दिगम्बर-परम्परा में ‘संवत्सरी’ शब्द

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दिगम्बर-परम्परा में ‘संवत्सरी’ शब्द

(पारस प्रिंटर्स एण्ड पब्लिशर्स, नौएडा (उ.प्र.) की ओर से श्री नवीन जैन की ओर से प्रकाशित पत्र ‘रत्नराज’ के मई १९९५ के अंक में पृष्ठ १३ से पृष्ठ १६ तक श्वेताम्बर जैन तेरापंथ के प्रथम गणाधिपति श्री तुलसी जी का ‘संवत्सरी’ शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ है। इसमें विद्वान लेखक ने ‘संवत्सरी’ की परम्परा का परिचय एवं विश्लेषण वैदुष्यपूर्ण ढंग से किया है। इसी लेख में एक जगह (पृष्ठ १३ पर) ‘आधुनिक परम्परा’ शीर्षक के अन्तर्गत ऐसा उल्लेख किया गया है कि ‘‘दिगम्बर परम्परा में ‘संवत्सरी’ जैसा कोई शब्द उपलब्ध नहीं है।’’- इस सन्दर्भ में यहाँ प्रस्तुत बिन्दु ध्यातव्य हैं-)

दिगम्बर परम्परा के प्रख्यात आचार्य इन्द्रनन्दिकृत ‘छेदपिण्ड’ नामक ग्रंथ में ‘संवत्सर’ शब्द का प्रयोग किया है-

‘‘आसाढे संवच्छर पडिक्कमणे दिज्जसु बारस उववासा ।’’

-छेदपिण्ड, ११५

-युग की समाप्ति आषढी पूर्णिमा को होती है। तत्पश्चात् (श्रावण) आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा को अभिजित नक्षत्र, बालकरण और रौद्रमुहूर्त में युग का आरम्भ होता है।

इसी प्रकार एक अन्य ग्रन्थ ‘छेदशास्त्र’ में ‘संवत्सरी’ शब्द का प्रयोग स्पष्टरूप से किया गया प्राप्त होता है-

‘‘संवच्छरिए बारस कादव्वा णिज्जराए ।’’

-छेदशास्त्र, ६७

-आषाढ़मास की संवत्सरी के बारह उपवास निर्जरार्थ करना चाहिए। तथा-

‘‘कार्तिकचातुर्मासेऽष्ट, फाल्गुनचातुर्मासे चत्वारि ।’’

-कार्तिक चातुर्मास में आठ एवं फाल्गुन चातुर्मास में चार उपवास करना चाहिए।

अत: यह कहना कि ‘संवत्सरी’ शब्द दिगम्बर परम्परा में उपलब्ध ही नहीं है; उक्त सन्दर्भों के आलोक में संगत नहीं लगता। यह उक्त लेख के एक वाक्य पर किया गया सूचनात्मक अनुरोधमात्र है। गणाधिपति जी के लेख की समीक्षा/टिप्पणी नहीं है।

सम्पादक

प्राकृत विद्या जुलाई-सितम्बर १९९५ अंक २