दानं दुर्गति-नाशनम्

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दानं दुर्गति-नाशनम्

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महाकवि भास महान् एवं भाषावेत्ता थे। उनके साहित्य की यशोगाथा देश और काल की सीमाओं से परे सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक हो चुकी हैं। संस्कृत साहित्य में उनकी जितनी ख्याति है, प्राकृत साहित्य के बारे में उनका अवदान उससे कहीं अधिक महान् है। वह जहाँ इतने महान् विद्वान् थे, वहीं उनका जीवन उदारता एवं परोपकार का अनन्य निदर्शन था। इसी की एक झलक इस संक्षिप्त कथा में प्रतिबिम्बत है।

‘‘महाकवि भास प्रकाण्ड विद्वान् थे। उन्होंने साधुओं के गुणगान ही नहीं गाए, उनका जीवन भी धर्ममय था। कोई भी व्यक्ति उनके पास आकर निराश नहीं लौटा- इतने उदार थे कवि भास ! उनके द्वार पर आए और आँसू बहाता हुआ पुन; चला जाए, ऐसा कभी नहीं हुआ।

एक दिवस एक व्यक्ति भास के द्वार पर पहुँचा। भास ने ससम्मान उसे भीतर बिठाया, आतिथ्य-सत्कार किया। तदनन्तर आने का प्रयोजन अत्यन्त विनम्रता से पूछा। आगन्तुक ने कहा - ‘‘मेरी बेटी की शादी है। आपकी उदारता की गाथा सुनकर यहाँ चला आया। बेटी को प्रीतिदान देना तो दूर, उसके विवाह के लिए भी अर्थाभाव है ! अब आप ही का सहारा है।’’

भास घर के भीतरी कक्ष में गए। इधर-उधर नजरों ने टटोला, हाथों ने भी; किंतु देने योग्य वस्तु नहीं मिली! मध्याह्न का समय था, भास की पत्नी विश्राम कर रही थी। आँखों में निद्रा थी ही। उसके हाथों में कंगन चमक रहे थे। भास ने सोचा- ‘‘जगाऊँ इसे! यद्यपि यह बहुत उदार है, किंतु इन कंगनों के सिवाय इसके पास बचा ही क्या है? अत: कहीं देने से इन्कार न कर दे।’’

भास चुपके से पत्नी के निकट गया, धीरे से हाथ उठाकर कंगन उतारने लगा। पत्नी पति के हाथ का स्पर्श पाकर जग गई, पूछा - ‘‘क्या बात है पतिदेव ?’’

भास ने सच-सच बात बता दी- ‘‘बाहर याचक खड़ा है। उसकी बेटी की शादी है! घर टटोला, कुछ भी नहीं मिला; इसलिए तुम्हारे हाथ का एक कंगन दे रहा था।’’

भास की पत्नी सन्नारी थी। धर्ममय जीवन था उसका। उसने कहा- ‘जैसी उसकी बेटी, वैसी हमारी भी बेटी’’ उसने शीध्रता के साथ दोनों हाथों के कंगन उतारे और भास के हाथों में देते हुए कहा- ‘‘मेरे हाथों में ये रहें या न रहें, किंतु बिटिया के हाथों में जरुर रहने चाहिए।’’

भास गदगद हो गया। लड़की का पिता प्रसन्नता से भर उठा।

प्राकृत-विद्या अक्टू.- दिस. १९९६ पृ. ८१