकर पति के चरणों को नमस्कार किया और जाने के लिए अनुमति देते हुए बोली—

‘आपका यह प्रवास सर्व मनोरथों को सफल करने वाला हो और जिनदेव की कृपा से आप पुन: हमारे से आकर मिलें।’

श्रीपाल मैनासुंदरी से आज्ञा लेकर माता के पास पहुँचे। उन्हें प्रणाम कर अपने परदेश जाने की सारी बात समझाई और माता की अनेक-अनेक शिक्षाओं को ग्रहण कर जाने को उद्यत हुए। तब माता ने स्नेह से पुत्र के मस्तक पर हाथ रखकर शुभाशीर्वाद दिया और वापस आने तक के लिए मंगल कामना करते हुए श्रीपाल के मस्तक पर दूध, दही, अक्षत रखे, ललाट पर कुंकुम का तिलक लगाया। श्रीपाल ने भी माता को प्रणाम कर अनंतर अपने सभी स्वजन लोगों से आज्ञा लेकर रात्रि के अंतिम प्रहर में उत्साह और आनंद के साथ पंचपरमेष्ठी का स्मरण कर घर से प्रस्थान कर दिया।