दर्शनमार्गणा अधिकार

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दर्शनमार्गणा अधिकार

अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

अथ स्थलपंचकेन चतुर्दशसूत्रै: दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले चक्षुर्दर्शनमार्गणायां मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले अस्मिन्नेव दर्शने असंयताद्यप्रमत्तान्तानां अन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं तृतीयस्थले उपशामकक्षपकयोरन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले अचक्षुर्दर्शनिनां अन्तरकथनत्वेन ‘‘अचक्खु’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनंतरं पंचमस्थले अवधिकेवलदर्शनिनो: अंतरनिरूपणत्वेन ‘‘ओधि’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।
संप्रति दर्शनमार्गणायां चक्षुर्दर्शनिषु मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां अन्तरप्ररूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणीसु मिच्छादिट्ठीणमोघं।।२८२।।
सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं।।२८३।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदि भागो, अंतो-मुहुत्तं।।२८४।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमसहस्साणि देसूणाणि।।२८५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं, एकजीवापेक्षया जघन्येन अंतर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण-देशोने द्वे षट्षष्टी सागरोपमे स्त:।
सासादनानां सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां जघन्येन एकसमय:, उत्कर्षेण पल्योपमासंख्यातभाग:। एकजीवापेक्षया पल्योपमासंख्यातभाग:। उत्कर्षेण कथ्यते-
एक: भ्रमिताचक्षुर्दर्शनस्थितिमात्र: असंज्ञिपंचेन्द्रियेषु उत्पन्न:, पंचपर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) भवनवासिवानव्यन्तरदेवेषु आयुर्बद्ध्वा (४) विश्रान्त: (५) देवेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (६) विश्रान्त: (७) विशुद्ध: (८) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (९) सासादनं गत:। मिथ्यात्वं गत्वान्तरं प्राप्य चक्षुर्दर्शनिस्थितिप्रमाणं परिभ्रम्यावसाने सासादनं गत:।
लब्धमन्तरं। अचक्षुर्दर्शनिप्रायोग्यमावलिकाया: असंख्यातभागं स्थित्वा मृत: अचक्षुर्दर्शनी जात:। एवं नवभि: अंतर्मुहूर्तै: आवलिकाया: असंख्यातभागेन च ऊना चक्षुर्दर्शनिस्थिति: सासादनोत्कृष्टान्तरं।
सम्यग्मिथ्यादृष्टेरन्तरं उच्यते-अचक्षुर्दर्शनिस्थितिं प्राप्य एक: असंज्ञिपंचेन्द्रियेषु उत्पन्न:। पंचपर्याप्तिभि: पर्याप्त: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) भवनवासि-वानव्यन्तरदेवेषु आयुर्बद्ध्वा (४) विश्रान्त: (५) देवेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (६) विश्रान्त: (७) विशुद्ध: (८) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (९) सम्यग्मिथ्यात्वं गत: (१०)। मिथ्यात्वं गत्वान्तरित: चक्षुर्दर्शनिस्थितिं परिभ्रम्यावसाने सम्यग्मिथ्यात्वं गत: (११)। लब्धमन्तरं। मिथ्यात्वं गत्वा (१२) अचक्षुर्दर्शनिषु उत्पन्न:। एवं द्वादशान्तर्मुहूर्तै: ऊना चक्षुर्दर्शनिस्थिति: उत्कृष्टान्तरं ज्ञातव्यं।
एवं प्रथमस्थले मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां चक्षुर्दर्शनिनां अन्तरकथनेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति चक्षुर्दर्शनिषु असंयताद्यप्रमत्तान्तानां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।२८६।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।२८७।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमसहस्साणि देसूणाणि।।२८८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वयो: सूत्रयोरर्थ: सुगम:। एकजीवापेक्षया उत्कर्षेण-एक: अचक्षुर्दर्शनि-स्थितिप्रमाणं स्थित: असंज्ञिपंचेन्द्रियसम्मूच्र्छिमपर्याप्तकेषु उत्पन्न:। पंचभि: पर्याप्तिभि: पर्याप्त: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) भवनवासि-वानव्यन्तरेषु आयुर्बद्ध्वा (४) विश्रान्त: (५) कालं गतो देवेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (६) विश्रान्त: (७) विशुद्ध: (८) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (९)। उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिका: सन्तीति सासादनं गत्वान्तरित:। मिथ्यात्वं गत्वा चक्षुर्दर्शनिस्थितिं भ्रमित्वावसाने उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (१०)। लब्धमन्तरं। पुन: सासादनं गत: अचक्षुर्दर्शनिप्रायोग्यं आवलिकाया: असंख्यातभागकालं स्थित्वा अचक्षुर्दर्शनिषु उत्पन्न:। दशभिरन्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्वकस्थितिप्रमाणं असंयतसम्यग्दृष्टीनामुत्कृष्टान्तरं।
संयतासंयतस्य कथ्यते-एक: अचक्षुर्दर्शनिस्थितौ विद्यमान: गर्भोपक्रान्तिके पंचेन्द्रियेषु पर्याप्तेषु उत्पन्न: (१)।
संज्ञिपंचेन्द्रियसम्मूच्र्छिमपर्याप्तेषु किन्नोत्पादित: ?
नैतत्, सम्मूच्र्छिमेषु प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तेरसंभवात्। न च असंख्यातासंख्यातलोकं अनन्तकालं वा अचक्षुर्दर्शनिषु परिभ्रमतां जीवानां वेदकसम्यक्त्वग्रहणं संभवति, विरोधात्। न च स्तोककालं स्थित: चक्षुर्दर्शनिस्थिते: समापनसक्षम:।
पुन: स एव जीव: त्रिपक्षत्रिदिवसान्तर्मुहूर्तेन च प्रथमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपन्न: (२)। प्रथमसम्यक्त्वकाले षडावलिका: सन्तीति सासादनं गत:। अन्तरितो मिथ्यात्वं गत्वा स्वकस्थितिं परिभ्रम्य अपश्चिमे भवे कृतकरणीयो भूत्वा संयमासंयमं प्रतिपन्न: (३)। लब्धमंतरं। अप्रमत्त: (४) प्रमत्त: (५) अप्रमत्त: (६)। उपरि षडन्तर्मुहूर्ता:। एवमष्टचत्वािंरशद्दिवसै: द्वादशान्तर्मुहूर्तैश्च ऊना स्वकस्थिति: संयतासंयतस्योत्कृष्टान्तरं।
प्रमत्तस्य उच्यते-एक: अचक्षुर्दर्शनिस्थितिं स्थित: मनुष्येषु गर्भाद्यष्टवर्षेण उपशमसम्यक्त्वमप्रमत्त-गुणस्थानं च युगपत् प्रतिपन्न: (१)। पुन: प्रमत्तो: जात: अध: पतित्वान्तरित: चक्षुर्दर्शनिस्थितिं परिभ्रम्या पश्चिमे भवे मनुष्यो जात:। कृतकरणीयो भूत्वा अन्तर्मुहूर्तावशेषे जीविते अप्रमत्तो भूत्वा प्रमत्तो जात: (३)। लब्धमंतरं। भूयोऽप्रमत्त: (४)। उपरि षडन्तर्मुहूर्ता:। एवमष्टवर्षै: दशान्तर्मुहूर्तै: ऊना स्वकस्थिति: प्रमत्तस्योत्कृष्टान्तरं।
एवमेवाप्रमत्तस्यापि ज्ञातव्यं।
एवं द्वितीयस्थले असंयताद्यप्रमत्तान्तानां अन्तरकथनेन सूत्रत्रयं गतम्।


अथ दर्शनमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में चौदह सूत्रों के द्वारा दर्शनमार्गणा नामका नवमां अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में चक्षुदर्शन मार्गणा में मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानवर्ती जीवों का अंतर कथन करने वाले ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में इसी चक्षुदर्शन में असंयत से लेकर अप्रमत्त गुणस्थान तक के जीवों का अंतर बतलाने हेतु ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके आगे तृतीय स्थल में उपशामक और क्षपक महामुनियों का अंतर प्रतिपादन करने वाले ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में अचक्षुदर्शन वालों का अंतर कथन करने वाला ‘‘अचक्खु’’ इत्यादि एक सूत्र है। तदनंतर पंचम स्थल में अवधिदर्शन और केवलदर्शन वाले जीवों का अंतर निरूपण करने वाले ‘‘ओधि’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। इस प्रकार यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब दर्शनमार्गणा में चक्षुदर्शनी जीवों में मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानवर्तियों का अंतर प्ररूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित किये जाते हैं।

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणा के अनुवाद से चक्षुदर्शनी जीवों में मिथ्यादृष्टियों का अंतर गुणस्थान के समान है।।२८२।।

चक्षुदर्शनी सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर गुणस्थान के समान है।।२८३।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर क्रमश: पल्योपम का असंख्यातवां भाग और अंतर्मुहूर्त है।।२८४।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अंतर कुछ कम दो हजार सागरोपम है।।२८५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है तथा एक जीव की अपेक्षा अंतर्मुहूर्तमात्र जघन्य अंतर है, उत्कृष्ट से कुछ कम दो छ्यासठ सागरोपमप्रमाण अंतर है।

सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नाना जीव का जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अंतर पल्योपम का असंख्यातवां भाग है। एक जीव की अपेक्षा पल्योपम का असंख्यातवां भाग है। अब उत्कृष्ट से कथन करते हैं—

अचक्षुदर्शन की स्थितिप्रमाण परिभ्रमण किया हुआ कोई एक जीव असंज्ञी पंचेंद्रियों में उत्पन्न हुआ। वहाँ पाँच पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) भवनवासी या वानव्यंतर देवों में आयु को बांधकर (४) विश्राम लेकर (५) देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (६) विश्राम लेकर (७) विशुद्ध होकर (८) उपशम सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (९)। पश्चात् सासादनगुणस्थान में चला गया। पुन: मिथ्यात्व में जाकर अंतर को प्राप्त होकर चक्षुदर्शनी की स्थितिप्रमाण परिभ्रमण करके अंत में सासादनगुणस्थान को प्राप्त हुआ। इस प्रकार अंतर प्राप्त हो गया। पुन: अचक्षुदर्शनी के बंधयोग्य आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल रहकर मरा और अचक्षुदर्शनी हो गया। इस प्र्रकार नौ अंतर्मुहूर्तों से और आवली के असंख्यातवें भाग से कम चक्षुदर्शनी की स्थितिप्रमाण चक्षुदर्शनी सासादनसम्यग्दृष्टि जीव का उत्कृष्ट अंतर है।

अब चक्षुदर्शनी सम्यग्मिथ्यादृष्टि का अंतर कहते हैं—अचक्षुदर्शन की स्थिति को प्राप्त हुआ कोई एक जीव असंज्ञी पंचेन्द्रियों में उत्पन्न हुआ। वहाँ पाँचों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर(२) विशुद्ध होकर (३) भवनवासी या वानव्यंतर देवों में आयु को बांधकर (४) विश्राम लेकर (५) मरा और देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (६) विश्राम लेकर (७) ाqवशुद्ध होकर (८) उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (९)। पश्चात् सम्यग्मिथ्यात्व में चला गया (१०) और वहाँ मिथ्यात्व को प्राप्त होकर अंतर को प्राप्त हुआ। चक्षुदर्शनी की स्थितिप्रमाण परिभ्रमणकर अंत में सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। (११)। इस प्रकार अंतर प्राप्त हो गया। पुन: मिथ्यात्व में जाकर (१२) अचक्षुदर्शनियों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार बारह अंतर्मुहूर्तों से कम चक्षुदर्शनी की स्थितिप्रमाण चक्षुदर्शनी सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव का उत्कृष्ट अंतर होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानवर्तियों में चक्षुदर्शनियों का अंतर बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब चक्षुदर्शनी जीवों में असंयत से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्तियों तक का अंतर बतलाने हेतु तीन सूत्रों का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक चक्षुदर्शनी जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरंतर है।।२८६।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर अंतर्मुहूर्त है।।२८७।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अंतर कुछ कम दो हजार सागरोपम है।।२८८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दो सूत्रों का अर्थ सरल है। एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्टरूप से—अचक्षुदर्शनी जीवों की स्थिति में विद्यमान एक जीव असंज्ञी पंचेन्द्रिय सम्मूचछम पर्याप्त जीवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ पाँचों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) भवनवासी या वानव्यंतरों में आयु को बांधकर (४) विश्राम लेकर (५) मरण को प्राप्त हुआ और देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (६) विश्राम लेकर (७) विशुद्ध होकर (८) उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (९)। उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवलीप्रमाण काल अवशेष रहने पर सासादन गुणस्थान में जाकर अंतर को प्राप्त हुआ। पुन: मिथ्यात्व में जाकर चक्षुदर्शन की स्थितिप्रमाण परिभ्रमण कर अन्त में उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (१०)। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ। पुन: सासादन में चला गया और अचक्षुदर्शनी जीवों के योग्य आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक रहकर अचक्षुदर्शनी जीवों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार दश अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थिति- प्रमाण चक्षुदर्शनी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उत्कृष्ट अंतर होता है।

चक्षुदर्शनी संयतासंयत का उत्कृष्ट अंतर कहते हैं। जैसे—अचक्षुदर्शन की स्थिति में विद्यमान कोई एक जीव गर्भोपक्रान्तिक—गर्भ जन्म वाले पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों में उत्पन्न हुआ (१)।

शंका-उक्त जीव को संज्ञी पंचेन्द्रिय सम्मूचछम पर्याप्तकों में क्यों नहीं उत्पन्न कराया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि सम्मूचछम जीवों में प्रथमोपशमसम्यक्त्व की उत्पत्ति असंभव है तथा असंख्यातासंख्यात लोकप्रमाण या अनंतकाल तथा अचक्षुदर्शनियों में परिभ्रमण किये हुए जीवों के वेदकसम्यक्त्व को ग्रहण करना संभव नहीं है, क्योंकि ऐसे जीवों के सम्यक्त्वोत्पत्ति का विरोध है। और न अल्पकाल तक रहे हुए जीव चक्षुदर्शन की स्थिति को समाप्त करने में समर्थ है।

पुन: पूर्वोक्त गर्भज वही जीव तीन पक्ष तीन दिवस और अंतर्मुहूर्त से प्रथमोपशमसम्यक्त्व और संयमासंयम को एक साथ प्राप्त हुआ (२)। प्रथमोपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली प्रमाण काल अवशिष्ट रह जाने पर सासादन को प्राप्त हुआ। पुन: अंतर को प्राप्त होकर मिथ्यात्व में जाकर अपनी स्थितिप्रमाण परिभ्रमणकर अंतिम भव में कृतकृत्यवेदक होकर संयमासंयम को प्राप्त हुआ (३)। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ। पुन: अप्रमत्तसंयत (४) प्रमत्तसंयत (५) और अप्रमत्तसंयत हुआ (६)। इनमें ऊपर के छह अंतर्मुहूर्त और मिलाये। इस प्रकार अड़तालीस दिवस और बारह अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थितिप्रमाण चक्षुदर्शनी संयतासंयतों का उत्कृष्ट अंतर होता है।

अब चक्षुदर्शनी प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अंतर कहते हैं—अचक्षुदर्शनी जीवों की स्थिति में विद्यमान एक जीव मनुष्यों में उत्पन्न हुआ और गर्भ को आदि लेकर आठ वर्ष के द्वारा उपशमसम्यक्त्व और अप्रमत्तगुणस्थान को एक साथ प्राप्त हुआ (१)। पुन: प्रमत्तसंयत हुआ (२)। पश्चात् नीचे के गुणस्थानों में गिरकर अंतर को प्राप्त हुआ। चक्षुदर्शनी की स्थितिप्रमाण परिभ्रमण करके अंतिम भव में मनुष्य हुआ। पश्चात् कृतकृत्यवेदक होकर जीवन के अंतर्मुहूर्त काल अवशेष रह जाने पर अप्रमत्तसंयत होकर प्रमत्तसंयत हुआ (३)। इस प्रकार अंतर प्राप्त हो गया। पुन: अप्रमत्तसंयत हुआ (४)। इनमें ऊपर के अंतर्मुहूर्त और मिलाये। इस प्रकार आठ वर्ष दश अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थितिप्रमाण चक्षुदर्शनी प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अंतर है। इसी प्रकार अप्रमत्तसंयत मुनियों का भी अंतर जानना चाहिए।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती जीवों से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्ती महामुनियों तक का अंतर कथन करने वाले तीन सूत्र समाप्त हुए।

चक्षुर्दर्शनिषु उपशामक-क्षपकाणां अन्तरकथनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते

चक्षुर्दर्शनिषु उपशामक-क्षपकाणां अन्तरकथनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-चदुण्हमुवसामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं।।२८९।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।२९०।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमसहस्साणि देसूणाणि।।२९१।।
चदुण्हं खवगाणमोघं।।२९२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका'-चतुर्णामुपशामकानां एकजीवापेक्षया उत्कर्षेण कथ्यते-एक: अचक्षुर्दर्शनिस्थितौ विद्यमान: मनुष्येषु उत्पन्न:। गर्भाद्यष्टवर्षेण उपशमसम्यक्त्वमप्रमत्तगुणस्थानं च युगपत् प्रतिपन्न: (१)। अंतर्मुहूर्तेन वेदकसम्यक्त्वं गत: (२)। तत: अन्तर्मुहूत्र्तेन अनन्तानुबंधिन: विसंयोजित: (३)। दर्शनमोहनीयमुपशाम्य (४) प्रमत्ताप्रमत्तपरावत्र्तसहस्रं कृत्वा (५) उपशमश्रेणिप्रायोग्यमप्रमत्तो जात: (६)। अपूर्व: (७) अनिवृत्ति: (८) सूक्ष्म: (९) उपशान्त: (१०) सूक्ष्म: (११) अनिवृत्ति: (१२) अपूर्व: (१३) अधोऽवतीर्यान्तरित: चक्षुर्दर्शनिस्थितिं परिभ्रम्यान्तिमे भवे मनुष्येषु उत्पन्न:। कृतकरणीयो भूत्वा अन्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे विशुद्धोऽप्रमत्तो जात:। सातासातबंधपरावत्र्तसहस्रं कृत्वा उपशमश्रेणिप्रायोग्याप्रमत्तो भूत्वा अपूर्वोपशामको जात: (१४) लब्धं अन्तरं। तत: अनिवृत्ति: (१५) सूक्ष्म: (१६) उपशान्त: (१७) पुनरपि सूक्ष्म: (१८) अनिवृत्ति: (१९) अपूर्व: (२०) अप्रमत्त: (२१) प्रमत्त: (२२) अप्रमत्त: (२३) भूत्वा क्षपकश्रेणिमारूढ:। उपरि षडन्तर्मुहूत्र्ता:। एवमष्टवर्षै: एकोनत्रिंशदन्तर्मुहूर्तैश्च ऊना स्वकस्थिति: अपूर्वकरणस्योत्कृष्टान्तरं। एवमेव त्रयाणामुपशामकानां। केवलं तु सप्तविंशति-पंचविंशति-त्रयोविंशति-अन्तर्मुहूत्र्ता: ऊना: कर्तव्या:।
चतुर्णां क्षपकाणां गुणस्थानवदन्तरं वक्तव्यं।
एवं तृतीयस्थले उपशामक-क्षपकाणामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति अचक्षुर्दर्शनेषु गुणस्थानापेक्षया अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-अचक्खुदंसणीसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव खीणकसायवीदरागछदुमत्था त्ति ओघं।।२९३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रियादारभ्य पंचेन्द्रियपर्यन्ता: तथा च मिथ्यादृष्टिगुणस्थानादारभ्य क्षीणकषायपर्यंता अचक्षुर्दर्शनिन: सन्ति। अतो गुणस्थानवदन्तरं ज्ञातव्यं।
पूर्वं चक्षुर्दर्शनिस्थितिं परिभ्रम्य इति कथितं तर्हि का चक्षुर्दर्शनिस्थिति: इति चेत् ? द्विसहस्रसागरोपमा स्थिति: इति ज्ञातव्यं। मिथ्यादृष्टीनां ततश्च सासादनादीनां गुणस्थानवदेवावगंतव्यं।
एवं चतुर्थस्थले अचक्षुर्दर्शनिनां अन्तरकथनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
संप्रति अवधि-केवलदर्शनिनोरन्तरकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-ओधिदंसणी ओधिणाणिभंगो।।२९४।।
केवलदंसणी केवलणाणिभंगो।।२९५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अवधिदर्शनिनां चतुर्थगुणस्थानादारभ्य द्वादशगुणस्थानपर्यंतं गुणस्थानवद् ज्ञातव्यं। केवलदर्शनिनां सयोगिनां नानाजीवापेक्षया सर्वकालं। एकजीवापेक्षया जघन्येन अंतर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण अष्टवर्षै: अष्टान्तर्मुहूर्तै: ऊनं पूर्वकोटिकालं कथयितव्यं। अयोगिनां चापि नानाजीवापेक्षया अंतर्मुहूर्तं, एकजीवापेक्षया चान्तर्मुहूर्तं, जघन्येन उत्कर्षेण चेति ज्ञातव्यं। किंच केवलिनां भगवतां दर्शनज्ञानोपयोगौ युगपत् स्त: न च क्रमेण अतो केवलदर्शनिनां अन्तरं केवलज्ञानिवद् निरूपितमस्ति।
एवं पंचमस्थले अवधिकेवलदर्शनिनोरन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अन्तरानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम-नवमोऽधिकार: समाप्त:।


अब चक्षुदर्शनी जीवों में उपशामक और क्षपक महामुनियों का अंतर बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

चक्षुदर्शनी चारों उपशामकों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर गुणस्थान के समान है।।२८९।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अंतर्मुहूर्त है।।२९०।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अंतर कुछ कम दो हजार सागरोपम है।।२९१।।

चक्षुदर्शनी चारों क्षपकों का अंतर गुणस्थान के समान है।।२९२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एक जीव की अपेक्षा उपशम श्रेणी पर चढ़ने वाले चारों गुणस्थानवर्ती महामुनियों का उत्कृष्ट अंतर बतलाते हैं—

अचक्षुदर्शन की स्थिति में विद्यमान कोई एक जीव मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। वहाँ गर्भ को आदि लेकर आठ वर्ष की आयु में उपशमसम्यक्त्व और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान को एक साथ प्राप्त हुआ (१)। वहाँ अंतर्मुहूर्त के पश्चात् वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त कर लिया (२) पुन: अंतर्मुहूर्त से अनंतानुबंधी का विसंयोजन किया (३)। पुन: दर्शनमोहनीय को उपशमनकर (४) प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानसंबंधी सहस्त्रों परिवर्तनों को करके (५) उपशमश्रेणी के योग्य अप्रमत्तसंयत हुआ (६)। पुन: अपूर्वकरण (७) अनिवृत्तिकरण (८) सूक्ष्मसाम्पराय (९) उपशान्तमोह (१०) सूक्ष्मसाम्पराय (११) अनिवृत्तिकरण (१२) और अपूर्वकरणसंयत होकर (१३) तथा नीचे उतरकर अंतर को प्राप्त होकर चक्षुदर्शनी की स्थितिप्रमाण परिभ्रमण कर अंतिम भव में मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। वहाँ पर कृतकृत्यवेदकसम्यक्त्वी होकर संसार के अंतर्मुहूर्त अवशिष्ट रह जाने पर विशुद्ध होकर अप्रमत्तसंयत हुआ। वहां पर साता और असाता वेदनीय के बंध-परावर्तनों को सहस्रों बार करके उपशमश्रेणी के योग्य अप्रमत्तसंयत होकर अपूर्वकरण उपशामक हुआ (१४)। इस प्रकार अंतर प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् अनिवृत्तिकरण (१५) सूक्ष्मसाम्पराय (१६)। उपशांतकषाय (१७)। पुनरपि नीचे आकर सूक्ष्मसाम्पराय (१८) अनिवृत्तिकरण (१९) अपूर्वकरण (२०) अप्रमत्तसंयत (२१) प्रमत्तसंयत (२२) और अप्रमत्तसंयत होकर (२३) क्षपकश्रेणी पर चढ़ा। इनमें ऊपर के छह अंतर्मुहूर्त और मिलाये। इस प्रकार आठ वर्ष और उनतीस अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थितिप्रमाण चक्षुदर्शनी अपूर्वकरण उपशामक का उत्कृष्ट अंतर होता है। इसी प्रकार शेष तीन उपशामकों का भी अंतर जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि अनिवृत्तिकरण उपशामक के सत्ताईस अंतर्मुहूर्त, सूक्ष्मसाम्पराय उपशामक के पच्चीस अंतर्मुहूर्त और उपशांतकषाय के तेईस अंतर्मुहूर्त कम करना चाहिए।

क्षपक श्रेणी पर चढ़ने वाले चारों गुणस्थानवर्ती क्षपक महामुनियों का अंतर गुणस्थान के समान जानना चाहिए।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में उपशामक और क्षपकों का अंतर प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब अचक्षुदर्शनी जीवों के एक जीव की अपेक्षा अंतर प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अचक्षुदर्शनियों में मिथ्यादृष्टि से लेकर क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का अंतर गुणस्थान के समान होता है।।२९३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय जीवों से आरंभ करके पंचेन्द्रिय पर्यन्त तथा मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से आरंभ करके क्षीणकषाय पर्यन्त अचक्षुदर्शनी जीव होते हैं। अत: इनका अंतर गुणस्थान के समान जानना चाहिए।

पूर्व में ‘चक्षुदर्शन की स्थिति में परिभ्रमण करके’ ऐसा कहा है, तो चक्षुदर्शन की क्या स्थिति है ? दो हजार सागरोपम की उनकी स्थिति है ऐसा जानना चाहिए। मिथ्यादृष्टियों का एवं सासादन सम्यग्दृष्टियों का अंतर गुणस्थान के समान ही जानना चाहिए।

इस प्रकार से चतुर्थ स्थल में अचक्षुदर्शनियों का अंतर कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब अवधिदर्शनी एवं केवलदर्शनियों का अंतर कथन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अवधिदर्शनी जीवों का अंतर अवधिज्ञानियों के समान है।।२९४।।

केवलदर्शनी जीवों का अंतर केवलज्ञानियों के समान है।।२९५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका'-अवधिदर्शनियों का चतुर्थ गुणस्थान से आरंभ करके बारहवें गुणस्थान तक सभी का अन्तर गुणस्थान के समान जानना चाहिए। केवलदर्शन वाले सयोगिकेवलियों का नाना जीव की अपेक्षा अन्तर सर्वकाल है। एक जीव की अपेक्षा जघन्य से अंतर्मुहूर्त अंतर है और उत्कृष्ट से आठ वर्ष और आठ अंतर्मुहूर्त कम पूर्वकोटिकाल का अन्तर कहना चाहिए। अयोगिकेवलियों का भी नाना जीवों की अपेक्षा अंतर्मुहूर्त अन्तर है, एक जीव की अपेक्षा अंतर्मुहूर्त है और जघन्य तथा उत्कृष्ट की अपेक्षा भी अंतर्मुहूर्त जानना चाहिए, क्योंकि केवली भगवन्तों के दर्शनोपयोग और ज्ञानोपयोग एक साथ होते हैं न कि क्रम से, अत: केवलज्ञानी के समान केवलदर्शनियों का अंतर निरूपित किया गया हैै।

इस प्रकार से पंचम स्थल में अवधि एवं केवलदर्शनी जीवों का अंतर निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खंडागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अन्तरानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिन्तामणि टीका में दर्शनमार्गणा नामक नवमां अधिकार समाप्त हुआ।