१४. कोटिभर श्रीपाल जी का चम्पापुर के लिए प्रस्थान

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१४ - कोटिभर श्रीपाल जी का चम्पापुर के लिए प्रस्थान, चाचा अरिदमन एवं श्रीपाल में युद्ध, युद्ध में श्रीपाल की विजय

एक दिन श्रीपाल विचार करने लगे—

इस उज्जैन शहर में रहते हुए मेरा बहुत सा समय व्यतीत हो गया है। मैंने परदेश यात्रा करके विपुल वैभव और कीर्ति को अर्जित कर लिया है किन्तु अपने पितृकुल की कीर्ति को नहीं फैला सका हूँ। अभी तक मैं राजजमाता के नाम से ही प्रसिद्ध हूँ अत: अब अपने लक्ष्य की पूर्ति करना आवश्यक है। इतना सोचकर उन्होंने राजा पुहुपाल से विदा माँगी। जैसे-तैसे स्वीकृति प्राप्त कर वे बहुत बड़ी विभूति के साथ चम्पापुर की ओर चल पड़े। मार्ग में अनेक वन और पर्वतों पर पड़ाव डालते हुए वे चम्पापुर के निकट पहुँचे। वहाँ नगर के चारों ओर सेना ठहराकर आप स्वयं उद्यान में ठहर गये। पुन: मंत्रियों से मंत्रणा कर अपने चाचा वीरदमन के पास एक दूत को भेजा। उसने जाकर सभा में निवेदन किया—

‘महाराज! अतुल ऐश्वर्य से युक्त होकर राजा श्रीपाल आज चम्पापुर में आ गये हैं। आप शीघ्र ही उनसे मिलें और उनका राज्य उन्हें सौंप दें।’

इस समाचार से वीरदमन पहले तो प्रसन्न हुए और श्रीपाल का कुशल समाचार पूछा पुन: दूसरे क्षण ही राज्य वापस देने की वार्ता सुनकर क्रोध भरे स्वर में बोले—

‘दूत! क्या तू यह नहीं जानता कि राज्य और स्त्री केवल माँगने से ही कोई दे देते हैं क्या? इन्हें पाने के लिए बाहुबल की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। बिना वीरता दिखाये राज्य प्राप्त कर लेना असंभव है। श्रीपाल की बाहुओं में यदि बल है तो वह रणांगण में उतरे। युद्ध में ही राज्याधिकार का निर्णय होगा।’

यद्यपि दूत ने नम्रता भरे शब्दों में राजा श्रीपाल का वैभव बताया और उनके बल पराक्रम की बात सुनाई किन्तु राजा वीरदमन के गर्व को दूर नहीं कर सका। तब उसने आकर श्रीपाल से सारी बातें बता दी। श्रीपाल को आवेश आ गया वे बोले—

‘अहो! चाचा वीरदमन को आज इतना अहंकार हो गया है मेरे द्वारा धरोहर में दिए गये मेरे ही राज्य को वे वापस नहीं देना चाहते हैं और युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। अच्छा, ठीक है।’

ऐसा कहकर उन्होंने तत्क्षण ही रणभेरी बजवा दी। दोनों ही सेनाओं में भयंकर युद्ध होने लगा। तमाम सैनिकों का नाश हो रहा था। यह देखकर दोनों पक्ष के मंत्रियों ने यह कहा—

‘अहो! यह सेना का विनाश अपने ही राज्य का तो विनाश है अत: सेना के विध्वंस की अपेक्षा ये दोनों वीर ही स्वयं क्यों न युद्ध कर लें!’

इस प्रकार विचार करके मंत्रियों ने दोनों के समक्ष प्रस्ताव रक्खा। दोनों ने उसे स्वीकार किया और आमने- सामने खड़े हो गये। वीरदमन ने कहा–

‘बेटा श्रीपाल! आओ, हम दोनों आपस में युद्ध कर इस राज्य के अधिकारी निर्णय कर लें।’

श्रीपाल ने कहा—

‘चाचाजी! हम तैयार हैं, परन्तु आपसे एक बार हम पुन: निवेदन करते हैं कि आप दूसरे के राज्य पर अपने अधिकार का मोह छोड़ दें। आपको मैंने सदैव पिता के तुल्य गिना है अतएव आपको युद्ध में परास्त करना मैं उचित नहीं समझता।’

वीरदमन ने हँसकर कहा—

‘अरे! युद्ध भूमि में पिता और पुत्र का संबंध कैसा?’

इत्यादि वचनों से जब वे आपस में नहीं समझे, तब युद्ध शुरू हो गया। इन दोनों में बहुत देर तक भयंकर युद्ध चलता रहा। अंत में श्रीपाल ने वीरदमन को परास्त कर दोनों हाथों से ऊपर उठा लिया। वे उस समय उन्हें धरती पर पटक सकते थे किन्तु दयाद्र्र हृदय से श्रीपाल ने अपने चाचा को पृथ्वी पर धीरे से लिटा दिया। तत्काल ही ‘जय जयकार’ की विजय ध्वनि से आकाश मण्डल गूँज उठा। तब लज्जित हुए वीरदमन ने कहा—

‘पुत्र! मैं तुमसे परास्त हो गया, तुम सचमुच में महाबली कोटिभट हो। तुम्हारे जैसे वीर के जन्म से मेरा वंश प्रशंसनीय है।’

तब श्रीपाल ने उत्तर दिया—

‘चाचाजी! यह सब आपके ही आशीर्वाद का फल है। मैं तो आपका आज्ञाकारी हूँ, आप जैसा आदेश देंगे, मैं वैसा ही करूँगा।’

उस समय वीरदमन का हृदय पूर्णतया विरक्त हो चुका था अत: उन्होंने कहा—

‘बेटा! अब तुम अपना राज्य संभालो। अब तो मैं जिनदीक्षा लेना चाहता हूँ।’

उसी क्षण आनंद के बाजे बजने लगे। ये सभी लोग गाजे-बाजे के साथ शहर में आ गए। चाचा वीरदमन ने बड़े प्रेम से श्रीपाल का राज्याभिषेक करके राज्य समर्पण कर दिया और उन्हें उचित शिक्षा उपदेश देकर आप स्वयं वन में जाकर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर मुनि बन गए।

श्रीपाल और मैना सुन्दरी को पुत्र रत्न की प्राप्ति

इधर अपने राज्य को प्राप्तकर श्रीपाल ‘महामंडलेश्वर’ राजा बन गए। अपनी प्रजा को सर्व प्रकार से सुखी करते हुए प्रजावत्सल कहलाए। उनका ऐश्वर्य इंद्र के समान प्रशंसनीय था, अनेक देशों के राजा उनकी आज्ञा के अधीन थे। श्रीपाल प्रतिदिन जिनपूजा और चतुर्विध संघ को दान देना आदि षट् आवश्यक क्रियाओं को बड़ी ही रुचि से किया करते थे।

कुछ समय बाद मैनासुंदरी ने गर्भ धारण किया, तब उसे शुभ दोहले होने लगे। श्रीपाल उनकी पूर्ति करके मैनासुंदरी के साथ जिनपूजा आदि क्रियायें किया करते थे। नवमास बाद मैनासुंदरी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। उसका नाम धनपाल रक्खा गया और शहर भर में उत्सव मनाए गए। राजा ने उस समय इतना दान दिया कि वहाँ शहर में कोई दरिद्री रह ही नहीं गया। इसके बाद मैनासुंदरी के क्रम से महापाल, देवरथ और महारथ नाम के तीन पुत्र और उत्पन्न हुए।

रयनमंजूषा ने सात पुत्रों को जन्म दिया और गुणमाला ने पाँच पुत्र प्राप्त किए। अन्य-अन्य रानियों के भी पुत्ररत्नों की प्राप्ति हुई। इस प्रकार श्रीपाल के सब मिलाकर बारह हजार पुत्र थे। इन सब परिवार से घिरे हुए श्रीपाल इस मनुष्य लोक के सारभूत उत्तम सुखों का अनुभव कर रहे थे।