अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव

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अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव के साथ १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का हुआ भव्य उद्घाटन

‘‘दिव्यशक्ति गणिनी माता की तपस्या के प्रति नतमस्तक हुआ सम्पूर्ण विश्व’’

    १०८ भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का भव्य उद्घाटन-

    कड़ी मेहनत, कठिन साधना और मुश्किलों को आसान बनाते हुए २० साल के उपरांत जब १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का निर्माण पूर्ण हुआ, तब सम्पूर्ण विश्व की दिगम्बर जैन समाज के साथ ही शासन-प्रशासन के व्यक्तियों में भी हर्ष की लहर कायम हो गई और प्रत्येक व्यक्ति का रोम-रोम पुलकित हो गया था, जिसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। सर्वप्रथम दिनाँक २४ जनवरी २०१६ को प्रतिमा के नेत्र खुलते ही प्रतिमा की पूर्णता घोषित की गई। पश्चात् ११ फरवरी से १०८ फुट भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव का ऐतिहासिक शुभारंभ हुआ।

    १२५ पिच्छीधारी साधु-साध्वियों के महत्वपूर्ण सान्निध्य में एवं विशेषरूप से आचार्य श्री शांतिसागर परम्परा के सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज के प्रमुख सान्निध्य और परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सान्निध्य में इस विशाल प्रतिमा का पंचकल्याणक शतकगुणित अतिशय को प्राप्त करके विश्व शिखर पर अपनी प्रभावना के गुण गा रहा था।

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    अनेकानेक विशिष्ट उपलब्धियों और कीर्तिमान के साथ भगवान ऋषभदेव का अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव औपचारिक घोषणा के अनुसार लगातार ६ मार्च तक मनाया गया। पश्चात् यह आयोजन सतत महामस्तकाभिषेकपूर्वक जून २०१६ तक मनाने के प्रारूप में कमेटी द्वारा उद्घोषित किया गया। महोत्सव में ११ फरवरी से १७ फरवरी तक भगवान की अतिशयकारी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न की गई। पुन: १८ फरवरी को भगवान का ऐतिहासिक प्रथम महामस्तकाभिषेक आयोजित किया गया, जिसमें प्रथम, द्वितीय, तृतीय कलश एवं पंचामृत सामग्री के द्वारा विशेष सौभाग्यशाली भक्तों ने भगवान का अभिषेक करके समूचे विश्व में सप्तरंगी महामस्तकाभिषेक की गूंज फैलाई। इसी के
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साथ हजारों नहीं लाखों की संख्या में सम्पूर्ण देश ही नहीं विदेश से भी भक्तों ने ऋषभगिरि, मांगीतुंगी पधारकर भगवान के महामस्तकाभिषेक में भाग लिया और ६ मार्च तक लगभग १५ लाख श्रद्धालुओं ने अतिशयकारी भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का अवलोकन, पूजा-अनुष्ठान व महामस्तकाभिषेक करके अपने जीवन को धन्य-धन्य किया। महोत्सव की ऐसी आशातीत सफलता को देखकर हर किसी ने ‘‘न भूतो न भविष्यति’’ कहकर नि:शब्द हो जाना ही उचित समझा। इस महोत्सव की चमक-दमक तथा शब्दातीत योजना का प्रारूप हर किसी आने वाले भक्त के दिल, दिमाग और नयनों को अतितृप्त करके संतोष के महासागर में सतत स्नान कराता रहा।

    आइये कतिपय शब्दों में गूंथे हुए इस महोत्सव के एक संक्षिप्त इतिहास से आपको परिचित कराते हैं-

११ फरवरी २०१६-झण्डारोहण

    माघ शुक्ला तृतीया, दिनाँक ११ फरवरी, गुरुवार का दिन इतिहास का सर्वश्रेष्ठ दिन था, जब १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक हेतु झण्डारोहण का मुहूर्त प्राप्त हुआ। २० साल की कड़ी मेहनत के उपरांत प्राप्त हुए जिनबिम्ब के लिए जब महापंचकल्याणक की शुभांरभ तिथि
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आई, तो इस तिथि को हर व्यक्ति ने अपने जीवन में खूब सराहा और महान अतिशयकारी तथा शुभ मानकर भक्तों ने ११ फरवरी का दिन अपने जीवन के लिए भी मंगलकारी प्रतीत किया।     इस महोत्सव का झण्डारोहण भारतवर्षीय दिगम्बर जैन
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तीर्थक्षेत्र कमेटी की प्रथम महिला-अध्यक्ष सौ. सरिता एम.के. जैन-चेन्नई के द्वारा किया गया। समस्त साधु-संतों की सन्निधी में प्रतिष्ठाचार्य पं.विजय कुमार जैन- जम्बूद्वीप, पं. नरेश कुमार जैन-जम्बूद्वीप, पं. दीपक उपाध्याय-सांगली, पं. प्रदीप जैन मधुर-मुम्बई, पं. वृषभसेन उपाध्याय-
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मालगांव, पं. सतेन्द्र जैन- तिवरी व पं. सम्मेद उपाध्याय- साजणी के द्वारा महोत्सव का झण्डारोहण विधि - विधानपूर्वक सम्पन्न कराया गया।     विशेषरूप से इस दिन तुरही वादकों ने महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर तुरहीनाद का उद्घोष करके महोत्सव की अगुवानी की तथा समस्त
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साधु-संतों का स्वागत- अभिनंदन किया। इस प्रकार यह महोत्सव झण्डारोहणपूर्वक ठाट- बाट के साथ प्रारंभ हुआ।

    समारोह के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में महाराष्ट्र के विधानसभा अध्यक्ष माननीय श्री हरिभाऊ जी बागड़े का आगमन भी हुआ और उनके साथ नासिक जिले के जिलाधिकारी माननीय श्री दीपेन्द्र सिंह कुशवाहा जी और अनेक प्रशासनिक पदाधिकारियों ने भी इस अवसर पर उपस्थित रहकर समारोह का उद्घाटन किया।

    शुभारंभ दिवस पर ही श्री श्रीपाल जैन गंगवाल-गेवराई परिवार द्वारा मण्डप उद्घाटन करके भगवान को पण्डाल की वेदी पर विराजमान किया गया तथा वेदी पर मंगल कलश की स्थापना वंâचनबाई विद्या प्रकाश, संजय, अजय

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दीवान परिवार-सूरत के द्वारा की गई। साथ में अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन श्री अनिल कुमार जैन, प्रीतविहार-दिल्ली के हस्ते सम्पन्न हुआ। इस दिन मध्यान्हकाल में सकलीकरण विधि, अंकुरारोपण, जाप्यानष्ठान संकल्प आदि सम्पन्न हुआ और रात्रि में प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा भेरीताड़न विधि आदि करवाई गई।

    इस दिन कार्यक्रम के शुभारंभ में प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा मंगलाष्टकपूर्वक मंगलाचरण किया गया पुन: सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज सहित समस्त आचार्यों को एवं पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी, प्रज्ञाश्रमणी र्आियका श्री चंदनामती माताजी व पूज्य पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी सहित अन्य आर्यिकाओं को गुरुआज्ञा हेतु श्रीफल समर्पित किये गये। इस अवसर पर समस्त प्रतिष्ठाचार्यों को भी समिति द्वारा आचार्य निमंत्रण हेतु सम्मानित किया गया।

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    वेदी पर भगवान विराजमान करते पूज्य पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी के साथ श्री श्रीपाल गंगवाल, गेवराई सपरिवार




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    भगवान विराजमान के उपरांत प्रतिमा का चरण स्पर्श करतीं आर्यिका श्री चंदनामती माताजी



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    वेदी पर अखण्ड दीप प्रज्ज्वलित करते श्री अनिल कुमार जैन-सौ.अनीता जैन, प्रीतविहार-दिल्ली।





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    महोत्सव के शुभारंभ में वेदी पर मंगल कलश की स्थापना करते श्री विद्याप्रकाश जैन-सौ. सुनीता जैन दीवान परिवार, सूरत (गुजरात)

दिनाँक-१२ फरवरी २०१६, यागमण्डल विधान

    माघ शुक्ला चतुर्थी/पंचमी, दिनाँक १२ फरवरी, शुक्रवार के दिन महोत्सव की निर्विघ्न सफलता हेतु प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा यागमण्डल विधान सम्पन्न कराया गया। इस अवसर पर प्रमख पात्रों में सौधर्म इन्द्र श्री जे० सी० जैन-सौ०
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सुनीता जैन -हरिद्वार, भगवान के माता-पिता डॉ० पन्नालाल पापडीवाल-सौ० कुमकुम देवी पापडीवाल- पैठण, धनकुबेर श्री मनोज जैन-सौ० नवीता जैन- मेरठ, महायज्ञनायक श्री प्रमोद कुमार जैन-सौ० अनीमा जैन, माडॅल टाउन-दिल्ली, ईशान इन्द्र-श्री सुरेश संघवी-सौ० अंजना संघवी बाँसवाड़ा (राज.), महामडलीक राजा श्री महावीर प्रसाद जैन-सौ० कुसुमलता जैन, साउथ एवस.-दिल्ली, श्री कमलचदं जैन-सौ० मैनासुन्दरी जैन, खारीबावली-दिल्ली, श्री अनिल कुमार जैन-सौ० अनीता जैन, प्रीतविहार-ादिल्ली, सानत्कुमार इन्द्र श्री सुनील कुमार जैन सर्राफ-सौ० मीनाक्षी जैन-मेरठ, माहेन्द्र इन्द्र श्री दीपक जैन-सौ० सुभाषिनी जैन-वाराणसी (उ.प्र.) आदि मंच पर विराजमान प्रमुख पात्रों व इन्द्र-इन्द्राणियों ने भक्तिभाव के साथ मडंल पर श्रीफल आदि अर्घ्य समर्पित करते हएु यागमण्डल विधान सम्पन्न किया। इससे पूर्व प्रतिदिन अनुसार सर्वप्रथम प्रात:काल २४ विभिन्नवेदियों पर २४ तीर्थंकर भगवन्तों का भव्य पंचामृत अभिषेक इन्द्र-इन्द्राणियों द्वारा सम्पन्न किया गया व सौभाग्यशाली भक्तों ने शांतिधारा का पुण्यार्जन किया।

    विशेष - इसी दिन से दशलक्षण पर्व एवं सोलहकारण पर्व का भी शुभारम्भ हुआ तथा १२ फरवरी, माघ शुक्ला चतुर्थी/पंचमी को ही भगवान विमलनाथ का जन्म, तप कल्याणक भी मनाया गया।

दिनाँक-१३ फरवरी २०१६, गर्भकल्याणक

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    माघ शुक्ला षष्ठ, दिनाँक १३ फरवरी, शनिवार को गर्भकल्याणक की पूजा सम्पन्न की गई और सायंकाल
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भगवान की माता सौ. कुमकुम देवी पापड़ीवाल की गोद भराई का आयोजन भव्यता के साथ किया गया। पश्चात् सुधर्मा सभा का आयोजन हुआ। साथ ही भगवान की माता मरुदेवी बनी सौ. कुमकुमदेवी द्वारा १६ स्वप्नों का दिग्दर्शन और भगवान का माता के गर्भ में आने का मंचन अत्यन्त सुन्दररूप में मंच पर दिखाया गया। माता के गर्भ में भगवान के आगमन पर अष्टकुमारी देवियाँ उनकी सेवा में लग गर्इं और भगवान की माता ने पिता नाभिराय

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बने डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल से अपने १६ स्वप्नों का अर्थ जानकर अत्यन्त हर्ष को प्राप्त किया। महोत्सव में अष्टकुमारी देवियाँ बनने का सौभाग्य कु. नमिता कासलीवाल-औरंगाबाद, कु. अंकिता कासलीवाल- औरंगाबाद, कु. साक्षी जैन-खण्डवा, कु. ईशा पाटनी-औरंगाबाद, कु. हर्षिता पाटनी-लोनी, कु. मोक्षा जैन-सूरत, कु. शैफाली जैन-टिकैतनगर एवं कु. गौरी जैन-सटाणा ने प्राप्त किया। इस अवसर पर धनकुबेर बने श्री मनोज जैन-नविता जैन-मेरठ (उ.प्र.) ने तीर्थंकर बालक के गर्भ में आने एवं जन्म के उपलक्ष्य में रत्नवृष्टि करके पुण्यार्जन किया और भक्तों को रत्न तथा समवसरण का सुन्दर रजत मोमेन्टो भेंट किया।

दिनाँक १४ फरवरी २०१६, जन्मकल्याणक

    माघ शुक्ला सप्तमी, दिनांक १४ फरवरी,

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भगवान के माता-पिता बने सौ. कुमकुमदेवी पापड़ीवाल एवं

डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल की गोद भराई







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गोद भराई करते श्री संजय-अंजली पापड़ीवाल एवं श्री विजय-माधुरी पापड़ीवाल सपरिवार, पैठण (महा.)। इस अवसर पर परिवार के सभी सदस्यों के साथ ही सैकड़ों श्रद्धालु भक्तों व इन्द्र-इन्द्राणियों ने भी माता-पिता की गोद भराई करके पुण्य अर्जित किया।




    रविवार को भगवान का जन्मकल्याणक का उत्सव भारी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस दिन डेढ़लाख से ज्यादा
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श्रद्धालु भक्त जन्मकल्याणक मनाने के लिए ऋषभगिरि, मांगीतुंगी में उपस्थित हुए। प्रात:काल मंच पर पूज्य गणिनीप्रमुख र्आियका श्री ज्ञानमती माताजी के मुखारविंद से मंत्रोच्चारपूर्वक भगवान के जन्म की घोषणा की गई। मध्य लोक में जब भगवान ऋषभदेव का अयोध्या नगरी में स्थित सर्वतोभद्र महल में जन्म हुआ, तब दूसरी ओर स्वर्ग के इन्द्रों में हड़कम्प मच गई और सौधर्म इन्द्र का आसन कम्पायमान होने लग गया, समस्त इन्द्रों के मुकुट झुक गये आदि दृश्य का मंचन अत्यन्त सुन्दर रूप में सभा के मध्य किया गया। इस अवसर पर सौधर्म इन्द्र बने श्री जे.सी. जैन एवं शचि इन्द्राणी सौ. सुनीता जैन- हरिद्वार ने अत्यन्त आकर्षक मनोभावों के साथ सभा के मध्य संवाद प्रस्तुत
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किया और हजारों इन्द्र-इन्द्राणियों के साथ ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र का आगमन सर्वतोभद्र महल में हुआ। यहाँ भगवान के पिता की आज्ञा से सौधर्म इन्द्र ने सुमेरु पर्वत की पाण्डुकशिला पर भगवान के जन्माभिषेक की स्वीकृति ली और शचि इन्द्राणी ने तीर्थंकर बालक को लाकर सौधर्म इन्द्र के हाथों में सौंपा। इस प्रकार सौधर्म इन्द्र ने १००० नेत्र बनाकर तीर्थंकर प्रभु की मनोहारी मुद्रा को निहारा तथा ऐरावत हाथी पर लेकर जुलूस के साथ भगवान का जन्माभिषेक किया। भगवान का जन्माभिषेक पाण्डाल परिसर में बनी पाण्डुकशिला पर हुआ। जन्मकल्याणक जुलूस

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का दृश्य ऐतिहासिक था, जिसमें हजारों नर-नारियों ने रंग-बिरंगी और केशरिया ध्वज लेकर जुलूस का आनंद द्विगुणित किया। बाजे- गाजे और साधु-संतों के विशाल संघ समूह के साथ जुलूस का आनंद देखते ही बनता था। इस प्रकार जन्मकल्याणक के अवसर पर हजारों नर-नारियों ने भगवान के जन्माभिषेक का पुण्य अर्जित किया। इस दिन जन्मकल्याणक की पूजा भी सम्पन्न हुई तथा सायंकाल में भगवान का पालना व बालक्रीड़ा सम्पन्न कराई गई। इस दिन
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मध्यान्ह में आकारशुद्धि आदि क्रियाएँ सम्पन्न की गर्इं।
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दिनाँक-१५ फरवरी २०१६, दीक्षाकल्याणक

    माघ शुक्ला अष्टमी, दिनाँक १५ फरवरी, सोमवार के दिन भगवान का दीक्षाकल्याणक जोर- शोर के साथ मनाया गया। भगवान ऋषभदेव ने समस्त राजपाट को छोड़कर जब वैराग्य को धारण किया, तो उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती बने श्री अभय कुमार जैन डोटिया-मुम्बई का राज्याभिषेक किया गया और भगवान का समस्त राजपाट उन्हें प्रदान किया गया। अपने राजमहल में नीलांजना का नृत्य देखते हुए

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जब नर्तकी की आयु समाप्त हुई, तो तीर्थंकर ऋषभदेव को वैराग्य हो गया और उनके वैराग्य की घोषणा होते ही लौकान्तिक देवों ने आकर भगवान की अनुमोदना की। इस दिन नीलांजना नृत्य करने का सौभाग्य कु. वीनस जैन-मुम्बई को प्राप्त हुआ तथा लौकान्तिक देव बनने का सौभाग्य श्री पियूष पापड़ीवाल-पैठण, श्री स्नेहल काला-नांदगाव, श्री जिनेश पापड़ीवाल-पैठण, श्री अजय पापड़ीवाल-पैठण, श्री संयम लोहाड़िया-खण्डवा, श्री प्रशांत पापड़ीवाल-पैठण ने प्राप्त किया। पश्चात् भगवान द्वारा पालकी में दीक्षा वन की ओर प्रस्थान हुआ और पच्ंमुष्टिकेशलोंचपूर्वक भगवान की दीक्षा का मंचन मंच पर सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर सर्वप्रथम मनुष्यों द्वारा पालकी उठायी गयी, जिसका सौभाग्य श्री राजेन्द्र कुमार जैन-आरा
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(बिहार), श्री त्रिलोकचंद सावला- रामगंज मण्डी (राज.), श्री भूपेन्द्र कुमार जैन-रामगंज मण्डी (राज.), श्री बसंतलाल केशवलाल-न्यूजर्सी (अमेरिका) एवं श्री संतोष सतीश सुनील सूरज पेंढारी-नागपुर (महा.) को प्राप्त हुआ। दीक्षाकल्याणक में सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज एवं अन्य साधु-संघों के साथ
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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने मुखारविंद से मंत्रोच्चारपूर्वक भगवान की दीक्षा की समस्त विधि सम्पन्न कराई और विधिनायक प्रतिमा के समक्ष पिच्छी और कमण्डलु रखे गये।

    इस अवसर पर पाण्डाल में मंच पर विधिनायक भगवान के समक्ष पिच्छी रखने का सौभाग्य श्री प्रमोद कुमार-अनीमा जैन, मॉडल टाउन, दिल्ली ने प्राप्त किया तथा कमण्डलु रखने का सौभाग्य श्री सुनील कुमार जैन-मीनाक्षी जैन सर्राफ-मेरठ (उ.प्र.) ने प्राप्त किया।

    इसी प्रकार सम्पूर्ण दीक्षा विधि १०८ फुट भगवान ऋषभदेव

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प्रतिमा के समक्ष भी सम्पन्न की गई, जिसमें पिच्छी रखने का सौभाग्य श्रीमती सुजाता जी शाह-पुणे ने एवं कमण्डलु भेंट करने का सौभाग्य श्री विनोद जैन-सिवान सपरिवार व पुत्री सौ. अर्पिता जैन, ब्र. अध्यात्म जैन ने प्राप्त किया। बड़े भगवान के समक्ष बड़े- बड़े पिच्छी-कमण्डलु भेंट किये गये, जिसमें २००८ मयूर पंखों वाली विशाल पिच्छिका और ३ फुट लम्बा व २.५ फुट चौड़ा विशाल कमण्डलु प्रतिमा के समक्ष रखा गया।


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    दीक्षा से पूर्व इस दिन प्रात:काल पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की विशेष प्रेरणा से मंच पर भगवान ऋषभदेव के द्वारा अपने पुत्रों को सिखाई गई २ कलाओं तथा पुत्रियों को सिखाई गई अंक लिपि और अक्षर लिपि का सुन्दर मंचन किया गया। इस अवसर पर भगवान ऋषभदेव का रोल श्री सुरेश जैन-मुरादाबाद (कुलाधिपति-तीर्थंकर महावीर
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विश्वविद्यालय) द्वारा किया गया और उन्होंने अपने पुत्र भरत-चक्रवर्ती बने श्री अभय कुमार डोटिया-मुम्बई (महा.) को तथा भगवान बाहुबली बने श्री राजकुमार सेठ- कलकत्ता (प. बंगाल) के साथ सभी पुत्रों को ७२ कलाओं का प्रशिक्षण दिया। साथ ही अपनी पुत्रियाँ ब्राह्मी बनी कु . मधुरिमा अजीत फड़े पढंरपुर (महा.) को एवं सुन्दरी बनी रानीका फडे नासिक (महा.) को अपने दाएं आरै बाएं बैठाकर क्रमश: बा्रह्मी को सीधे हाथ से अक्षर लिपि लिखने का ज्ञान कराया और सुन्दरी को उल्टे हाथ से अंक लिपि का ज्ञान कराया। इस प्रकार मंच पर भगवान द्वारा श्रावकों की आजीविका हेतु बताये गये षट्कर्मों में असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प
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का मंचन करके युग की आदि का स्मरण कराया गया, जब भोगभूमि का समापन आरै कर्मभूमि का सूत्रपात हुआ था आरै प्रजा को आजाीविका का साधन प्राप्त नहीं था, ऎसी स्थिति में भगवान ऋषभदेव द्वारा बताये गये षटकर्म का उपदेश भी नाटकीय मंचन के साथ मंच पर प्रस्तुत किया गया।

    विशेष - इसी दिन सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकान्त सागर जी महाराज के करकमलों द्वारा क्षुल्लिका श्री प्रार्थनामती माताजी को आर्यिका दीक्षा प्रदान की गई तथा गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के संघस्थ ब्र० कोमलचंद जैन-कानपुर को क्षुल्लक दीक्षा प्रदान करके क्षुल्लक उत्सवसागर जी महाराज नाम प्रदान किया गया।

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दिनाँक-१६ फरवरी २०१६, केवलज्ञानकल्याणक

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    माघ शुक्ला नवमी, दिनाँक १६ फरवरी, मंगलवार के दिन भगवान का केवलज्ञानकल्याणक मनाया गया। साधुओं एवं प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा केवलज्ञानकल्याणक की समस्त क्रियाएं मध्यान्हकाल में सम्पन्न की गर्इं। लेकिन इससे पूर्व इस दिन प्रात:काल भगवान की आहार विधि अत्यन्त भक्तिभाव के साथ कराई गई। दीक्षा के उपरांत भगवान ऋषभदेव ने ६ मास का उपवास करके तपस्या की। पुन: नवधाभक्तिपूर्वक मुनियों को पड़गाहन एवं आहारदान की विधि जनता को नहीं ज्ञात होने से ६ माह ३९ दिन तक भ्रमण किया। पश्चात् जब भगवान का आगमन हस्तिनापुर नगरी में हुआ, तो वहाँ के राजा श्रेयांस को जातिस्मरण हो जाने से नवधाभक्तिपूर्वक मुनियों को आहारदान देने की विधि ज्ञात हो गई और उन्होंने ‘हे स्वामी, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु, अत्र, अत्र, अत्र...........’ आदि बोलकर भगवान ऋषभदेव का पड़गाहन किया और उन्हें
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इक्षुरस से आहारदान दिया। उक्त समस्त घटनाक्रम का मंचन महोत्सव में सम्पन्न किया गया और प्रतिष्ठाचार्य पं. विजय कुमार जैन ने शुद्धिपूर्वक भगवान की प्रतिमा को लेकर आहार के लिए प्रस्थान और भ्रमण किया। हजारों श्रद्धालुओं द्वारा भगवान को अन्यथा विधि से आहार हेतु बुलाने पर भगवान का पडगाहन नहीं हो सका, लेकिन अंततोगत्वा राजा श्रेयांस बने श्री संजय जैन-सौ. रेखा जैन दीवान-सूरत परिवार ने जब भगवान को नवधाभक्तिपूर्वक पड़गाहन किया, तो उनके राजमहल


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में भगवान का आहार सम्पन्न हुआ। इस प्रकार संजय दीवान जी ने अपनी माँ कंचनबाई, भाई विद्या प्रकाश, अजय जैन दीवान आदि के साथ भगवान को इक्षुरस का प्रथम आहार देकर पुण्य अर्जित किया।

    राजा श्रेयांस के साथ उनके भाई राजा सोमप्रभ के रूप में श्री प्रद्युम्न कुमार जैन छोटी सा.-टिकैतनगर परिवार ने भी भगवान को आहार देने का पुण्य अर्जित किया।

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मध्यान्ह काल में अंकन्यास, नेत्रोन्मीलन, तिलकदान आदि विधि सम्पन्न हुई और भगवान का केवलज्ञानकल्याणक मनाया गया। भगवान को केवलज्ञान होते ही मंच पर सुन्दर समवसरण की रचना निर्मित की गई और सायंकाल में समस्त चतुर्विध संघ श्रावक-श्राविका आदि के मध्य भगवान की दिव्यदेशना के रूप में गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री

ज्ञानमती माताजी ने अपना शास्त्रीय

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उद्बोधन प्रदान करते हुए तीर्थंकर भगवान के केवलज्ञान का महत्व तथा समवसरण की महिमा का वर्णन किया। इसी अवसर पर सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज व उनके साथ अन्य साधुसंतों की भी मंगल वाणी सभा के मध्य प्रस्तुत हुई।

    विशेष - १६ फरवरी के दिन मंच

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पर विराजमान ऐलाचार्य मुनि श्री निजानंदसागर जी महाराज का ३५वाँ दीक्षा दिवस समारोह भी समस्त मंचासीन साधुगणों द्वारा हर्ष के साथ मनाया गया और भक्तों व संघस्थ शिष्यों द्वारा ऐलाचार्य श्री का पादप्रक्षाल करके अघ्र्य समर्पण किया गया। इस अवसर पर उनके करकमलों में साधुओं ने नूतन पिच्छिका भी भेंट की और महाराज जी के रत्नत्रयपूर्ण दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामनाएं कीं।

दिनाँक-१७ फरवरी २०१६, मोक्षकल्याणक

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मोक्षकल्याणक

    माघ शुक्ला दशमी, दिनाँक १७ फरवरी, बुधवार को भगवान का मोक्षकल्याणक अत्यन्त भक्तिभाव के साथ सम्पन्न किया गया। इस दिन १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के समक्ष पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी एवं अन्य साधु-संतों के सान्निध्य में मंत्रोच्चारपूर्वक प्रमुख इन्द्र-इन्द्राणियों द्वारा मोक्षकल्याणक की क्रियाएँ सम्पन्न की गर्इं।
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इसके साथ ही मंच पर विधिनायक प्रतिमा के मस्तक पर उक्त क्रियाएँ सम्पन्न हुर्इं और भगवान ने मोक्ष प्राप्त करके सिद्धशिला में अवगाहन किया। मोक्षकल्याणक के उपरांत अग्नि कुमार इन्द्रों द्वारा भगवान के नख,
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केश का संस्कार किया गया आरै सभी भक्तों ने भगवान के मोक्ष की खुशियाँ मनाकर भगवान ऋषभदेव पूजन के साथ निर्वाणकांड पढ़कर विशाल निर्वाणलाडू समर्पित किया।

    इस प्रकार

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सायंकाल विशाल रथयात्रा जुलूस के साथ समापन हुआ |
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