नेमि—राजुल का वैराग्य

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नेमि—राजुल का वैराग्य

तर्ज—एक था गुल और एक थी बुलबुल ..............

सूत्रधार— सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।
नेमिप्रभू और राजुल के वैराग्य का दृश्य दिखाते हैं।।
शौरीपुर के राजा जिनका, नाम समुद्रविजय जी था।
मात शिवादेवी का अतिशय पुण्य जिन्हें सौभाग्य मिला।।
तीर्थंकर के मात—पिता की गौरव गाथा गाते हैं।
सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।।१।।
इन्द्रादिक ने गर्भ, जन्म कल्याणक खुशी मनाई थी।
शौरीपुर की जनता भी जिनशिशु को पा हरषाई थी।।
बाइसवें तीर्थेश कहाए, उनकी महिमा गाते हैं।
सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।।२।।
धीरे-धीरे बड़े हो गए अतुलित काया के धारी।
देखा यौवन जब सबने तब, ब्याह की कर दी तैयारी।
किन्तु जिसे वैराग्य है भाया, नहीं राग मन लाते हैं।
सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।।३।।

मेरे प्यारे मित्रों ! आज मैं आपको एक ऐसी रोमांचक कथा सुनाने जा रहा हूँ जिसके जीवन में घटे एक घटना चक्र ने उसके जीवन की दशा ही बदल दी। जी हां ! आप बिल्कुल सही समझे, ये कथा है नेमि–राजुल के वैराग्य की, आइए, ले चलते हैं उस नगरी में, जहां चारों ओर खुशियां ही खुशियां छाई हैं क्योंकि अपने नेमि राजा का विवाह जूनागढ़ के राजा उग्रसेन की सर्वांग सुन्दरी राजीमती के साथ होना निश्चित हुआ है। तो चलिए देखते हैं नगरी का दृश्य—

—प्रथम दृश्य—

एक श्रावक—(दूसरे से) अरे भाई सुना आपने ! अपने राजा समुद्रविजय ने अपने राजकुमार नेमिनाथ का विवाह राजा उग्रसेन की पुत्री से तय कर दिया है।

दूसरा श्रावक—हां, हां भाई ! वह राजकुमारी तो इतनी सुन्दर है कि कोई उसे देखे तो बस देखता ही रह जाए।

एक श्राविकाभैय्या ! इसीलिए तो यह नगरी दुल्हन की तरह सजी है। सचमुच, युवराज नेमि और राजुल कुमारी की जोड़ी कितनी सुन्दर लगेगी।

दूसरी श्राविका—हां, हम सब उस समारोह में अवश्य जाएंगे।

तीसरा श्रावक—भाइयों, बहनों ! अब तो हमें घर चलकर चलने की तैयारी करनी चाहिए क्योंकि हमारे राजकुमार अपने राजपरिकर के साथ जूनागढ़ रवाना होने ही वाले हैं।

सभी—चलो, चलो, जल्दी चलते हैं। ऐसा विवाह कौन नहीं देखना चाहेगा। (सभी नर-नारी दिव्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो युवराज नेमिनाथ के विवाह उत्सव में भाग लेने के लिए राज परिवार के साथ रवाना हो जाते हैं।)

—दूसरा दृश्य—

(जूनागढ़ का दृश्य)

वहां की जनता आपस में वार्तालाप कर रही है—

श्रावक(1)—भैय्या ! आज तो अपनी राजुलकुमारी का ब्याह है, बस अब बारात आने ही वाली होगी।

श्रावक (2)—हां भाई ! अपनी राजुल के तो भाग्य खुल गए, जिसका गर्भ और जन्मकल्याणक स्वयं इन्द्रादि देवों ने स्वर्ग से आकर मनाया उसके संग ब्याह।

श्राविका—हां भाई ! तीर्थंकर कहलाने वाले महापुरुष को पाकर राजकुमारी तो धन्य हो जाएगी।

श्राविका—भई ! ये सब तो महान पुण्य के प्रताप से मिलता है।

श्रावक (३)—अब देखो ना ! वर पक्ष ने रत्नों की पच्चीकारी का कैसा सुन्दर मण्डप तैयार करवाया है, उसमें सोने के खम्बे लगवाए हैं।

श्रावक (४)—(आश्चर्य से) क्या कहा ? सोने के खम्बे ?

श्रावक (३)—हां भाई ! इसमें आश्चर्य कैसा, उसे तो बेशकीमती रेशमी वस्त्रों, छत्र, चंवर, मोतियों की झालर और फूलमाला आदि से सजाया गया है।

श्राविका (३)—हां, मैं तो उस मण्डप को कई बार देख आई पर मेरा मन है कि भरता ही नहीं है, बार-बार वहीं जाने को जी करता है।

श्राविका (४)—और सुनो ! वहां तो सदावर्त दान बंट रहा है। वहां एक लम्बा-चौड़ा सोने का पट्टा रखा है, उसके चारों ओर मंगल द्रव्य लगे हैं और देवांगनाएं और स्त्रियां वहां सुन्दर-सुन्दर गीत गा रही हैं।

सभी—(खुश होकर) अच्छा ! चलो, चलो, हम सब भी उस समारोह में सम्मिलित होते हैं और बस बारात भी आने वाली होगी।

(यहां नृत्य संगीत का कार्यक्रम दिखावें)

(आस-पास महिलाएं बैठी हैं, पास में दिव्य सिंहासन पर राजुल सखियों के साथ बैठी है, नृत्य, संगीत और आमोद-प्रमोद चल रहा है। तभी ढोल-नगाड़ों की आवाज सुनाई देती है)

(१) महिला—अरे, अरे ! लगता है बारात आ गई।

(२) महिला—चलो, चलो, सभी देखते हैं।

(सभी झरोखे से खड़ी होकर बारात देखने लगती हैं और नेमि की सुन्दरता और राजुल के भाग्य की प्रशंसा करती हैं। बारात का भव्य स्वागत किया जाता है। वर पक्ष को योग्य स्थान पर ठहरा दिया जाता है। उस समय बारात कई दिनों तक ठहरती थी। दो दिन तक पूर्व की क्रियाएं सम्पन्न होती हैं, तीसरे दिन नेमिनाथ अपने मित्रों एवं मंत्री आदि के साथ घूमने के लिए निकलते हैं, तभी अचानक क्या होता है)

—तीसरा दृश्य—

सूत्रधार— चले नेमि मित्रों के संग में, सोचा था विचरण कर लें।

मनभावन इस मौसम को, अपने अन्तस में हम भर लें।।
किन्तु नहीं विश्वास था जिस पर, दृश्य वही दिख जाते हैं।
सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।
थोड़ा आगे बढ़े तो देखा, कांटों की है बाड़ लगी।
नाना पशुगण बंधे वहां, क्रन्दन एवं चीत्कार मची।।
पूछा जब तो कहा म्लेच्छ भोजन हेतू बंधवाते हैं।
सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।
दृश्य करुण देखा नेमी ने, उनका मन चीत्कार उठा।
मेरे ब्याह हेतु इन पशुओं, का वध कैसा स्वांग अहा।।
दयाभावयुत नेमी बोले अभी मुक्त करवाते हैं।

सुनो बन्धुओं ! आज तुम्हें रोमांचक कथा सुनाते हैं।

प्यारे भाइयों ! पूरे नगर में खुशियां छाई थीं लेकिन किसे पता था कि अभी थोड़ी ही देर में वह खुशियां दुख में परिर्वितत होने वाली हैं। राजा उग्रसेन ने सभी बारातियों का खूब अच्छे से स्वागत-सत्कार किया। दो दिन पश्चात् नेमि स्वामी अपने मित्रों, मंत्रियों और वहां के नागरिकों के साथ भ्रमण हेतु निकले, थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने देखा कि खूब सारे पशु कांटेदार बाड़े में बन्द हैं और भूख-प्यास के मारे चिल्ला रहे हैं, बिलबिला रहे हैं, मूर्छा खा-खाकर इधर-उधर गिर पड़ रहे हैं। उनकी यह दशा देखकर भगवान ने उनके रक्षक लोगों से पूछा—

नेमिनाथ—सैनिकों ! ये मृग आदि यहाँ क्यों रोके गए और किसलिए इन्हें इकट्ठा करके इतना कष्ट दिया जा रहा है ?

सैनिक—(हाथ जोड़कर) प्रभो ! क्षमा करें। आपके विवाह में जो म्लेच्छ राजा लोग आए हैं, उनके भोजन के लिए इनको यहाँ इकट्ठा करवाया है।

नेमिनाथ—(कानों पर हाथ रखकर) हे भगवन् ! यह मैं क्या सुन रहा हूँ। यह महानर्क में ले जाने वाला पशुवध हमारे कुल में आज तक नहीं हुआ, यह महापाप है।

(तभी चिन्तन कर नेमिनाथ अपने अवधिज्ञान से सब जान लेते हैं और कहते हैं)

ओह ! मेरे साथ इतना बड़ा छल ! इस असार संसार को धिक्कार है, जहाँ तृष्णावश प्राणी इतने बड़े-बड़े पाप कर डालते हैं। पंचेन्द्रिय के विषय भोग और सात व्यसनों में फंसकर ही यह जीव घोर नरक के दुख उठाता है।

(ऐसा सोचते–सोचते नेमिनाथ स्वामी को वैराग्य हो जाता है और वह बारह भावनाओं का चिन्तन करने लगते हैं। और अपने सभी आभूषण एक-एक कर उतार देते हैं)

विशेष—(यहाँ एक ओर नेमिनाथ को बारह भावनाओं का चिन्तन करते हुए और दूसरी ओर सूत्रधार द्वारा एक-एक भावनाओं के नाम पट्टी पर दिखाकर उसका वर्णन करते हुए दिखला सकते हैं)

—शंभु छन्द—

अनित्य— यह सांसारिक वैभव चंचल, बिजली सम नश्वर दुखकर।
आज जो बन्धू कल शत्रू है, आत्मा केवल अविनश्वर।।
मरना सबको एक दिवस, यह देह भी नहीं हमारा है।
इसीलिए ज्ञानीजन ने, शिवपथ मारग स्वीकारा है।।१।।
अशरण— दल बल देवी और देवता, मात पिता बन्धू प्यारे।
मृत्यु समय निंह कोई शरण है, कोई न हैं राखनहारे।।
त्रिभुवन में भविजन के हेतू, देव शास्त्र गुरु परम शरण।
मोक्षप्राप्ति हेतू कारण हैं, वह ही तारण और तरण।।२।।
संसार— मिथ्या मोह महातम छाया, यह संसार महा विकराल।
कोइ जीव निंह कहीं सुखी है, बिछा यहां पर मायाजाल।।
ऐसी इस जग अटवी में, रत्नत्रय रूपी सुख मारग।
जिसे मिले वह प्राणी समझो, मुक्ती के हो जाए निकट।।३।।
एकत्व— जीव स्वयं ही पुण्य पाप से, सुख दुख को भोगा करता।
मरे अकेला जिए अकेला, संगी साथी निंह होता।।
पाप करे से नरक पशूगति, पुण्य करे नर-सुर बनता।
रत्नत्रय आराधे तो मुक्तीकान्ता का वर होता।।४।।
अन्यत्व— क्षीर जलधि सम एकमेक आत्मा शरीर इस प्राणी का।
आठ कर्म के सम्बन्धों से चतुर्गती परिभ्रमण किया।।
देह छूटते कोई न अपना, मेले में पन्थीजन सम।
नेह वहीं तक जहाँ देह है, सदा संग है एक धरम।।५।।
अशुचि— यह शरीर अपवित्र मलिन है, कितना श्री शृंगार करे।
केसर, चन्दन आदि सुगन्धित, श्रेष्ठ वस्तु अपवित्र बनें।।
जल का है आधार पात्र ज्यों, आत्मा का आधार शरीर।
मूरख उसको अपना माने, धर्मरहित हो रहें अधीर।।६।।
आस्रव— छिद्ररहित नौका में जल सम, जीव में आस्रव आते हैं।
सत्तावन भेदोंयुत यह, प्राणी को नाच नचाते हैं।।
इसे जानकर भवि प्राणी, इनसे बचने का यतन करें।
मोहनींद को जीत सके तो कर्मचोर निंह पास भ्रमें।।७।।
संवर— जलसंचय हेतू जैसे पुल, कर्मास्रव को रोके संवर।
नानाविध सुखों का दाता, कहते हैं सब सन्तप्रवर।।
गुरुदेव कहें उठ भवि प्राणी, अब मोहनींद को तज दे तू।
दश धर्म, परीषह आदि धार, चारित भी धारण कर ले तू।।८।।
निर्जरा— बाह्याभ्यन्तर तप द्वारा जो कर्मों को अपने नष्ट करें।
अपने मनरूपी बन्दर को सन्तोष की रस्सी से कस दें।।
तप चिन्तामणि, तप कल्पवृक्ष, इच्छा निरोध तप माना है।
इस तप की महिमा ग्रंथ पुराणों ने भी खूब बखाना है।।९।।
लोक— यह लोक अनादिनिधन अनन्त, आकार मनुष्याकार कहा।
छह द्रव्यों से है भरा हुआ, त्रय वातवलय से घिरा सदा।।
अज्ञानी प्राणी ज्ञान बिना, त्रय लोक भ्रमण कर दुखी रहा।
जिसने शुद्धातम ध्यान किया, वह लोकशिखर पर तिष्ठ रहा।।१०।।
बोधिदुर्लभ— धन-कन कंचन आदिक वैभव, थोड़े श्रम से मिल जाते हैं।
पर सम्यग्दर्शन मणि दुर्लभ, विरले ही उसको पाते हैं।।
जो रत्नत्रय को धार सके, उससे बढ़कर निंह पुण्यात्मा।
संसार समुद्र तिरे निश्चित, निकटस्थ है संसारी आत्मा।।११।।
धर्म— जो चतुर्गती से निकालकर, उत्तम सुख में पहुंचाता है।
भवि स्वर्ग-मोक्ष का दाता वह, जिनधर्म एक कहलाता है।।
बिन मांगे बिन चिंते सब दे, यह धर्म परम सुखदायी है।
जिनधर्म की शरण लहो प्राणी, यह बात'इंदु'मन भाई है।।१२।।

(और इस प्रकार बारह भावनाओं को भाते-भाते भगवान को वैराग्य हो जाता है, तत्क्षण ही स्वर्ग से लौकान्तिक देव आकर भगवान के तप की अनुमोदना करने लग जाते हैं)

—अगला दृश्य—

लौकान्तिक देव (१) —हे भगवान् ! इस संसार में कहीं भी सुख नहीं है, सुख तो उसी में है जिसे आपने मन में करने का विचार किया है।

लौकान्तिक देव (२) —प्रभो ! आप संसार समुद्र से पार करने वाले संयम को ग्रहण कीजिए और फिर केवलज्ञान प्राप्त करके जीवों को दिव्य अमृत प्रदान कीजिए।

लौकान्तिक देव (३) —भगवान् ! आप स्वयंसिद्ध हैं। हम जैसे अज्ञानी आपको मोक्षमार्ग क्या बता सकते हैं ?

लौकान्तिक देव (४) —परन्तु नाथ ! आपकी चरणसेवा करने का हमारा नियोग है, वह हमें पूरा करना पड़ता है ?

लौकान्तिक देव (५) —प्रभो ! संसार में ऐसा कौन उपदेशक है जो सूरज को प्रकाश करना बता सके। उसी प्रकार आपके समान ज्ञानी को कौन प्रबोध दे सकता है ?

लौकान्तिक देव (६) —हे जगत्बन्धु ! आप तो स्वयं ही केवलज्ञानी होकर हमें प्रबोध देंगे।

लौकान्तिक देव (७ ± ८) —(पुष्पवृष्टि कर) जय हो, जय हो, नेमिनाथ स्वामी की जय हो।

सूत्रधारइस प्रकार भक्ति से भगवान की प्रार्थना कर सभी देवतागण अपने-अपने स्थान पर चले गए। इसके बाद अन्य देवतागण व विद्याधर राजा आदि ने भगवान का जय-जयकार कर उन्हें सिंहासन पर बिठाया, नाना प्रकार के बाजे बज उठे, देवताओं ने तीर्थों के जल से भगवान का अभिषेक किया। पुन: सुगन्धित द्रव्यों का लेपन कर भगवान को दिव्य वस्त्राभूषण पहनाए, उस समय ऐसा लग रहा था कि नेमिनाथ स्वामी मुक्तिकन्या का वरण करने जा रहे हैं। देवताओं ने भगवान के सामने रत्नमयी पालकी रखी और भगवान उसमें बैठ गए और सहस्राम्र वन में जाकर सिद्धों की साक्षीपूर्वक दीक्षा ले ली। उधर देवांगना समान राजीमती और उनके परिकर ने यह समाचार सुना तो सभी का मन अत्यन्त दुखी हो उठा। सुख के क्षण दुख में परिर्वितत हो उठे, सबकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। सच ही कहा है

बन्धू—क्या कोई नर है इस जग में
विधि का विधान जो टाल सके।
होनी तो होकर रहती है
निंह होनहार कोई टाल सके।।

आइए, आपको जूनागढ़ के उसे महल में ले चलते हैं, जहाँ इस समाचार से सभी पर वज्रपात हो उठा है।—

—अगला दृश्य—

(जूनागढ़ का दृश्य)

(कुछ सखियाँ दौड़ी-दौड़ी आती हैं और राजुल से कहती हैं) (सोलह शृंगार किए राजुल बैठी है)

सखी (१)—(राजुल से) अरी राजुल ! गजब हो गया, नेमिनाथ तो मण्डप छोड़कर चले गए।

सखी (२)—हाँ, सुना है उन्होंने दीक्षा भी ले ली और सहस्राम्र वन में तपस्या में लीन हो गए।

सखी (३)—मैंने तो सब देखा है फिर भी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा है।

राजुल(अधीर होकर) क्या कहा ? (चकरा जाती है) नहीं, नहीं। ऐसा नहीं हो सकता, मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते हैं। (रोने लगती है)

सखी (४)—(दुखी होकर)लेकिन बहना, वह तो तुम्हें छोड़कर चले

राजुल—(रोते हुए) मुझसे ऐसा क्या अपराध हो गया जो मेरे स्वामी मुझे छोड़कर चले गए। कोई तो बताए ऐसा क्या हुआ ? (सखी को पकड़कर) बोलो सखी, क्या बात हुई थी ?

सखी (१)—राजुल ! सुना है कि नेमि राजा घूमने के लिए निकले थे, तभी वहां एक कांटेदार बाड़े में खूब सारे पशुओं को बंधे देखा जो करुण क्रन्दन कर रहे थे, उन पशुओं का रोना और यह सुनना कि वह म्लेच्छों के भोजन हेतु बांधे गए हैं, उनसे सहन नहीं हुआ और.......

राजुल—(व्याकुल होकर) और क्या सखी ! जल्दी बोलो !

सखी (१)—बस नेमि स्वामी को वैराग्य हो गया और उन्होंने वन में जाकर दीक्षा धारण कर ली। (तभी राजुल के माता-पिता आ जाते हैं, उनकी भी आँखों में अश्रु हैं। राजुल दौड़कर उनसे लिपट जाती है)—

राजुल—(दौड़कर) माँ ! पिताश्री ! यह क्या हो गया ? मेरे स्वामी कहां चले गए ? राजा उग्रसेनपुत्री ! धीरज धरो, सब ठीक हो जाएगा।

माता(सिर पर हाथ फेरकर) पुत्री ! हम तुम्हारे लिए इससे अच्छा वर ढूंढेंगे, तुम जरा भी दुखी मत होवो। (भगवान से) हे प्रभु ! ये अनर्थ मेरी ही पुत्री के साथ होना था।

राजुल—(पुन: सखियों से कहती है)— कहां गए वह नेमि पिया रे, कैसे मैं रह पाऊंगी।

मेरी सखी ले चल तू वहां पर, उनको वापस लाऊंगी।।

क्या सोचा जो मुझको छोड़ा, क्यों सब नाता तोड़ दिया।
सात भवों का अपना नाता, पल भर में सब छोड़ दिया।।
उनके बिन यह जीवन सूना, इक पल निंह जी पाऊंगी।
कहां गए वह नेमि पिया रे, कैसे मैं रह पाऊंगी।।१।।
एक बार तो मिल लेते, क्या दोष मेरा सखि बतलाओ।
कैसा भी तुम जतन करो, मेरे नेमि पिया को ले आओ।।
उनकी हर आज्ञा मानूंगी, उन संग बस मैं जाऊंगी।
कहां गए वह नेमि पिया रे, .......... (रोने लगती है।)

सूत्रधार—(सभी सखियां एवं माता-पिता उसे धीरज बंधाते हैं किन्तु उसके कोमल मन पर इस घटना से अत्यन्त आघात लगा, कुछ क्षण के लिए वह किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो गई। पुन: कुछ समय बाद जब विवेकरूपी मणि के प्रकाश से उसका मोहरूपी अंधकार नष्ट हो गया, तब वह जिनधर्म का मर्म समझकर विषय भोगों से विरक्त हो उठी)—

—अगला दृश्य—

(माता-पिता, परिजन एवं सखियाँ सभी राजुल के आस-पास बैठे हैं, तभी राजुल बोल उठी)—

राजुल—(माता से) माँ ! आप तो कहती हैं कि इस संसार में जिनधर्म के अतिरिक्त कोई भी अपना नहीं है।

माता—(राजुल के सिर पर हाथ फेरकर) हां पुत्री ! यह सब तो स्वारथ का नाता है, जो जिनेन्द्र भगवान की शरण में जाता है उसे सब सुख स्वयं प्राप्त हो जाते हैं।

राजुल—(पिता से) पिताश्री ! आपने ही तो बताया था कि पहले अनेकों तीर्थंकर भगवन्तों ने सब राज्य वैभव छोड़कर जिनदीक्षा ले ली और उनके साथ उनकी रानियों ने भी दीक्षा ले ली ?

पिताश्री—हां बेटी ! बताया था, किन्तु इस समय इन बातों का क्या प्रयोजन ! अब तो तू अपने भविष्य की चिन्ता कर, मैं शीघ्र ही तुम्हारे योग्य.........

राजुल (बीच में ही)—पिताश्री ! भविष्य की ही तो बात कर रही हूं। अब मुझे भी वहीं जाना है जहाँ मेरे नेमि स्वामी गए हैं।

माँ—(आश्चर्य से आँखों में अश्रु भरकर) क्या कहा ? तू वहां जाएगी ? वैरागन बन जाएगी ?

राजुल—हाँ माँ ! हाँ पिताजी ! अब मुझे भी वास्तविक बोध हो गया है। वास्तव में यह संसार असार है। वास्तविक सुख मोक्षसुख है जिसे पाने के लिए मेरे स्वामी ने दीक्षा ली और अब वही दीक्षा मुझे भी लेनी है, उन्हीं के पादमूल में जाकर मुझे भी घोर तप करके इस स्त्रीिंलग का छेद करना है।

सखियाँ—नहीं, नहीं ! राजुल ! ऐसा मत करो, हम तुम्हारे बिना नहीं रह सकती हैं।(रोने लगती हैं)

राजुल—सखियों ! ऐसे सम्बन्ध तो हमने भव-भव में बनाए और उन्हें यूं ही रोता-बिलखता छोड़ दिया, अब तो कुछ ऐसा करना है कि जिसके बाद रोना ही न पड़े, जिसके बाद भव-भव में ये रिश्ते-नाते जोड़ने ही न पड़ें। आप सब मुझे सहर्ष आज्ञा दें कि मैं इस संयम पथ पर आगे बढ़ सकू।

राजुल सुन री सखी, सुनो मात-पिता, अब राजुल वन को जाती है।

जहां गए हैं नेमि वहीं, दीक्षा ले कर्म नशाती है।।
यह संसार असार यहाँ निंह, कोई नाता सच्चा है।
मोक्षपथिक बनने के हेतू, तप ही करना अच्छा है।।
इसीलिए अब तेरी राजुल, संयम पथ अपनाती है।
सुन री सखी सुनो मात-पिता, अब राजुल वन को जाती है।।१।।
दीक्षा लेकर बनूं र्आियका, मात मुझे आज्ञा दे दो।
हे पितु अपनी इस पुत्री को, संयम पथ पर चलने दो।।
वरुंगी सखि अब मोक्ष को जिससे, शिवरमणी मिल जाती है।
सुन री सखी सुनो मात-पिता, अब राजुल वन को जाती है।।२।।

सूत्रधार—और इस प्रकार राजुल सोलह शृंगार को उतारकर श्वेत वस्त्र धारण कर वन की ओर चली जाती है। बन्धुओं ! यह संक्षिप्त कथा है उन नेमि और राजुल की, जिन्होंने संयम पथ पर चलकर अनेक शिक्षाएँ हमें प्रदान की दीं कि कभी भी हमें जीविंहसा नहीं करना है। अपनी जिह्वालोलुपता के लिए मूक, निरीह पशुओं का वध नहीं होने देना है। कुलीन कन्याओं के लिए यही उचित है कि एक बार वाग्दान हो जाने पर अन्य पति का वरण न करें, यही भारतीय संस्कृति है तथा इस संसार में माता-पिता, पुत्र-मित्र आदि कुटुम्बीजन सब स्वारथ का नाता है, केवल और केवल, बस एक जिनधर्म ही हमारे लिए शरणभूत है।)

जय बोलो जिनधर्म की जय, जय बोलो नेमि-राजुल की जय