खगोल शास्त्र एवं जैन ज्योतिष की प्राचीनता

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खगोल शास्त्र एवं जैन ज्योतिष की प्राचीनता

सारांश जैन ज्योतिष एवं खगोल शास्त्र के इतिहास में सर्वप्रथम कालकाचार्य, भद्रबाहु तथा बाराह मिहिर का नाम लिया जाता हैं। जैन ग्रंथ सूर्य प्रज्ञप्ति गर्ग संहिता, ज्योतिष्करणक में ज्योतिष की अमूल्य ज्ञान राशि छिपी पड़ी है। वेदांग ज्योतिष ने भी इन्हें आधार माना है। श्वेताम्बर जैन आगम कल्पसूत्र तथा ठाणांग में ज्योतिषी के लिये ‘‘जोई संगविऊ’’ शब्द प्रयोग हुआ है।

भारतीय जैन गणित एवं ज्योतिष विश्व के लिये एक अपूर्व देन है। अति प्राचीन काल से ही भारत में इस विज्ञान को बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। मध्यकाल में तो में तो यह विद्या अपनी चरम सीमा तक पहुँच गयी थी। ज्योतिष के प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थ बहुत कम ही प्राप्त हैं। मध्यकाल में सैकड़ों ग्रन्थ रचे गये, उनमें जैन विद्वानों के ज्योतिष सम्बन्धी ग्रन्थों में कई तो अत्यन्त महत्त्व के हैं। प्राचीन जैन आगमों में ज्योतिष एवं गणित के अनेक उल्लेखनीय सूत्र पाये जाते हैं जिसे ढाई हजार वर्ष पूर्व तिथिपत्र सम्बन्धी मान्यताओं का ज्ञान होता है वेदांग ज्योतिष को सम्यक् प्रकार से समझने के लिये सूर्य प्रज्ञप्ति, चन्द्र प्रज्ञप्ति, ज्योतिष करण्डक आदि ग्रन्थ बहुत उपयोगी माने जाते हैं। अंग विद्या सम्बन्धी भारतीय सूक्ष्म ज्ञान का पता प्राचीन प्राकृत भाषा के ‘‘अंग विज्जा’’ नामक ग्रन्थ से बहुत अच्छे रूप में मिलाता है। बारह हजार श्लोक प्रमाण का यह वृहद ग्रन्थ अपने विषय का विश्वभर में बेजोड़, खेद है अभी पुण्यविजयजी ने प्राचीन ताड़पत्रीय प्रतियों के आधार पर इसका सुसंपादन किया है। प्राचीन गणित का भी जैन आगमों और षट्खंड़ागम, क्षेत्र समाज आदि ग्रन्थों में जो विवरण मिलता है उससे तत्कालीन गणित प्रणाली का अच्छा परिचय मिलता है।

वर्णी अभिनन्दन ग्रन्थ में प्रकाशित डॉ. अवधेश नारायण सिंह के लेख मेें [१] जैन ग्रन्थों के गणित में योगदान पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। स्वर्गीय कुंवरजी अणंदजी का जैन गणित विचार नामक गुजराती ग्रन्थ भी इस सम्बन्ध में दृष्टव्य है। इस अभिनन्दन ग्रन्थ में ज्योतिषाचार्य डॉ. नेमीचंद जैन, शास्त्री का आलेख भी आलेख भी है जिसमें जैन ज्योतिष ग्रन्थों की तालिका है। स्वर्गीय अगरचन्द नाहटा बीकानेर[२] ने अपने आलेख में ज्योतिष, के अप्रकाशित, प्रकाशित ग्रन्थों की सूची ‘‘जैनसिद्धान्त भास्कर’’ में प्रकाशित की है। जैन विद्वानों द्वारा रचित ३०० मौलिक अप्रकाशित एवं २५ जैनेतर ग्रन्थों की टीकाओं की नामावली जैन सिद्धान्त भास्कर, दिसम्बर—५४ में डॉ. नेमीचंद जैन शास्त्री ने दी।

जैन ज्योतिष साहित्य के इतिहास में सर्वप्रथम कालकाचार्य का नाम लिया जाता है। जैन ग्रन्थ सूर्य प्रज्ञप्ति, गर्ग संहिता, ज्योतिष, करण्डक इत्यादि में ज्योतिष साहित्य की अनेक महत्त्व पूर्ण उपलब्ध्यिों का वर्णन मिलता है। अयन, भुक्त मास, क्षयमास, तेरह दिन का पक्ष नक्षत्रों की श्रेणियाँ, रोहणी सौरमास, मलमास, शकटभेद का सूक्ष्म विवेचन ज्योतिष करण्डक में सुंदर ढँग से जैन ज्योतिष के साथ ही भारतीय ज्योतिष की प्राचीनता और मौलिकता सिद्ध करता है। डॉ. श्यामा शास्त्री ने भी अपने ‘‘वेदांग ज्योतिष’’ में इसी कथन की पुष्टि की है। उनका कहना है उपलब्ध जैन साहित्य भले ही आज इतना प्राचीन न हो लेकिन इसका मूल तत्त्व मौलिक रूप में खरबों वर्ष पहले से विद्यमान था। आज इतिहास भी जैनधर्म का अस्तित्व प्रागैतिहासिक काल में स्वीकार करता है। ईसा से ५०० वर्ष पूर्व रचे गये (?) श्वेताम्बर जैन आगमों जैसे कल्पसूत्र एण्वं ठाणांग में ज्योतिष के लिये ‘‘जोई संगविऊ’’ शब्द आया है। काव्यकारों ने इसे ग्रहों की सम्यक् स्थिति के ज्ञान को प्राप्त करना बताया है।

ठाणांग और प्रश्न व्याकरण में सायन सौरवर्ष का कथन मिलात है। समवायंग सूत्र में चान्द्रवर्ष की दिन संख्या ३५४ बताई है।[३] ३३वें समवाय में चाद्रवर्ष की उत्पत्ति का कथन भी किया गया है। ठाणांग सूत्र में पाँच का एक युग बताया गया है। समवायांग में भी उक्त कथन की पुष्टि मिलती है।

प्रश्न व्याकरण में नक्षत्रों के फलों का विशेष ढँग से निरूपण करने के लिये इनका कुल, उपकुल और कुलोपकुलों में विभाजन करके वर्णन मिलता है।

समवायांग में बताया है कि नक्षत्रों के दिशाद्वार होते हैं और उनका भिन्न—भिन्न फलादेश होता है। प्रथम मेें सात नक्षत्र पूर्व द्वार—आठ से चौदह तक दक्षिण द्वार पन्द्रह से बाइस तक पश्चिम द्वार तथा अंतिम सात उत्तर द्वार वाले होते हैं। ठाणांग सूत्र में चन्द्रमा के साथ स्पर्श योग करने वाले नक्षत्रों का कथन पृष्ठ ९८ से १०० के बीच मिलता है। ग्रहों के सम्बन्ध में ठाणांग के पृष्ठ ९९—१०० मेें अट्ठासी ग्रहों के नाम बताये है। समवायांग के अध्ययन से भी इसका समर्थन मिलता है। सामवायांग ८८/११ में कहा गया है एक चन्द्र और एक सूर्य का परिवार अट्ठासी महाग्रहों का है।

समवायांग के पन्द्रहवें समवाय के तीसरे सूत्र में राहु के दो भेद बताये हैं नित्य राहु एवं पर्व राहु। नित्य राहु को कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष का कारण तथा पर्वराहु को चन्द्रग्रहण का कारण माना जाता है। केतु जिसका ध्वजदंड सूर्य के ध्वजदंड से ऊँचा है, अत: भ्रमण वश यही केतु सूर्य ग्रहण का कारण होता है अभिप्राय यह है कि सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण की मीमांसा भी उदयकाल में साहित्य के अन्तराल शामिल हो गई थी।

ई.पू. ५०० के लगभग की रचना ‘सूर्य प्रज्ञपित’, वेदांग ज्योतिष के समान प्राचीन ज्योतिष का प्रामाणिक और मौलिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की भाषा प्राकृत है। मलयगिरि सूरि ने इसकी संंस्कृत टीका लिखी है । इस ग्रंथ की प्रति आरा के संग्रहालय में उपलब्ध है। स्व. डॉ. नेमीचंद जैन शास्त्री ने अपनी पुस्तक ‘‘भारतीय ज्योतिष’’ में भी इसके उद्धरण प्रयोग किये हैं। इस ग्रन्थ में दिन, रात , मास, पक्ष, अयन, आदि का कथन करते हुए दिनमान के बारे में बताया है।१२ इस ग्रंथ में पंच वर्षात्मक युग के अयनों के नक्षत्र तिथि और मास का वर्णन भी पृष्ठ—२२२ पर मिलता है।

चन्द्र प्रज्ञप्ति भी इसी कालावधि का जैन ग्रंथ हैं। इसका विषय प्राय: सूर्य प्रज्ञप्ति से मिलता—जुलता है। सूर्य प्रज्ञप्ति से चन्द्र प्रज्ञप्ति अधिक परिष्कृत है। इसमें सूर्य की प्रतिदिन की योजना गति निकाली गई है तथा उत्तरायण—दक्षिणायन की बीथियों का अलग—अलग विस्तार निकालकर सूर्य और चन्द्र की गति निश् की है। इसके चतुर्थ प्राभृत में चन्द्र और सूर्य का संस्थान तथा नाम क्षेत्र का संस्थान विस्तार से बताया है। पुरुष छाया पर से दिनमान की साधना के बारे में विस्तृत विवेचन है।

इस ग्रन्थ के उन्नीवें प्राभृत में चन्द्र—सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और ताराओं की ऊँचाई का कथन किया गया है। इस ग्रन्थ के अंत में जैन मान्यतानुसार ७९० योजन से लेकर ९०० योजन की ऊँचाई के बीच में ग्रह नक्षत्रों की स्थिति बताई गई है। ज्योतिष करण्डक, ज्योतिष का प्राचीन मौलिक ग्रन्थ है। इसका विषय वेदांग ज्योतिष के समान अविकसित अवस्था में हैं। इसमें भी नक्षत्र—लग्न का प्रतिपादन किया गया है। इसका रचनाकाल ई.पू तीसरी या ई.पू. चौथी शताब्दी निश्चित है। इसमें जो लग्न का निरूपण किया गया है इससे भारतीय ज्योतिष की कई नवीन बातों पर प्रकाश पड़ता है।

हिन्दुत्व के लेखक ने जैन ज्योेतिष का महत्त्व और प्राचीनता स्वीकार की है और लिखा है भारतीय ज्योतिष में, यूनानियों की भी शैली का प्रचार वि. सं. ३०० वर्ष पीछे हुआ था पर जैनों के मूल ग्रन्थ एवं अंगों में यवन ज्योतिष का कुछ भी भास नहीं है। जिसप्रकार सनातनियों की वेद संहिता में पंचवर्षात्मक युग है और कृतिका से नक्षत्र गणना है, उसी प्रकार जैनों के अंग ग्रंथों में भी है। डॉ.श्याम शास्त्री ने भी जैन ज्योतिष प्रागैतिहासिक पुरातन परम्परा की मान्यता दी है।

जैन ज्योतिष साहित्य की प्राचीनता, ज्योतिष करण्डक २००—२०५ तथा उसकी नक्षत्र गणना से भी सिद्ध होती है। प्राचीनकाल में कृतिका से नक्षत्र गण्ना की जाती थी, अभिजित वाली नक्षत्र गणना कृतिका वाली नक्षत्र गणना से प्राचीन है।

जैन ग्रन्थों में अभिजित वाली तथा कुछ में कृतिका नक्षत्र गणना वत्र्तमान है। कृतिका से नक्षत्र गणना का प्रयोग भी प्राचीन जैन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है। विशोत्तरी दशा का क्रम इसी से लिया जाता है। चान्द्र वर्षों की अपेक्षा सायन नक्षत्रों का विधान अधिक सटीक है। जैन संवत्सर प्रणाली साभिजित नक्षत्र प्रणाली पर आश्रित है। नक्षत्र, संवत्सर, युग संवत्सर, प्रमाण संवत्सर देखने से प्रतीत होता है कि इसका प्रयोग प्राचीन भारत में ई. पू. दशवीं शताब्दी से भी पूर्व था। वेदों में जो संवत्सार नाम आये हैं जैन ग्रंथों में उनसे भिन्न—भिन्न नाम है। यह संवत्सर प्रणाली और शनि संवत्सर। वृहस्पति जब सब नक्षत्रों की भुक्ति करके पुन: अभिजित नक्षत्र पर आ जाता है तब महानक्षत्र संवत्सर होता है। षट्खण्डागम की चौथी टीका में रौद्र, श् वेत, मैत्र वारभट्, दैत्य, वैरोचन, वैश्वदेव, अभिजित, रोहण, क्लविक्षप नैऋत्य, वरुण अर्यमन, भाग्य आदि १५ मुहुर्त गिनाये हैं। प्रस्तुत आलेख जैन ज्योतिष की प्राचीनता सिद्ध करने का परिचय मात्र है——लेख अधिक विस्तृत न हो जाय इसलिये इसको संक्षिप्ततर करने का प्रयास किया है। खगोलशास्त्र और ज्योतिष की पुरासम्पदा से जैन साहित्य भरा— पूरा है। इसमें अनेक शोध सन्दर्भ विखरे पड़े है, आवश्यकता हैं इनके मंथन की ओर प्रकाश में लाने के लिये भरसक प्रयास करने की जैन खगोलशास्त्र—ज्योतिषशास्त्र के ऐतिहासिक शोध की अग्रगति के लिये यह नितान्त आवश्यक है।

टिप्पणी

  1. वर्णी अभिनंदन ग्रंथ में डॉ. नेमीचंद शास्त्री एवं डॉ. अवधेश नारायणसिंह के लेख देखें।
  2. जैन सिद्धान्त भास्कर आरा—बिहार, न्न्दतर्र् N०—२, १९५४ अम्, अगरचंद नाहटा का लेख
  3. . समवायंग, छ १/स


—अभय प्रकाश जैन
एन—१४, चेतकपुरी, ग्वालियर—४७४००९
अर्हत् वचन जन. अक्टू. १९९१