दहेज के विरुद्ध स्लोगन

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दहेज के विरुद्ध स्लोगन

विनोद कुमार ‘नयन’
इंजीनियर, डाक्टर हुए, लड़के पढ़—पढ़ आज।

लाखों में बिकते यहाँ, तनिक न आती लाज ।।
बिकते थे कभी देश में, गाय घोड़े और बैल।
लेकिन अब बिकते यहाँ, ऊँचे दाम में छैल।।

जब तक भूखे भेड़िये, हैं समाज में लोग।
तब तक कैसे खत्म हो, यह दहेज का रोग।।
जिन पर होता गर्व था, उन पर आती शर्म।
वे लाखों में बिक रहे, जिनके ऊँचे पद, धर्म।।

बढ़े सो पावे का चलन, चलता है यहाँ खूब।
डाक्टर, इंजीनियर बिके, अफसर बिकते खूब।।
बेटा यहाँ गरीब का, हो कितना गुणवान।
पर ढूँढ़े से भी न मिलें, इनका कोई कद्रदान।।

वणिक वृत्ति के लोग हैं , करो न झूठी आस।
बिन दहेज शादी करें, हमें नहीं विश्वास।।
धर्म की बातें खूब हैं, हिंसा करें न लोग।
बहुएँ फिर क्यों जल रहीं, समझ न पाते लोग।।

शादी का बंधन पवित्र, खुशियों का त्यौहार।
लेकिन धन—लोलुपियों ने, बना दिया व्योपार।।
लड़के अधबूढ़े हुए मांगा खूब दहेज।
अब कहते हैं, दहेज से , है हमको परहेज।।

बढ़ा प्रदर्शन दिखावा, शादी हुई व्यापार।
वधु—पक्ष से खर्च सब, लेने को तैयार।।
महंगाई की मार से, जीना है दुश्वार।
ऊपर से ये दहेज का, नाग रहा फुफकार।।

पेट काटकर रख रहे, रूपये जोड़ सहेज।
बेटी सयानी हो रही, देना पड़े दहेज।।

बेटी ज्यों—ज्यों हो बड़ी, चिन्तित हों माँ बाप।
रूपये कहाँ से लायेंगे, करने पीले हाथ।।
जिसकी जितनी हैसियत, उससे ज्यादा देय।
बेटी की खुशी के लिए, बाप कर्ज तक लेय।।

मिलता था इस देश में, बेटों को सम्मान।
मेहनत लगन से पा लिया, बेटियों ने स्थान।।
बेटियाँ पढ़ लिखकर हुई आत्मनिर्भर होशियार।
उनका भी सम्मान हो, मिले सभी का प्यार।।

पढ़ लिखकर हुई बेटियाँ डॉक्टर, इंजीनियरी पास।
लड़के आवारा हुए, खोदेंगे अब घास।।
नहीं दहेज इतना बुरा , जो हैसियत से देय।
वह तो क्रुर कसाई है, गला पकड़ जो लेय।।

ऊपर से सज्जन दिखें , अंदर से हैं कसाई।
तिस घर लड़की ब्याहें न, अगर जो चाहे भलाई।।
भीख मांगने जैसा है, माँग रहे जो दहेज।
खत्म मधुर संबंध हों, निभाने से परहेज।।

संबंधों की मधुरता, दहेज कारण नशजात।
रूपयों के पीछे अरे आपस में भिड़ जात।
मिला न कुछ मां बाप को व्यर्थ हुए बदनाम।
लड़के ने ही रख लिया, मिला दहेज तमाम।।

जिन्हें भरोसा बाहुबल पर अपने नहिं होय।
जो दहेज हैं माँगते, कर्म हीन नर सोय।।
जिनके पास है, विपुल धन, मांगे वे ही दहेज।
‘नयन’ दहेज के लोभी जो, उनको लान्नत भेज।।

इस दहेज की मांग ने किया समाज को भंग ।
अन्य जाति में बेटियाँ, ब्याहीं उड़ा है रंग।।
श्रेष्ठ है शादी स्वजाति में उपजाति भी स्वीकार।
करें शादी परजाति में, उनको है धिक्कार।।

शादी करें समाज में, अंतजाति का विरोध
मिले सम्मान स्वजाति में, परजाति अवरोध।।
माता—पिता की सहमति, से गर शादी होय,
सुखी रहें लड़का—बहू, कबहूँ न झँझट होय।।

शादी करते वक्त दें, गुण खानदान पे ध्यान।
भावी जीवन में मिलें, खुशियाँ और सम्मान।।
शादी करें स्वजाति में , समझदार वे लोग।
जो परजाति में करें, निंदा सहें विरोध।।

मुँह से तो माँगे नहिं, करे न सीधी बात।
घुमा फिरा कर फिर वही, दहेज पर आ जात।।
घर—घर बेटी को मिलीं झिड़कियाँ और अपमान।
घुट—घुट कर कब तक जिएँ, जागा स्वाभिमान।।

घर का सारा काम हम, बेटी पर दें थोप।
बेटे कुछ भी न करें, ये कैसा प्रतिशोध।।
बचपन में ही स्यानी हुई, बेटी हुई समझदार।
पढ़ूँ आत्म निर्भर बनूँ, नहीं किसी पर भार।।

ऐसा समय है आ रहा, कन्याओं का अकाल।
शीघ्र यहाँ पर पड़ेगा, आज नहीं तो काल।।
लड़कों से कुल चलता है, ये समाज की भूल।
अब तो नाम डूबोने में, लड़के ही मशगूल।।

अगर बेटियाँ ठान लें, करें कड़ा प्रतिरोध।
उस घर ना शादी करें, जहाँ दहेज अनुरोध।।
अंकुश लगे दहेज पर लें जो बेटियाँ ठान।
शादी करें वहीं जहाँ, नहिं दहेज का मान।।

जिनने लड़की वालों को, चक्कर खूब कटाये।
दहेज मिला न शादी हुई, बैठे हैं बिन ब्याहे।।
लड़के वाले कह रहे, उल्टा दहेज ले जाये।
काली, गोरी कैसी भी, पर दुल्हिन दे जाये।।

बदला है अब जमाना, बदल गई है चाल।
लड़की जहाँ , वे हैं धनी, लड़के जहाँ, कंगाल।।
अपनी बेटियों को सभी, खूब पढ़ायें और लिखायें।
आगे बढ़ने का अवसर दें, सोया स्वाभिमान जगाएँ।।

घर बाहर के काम करे, तनिक न जो विश्राम करे।
फिर भी उसे सताते हो , क्यों पुरूषत्व लजाते हो।।
मैं ‘तुम‘ से ‘तू’ हो गया, वे ‘तुम‘ से हुए ‘आप’।
मैं लड़की का बाप था, वे लड़के के बाप।।

घण्टों तक पूजा करें, धर्म करें वे खूब।
करनी लेकिन चुल्लू भर, पानी में मरें डूब।।
पत्नि को हैं पीटते, दिन—भर पियें शराब।
फिर भी पति को देवता मानें, कहती नहीं खराब।।

हमसे तो वे भले हैं , अनपढ़ और गंवार।
हँसी—खुशी शादी करें, करें नहीं व्यापार।।
चींटी भी मर जाये ना, मन में करे ख्याल।
लेकिन बहू—बेटी जलें, फिर भी नहीं मलाल।।

ब्याह करें बेटी—बेटों का, करें नहीं व्यापार।
जहाँ सदगुणों की पूजा हो, खुशियाँ वहाँ अपार।।
दिखने में तो सभ्य थे, निकले व्रूर कसाई।
जला दिया बहू को ‘नयन’, जरा लाज न आई।।

खड़े हैं बीच बाजार में, बिकने को तैयार।
ले जाओ ऊँचे दामों में, करें नहीं इन्कार।।
वणिक वृत्ति नहीं छूटती, सब कुछ जाये छूट।
लड़के की शादी करें, दोनों हाथों लूट।।

केवल रूप रंग न देखें, देखें शिक्षा और खानदान।
करें वहीं सम्बंध, जहाँ पर भरपूर मिले मान सम्मान।।
ज्यादा सयानपना दुखदाई, ठगा जाये इन्सान।
सयाना कौआ मल पर बैठे, यही इसकी पहचान।।

अच्छी बहु की तलाश में, बीत गए कई साल।
लड़के हैं अब तक बिन ब्याहे, पिचक गए हैं गाल।।
घर की जिम्मेदारी सिर पर होती, लड़के ज्यादा न पढ़ पाते।
लड़कियां तो ज्यादा पढ़ जाती, लड़के पीछे रह जाते।।

परिचय धन से कर रहे, गुण योग्यता को भूल।
यही भूल इन्सान की, नष्ट करेगी समूल।।
मुँह से तो कहते फिरें नहिं दहेज की चाह।
पर स्वागत के नाम पर फाड़ रहे मुँह आह।।

ज्यादा अच्छे के चक्कर में आधी उमर गमाई।
अब भैरानें से फिरते हैं, राह न पड़े दिखाई।।
इस जीवन में सुख नहिं, मिले परंतु परलोक।
जैसे भूखे को आश्वासन, मिलेंगे छप्पन भोग।।

यहाँ आपस में प्रेम नहिं, करें मोक्ष की बात।
लड़ेंगे जाकर के वहां , क्या ये यों दिन—रात।।
पूत कपूत हो या सपूत तो, धन संचय बेकार।
एक मिटा देगा संचित धन, एक कमाये अपार।।

इक तो लड़की का पिता, उस पर बहुत गरीब ।
कैसे ब्याहे बेटी को , फूटा हुआ नसीब।।
लड़कियों ने ज्यादा पढ़ लिखकर लड़कों को पीछे छोड़ा।
अगर योग्य वर नहीं मिले, तो झुकना पड़ेगा थोड़ा।।

ज्यों ही शादी की उम्र हो, करें कोशिश प्रारंभ।
अच्छा घर—वर, वधु मिले, मिले नेक संबंध।।
कैसे लड़कियाँ नौकरी कर रहीं, लड़के बेरोजगार
कैसे शादी ब्याह हो, सोचो करो विचार।।