कुण्डलपुरस्य महावीर:

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कुण्डलपुरस्य महावीर:

-डॉ. प्रकाशचंद जैन,

जैनदर्शन-साहित्याचार्य,

साहिबाबाद (गाजियाबाद)
(१)

कुण्डलपुर-रम्या भू:, श्रीमहावीर-जन्मदा।
पुण्यदा सुखदा पूता, सादरमभिवन्द्यते।।

कुण्डलपुर की सुन्दर पृथ्वी, जो कि श्री भगवान् महावीर को जन्म देने वाली है, वह पुण्य देने वाली, सुख देने वाली, पवित्र है, उसका मेरे द्वारा आदरपूर्वक अभिनंदन किया जाता है।

(२)
भुवो भालोज्ज्वला मौलि:, भव्यं भाति भारतम्।
तत्समो न हि देशोऽस्ति, सम्पूर्णे वसुधातले।।

सुन्दर भारतवर्ष पृथ्वी के माथे पर चमकदार मुकुट के समान शोभित हो रहा है। सम्पूर्ण पृथ्वीतल पर उसके समान कोई देश नहीं है।

(३)
भारतेऽत्रास्तिवस्तूनां, श्रेष्ठानां शुभसंगम:।
तन्नास्ति वस्तु कुत्रापि, यन्नास्ति मम भारते।।

यहाँ भारत में श्रेष्ठ वस्तुओं का सुन्दर संगम है। मेरे भारतवर्ष में जो वस्तु नहीं है, वह पृथ्वी पर कहीं भी नहीं है।

(४)
धर्मार्थकाममोक्षाख्यं, पुरुषार्थचतुष्टयम् ।
साधनीयं जनै: सर्वै:, जीवन-लक्ष्य-सिद्धये।।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नाम वाले चार पुरुषार्थों को जीवन के लक्ष्यों की सिद्धि के लिए सभी लोगों को साधना चाहिए।

(५)
भारतीया: जना: नित्यं, पुरुषार्थ-चतुष्टयम्।
साधयन्ति प्रयत्नेन, जीवनानन्दलब्धये।।

भारतीय लोग चारों पुरुषार्थों को जीवन में आनन्द प्राप्त करने के लिए सदा कोशिश के साथ साधते रहते हैं।

(६)
भारतेतरदेशेषु, भौतिक - सुखलिप्सव:।
धर्ममोक्षौ न जानन्ति, अर्थकामपरायणा:।।

भारत के अलावा सभी देशों में भौतिक सुख के लालची अर्थ और काम पुरुषार्थों की सिद्धि में लगे रहते हैं। वे धर्म और मोक्ष के विषय में नहीं जानते हैं।

(७)
भारतेऽपि न सर्वेभ्य:, सुलभं मोक्षसाधनम्।
केचिदेव महात्मान:, चलन्ति मोक्ष वत्र्मनि।।

यहाँ भारत में भी मोक्ष की साधना आसान नहीं है। कुछ महात्मा (विलक्षण महान आत्मा) ही मोक्षमार्ग पर चलते हैं।

(८)
कठिनं मोक्षमार्गं तु, साधयन्ति जितेन्द्रिया:।
त्यक्त्वा भौतिक लिप्सास्ते, लभन्ते स्वात्म-संपद:।।

कठिन मोक्षमार्ग की साधना तो जितेन्द्रिय महापुरुष ही करते हैं। वे भौतिक लिप्साओं को त्याग कर ही आत्म-संपदाओं को प्राप्त करते हैं।

(९)
मोक्षं प्राप्तुं यतन्तेऽत्र, जैन धर्मानुयायिन:।
त्याग-वैराग्यमुख्यास्ति, जैनदर्शनसंस्कृति:।

जैन धर्मानुयायी ही मोक्ष प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि जैनधर्म की संस्कृति त्याग-वैराग्य प्रधान है।

(१०)
जैन तीर्थंकरैर्लब्धं, मोक्षपदं सुदुर्लभम् ।
त्यक्त्वा भौतिक-संसारं, तैर्दग्धं कर्मणां वनम्।।

अत्यन्त दुर्लभ मोक्षपद तो जैन तीर्थंकरों के द्वारा ही प्राप्त किया गया है। क्योंकि उनके द्वारा भौतिक संसार को त्याग कर कर्मों का वन जला दिया गया है।

(११)
सर्वज्ञा: वीतरागास्ते, कृतकृत्या: जितेन्द्रिया:।
भगवन्तस्तीर्णसंसारा:, जन्ममृत्यु विनाशका:।।

जैन तीर्थंकर सर्वज्ञ, वीतराग, कृतकृत्य, जितेन्द्रियवान् हैं। उन्होंने संसार-समुद्र को पार कर जन्म-मृत्यु का नाश कर दिया है।

(१२)
मोक्षमार्ग प्रणेतार:, सर्वजीव हितंकरा:।
तीर्थंकरा: महानात्म:, निग्र्रन्था: समदर्शिन:।।

वे तीर्थंकर मोक्षमार्ग के नेता, सब जीवों का हित करने वाले, महान् आत्मा, निर्ग्रन्थ और समदर्शी हैं।

(१३)
ये वर्तमानकालीना:, तीर्थंकरा: जिनेश्वरा:।
तेषां भगवतां संख्या, चतुर्विंशतिरुच्यते।।

जो वर्तमानकालीन जिनेश्वर-तीर्थंकर हैं। उन भगवन्तों की संख्या चौबीस है।

(१४)
वृषभ: प्रथमस्तेषाम्, आदीशो नाभिनन्दन:।
कल्पवृक्षविकल्पानां, कर्मणां स: प्रवर्तक:।।

उन चौबीस तीर्थंकरों में नाभिपुत्र आदीश्वर ऋषभदेव प्रथम हैं। जो कल्पवृक्षों के स्थान पर असि, मसि, कृषि आदि कर्मों के प्रवर्तक हैं।

(१५)
अन्तिमस्तु महावीर:, चतुर्विंशो जिनाधिप:।
तस्यैव कृपया लोके, जैनं जयति शासनम्।।

और उनमें अंतिम चौबीसवें तीर्थंकर महावीर हैं। उनकी ही कृपा से लोक में जैनशासन की विजय हो रही है।

(१६)
मया त्वत्र हि काव्येस्मिन्, महावीरस्य जीवनम्।
पद्यात्मकेन रूपेण, संक्षेपेण निरूप्यते।।

मेरे द्वारा यहाँ संक्षेप में पद्यरूप से भगवान महावीर के जीवन का निरूपण किया जा रहा है।

(१७)
षड्विंशतिशतं द्वे च, वर्षपूर्वमजायत।
चतुर्विंशो महावीर:, तीर्थंकरोऽत्र भारते।।

आज से छब्बीस सौ दो वर्ष पूर्व तीर्थंकर महावीर भारतवर्ष में पैदा हुए थे।

(१८)
प्रदेशोऽस्ति बिहाराख्य:, आर्यभूमौ हि भारते।
जैनधर्मस्य केन्द्र: स:, श्रमणानां विहार-भू:।।

आर्य भूमि भारत में बिहार नाम का प्रदेश है। जैनधर्म का केन्द्र वह बिहार श्रमणों (जैन साधुओं) के विहार की भूमि है।

(१९)
तत्रास्ति विश्वविख्यातं, कुण्डलपुरनामकम्।
पुरं स्वर्गोपमं रम्यं, पृथिव्या: कर्णकुण्डलम्।।

वहाँ बिहार में विश्व प्रसिद्ध, स्वर्ग के समान सुन्दर, मानो पृथ्वी के कान का कुण्डल ऐसा कुण्डलपुर नाम का नगर है।

(२०)
पुरस्य तस्य राजाऽऽसीत्, सिद्धार्थो लोकरञ्जक:।
न्यायी, दानी दयालुश्च, प्रजापालन-तत्पर:।।

उस कुण्डलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ थे, जो लोगों को खुश करने वाले, न्यायी, दानी और प्रजा के पालन में तत्पर थे।

(२१)
शिल्पकारा: कलाकारा:, वणिज:, श्रमिका: जना:।
विद्वांस: कृषका: विप्रा:, सन्तुष्टा: न्यवसन् पुरे।।

उस कुण्डलपुर नगर में शिल्पकार, कलाकार, बनिये, मजदूर, विद्वान्, किसान, ब्राह्मण आदि सभी संतुष्ट होकर रहते थे।

(२२)
नासीत् कोऽपि दुर्वृत्त:, निर्धनस्तस्कर: शठ:।
लोलुप: कृपणो दीन: तस्य राज्ये महीपते:।।

उन सिद्धार्थ राजा के राज्य में कोई भी व्यक्ति दुराचारी, निर्धन, चोर, लालची, वंâजूस, दीन और धूर्त नहीं था।

(२३)
तस्य राज्ञो महिस्यासीत्, त्रिशला प्रियकारिणी।
वैशालीशस्य पुत्री सा, चेटकस्य प्रतापिन:।।

उन राजा सिद्धार्थ की पट्टरानी प्रियकारिणी त्रिशला थी। जो वैशाली के प्रतापी राजा चेटक की पुत्री थी।।

(२४)
पतिव्रता सुशीला सा, विदुषी मृदुभाषिणी।
धार्मिकवृत्तिरव्रूरा, सर्वसेवापरायणा।।

वह त्रिशला रानी पतिव्रता, अच्छे आचरण वाली, विदुषी, मीठा बोलने वाली, धार्मिक आचरण वाली, कठोरता रहित और सभी की सेवा करने वाली थी।

(२५)
प्रेम-हर्ष-विनोदैश्च, यापयन्तौ स्वजीवनम्।
आनन्दमन्वभूतां तौ, सहयोगै: परस्परम्।।

प्रेम, हर्ष और मनोरंजन से अपने जीवन को बिताते हुए आपसी सहयोगों से वे दोनों पति-पत्नी आनन्द का अनुभव कर रहे थे।

गर्भ कल्याणक

(२६)
एकदा सुख-निद्रायां, नन्द्यावर्ते स्व सद्मनि।

प्रसुप्ता त्रिशला राज्ञी, ददर्श स्वप्नमालिकाम् ।।

एक बार अपने नंद्यावर्त महल में सुख की नींद में सोई हुई त्रिशला रानी ने स्वप्नों के समूह को देखा।

(२७)
षोडश स्वप्न चित्राणि, निशाया: प्रहरेऽन्ति मे।
वीक्ष्य विस्मय-विभ्रान्ता, तत्कालं जागृताऽभवत् ।।

रात्रि के अंतिम प्रहर में सुन्दर सोलह स्वप्न को देखकर सुखद आश्चर्य से सहित वह त्रिशला तत्काल जाग गई।

(२८)
प्रात: स्वपतिं सिद्धार्थं, दृष्टस्वप्नान्न्यवेदयत्।
अपृच्छच्च फलं तेषां, त्रिशला हर्षमानसा।।

प्रात:काल हर्षित मन से त्रिशला ने अपने पति सिद्धार्थ को देखे हुए स्वप्नों को बताया और उनका फल पूछा।

(२९)
स्वप्नवृत्तान्तमाकण्र्य, सिद्धार्थो मुदितोऽभवत्।
राज्ञीं च स्वप्न-निष्कर्षं, उवाच मेदिनीपति:।।

स्वप्नों के वर्णन को सुनकर सिद्धार्थ प्रसन्न हो गए और रानी को स्वप्नों का निष्कर्ष (फल) बताया।

(३०)
देवि! त्वं कृतपुण्याऽसि, तव गर्भे समागत:।
तीर्थंकरो जगत्पूज्य: लोकत्रयस्य दीपक:।।

हे देवि! तुमने बड़ा पुण्य किया है। तुम्हारे गर्भ में जगत्पूज्य, तीन लोक के दीपक तीर्थंकर आए हैं।

(३१)
निश्चिन्ता भव चित्ते त्वं, न माता त्वत्समाऽपरा।
काष्ठा प्राची यथा सूर्यं, दधासि उदरे जिनम् ।।

तुम चित्त में निश्चिन्त रहो। तुम्हारे जैसी दूसरी कोई माता नहीं है। जिस प्रकार पूर्व दिशा सूर्य को धारण करती है, उसी प्रकार तुम अपने उदर में जिनेन्द्र को धारण कर रही हो।

(३२)
श्रुत्वा फलं हि स्वप्नानां, त्रिशला प्रियकारिणी।
परमानन्दिता चित्ते, प्रसन्नवदनाऽभवत् ।।

प्रियकारिणी त्रिशला स्वप्नों के फल को सुनकर मन में बहुत आनन्दित हुई और उसका मुख प्रसन्नता से खिल उठा।

(३३)
सौधर्मेन्द्रस्तदा स्वर्गे, अवधिज्ञान-चक्षुषा।
गर्भावतार-वृत्तान्तं, जिनदेवस्य ज्ञातवान् ।।

तभी स्वर्ग में सौधर्म इन्द्र ने अपने अवधिज्ञानरूपी नेत्र से जिनेन्द्रदेव के गर्भावतरण के वृत्तान्त को जान लिया।

(३४)
आषाढ़-शुक्ल-षष्ठ्यां स:, शक्रो देवै: परिवृत:।
कुण्डलपुरमागच्छत्, गर्भोत्सव-चिकीर्षया।।

आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन वह इन्द्र देवों से घिरा हुआ गर्भ कल्याणक मनाने की इच्छा से कुण्डलपुर आया।

(३५)
नृत्य-वादन-संगीतै:, दान-वर्धापनै: समम् ।
इन्द्र: पौरा: मिलित्वैव, चक्रुर्जन्ममहोत्सवम् ।।

इन्द्र ने नगरवासियों के साथ मिलकर नृत्य, बाजों, संगीत, दान और बधाईयों के आदान-प्रदान के साथ गर्भकल्याणक मनाया।
(३६)
जननी-गर्भ-सेवायै, दिव्या: देव्य: समागता:।
ता: नवमास-पर्यन्तम् अतिष्ठन् मातृसन्निधौ।।
इस अवसर पर माता के गर्भ की सेवा के लिए स्वर्ग की देवियाँ आर्इं और वे नौ माह तक माता के पास ही रहीं।
(३७)
कुबेर: कृतवान्नित्यं, त्रिशलाया: गृहांगणे।
सार्धसप्तकोटीनां, रत्नानां सुवर्षणम् ।।
कुबेर ने त्रिशला-माता के घर के आंगन में प्रतिदिन साढ़े सात करोड़ रत्नों की वर्षा की।
(३८)
ररक्ष त्रिशला गर्भं, नवमासान् बिना व्यथाम्।
पुत्र-जन्मप्रतीक्षायां, नीतवती सुरखै: सह।।
त्रिशला ने बिना कष्ट के नौ महीने पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा में सुख से गर्भ की रक्षा करते हुए बिता दिए।

जन्म कल्याणक

(३९ )


नवमासा: यदा पूर्णा:, जन्मबेला समागता।
चैत्र शुक्ल त्रयोदश्यां, त्रिशलाऽजनयत् सुतम्।।
जब जन्म के नौ माह पूर्ण हो गए और जन्म का समय आ गया तब चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन त्रिशला ने पुत्र को जन्म दिया।
(४०)
सिद्धार्थ-भवने स्नु:, जात: श्रुत्वेति नागरा:।
मंगलाचार संलग्ना:, राजभवनं समागता:।।
सिद्धार्थ के घर में पुत्र पैदा हुआ है, यह सुनकर मंगलाचार करते हुए नगर निवासी राजमहल में आने लगे।
(४१)
अभिवादन-सत्कारै:, वर्धापनैरुपायनै:।
गायन-नृत्य-संगीतै:, सर्वै: हर्ष: प्रकाशिता:।।
अभिवादन, सत्कार, बधाइयाँ, भेंट, गाना, नृत्य और संगीत के द्वारा सभी के द्वारा हर्ष प्रकट किया गया।
(४२)
प्रसन्न देव-देवीभि:, साद्र्धं सौधर्म देवराट्।
जन्माभिषेक-विध्यर्थं, कुण्डलपुरमाययौ।।
प्रसन्न देव-देवियों के साथ सौधर्म इन्द्र जन्माभिषेक की विधि सम्पन्न करने के लिए कुण्डलपुर आ गया।
(४३)
तीर्थंकर शिशु नीत्वा, मुदित: सकलै: सह।
जन्माभिषेक सत्कार्यं, सुमेरु पर्वतेऽकरोत् ।।
प्रसन्न इन्द्र ने सबके साथ तीर्थंकर शिशु को मेरु पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक की विधि को सम्पन्न किया।
(४४)
कुण्डलपुर-भूमिस्तु, गुंजिता मंगलै: रवै:।
जन्मकल्याणके रम्ये, सर्वे मंगलमाचरन् ।।
कुण्डलपुर की भूमि-मंगल-शब्दों से गूँज उठी। जन्म-कल्याणक के अवसर पर सभी ने मंगल-आचरण किया।
(४५)
बालस्य जन्मना सावंâ, वर्धिता: राज्य संपद:।
तस्मान्नव शिशोर्नाम, वर्धमान: कृतं जनै:।।
बालक के जन्म के साथ ही राज्य की संपदाएँ बढ़ने लगी, इसीलिए सभी ने बालक का नाम वर्धमान रखा।
(४६)
जन्माभिषेक बेलायाम्, अनुमीय शिशोर्बलम्।
वीरोऽयमिति शव्रेâण, वीर नाम कृतं तदा।।
जन्माभिषेक के समय बालक के बल का अनुमान लगाकर इन्द्र के द्वारा यह वीर है इस प्रकार कहकर उसका नाम वीर रखा।
(४७)
दोला-स्थितं शिशुं दृष्ट्वा, संजय-विजयद्वयो:।
मुन्योर्मनोगता: शंका:, स्वयमेव निराकृता:।।
झूले में स्थित बालक को देखकर संजय और विजय दोनों मुनियों के मन की शंकाएँ स्वत: मिट गर्इं।
(४८)
बालस्य बुद्धि-माहात्म्यं, वीक्ष्य तौ द्वौ अभाषताम्।
सन्मतिरिति बालोऽयं, सन्मतिर्नाम प्राचलत् ।।
बालक की बुद्धि महत्ता को देखकर वे दोनों बोले-यह बालक सन्मति है। तभी से उसका नाम ‘‘सन्मति’’ चल पड़ा।
(४९)
एकदा वर्धमान: स:, मित्र-शिशुभि: समम्।
वृक्षारोहण क्रीडायां, आसीद् व्यस्तो घने वने।।
एक बार वह वर्धमान अपने मित्र-बालकों के साथ घने जंगल में वृक्ष पर चढ़ने-उतरने के खेल में व्यस्त था।
(५०)
तदैव संगमो देव:, कर्तंु धैर्य-परीक्षणम् ।
सर्परूपं विधायैवं, भीतं कर्तुं प्रयत्नवान्।।
एक बार संगम नाम देव ने उनके धैर्य की परीक्षा लेने के लिए सर्प का रूप धारण करके इन्हें भयभीत करने की कोशिश की।
(५१)
वर्धमानस्य मित्राणि, सर्पं वीक्ष्य भयंकरम् ।
प्रधावितानि सर्वाणि, वीरोऽतिष्ठत् विना भयम्।।
भयंकर सर्प को देखकर सभी मित्र तेजी से भाग गए। लेकिन वीर वहाँ बिना भय के ठहरे रहे।
(५२)
वर्धमानस्तु एकाकी, सर्पं फणे गृहीतवान् ।
पूâत्कारं तस्य श्रुत्वापि, अगुञचन्नैव तत्फणम्।।
वर्धमान ने अकेले ही सर्प के फण को पकड़ लिया और उसकी पुंâकार को सुनकर भी उसके फण को नहीं छोड़ा।
(५३)
वीरस्य साहसं दृष्ट्वा, संगम: प्रकटितोऽभवत्।
दर्शयित्वा निजं रूपम्, महावीरस्त्वमुक्तवान्।।
वीर के साहस को देखकर संगम देव सामने प्रकट हुआ और अपना रूप दिखाकर, ‘तुम महावीर हो’ ऐसा कहा। अर्थात् उन्हें ‘‘महावीर’’ नाम से सम्बोधित कर चरणों में नमन किया और स्वर्ग वापस चला गया।
(५४)
सुस्वस्थ: प्रतिभाशाली, बलिष्ठश्चतुरो गुणी।
स: सन्मतिर्महावीर:, जात: बालशिरोमणि:।
अत्यन्त स्वस्थ, प्रतिभाशाली, बलिष्ठ और गुणी वह सन्मति महावीर बालकशिरोमणि बन गए।
(५५)
शैशवोचित क्रीडासु, बहुविद्यासु र्कीितमान्।
शनै: शनै र्महावीर:, बाल्यात्तारुण्यमाप्तवान्।।
बालोचित क्रीड़ाओं में तथा सर्वविद्याओं में यश प्राप्त करते हुए महावीर धीरे-धीरे बाल्यावस्था से जवानी को प्राप्त हो गए।

दीक्षा कल्याणक

(५६ )


रूप-यौवन संपन्न:, प्राप्त संपूर्ण वैभव:।
अतिष्ठत् किन्तु भोगेभ्य:, विरक्त एव सर्वदा।।
सौन्दर्य और जवानी से युक्त, संपूर्ण वैभवों को प्राप्त किए हुए भी महावीर हमेशा सभी भोगों से उदासीन ही रहे।
(५७)
लक्षित: सर्वदा वीरोऽयं, गंभीर-धैर्यसागर:।
यौवनोचित चाञ्चल्यम्, व्यकरोन्नास्य मानसम्।।
यह महावीर सदा गाम्भीर्य और धैर्य के सागर रूप में देखे गये। यौवन में भी चंचलता ने इनके मन को विकृत नहीं किया।
(५८)
राज्य-वैभव मध्येऽपि, न लिप्तस्तैरयमभूत्।
गृहेऽप्ययमवातिष्ठत्, यथा वारिणि वारिजम्।।
राज्य के वैभवों के बीच भी वह उनसे निर्लिप्त थे। घर में भी वह उसी प्रकार ठहरे हुए थे, जैसे जल में कमल।
(५९)
विरक्तस्तु महावीरा, संसाराय निरुत्सुक:।
स्वजनेभ्यस्तु सर्वेभ्य:, चिन्ताया: विषयोऽभवत्।।
संसार के लिए निरुत्सुक, विरक्त महावीर अपने सभी लोगों के लिए चिन्ता का विषय बन गए। अर्थात् महावीर की संसार से विरक्ति देखकर माता-पिता आदि सभी चिन्तित हो गए।
(६०)
नारभत मनस्तस्य, मनोरञ्जन कर्मसु।
स्वादिष्ट भोज्यपानेषु, अम्बराभरणे स्वपि।।
उन महावीर का मन मनोरंजन कार्योंे में, स्वादिष्ट भोजन-पान में और वस्त्राभूषणो में आनन्द नहीं प्राप्त करता था।
(६१)
मात्रा कृतश्च प्रस्ताव:, विवाहस्य वृथाऽभवत्।
पित्रा प्रस्तावितं राज्यं, स्वीकृतवान्न सन्मति:।।
माता के द्वारा किया गया उनके विवाह का प्रस्ताव व्यर्थ तथा पिता के द्वारा प्रस्तावित राज्य भी उन सन्मति ने स्वीकार नहीं किया।
(६२)
तं गृहाभिमुखं कर्तुं, जाता: यत्ना: निरर्थका:।
वैराग्य परिपक्वोऽयं, दृढो यथा हिमालय:।।
उन्हे घर की ओर मोड़ने के सारे प्रयत्न निरर्थक रहे। वैराग्य भाव में परिपक्व वह हिमालय की तरह दृढ़ थे।
(६३)
एकाक्येकान्तभूमिस्थ:, मग्नश्चिन्तनसागरे।
शरीर-लोक संबंधे, बहुधा स: व्यचिन्तयत्।।
अकेले एकान्त स्थल में बैठे हुए, विचार-सागर में डूबे हुए, वह ज्यादातर शरीर और संसार के संबंध में सोचते रहते थे।
(६४)
अनित्या: सन्ति संबन्धा:, नश्वरा: भोग संपद:।
यथास्ति गगने विद्युत्, चंचला जगत: स्थिति:।।
संंबंध नित्य नहीं हैं, भोग-संपदाएँ नाशवान् हैं। जिस प्रकार आकाश में बिजली, उसी प्रकार संसार की स्थिति भी चंचल है।
(६५)
एकाकी जायते जीव:, एकाकी म्रियते सदा।
मृत्यु-काले समापन्ने, नापरो रक्षितुं क्षम:।।
जीव अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। मृत्युकाल के निकट आने पर दूसरा कोई उसे नहीं बचा सकता।
(६६)
सर्वे सन्त्यत्र संसारे, प्राणिन: दुःख-भोगिन:।
धनहीना: धनाभावै:, धनवन्तश्च तृष्णया।।
इस संसार में सभी प्राणी दुःख भोगते रहते हैं। धनहीन धन की कमी से तथा धनवान् तृष्णा से।
(६७)
मल-मूत्रास्थिरक्तैश्च, माँस-मज्जाप्रपूरिते।
घृणास्पदे शरीरेऽस्मिन्, प्रीतिं कुर्वन्ति मोहिन:।।
मल, मूत्र, हड्डी, रक्त, माँस और मज्जा से भरे हुए घृणा के स्थानभूत इस शरीर में मोही व्यक्ति प्रीति करते हैं।
(६८)
सच्चिदानन्दपिण्डात्मा, कर्मचौरै: प्रदूस्यते।
संसार पाश बद्धात्मा, कर्मागमं न पश्यति।।
यह आत्मा सत्, चित् और आनन्द का पिण्ड है। कर्मरूपी चोर इसे दूषित कर रहे हैं। संसाररूपी जाल में बंधा हुआ यह आत्मा कर्मों के आने को नहीं देख पाता है।
(६९)
व्रत-समिति गुप्तिभ्य:, कर्मबंधो निरुध्यते।
कर्मबन्ध निरोधाय, जीव: प्रयत्नमाचरेत् ।।
व्रत, समिति और गुप्तियों के द्वारा कर्मबंध रोका जा सकता है। जीव को कर्मबंध रोकने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
(७०)
तपश्चर्यैव मोक्षाय, साधनमस्ति केवलम् ।
तपस्तप्तुं हि गन्तव्यं, गृहं त्यक्त्वा मुमुक्षुणा।।
केवल तपश्चरण ही मोक्ष का साधन है। मोक्ष की इच्छा रखने वाले के द्वारा घर छोड़कर तप के लिए जाना चाहिए।
(७१)
तपसि बाधवं मत्वा, गृहं त्यक्तुम हि तत्पर:।
महावीरो गतमोह:, वायुवेग इवोत्थित:।।
घर को तप में बाधक मानकर, घर को छोड़ने के लिए तत्पर मोहरहित, महावीर वायु के वेग के समान उठ खड़े हुए।
(७२)
मातरं पितरं बन्धून्, स्व निश्चयं न्यवेदयत्।
अनुमतिं वनं गन्तुम्, स: सकलानयाचत।।
उन्होंने माता-पिता और बन्धुओं को अपना निश्चय बताया और उन सबसे वन जाने के लिए अनुमति माँगी।
(७३)
निवारितोऽपि सर्वै: स:, अनुनीतश्च पुन: पुन:।
स्व निश्चये दृढो वीर:, चिच्छेदमोहबन्धनम्।
सभी के द्वारा रोके गए और बार-बार मनाए गए भी अपने निश्चय में दृढ़ वीर ने मोह के बंधन को काट डाला।
(७४)
त्रिंशत् वर्षीय महावीर:, सर्वं त्यक्त्वा वनं ययौ।
तपोभि: कर्मनाशार्थं, मुमुक्षु: स: जितेन्द्रिय:।।
तीस वर्ष के मोक्षाभिलाषी जितेन्द्रिय महावीर तप से कर्मों को नष्ट करने के लिए सब कुछ छोड़कर वन को चले गए।
(७५)
मार्गशीर्षस्य शुक्लायां, दशम्यां शुभवासरे।
ज्ञातृवने शालिच्छायायां, जैन दीक्षां गृहीतवान्।।
मार्गशीर्ष-शुक्ल दशमी के शुभ-दिन महावीर ने ज्ञातृवन में शाल वृक्ष के नीचे जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली।।
(७६)
आहार-दान-सौभाग्यं, प्रथमं वीर-तपस्विने।
प्राप्तवान् वकुलो राजा, वूâलग्रामस्य श्रावक:।।
महावीर मुुनि के लिए प्रथम आहारदान का सौभाग्य वूâलग्राम के श्रावक राजा वकुल ने प्राप्त किया।
(७७)
तपन् तपांसि घोराणि, निर्जरायै स्वकर्मणाम्।
बाह्याभ्यन्तर द्वन्द्वेभ्य:, मुक्तो गतपरिग्रह:।।
अपने कर्मों की निर्जरा के लिए घोर तप करते हुए, बाह्य और अन्तरंग परिग्रह से रहित महावीर सभी द्वन्द्वों से रहित हो गए।


चंदनबाला द्वारा ऐतिहासिक आहार

(७८ )


मोक्षमार्गोपि देशाय, विहरन् वसुधातले।
स: जगामैकदा वीर:, कौशाम्बीं महतीं पुरीम्।।
मोक्षमार्ग के उपदेश के लिए पृथ्वीतल पर विहार करते हुए एक बार वीर-मुनि कौशाम्बी नामक विशाल नगरी में गए।
(७९)
स्वामिन्या निगडैर्बद्धा, बालैका तत्र चन्दना।
दृष्टवती महावीरम्, आहाराय विनिर्गतम्।।
वहाँ स्वामिनी के द्वारा बेड़ियों में बंधी हुई एक युवती चन्दना ने आहार के लिए निकले हुए महावीर को देखा।
(८०)
दृष्ट्वा मुनिं महावीरम्, त्रुटिता सर्वशृंखला।
आहारं प्रददौ तस्मै, क्षीरान्नस्य हि चन्दना।।
मुनि महावीर को देखकर उसकी सभी बेड़ियाँ टूट गई और चन्दना ने उनको खीर का (कोदों का भात ही खीर रूप में परिणत हो गया था) आहार दिया।
(८१)
धन्यो मुनिर्महावीर: धन्या बाला हि चन्दना।
आहारदान महत्त्वेन, जाता या गतबन्धना।।
मुनि महावीर धन्य हैं वह चन्दनबाला भी धन्य है जो आहार-दान के महत्व से बंधनरहित हो गई।।
(८२)
तदानीं महावीरस्य: काले, पाखण्डि साधव:।
बाह्याडम्बर संलग्ना:, सत्साधुत्वं व्यनाशयन्।।
उस समय महावीर के समय में जैनेतर साधु बाह्याडम्बरों मे लगे हुए सच्चे साधुत्व को नष्ट कर रहे थे।
(८३)
पाखण्ड-खण्डनं कृत्वा, सोढ्वा विरोधयातना:।
निज जीवन-चर्योभि:, सत्साधुत्वमुपादिशत्।।
पाखण्डों का खण्डन करके विरोधियों द्वारा दिए गए कष्टों को सहकर भी महावीर ने अपनी जीवन चर्या से सच्चे साधुत्व का उपदेश दिया।
(८४)
हिंसां च वैदिकीं वीर:, पापमेवोदघोषयत् ।
मूकानां च पशूनां स:, बलिदानं न्यवारयत्।
महावीर ने वैदिक हिंसा को भी पाप ही बताया। उन्होंने मूक पशुओं के बलिदान को रोका।

रूद्र द्वारा उपसर्ग

(८५ )


एकदोज्जयिनीं प्राप्त:, विहरन् वीर-तापस:।
श्मशाने तत्र ध्यानाय, खड्गासनं गृहीतवान्।।
महावीर-तपस्वी एक बार विहार करते हुए उज्जयिनी आए। वहाँ श्मशान में ध्यान के लिए उन्होंने खड्गासन ग्रहण किया।
(८६)
रुद्रैकस्तत्र ध्यानात्, च्युतं कर्तुं प्रयत्नवान्।
सोढ्वा तद्दत्त-कष्टानि, वीरो ध्यानं न त्यक्तवान्।।
वहाँ एक रुद्र ने उन्हें ध्यान से च्युत करने की कोशिश की। उसके द्वारा दिए गए कष्टों को सहन करके भी वीर ने ध्यान को नहीं छोड़ा।
(८७)
रुद्रश्च धैर्यमालोक्य, स्तुतिं भत्तिंâ तदाकरोत्।
भूषितवान् महावीरं, स: अतिवीर-संज्ञया।।
और तब रुद्र ने उनका धैर्य देखकर उनकी स्तुति एवं भक्ति की तथा उन्हें अतिवीर नाम से विभूषित किया।
(८८)
द्वादश भेदभिन्नानि, तपांसि स: समाचरत् ।
पंच महाव्रतै: सार्धं, दशधर्मानधारयत् ।।
उन वीर भगवान ने बारह प्रकार के तपों को किया तथा पाँंच महाव्रतों के साथ दश धर्मों को हृदय में धारण किया।
(८९)
समिति-गुप्ति रक्षायां, सावधान: सुसंयमी।
द्वादश भावना-चिन्तां, कृतवान् वीर-साधक:।।
वह वीर-साधक समिति और गुप्तियों की रक्षा में सावधान रहकर बारह भावनाओं का चिन्तन करते थे।
(९०)
दग्ध्वा स: घाति-कर्माणि, शुक्लध्यान महानले।
तपस्वी वीतरागोऽयं, निजात्मन्येव तन्मय:।।
शुक्लध्यानरूपी अग्नि में चार घातिया कर्मों को जलाकर वह वीतराग तपस्वी अपनी आत्मा में ही तन्मय हो गए।

केवलज्ञान कल्याणक

(९१ )


दशम्यां वैशाख-शुक्लायां, केवलज्ञानमाप्तवान्।
येन सर्वाणि द्रव्याणि, हस्तस्थितीव दृष्टवान् ।।
उन्होंने वैशाख शुक्ल दशमी के दिन केवलज्ञान प्राप्त किया जिससे वे सभी द्रव्यों को हाथ में स्थित के समान देखने लगे।
(९२)
गणधरं विना किन्तु, दिव्यध्वनिर्न निर्गत:।
षट्षष्टि, दिनानि जातानि, वाणी नैव प्रकाशिता।।
किन्तु गणधर के बिना दिव्यध्वनि प्रकट नहीं हुई। छ्यासठ दिन बीत गए, वाणी प्रकाशित नहीं हुई।
(९३)
पुण्योदयेन लोकस्य, गणधरो हि गौतम:।
आगत्य वन्दनां कृत्वा, समक्षं समुपस्थित:।।
लोगों के पुण्योदय से गौतम गणधर आकर वन्दना करके सामने उपस्थित हो गया।
(९४)
आगच्छद् गौतम: स्वामी, दिव्यध्वनिश्च गुंजित:।
अज्ञान तिमिर नाशाय, उन्नते विपुलाचले।।
गौतम स्वामी आए और अज्ञानान्धकार के नाश के लिए ऊँचे विपुलाचल पर महावीर की दिव्यध्वनि गूँजने लगी।
(९५)
त्रिन्शद् वर्षेषु जातेषु, वाणी गंगा प्रवाहिता।
यथा मुमुक्षवो भव्या: आत्मोद्धाराय स्नापिता:।।
तीस वर्ष बीत जाने पर वाणी-गंगा प्रवाहित हुई जिसके द्वारा भव्य मुमुक्षु आत्मोद्धार के लिए स्नान कराए गए।
(९६)
केवलज्ञाननेत्रेण, सर्वद्रव्याणि पश्यत:।
दिव्यध्वनिस्तु वीरस्य, अकरोद् धर्मदेशनाम्।।
केवलज्ञानरूपी नेत्र से सभी द्रव्यों को देखने वाले भगवान वीर की धर्मदेशनारूप दिव्यध्वनि खिरने लगी।
(९७)
नर-पशु-सुरा: सर्वे, समवसरणस्थिता:।
हितोपदेशमाकण्र्य, चक्रु: कल्याणमात्मन:।।
समवसरण में स्थित मनुष्य, पशु और देव सभी ने हितोपदेश सुनकर आत्म-कल्याण किया।

निर्वाण कल्याणक

(९८ )


जगत्कल्याण कर्तुं स:, व्यहरत् जगतीतले।
सूर्यकान्तिर्महावीर:, पावापुरं हि प्राप्तवान्।।
जगत् का कल्याण करने के लिए सूर्य के समान कान्ति वाले महावीर पृथ्वीतल पर विहार करते रहे और अन्त में पावापुर पहुँच गए।
(९९)
अमावस्या-निशायां स:, कृष्ण पक्षे च कार्तिके।
दग्ध्वावशिष्ट कर्माणि, प्रपेदे मोक्षमन्दिरम्।।
कार्तिक कृष्णपक्ष में अमावस्या की राात्रि में अवशिष्ट अघातिकर्मों को जलाकर भगवान महावीर मोक्ष मंदिर को प्राप्त हुए।
(१००)
लब्धनिर्वाणलाभस्य, पावापुरसरोवरे।
महावीरस्य भक्तास्तु, परं प्रमोदमाप्नुयु:।।
पावापुर सरोवर में मुक्तिलाभ को प्राप्त हुए महावीर को देखकर उनके भक्त अत्यन्त हर्ष को प्राप्त हुए।
(१०१)
कर्तुं हर्षाभिव्यक्तिम च, तै: प्रदीपा: प्रकाशिता:।
आरभ्य तद्दिनादेव, दीपावली प्रकाश्यते।।
और उन भक्तों के द्वारा हर्ष की अभिव्यक्ति करने के लिए दीपक जलाए। उसी दिन से प्रारंभ हुए दीपावली पर्व के दिन दीपमालिका प्रकाशित की जाती है।
(१०२)
वर्धमानं महावीरम्, वीरं सन्मति दायकम्।
अतिवीरमहं वन्दे, कुण्डलपुर-भू सुतम् ।।
मै कुण्डलपुर-भूमि के पुत्र वर्धमान महावीर, वीर, सन्मति, अतिवीर को नमस्कार करता हूँ।
(१०३)
कुण्डलपुरजात: स:, महावीर जिनेश्वर:।
विश्व-शान्ति-विधाता स:, जैनशासन नायक:।।
कुण्डलपुर में उत्पन्न वे महावीर जिनेश्वर विश्वशांति करने वाले तथा जैनशासन के नायक हैं।
(१०४)
कुण्डलपुर-भूभागस्तु, महावीरस्य जन्मना।
पवित्र: पुण्यदश्चैव, मन: शान्तिप्रदायक:।
महावीर के जन्म से पवित्र-कुण्डलपुर का भूमि-भाग पुण्य देने वाला और मन की शांति देने वाला है।
(१०५)
कुण्डलपुर-माहात्म्यं, शब्दैर्मया न वर्ण्यते।
यत्रोत्पन्नो महावीर:, सर्वोदयस्य प्रेरक:।।
कुण्डलपुर का महत्व मेरे द्वारा शब्दों से वर्णित नहीं किया जा सकता। जहाँ उत्पन्न महावीर ने सर्वोदय शासन की प्रेरणा प्रदान की है।

कुण्डलपुर का जीर्णोद्धार एवं विकास

(१०६)


दीर्घकाल प्रभावात्तु, उपेक्षायाच्च कारणात्।
प्राचीन शिल्प-सम्पत्ति:, न दृश्यतेऽत्र साम्प्रतम्।।
लम्बे समय के प्रभाव से तथा उपेक्षा के कारण से यहाँ अब प्राचीन-शिल्प की कोई वस्तु नहीं प्राप्त हैं।
(१०७)
वर्तमानेतुतत्रासीत्, प्राचीनं लघु मंदिरम्।
यात्रिणश्चाल्प संख्यायाम् गच्छन्तिस्म यदा कदा।।
वर्तमान में तो यहाँ एक छोटा सा प्राचीन मंदिर था और यात्री भी कभी-कभी थोड़ी संख्या मेें जाया करते थे।
(१०८)
प्रबंध-सुविधाऽभावात्, आगन्तुमत्र यात्रिण:।
दर्शनार्थं तु क्षेत्रेऽस्मिन्, नोत्सहन्ते पुन: पुन:।।
प्रबंध और सुविधाओं के अभाव के कारण यात्री दर्शनों के लिए बार-बार यहाँ आने का उत्साह नहीं करते थे।
(१०९)
दिग्भ्रमिता: जना: केचित्, प्रमाणै: प्रबलै: बिना।
कल्पन्ते जन्म वीरस्य, अन्यत्रैव नवे स्थले।।
कुछ दिशाहीन लोग प्रबल प्रमाणों के बिना भगवान् महावीर का जन्म किसी दूसरी जगह मानते हैं।
(११०)
एतेषां भ्रान्तचिन्त्ततानाम्, अन्यत्र जन्म वादिनाम्।
दुष्प्रचारोऽपि क्षेत्राय, जातो विकास बाधक:।।
भगवान् महावीर के जन्म को अन्यत्र मानने वाले इन भ्रान्तचित्त लोगों के द्वारा कुण्डलपुर क्षेत्र के प्रति दुष्प्रचार करने से तीर्थ विकास में बाधा उत्पन्न हुई अर्थात् क्षेत्रविकास अवरुद्ध हो गया था।
(१११)
वरिष्ठा गणिनी माता, ज्ञानमती तपस्विनी।
लेखिका विदुषी साध्वी, जैनशासनदीपिका।।
बीसवीं सदी की वरिष्ठ गणिनी तपस्विनी माता ज्ञानमती हैं जो कि लेखिका, विदुषी और जैन शासन को चमकाने वाली साध्वी हैं।
(११२)
जैन तीर्थ विकासाय, प्रेरिका मार्गदर्शिका।
जैनागमोक्तमार्गेण, तीर्थोद्धाराय चिन्तिता।।
आगमों के अनुसार जैन तीर्थों के विकास के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन करने वाली वे माता प्राचीन तीर्थों के जीर्णोद्धार के लिए चिन्तनरत रहती हैं।
(११३)
विहरन्ती तु सा साध्वी, कुण्डलपुरमागता।
क्षेत्रस्थितिं समालोक्य, मनसि व्यथिताऽभवत्।।
विहार करती हुई वह ज्ञानमती माता जी कुण्डलपुर आर्इं। क्षेत्र की स्थिति को देखकर मन में व्यथित हुर्इं।।
(११४)
कुण्डलपुर भूमिश्च, न महावीर-जन्मदा।
श्रुत्वा मतं हि केषांचित्, साऽऽश्चर्यचकिताभवत्।।
कुण्डलपुर की भूमि महावीर को जन्म देने वाली नही है, किन्हीं के इस मत को सुनकर माताजी आश्चर्यचकित रह गर्इं।
(११५)
प्रमाणैर्बहुभिर्माता, तर्वैâरेतदसाधयत् ।
कुण्डलपुरमेवास्ति, महावीरस्य जन्मभू:।।
माताजी ने बहुत से प्रमाणों और तर्कों से सिद्ध किया कि महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर ही है।
(११६)
मातु: पादार्पणेनैव, निर्मिता: नवयोजना:।
कायाकल्पाय क्षेत्रस्य, प्रारब्धा कार्य-शृंखला।।
माताजी के पदार्पण करते ही क्षेत्र के कायाकल्प के लिए नई योजनाएँ बनीं तथा कार्यशृंखला आरंभ हो गई।
(११७)
मन्दिराणां मनोज्ञानां, विनिर्माणमिहाभवत् ।
महोन्नत प्रतिमाभि:, शोभितानि चाभवन् ।।
अनेक मनोज्ञ मंदिरों का यहाँ निर्माण हुआ और वे ऊँची प्रतिमाओं से सुशोभित हुए।
(११८)
सप्त खण्डात्मके रम्ये, नन्द्यावर्ताभिधेनवे।
प्रासादे सन्ति दृष्टव्या:, सुरचना: मनोहरा:।।
सात मंजिलों वाले नंद्यावर्त नामक सुन्दर और नए महल में देखने योग्य बहुत सी मनोहारिणी रचनाएँ हुई हैं।
(११९)
नद्यावर्ते च तत्रास्ति, महावीरस्य मंदिरम्।
महोन्नतं सुरम्यं च, उत्तुंग-मूर्ति शोभितम्।।
और उसी नंद्यावर्त महल में एक बहुत ऊँचा और सुन्दर महावीर का मंदिर है, जो भगवान महावीर की उत्तुंग प्रतिमा से सुशोभित है।
(१२०)
तत्रैव ऋषभस्यापि, भगवत: सुमन्दिरम् ।।
तस्मिन्नापि सुमनोज्ञा, भव्या मूर्तिर्विराजते।।
वहीं पर भगवान ऋषभदेव का भी सुन्दर मंदिर है, उसमें भी भव्य और मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है।
(१२१)
परिसरे च तत्रैव, नवग्रहाख्य - मंदिरम्।
विघ्नहारि-जिनेशानां, विराजन्तेऽत्र मूर्तय:।।
उसी नंद्यावर्त परिसर में नवग्रह शांति नाम का मंदिर है। उसमें विघ्नहर्ता नव जिनेन्द्र देवों की मूर्तियाँ विराजमान हैं।
(१२२)
त्रिकालेषु च वर्तन्ते, द्वि सप्ततिर्हि ये जिना:।
शोभते मूर्तिभिस्तेषां, चतुर्विंशतिर्मन्दिरम् ।।
तीनों कालों में जो २४²३·७२ (बहत्तर) तीर्थंकर हैं, उनकी मूर्तियाँ त्रिकाल चौबीसी जिनालय में शोभित हैं।
(१२३)
समं तु नव निर्माणै:, क्षेत्र माहात्म्यवर्धवैâ:।
आकर्षणमयी जाता, कुण्डलपुर-मेदिनी।।
क्षेत्र के महत्त्व से बढ़ाने वाले नए निर्माणों के साथ कुण्डलपुर की पृथ्वी आकर्षणमय बन गई।
(१२४)
यात्रिभ्य: सुखदानाय, व्यवस्थात्र मनोहरा।
भोजन-वास-सम्बद्ध:, प्रबंधोऽत्र सुखायते।।
यात्रियों को सुख देने के लिए यहाँ मन को हरण करने वाली व्यवस्था हेतु भोजन और आवास से संबंधित प्रबन्ध सुख देता है।
(१२५)
धर्मशालाश्च वर्तन्ते, स्वच्छा, रम्या मनोरमा:।
अनुभवन्ति सौख्यानि, यात्रिणस्ते यथा गृहे।।
यहाँ धर्मशालाएँ स्वच्छ, सुन्दर और मन को आनन्द देने वाली हैं, यात्री यहाँ ऐसा सुख अनुभव करते हैं, जैसा कि वे अपने घर में ही हैं।
(१२६)
पानाय निर्मलं नीरम्, विद्युत् वायोश्च शुद्धता।
प्राकृतिवंâ च सौन्दर्यं, सन्ति क्षेत्र विशिष्टता:।।
पीने के लिए निर्मल पानी, प्रकाश हेतु बिजली, शुद्धवायु और प्राकृतिक सौन्दर्य आदि इस क्षेत्र की विशेषताएँ हैं।
(१२७)
नवं रूपं तु क्षेत्रस्य:, सर्वैरेव प्रशस्यते।
निर्माण प्रक्रियायाश्च, क्रमोऽद्यापि प्रगच्छति।।
क्षेत्र के नये रूप की सभी के द्वारा प्रशंसा की जा रही है। वहाँ निर्माणप्रक्रिया आज भी चल रही है।
(१२८)
साध्वीं ज्ञानमतीं वन्दे, गणिनीं विदुषीमहम्।
यस्या: कृपाप्रसादेन, क्षेत्रोन्नतिर्विधीयते।।
मैं साध्वी, गणिनी विदुषी ज्ञानमती की वन्दना करता हूँ, जिनकी कृपा के प्रसाद से तीर्थ क्षेत्र का विकास किया जा रहा है।