ऋषभदेव विधान (लघु)

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ॐ नम: सिद्धेभ्य:

श्री ऋषभदेव विधान

मंगलाचरण

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शंभुछंद

हे आदिनाथ! हे आदीश्वर! हे ऋषभ जिनेश्वर! नाभिललन!
पुरुदेव! युगादि पुरुष ! ब्रह्मा, विधि और विधाता मुक्तिकरण।।
मैं अगणित बार नमूँ तुमको, वन्दूँ ध्याउँ गुणगान करूँ।
स्वात्मैक परम आनन्दमयी, सुज्ञान सुधा का पान करूँ।।१।।

आषाढ़ बदी दुतिया तिथि थी, मरुदेवी गर्भ पधारे थे।
श्री ह्री धृति आदि देवियों ने, माता के चरण पखारे थे।।
शुभ चैत्र वदी नवमी तिथि थी, भगवान यहाँ जब थे जन्मे।
तब मेरु सुदर्शन के ऊपर, अभिषेक किया था इन्द्रों ने।।२।।

वो घड़ी धन्य थी धन्य दिवस, धन धन्य अयोध्या नगरी थी।
श्री नाभिराज भी धन्य तथा, तब धन्य प्रजा भी सगरी थी।।
प्रभु ने असि मसि आदिक किरिया, उपदेशी आदि विधाता थे।
थे युग के आदिपुरुष ब्रह्मा, श्रावक-मुनिमार्ग विधाता थे।।३।।

थे कनक वर्ण धनु पंच शतक, तनु वे युग के अवतारी थे।
आयू चौरासी लाख पूर्व, धारक वृष लक्षणधारी थे।।
दीक्षा से तीर्थ प्रयाग बना, जहाँ नग्न दिगम्बर रूप धरा।
वह चैत्र वदी नवमी शुभ थी, जिस दिन प्रभु ने कचलोंच करा।।४।।

षट् मास योग में लीन रहे, लंबित भुज नासादृष्टी थी।
निज आत्म सुधारस पीते थे, तन से बिल्कुल निर्ममता थी।।
फिर ध्यान समाप्त किया प्रभु ने, आहार विधी बतलाने को।
भवसिंधू में डूबे जन को, मुनिमार्ग सरल समझाने को।।५।।

षट् मास भ्रमण करते-करते, प्रभु हस्तिनागपुर में आये।
सोमप्रभ नृप श्रेयांस तभी, आहारदान दे हर्षाये।।
रत्नों की वर्षा हुई गगन से, सुरगण मिल जयकार किया।
धन-धन्य हुई वैसाख सुदी, अक्षय तृतिया आहार हुआ।।६।।

अक्षयवटवृक्ष तले तिष्ठे, घाती पर ध्यान चक्र छोड़ा।
एकादशि फाल्गुन कृष्णा थी, केवलश्री से नाता जोड़ा।।
त्रिभुवन में ज्ञान लता फैली, भविजन को छाया सुखद मिली।
फिर माघ कृष्ण चौदश के दिन, मुक्तिश्री प्रभु के गले मिली।।७।।

क्रोधादिक रिपु को जीत प्रभो, स्वात्मा से जनित सुखामृत को।
पीकर अत्यर्थतया निशदिन, भव से सु निकाला आत्मा को।।
त्रिभुवन के मस्तक पर जाकर, अब तक व अनंते कालों तक।
ठहरेंगे वे पुरुदेव! मुझे, शुभ ‘‘ज्ञानमती’’ श्री देवें झट।।८।।

अथ श्री जिनयज्ञप्रतिज्ञापनाय मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

(मंडल के ऊपर पुष्पांजलि क्षेपण करें)


श्री ऋषभदेव पूजा

-अथ स्थापना-
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तर्ज—ऐ माँ तेरी सूरत से अलग...
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जिनवर की शरण में आये हैं, तन मन धन अर्पण कर देंगे।
भगवान-भगवान तेरी भक्ती के लिये, जीवन भी समर्पण कर देंगे।।टेक.।।
शुभ नगरि अयोध्या की, धनपति ने रचना की।
माता के आंगन में, रत्नों की वर्षा की।।
आदीश्वर तीर्थंकर प्रभु का, शिर नत कर वंदन कर लेंगे।।भगवान.।।
श्री ऋषभदेव का हम, आह्वानन करते हैं।
निज हृदय कमल में प्रभु, स्थापन करते हैं।।
हम सन्निधिकरण विधी करके, प्रभुपद का अर्चन कर लेंगे।।भगवान.।।
ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदश्रीऋषभदेवतीर्थंकर! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदश्रीऋषभदेवतीर्थंकर! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदश्रीऋषभदेवतीर्थंकर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

-अथ अष्टक—

शंभु छंद-
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ऋषभेश सुयश सम उज्ज्वल जल, लेकर झारी भर लाये हैं।
निज समरस सुख पाने हेतू, प्रभु चरण चढ़ाने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।१।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश गुणों सम अतिशीतल, चंदन घिस कर ले आये हैं।
निज की शीतलता पाने को, प्रभु चरण चढ़ाने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।२।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश सौख्य सम खण्ड रहित, उज्ज्वल तंदुल ले आये हैं।
निज सुख अखण्ड पाने हेतू, प्रभु पुंज चढ़ाने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।३।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश गुणों सम अति सुगंध, पुष्पों को चुनकर लाये हैं।
निज गुण सुगंधि पाने हेतू, प्रभु चरणों पुष्प चढ़ाये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।४।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश पुष्टि सम नानाविध, पकवान बनाकर लाये हैं।
निज आत्मतृप्ति पाने हेतू, प्रभु चरण चढ़ाने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।५।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश ज्ञान सम ज्योतिर्मय, कर्पूर जलाकर लाये हैं।
निज ज्ञानज्योति पाने हेतू, हम आरति करने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।६।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश गुणों की सुरभि सदृश, वर धूप सुगंधित लाये हैं।
निज आत्मसुरभि पाने हेतू, अग्नी में धूप जलाये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।७।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश सुखामृत सदृश मधुर, रस भरे बहुत फल लाये हैं।
निज मोक्ष सुफल हेतू भगवन्! फल आज चढ़ाने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।८।।

ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
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ऋषभेश गुणों के सम अनर्घ्य, यह अर्घ्य सजाकर लाये हैं।
कैवल्य ‘‘ज्ञानमति’’ हेतू ही, प्रभु चरण चढ़ाने आये हैं।।
श्री ऋषभदेव के चरण कमल, हम मन वच तन से नित ध्यावें।
निज आत्मसिद्धि को पा करके, परमानंदामृत सुख पावें।।९।।
ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-शेर छंद-
सरयू नदी का जल भरें, हम स्वर्णभृंग में।
त्रयधार दे धारा करें, प्रभु पादकमल में।।
तिहुंलोक में सुख शांति हो, यह भावना करें।
हो मन पवित्र मेरा, यह याचना करें।।१०।।
शांतये शांतिधारा।

बेला वकुल गुलाब सुरभि पुष्प चुन लिये।
प्रभु पाद पंकेरुह में कुसुम अंजली किये।।
धन धान्य सौख्य संपदा स्वयमेव आ मिले।
भक्ती से शक्ति हो प्रगट शिवयुक्ति भी मिले।।११।।
दिव्य पुष्पांजलि:।



प्रथम कोष्ठक पूजा

(३४ अतिशय के ३४ अर्घ्य)

-सोरठा—
जिनवर गुणमणि तेज, सर्वलोक में व्यापता।
हो मुझ ज्ञान अशेष, पुष्पांजलि कर पूजहूँ।।
अथ मंडलस्योपरि प्रथमकोष्ठकस्थाने पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
-शंभु छंद-
श्री आदिनाथ के जन्म समय से, दश अतिशय सुखदाता हैं।
उनके तनु में निंह हो पसेव, यह अतिशय गुण मन भाता है।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।१।।
ॐ ह्रीं नि:स्वेदत्वसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
माता की कुक्षी से जन्मे, औदारिक तनु मानव का है।
फिर भी मलमूत्र नहीं तुममें, यह अतिशय पुण्य उदय का है।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।२।।
ॐ ह्रीं मलरहितसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु तन में श्वेत रुधिर पयसम, यह अतिशय तीर्थंकर के हो।
अतएव मात सम त्रिभुवनजन, पोषण करते उदारमन हो।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।३।।
ॐ ह्रीं क्षीरसमरुधिरत्वसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शनफल-प्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम संहनन सुवज्रवृषभ-नाराच कहाता शक्ति धरे।
यह अन्य जनों को सुलभ तथापी, तुममें अतिशय नाम धरे।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।४।।
ॐ ह्रीं वज्रवृषभनाराचसंहननसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु तनु में एक एक अवयव, सब माप सहित अतिशय सुन्दर।
यह समचतुरस्र नाम का ही, संस्थान कहा त्रिभुवन मनहर।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।५।।
ॐ ह्रीं समचतुरस्रसंस्थानसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शन-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

त्रिभुवन में उपमारहित रूप, अतिसुन्दर अणुओं से निर्मित।
सुरपति निज नेत्र हजार बना, प्रभु को निरखे फिर भी अतृप्त।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।६।।
ॐ ह्रीं अनुपमरूपसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

नव चंपक की उत्तम सुगंधि, सम देह सुगंधित प्रभु का है।
यह अतिशय अन्य मनुज तनु में, निंह कभी प्राप्त हो सकता है।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।७।।
ॐ ह्रीं सौगन्ध्यसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शुभ एक हजार आठ लक्षण, प्रभु तनु का अतिशय कहते हैं।
यह तीन जगत में भी उत्तम, अतएव इन्द्र सब नमते हैं।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।८।।
ॐ ह्रीं अष्टोत्तरसहस्रशुभलक्षणसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तनु में अनंत बल वीर्य रहे, जन्मत ही यह अतिशय प्रगटे।
अतएव हजार-हजार बड़े, कलशों से न्हवन भि झेल सकें।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।९।।
ॐ ह्रीं अनंतबलवीर्यसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्दर्शन-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

हित मित सुमधुर वाणी प्रभु की, जन मन को अतिशय प्रिय लगती।
त्रिभुवन हितकारी भावों से, यह अद्भुत वचन शक्ति मिलती।।
मैं पूजूँ इस अतिशययुत को, वे तीर्थंकर पदधारी हैं।
उन त्रिभुवन गुरु की पूजा ही, भव भय संकट परिहारी है।।१०।।
ॐ ह्रीं प्रियहितमितमधुरवचनसहजातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यग्दर्शनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-नरेन्द्र छंद-
केवलज्योति प्रगट होते इक, दश अतिशय होते हैं।
चारों दिश में सुभिक्ष होवे, चउ चउ सौ कोसों में।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु;ख से छूटूँ।।११।।
ॐ ह्रीं गव्यूतिशतचतुष्टयसुभिक्षताकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यग्ज्ञानफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

ज्ञान प्रगट होते ही जिनवर, गगन गमन करते हैं।
बीस हजार हाथ ऊपर जा, अधर सिंहासन पर हैं।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु;ख से छूटूँ।।१२।।
ॐ ह्रीं गगनगमनत्वकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु के गमन शरीर आदि से, प्राणी वध निंह होवे।
करुणासिंधु अभयदाता को, पूजत निर्भय होवें।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१३।।
ॐ ह्रीं प्राणिवधाभावकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कोटीपूर्व वर्ष आयू में, कुछ कम ही वर्षों में।
केवलि का उत्कृष्ट काल यह, बिन भोजन है तन में।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१४।।
ॐ ह्रीं कवलाहाराभावकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

देव मनुज तिर्यंच आदि उपसर्ग नहीं कर सकते।
केवलि प्रभु के कर्म असाता, साता में ही फलते।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१५।।
ॐ ह्रीं उपसर्गाभावकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
समवसरण की गोल सभा में, चहुंदिश प्रभु मुख दीखे।
चतुर्मुखी ब्रह्मा यद्यपि ये, पूर्व उदङ् मुख तिष्ठें।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१६।।
ॐ ह्रीं चतुर्मुखत्वकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञानफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

परमौदारिक पुद्गल तनु भी, छाया नहीं पड़े हैं।
केवलज्ञान सूर्य होकर भी, सबको छाँव करे हैं।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१७।।
ॐ ह्रीं छायारहितकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञानफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

नेत्रों की पलकें नहिं झपकें, निर्निमेष दृष्टी है।
जो पूजें वे भव्य लहें तुम, सदा कृपादृष्टी हैं।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१८।।
ॐ ह्रीं पक्ष्मस्पंदरहितकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

त्रिभुवन में जितनी विद्या हैं, सबके ईश्वर प्रभु हैं।
जो भवि पूजें वे सब विद्या, अतिशय प्राप्त करे हैं।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।१९।।
ॐ ह्रीं सर्वविद्येश्वरताकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

केश और नख बढ़ें न प्रभु के, चिच्चैतन्य प्रभू हैं।
दिव्यदेह को धारण करते, त्रिभुवन एक विभू हैं।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।२०।।
ॐ ह्रीं नखकेशवृद्धिरहितकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञान-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अनुपम दिव्यध्वनी त्रय संध्या, मुहूर्त त्रय त्रय खिरती।
चार कोश तक सुनते भविजन, सब भाषामय बनती।।
घातिकर्म के क्षय से अतिशय, प्रगटे उनको पूजूँ।
मुझमें केवलज्ञान सौख्य हो, भव भव दु:ख से छूटूँ।।२१।।
ॐ ह्रीं अक्षरानक्षरात्मकसर्वभाषामयदिव्यध्वनिकेवलज्ञानातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यग्ज्ञानफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-शंभु छंद-
प्रभु के श्रीविहार में दश दिश, संख्यात कोश तक असमय में।
सब ऋतु के फल फलते व फूल, खिल जाते हैं वन उपवन में।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२२।।
ॐ ह्रीं सर्वर्तुफलादिशोभिततरूपरिणाम-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कंटक धूली को दूर करे, जन मन हर सुखद पवन बहती।
प्रभु के विहार में बहुत दूर तक, स्वच्छ हुई भूमी दिखती।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२३।।
ॐ ह्रीं वायुकुमारोपशमितधूलकंटकादि-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सब जीव पूर्व के वैर छोड़, आपस में प्रीती से रहते।
इस अतिशय पूजत कलह वैर, ईष्र्यादि दोष निश्चित टलते।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२४।।
ॐ ह्रीं सर्वजनमैत्रीभाव-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पृथिवी दर्पण तल सदृश स्वच्छ, अरु रत्नमयी हो जाती है।
जहं जहं प्रभु विहरण करते हैं, वह भूमि रम्य मन भाती है।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२५।।
ॐ ह्रीं आदर्शतलप्रतिमारत्नमयीमही-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सुर मेघकुमार सुरभित शीतल, जल कण की वर्षा करते हैं।
इंद्राज्ञा से सब देववृंद, प्रभु का अतिशय विस्तरते हैं।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२६।।
ॐ ह्रीं मेघकुमारकृतगंधोदकवृष्टि-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शाली जौ आदिक धान्य भरित, खेती फल से झुक जाती है।
सब तरफ खेत हों हरे-भरे, यह महिमा सुखद सुहाती है।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२७।।
ॐ ह्रीं फलभारनम्रशालि-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सब जन मन परमानन्द भरें, जहं जहं प्रभु विचरण करते हैं।
मुनिजन भी आत्मसुधा पीकर, क्रम से शिवरमणी वरते हैं।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२८।।
ॐ ह्रीं सर्वजनपरमानन्दत्व-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

वायूकुमार जिन भक्तीरत, सुख शीतल पवन चलाते हैं।
जिन विहरण में अनुकूल पवन, उससे जन व्याधि नशाते हैं।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।२९।।
ॐ ह्रीं अनुकूलविहरणवायुत्व-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सब कुएं सरोवर बावड़ियाँ, निर्मल जल से भर जाते हैं।
इस चमत्कार को देख भव्य, निज पुण्यकोष भर लाते हैं।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।३०।।
ॐ ह्रीं निर्मलजलपूर्णकूपसरोवरादि-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आकाश धूम्र उल्कादिरहित, अतिस्वच्छ शरदऋतु सम होता।
जिनवर भक्ती वन्दन करते, भविजन मन भी निर्मल होता।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।३१।।
ॐ ह्रीं शरत्कालवन्निर्मलाकाश-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायि-सम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सब जन ही रोग शोक संकट, बाधाओं से छुट जाते हैं।
जहं जहं प्रभु विहरण करते हैं, सर्वोपद्रव टल जाते हैं।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।३२।।
ॐ ह्रीं सर्वजनरोगशोकबाधारहितत्व-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

यक्षेन्द्र चार दिश मस्तक पर, शुचि धर्मचक्र धारण करते।
उनमें हजार आरे अपनी, किरणों से अतिशय चमचमते।।
तीर्थंकर जिनका यह माहात्म्य, यह अतिशय सब सुखदायी है।
मैं पूजूँ रुचि से मुझको यह, परमानन्दामृतदायी है।।३३।।
ॐ ह्रीं यक्षेन्द्रमस्तकोपरिस्थितधर्मचक्रचतुष्टय-देवोपनीतातिशयगुणमंडिताय अतिशायिसम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दिश विदिशा में छप्पन सुवर्ण, पंकज खिलते सुरभी करते।
इक पाद पीठ मंगल सुद्रव्य, पूजन सुद्रव्य सुरगण धरते।।
प्रभु के विहार में चरण तले, सुर स्वर्णकमल रखते जाते।
इन तेरह सुरकृत अतिशय को, हम पूजत ही सम सुख पाते।।३४।।
ॐ ह्रीं तीर्थंकरदेवचरणकमलतलस्वर्णकमलरचना-देवोपनीतातिशय-गुणमंडिताय अतिशायिसम्यक्चारित्रफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-पूर्णार्घ्य-
दश अतिशय जन्म समय से ग्यारह केवलज्ञान उदय से हों।
देवोंकृत तेरह अतिशय हों, चौंतिस अतिशय सब मिल के हों।।
इनसे महान अतिशयशाली, श्री ऋषभदेव को मैं पूजूँ।
जल चंदन आदिक अघ्र्य चढ़ा, संपूर्ण अमंगल से छूटूँ।।१।।
ॐ ह्रीं चतुस्त्रिंशदतिशयसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।


द्वितीय कोष्ठक पूजा

(अष्ट प्रातिहार्य के ८ अर्घ्यं)

—दोहा—
आठ प्रातिहार्यों सहित, श्री अरिहंत जिनेश।
पुष्पांजलि कर पूजहूँ, ऋषभदेव परमेश।।
अथ मण्डलस्योपरि द्वितीय कोष्ठकस्थाने पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
-गीता छंद-
वर प्रातिहार्य सु आठ में, तरुवर अशोक विराजता।
मरकत मणी के पत्र पुष्पों, से खिला अतिभासता।।
वृषभेश की ऊँचाई से, बारह गुणे तुंग फरहरे।
इस युत प्रभू की अर्चना, कर शोक सब मन का हरें।।१।।
ॐ ह्रीं अशोकवृक्षमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु शीश पर त्रय छत्र शोभें, मोतियों की हैं लरें।
प्रभु तीन जग के ईश हैं, यह सूचना करती फिरें।।
क्या चन्द्रमा नक्षत्रगण, को साथ ले भक्ति करें।
इस कल्पनायुत छत्रत्रययुत, की सदा अर्चा करें।।२।।
ॐ ह्रीं छत्रत्रयमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निर्मल फटिक मणि से बना, बहुरत्न से चित्रित हुआ।
जिननाथ सिंहासन दिपे, निज तेज से नभ को छुआ।।
इस पीठ पर तीर्थेश, चतुरंगुल अधर ही राजते।
इस प्रातिहार्य समेत को, जन पूजते निज भासते।।३।।
ॐ ह्रीं सिंहासनमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गणधर मुनीगण देव देवी, चक्रि नर पशु आदि सब।
निज निजी कोठे बैठ अंजलि, जोड़ते सुप्रसन्न मुख।।
इन बारहों गण से घिरे, वृषभेश त्रिभुवन सूर्य हैं।
इस प्रातिहार्य समेत जिनको, जजत जन जग सूर्य हैं।।४।।
ॐ ह्रीं द्वादशगणपरिवेष्टितमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभन-फलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सब आइये जिन शरण में, मानों कहे यह दुंदुभी।
सब देवगण मिलकर बजाते, बहुत बाजे दुंदुभी।।
इस प्रातिहार्य समेत जिनको, वाद्य ध्वनि से पूजते।
सुरगण बजावें वाद्य उनके, सामने बहु भक्ति से।।५।।
ॐ ह्रीं देवदुंदुभिमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सुरगण गगन से कल्पतरु के, पुष्प बहु वर्षा करें।
यह वर्ण-वर्ण सुगंध खिलते, पुष्प जन मन भा रहें।।
इस प्रातिहार्य समेत जिन को, सुमन अघ्र्य लिये जजूँ।
अतिशय सुयश सुख प्राप्तकर, सब अशुभ अपयश से बचूँ।।६।।
ॐ ह्रीं सुरपुष्पवृष्टिमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यह कोटि भास्कर तेज हरता, ‘प्रभामण्डल’ नाथ का।
जन दर्श से निज सात भव को, देखते उसमें सदा।।
इस प्रातिहार्य समेत जिनको, पूजहूँ अति चाव से।
निज आत्मतेज अपूर्व पाकर, छूटहूँ भव दाव से।।७।।
ॐ ह्रीं भामण्डलमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सुर यक्षगण चौसठ चंवर, जिनराज पर ढोरें सदा।
ये चन्द्रसम उज्ज्वल चंवर, हरते सभी मन की व्यथा।।
इस प्रातिहार्य समेत जिन को, पूजहूँ श्रद्धा धरे।
जो जजें चामर ढोरकर, वे उच्च पद के सुख भरें।।८।।
ॐ ह्रीं चतु:षष्टिचामरमहाप्रातिहार्यगुणमंडिताय वरप्रातिहार्यशोभनफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य-
प्रातिहार्य वर आठ हैं, तीर्थंकर पहिचान।
पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय के, पाऊॅँ स्वात्मनिधान।।१।।
ॐ ह्रीं अष्टमहाप्रातिहार्यसमन्विताय श्रीतीर्थंकरऋषभदेवाय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।


तृतीय कोष्ठक पूजा

(अनंत चतुष्टय के ४ अघ्र्य)

—दोहा—
अनंत चतुष्टय के धनी, ऋषभदेव भगवान।
मण्डल पर पुष्पाञ्जली, करूँ प्रभू गुणगान।।
अथ मंडलस्योपरि तृतीय कोष्ठकस्थाने पुष्पांजलि क्षिपेत्।
-नाराच छंद-
तीनलोक तीनकाल की समस्त वस्तु को।
एक साथ जानता अनंत ज्ञान विश्व को।।
जो अनन्तज्ञान युक्त इन्द्र अर्चते जिन्हें।
पूजहूँ सदा उन्हें अनन्तज्ञान हेतु मैं।।१।।
ॐ ह्रीं अनंतज्ञानगुणसमन्विताय तथैवफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
लोक औ अलोक के समस्त ही पदार्थ को।
एक साथ देखता अनन्त दर्श सर्व को।।
जो अनन्त दर्श युक्त इन्द्र अर्चते उन्हें।
पूजहूँ सदा उन्हें अनन्त दर्श हेतु मैं।।२।।
ॐ ह्रीं अनंतदर्शनगुणसमन्विताय तथैवफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बाधहीन जो अनन्त सौख्य भोगते सदा।
हो भले अनन्तकाल आवते न ह्यां कदा।।
वे अनन्त सौख्य युक्त इन्द्र अर्चते उन्हें।
पूजहूँ सदा तिन्हें अनन्त सौख्य हेतु मैं।।३।।
ॐ ह्रीं अनंतसौख्यगुणसमन्विताय तथैवफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो अनन्त वीर्यवान अंतराय को हने।
तिष्ठते अनन्तकाल श्रम नहीं कभी उन्हें।।
जो अनन्त शक्ति युक्त इन्द्र अर्चते उन्हें।
पूजहूँ सदा तिन्हें अनन्तवीर्य हेतु मैं।।४।।
ॐ ह्रीं अनंतवीर्यगुणसमन्विताय तथैवफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य— (शंभु छंद)
जो ज्ञान अनंत प्राप्त करके, त्रैलोक्य चराचर जान रहे।
जो दर्श अनंत प्राप्त करके, सम्पूर्ण विश्व को देख रहे।।
आनन्त्य सौख्य को प्राप्त किया, आनन्त्य वीर्य के धारी हैं।
ऐसे तीर्थंकर की पूजा, आनन्त्य चतुष्टयकारी है।।१।।
ॐ ह्रीं अनंतचतुष्टयसमन्विताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—छ्यालिस गुणों का पूर्णाघ्र्य—
दश अतिशय जन्म समय से ग्यारह, केवलज्ञान उदय से हों।
देवों कृत तेरह अतिशय हों, चौंतिस अतिशय सब मिल के हों।।
वर प्रातिहार्य हैं आठ कहें, आनंत्य चतुष्टय चार कहें।
ये छ्यालिस गुण वृषभेश्वर के, हम पूजें वांछित सर्व लहें।।२।।
ॐ ह्रीं षट्चत्वािंरशत्गुणसमन्विताय सर्वातिशायिफलप्रदाय श्रीऋषभदेव-तीर्थंकराय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।


चतुर्थ कोष्ठक पूजा

(चौबीसविध संकट निवारक २४ अघ्र्य)

-दोहा-
वर्तमान के बहुत विध, कष्ट स्वयं हो दूर।
पुष्पांजलि से पूजते, मिले सौख्य भरपूर।।
अथ चतुर्थकोष्ठकस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
-शेर छंद-
जब मेघ अतीवृष्टि से भू जलमयी करें।
नदियों की बाढ़ में बहें जन डूबकर मरें।।
जो भक्त आप पूजतें वे पुण्य योग से।
अतिवृष्टि अपने देश से वे दूर कर सकें।।१।।
ॐ ह्रीं अतिवृष्टि-उपद्रवनाशनसमर्थाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नहिं मेघ बरसते सभी जल के लिये तरसें।
पशु पक्षी मनुज प्यास से निज प्राण को तजें।।
ऐसे समय में आप की पूजा ही मेघ सम।
अमृतमयी जलवृष्टि से तर्पित करें जन मन।।२।।
ॐ ह्रीं अनावृष्टि-उपद्रवनाशनसमर्थाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दुर्भिक्ष हो अकाल हो असमय में जन मरें।
भगवन्! तुम्हारी भक्ति से जन पाप परिहरें।।
होवे सुभिक्ष सब तरफ जब पुण्य घट भरें।
तब मेघ भी समय समय वर्षा सुखद करें।।३।।
ॐ ह्रीं दुर्भिक्षोपद्रवनाशनकराय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
धन से भरी तिजोरियाँ ताले लगा दिये।
डाकू लुटेरे चोर आये लूट ले गये।।
बहु श्रम से कमाया गया धन हानि जो होती।
प्रभु भक्ति से हानी न हो धन रक्षणा होती।।४।।
ॐ ह्रीं चोरलुंटकादि-उपद्रवनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो राज्यकर के हेतु ही अधिकारी राज्य के।
छापा या टैक्स आदि से धन लूट ले जाते।।
इस विध से राज्य भय से घिरें निर्धनी बनें।
प्रभु के चरणकमल भजें फिर से धनी बनें।।५।।
ॐ ह्रीं आयकरादिराज्यभयोपद्रवनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तनु में ज्वरादि रोग हो पीड़ाएँ हों घनी।
बहु औषधि लेते भी व्याधियाँ हो चौगुनी।।
भगवान ऋषभदेव की जो अर्चना करें।
ज्वर शूल आदि रोग को वे क्षण में परिहरें।।५।।
ॐ ह्रीं ज्वरशूलरोगादिनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बहुविध के नेत्र रोग हों अंधा करें यदी।
औषधि व शल्य चिकित्सा से हो न लाभ भी।
ऐसे समय में जो मनुष्य प्रभु शरण गहें।
हो नेत्र ज्योति स्वच्छ मन प्रसन्नता लहें।।६।।
ॐ ह्रीं नानाविधनेत्ररोगविनाशकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो प्राण को भी घातती कैंसर महाव्याधी।
अति कष्टदायी वेदना से हो न समाधी।।
तब भक्त आप मंत्र को जपते जो भाव से।
सब वेदना व व्याधि भी भगती हैं देह से।।७।।
ॐ ह्रीं प्राणघातिकैंसरमहाव्याधिविनाशकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हृद रोग से पीड़ित मनुज न पावते साता।
बहुधन करें खर्चा परन्तु बढ़ती असाता।।
जिनराज पादकमल की लेते यदि शरण।
हों पूर्ण स्वस्थ नहीं हो अकाल में मरण।।८।।
ॐ ह्रीं हृदयरोगपीड़ानिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-शंभु छन्द-
जो वायुयान से गगन गमन, करते ऊपर में उड़ जाते।
यदि अकस्मात् दुर्घटना हो, ऊपर से नीचे गिर जाते।।
प्रभु नाम जपें तत्क्षण ही तब, तनु में किन्चित् नहीं चोट लगे।
मरणान्तक पीड़ा से बचते, दीर्घायु हों दु:ख दूर भगें।।९।।
ॐ ह्रीं सर्ववायुयानदुर्घटनाकष्टनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो रेल में बैठे अतिशीघ्र, बहुतेक कोश यात्रा करते।
यदि एक्सीडेंट आदि होवे, तो आकस्मिक मृत्यु लभते।।
जिनराज भक्ति का ही प्रभाव, ऐसी बहु दुर्घटनाओं में।
परिपूर्ण सुरक्षित बच जाते, या एक्सीडेंट टलें क्षण में।।१०।।
ॐ ह्रीं सर्वलोहपथगामिनीदुर्घटनादिभयनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बस कार आदि यात्रा साधन, सुख देते आज सभी को भी।
संघट्टन आदि बहुत विध की, दुर्घटनाएँ होती फिर भी।।
प्रभु नाम मंत्र जपते उस क्षण, दुर्घटना से बच जाते हैं।
यदि मरें कदाचित् फिर भी वे, शुभ स्वर्ग सौख्य पा जाते हैं।।११।।
ॐ ह्रीं सर्वचतुष्चक्रिकादुर्घटनादिसंकटमोचनाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो चलें तिपहिए वाहनादि, उनके संघट्टन आदि विविध।
गिरने पड़ने से एक्सीडेंट, आदिक दुर्घटनाओं से नित।।
नाना आतंक दिखें जग में, प्रभु भक्ती से टल जाते हैं।
सब विध अकालमृत्यु टलती, भाक्तिक दु:ख से बच जाते हैं।।१२।।
ॐ ह्रीं सर्वत्रिचक्रिकादुर्घटनादिकष्टनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भू पर कंप कभी होता, बहुतेक मनुज मर जाते हैं।
घर ग्राम आदि भी नश जाते, बहुते पशु भी मर जाते हैं।।
प्राकृतिक कोप भूकम्प आदि दुर्घटनाएँ भी टल जाती हैं।
जो भक्त आपको जजते हैं, उनकी रक्षा हो जाती है।।१३।।
ॐ ह्रीं भूकम्पदुर्घटनादिनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नदियों में बाढ़ यदि आवे, कितने ही ग्राम डूब जाते।
कितने नर नारी पशु पक्षी, जल में डूबे तब मर जाते।।
इन आकस्मिक जल संकट से, भाक्तिक जन ही बच सकते हैं।
जिनदेवदेव का ही प्रभाव, ये संकट भी टल सकते हैं।।१४।।
ॐ ह्रीं नदीपूरप्रवाहसंकटमोचनाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो नदी, समुद्र, नहर आदिक, में अकस्मात् गिर जाते हैं।
तुम नाम मंत्र जपते तत्क्षण, वे सहसा ही तिर जाते हैं।।
जिनदेव भक्ति की महिमा ही, भवसागर भी तिर सकते हैं।
प्रभु आदीश्वर की भक्ति से, हम भी सब संकट हरते हैं।।१५।।
ॐ ह्रीं नदीसमुद्रादिपतनकष्टनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बिच्छू आदिक विषधर जंतु, सर्पादिक काले नाग यदी।
हालाहल विष उगले डस लें, निंह बचा सकें वैद्य यदी।।
ऐसे भय यदी भयंकर भी, जीवन नाशक आ जाते हैं।
आदीश्वर जिनकी भक्ति से, निर्विष हो जीवन पाते हैं।।१६।।
ॐ ह्रीं वृश्चिकसर्पादिविषधरविषनिर्णाशनाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-नाराच छंद-
आज बम फटें कहीं अनेक प्राणि मारते।
उग्रवादी लोग भी अनेक को संहारते।।
ग्राम सद्म भी बड़े बड़े ही बम गिरे नशें।
आप पाद पूजते समस्त आपदा नशें।।१७।।
ॐ ह्रीं बमविस्फोटकादि-आकस्मिकसंकटनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उग्रवादि लोग आज मानवों को मारते।
बेकसूर प्राणियों के प्राण को संहारते।।
मानसीक वेदना धरें अनेक नित्य ही।
नाम मंत्र आप का हरे अनेक भीति ही।।१८।।
ॐ ह्रीं आतंकवादिजनकृत्-आकस्मिकमरणादिभयविनाशकाय श्रीऋषभदेव-तीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मृत्यु हो अकाल में न पूर्ण आयु पा सकें।
कर्म की उदीरणा से बहुविधे निमित बनें।।नाथ पाद को जजें अपूर्व पुण्य को भरें।
दीर्घ आयु हो यहाँ समस्त कष्ट को हरें।।१९।।
ॐ ह्रीं नानाविधदुर्घटनादि-अकालमृत्युनिवारणाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भूत औ पिशाच व्यंतरादि कष्ट दें घने।
डाकिनी व शाकिनी ग्रहादि भी निमित बनें।।
दु:ख हो पिशाचग्रस्त आप वश्य ना रहें।
नाथ पाद पूजते समस्त कष्ट को दहें।।२०।।
ॐ ह्रीं भूतपिशाचव्यंतरादिबाधानिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-चौबोल छन्द-
किन्चित् श्रम से धन ही धन हो, सब व्यापार सफल होते।
पुण्य उदय से हों उद्योगपति, सब जन के प्रिय होते।।
जिन पूजा का ही माहात्म्य, जो धन से घर भण्डार भरें।
भाक्तिक जन प्रभु पूजा कर, शीघ्र स्वात्मनिधि प्राप्त करें।।२१।।
ॐ ह्रीं बहुविधव्यापारसफलताकारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीर्घ आयु पाते वे भविजन, जो प्रभु चरण कमल जजते।
अशुभ भाव से दूर रहें नित, जिनवर के गुण में रमते।।
मनुज देव योनी को पाते, सम्यग्दर्शन महिमा से।
अत: जजूँ मैं भक्तिभाव से, उत्तम आयु मिले जिससे।।२२।।
ॐ ह्रीं दीर्घायुप्रापकपुण्यप्रदायकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अंत समय में रोग वेदना, आर्तरौद्र दुध्र्यान न हों।
क्रोध मान माया लोभादिक, राग द्वेष दुर्भाव न हों।।
देव शास्त्र गुरु पंचपरम गुरु, इनका ही बस ध्यान प्रभो।
महामंत्र का मनन श्रवण हो, अंत समाधी मरण प्रभो।।२३।।
ॐ ह्रीं अन्त्यसमाधीमरणफलप्रदाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण ये, रत्नत्रय शिवदाता हैं।
निश्चय औ व्यवहार मार्ग ये, परमानन्द विधाता हैं।।
ऋषभदेव तीर्थंकर प्रभु की, भक्ति करें जो भव्य सदा।
वे ही तीन रत्न पा लेते, त्रिभुवन लक्ष्मी लें सुखदा।।२४।।
ॐ ह्रीं व्यवहारनिश्चयरत्नत्रयप्रदायकाय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य— (शंभु छंद)
अतिवृष्टि अनावृष्ट्यादि कष्ट, जो मानव को दु:ख देते हैं।
श्रीऋषभदेव की पूजा से, भविजन सब दु:ख को मेटे हैं।।
नीरोग बनें दीर्घायु हों, सब सुख सम्पत्ति भर लेते हैं।
यह जिनपूजन का ही प्रभाव, बहुयश सौरभ को देते हैं।।१।।

ॐ ह्रीं अतिवृष्टि-अनावृष्ट्यादिविविधसंकटनिवारकाय श्रीऋषभदेवतीर्थं-कराय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


पंचम कोष्ठक पूजा

(अष्टकर्म क्षय सम्बन्धी ८ अघ्र्य)

-दोहा-
प्रभु अनंत गुण के धनी, शुद्ध सिद्ध भगवंत।
मुख्य आठ गुण को नमूँ, पुष्पांजलि विकिरंत।।
अथ मण्डलस्योपरि पञ्चम कोष्ठकस्थाने पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

तर्ज—आवो बच्चों तुम्हें दिखायें...
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं, जय जय आदिजिनं।
जय जय आदिजिनं, जय जय आदिजिनं।।टेक.।।

दर्शनमोहनीय है त्रयविध, चार अनंतानूबंधी।
मोहकर्म को नाश जिन्होंने, पाया क्षायिक समकित भी।।
इस गुण से अगणित गुण पाये, उन गुणमणि श्रीमान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।१।।
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय सम्यक्त्वगुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
ज्ञानावरण कर्म को नाशा, पूर्णज्ञान प्रगटाया है।
युगपत् तीन लोक त्रयकालिक, जान ज्ञान फल पाया है।।
शत इन्द्रों से वंद्य सदा जो, उन आदर्श महान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।२।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय ज्ञानगुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
सर्व दर्शनावरण घात कर, केवल दर्शन प्रगट किया।
युगपत् तीन लोक त्रैकालिक, सब पदार्थ को देख लिया।।
जिनको गणधर गुरु भी ध्याते, उन दृष्टा भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।३।।
ॐ ह्रीं दर्शनावरणकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय दर्शनगुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
अंतराय शत्रू के विजयी, शक्ति अनंती प्रगटाई।
काल अनंतानंते तक भी, तिष्ठ रहे प्रभु श्रम नाहीं।।
हम भी करते नित उपासना, अनंत शक्तीमान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।४।।
ॐ ह्रीं अन्तरायकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय वीर्यगुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
सूक्ष्मत्व गुण पाया जिनने, नाम कर्म का नाश किया।
सूक्ष्म और अंतरित दूरवर्ती पदार्थ को जान लिया।।
योगीश्वर के ध्यानगम्य जो, अचिन्त्य महिमावान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।५।।
ॐ ह्रीं नामकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय सूक्ष्मगुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
आयु कर्म से शून्य जिन्होंने, अवगाहन गुण पाया है।
जिनमें सिद्ध अनंतानंतों ने, अवगाहन पाया है।।
भविजन कमल खिलाते हैं जो, उन अतुल्य भास्वान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।६।।
ॐ ह्रीं आयुकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय अवगाहन-गुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
ऊँच नीच विध गोत्रकर्म को, ध्यान अग्नि में भस्म किया।
अगुरुलघु गुण से अनंत युग, तक निज में विश्राम किया।।
त्रिभुवन के गुरु माने हैं जो, उन अविचल गुणवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।७।।
ॐ ह्रीं गोत्रकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय अगुरुलघुगुणसहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
सात असाता द्विविध वेदनी, ध्यान अग्नि से जला दिया।
अव्याबाध सुखामृत पीकर, निज से निज को तृप्त किया।।
भक्ति नाव से भव्य तिरें जो, उन शुद्धात्मा महान की।
सिद्धशिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।८।।
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय अव्याबाधगुण-सहिताय श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य-
आओ हम सब करें अर्चना, ऋषभदेव भगवान की।
सिद्ध शिला पर राज रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।
शुक्लध्यान की अग्नि जलाकर, आठ कर्म को भस्म किया।
केवलज्ञान सूर्य को पाकर, आठ गुणों को व्यक्त किया।।
सिद्धों का जो वंदन करते, मिले राह कल्याण की।
सिद्ध शिला पर तिष्ठ रहे जो, उन अनंत गुणखान की।।
जय जय आदिजिनं-४।।१।।
ॐ ह्रीं अष्टकर्मविघातकाय तथैवकर्मनाशनशक्तिप्रदाय सम्यक्त्वादिप्रमुख-अष्टसिद्धगुणसमन्वित श्रीऋषभदेवतीर्थंकराय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।

जाप्य—ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवाय सर्वसिद्धिकराय सर्वसौख्यं कुरु कुरु ह्रीं नम:। (सुगंधित पुष्पों से या लवंग से १०८ बार जाप्य करें।)


जयमाला

-दोहा-

अति अद्भुत लक्ष्मी धरें, समवसरण प्रभु आप।
तुम ध्वनि सुन भविवृृंद नित, हरें सकल संताप।।१।।

-शंभु छंद-
जय ऋषभदेव जिन का वैभव, अंतर का अनुपम गुणमय है।
जो दर्शज्ञान सुख वीर्यरूप, आनन्त्य चतुष्टय गुणमय है।।
बाहर का वैभव समवसरण, जिसमें असंख्य रचना मानी।
गुरु गणधर भी वर्णन करते, थक जाते मनपर्यय ज्ञानी।।२।।

यह समवसरण की दिव्य भूमि, इक हाथ उपरि पृथ्वी तल से।
सीढ़ी से ऊपर अधर भूमि, छ्यानवे मील की गोल दिखे।।
यह भूमि कमल आकार कही, जो इन्द्रनीलमणि निर्मित है।
है गंधकुटी इस मध्य सही, जो कमल कर्णिका सदृश है।।३।।

पंकज के दल सम बाह्य भूमि, जो अनुपम शोभा धारे है।
इस समवसरण का बाह्य भाग, दर्पण तल सम रुचि धारे है।।
यह बीस हजार हाथ ऊँचा, शुभ समवसरण अतिशय शोभे।
एकेक हाथ ऊँची सीढ़ी, सब बीस हजार प्रमित शोभें।।४।।

अंधे पंगू रोगी बालक, औ वृद्ध सभी जन चढ़ जाते।
अंतर्मुहूर्त के भीतर ही, यह अतिशय जिन आगम गाते।।
इसमें शुभ चार दिशाओं में, अति विस्तृत महा वीथियाँ हैं।
वीथी में मानस्तंभ कहे, जिनकी कलधौत पीठिका हैं।।५।।

जिनवर से बारह गुणे तुंग, बारह योजन से दिखते हैं।
इनमें हैं दो हजार पहलू, स्फटिक मणी के चमके हैं।।
उनमें चारों दिश में ऊपर, सिद्धों की प्रतिमाएँ राजें।
मानस्तंभों की सीढ़ी पर, लक्ष्मी की मूर्ति अतुल राजें।।६।।

ये दूर-दूर तक गाँवों में, अपना प्रकाश फैलाते हैं।
जो इनका दर्शन करते हैं, वे निज अभिमान गलाते हैं।।
मानस्तंभों के चारों दिश, जलपूरित स्वच्छ सरोवर हैं।
जिनमें अतिसुंदर कमल खिले, हंसादि रवों से मनहर हैं।।७।।

श्री वृषभसेन आदिक चौरासी, गणधर मुनि चौरासि सहस।
ब्राह्मी गणिनी त्रय लाख पचास, हजार आर्यिका व्रतसंयुत।।
त्रय लाख सुश्रावक पाँच लाख, श्राविका प्रभू का चउ संघ था।
आयू चौरासी लाख पूर्व, वत्सर व पाँच सौ धनु तनु था।।८।।

हे नाथ! कामना पूर्ण करो, निज चरणों में आश्रय देवो।
जब तक नहिं मुक्ति मिले मुझको, तब तक ही शरण मुझे लेवो।।
तब तक तुम चरण कमल मेरे, मन में नित सुस्थिर हो जावें।
जब तक नहिं केवल ‘ज्ञानमती’, तब तक मम वच तुम गुण गावें।।९।।

-दोहा-
नाथ! आप गुणरत्न को, गिनत न पावें पार।
तीन रत्न के हेतु मैं, नमूँ अनंतों बार।।१०।।
ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवजिनेन्द्राय जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
 -शेर छंद-
जो भव्य ऋषभदेव का विधान यह करें।
सम्पूर्ण अमंगल व रोग शोक दुख हरें।।
अतिशायि पुण्य प्राप्त कर ईप्सित सफल करें।
कैवल्य ‘‘ज्ञानमती’’ से जिनगुण सकल भरें।।१।।

।। इत्याशीर्वाद:।।


श्री ऋषभदेव विधान की प्रशस्ति

—दोहा—

ऋषभदेव से वीर तक, तीर्थंकर चौबीस।
भक्तिभाव से नित्य मैं, नमूँ नमाकर शीश।।१।।

तीर्थ अयोध्या को नमूँ, जन्मभूमि से ख्यात।
हुये अनंतानंत भी, यहीं तीर्थकर नाथ।।२।।

वीर निर्वृति पच्चीस सौ, उन्निस का शुभ योग।
तीर्थ अयोध्या में किया, मैंने वर्षायोग।।३।।

शरद पूर्णिमा दिन वृहत्, ऋषभदेव सुविधान।
दो सौ चार सुअघ्र्य का, रचा सर्व सुखखान।।४।।

पुन: किया संक्षिप्त यह, ऋषभदेव सुविधान।
अट्ठत्तर ही अघ्र्य हैं, फिर भी महिमावान्।।५।।

सदी बीसवीं के प्रथम, शांतिसागराचार्य।
उनके पट्टाधीश हुये, वीरसागराचार्य।।६।।

उनकी शिष्या मैं प्रथित, रचे ग्रंथ बहुतेक।
गणिनी ज्ञानमती लिखित, पूजा ग्रन्थ अनेक।।७।।

जब तक जिनशासन यहाँ, तब तक ‘ऋषभ विधान’।

ज्ञानमती गणिनी रचित, बने भक्त वरदान।।८।।