दान की महिमा

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दान की महिमा

भव्यात्माओं! आचार्यों ने श्रावकों के देवपूजा , गुरुपास्ति , स्वाध्याय , संयम , तप और दान ये षट् आवश्यक कर्तव्य बताए हैं। उनमें भी आचार्य कुन्दकुन्द ने ‘दाणं पूजा मुक्खो’ दान और पूजा को मुख्य बताया है। मैं आपको दान के विषय में विस्तार से बता रही हूँ -

जो अपने और दूसरों के उपकार के लिए दिया जाता है उसे दान कहते हैं। जिससे अपना भी कल्याण हो और अन्य मुनियों के रत्नत्रय, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की उन्नति हो वही दान है। गृहस्थों को विधि, देश, द्रव्य, आगम, पात्र और काल के अनुसार दान देना चाहिए। जैसे मेघों से बरसा हुआ पानी भूमि को पाकर विशिष्ट फल देने वाला हो जाता है वैसे ही दाता, पात्र, विधि और द्रव्य की विशेषता से दान में भी विशेषता आ जाती है।

जो प्रेमपूर्वक देता है वह दाता है। जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से विभूषित हैं वे ही पात्र हैं। आदरपूर्वक देने का नाम विधि है और जो तप तथा स्वाध्याय में सहायक हो वही द्रव्य है।

सज्जन पुरुष तीन प्रकार से अपने धन को खर्च करते है। ‘परलोक में हमें सुख प्राप्त होगा’ कोई इस बुद्धि से अपना धन खर्च करते हैं। कोई इस लोक में सुख-यश आदि की प्राप्ति के लिए ही धन का दान करते हैं और कोई उचित समझकर ही धन खर्चते हैं किन्तु इससे विपरीत जिन्हें न परलोक का ध्यान है, न इहलोक का ध्यान है और न औचित्य का ही ध्यान है वे न धर्म कर सकते हैं, न अपने लौकिक कार्य कर सकते हैं और न यश ही कमा सकते हैं।

अन्यत्र भी सूक्तिकारों ने धन की तीन ही गति मानी है-

‘‘दानं भोगो नाश:, तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुत्ते, तस्य तृतीया गतिर्भवति।।’

दान, भोग और नाश, धन की ये तीन ही गति हैं। जो न दान देता है और न उपभोग ही करता है उसके धन का ‘नाश’ हो जाना यही तीसरी गति होती है। तात्पर्य यही है जो अपने धन को पात्र दान आदि सत्कार्यों में लगा देते हैं वे तो अपने धन को इस लोक में भी बहुत काल तक स्थायी रहने वाला बना लेते हैं और परलोक में नवनिधि आदि के रूप में अनेक गुणा प्राप्त कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त जो बड़े श्रम से धन कमाकर अपने गार्हस्थ जीवन के भोगों में ही लगा देते हैं वे तत्काल में तो कुछ उसका उपयोग कर ही लेते हैं भविष्य में उसका फल भले ही कटुक ही क्यों न हो किन्तु जो न देते हैं न खाते हैं उनके धन को चोर या डाकू लूट लेते हैं या दामाद के लोग छीन लेते हैं या सरकार के टैक्स चुकाने में लगाना पड़ता है या कोर्ट कचहरी के झगड़े में ही समाप्त हो जाता है। मतलब, किसी न किसी तरह से ‘नाश’ हो जाना, यही उसकी गति होती है। इसीलिए महर्षियों ने बुद्धिमान गृहस्थों को अपने धन का सही सदुपयोग करने के लिए दान का विधान किया है।

दान के चार भेद हैं-

अभयदान, आहारदान, औषधदान और शास्त्रदान। ये चारों दान अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार देना चाहिए। अभयदान से सुन्दर रूप मिलता है, आहारदान से भोग मिलते हैं, औषधदान से आरोग्य प्राप्त होता है और शास्त्रदान से श्रुतकेवली होता है।

सबसे प्रथम सब प्राणियों को अभयदान देना चाहिए, क्योंकि जो अभयदान नहीं दे सकता उस मनुष्य की समस्त पारलौकिक क्रियाएं व्यर्थ हैं और कोई दान दो या न दो, किन्तु अभयदान जरूर देना चाहिए क्योंकि सर्व दानों में अभयदान श्रेष्ठ है। जो अभयदान को देता है, वह सब शास्त्रों का ज्ञाता है, परमतपस्वी है और सब दानों का कर्ता है। प्राणी मात्र का भय दूर करके उनके जीवन की रक्षा करना अभयदान है। जीवन की रक्षा सब चाहते हैं अर्थात् सभी को अपना-अपना जीवन प्रिय है। यदि जीवन पर ही संकट हो तो आहारदान या औषधदान या शास्त्र-दान किस काम का जो मनुष्य अपने से दूसरों की रक्षा नहीं कर सकता वह यदि परलोक के लिए धर्म कर्म करे भी तो वह सब व्यर्थ है। क्योंकि धर्म का मूल जीव रक्षा है। यदि मूल ही नहीं तो धर्म कहाँ से रह सकता है। अत: प्राणीमात्र को यथाशक्ति जीवन दान देना ही सर्वोत्तम दान है।

श्री सोमदेवसूरि ने दान के चार भेद में पहले अभयदान को लिया है। श्री समंतभद्र स्वामी ने शिक्षाव्रत के अंतिम भेद को ‘वैयावृत्य’ शब्द से लिया है। उस वैयावृत्य में चार प्रकार के दान का उपदेश दिया है। उनका क्रम ऐसा है-आहारदान, औषधदान, उपकरणदान और आवासदान। उपकरणदान में ही ज्ञान का उपकरण शास्त्रदान आ जाता है और आवासदान से अभयदान आ जाता है। मुनियों के लिए वसतिका दान देना आवासदान है। पूर्वकाल में श्रावक मुनियों के लिए गुफा या वसतिका बनवाते थे। उनके उदाहरण एलोरा आदि स्थानों की गुफाएं हैं। भगवती आराधना में भी मुनियों को वसतिका में रहने का वर्णन आया है। सल्लेखना के समय वसतिका गांव के निकट हो या खुले स्थान पर हो, अंदर भी उसमें प्रकाश हो और मलमूत्रादि विसर्जन के लिए मर्यादित स्थान हो, ऐसा बताया गया है। मूलाचार में भी बताया है कि मुनि आगंतुक मुनि के लिए वसतिका दान देवें।

नवधा भक्ति क्या है-

सात गुणों से युक्त दाता नवधाभक्तिपूर्वक जो साधुओं को अन्न पान आदि शुद्ध आहार देता है वह आहारदान कहलाता है। नवधाभक्ति क्या है? प्रतिग्रह, उच्चस्थान, चरणप्रक्षालन, अर्चन, प्रणाम, मन-वचन-काय शुद्धि और भोजन शुद्धि ये नवधाभक्ति हैं।

सबसे पहले अपने द्वार पर मुनि को आते हुए देखकर उन्हें आदरपूर्वक ग्रहण करना-पड़गाहन करना प्रतिग्रह है। यथा-हे स्वामिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ। यदि वे ठहर जायें तो घर में ले जाकर ऊँचे आसन पर उन्हें बैठाना चाहिए, फिर उनके चरणों का प्रक्षालन कर गंधोदक लेना चाहिए, अष्टद्रव्य से उनकी पूजा करनी चाहिए पुन: पंचांग प्रणाम करना चाहिए। फिर थाली में भोजन परोस कर उनसे निवेदन करना चाहिए कि मेरा मन शुद्ध है, वचन शुद्ध है, काय शुद्ध है और अन्न-जल शुद्ध है। श्रावकों की ये सब क्रियाएँ नवधाभक्ति कहलाती हैं।

दाता के सात गुण है-

श्रद्धा, भक्ति, तुष्टि, विज्ञान, अलोभीपना, क्षमा और शक्ति। जिस दाता में ये सात गुण पाये जाते हैं वही दाता प्रशंसा के योग्य होता है। इन सातों गुणों में जो विज्ञान गुण है, उसी का नाम विवेक है। इस गुण से युक्त श्रावक साधुओं को प्रासुक, पथ्य और योग्य आहार देता है। जो भोजन विरूप हो, चलितरस हो-अपने स्वाद से बिगड़ गया हो, फेंका हुआ हो, जल गया हो, खाने से रोग उत्पन्न करने वाला हो या साधु की प्रकृति विरुद्ध हो ऐसा भोजन मुनि को नहीं देना चाहिए। जो भोजन उच्छिष्ठ हो-खाने के बच गया हो, नीच लोगों के खाने योग्य हो, दूसरों के लिए बनाया गया हो, निन्दनीय हो, दुर्जन से छू गया हो, किसी देवता अथवा यक्ष के उद्देश्य से रखा हो वह भोजन भी मुनि को नहीं देना चाहिए। ऐसे ही जो भोजन दूसरे गांव से लाया गया हो या मंत्र के द्वारा लाया गया हो या भेंट में आया हो या बाजार से खरीदकर लाया गया हो या ऋतु के प्रतिकूल हो वह भोजन भी मुनि को नहीं देना चाहिए। दही, घी, दूध आदि बासी भी खाने के योग्य हैं किन्तु यदि इनका रूप, गंध और स्वाद बदल गया हो वह मुनि के देने योग्य नहीं है।

जो मुनि अवस्था में छोटे हैं, रोग से दुर्बल हैं, वृद्ध हैं अथवा नाना व्याधियों से पीड़ित हैं ऐसे मुनियों को उनके स्वास्थ्य के अनुकूल ही आहार देना चाहिए।

मुनियों को आहार देते समय कपट, घमंड, निरादर, चंचलता, असंयम और कठोर वचनों को विशेषरूप से छोड़ देना चाहिए अर्थात् ये कपट आदि प्रवृत्तियाँ तो सदा ही त्याज्य हैं किन्तु भोजन के समय तो खासतौर से छोड़ देने योग्य हैं क्योंकि इन सबका मन पर अच्छा असर नहीं पड़ता है और मन खराब होने से भोजन का भी परिपाक ठीक नहीं होता है।

जो भक्तिपूर्वक दान नहीं देते या अत्यन्त कृपण हैं अथवा अव्रती हैं, या अपनी दीनता प्रगट करते हैं या करुणाबुद्धि से दान देते हैं उनके घर पर साधु को आहार नहीं लेना चाहिए।

जैन साधु बड़े सत्त्वशाली होते हैं, चित्त से भी बड़े दयालु होते हैं, उनकी वृत्ति दीनता और करुणाजन संकल्पों से रहित होती हैं अत: वे दीनों और दयापात्रों के घर पर आहार नहीं करते हैं।

मुनियों को दान स्वयं अपने हाथ से देना चाहिए-

यदि कोई पर से दान दिलाता है तो वह दान वैसा है? सो ही आचार्य बताते हैं कि-

‘धर्म के कार्य, स्वामी की सेवा और सन्तानोत्पत्ति को कौन समझदार मनुष्य दूसरे के हाथ सौंपता है? अर्थात् धर्म के कार्य-दान, पूजा आदि क्रियाएं, स्वामी की सेवा और संतान उत्पत्ति के कार्य, स्त्री भोग ये कार्य बुद्धिमान लोग स्वयं ही करते हैं। जो अपना धन देकर दूसरों के द्वारा धर्म कराता है वह उसका फल दूसरों के भोग के लिए ही उपार्जित करता है इसमें संदेह नहीं है।

खाद्यपदार्थ, भोजन करने की शक्ति, रमण करने की शक्ति, सुन्दर स्त्रियाँ, संपत्ति और दान करने की शक्ति ये सब चीजें स्वयं धर्म करने से ही प्राप्त होती हैं।

मुनियों को नाई, धोबी, कुम्हार, लुहार, सुनार, गायक, भाट, दुराचारिणी स्त्री तथा नीच लोगों के घर आहार नहीं लेना चाहिए। उत्तम वर्ण और उत्तम कार्य करने वालों के यहाँ ही आहार लेना चाहिए ऐसा विधान है।

प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है कि वह अपना मन शुभ कार्यों में लगावे जैसे पारस के योग से लोहा अत्यन्त शुद्ध हो जाता है वैसे ही परिणामों की निर्मलता से दिया गया दान अतिशय लाभ को देने वाला हो जाता है। प्राणियों के मन होते हुए भी यदि वह तप, दान और पूजा में नहीं लगाया जाता है तो जैसे गोदाम में धरा हुआ बीज धान्य को उत्पन्न नहीं कर सकता है। वैसे ही वह मन भी उत्कृष्ट विशुद्धि को प्राप्त नहीं करा सकता है। अत: यदि मन है तो उसे शुभ कार्यों में लगाओ और यदि धन है तो घर पर आये हुए अतिथि को, अपने आश्रित को, सजातीय को और दीन मनुष्यों को समय के अनुसार दान देते रहो, यही श्रावक का परम कर्तव्य है।

आजकल सच्चे मुनि हैं या नहीं?-

इस पर आचार्य कहते हैं-

‘काले कलौ चले चित्ते देहे चान्नादि कीटके।

एतच्चित्रं यदद्यापि जिनरूपधरा नरा:।।
यथा पूज्यं मुनीन्द्राणां रूपं लेपादि निर्मितम्।

तथा पूर्व मुनिच्छाया पूज्या: संप्रति संयता:।।

इस कलिकाल में मनुष्यों का मन चंचल रहता है और शरीर अन्न का कीड़ा बना हुआ है। फिर भी बड़े आश्चर्य की बात है कि आज भी जिनमुद्रा के धारक मुनि पाये जाते हैं। जैसे पाषाण आदि में अंकित जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा पूजने योग्य है लोग उसकी पूजा करते हैं, वैसे ही आजकल के मुनियों को भी पूर्वकाल के मुनियों की प्रतिकृति मानकर पूजना चाहिए।

पात्र के तीन भेद हैं-

उत्तम, मध्यम और जघन्य। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से विभूषित मुनि उत्तम पात्र हैं। अणुव्रती श्रावक-क्षुल्लक, ऐलक पर्यंत मध्यम पात्र हैं और असंयत सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र हैं। जिस मनुष्य में सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र नहीं है वह अपात्र है जैसे ऊसर भूमि में बोया गया बीज व्यर्थ हो जाता है वैसे ही अपात्र में दिया गया दान व्यर्थ हो जाता है तथा जिसका चित्त मिथ्यात्व में पंसा हुआ है और जो मिथ्या चारित्र को पालते हैं उनको दान देने से बुरा फल ही मिलता है जैसे कि सांप को दूध पिलाने से वह जहर ही उगलता है उसी प्रकार से कुपात्र को दिया गया दान कुत्सित फल को फलता है। ऐसे लोगों को यदि दयाभाव से कुछ दिया जाये तो उन्हें भोजन आदि कुछ दे देना चाहिए।

ऊपर में कहे गये उत्तम, मध्यम और जघन्य पात्रों को दिया गया दान उत्तम, मध्यम आदि रूप से फल देने वाला हो जाता है। सत्पात्र में दिया गया दान महा पुण्यफल को देता है। जैसे कि वट का बीज बहुत बड़े सघनदार, छाया सहित वृक्ष के रूप में फलता है वैसे ही पात्रदान बहुत ही उत्तम फल को देने वाला है।

उत्तम पात्र कौन हैं?-

दर्शन प्रतिमा, व्रत प्रतिमा, सामायिक प्रतिमा, प्रोषधोपवास प्रतिमा, कृषि आदि त्याग प्रतिमा, दिवामैथुन त्याग प्रतिमा, ब्रह्मचर्य प्रतिमा, सचित्त त्याग प्रतिमा, परिग्रह त्याग प्रतिमा, आरंभ त्याग प्रतिमा और उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा ये ग्यारह प्रतिमाएं हैं। अन्यत्र ग्रंथों में श्री कुन्दकुन्द आदि आचार्यों के कथित नाम से यहाँ कुछ अंतर है। यथा दर्शन, व्रत, सामायिक, प्रोषधोपवास, सचित्त त्याग, रात्रिभुक्तित्याग, ब्रह्मचर्य, आरंभ त्याग, परिग्रहत्याग, अनुमतित्याग और उद्दिष्ट त्याग ये नाम हैं।

दर्शन प्रतिमा आदि ग्यारह प्रतिमाधारी उपासकों में से पहले की छह प्रतिमा के धारक गृहस्थ कहे जाते हैं, सातवीं, आठवीं और नवमीं प्रतिमा के धारक ब्रह्मचारी कहलाते हैं तथा दशवीं और ग्यारहवीं प्रतिमाधारी भिक्षु कहलाते हैं। इन सबसे ऊपर २८ मूलगुणधारी महाव्रती मुनि या साधु नाम से जाने जाते हैं। उन-उन गुणों की प्रधानता के कारण मुनि अनेक प्रकार के बतलाये हैं।

मुनि के प्रकार-

उनके उन-उन नामों की युक्तिपूर्वक निरुक्ति इस प्रकार है-

जितेन्द्रिय- जो सब इन्द्रियों को जीतकर अपने से अपने को जानते हैं उन्हें जितेन्द्रिय कहते हैं।

क्षपण- मन, माया, मद और क्रोध का नाश कर देने से क्षपण कहलाते हैं।

श्रमण- जगह-जगह विहार करते हुए भी जो थकते नहीं हैं, इसलिए श्रमण हैं।

आशाम्बर- जिन्होंने अपनी लालसाओं को नष्ट कर दिया है, उन्हें आशाम्बर कहते हैं।

नग्न- अंतरंग तथा बहिरंग परिग्रहों से रहित होने के कारण नग्न कहलाते हैं।

ऋषि- क्लेश समूह को रोकने से ऋषि संज्ञा होती है।

मुनि- आत्म विद्या में मान्य होने के कारण मुनि नाम पाते हैं।

यति- जो पापरूपी बंधन के नाश करने का यत्न करते हैं उन्हें यति कहते हैं।

अनगार- शरीररूपी घर में भी जिनकी रुचि नहीं है वे अनगार माने जाते हैं।

शुचि- जो आत्मा को मलिन करने वाले कर्मरूपी दुर्जनों से संबंध नहीं रखते, वे ही मनुष्य शुचि या शुद्ध हैं, न कि सिर पर पानी डालकर स्नान करने वाले। अर्थात् जो पानी से शरीर को मल-मल कर धोते हैं वे पवित्र नहीं हैं किन्तु जिनकी आत्मा निर्मल है वे ही पवित्र हैं। यद्यपि मुनि स्नान नहीं करते हैं किन्तु उनकी आत्मा निर्मल है इसलिए उन्हें पवित्र या शुचि कहते हैं।

निर्मम- जो धर्माचरण के फल में इच्छा नहीं रखते, अधर्माचरण के त्यागी हैं और केवल आत्मा ही जिनका परिवार या संपत्ति है उन्हें निर्मम कहते हैं। अर्थात् ये अपनी आत्मा के सिवाय शरीर से भी निर्मम रहते हैं।

मुमुक्षु- जो पुण्य और पाप दोनों से रहित हैं उन्हें मुमुक्षु कहते हैं। क्योंकि बंधन लोहे के हों या सोने के, जो उनसे बंधा है वह बद्ध ही है अर्थात् पुण्य कर्म सोने के बंधन के समान हैं, पाप कर्म लोहे के बंधन के समान हैं दोनों ही जीवों को संसार में बांधकर रखते हैं। अत: जो पाप को छोड़कर पुण्य से भी आगे उठकर शुद्धोपयोग में संलीन हैं वे ही मुमुक्षु हैं।

समधी- जो ममता रहित हैं, अहंकार रहित हैं, मान, माया और डाह से रहित हैं, निंदा और स्तुति में समान बुद्धि रखते हैं वे प्रशंसनीय व्रत के धारक ‘समधी’ कहलाते हैं।

मौनी- जो आम्नाय के अनुसार तत्व को जानकर उसी का एकमात्र ध्यान करते हैं उन्हें मौनी जानना चाहिए। जो पशु की तरह केवल बोलते नहीं हैं वे मौनी नहीं हैं।

अनूचान- जिनका मन श्रुत में, व्रत में, ध्यान में, संयम में तथा यम और नियम में संलग्न रहता है उन्हें अनूचान कहते हैं अर्थात् वैदिक धर्म में सांग वेद के पूर्ण विद्वान को अनूचान कहा है किन्तु यहाँ पर श्रुत, व्रत, नियम, आदि में रत जैसे मुनि को ही अनूचान कहा है।

अनाश्वान- जो इन्द्रियरूपी चोरों का विश्वास नहीं करते, स्थायी मार्ग पर दृढ़ रहते हैं और हर एक प्राणी जिनका विश्वास करते हैं अर्थात् जो किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाते वे ही अनाश्वान हैं किन्तु वैदिक परम्परा के अनुसार भोजन नहीं करने मात्र से ही अनाश्वान नहीं होते।

योगी जिनकी आत्मा तत्व में लीन है, मन आत्मा में लीन है और इन्द्रियाँ मन में लीन हैं उन्हें योगी कहते हैं। अर्थात् जिनकी इन्द्रियाँ मन में, आत्मा में और आत्म तत्व में लीन हैं वे ही योगी हैं। किन्तु जो अन्य वस्तुओं के इच्छारूपी दुष्ट संकल्प से ग्रसित हैं वे योगी नहीं हैं।

पंचाग्नि साधक- काम, क्रोध, मद, माया और लोभ ये पाँच अग्नि हैं। जो इन पांचों अग्नियों को अपने वश में कर लेते हैं वे ही पंचाग्नि साधक हैं। किन्तु वैदिक साहित्य के अनुसार बाह्य पांच अग्नियों में अपने शरीर को तपाने वाले मात्र पंचाग्नि साधक नहीं है।

ब्रह्मचारी- ज्ञान ब्रह्म है, दया ब्रह्म है और काम को वश में करना ब्रह्म है। जो मुनि अच्छी तरह ज्ञान की आराधना करते हैं, दया का पालन करते हैं और काम को जीत लेते हैं वे ही ब्रह्मचारी हैं।

गृहस्थ- जो क्षमारूपी स्त्री में आसक्त हैं, ज्ञानी और मनोजयी हैं वे सच्चे गृहस्थ हैं अर्थात् व्यवहार में गृह में रहने वाले को गृहस्थ संज्ञा है किन्तु यहाँ पर आचार्य ने क्षमाशील ज्ञानी मनोजयी मुनि को निरुक्ति अनुसार गृहस्थ कहा है।

वानप्रस्थ- जो अंदर से और बाहर में अश्लील व्यवहार को छोड़कर संयम धारण करते हैं वे ही वानप्रस्थ हैं, किन्तु जो कुटुम्ब को लेकर जाकर जंगल में रहते हैं वे वानप्रस्थ नहीं हैं।

शिखाछेदी- जिन्होंने ज्ञानरूपी तलवार के द्वारा संसाररूपी अग्नि की शिखा को यानी लपटों को काट डाला है उन्हें शिखाछेदी कहते हैं। सिर घुटाने मात्र से शिखाछेदी नहीं होते।

परमहंस- संसार अवस्था में कर्म और आत्मा दूध और पानी की तरह मिले हुए हैं जो दूध और पानी की तरह आत्मा से कर्म को पृथक्-पृथक् कर देते हैं वे ही परमहंस साधु हैं। किन्तु जो अग्नि की तरह सर्वभक्षी हैं जो मिल जाये वही खा लेते हैं वे परमहंस नहीं हैं।

तपस्वी- जिनका मन ज्ञान से, शरीर से, चारित्र से और इन्द्रियाँ नियमों से सदा प्रदीप्त रहती हैं वे ही तपस्वी हैं। मात्र जिसने कोरा वेष बना रखा है वह तपस्वी नहीं हैं।

अतिथि- पांचों इन्द्रियों का अपने-अपने विषय में लगना ही तिथियाँ हैं और इन्द्रियों का अपने-अपने विषय में प्रवृत्ति करना संसार का ही कारण है। जो मुनि इन इन्द्रियों के विषयों से विरक्त हो चुके हैं वे ही अतिथि कहलाते हैं अथवा जिनके आने की कोई तिथि निश्चित नहीं है वे अतिथि कहलाते हैं, जिनके द्वितीया, पंचमी, अष्टमी, एकादशी और चतुर्दशी इन तिथियों का कोई बंधन ही नहीं है वे अतिथि हैं। यहाँ पर आचार्य ने पांचों इन्द्रियों के विजेता को अतिथि कहा है।

दीक्षित- जो प्रतिदिन समस्त प्राणियों में मैत्रीरूप यज्ञ का आचरण करते हैं वे ही दीक्षित हैं, न कि बकरे आदि का बलिदान करने वाले।

श्रोत्रिय- जो बुरे कार्यों को नहीं करते और न बुरे मनुष्यों की संगति ही करते हैं तथा सर्व प्राणियों का हित चाहते हैं वे ही श्रोत्रिय हैं किन्तु जो केवल बाह्य शुद्धि पालते हैं, वे श्रोत्रिय नहीं हैं।

होता- जो आत्मा रूपी अग्नि में दयारूपी मंत्रों के द्वारा कर्मरूपी काष्ठ समूह से हवन करते हैं वे ही होता हैं अर्थात् होमकर्ता हैं किन्तु जो बाह्य अग्नि में हवन करते हैं वे होता नहीं हैं।

यष्टा- जो भावरूपी पुष्पों से देवता की पूजा करते हैं। व्रतरूपी पुष्पों से शरीररूपी घर की पूजा करते हैं और क्षमारूपी पुष्पों से मनरूपी अग्नि की पूजा करते हैं उन्हें ही सज्जन पुरुष यष्टा-यज्ञ करने वाला कहते हैं।

अध्वर्यु- जो महात्मा सोलहकारण भावनारूपी यज्ञ करने वाले ऋत्विजों के स्वामी हैं, मोक्ष सुखरूपी यज्ञ के उद्धारक उस पुरुष (मुनि) को अध्वर्यु जानना चाहिए।

वेद- जो आत्मा और शरीर के भेद को स्पष्ट शब्दों में बतलाते हैं वे ही सच्चे वेद हैं, विद्वान लोग उनसे ही प्रेम करते हैं, किन्तु जो सब पशुओं के विनाश के कारण हैं वे सच्चे वेद नहीं हैं।

त्रयी- जन्म, जरा और मृत्यु ये तीनों ही संसार के दुखों के कारण हैं। इस त्रयी-तीनों का जिस त्रयी से नाश होता है उसके धारक ही सच्चे त्रयी हैं। आशय यह है कि ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद को त्रयी कहा जाता है। किन्तु यहाँ जैनाचार्य का कहना है कि जो जन्म, जरा और मृत्यु को नष्ट कर दे ऐसा सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्ररूप रत्नत्रय ही त्रयी है तथा उसके धारक मुनि ही सच्चे त्रयी हैं।

ब्राह्मण- जो अहिंसक हैं, समीचीन व्रतों का पालन करते हैं, ज्ञानी हैं, सांसारिक इच्छाओं से दूर हैं और काम, क्रोध, मोह आदि तथा जमीन, जायदाद, धन आदि अंतरंग और बहिरंग परिग्रह से रहित हैं, वे ही सच्चे ब्राह्मण हैं, इससे विपरीत जो जातिमद से अंधे होकर अपने को सबसे ऊंचा और दूसरों को नीचा समझते हैं वे सच्चे ब्राह्मण नहीं हैं। वास्तव में वही जाति परलोक के लिए उपयोगी है जिससे सच्चे धर्म का जन्म होता है, जमीन शुद्ध भी हो किन्तु यदि उसमें बीज न डाला गया हो तो अनाज पैदा नहीं हो सकता अर्थात् ब्राह्मण जाति शुद्ध भी हो किन्तु उसमें यदि समीचीन धर्म के पालन की परिपाटी न हो तो वह शुद्ध जाति व्यर्थ है।

शैव- जो शिव अर्थात् अपने कल्याणरूप मुक्ति को जानते हैं वे ही सच्चे शैव-शिव के अनुयायी हैं।

बौद्ध- जो अपनी अंतरात्मा के पोषक हैं वे ही सच्चे बौद्ध हैं।

सांख्य- जो आत्म ध्यानी हैं वे ही सांख्य हैं।

द्विज- जिन्हें फिर संसार में जन्म नहीं लेना है वे ही द्विज हैं।

इन उपर्युक्त नामों के अनुरूप गुणों से सहित दिगम्बर मुनि ही उत्तमपात्र कहलाते हैं। उनको दिया गया आहार, औषध, शास्त्र और अभयदान या वसतिका आदि का दान उत्तम-उत्तम फलों को देने वाला माना गया है। इनसे विपरीत जो अज्ञानी हैं, दुराचारी हैं, निर्दय हैं, विषयों के लोलुपी हैं तथा इन्द्रियों के दास हैं, ऐसे पाखण्डी दान के पात्र वैसे हो सकते हैं?

पात्र के पांच भेद

शास्त्रों में समयी, साधक, साधु, आचार्य और धर्म के प्रभावक ऐसे पात्र के पाँच भेद माने गये हैं। गृहस्थ हो या साधु जो जैनधर्म का अनुयायी है उसे समयी या साधर्मी कहते हैं। सम्यग्दृष्टि श्रावक को उन्हें आदर सत्कार देते हुए दान देना चाहिए

जिनकी बुद्धि परोक्ष अर्थ को भली प्रकार से जानने में समर्थ है उन ज्योतिष शास्त्र, मंत्रशास्त्र और निमित्तशास्त्र के ज्ञाताओं का तथा प्रतिष्ठा आदि के ज्ञाता का सम्मान करना चाहिए। यदि ये न हों तो जिन दीक्षा, तीर्थयात्रा और जिनबिंब प्रतिष्ठा आदि क्रियाएं कैसे हो सकती हैं? क्योंकि इन कार्यों के अनुष्ठान में मुहूर्त देखने के लिए ज्योतिष विद्या और विधिविधान, क्रियाकाण्ड, प्रतिष्ठा आदि कराने के लिए प्रतिष्ठा शास्त्र के ज्ञाता को आवश्यकता होती है। यदि कोई कहे कि दूसरे लोगों में जो ज्योतिषी या मंत्रशास्त्री हैं उनसे काम चला लिया जावेगा किन्तु इस तरह दूसरों से पूछने से अपने धर्म की उन्नति कैसे हो सकती है तथा अपने मुहूर्त विचार में भी दूसरों से अंतर है और प्रतिष्ठा आदि विधि तो बिल्कुल ही अलग है। अत: जैन ज्योतिषी, जैन मंत्रशास्त्र के ज्ञाता और जैन प्रतिष्ठा शास्त्र के वेत्ताओं का भी सम्मान करना चाहिए। जिससे उनकी परम्परा बढ़ती रहे और हमारे धर्म की क्रियाएं शुद्ध विधिपूर्वक चालू रहें।

साधु की परिभाषा

मूलगुण और उत्तरगुणों से युक्त तपस्वी मुनि को साधु कहते हैं। जो पुण्य को संचय करना चाहते हैं उनका कर्तव्य है कि वे साधुओं की भक्तिभाव से पूजा करें।

‘‘जो ज्ञानकाण्ड और क्रियाकाण्ड में चतुर्विध संघ के मुखिया होते हैं तथा संसाररूपी समुद्र से पार उतारने में समर्थ हैं उन्हें आचार्य कहते हैं। उनकी देव के समान आराधना करनी चाहिए।

जो लोकज्ञता तथा कवित्व आदि के द्वारा और शास्त्रार्थ तथा वत्तृत्वशक्ति के कौशल द्वारा जैनधर्म की प्रभावना करने में सदा संलग्न रहते हैं उन सज्जन पुरुषों का विशेष से समादर करना चाहिए। क्योंकि-

मान्यं ज्ञानं तपोहीनं ज्ञानहीनं तपोर्हितम्।

द्वयं यत्र स देव: स्याद् द्विहीनो गणपूरण:।।
ज्ञानकाण्डे क्रियाकाण्डे चातुर्वण्र्यपुर: सर:।

सूरिर्देव इवाराध्य: संसाराब्धितरण्डक:।।

तप से हीन ज्ञान भी समादर के योग्य है और ज्ञान से हीन तप भी पूजनीय है। किन्तु जिसमें ज्ञान और तप दोनों हैं वह देवता है और जिसमें दोनों नहीं हैं वह केवल संघ का स्थान भरने वाला है।

जिनमुद्रा के धारी मुनियों को नमोऽस्तु कहकर नमस्कार करना चाहिए। आर्यिकाओं को वंदामि कहकर नमस्कार किया जाता है। क्षुल्लक, ऐलक और क्षुल्लिकाओं को इच्छामि कहकर अभिवादन होता है तथा क्षुल्लक, ऐलक भी परस्पर में इच्छामि कहकर एक-दूूसरे को अभिवादन करते हैं। पूज्य पुरुषों के सामने सदा शास्त्रानुवूल वचन बोलना चाहिए। गुरुजनों के सामने स्वच्छंदतापूर्वक हंसी-मजाक आदि नहीं करनी चाहिए।

केवल आहारदान के लिए साधुओं की परीक्षा नहीं करनी चाहिए

वो सज्जन हों या न हों, गृहस्थ तो दान देने से ही शुद्ध हो जाता है। गृहस्थ लोग अनेक आरंभ में फँसे रहते हैं और उनका धन भी अनेक प्रकार से खर्च होता रहता है। इसलिए तपस्वियों को आहारदान देने में ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। मुनिजन जैसे-जैसे तप, ज्ञान आदि गुणों से विशिष्ट हों, वैसे-वैसे गृहस्थों को उनका अधिक समादर करना चाहिए। धन बड़े भाग्य से मिलता है, अत: भाग्यशाली पुरुषों को आगमानुवूल कोई मुनि मिले या न मिले किन्तु उन्हें अपना धन जैन धर्मानुयायियों में अवश्य खर्च करना चाहिए। जिनेन्द्रदेव का यह धर्म प्राय: ऊँच और हीन सभी प्रकार के मनुष्यों से भरा हुआ है। जैसे मकान एक खम्भे पर नहीं ठहर सकता है वैसे ही यह धर्म भी एक पुरुष के आश्रय से नहीं ठहर सकता है।

नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेप की अपेक्षा से मुनि चार प्रकार के होते हैं और वे सभी दान सम्मान के योग्य हैं। गृहस्थों को पुण्य उपार्जन की दृष्टि से जिनबिंबों की तरह उन चार प्रकार के मुनियों में विशेष भक्ति करनी चाहिए।

प्रकारान्तर से दान के तीन भेद

प्रकारान्तर से दान के तीन भेद भी माने गये हैं-राजस, तामस और सात्विक। जो मनुष्य अपनी ख्याति की भावना से कभी-कभी किसी को दान तब देते हैं जबकि वे दूसरे दाता को वैसे दान से मिलने वाले फल को स्वयं देख लेते हैं इस दान को राजस दान कहते हैं। अर्थात् उसे स्वयं तो दान पर विश्वास नहीं है किन्तु इसने यह दान दिया था तो इसको इस दान से अमुक-अमुक फल मिला है। ऐसा देखकर जो दान देता है उसका यह दान रजोगुण प्रधान होने से राजस कहलाता है।

जो पात्र और अपात्र को समान रूप से मानकर या पात्र को अपात्र के समान मानकर बिना किसी आदर, सम्मान और स्तुति के नौकर चाकरों के उद्योगपूर्वक दान देते हैं उसे तामस दान कहते हैं।

जिस दान में स्वयं पात्र को देखकर उसका अतिथि सत्कार किया जाता है तथा जो दान श्रद्धा आदि के साथ दिया जाता है वह सात्विक दान है। राजस दान मध्यम है और तापस दान सब दानों में निकृष्ट है।

कुछ लोगों का कहना है कि जो दिया जाता है परलोक में वही मिलता है किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि घास खाने वाली गायें दूध देती हैं यह बात सर्वजन प्रसिद्ध है। इसी प्रकार से मुनियों को समय पर भक्तिपूर्वक दिया गया शाक-पात का भी आहारदान अपरिमित पुण्य को देने वाला होता है क्योंकि भक्ति ही चिंतामणि है। भोजन के समय मौन क्यों रहना। आचार्यों के अनुसार-

‘जिनेन्द्रदेव ने अभिमान की रक्षा के लिए और श्रुत की विनय के लिए भोजन करते समय मौन रखना बतलाया है। भोजन की लोलुपता त्यागने से अभिमान की रक्षा भी होती है और मन भी वश में हो जाता है। श्रुत की विनय करने से कल्याण होता है, संपत्ति मिलती है और मनुष्य पर सरस्वती प्रसन्न हो जाती है। तात्पर्य यह है कि भोजन के समय मौन रखने से, जूठे मुख वाणी का उच्चारण नहीं करने से वाणी का विनय होता है। वाणी के विनय से वाणी पर असाधारण अधिकार प्राप्त होता है। जो लोग दिन भर बक-बक करते रहते हैं उनके वचन की कीमत जाती रहती है। भोजन के समय मौन रखने से दूसरा लाभ यह भी है कि मांगना नहीं पड़ता है। मांगने से दीनता दिखती थी सो नहीं होने से स्वाभिमान सुरक्षित तो रहता ही है प्रत्युत् गौरव भी बढ़ता है। तीसरी बात यह है कि कदाचित् किसी वस्तु की इच्छा भी थी तो भी मौन रहने से, इच्छा को रोकने से ‘‘इच्छा निरोधस्तप:’’ के अनुसार तपश्चरण भी हो जाता है। अत: मौनूपूर्वक भोजन करने का विधान है।

धर्म के साधन हेतु जो विकल्प उत्पन्न होते हैं, वे धनवान मनुष्य के दान के द्वारा सत्य होते हैं। सो ठीक ही है क्योंकि चन्द्रकांत मणि चन्द्रकिरणों से स्पर्शित होकर अमृत को बहाते हुए ही यहाँ प्रतिष्ठा को प्राप्त होती है। इसका विशेषार्थ यह है कि पात्र को दान देने वाला श्रावक इस भव में उस दान के द्वारा लोक में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है। जैसे चन्द्रकांत मणि से निर्मित भवन को देखते हुए भी साधारण मनुष्य उस चन्द्रकांत मणि का परिचय नहीं पाता है, किन्तु चन्द्रमा का उदय होने पर जब उस भवन से पानी का प्रवाह बहने लगता है तब साधारण से साधारण मनुष्य भी यह समझ लेता है कि यह भवन चन्द्रकांत मणियों से बना हुआ है। तब वह उसकी प्रशंसा करने लगता है। ठीक इसी प्रकार से विवेकी दाता जिनमंदिर आदि बनवाकर मुनियों को आहार आदि देकर अपनी सम्पत्ति का सदुपयोग करता है। वह यद्यपि अपनी प्रतिष्ठा की कामना नहीं करता है फिर भी उस दिन मंदिर या दान आदि के देखने वाले मनुष्य उसकी प्रशंसा करते ही हैं। यह तो हुई इस जन्म की बात, इसके साथ पात्रदान आदि शुभ कार्यों से उसको जो महान पुण्य लाभ होता है उसके फल से वह अगले भव में भी इन्द्र, चक्रवर्ती आदि के वैभव प्राप्त कर लेता है।

जो मनुष्य धन के रहने पर भी दान देने में उत्सुक नहीं होता है, परन्तु अपने आप धर्मात्मा कहलाना चाहता है। उसके हृदय में जो कुटिलता रहती है वह परलोक में उसके सुख को समाप्त कर देती है। जैसे कि बिजली के गिरने से पर्वत चूर हो जाते हैं। यहाँ पर जैनाचार्यों का आदेश है कि-हे भव्यों! तुम अणुव्रती होकर निरन्तर अपनी सम्पत्ति के अनुसार एक ग्रास, आधा ग्रास अथवा चौथाई ग्रास ही क्यों न हो दान में देते ही रहो, क्योंकि यहाँ लोक में अपनी इच्छानुसार द्रव्य कब किसको होगा जो कि उत्तम पात्र को दान दे सके, यह कुछ कहा नहीं जा सकता है। अभिप्राय यही है कि यदि किसी के पास धन कम है तो उसमें से ही कुछ अंश दान में निकालते रहना चाहिए क्योंकि इच्छानुसार सम्पत्ति कभी किसी को नहीं मिलती है। लखपति करोड़ चाहता है, करोड़पति अरबों की आशा करता है और अरब हो जाने पर खरबों की इच्छा हो जाती है उसमें भी किसी को संतोष नहीं होता है अत: जितना भी धन अपने पास है उसमें ही मुनि को आहारदान आदि देते रहना चाहिए। इस दान से ही सम्पत्ति बढ़ती है। प्राय: देखा जाता है कि लोग सोचा करते हैं जब मेरे पास इतना धन हो जायेगा तब दान कर देंगे चूँकि अभी तो परिवार पोषण से ही नहीं बचता है किन्तु बात यह है कि जितना भी धन बढ़ेगा उतनी ही आवश्यकताएं, उतने ही ऐश आराम और इच्छाएं बढ़ती जायेंगी। अत: प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन कुछ न कुछ दान देते ही रहना चाहिए।

दान की रुचि का भी फल मिलता है

मिथ्यादृष्टि पशु की भी मुनिराज के दान में जो केवल रुचि होती है उस रुचि अथवा दान की अनुमोदना से ही वह उत्तम भोगभूमि को प्राप्त कर लेता है। जहाँ पर दश प्रकार के कल्पवृक्ष सदा उसे सभी प्रकार के अभीष्ट पदार्थ देते रहते हैं। फिर भला यदि सम्यग्दृष्टि उस पात्रदान में रुचि रखें तो उसे क्या ऐसी चीज है जो नहीं मिलेगी? अर्थात् उसे निश्चित ही सर्ववांछित फल प्राप्त हो जाते हैं। दान के योग्य सम्पत्ति के होने पर तथा पात्र के भी मिल जाने पर जिस मनुष्य की बुद्धि दान के लिए उत्साहित नहीं होती है वह दुर्बुद्धि खान में प्राप्त हुए भी अतिशय मूल्यवान रत्नों को छोड़ कर पृथ्वी के तलभाग को व्यर्थ ही खोदता है। अर्थात् जैसे कोई मनुष्य हीरे के लिए उसकी खान को खोदे, उत्तम हीरा मिल जाये फिर भी उसे छोड़कर आगे और नीचे-नीचे खोदता ही चला जाये तो वह मूर्ख ही है। हीरे को प्राप्त कर भी छोड़ दिया और व्यर्थ ही भूमि खोदने का श्रम करता रहता है।

यदि किसी के हाथ से मणि समुद्र में गिर जाये और बहुत काल के बाद उसे वह ढूँढे तो जैसे उसका मिलना कठिन है, ऐसे ही मनुष्य पर्याय, धन और जिनवाणी को पाकर भी जो दान नहीं करता है वह मूर्ख मनुष्य रत्नों को ग्रहण कर छिद्रवाली नाव में बैठकर समुद्र पार करना चाहता है। अर्थात् छिद्रवाली नाव में बैठने वाला नियम से समुद्र में डूब जायेगा वैसे ही अति दुर्लभ मनुष्य पर्याय, धन सम्पत्ति और जैनधर्म को पाकर भी जो दान नहीं देता है तो दुर्लभ मनुष्य भव आदि को व्यर्थ ही गंवा कर दुर्गति में चला जाता है।

जो पात्रदान इस भव में यश का कारण तथा परभव में सुख का कारण है उसे जो मनुष्य धन पाकर भी नहीं करता है, उसे ऐसा समझना चाहिए कि मानों किसी पुण्यशाली मनुष्य ने अपने धन की रक्षा के लिए उसे अपना सेवक बनाकर ही नियुक्त किया है। तात्पर्य यही है कि भाग्यवश यदि संपत्ति मिली है तो उसको दानादि उत्तम कार्यों में लगाना चाहिए और आवश्यकतानुसार उसका उपभोग भी करना चाहिए, किन्तु जो स्वयं अपनी संपत्ति को दान और भोग में नहीं लगाता है तो पता नहीं उस सम्पत्ति को आगे कौन भोगेगा? इसलिए आचार्यदेव का ऐसा कहना है कि मानो वह धन का स्वामी न होकर रक्षक-सेवक ही है क्योंकि धन को भोगने वाला और दान में लगाने वाला ही उसका स्वामी माना जाता है।

लोक में जो धन जिनालय के निर्माण के कराने में, जिनदेव की पूजा में, आचार्य और उपाध्याय की पूजा में, संयमी जनों को दान देने में, अतिशय दु:खी प्राणियों को भी दयापूर्वक दान करने में तथा अपने उपभोग में भी काम आता है वही धन अपना धन है, यह बात निश्चित है। किन्तु इससे विपरीत जो धन इन कार्यों में नहीं लगाया जाता है, वह धन किसी दूसरे का ही है ऐसा समझो। संपत्ति पुण्य के क्षय से नष्ट होती है या घटती है न कि दान करने से। अतएव हे श्रावकों! आप निरन्तर पात्रदान करते रहें। क्या आप यह नहीं जानते हैं कि कुंए से जितना-जितना जल निकाला जाता है उतना उतना जल बढ़ता ही चला जाता है।

पूजा का फल

पूज्यजनों की पूजा में बाधा पहुँचाने वाला लोभ इस लोक और परलोक में भी सब के सर्व गुणों को नष्ट कर देता है और वह लोभ यदि केवल गृहस्थी के विवाह आदि कार्यों में किया जाता है तो केवल एक जन्म में ही लोग उसे लोभी कहते हैं अर्थात् जिनपूजन, पात्रदान आदि में किया गया लोभ इस भव और परभव में सर्वथा दु:खदायी है, सर्वगुणों को नष्ट कर देने वाला है क्योंकि दान पूजन से होने वाला पुण्य और कीर्ति आदि कुछ भी नहीं मिलते हैं। जो घर कार्यों में लोभ करते हैं उसे मात्र यहीं लोग कंजूस आदि कह देते हैं किन्तु उसका परलोक नहीं बिगड़ता है ऐसा समझना चाहिए।

आज लोग इससे विपरीत करते हैं अपने घर कार्य पुत्रादि के विवाह या अन्य लौकिक कार्यों में खूब धन खर्च कर दिया करते हैं किन्तु दान पूजन आदि के समय कृपण बन जाते हैं। सोचते हैं-

अपनी गाढ़ी कमाई का धन इन कार्यों में कैसे लगा दें? सो यह मात्र मूर्खता ही है क्योंकि दान पूजन में खर्चा गया धन अपना बन गया है और वह आगे असंख्य गुणा होकर फलेगा किन्तु

‘‘खाय खोया बह गया’’ इस सूक्ति के अनुसार अपने भोग में लगाया गया धन व्यर्थ ही चला गया है ऐसा निश्चित समझकर सदैव दानादि उत्तम कार्यों में धन का सदुपयोग करते रहना चाहिए।

आचार्यों ने बताया है कि जिसके क्रोधादि विकार भाव विद्यमान हैं वह क्या देव हो सकता है? जिस धर्म में प्राणियों की दया प्रधान नहीं है वह क्या धर्म कहा जा सकता है? जिसमें सम्यग्ज्ञान नहीं है क्या वह तप और गुरु हो सकता है तथा जिस संपत्ति में से पात्रों के लिए दान नहीं दिया जाता है वह सम्पत्ति क्या सफल हो सकती है? अर्थात् नहीं।

धर्म की महिमा

अभिप्राय यह है कि जिसमें राग, द्वेष, क्रोध, मान आदि मौजूद हैं वह देव नहीं, माना जा सकता है। जिस धर्म में दया धर्म की प्रमुखता नहीं है वह धर्म भी सच्चा धर्म नहीं है। जो तपश्चर्या सम्यग्ज्ञान सहित होकर की जाती है वह कर्मनिर्जरा को कराने वाली है और जो गुरु सम्यग्ज्ञान से सहित हैं वे ही निर्ग्रन्थ दिगम्बर साधु गुरु हैं। उसी प्रकार जिस संपत्ति के कुछ भाग को मुनियों के आहारदान आदि में लगाया जाता है वही संपत्ति सफल है।

यदि मनुष्य के पास तीनों लोकों को वशीभूत करने के लिए अद्वितीय वशीकरण मंत्र है तो वह दान है और व्रत आदि से उत्पन्न हुआ धर्म विद्यमान है तो ऐसे कौन से गुण हैं जो उसके वश में न हो सवें, वह कौन सा सुख है जो उसको प्राप्त न हो सके तथा वह कौन सी विभूति है जो उसके अधीन न हो जाये। तात्पर्य यही है कि ‘दान’ यह तीनों लोकों को अपने वश में करने के लिए उत्तम वशीकरण मंत्र है। जिसको दान दिया जाता है वह प्रसन्न हो जाता है और भव-भव में उसके उपकार को मानता रहता है। मुनिजनों को आहारदान देने से तो पुण्य के साथ-साथ विशेष कीर्ति फैलती है। सज्जन पुरुष उसे आदर देते हैं। दान देने से शत्रुता भी खत्म हो जाती है। वैसे ही व्रत आदि शुभ कार्य भी धर्म हैं उनसे भी लोग अपने अधीन बन जाते हैं। इसीलिए आचार्यदेव का कहना है कि दान और व्रत करने वाले सज्जन पुरुषों को इतना लाभ होता है कि सभी लोग उसके वश में हो जाते हैं, सभी प्रकार के सुख उसको मिलते हैं और सभी प्रकार की विभूतियाँ भी उसे प्राप्त हो जाती हैं। अब आचार्यदेव तुलना करते हुए बतलाते हैं कि-

एक मनुष्य के पास उत्तम पात्र को दिये गये आहारदान से उत्तम हुआ पुण्य समुदाय विद्यमान है तथा दूसरे मनुष्य के पास राज्यलक्ष्मी विद्यमान है। फिर भी प्रथम मनुष्य की अपेक्षा द्वितीय मनुष्य दरिद्र ही है, क्योंकि उसके पास आगामी काल में फल देने वाला कुछ भी शेष नहीं है। अभिप्राय यही है कि सुख का कारण एक मात्र पुण्य ही है अत: जिसने दान दिया है उसने इतना अधिक पुण्य संचय कर लिया है कि वह आगामी काल में नवनिधि आदि तमाम धन संपत्ति का स्वामी होगा तथा जिस व्यक्ति के पास राज्यलक्ष्मी तो है वह वर्तमान में धनी है किन्तु आगे वह निर्धन ही रहेगा।

जिसके धन दान के लिए नहीं है, शरीर व्रत के लिए नहीं है और शास्त्राभ्यास कषायों की उपशांति के लिए नहीं है उसका जन्म केवल संसार के दु:खों के लिए मूल-भूत ऐसे जन्म मरण के लिए ही है। तात्पर्य यही है कि धन पाकर दान देना चाहिए। मनुष्य का शरीर पाकर व्रत करना चाहिए और शास्त्रों को पढ़कर कषायों को मंद करना चाहिए। यदि धन से दान नहीं दिया, शरीर से व्रत नहीं किया और शास्त्र पढ़कर भी क्रोध, मान, माया, लोभ को बढ़ाते रहे तो समझ लीजिए उस व्यक्ति ने अपने संसार के दु:खों को ही बढ़ावा दिया है।

मनुष्य जन्म को प्राप्त कर प्रत्येक व्यक्ति को तप करना चाहिए। क्योंकि यह तप संसार रूपी समुद्र से पार होने के लिए अपूर्व पुल के समान है। जो मनुष्य देव, गुरु एवं मुनि की पूजा करता है, दान देता है तो उसका वैभव पाना सफल है क्योंकि यदि वैभव पाकर भी दान, पूजन नहीं किया तो वह वैभव मात्र कर्मबंध का ही कारण है। पाप को उत्पन्न करने वाले समस्त कार्यों से रहित ऐसे चित्तवृत्ति का आश्रय करने वाली भिक्षा कहीं श्रेष्ठ है किन्तु सत्पात्र दान से रहित होकर विपुल एवं तीव्र दु:खों से परिपूर्ण दुर्लभ्य नरक आदि गतिरूप दुर्गति को करने वाली विभूति श्रेष्ठ नहीं है।

आचार्य श्री पद्मनंदि देव कहते हैं कि जो गृहस्थ भगवान के चरण कमलों की पूजा नहीं करता है और संयमी साधुओं को दान नहीं देतार है उसे गहरे जल में डुबो देना चाहिए। इसका अभिप्राय यही ही कि दान और पूजा क्रिया से रहित गृहस्थ स्वयं ही गृहस्थाश्रम के पाप के भार से अगाध संसार समुद्र में डूब जाता है। इसलिए श्रावक का कर्तव्य है कि वह प्रतिदिन दान पूजा अवश्य करे इसी से गृहस्थाश्रम सफल है। इस संसार रूप समुद्र में परिभ्रमण करते हुए यदि चिरकाल में बड़े दु:ख से मनुष्य पर्याय प्राप्त हो गई है तो उसे पाकर उत्कृष्ट तप करना चाहिए। अर्थात् मुनि दीक्षा ले लेना चाहिए और यदि कदाचित् वह तप नहीं किया जा सकता है तो अणुव्रती ही हो जाना चाहिए जिससे कि प्रतिदिन पात्रदान हो सके। इससे यही अभिप्राय निकलता है कि अणुव्रत लिए बगैर श्रावक नहीं कहा सकता है और श्रावक हुए बगैर मुनियों को आहार देने का सौभाग्य नहीं मिलता है।

पुण्य का फल

यदि कोई मनुष्य अपने घर से बहुत सा नाश्ता (मार्ग में खाने योग्य पकवान) लेकर दूसरे गांव जाता है तो वह जिस प्रकार सुखी रहता है उसी प्रकार दूसरे जन्म में जाने के लिए व्यक्ति को व्रत एवं दान से कमाया हुआ एकमात्र पुण्य ही सुख का कारण होता है। यहाँ इस लोक में काम, अर्थ (धन) और यश के लिए किया गया प्रयत्न भाग्यवश कदाचित् निष्फल भी हो जाता है किन्तु मुनि, आर्यिका आदि पात्रों के नहीं मिलने पर हर्षपूर्वक उनके लिए किया गया दान का संकल्प भी पुण्य को प्रदान करता ही करता है। अपने मकान में शत्रुजन के भी आ जाने पर सज्जन मनुष्य प्रिय वचन एवं आसन देना आदि के द्वारा उसका अनुपम आदर सत्कार करते हैं। फिर भला उत्तम गुणों रूप रत्नों के आश्रयभूत उत्कृष्ट पात्र के अपने घर पर आ जाने पर सज्जन पुरुष क्या हर्ष से आदर सत्कार नहीं करते हैं अर्थात् अवश्य ही वे दान आदि के द्वारा उनका यथायोग्य सम्मान करते हैं। तात्पर्य यही है कि गृहस्थ के घर में यदि कदाचित् शत्रु भी आ जाये तो उसको भी बिठाना चाहिए, मधुर वचन से उसे संतुष्ट करना चाहिए और यदि कदाचित् उत्तम पात्र मुनि, आर्यिका आदि का घर में आगमन हो जाये तो उनकी विधिवत् नवधाभक्ति करके उन्हें आहारदान देकर महान पुण्य संचय कर लेना चाहिए।

सज्जन पुरुष के लिए अपने पुत्र की मृत्यु का दिन भी उतना बाधक नहीं होता जितना कि मुनिदान से रहित दिन उसको बाधक दिखता है। ठीक है, दुर्निवार दैव के द्वारा कुत्सित कार्य के किए जाने पर बुद्धिमान मनुष्य उसे अनिष्ट नहीं मानता, किन्तु पुरुष के द्वारा ऐसे किसी कार्य के किए जाने पर विवेकी मनुष्य के घर पर यदि पुत्र का मरण हो जाता है तो वह विशेष शोकाकुल नहीं होता है क्योंकि वह जानता है कि यह पुत्र वियोग अपने पूर्वोपार्जित कर्मों के उदय से हुआ है जो कि किसी प्रकार से टाला नहीं जा सकता था परन्तु यहाँ यदि किसी दिन साधुजन को आहार नहीं दिया जाता है तो वह इसके लिए पश्चाताप करता है कारण कि वह अपनी असावधानी से हुआ है वह सोचता है कि यदि हम सावधान होकर द्वारापेक्षण आदि करते तो पात्र का लाभ अवश्य मिल जाता तथा पात्रदान के अभाव में जो पुण्य लाभ की हानि हुई है और अपनी आवश्यक क्रिया की पूर्ति नहीं हुई है इसलिए वह पुत्र वियोग से अधिक भी दु:ख महसूस करता है।

यह है सच्चे श्रावक की भावना, सच है आज भी यत्र-तत्र मुनि, आर्यिकाएं और क्षुल्लक, क्षुल्लिकाएं दिख रहे हैं। जो भक्तजन उनकी भक्ति करते हैं उन्हें आहारदान देते हैं वह अपने मनुष्य पर्याय को सफल कर लेते हैं। इससे विपरीत जो उनकी निंदा में अपने समय को बिता रहे हैं वे बेचारे व्यर्थ ही पाप की पोट बांधकर अपने संसार को बढ़ा रहे हैं। यह निश्चित बात है।

करोड़ों परिश्रमों से संचित किया हुआ जो धन है वह मनुष्यों को अपने पुत्रों और प्राणों से भी अधिक प्रिय प्रतीत होता है उसका सदुपयोग तो केवल दान देने में ही होता है। इसके विरुद्ध दुर्व्यसनादि में उसका उपयोग करने से मनुष्य को अनेक कष्ट ही भोगने पड़ते हैं, ऐसा आगम का कथन है। इस लोक में गृहस्थों की जो संपत्ति प्रतिदिन खाने-पीने आदि में खर्च होती है वह नष्ट हुई ही समझो चूँकि वह यहाँ फिर से कभी वापस नहीं आती है किन्तु उत्तम पात्रों के लिए दिये गये दान में जो संपत्ति व्यय होती है वह संपत्ति नियम से फिर से प्राप्त हो जाती है अर्थात् असंख्य गुणा होकर फलती है जैसे कि उत्तम भूमि में बोया हुआ बड़ का बीज करोड़ गुणा फल देता है।

आहार दान का फल

जिस श्रावक ने यहाँ मोक्षाभिलाषी मुनि को भक्तिपूर्वक आहार दिया है उसने केवल उन मुनि को ही मोक्षमार्ग में प्रवृत्त नहीं किया है बल्कि अपने आपको भी उसने मोक्षमार्ग में लगा दिया है। तो ठीक ही है जैैसे-मंदिर को बनाने वाला कारीगर भी निश्चय से उस मंदिर के साथ ही ऊँचे स्थान को चला जाता है अर्थात् जिस प्रकार मंदिर को बनाने वाला कारीगर जैसे-जैसे मंदिर ऊँचा बनाता जाता है वैसे-वैसे वह भी पेंड बांधकर ऊँचे स्थान पर चढ़ता चला जाता है। ठीक उसी प्रकार से मुनि को भक्तिपूर्वक आहार देने वाला मनुष्य भी उस मुनि को मोक्षमार्ग में बढ़ाता हुआ स्वयं भी उनके ही साथ मोक्षमार्ग में बढ़ता चला जाता है।

भक्तिरस से अनुरंजित बुद्धि वाला जो गृहस्थ श्रेष्ठ मुनि को शाक भी आहार देता है वह अनन्त फल का भोगने वाला होता है। सो ठीक ही है। उत्तम खेत में बोया गया बीज क्या किसान को बहुत फल नहीं देता है? अवश्य देता है। मन-वचन-काय की शुद्धि करके विशुद्ध हुआ जो मनुष्य साक्षात् पात्र मुनि, आर्यिका आदि को केवल आहार ही देता है। उसको भी संसार से पार उतारने वाला ऐसा पुण्य प्राप्त हो जाता है कि जिस पुण्य की इन्द्र भी अभिलाषा करते हैं। अभिप्राय यही है कि आहारदान का पुण्य इतना महान है जिसे इन्द्र भी चाहते हैं। लोक में मोक्ष के कारणीभूत जिस रत्नत्रय की स्तुति की जाती है वह रत्नत्रय मुनिगण शरीर की शक्ति से ही धारण करते हैं, वह शरीर की शक्ति भोजन से प्राप्त होती है