अंतर्दृष्टि

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


अंतर्दृष्टि

आतमको हित है सुख, सो सुख आकुलता बिन कहिये ।
आकुलता शिव माहिं न तातैं, शिवमग लागो चहिये । ।

बस यहाँ होता है दर्शनशास्त्र का प्रवेश, अन्तर्दृष्टि-सम्पन्न ऋषियों की शरण । अन्तर्दृष्टि खुले बिना इस कारिका का क्या मूल्य? कौन सुनता है इस व्यर्थ के प्रलाप को? कविजनों की कल्पना है । आकाश-पुष्प की प्राप्ति सम्भवत: हो जाय, परन्तु इस कल्पना को साकार हुआ न तो आजतक किसी ने देखा है और न कभी देखने की आशा ही की जा सकती है । और यदि कदाचित् दूर स्थ्यइष्य में किसी एक विरले व्यक्ति को काकतालीय न्याय से उसकी प्राप्ति सम्भव हो भी जाय तो वर्तमान छोड्‌कर भावी की आशा कौन करेगा?

आतम को हित है सुख, सो सुख विषय- भोग में लहिये ।
विषय- भोग धन बिन नहिं तातैं, धन ही धन उपजइये । ।

इस कारिका के प्रत्यक्ष अर्थ को छोड्‌कर उपर्युक्त कारिका के काल्पनिक अर्थ को हस्तगत करने का प्रयास जलगत चन्द्रबिम्ब को हस्तगत करने के प्रयास से अधिक और क्या है? ये कुछ तर्क हैं उनके, जिनको अन्तर्दृष्टि प्राप्त नहीं हुई है । इन्हें हम सर्वथा देथ्या भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐन्द्रिय जगत में इससे ऊपर और है ही क्या? चेसी अन्य से सुनकर या पढ़कर उक्त कारिका का पाठ करने वालों को वह दृष्टि न्न्त हो गयी हो, ऐसा भी नहीं है । जहाँ उस कारिका का वाफ्य अर्थ स्थित है जहां प्रवेश किये बिना, केवल कारिका का पाठ कर देने मात्र से अपने को अन्तदृष्टि-सम्पन्न समझ लेना अपनी अखि में स्वयं धूल झोंकना है । शब्द भी उसी ऊकार ऐन्द्रिय-जगत का पदार्थ है जिस प्रकार कि विषय-भोग तथा धन । शब्द -क भी भोग होता है और सम्भवत: विषय-भोग से अधिक । विषय-भोग की परिधि इवल एक व्यक्ति तक सीमित है जबकि शब्द भोग की परिधि हजारों तथा लाखों व्यक्तियों के भोग को अपने भीतर समेट लेती है । विषय-भोग से धन का लोभ ज्न्न्त्र होता है और शब्द-भोग से प्रशंसा सुनने का लोभ । दोनों में कोई अन्तर ?ए । केवल वस्त्र बदल लेने से व्यक्ति नहीं बदलता । लोभ नये वेश में रंग- मंच पर आया है यह बात अन्तर्दृष्टि वाला ही जान सकता है । वह जानता है इसलिये बचता है, जो नहीं जानता वह बचता भी नहीं । धन तथा तज्जनित भोग जिस प्रकार व्यक्ति के साथ न जाकर यहीं रह जाता है उसी प्रकार शब्द तथा तज्जनित प्रशंसा भी व्यक्ति के साथ न जाकर यहीं रह जाती है ।

हे भव्य! हे मुमुक्षु! समस्त बाह्य प्रपंचों से हटकर स्वयं अपने भीतर देख, वहाँ जहाँ कि उक्त कारिका का अखण्ड-पाठ नित्य चल रहा है और चलता रहेगा, उस समय तक जबतक कि उसका अर्थ हस्तगत नहीं हो जाता । हे महापुण्डरीव! अपनी महत्ता को देख क्षुद्र मत बन । क्या दासत्व तुझे अच्छा लगता है? यदि नहीं तो स्वतन्त्रता के लिये प्रयास क्यों नहीं करता? ओह! समझा, तुझे अपने दासत्व की प्रतीति ही कब है? होती तो एक ही झटके में सब बन्धन तोड़ डालता, सब बेड़िये चकनाचूर कर डालता । प्तरन्तु अन्तर्दृष्टि बिना इस बन्धन की भी प्रतीति कैसे हो? बाहर में तो तू स्वतंत्र है ही, व्यक्ति की अपेक्षा भी और राष्ट्र की अपेक्षा भी जो चाहे करे जो चाहे छोड़े जो चाहे भोगे ।

भूलता है प्रभो! भूलता है आ गुरुओं की शरण में और तब ही पता चलेगा तुझे कि तू स्वतंत्र है या परतन्त्र । विशान ने इतनी उन्नति की पृथ्वी पर स्वर्ग उतारा, परन्तु क्या वह भी स्वतंत्र- है? यदि है तो इतना आतंक क्यों, इतनी आशंका क्यों? देख तनिक भीतर चलकर देख, सभी परिस्थितियों से बँधे हैं व्यक्ति हो या समाज, देश हो या रष्ट्र ज्ञान हो या विज्ञान, जो कुछ करता है सब परिस्थितिवश । परिस्थिति बाध्य न करे तो कौन इतना संघर्ष करे । सर्वत्र संघर्ष - मचा है भीतर भी और बाहर भी व्यक्ति में भी समाज में भी, राष्ट्र में भी, और सकल विश्व में भी । यह सब कुछ क्यों? बस एक उत्तर है, 'परिस्थितिवश' । न चाहते हुए भी परिस्थितिवश करना पड़ता है इससे बड़ी दासता और क्या है? परन्तु यह 'परिस्थिति क्या वस्तु है और कहाँ बैठी है, क्या इसका भी विचार किया है कभी? ऐन्द्रिय-जगत में विचरण करने वाले के लिये यह सम्भव 'ही कब है? उसमें परिस्थिति की प्रतीति होती है, परन्तु 'परिस्थिति क्या वस्तु है' इस विचार के लिए वहाँ अवकाश नहीं । तब उसकी खोज की तो बात ही क्या । परिस्थितियों में रहते हुए भी परिस्थिति को न देखना, इससे बड़ा अन्धपना क्या? आ गुरुदेव की शरण में । वह ज्ञानाझन के द्वारा तेरा तृतीय नेत्र खोल देंगे, और तभी सम्भव हो सकेगा तेरे लिये उसे देखना, उसे जानना । तब ऋषि बन जायेगा तू द्रष्टा बन जायेगा तू ज्ञाता बन जायेगा तू । तब तू देखेगा कि इस ऐन्द्रिय जगत की अपेक्षा अनन्त गुणा जगत तेरे भीतर बसा हुआ है । चित्तगत इस छोटे मे मंच पर इतना विशाल जगत नृत्य कर रहा है कि उसका ओर छोर पाना कठिन है । इन्द्रिय-पथ में आने वाला यह सकल बाह्य-जगत एक रेणु की भांति उसके एक कोने में पड़ा दिखाई भी नहीं देता है ।

चिर-परिचित इन्द्रिय के राज्य को छोड्‌कर एक बार केवल एक बार, इसमें स्वेश कर । तू चकित रह जायेगा, सारा रहस्य समझ जायेगा । इसे न जानने -ग् कारण ही तू परिस्थितियों का दास बना हुआ है, और दास होकर भी अपने ये स्वतन्त्र समझ रहा है । मत घबरा यह तेरा अपना जीवन है । जिस जीवन में त्रु रह रहा है वह तेरा बाह्य जीवन है और चित्त के नाम से जिसका उल्लेख मैं न रहा हूँ वह तेरा आप्यन्तर जीवन है । इन्द्रिय-पथ में आने के कारण बाह्य- जेवन ही आजतक तेरे परिचय में आया है । इन्द्रियों से अतीत होने के कारण व्ह आभ्यन्तर जीवन न तो आजतक तेरे परिचय में आया है, और न तूने इसे -ज्ञानने का प्रयत्न ही किया है । प्रयत्न करता भी कैसे, परिस्थितियाँ तुझे अपनी टटग्-पूर्ति के अतिरिक्त अन्य प्रयत्न करने के लिए अवकाश ही कब देती हैं? दृनंगलए तो तुझे दास, लाचार, दीन तथा हीन कह रहा हूँ ।

एक बार केवल एक बार अपने इस आभ्यन्तर-जीवन में प्रवेश कर । तब ल्म बाह्य-जीवन का तेरे लिये कोई मूल्य नहीं रह जायेगा । कांच के टुकड़ों में ८ किसी एक चमकदार कांच खण्ड को हाथ में लेकर ही तू सन्तुष्ट बना हुआ है रत्न के हस्तगत हो जाने पर तू अन्य धुँधले कांच खण्डों की भांति इसे भी छेडु देगा । वह इसकी अपेक्षा अधिक सत्य है । उसके समक्ष यह बाह्य-जीवन इग्एऐ तू सत्य समझ रहा है, वास्तव में असत्य है, भ्रान्त है । इसकी सत्यता केवल दुर्ग-लिए भास रही है कि इन्द्रियों में इसके अतिरिक्त अन्य कुछ देखने की शक्ति न्हॅ? है । सागर को रत्नाकर कहा गया है, परन्तु उसका वह रत्नाकरत्व उसमें ख्वुं स्थित है? इन्द्रियों के द्वारा तो केवल उसका 'उदधि' वाला रूप ही सत्य है रत्नाकर वाला रूप नहीं । इसी प्रकार इन्द्रियों के राज्य में केवल यह बाह्य- त्रेघ्न ही सत्य है, आष्यन्तर जीवन नहीं । परन्तु जिस प्रकार उदधि के भीतर रनके तल भाग में जाने पर रत्नाकर सत्य है, उसी प्रकार इस बाह्य-जीवन के टेलर इसके तल-भाग में जाने पर आभ्यन्तर-जीवन सत्य है । जिस प्रकार ज्न्नाकर के हस्तगत हो जाने पर उदधि निर्मूल तथा निःसार हो जाता है, उसी -मार आष्यन्तर-जीवन के हस्तगत हो जाने पर बाह्य-जीवन निर्मूल्य तथा निःसार हो 'जाता है । हे प्रभो! तू एक बार इसमें डूबकी लगा, मैं तुझे विश्वास दिलाता हूँ कि वह इसकी अपेक्षा अधिक सत्य है, इसकी अपेक्षा अधिक स्थायी है, इसकी ' अपेक्षा अधिक मूल्यवान है ।

वही वास्तव में तेरे बाह्य-जीवन का प्राण है, उसके अभाव में यह निष्प्राण . है । मृत्यु के समय इन्द्रियगम्य यह बाह्य-शरीर तो रहता है परन्तु उससे अतीत आष्यन्तर-जीवन चला जाता है, जिसे जगत के लोग समझ नहीं पाते और व्यक्ति को मृत मानकर रोने लगते हैं । वास्तव में व्यक्ति नहीं मरा है, शरीर मरा है । मृत्यु केवल निषाण होने का नाम है । 'चित के नाम से कहा गया तेरा आष्यन्तर- - जीवन ही वास्तव में इसका प्राण है । व्यक्ति का व्यक्तित्व उसी में निहित है, शरीर इइऐऐ में नहीं । लोक में भी प्रसिद्ध है कि शरीर के सुन्दर- असुन्दर होने से व्यक्ति का व्यक्तित्व सुन्दर-असुन्दर नहीं होता, चित्त के सुन्दर-असुन्दर होने से ही वह सुन्दर-असुन्दर होता है । इसलिए चित्त ही अधिक सत्य है, शरीर नही । तेरी सकल परिस्थितियाँ भी वास्तव में वहाँ ही निवास करती है, शरीर में अथवा इसके साधनभूत इस बाह्य-जगत में नहीं । पुत्र मित्र कलत्रादि में, घर मे, समाज में अथवा राष्ट्र या अन्तर्राष्ट्र में उनका प्रतिभास होता है, परन्तु वह प्रतिभास भ्रान्त है । इस रहस्य को भी तू उसी समय समझ सकेगा जबकि चित्त नाम से कथित इस आभ्यन्तर लोक में तू प्रवेश करेगा और उसके प्रत्येक प्रान्त में जा जाकर तू उसका अवलोकन करेगा ।