दिगम्बर जैन मुनि एवं आर्यिकाओं की दिनचर्या

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दिगम्बर जैन मुनि एवं आर्यिकाओं की दिनचर्या

यतियों के मूलगुण

पंच य महव्वयाइं, समिदीओ पंच जिणवरुद्दिट्ठा ।

पंचेविंदियरोहा, छप्पि य आवासया लोचो ।।२।।
आचेलकमण्हाणं, खिदिसयणमदंतघंसणं चेव ।

ठिदिभोयणेयभत्तं, मूलगुणा अट्ठवीसा दु ।।३।।

अर्थ - पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रिय निरोध, छह आवश्यक, लोच, आचेलक्य, अस्नान, क्षितिशयन, अदंतधावन, स्थितिभोजन और एकभक्त ये अट्ठाईस मूलगुण श्री जिनेन्द्रदेव ने मुनियों के लिए कहे हैं ।
यहाँ श्रमण, यति, मुनि, साधु और अनगार ये सब पर्यायवाची नाम हैं । इन शब्दों से दिगम्बर मुनि विवक्षित हैं । इनके तीन भेद होते हैं - आचार्य, उपाध्याय और साधु। इन सभी के ये अट्ठाइस मूलगुण होते ही हैं तथा आचार्य और उपाध्याय के ३६ और २५ भी मूलगुण माने हैं जो कि उनके विशेष गुण हैं ।
उत्तरगुण - बारह तप और बाईस परीषह ये चौंतीस उत्तर गुण माने गये हैं ।
‘मुनिचर्या’ में मुनि एवं आर्यिकाओं के मूलगुणों के अन्तर्गत जो छह आवश्यक क्रियाएं हैं उनके प्रयोग की विधि का वर्णन किया जा रहा है ।

आर्यिकाओं की आवश्यक क्रियायें-

एसो अज्जाणं पि अ, सामाचारो जहाक्खिओ पुव्वं ।
सव्वह्मि अहोरत्ते विभासिदव्वो जहाजोग्गं ।।१८३।।[१]

मूलाचार ग्रंथ में पूर्व में जैसी विधि मुनियों के लिए कही गयी है वैसी ही यह समाचारविधि आर्यिकाओं को भी सम्पूर्ण अहोरात्र में यथायोग्य करनी चाहिए ।
अन्तर इतना ही है कि ‘‘जहाजोग्गं-यथायोग्यं आत्मानुरूपो वृक्ष-मूलादिरहित: । सर्वस्मिन्नहोरात्रे एषोऽपि सामाचारो यथायोग्यमार्यिकाणां आर्यिकाभिर्वा प्रकटयितव्यो विभावयितव्यो वा यथाख्यात: पूर्वस्मिन्निति ।’’
अपने अनुरूप-वृक्षमूल आदि योगों से रहित पूर्वकथित सर्व ही समाचार विधि अहोरात्र में आर्यिकाओं को भी करनी चाहिए । मूलाचार की इस गाथा से और टीका से स्पष्ट है कि आर्यिकाओं के लिए पूर्वकथित वे ही अट्ठाईस मूलगुण हैं और वे ही प्रत्याख्यान, संस्तर ग्रहण आदि तथा वे ही औघिक और पदविभागिक सामाचार माने गये हैं जो कि मूलाचार में चार अध्यायों में गाथा १८६ तक वर्णित हैं । मात्र 'यथायोग्य पद से टीकाकार श्री वसुनंदि आचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि आर्यिकाओं को वृक्षमूल, आतापन, अभ्रावकाश और प्रतिमायोग आदि उत्तरयोगों को करने का निषेध है । यही कारण है कि आर्यिकाओं के लिए पृथक् दीक्षाविधि या पृथक् चर्या और क्रियाविधि आदि का कोई ग्रंथ नहीं है ।
आचेलक्य मूलगुण में आर्यिकाओं के लिए दो साड़ी का विधान है। यथा -

वस्त्रयुग्मं सुबीभत्सलिंगप्रच्छादनाय च ।
आर्याणां संकल्पेन, तृतीये मूलमिष्यते ।।[२]

पर्यायजन्य असमर्थता के कारण अपने गुप्तांगों को ढकने हेतु आर्यिकाओं के लिए दो वस्त्र (दो साड़ी) का विधान है ।
आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज कहते थे कि आर्यिकायें बैठकर करपात्र में आहार लेती हैं और साड़ी पहनती हैं । ये दोनों भी इनके मूलगुण ही हैं ।
आर्यिकाओं को दीक्षा देते समय उन्हें अट्ठाईस मूलगुण दिये जाते हैं एवं मुनियों की दीक्षाविधि के ही संस्कार किये जाते हैं । यद्यपि छठे गुणस्थान योग्य संयम न होने से इनके पाँच महाव्रत उपचार से कहे गये हैं फिर भी ग्रंथों में इन्हें संयतिका, महाव्रतिका आदि पदों से कहा गया है । यही कारण है कि इनकी नवधाभक्ति पूजा आदि भी मुनियों के समान ही मानी गई है ।
अहोरात्रि के कृतिकर्म -

चत्तारि पडिक्कमणे, किदियम्मा तिण्णि होंति सज्झाए ।
पुव्वण्हे अवरण्हे किदियम्मा चोद्दसा होंति ।।६०२।।[३]

‘‘चार प्रतिक्रमण के और तीन स्वाध्याय के ऐसे पूर्वाण्ह के सात कृतिकर्म और अपरान्ह के सात कृतिकर्म ऐसे चौदह कृतिकर्म होते हैं ।’’ अथवा पश्चिम रात्रि[४] में प्रतिक्रमण के चार, स्वाध्याय के तीन और वंदना के दो, सूर्य उदय होने पर स्वाध्याय के तीन और मध्यान्ह देव वंदना (सामायिक) के दो इस प्रकार पूर्वाण्ह कृतिकर्म के ये चौदह हुए, उसी प्रकार अपरान्ह काल में स्वाध्याय के तीन, प्रतिक्रमण के चार, वंदना के दो, रात्रियोग ग्रहण-विसर्जन में योगभक्ति के दो और पूर्व रात्रि में स्वाध्याय के तीन इस प्रकार अपरान्हिक क्रिया में चौदह कृतिकर्म होते हैं । अहोरात्रि के कुल मिलाकर अट्ठाईस कृतिकर्म होते हैं। यहाँ पर गाथा में प्रतिक्रमण और स्वाध्याय का ग्रहण उपलक्षण मात्र है इसलिए सभी क्रियायें इन्हीं में अन्तर्भूत हो जाती हैं[५]।’’
अनगारधर्मामृत में भी कहा है -

स्वाध्याये द्वादशेष्टा षड्वंदनेष्टौ प्रतिक्रमे ।
कायोत्सर्गा योगभक्तौ द्वौ चाहोरात्रगोचरा: ।।७५।।[६]

‘‘चार बार के स्वाध्याय के १२, त्रिकाल वंदना के ६, दो बार के प्रतिक्रमण के ८ और रात्रियोग ग्रहण-विसर्जन में योग भक्ति के २, ऐसे २८ कायोत्सर्ग साधु के अहोरात्र विषयक होते हैं ।’’ इनका स्पष्टीकरण यह है कि-
त्रिकाल देववंदना में चैत्यभक्ति और पंचगुरुभक्ति संबंधी दो-दो २²३·६, दैवसिक-रात्रिक प्रतिक्रमण में, सिद्धभक्ति, प्रतिक्रमण भक्ति, निष्ठितकरणवीर भक्ति और चतुर्विंशति तीर्थंकर भक्ति इन चार भक्ति संबंधी चार-चार ४²२·८, पूर्वान्ह, अपरान्ह, पूर्वरात्रिक और अपररात्रिक इन चार कालिक स्वाध्याय में-स्वाध्याय के प्रारम्भ में श्रुतभक्ति, आचार्यभक्ति एवं समाप्ति में श्रुतभक्ति ऐसे तीन-तीन भक्ति सम्बन्धी ४²३·१२, रात्रियोग प्रतिष्ठापन में योगिभक्ति सम्बन्धी एक और निष्ठापन में एक ऐसे २, इस तरह सब मिलकर ६±८±१२±२·२८ कायोत्सर्ग किये जाते हैं । ये कायोत्सर्ग विधिवत् किये जाने से ‘‘कृतिकर्म’’ कहलाते हैं ।

क्षुल्लक, ऐलक की आवश्यक क्रियायें -

उद्दिष्टत्यागी क्षुल्लक, ऐलक और अनुमतित्यागी दसवीं प्रतिमाधारी उत्कृष्ट श्रावकों के लिए भी इन्हीं अट्ठाईस कायोत्सर्गरूप कृतिकर्म का विधान है । यथा-

वंदना त्रितये काले, प्रतिक्रांते द्वयं तथा ।

स्वाध्यायानां चतुष्वंâ च, योगिभक्तिद्वयं पुन: ।।
उत्कृष्टश्रावकेनामू:, कर्तव्या यत्नतोऽन्वहं ।

षडष्टौ द्वादश द्वे च, क्रमशोऽमूषु भक्त्य: ।।

त्रिकाल वंदना में छह, प्रातःकाल-सायंकाल दोनों समय के प्रतिक्रमण में आठ, चार स्वाध्याय में बारह और योगिभक्ति में दो ऐसी ६±८±१२±२·२८ भक्तियाँ कायोत्सर्ग सहित क्रम से उत्कृष्ट श्रावकों को प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए । यही क्रिया क्षुल्लिकाओं के लिए भी समझनी चाहिए ।
कृतिकर्म का लक्षण -
'सामायिकस्तवपूर्वककायोत्सर्गश्चतुर्विंशतिस्तवपर्यंत: कृतिकर्मेत्युच्यते ।[७]
‘‘सामायिक स्तवपूर्वक कायोत्सर्ग करके चतुर्विंशतिस्तव पर्यन्त जो विधि है उसे कृतिकर्म कहते हैं ।’’
दोणदं तु जधाजादं, वारसावत्तमेव य ।
चदुस्सिरं तिसुद्धिं च, किदियम्मं पउंजदे ।।६०३।।[८]
‘‘यथाजात मुद्राधारी साधु मन वचन काय की शुद्धि करके दो प्रणाम, बारह आवर्त और चार शिरोनतिपूर्वक कृतिकर्म का प्रयोग करें ।’’ अर्थात् किसी भी क्रिया के प्रयोग में पहले प्रतिज्ञा करके भूमि स्पर्शरूप पंचांग नमस्कार किया जाता है, जैसे -
अथ पौर्वाण्हिकस्वाध्यायप्रारंभक्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजा-वंदनास्तवसमेतं श्रुतभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं’’ ऐसी प्रतिज्ञा करके पंचांग नमस्कार किया जाता है । पुन: ‘‘णमो अरिहंताणं’’ से लेकर ‘‘तावकालं पावकम्मं दुच्चरियं वोस्सरामि पाठ बोला जाता है इसे सामायिक स्तव कहते हैं । इसमें ‘‘णमो अरिहंताणं’’ पाठ प्रारंभ करते समय तीन आवर्त करके एक शिरोनति की जाती है, पुन: पाठ पूरा करके तीन आवर्त एक शिरोनति की जाती है । फिर कायोत्सर्ग करके पंचांग प्रणाम किया जाता है पुन: ‘‘थोस्सामि’’ इत्यादि चतुर्विंशति स्तव के प्रारंभ में तीन आवर्त एक शिरोनति करके पाठ पूरा होने पर तीन आवर्त और एक शिरोनति होती है । इस प्रकार प्रतिज्ञा के अनन्तर प्रणाम और कायोत्सर्ग के अनन्तर प्रणाम ऐसे दो प्रणाम हुए । सामायिक दण्डक के आदि-अन्त में और थोस्सामि स्तव के आदि-अन्त में ऐसे तीन-तीन आवर्त चार बार करने से बारह आवर्त हुए तथा प्रत्येक में एक-एक शिरोनति करने से चार शिरोनति हो गर्इं ।
इसी विधि को आचारसार में स्पष्ट किया है । यथा -

क्रियायामस्यां व्युत्सर्गं, भक्तेरस्या: करोम्यहं ।

विज्ञाप्येति समुत्थाय गुरुस्तवनपूर्वकम् ।।३५।।
कृत्वा करसरोजातमुकुलालंकृतं निजं ।
भाललीलासर: कुर्यात्त्र्यावर्तां शिरसो नतिम् ।।३६।।
आद्यस्य दण्डकस्यादौ मंगलादेरयं क्रम: ।
तदंगेऽप्यंगव्युत्सर्गः कार्योऽतस्तदनंतरम् ।।३७।।
कुर्यात्तथैव थोस्सामीत्याद्यार्याद्यन्तयोरपि ।

इत्यस्मिन् द्वादशावर्ता: शिरोनतिचतुष्टयम् ।।३८।।

इन श्लोकों का पूरा अर्थ ऊपर आ चुका है अतः यहाँ पुन: नहीं दिया है ।

नित्यक्रियायें

(दिनचर्या)
अनगार धर्मामृत के आठवें अध्याय में छह आवश्यक क्रियाओं का वर्णन करके नवमें अध्याय में नित्य-नैमित्तिक क्रियाओं का अथवा इन आवश्यक क्रियाओं के प्रयोग का वर्णन बहुत ही सरल ढंग से किया है । यथा-
अर्धरात्रि के दो घड़ी अनन्तर से अपररात्रिक स्वाध्याय का काल हो जाता है । उस समय पहले ‘‘अपररात्रिक’’ स्वाध्याय करके पुन: सूर्योदय के दो घड़ी शेष रह जाने पर स्वाध्याय समाप्त कर ‘‘रात्रिक प्रतिक्रमण’’ करके रात्रि योग समाप्त कर देवें । फिर सूर्योदय के समय से दो घड़ी (४८ मिनट) तक ‘‘देव वंदना’’ अर्थात् सामायिक करके ‘‘गुरुवन्दना’’ करें। पुन: ‘‘पौर्वाण्हिक’’ स्वाध्याय प्रारंभ करके मध्यान्ह के दो घड़ी शेष रहने पर स्वाध्याय समाप्त कर ‘‘देव वन्दना’’ करें । मध्यान्ह समय देववन्दना समाप्त कर ‘‘गुरु वन्दना’’ करके ‘‘आहार हेतु’’ जावें । यदि उपवास हो तो उस समय जाप्य या आराधना का चिन्तवन करें । आहार से आकर गोचरी प्रतिक्रमण करके व प्रत्याख्यान ग्रहण करके पुन: ‘‘अपराण्हिक’’ स्वाध्याय प्रारंभ कर सूर्यास्त के दो घड़ी पहले समाप्त कर ‘‘दैवसिक-प्रतिक्रमण’’ करें । पुन: गुरुवन्दना करके रात्रि योग ग्रहण करें तथा सूर्यास्त के अनन्तर ‘‘देव वन्दना’’-सामायिक करें । रात्रि के दो घड़ी व्यतीत हो जाने पर ‘‘पूर्वरात्रिक’’ स्वाध्याय प्रारंभ करके अर्ध रात्रि के दो घड़ी पहले ही स्वाध्याय समाप्त करके शयन करें। यह अहोरात्र संबंधी क्रियाएँ हुई ।
मूलाचार गाथा ६०२ की टीका में भी इन्हीं क्रियाओं का कथन किया गया है ।
विशेष -शास्त्रों में मध्यान्ह देववन्दना के बाद आहार करने को कहा है किन्तु आजकल प्रात: ९ बजे से ११.३० के बीच में साधुओं के आहार की परम्परा है अतः आहार के बाद मध्यान्ह की सामायिक की जाती है ।
सर्वप्रथम पिछली रात्रि की क्रियाओं को कहते हैं -

क्लमं नियम्य क्षणयोगनिद्रया, लातं निशीथे घटिकाद्वयाधिके ।
स्वाध्यायमत्यस्य निशाद्विनाडिकाशेषे प्रतिक्रम्य च योगमुत्सृजेत् ।।७।।
[९]

योगनिद्रा - धर्मध्यान सहित निद्रा के द्वारा शरीर की थकान को दूर करके अर्थात् ४ घड़ी (९६ मिनट तक) अर्ध रात्रि में नींद लेकर पुन: जागकर अपररात्रिक-वैरात्रिक स्वाध्याय करके ४८ मिनट रात्रि शेष रहने पर स्वाध्याय समापन कर रात्रिक प्रतिक्रमण करके योग भक्ति के द्वारा रात्रि योग का विसर्जन कर देवें ।
उपर्युक्त कथनानुसार अर्ध रात्रि में मात्र ४ घड़ी शयन करना यह उत्कृष्ट मार्ग है । आजकल मुनि-आर्यिकाएं पाँच, छह घंटे भी सोते हैं क्योंकि नींद कम लेने से शरीर में थकान बनी रहती है अत: अपने स्वास्थ्य के अनुसार शरीर को स्वस्थ रखते हुए कम से कम निद्रा लेना चाहिए यही अभिप्राय समझना ।

साधु वर्ग पिछली रात्रि में उठकर पहले क्या करें ?

मुनि या आर्यिका पिछली रात्रि में निद्रा से उठकर नौ बार णमोकार मंत्र का जाप्य करें । अनन्तर लघु शंका आदि बाधाओं से निवृत्त होकर हाथ, पैर, मुख आदि धोकर अपने आसन पर बैठकर यत्स्वर्गावतरोत्सवे आदि सुप्रभात स्तोत्र पढ़ें । पुन: वैरात्रिक-पिछली रात्रि का स्वाध्याय करें ।
स्वाध्याय करते समय पहले श्री गौतम स्वामी के मुख से प्रगट हुए गणधरवलय मंत्रों को पढ़कर किसी भी ग्रंथ का स्वाध्याय करें ।
पिछली रात्रि के स्वाध्याय में सिद्धान्त ग्रंथ की वाचना का निषेध है ।

व्योमाचलकुलान्तस्थचारणावधिबोधिनाम् ।
वाचनापररात्रौ तु क्षेत्रशुद्ध्युपलंभत: ।।७९।। आचारसार।

आकाशगामी ऋद्धिधारी, अवधिज्ञानी आदि मुनियों के लिए ही क्षेत्र शुद्धि होने से पिछली रात्रि में सिद्धान्त ग्रंथों की वाचना मानी गई है । यही बात धवला पुस्तक ९ में भी पृष्ठ २५४ पर कही गई है अत: आचारसार, मूलाचार, समाधिशतक, आप्तमीमांसा, स्वयंभूस्तोत्र आदि ग्रंथों का स्वाध्याय करें । कदाचित् प्रकाश की व्यवस्था न हो तो जो रत्नकरण्डश्रावकाचार, तत्त्वार्थसूत्र, द्रव्यसंग्रह आदि पाठ मौखिक याद हों उन्हें ही पढ़ लेवें । अनन्तर स्वाध्याय की निष्ठापना करें । सूर्योदय से दो घड़ी (४८ मिनट) पूर्व तक पिछली रात्रि के स्वाध्याय का काल है ।

दिक्शुद्धि कब और कैसे करें ?

वैरात्रिक स्वाध्याय के अनंतर साधु बाहर निकलकर पौर्वाण्हिक स्वाध्याय के लिए दिक्शुद्धि करें । जैसा कि धवला महाशास्त्र में कहा है । यथा-‘‘पच्छिमरत्तियसज्झायं खमाविय बिंह णिक्कलिय पासुगे भूमिपदेसे काओसग्गेण पुव्वाहिमुहो ।’’ [१०]पश्चिम रात्रि के स्वाध्याय को निष्ठापित करके बाहर निकलकर प्रासुक भूमि प्रदेश में खड़े होकर कायोत्सर्ग मुद्रा से पूर्वाभिमुख होकर दिक्शुद्धि करें ऐसे ही चारों दिशाओं में दिक्शुद्धि की जाती है ।

णवसत्तपंचगाहापरिमाणं दिसि विभागसोधीए ।
पुव्वण्हे अवरण्हे, पदोसकाले य सज्झाए ।।२७३।।मूलाचार।

उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है -
पूर्वाण्हकाल के स्वाध्याय के लिए दिग्विभाग शुद्धि के निमित्त प्रत्येक दिशा में कायोत्सर्ग से स्थित होकर नव-नव गाथा परिमाण जाप्य करना चाहिए । यह दिक्शुद्धि पिछली रात्रि के स्वाध्याय के बाद की जाती है । ऐसे पूर्वाण्ह स्वाध्याय के बाद अपराण्ह स्वाध्याय हेतु प्रत्येक दिशा में कायोत्सर्ग पूर्वक सात-सात बार णमोकार मंत्र पढ़कर करना चाहिए और पूर्वरात्रिक स्वाध्याय के लिए अपराण्ह स्वाध्याय समापन के बाद प्रत्येक दिशा में पाँच-पाँच गाथा पढ़कर दिक्शुद्धि करनी चाहिए । पश्चिम रात्रिक स्वाध्याय के लिए दिक्शुद्धि का विधान नहीं है क्योंकि उस समय सिद्धान्त ग्रन्थ पढ़ने का निषेध है । उस काल में भी सिद्धान्त ग्रंथों के अधिकारी ऋद्धिधारी मुनि आदि ही हैं, ऐसा आचारसार ग्रन्थ में कहा है । यही पूर्ण विधि आचारसार ग्रंथ अध्याय चतुर्थ में ७३-७४ आदि श्लोकों में दी गई है ।
विशेष -यह दिक्शुद्धि का विधान केवल सिद्धान्तग्रंथों के पठन-पाठन के लिए ही है ।
इस दिक्शुद्धि के बाद रात्रिक प्रतिक्रमण किया जाता है ।

रात्रिक प्रतिक्रमण कब और कैसे करें ?

सूर्योदय से दो घड़ी पहले रात्रिक प्रतिक्रमण का काल माना गया है । यह प्रतिक्रमण प्रात:कालीन सामायिक के पहले किया जाता है । यथा - ‘‘पश्चिमरात्रौ प्रतिक्रमणे क्रियाकर्माणि चत्वारि’’[११] पिछली रात्रि के प्रतिक्रमण में चार भक्ति संबंधी चार कृतिकर्म होते हैं । अत: दिक्शुद्धि के बाद सभी साधु पश्चिमरात्रि में आचार्य के पास जाकर नमोस्तु करके विनय से बैठकर ‘‘जीवे प्रमादजनिता: प्रचुरा: प्रदोषा:’’ इत्यादि बोलते हुए प्रतिक्रमण करें । जैसा कि कहा है - जो ‘‘दैवसिकरात्रिकप्रतिक्रमण’’ छपा है वही यहाँ पढ़ा जाता है । इसमें ‘‘दैवसिकप्रतिक्रमणक्रियायां’’ के स्थान पर ‘‘रात्रिकप्रतिक्रमणक्रियायां’’ ऐसा बोलें । ऐसे ही ‘‘देवसियम्मि’’ की जगह ‘‘राइयम्मि’’ ‘‘देवसियो’’ की जगह ‘‘राइओ’’ ‘‘देवसियस्स’’ की जगह ‘‘राइयस्स’’ पाठ बोलें। ‘‘देवसिओ राइओ’’ ऐसे दोनों बोलने की आवश्यकता नहीं रहती है । आजकल मुनिसंघों में प्राय: प्रात: की सामायिक के बाद यह रात्रिक प्रतिक्रमण करते हैं । फिर भी कुछ साधु-साध्वियाँ शास्त्रानुसार पहले प्रतिक्रमण करके सामायिक करते हैं ।[१२] कायोत्सर्ग का लक्षण - ‘‘एक बार णमोकार मंत्र के पढ़ने में तीन श्वासोच्छ्वास हो जाते हैं । जैसे कि ‘‘णमो अरिहंताणं’’ पद के उच्चारण में श्वास को ऊपर खींचा जाता है और ‘‘णमो सिद्धाणं’’ पद के उच्चारण में श्वांस को छोड़ा जाता है । ‘‘णमो आइरियाणं’’ पद के उच्चारण में श्वांस को खींचना और ‘‘णमो उवज्झायाणं’’ बोलकर श्वांस को छोड़ना पुन: ‘‘णमो लोए’’ पद बोलकर श्वांस को खींचा जाता है और ‘‘सव्वसाहूणं’’ बोलते हुए श्वांस को छोड़ा जाता है । इस तरह नव बार णमोकार मंत्र के जाप्य में सत्ताईस श्वासोच्छ्वास हो जाते हैं [१३]।’’</poem>

कायोत्सर्ग कब कितने करना ?

‘‘नव बार णमोकार मंत्र के जाप्य को कायोत्सर्ग कहते हैं । यहाँ रात्रिक प्रतिक्रमण में सिद्धभक्ति, प्रतिक्रमणभक्ति, वीरभक्ति और चौबीस तीर्थंकर भक्ति के चार कायोत्सर्ग माने गये हैं । अन्त की समाधि भक्ति सर्वदोष विशुद्धि के लिए की जाती है अत: उसके कायोत्सर्ग की गणना नहीं होती है ।
रात्रिक प्रतिक्रमण में वीरभक्ति के कायोत्सर्ग में चौवन (५४) श्वासोच्छ्वास कहे गये हैं यद्यपि इसमें दो कायोत्सर्ग हो जाते हैं और वह भी उस ‘‘वीरभक्ति’’ संबंधी एक ही कहलाता है । ऐसे ही दैवसिक प्रतिक्रमण में वीरभक्ति के कायोत्सर्ग में एक सौ आठ उच्छ्वास माने हैं इसके लिए चार कायोत्सर्ग करना होता है ।
मानसिक जप के प्रति अशक्त जीव वाचनिक जाप्य भी करते हैं ।

वाचाप्युपांशु व्युत्सर्गे, कार्यो जाप्य: स वाचिक: ।
पुण्यं शतगुणं चैत्त:, सहस्रगुणमाहवेत् ।।२४।।
[१४]

वचन के द्वारा जिसका स्पष्ट उच्चारण हो किन्तु अन्य जन न सुन सकें मात्र अंतरंग में ही उच्चारण हो उसे उपांशु जप कहते हैं और जिसका मात्र मन में ही चिंतवन हो उसे मानसिक जप कहते हैं । उपांशु-वाचिक जप का फल सौ गुणा होता है और मानसिक जप का फल हजार गुणा अधिक होता है ।

रात्रियोग निष्ठापन कब और कैसे करें ?

पहले दिन सायंकाल प्रतिक्रमण के बाद जो ‘‘रात्रियोग’’ ग्रहण किया था कि ‘‘आज रात्रि में मैं इसी वसतिका में निवास करूंगा ।’’ इसे रात्रियोग प्रतिष्ठापन कहते हैं । इसी रात्रियोग का अब प्रात: रात्रिक-प्रतिक्रमण के बाद समापन करना होता है ।

सामायिक कब और कैसे करें ?

साधुओं की सामायिक और देववंदना एक है । विधिवत् देववंदना करना इसी का नाम सामायिक है । ‘सत्त्वेषु मैत्रीं’ आदि पाठ पढ़कर जाप्य आदि करके सामायिक करना और देवदर्शन के समय देववंदना क्रिया करना ऐसा नहीं है, प्रत्युत त्रिकाल सामायिक के समय ही तीन बार देववंदना का विधान है । उसी को यहां सप्रमाण दिखाया जाता है ।
मूलाचार में श्रीकुन्दकुन्ददेव ने अट्ठाईस मूलगुणों का वर्णन करते हुए समता नाम के आवश्यक का लक्षण किया है -

जीविदमरणे लाभालाभे संजोयविप्पओगे य ।
बंधुरिसुहदुक्खादिसु समदा सामाइयं णाम ।।२३।।

इसकी टीका में श्री वसुनंदि आचार्य ने कहा है -
सामाइयं णाम-सामायिकं नाम भवति । जीवितमरण-लाभालाभसंयोगविप्रयोगबन्ध्वरि-सुखदुःखादिषु यदेतत्समत्वं समानपरिणाम: त्रिकालदेववंदनाकरणं च तत्सामायिकं व्रतं भवति ।
अभिप्राय यह है कि जीवन-मरण, लाभ-अलाभ, संयोग-वियोग, बंधु-शत्रु और सुख-दुःख आदि में जो समान परिणाम का होना है और त्रिकाल में देववंदना करना है वह सामायिक व्रत है ।
अन्यत्र सामायिक के नियतकालिक-अनियतकालिक ऐसे दो भेद करके नियतकालिक में त्रिकाल देववंदना और अनियतकालिक में समताभाव को रखना ऐसा कहा है ।
आचारसार ग्रंथ में सामायिक आवश्यक का वर्णन करते हुए सिद्धान्तचक्रवर्ती श्रीवीरनंदि आचार्यदेव ने तीर्थक्षेत्र या जिनमंदिर में जाकर विधिवत् ईयापथशुद्धि और चैत्य-पंचगुरुभक्ति करने का आदेश दिया है ।
यहाँ कृतिकर्म का लक्षण बताकर कहा है कि ‘देववंदना क्रिया में चैत्य-पंचगुरु ये दो भक्तियां की जाती हैं और चतुर्दशी के दिन देववन्दना में चैत्यभक्ति के बाद श्रुतभक्ति करके पंचगुरुभक्ति की जाती है’ इत्यादि ।
यही सारी विधि अनगार धर्मामृत में कही गई है एवं क्रियाकलाप ग्रंथ में भी छपी हुई है । अनेक प्रमाणों को उद्धृत कर दिगम्बर मुनि ग्रंथ में मैंने स्पष्टीकरण किया है । विशेष जिज्ञासुओं को उन-उन ग्रंथों को देखना चाहिए । यहां संक्षेप में सामायिक और देववन्दना को एक सिद्ध कर उसी की प्रयोग विधि दी जा रही है ।
दिनचर्या के प्रकरण में सूर्योदय से लेकर ४८ मिनट तक इस देववन्दना का काल अनगारधर्मामृत में कहा है । इसी ग्रंथ की आठवीं अध्याय में ६-६ घड़ी का उत्कृष्ट काल कहा है, एक घड़ी २४ मिनट की होती है ।

त्रिसंध्यं वंदने युंज्यात्, चैत्यपंचगुरुस्तुती ।
प्रियभक्तिं बृहद्भक्तिष्वंते दोषविशुद्धये ।।१३।।

तीनों सन्ध्या संबंधी जिनवन्दना में चैत्यभक्ति और पंचगुरुभक्ति पढ़ें तथा वृहद् भक्तियों के अन्त में पाठ की हीनाधिकतारूप दोषों की विशुद्धि के लिए प्रियभक्ति (समाधिभक्ति) करना चाहिए ।
इस देववन्दना में छह प्रकार का कृतिकर्म भी होता है । यथा-

स्वाधीनता परीतिस्त्रयी निषद्या त्रिवारमावर्ता: ।
द्वादश चत्वारि शिरांस्येवं कृतिकर्म षोढेष्टम् ।।२।।

तथा - ‘‘आदाहीणं, पदाहीणं, तिक्खुत्तं, तिऊणदं, चदुस्सिरं वारसावत्तं, चेदि ।’’
(१) वन्दना करने वाले की स्वाधीनता (२) तीन प्रदक्षिणा (३) तीन भक्ति संबंधी तीन कायोत्सर्ग (४) तीन निषद्या-१. ईर्यापथ कायोत्सर्ग के अनन्तर बैठकर आलोचना करना और चैत्यभक्ति संबंधी क्रिया-विज्ञापन करना २. चैत्यभक्ति के अन्त में बैठकर आलोचना करना और पंचमहागुरुभक्ति संबंधी क्रिया विज्ञापन करना ३. पंचगुरुभक्ति के अन्त में बैठकर आलोचना करना (५) चार शिरोनति (६) बारह आवर्त। यही सब सामायिक विधि में आता है ।

वन्दना योग्य मुद्रा -

मुद्रा के चार भेद हैं - जिनमुद्रा, योगमुद्रा, वन्दना मुद्रा, मुक्ताशुक्तिमुद्रा । इन चारों मुद्राओं का लक्षण क्रम से कहते हैं ।
जिनमुद्रा - दोनों पैरों में चार अंगुल प्रमाण अन्तर रखकर और दोनों भुजाओं को नीचे लटकाकर कायोत्सर्गरूप से खड़े होना सो जिनमुद्रा है । योगमुद्रा-पद्मासन, पर्यंकासन और वीरासन इन तीनों आसनों की गोद में नाभि के समीप दोनों हाथों की हथेलियों को चित रखने को जिनेन्द्रदेव योगमुद्रा कहते हैं । वन्दना मुद्रा-दोनों हाथों को मुकुलित कर और कुहनियों को उदर पर रखकर खड़े हुए पुरुष के वन्दना मुद्रा होती है । मुक्ताशुक्तिमुद्रा-दोनों हाथों की अंगुलियों को मिलाकर और दोनों कुहनियों को उदर पर रखकर खड़े हुए को आचार्य मुक्ताशुक्तिमुद्रा कहते हैं ।
देववन्दना के लिए जिनमंदिर में पहुँचकर हाथ-पैर धोकर ‘नि:सहि’’ का तीन बार उच्चारण कर जिनेन्द्रदेव को नमस्कार करे । अनंतर ‘‘दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भवतापहारि’’ इत्यादि स्तोत्र को पढ़ते हुए चैत्यालय की तीन प्रदक्षिणा देवे । पुन: ‘नि:संगोऽहं जिनानां’’ इत्यादि दर्शनस्तोत्र पढ़कर यदि खड़े होकर सामायिक करना है तो खड़े होकर ‘‘ईर्यापथशुद्धि पाठ’’ से सामायिक शुरू करें । यदि खड़े होकर सामायिक करने की शक्ति नहीं है तो बैठकर करें ।

बैठकर भी देववन्दना करने का विधान -

साधु: पुनर्वंदनां यथोक्तविशेषणविशिष्ट: - सपर्यंक: सप्रतिलेखन-मुकुलितवत्सोत्संगितकरः कुर्यात् । कया ? अशक्त्या । उद्भो यदि वंदितुं न शक्नुयादित्यर्थ: ।
साधु यदि खड़े होकर वंदना नहीं कर सकते हैं - असमर्थ हैं तो पर्यंकासन से बैठकर, पिच्छी लेकर, मुकुलित हाथ जोड़कर वक्ष:स्थल के पास रखकर देववंदना करें ।

चैत्यभक्ति में तीन प्रदक्षिणा -

चैत्यभक्ति पढ़ते-पढ़ते भी जिनप्रतिमा की तीन प्रदक्षिणा देने का विधान है ।

दीयते चैत्यनिर्वाणयोगिनंदीश्वरेषु हि ।
वंद्यमानेष्वधीयानैस्तत्तद्भभक्तिं प्रदक्षिणा ।।९२।।

चैत्यभक्ति, निर्वाणभक्ति, योगिभक्ति और नन्दीश्वर भक्ति पढ़ते-पढ़ते मंदिर में, निर्वाणक्षेत्रों में, योगियों की व जिनबिम्बों की प्रदक्षिणा करना चाहिए ।

सामायिक से पूर्व दृष्टाष्टक स्तोत्र भी पढ़ें -

सामायिक के लिए श्री जिनमंदिर को जावें। मंदिर का शिखर दिखते ही ‘‘दृष्टं जिनेन्द्र भवनं भवतापहारि..’’ इत्यादि दृष्टाष्टक स्तोत्र को पढ़ते हुए मंदिर के पास पहुँचें अथवा मंदिर के पास पहुँचकर मंदिर की प्रदक्षिणा देते हुए दृष्टाष्टक स्तोत्र पढ़ें ।
पुन: उचित स्थान पर पैर धोकर चैत्यालय के अन्दर प्रवेश करें । ‘‘नि:सही नि:सही नि:सही’’ ऐसा उच्चारण करके श्री जिनेन्द्रदेव के मुख को देखकर नमस्कार करके ‘‘नि:संगोऽहं जिनानां’’ इत्यादिरूप से प्रसिद्ध ‘ईर्यापथशुद्धि’ नामक स्तोत्र को पढ़ें । यदि जिनमंदिर की बाहर से प्रदक्षिणा नहीं है तो इसी ‘नि:संगोऽहं’ स्तोत्र को पढ़ते हुए वेदी में विराजमान जिनेन्द्रदेव की तीन प्रदक्षिणा देवें ।

देववंदना (सामायिक)

पुन: जिनेंद्रदेव के सामने पूर्व या उत्तर मुखकर खड़े होकर या बैठकर ‘‘पडिक्कमामि भंते !’’ यह ईर्यापथशुद्धि का प्रतिक्रमण बोलते हुए सामायिक विधि प्रारंभ करें । सामायिक का उत्कृष्ट काल ६ घड़ी (२ घंटे २४ मिनट) है । मध्यम काल ४ घड़ी (१ घंटे ३६ मिनट) है और जघन्य काल २ घड़ी (४८मिनट) है । इस देववंदना में ईर्यापथशुद्धि, चैत्यभक्ति और पंचगुरुभक्ति को पढ़ने के बाद उपर्युक्त जघन्य, मध्यम या उत्कृष्ट सामायिक के काल में जितना समय शेष रहा हो उतने समय में पिंडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ या रूपातीत ध्यान करें अथवा सिद्धचक्र मंत्र, णमोकार मंत्र आदि का मानसिक या उपांशु जाप्य करें । पुन: यदि गुरु प्रत्यक्ष में हैं तो उनके पास जाकर विधिवत् गुरुवंदना करें और यदि प्रत्यक्ष में नहीं हैं तो परोक्ष में ही लघु तीन भक्तियाँ पढ़कर विधिवत् गुरुवंदना करें । यह त्रिकाल वंदना की विधि है । इससे अतिरिक्त सम्पूर्ण क्रियाओं के-स्वाध्याय,सामायिक, प्रतिक्रमण आदि के प्रारंभ में बाहर आने-जाने आदि में गवासन से बैठकर मात्र नमोऽस्तु शब्द बोलकर वंदना करनी चाहिए’’तथा विशेष कार्यों में कृतिकर्म विधिपूर्वक वंदना करनी चाहिए ।</poem>

अभिषेक वंदना कब और कैसे करें ?

‘‘अहिसेयवंदणासिद्धचेदिपंचगुरुसंतिभत्तीहिं ।’’ सिद्ध, चैत्य, पंचगुरु और शांति भक्ति पढ़कर अभिषेक वंदना की जाती है ।
इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि मुनिगण भी जिनेन्द्रदेव का अभिषेक देखते हैं और उस समय भक्ति पाठ भी करते हैं ।
विशेष - इस युग के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज भी बहुत ही भक्ति से पंचामृत अभिषेक देखते थे पुन: आहार के लिए निकलते थे । वर्तमान में कुछ संघों में पूर्वाण्ह समय ६-७ बजे स्वाध्याय के पहले ही अभिषेक देखते हैं, कुछ संघों में आहार को उठते समय लगभग ९ बजे अभिषेक देखते हैं।

पूर्वाण्ह स्वाध्याय कब और कैसे करें ?

ग्राह्य: प्रगे द्विघटिकादूध्र्वं स प्राक्तनश्च मध्यान्हे । क्षम्योऽपराण्हपूर्वापररात्रेष्वपि दिगेषैव ।।३।। (अन. ध.अ. ९)

प्रात:काल सूर्योदय से दो घड़ी-४८ मिनट के बाद पौर्वाण्हिक स्वाध्याय प्रारंभ करना चाहिए पुन: मध्यान्ह के दो घड़ी पहले तक समापन कर देना चाहिए अर्थात् सूर्योदय के दो घड़ी बाद से लेकर मध्यान्ह से दो घड़ी पहले तक पूर्वाण्ह स्वाध्याय का काल माना गया है ।
इसी प्रकार मध्यान्ह की दो घड़ी बाद से लेकर सूर्यास्त के दो घड़ी पहले तक अपराण्ह के स्वाध्याय का काल है । रात्रि में सूर्यास्त के दो घड़ी बाद से अर्धरात्रि के दो घड़ी पहले तक पूर्वरात्रिक स्वाध्याय का काल है तथा अर्धरात्रि के दो घड़ी बाद से सूर्योदय के दो घड़ी पहले तक वैरात्रिक स्वाध्याय का काल है । तात्पर्य यह है कि चारों संधि कालों में चार-चार घड़ी का काल स्वाध्याय के लिए अकाल है ।
अकाल के और भी भेद हैं यथा - दिक्दाह, बिजली गिरना, वङ्कापात होना, इन्द्रधनुष होना,चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, दुर्दिन, धूमकेतु, भूकंप, भयंकर मेघ गर्जन, अग्नि लग जाना, कलह आदि हो जाना इत्यादि प्रसंगों में अकाल माना गया है ।
इसी प्रकार से अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, आष्टान्हिक पर्व आदि में भी सिद्धान्त ग्रंथों के पढ़ने का निषेध है । यह प्रकरण धवला [१५]पुस्तक ९ में व ‘दिगम्बर मुनि’ पुस्तक में है । सिद्धान्त ग्रंथों को पढ़ने के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव इन चारों की शुद्धि शास्त्रों में कही गई है । इन शुद्धियों का उल्लंघन कर जो अकाल आदि में स्वाध्याय करते हैं उनके ज्ञान की वृद्धि व कर्म निर्जरा आदि के अतिरिक्त ज्ञानावरणीय कर्म का बंध हो जाता है । जैसा कि कहा है -‘‘द्रव्यादिशुद्ध्या ह्यधीतं शास्त्रं कर्मक्षयाय स्यादन्यथा कर्मबंधायेति भाव: ।’’[१६]

सिद्धांथ ग्रंथ कौन-कौन से हैं ?

गणधरदेव, अभिन्नदशपूर्वी आदि महामुनियों द्वारा कथित सूत्रग्रन्थ-सिद्धान्त ग्रंथ हैं । इनके लिए ही द्रव्यादि शुद्धि का विधान है । वर्तमान में षट्खंडागमसूत्र-धवला ग्रंथ, कसायपाहुड़-जयधवला और महाबंध ये ग्रंथ सिद्धान्त ग्रंथ माने जाते हैं अतः इनको अस्वाध्याय काल में नहीं पढ़ना चाहिए । बाकी के आराधनाग्रंथ-भगवतीआराधना आदि, स्तुति ग्रंथ-आप्तमीमांसा आदि, पुराण ग्रंथ आदि अस्वाध्याय काल में पढ़े जा सकते हैं । मुनि और आर्यिकाओं को स्वाध्याय काल में ही सिद्धान्त ग्रंथों को पढ़ना चाहिए ऐसा मूलाचार में कहा है । आगम के अनुसार विनय से पढ़ा गया शास्त्र केवलज्ञान को प्राप्त कराने वाला है ।

आहारचर्या कब और कैसे ?

साधु मंदिर में जाकर मध्यान्ह देववन्दना और गुरुवन्दना करके आहार को निकलते हैं ऐसा मूलाचार टीका, अनगार धर्मामृत आदि में विधान है फिर भी आजकल ९ बजे से लेकर ११ बजे तक के काल में आहार को निकलते हैं । संघ के नायक आचार्य आदि गुरु पहले निकलते हैं उनके पीछे-पीछे क्रम से मुनि, आर्यिकायें, ऐलक, क्षुल्लक और क्षुल्लिकायें निकलते हैं अत: मंदिर में सभी संघ पहुँच जाता है तब मात्र गुरुवंदना करके भगवान् की सामान्य स्तुति वंदना करके निकलते हैं । मुनिगण बायें हाथ में पिच्छी कमंडलु लेकर दाहिने हाथ की मुद्रा को कंधे पर रखकर निकलते हैं । किसी संघ में मुनिगण दाहिने हाथ में पिच्छी और बायें हाथ में कमंडलु लेकर निकलते हैं पुन: दातार के द्वार पर पड़गाहन के बाद बायें हाथ में पिच्छी लेकर दाहिने हाथ की मुद्रा कंधे पर रख लेते हैं ।

नवधा भक्ति

१. पड़गाहन करना २. उच्च आसन देना ३. पाद प्रक्षालन करना ४. अष्टद्रव्य से पूजन करना ५. पंचांग नमस्कार करना ६. मनशुद्धि ७. वचनशुद्धि ८. कायशुद्धि और ९. भोजनशुद्धि कहना ये नवधा भक्ति है ।
जब श्रावक नवधा भक्ति करके ‘‘हे स्वामिन् ! आहार ग्रहण कीजिये ।’’ ऐसी प्रार्थना करके शुद्ध गरम जल से साधु के हाथ धुला देते हैं तब साधु वहीं चौके में पूर्व दिन के ग्रहण किये हुए आहार के त्यागरूप प्रत्याख्यान या उपवास की निष्ठापन क्रिया करते हैं । जैसा कि अनगार धर्मामृत और आचारसार आदि ग्रंथों में लिखा है -
हेयं - त्याज्यं साधुना निष्ठाप्यमित्यर्थ: । किं तत् ? प्रत्याख्यानादि प्रत्याख्यानमुपोषितं वा । क्व ? अशनादौ-भोजनारंभे। कया ? सिद्धभक्त्या । किं विशिष्ट्या ? लघ्व्या ।
अर्थ - साधु चौके में भोजन प्रारंभ करते समय लघु सिद्ध भक्ति के द्वारा पूर्व दिन के ग्रहण किये गये प्रत्याख्यान या उपवास का निष्ठापन करें - त्याग कर देवें ।
(कोई साधु मंदिर में या गुरु के पास ही सिद्धभक्तिपूर्वक प्रत्याख्यान की निष्ठापना करके आहार को जाते हैं । सो समझ में नहीं आया, ऐसा कहीं आगम में विधान नहीं है ।)
पुनः वहीं आहार के अनंतर मुखशुद्धि करके तत्क्षण ही प्रत्याख्यान ग्रहण कर लेवें । सो ही देखिये -
आदेयं च-लघ्व्या सिद्धभक्त्या प्रतिष्ठाप्यं साधुना । किं तत् ? प्रत्याख्यानादि । क्व ? अंते प्रक्रमाद् भोजनस्यैव प्रांते । कथं ? आशु शीघ्रं भोजनानंतरमेव । आचार्यासन्नि-धावेतद्विधेयं ।
साधु शीघ्र ही - भोजन के अनंतर ही आचार्य की अनुपस्थिति में-वहीं चौके में ही लघु सिद्धभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास ग्रहण कर लेवें अर्थात् अगले दिन आहार ग्रहण के पूर्व तक चतुर्विध आहार का त्याग कर देवें या अगले दिन उपवास करना है तो उपवास ग्रहण कर लेवें ।
पुन: श्रावक के घर से निकलकर साधु अपनी वसतिका में आकर आचार्य के समीप गवासन से बैठकर प्रत्याख्यान ग्रहण करें ।
आचार्य के पास में बैठकर साधु लघु सिद्धभक्ति और लघु योगिभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान या उपवास ग्रहण करें अनंतर लघु आचार्य भक्ति पढ़कर आचार्य की वंदना करें ।

गोचार प्रतिक्रमण कब और कैसे करें ?

आचार्यदेव की वंदना के बाद साधुवर्ग गोचार प्रतिक्रमण करें। जिनके घर में आहार हुआ है उनका नाम आदि बताकर आहार में जो कुछ अतिचार आदि लगे हों उनको कहना चाहिए । किन्हीं-किन्हीं संघ में आहार में जो कुछ ग्रहण किया है उन सब वस्तुओं को भी बतलाते हैं यह भी अच्छी परम्परा है । इससे शिष्यों के स्वास्थ्य के अनुकूल-प्रतिकूल वस्तु की जानकारी हो जाने से गुरु उसे अनुकूल वस्तु लेने व प्रतिकूल वस्तु न लेने आदि की शिक्षा भी देते हैं । अनगार धर्मामृत में एक प्रश्न हुआ है कि साधु गुरु के परोक्ष में ही चौके में ही प्रत्याख्यान क्यों ले लेते हैं ? उसका समाधान दिया है कि ‘‘दैवयोग से यदि कदाचित् गुरु के पास आते समय मार्ग में ही आयु समाप्त हो गई तो प्रत्याख्यान के बिना मृत्यु हो जाने से वह साधु विराधक - असमाधि से मरण करने वाला हो जावेगा अत: शीघ्र ही प्रत्याख्यान स्वयं ले लेना चाहिए, फिर आकर गुरु के पास भी लेना चाहिए ।[१७]

विशेष ज्ञातव्य - आजकल किन्हीं संघों में साधु आहार के पहले ही गुरु के पास प्रत्याख्यान निष्ठापन की भक्ति पढ़ लेते हैं और गुरु के पास ही प्रत्याख्यान का त्याग करके आहार को जाते हैं । सो यह परम्परा कैसे चालू हुई कौन जाने ? यह आगमोक्त नहीं है । आचारसार में भी लिखा है कि ‘‘साधु दातार द्वारा पड़गाहन आदि नवधाभक्ति के पूर्ण हो जाने के बाद ही सिद्धभक्ति करके प्रत्याख्यान का निष्ठापन करे पुन: आहार ग्रहण करे ।[१८] क्रियाकलाप में पंडित पन्नालाल जी सोनी ने भी यही विधि लिखी है । यथा - ‘‘भोजन के पहले लघु सिद्धभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास का त्याग-निष्ठापन करें और भोजन के बाद शीघ्र ही लघु सिद्धभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास ग्रहण करें । यह तो आचार्य की असमक्षता में करें । आचार्य के समीप में लघु सिद्धभक्ति, लघु योगिभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास धारण करें । अनन्तर लघु आचार्यभक्ति पढ़कर आचार्य की वंदना करें ।[१९]

मध्यान्ह देववन्दना (सामायिक)

११.३० बजे से मध्यान्ह सामायिक का काल माना गया है । प्रात:कालीन सामायिक-देववंदना के सदृश ही जिनमंदिर में जाकर विधिवत् देववंदना करें । यदि कदाचित् अपनी वसतिका में ही सामायिक करना हो तो भी परोक्ष में ही पूर्ववत् सारी विधि करें ।

दैवसिक प्रतिक्रमण कब करें ?

सूर्यास्त के दो घड़ी (४८मिनट)पहले ही सभी साधु आचार्यश्री के पास उपस्थित होकर ‘नमोऽस्तु’ करके उचित व्यवस्था से बैठकर ‘‘जीवे प्रमादजनिता:’’ आदि पढ़ते हुए दैवसिक प्रतिक्रमण करें । जो पिछली रात्रि में रात्रिक प्रतिक्रमण विधि थी वही प्रतिक्रमण यहां पड़ना है । अंतर इतना ही है कि इसमें अथ सर्वतिचार्विशुद्ध्यार्थं दैव्सिकप्रतिक्रमणक्रियायां बोलना चाहिए ।

रात्रियोग प्रतिष्ठापना कब और कैसे ?

पुन: सभी साधु रात्रियोग ग्रहण कर लेवें । आर्यिकायें अपनी वसतिका में जाकर ही रात्रियोग ग्रहण करें । इसका मतलब यह है कि-‘योगं-अद्य रात्रावत्र वसत्यां स्थातव्यमिति नियमविशेषं ।’’ आज रात्रि में हमें इस वसतिका में ही रहना है । इस नियम विशेष का नाम ‘‘रात्रियोग’’ है ।
रात्रि में मलमूत्रादि विसर्जन के स्थान को साधु दिन में पहले से ही देखकर निश्चित कर लेते हैं, पुन: बाधा होने पर जा सकते हैं अत: उतनी परिधि खुली रखनी चाहिए।

अपराण्हिक देववन्दना विधि

सूर्यास्त के बाद साधु मंदिर जी में या अपनी वसतिका में ही सायंकालीन सामायिक शुरू करें । इसकी सारी विधि ‘पौर्वाण्हिक देववंदना’ के समान ही है । अन्तर इतना ही है कि ‘‘पौर्वाण्हिक’’ के स्थान में ‘अपराण्हिक’ बोलें ।

पूर्वरात्रिक स्वाध्याय कब करें ?

सूर्यास्त के दो घड़ी बाद से पूर्वरात्रिक स्वाध्याय काल शुरू हो जाता है । इस काल को प्रादोषिक काल भी कहते हैं । इस काल में विधिवत् स्वाध्याय करें ।
यदि कदाचित् दीपक, विद्युत दीपक आदि प्रकाश की व्यवस्था न हो सके तो जो पाठ मौखिक याद हैं उन्हें पढ़कर उनके अर्थ का चिंतवन करते हुए स्वाध्याय पूर्ण निष्ठापनविधि करें । इस स्वाध्याय का काल अर्धरात्रि के दो घड़ी (४८ मिनट) पहले तक माना गया है । फिर भी अपने स्वास्थ्य और शक्ति के अनुसार ही जागें, पुन: निद्रा ग्रहण करें ।
वैरात्रिक या अपररात्रिक स्वाध्याय के लिए दिक्शुद्धि का विधान शास्त्रों में नहीं है अत: इस स्वाध्याय के बाद दिक्शुद्धि नहीं करना है । चूंकि पिछली रात्रि में सिद्धांत ग्रंथ पढ़ने का निषेध है ।
इसके बाद एकत्व भावना, वैराग्य भावना आदि का चिंतन करते हुए रात्रि में पाटा, चटाई या घास पर एक पसवाड़े से-एक करवट आदि से सो जावें ।
यह पूर्वरात्रिक अनुष्ठान समाप्त हुआ ।
इस प्रकार दिगम्बर जैन साधु-साध्वियों की दिनचर्या यहाँ बताई गई है ।

टिप्पणी

  1. मूलाचार अ. ४ गाथा १८३।
  2. प्रायश्चित्त ग्रंथ
  3. मूलाचार।
  4. पश्चिम रात्रौ प्रतिक्रमणे। ‘‘मूलाचार टीका’’
  5. मूलाचार गाथा ६०२ की टीका।
  6. अनगार धर्मामृत अध्याय ८।
  7. मूलाचार गाथा ६०२ की टीका।
  8. मूलाचार गाथा ६०३।
  9. अनगार धर्मामृत अध्याय ९, श्लोक ७।
  10. धवला पुस्तक ९, पृ. २५३।
  11. मूलाचार गाथा ६०२ की टीका में।
  12. मैं स्वयं पहले प्रतिक्रमण करके बाद में सामायिक करती हूँ।
  13. अनगारधर्मामृत अ. ९।
  14. अनगारधर्मामृत अ. ९ श्लोक २४।
  15. धवला पुस्तक ९, पृ. २५२ से २५९ तक।
  16. अनगारधर्मामृत अ. ९, श्लोक ४ की टीका।
  17. अनगारधर्मामृत अ. ९, श्लोक ३८।
  18. आचारसार अ. ३, श्लोक ११६ से १२२।
  19. क्रियाकलाप पृ. ४१-४२।