१०. धवलसेठ की रयनमंजूषा पर आसक्ति

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१० - धवलसेठ की रयनमंजूषा पर आसक्ति, रयनमंजूषा के शील के प्रभाव से जलदेवता का आसन कंपायमान

धवल सेठ कामाग्नि से दग्ध हो रहा था अत: वह अब और अधिक दिन निकालने में असमर्थ हो गया। तब उसने एक दूती को समझा-बुझाकर रयनमंजूषा के पास भेज दिया। दूती ने उसे समझाना शुरू किया—

‘अरे बेटी! तेरा यह नवयौवन रोने-धोने के लिए नहीं है। तू अपने जीवन को सुखी बना। देख, धवल सेठ किसी महाराजा से कम नहीं है और मैं सच कह रही हूँ इस समय वह तेरे विरह में पागल हो रहा है।’

इत्यादि बातें सुनकर रयनमंजूषा क्रोध मे आकर उसका तिरस्कार करते हुए बोली—

‘अरी दुष्टे! ऐसे शब्द कहते हुए तेरी जिह्वा के सौ-सौ टुकड़े क्यों नहीं हो गये? तू यहाँ से शीघ्र ही भाग जा.....।’

यद्यपि वह दूती सहम गई फिर भी उसने साहस बटोर कर पुन: पुन: समझाना चालू ही रक्खा। वह बोली—

‘पुत्रि! तुम शांत होओ, देखो! मालिक जब प्रसन्न हो तब भला भृत्य को कौन चाहेगा? अरे! वह श्रीपाल तो धनकुबेर सदृश इन धवल सेठ का किंकर ही तो था....।’

किन्तु रयनमंजूषा इन बातों को बिल्कुल ही नहीं सुन सकी। उसने उस दूती को अच्छी तरह अपमानित कर भगा दिया। वह धवल सेठ के पास पहुँचकर बोली—

‘हे महानुभाव! वह सती शिरोमणि है, आपके वश में क्या, वह देवों के भी वश में नहीं आ सकती है। मैंने सब कुछ उपाय कर लिए, सब निरर्थक गये। मेरा तो उसने खूब ही तिरस्कार किया है।’

इतना कहकर वह दासी अपने स्थान चली गई। अब धवल सेठ चिंतातुर हो सोचने लगे। जो भी हो, निराश न होकर मुझे तो स्वयं उसके पास पहुँचना होगा। ऐसा सोचकर पापी निर्लज्ज बेखटके रयनमंजूषा के पास पहुँच गया। उसे देखते ही वह सती घबरा गई। उसने वस्त्रांचल से (घूँघट) अपना मुख ढक लिया और मन ही मन जिनेन्द्रदेव का स्मरण करने लगी। बीच में उसने कहना शुरू किया—

‘हे सुंदरी! सुनो, श्रीपाल तो मेरा कृतदास-पैसे का नौकर था। उसके कुल का कुछ पता ही नहीं था, न जाने वह किसका पुत्र था? उसका तो मर जाना अच्छा हुआ। तुम्हें चिंता किस बात की? बताओ, भला मेरे रहते हुए तुम्हें कमी किस चीज की है? यह तुम्हारा यौवन और रूपसौन्दर्य मेरे मन को हर चुका है। प्रिये! मैं तुम्हें अपनी सभी स्त्रियों में प्रधान बनाऊँगा।’

इत्यादि बातों को सुनकर रयनमंजूषा ने कहा—

‘हे पिताजी! आप तो मेरे धर्मपिता हैं अथवा मेरे स्वामी के धर्मपिता होने से मेरे श्वसुर हैं। आपके मुख से ऐसे निंद्य वचन मैं सुनना नहीं चाहती।.....’

इतना कहकर वह चुप हो गई। तब धवल सेठ ने अनेक अनुनय-विनय से उसे अनुकूल करना चाहा। जब सब प्रयत्न निष्फल हो गये तब वह जबरदस्ती व्यभिचार करने के लिए आगे बढ़ा। तव वह सती एकदम आर्तस्वर में पुकार उठी—

‘हे अरहंत देव! हे दीनबन्धो! हे दयासागर! तुम कहाँ हो? शीघ्र आओ और इस अबला की रक्षा करो।’

इतना कहकर वह एकाग्र चित्त हो आसन से स्थिर बैठ गई। इधर धवल सेठ उसे पकड़ना ही चाहता था कि उसी क्षण सती के शील के प्रभाव से जलदेव का आसन कंपायमान हो गया वह वहाँ आ गया और उसने धवल सेठ को पकड़कर खूब कसकर बाँध लिया, ऊपर से अपनी गदा के प्रहार करने लगा। इस घटना से जहाज के सभी लोग वहाँ एकत्रित हो गए। सब लोग सेठ की चिल्लाहट को देख रहे थे किन्तु मारने वाले को कोई नहीं देख रहा था, सब आश्चर्यचकित थे। अंततोगत्वा सबने यह समझ लिया कि—

‘इस पापी ने रयनमंजूषा का शील भंग करना चाहा था कि उसवे शील के प्रभाव से यह दैवी चमत्कार प्रगट हुआ है। कोई देव अदृश्य ही इसे मार रहा है।’

सबने आपस में विचार किया कि—

‘चलो, हम लोग सती के चरणों में ही प्रार्थना करें जिससे इस सेठ की भी रक्षा हो और हम लोगों पर भी कोई संकट न आ जावे।’

ऐसा निर्णय कर सब रयनमंजूषा के सामने उपस्थित होकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे—

‘हे पतिव्रते! आपके शील के प्रभाव को धन्य है। हे कल्याण रूपिणि! हे देवि! इस धवल सेठ का अपराध क्षमा करो और हम सब पर दया करो। हे दयामूर्ते! आप अब दया करके इस सेठ को बचा लो अन्यथा इसके न रहने पर हम लोगों की भी आजीविका नष्ट हो जाएगी।’

इस प्रकार के दीन वचन सुनकर रयनमंजूषा ने दया से आद्र्र हो कहा—

‘हे भगवन्! आपके प्रसाद से मेरे शील की रक्षा हुई है। हे शासन देव! जिन्होंने भी आकर मेरी सहायता की है, उनसे मेरा निवेदन है कि इस सेठ के अपराध को क्षमा कर दीजिए और इसे प्राणों की भिक्षा दीजिए।’

इतना सुनकर जल देव ने धवल सेठ को छोड़ दिया और बोले—

‘हे सती शिरोमणि! तू धैर्य धारण कर, थोड़े ही दिनों बाद तेरा पति श्रीपाल तुझे मिलेगा। वह समस्त राजाओें का अधिपति महाराजा होगा।’

इतना कह कर वह देव अपने स्थान पर चला गया। धवल सेठ संकट से छूटते ही सती के पैरों पर गिरकर बोला—

‘पुत्रि! मेरे अपराध क्षमा कर दो। मैं अत्यन्त पापी हूँ। मैंने अपनी करनी का फल पा लिया है। अब इस जीवन में मैं ऐसा निंद्य कार्य कभी भी नहीं सोचूँगा।’

रयनमंजूषा ने धवल सेठ को क्षमा कर दिया और आप देव के मुख से भविष्य में पति के मिलने का समाचार ज्ञात कर शांत चित्त होती हुई महामंत्र का स्मरण करते हुए अनशन, अवमौदर्य आदि तपश्चरण करने लगी। धवल सेठ की जहाज यात्रा जैसे की तैसे चलने लगी और सभी लोग सती के शील की प्रशंसा एवं देव के आगमन की चर्चा करते हुए अपने-अपने काम में लग गए।