बंधप्रत्यय

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बंधप्रत्यय

बंध प्रत्यय अर्थात् बंध के कारण चार माने हैं। श्री गौतमस्वामी ने प्रतिक्रमण पाठ में अनेक बार—

चउण्णं पच्चयाणं[१]। ‘‘चउसु पच्चएसु[२]।।’’

टीकाकारों ने मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ऐसे नाम दिये हैं। षट्खण्डागम में तो अनेक स्थलों पर ये प्रत्यय चार ही माने हैं। षट्खण्डागम में तृतीय खण्ड का नाम ही ‘‘बंध स्वामित्व-विचय’’ है। धवला पु. ८ में देखिए—

‘मिच्छत्तासंजमकसाय-जोगा इदि एदे चत्तारि मूलपच्चया।[३]'

अर्थात् मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योग ये चार मूल प्रत्यय है। इनके भेद ५७ हैं। मिथ्यात्व के ५, अविरति के १२, कषाय के २५ एवं योग के १५ भेद होते हैं।

विशेष — यहाँ यह बात ध्यान में रखना है कि—जो बन्ध के कारण हैं वे ही कर्म के आस्रव के कारण हैं। अत: ‘आस्रव त्रिभंगी’ छोटा सा ग्रंथ है, इसमें भी इन्हीं चार भेद के ५७ भेद करके गुणस्थान और मार्गणाओं में आस्रव, अनास्रव व आस्रव व्युच्छित्ति को अच्छी तरह समझाया गया है। समयसार ग्रंथ में श्री कुन्दकुन्ददेव ने भी कहा है—

सामण्णपच्चया खलु, चउरो भण्णंति बंध कत्तारो।
मिच्छत्तं अविरमणं, कसायजोगा य बोद्धव्वा[४]।।१०९।।

अर्थ — सामान्य से बंध के करने वाले प्रत्यय—कारण चार हैं। मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग। ऐसा जानना चाहिये। मूलाचार में भी चार प्रत्यय माने हैं-मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग।

मिच्छत्तं अविरमणं कषाय जोगा य आसवा होंति।
अरिहंत वुत्तअत्थेसु विमोहो होइ मिच्छत्तं।।२३६।।[५]

आगे श्री उमास्वामी आचार्यदेव ने बंध के पांच कारण माने हैं। देखिये—तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ८ का प्रथम सूत्र-

मिथ्यादर्शनाविरति-प्रमादकषाययोगा बंधहेतवः।।१।।

यहाँ मिथ्यात्व के ५ भेद, अविरति के १२, प्रमाद के १५, कषाय के २५ व योग के १५ भेद लिये हैं। सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ में श्री पूज्यपाद स्वामी ने अनेक भेद कहे हैं—

सूत्रार्थ -
मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बन्ध के हेतु हैं[६]।।१।।

मिथ्यादर्शन दो प्रकार का है—नैसर्गिक और परोपदेशपूर्वक। इनमें से जो परोपदेश के बिना मिथ्यादर्शन कर्म के उदय से जीवादि पदार्थों का अश्रद्धानरूप भाव होता है वह नैसर्गिक मिथ्यादर्शन है तथा परोपदेश के निमित्त से होने वाला मिथ्यादर्शन चार प्रकार का है—क्रयावादी, अक्रियावादी, अज्ञानी और वैनयिक। अथवा मिथ्यादर्शन पाँच प्रकार का है—एकान्त मिथ्यादर्शन, विपरीतमिथ्यादर्शन, संशयमिथ्यादर्शन, वैनयिकमिथ्यादर्शन और अज्ञानिक मिथ्यादर्शन। यही है, इसी प्रकार का है इस प्रकार धर्म और धर्मों में एकान्तरूप अभिप्राय रखना एकान्त मिथ्यादर्शन है। जैसे यह सब जग परब्रह्मरूप ही है, या सब पदार्थ अनित्य ही हैं या नित्य ही है।। सग्रन्थ को निग्र्रन्थ मानना, केवली को कवलाहारी मानना और स्त्री सिद्ध होती है इत्यादि मानना विपर्यय मिथ्यादर्शन है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यव्चारित्र ये तीनों मिलकर क्या मोक्षमार्ग है या नहीं, इस प्रकार किसी एक पक्ष को स्वीकार नहीं करना संशय मिथ्यादर्शन है। सब देवता और सब मतों को एक समान मानना वैनयिक मिथ्यादर्शन है। हिताहित की परीक्षा से रहित होना अज्ञानिक मिथ्यादर्शन है कहा भी है—‘‘क्रियावादियों के एक सौ अस्सी, अक्रियावादियों के चौरासी, अज्ञानियों के सड़सठ और वैनयिकों के बत्तीस भेद हैं।

छहकाय के जीवों की दया न करने से और छह इन्द्रियों के विषय भेद से अविरति बारह प्रकार की है। सोलह कषाय और नौ नोकषाय ये पच्चीस कषाय हैं। यद्यपि कषायों से नोकषायों में थोड़ा भेद है पर वह यहाँ विवक्षित नहीं है, इसलिए सबको कषाय कहा है। चार मनोयोग, चार वचनयोग और पाँच काययोग ये योग के तेरह भेद हैं। प्रमत्तसंयत गुणस्थान में आहारक ऋद्धिधारी मुनि के आहारककाययोग और आहारक मिश्रकाययोग भी सम्भव हैं इस प्रकार योग पन्द्रह भी होते हैं। शुद्ध्यष्टक और उत्तम क्षमा आदि विषयक भेद से प्रमाद अनेक प्रकार का है। इस प्रकार ये मिथ्यादर्शन आदि पाँचों मिलकर या पृथक़-पृथक़ बन्ध के हेतु हैं।

स्पष्टीकरण इस प्रकार है—मथ्यादृष्टि जीव के पाँचों ही मिलकर बंध के हेतु हैं। सासादन-सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और अविरतसम्यग्दृष्टि के अविरति आदि चार बंध के हेतु हैं। संयतासंयत के विरति और अविरति ये दोनों मिश्ररूप तथा प्रमाद, कषाय और योग ये बन्ध के हेतु हैं। प्रमत्तसंयत के प्रमाद, कषाय और योग ये तीन बन्ध के हेतु हैं। अप्रमत्तसंयत आदि चार के योग और कषाय ये दो बन्ध के हेतु हैं। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली इनके एक योग ही बन्ध का हेतु है। अयोगकेवली के बन्ध का हेतु नहीं है।

द्रव्यसंग्रह में मूल में पाँच भेद मानकर उनके प्रभेद कम किये है। यथा—

मिच्छत्ताविरदिपमाद-जोगकोहादओथ विण्णेया।
पण पण पण दह तिय चउ, कमसो भेदा दु पुव्वस्स।।३०।।[७]

अर्थ — पाँच मिथ्यात्व, पाँच अविरति, पंद्रह प्रमाद, तीनयोग और चार कषाय ये बत्तीस भेद भी भावास्रव के होते हैं। गोम्मटसार कर्मकाण्ड में बन्धप्रत्यय के भेद—


मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा य आसवा होंति।

पण बारस पणुवीसं पण्णरसा होंति तब्भेया[८]।।६८६।।

अर्थ — मिथ्यात्व—अविरति—कषाय और योग, ये चार मूल आस्रव हैं तथा इनके उत्तर भेद क्रम से ५,१२, २५ और १५ जानने। इस प्रकार आस्रवों के उत्तर भेद ५७ हैं। अथानन्तर मूल प्रत्ययों को गुणस्थानों में कहते हैं—


चदुपच्चइगो बंधो पढमे णंतरतिगे तिपच्चइगो।

मिस्सगविदियं उवरिमदुगं च देसेक्कदेसम्मि।।७८७।।
उवरिल्लपंचये पुण दुपच्चया जोगपच्चओ तिण्हं।
सामण्णपच्चया खलु अट्ठण्हं होंति कम्माणं।।७८८।।

अर्थ — मिथ्यात्वगुणस्थान में चारों प्रत्ययों से बन्ध होता है अनन्तर सासादनमिश्र व असंयत इन तीन गुणस्थानों में मिथ्यात्व बिना तीन प्रत्ययों से बन्ध होता है, (देश अर्थात् िंकचित् असंयम जहाँ है उसको दिशति—त्यागे ऐसे) देशसंयतगुणस्थान में अढ़ाई प्रत्यय हैं। (यहाँ विशेषता यह है कि अविरतिप्रत्यय विरति से मिश्रित हुआ है शेष दो प्रत्यय पूर्ण), आगे प्रमत्त से सूक्ष्मसाम्पराय—गुणस्थानपर्यन्त एक योग प्रत्यय ही है। इस प्रकार सामान्य से आठ कर्मों के प्रत्यय गुणस्थानों में जानना चाहिए।

इन दो प्रकार से कहे बंध अथवा आस्रव के कारणों को समझ कर उन-उन आचार्यों की कृति में परिवर्तन या परिवर्धन नहीं करना चाहिये।

श्री गौतमस्वामी, श्री पुष्पदंत-भूतबली आचार्य, श्रीकुन्दकुन्ददेव के कथित ग्रंथों में बंध के चार कारण व उनके ५७ भेदों को समझना चाहिये। आगे श्री उमास्वामी आचार्य व श्री नेमिचंद्राचार्य आदि आचार्यों के प्रमाद सहित पाँच भेदों को व उनके प्रभेदों को भी उनके टीका ग्रंथों से जानना चाहिये।

हमारे व आपके लिये ये सभी आचार्य देव प्रमाणीक हैं व उनके ग्रन्थ प्रमाणीक हैं।

बंध प्रत्यय-बंध के कारण में अन्तर ग्रन्थ बंध प्रत्यय संख्या नाम उत्तर भेद १. प्रतिक्रमण पाठ ४ मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, योग ५७ २. षट्खण्डागम ध. पु. ८ ४ मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, योग ५७ ३. आस्रव त्रिभंगी ४ मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, योग ५७ ४. समयसार ४ मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग अनेक ५. मूलाचार ४ मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ५७ ६. गोम्मटसार कर्मकाण्ड ४ मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ५७ ७. तत्त्वार्थसूत्र ५ मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग ७२ ८. सर्वार्थसिद्धि ५ मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग अनेक ९. द्रव्यसंग्रह ५ मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग और कषाय ३२


टिप्पणी

  1. मुनिचर्या पृ. २५।
  2. मुनिचर्या पृ. १३५-१६९।
  3. धवला पुस्तक-८ पृ. १९-२०।
  4. समयसार पृ. ३९३।
  5. मूलाचार, पृ. २००।
  6. सर्वार्थसिद्धि अध्याय ८, सूत्र-१, पृ. २९१ से २९३
  7. द्रव्यसंग्रह, गाथा-३०।
  8. गोम्मटसार कर्मकाण्ड (आचार्य शिवसागर दिगम्बर जैन ग्रंथमाला से प्रकाशित) पृ. ७०९ से ७११।