भरत चक्रवर्ती सिद्ध भगवान का परिचय

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भरत चक्रवर्ती सिद्ध भगवान का परिचय

युग की आदि में भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर हुए हैं और उनके ज्येष्ठ पुत्र ‘‘भरत’’ चक्रवर्ती हुए हैं। भरत का अपने पिता तीर्थंकर ऋषभदेव के समान ही चैत्र कृ. नवमी के दिन जन्मे थे। यशस्वती महादेवी ने रात्रि के पिछले प्रहर में ६ स्वप्न देखे थे-सुमेरु पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, हंससहित सरोवर, चंचल लहरो वाला समुद्र, ग्रसित होती हुई पृथ्वी देखा। ये सब मंगल स्वप्न देखने से तुम्हारे चक्रवर्ती पुत्र का जन्म होगा। माता यशस्वती के स्तन का पान करता हुआ जब भरत दूध के कुरले को बार-बार उगलता था, तब ऐसा लगता कि मानों वह अपना यश ही दिशाओं में बांट रहा है।

उन्हीं के समान तीनों लोकों को उल्लंघन करने वाला देदीप्यमान शरीर था, भरत को देखकर उस समय प्रजा के लोग कहा करते थे-अहो! आत्मा बै पुत्रनामासीत्-पिता की आत्मा ही पुत्र नाम से कहा जाता है, यह बात बिल्कुल सत्य है। वह भरत पन्द्रहवें मनु भगवान ऋषभदेव के मन को भी अपने प्रेम के अधीन कर लेता था। इसलिए लोग कहते थे-यह भरत सोलहवाँ मनु ही उत्पन्न हुआ है। उन यशस्वती रानी के वे भरत पुत्र थे। अनेक अलंकारों से अलंकृत ये भरत सूर्य के समान तेजस्वी थे। उनके चरण-कमलों में चक्र, छत्र, तलवार, दण्ड आदि चौदह रत्नों के चिन्ह बने हुए थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानों ये चौदह रत्न लक्षणों के बहाने भावी चक्रवर्ती की पहले से ही सेवा कर रहे हैं। उनके शरीर संबंधी बल का वर्णन इतने से ही समझो कि वे चरमशरीरी हैं, इसी भव से मोक्ष जायेंगे और आत्मा संबंधी बल का वर्णन दिग्विजय आदि से जाना जायेगा।

भगवान ऋषभदेव ने अपने पुत्रों के लिए भी यथायोग्य रूप से महल, सवारी तथा अन्य प्रकार की संपति का विभाग कर दिया। भगवान ऋषभदेव ने नीलांजना का नृत्य देखते-देखते उसी क्षण सब कुछ समझ लिया, उन्हें उसी क्षण वैराग्य हो गया और जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। प्रभु ने अपने बड़े पुत्र को अयोध्या के राज्यपद पर अभिषिक्त कर प्रजा को सनाथ कर दिया। भरत महाराज अपने राज्य सिंहासन पर सुखपूर्वक बैठे हुए थे कि एक साथ तीन संदेशवाहकों ने आकर तीन समाचार सुनाए। भरत महाराज ने तीनों समाचार सुने, तत्क्षण ही उठकर जिधर भगवान का समवसरण था, उस दिशा में सात पैंड आगे बढ़कर बहुत ही भक्ति से प्रभु को परोक्ष में ही नमस्कार किया पुन: व्याकुल होकर सोचने लगे-पुण्यतीर्थ पूज्य पिता को केवलज्ञान उत्पन्न होना, चक्ररत्न का प्रगट होना, और पुत्र की उत्पत्ति होना ये तीनों ही धर्म, अर्थ और काम इन तीन वर्ग के फल मुझे एक साथ प्राप्त हुए हैं। भरत पुन: सोचने लगे, मुझे सबसे पहले जिनेन्द्रदेव की पूजा करनी चाहिए। भरत विशाल सेना से घिरे हुए महाराज भरत भगवान के समवसरण में जा पहुँचे, वे सबसे पहले समवसरण भूमि की प्रदक्षिणा देकर मानस्तंभों की पूजा की, अनेक स्तोत्र वचनों से प्रभु की स्तुति की।

भरत महाराज मनुष्यों के कोठे में जाकर बैठ गये और मस्तक झुकाकर प्रार्थना की। हे भगवन् तत्त्वों का स्वरूप क्या है आदि प्रश्न किए। भगवान की वाणी बिना इच्छा के ही निकल रही थी। हे आयुष्मान््! हे आयुष्मान्! जीवादि पदार्थों का यथार्थस्वरूप ही तत्त्व है भरत महाराज भगवान का दिव्य उपदेश सुनकर भगवान की बार-बार वंदना कर समवसरण से बाहर आये तथा सेना समेत अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। अयोध्या में प्रवेश कर चक्ररत्न की पूजा की और फिर पुत्र का जन्मोत्सव मनाया। भरत ने इतना दान दिया कि कोई याचक नहीं बचा था। भरत ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान करने का उद्योग किया। मांगलिक वस्त्र पहने। स्थपति नाम के रत्न ने एक बड़ा भारी रथ तैयार करके वहाँ सामने खड़ा कर दिया। भावी चक्रवर्ती भरत इन्द्र के समान उस रथ पर आरूढ़ हो गये। अयोध्या के प्रमुख लोग जय-जयकारे के नारे से भरत का अभिनंदन करने लगे। भरत ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया भरत महाराज की कीर्ति के समान सुशोभित हो रही थी। ऐसी गंगानदी को भरत बड़े ही प्रेम से देख रहे थे। सारथी ने कहा! हे महाराज! यह गंगा नदी सौ योजन अर्थात् चार लाख मील ऊँचे हिमवान् पर्वत से पृथ्वी पर पड़ी हुई है। इसलिए इसे आकाश गंगा कहते हैं। वनभूमि को इस तरह पार कर गये कि उन्हें लम्बाई का पता ही नहीं चला। भरत का शरीर सुवर्णवर्ण का है, अत: वे निषधपर्वत के समान सुशोभित हो रहे हैं एक चक्रवर्ती हैं तो दूसरे कामदेव हैं। दोनों ही भगवान ऋषभदेव के पुत्र हैं, दोनों समान शक्तिशाली हैं। सर्वप्रथम दृष्टियुद्ध शुरू होता है। भरत के शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष, बाहुबली के शरीर की ऊँचाई सवा पाँच सौ धनुष है। यही कारण है कि भरत अपने नेत्र ऊपर कर देख रहे थे अत: जल्दी पलक झपक गई है। जलक्रीड़ा में भी बाहुबली की जय-जयकार होती है।

दोनों भाई अखड़े के मैदान में आ जाते हैं, लेकिन भरत असफल हो जाते हैं। भरत, बाहुबली का संवाद चलता है, भरत पश्चाताप करते है।। बाहुबली कहते हैं-भरत भाई! मुझे अब दीक्षा लेना है। भरत बाहुबली को अपनी भुजाओं में भर लेते हैं और बड़े प्रेम से कहते हैं। भैय्या अभी कुछ दिन घर में रहो, लेकिन बाहुबली अपने पिता ऋषभदेव के पास जाकर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं।

समस्त दिग्विजय पूर्ण कर लेने पर चक्ररत्न स्वयं अयोध्या में प्रवेश करने के लिए चला पड़ा। भरतेश्वर महाराज ने प्रसन्न हो अपनी जन्मभूमि में प्रवेश किया। अनेक राजागण वृद्ध चक्रवर्ती को शुभाशीर्वाद दे रहे थे। अनंतर भरत के राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हुई। माता यशस्वती ने अनेक सुवासिनी स्त्रियों को साथ लेकर मंगल चौक पूरा। देवों के साथ-साथ राजाओं ने भरतेश्वर का राज्याभिषेक करना शुरू किया। ये भरत महाराज सोलहवें मनु हैं, षट्खण्ड भरत क्षेत्र के स्वामी हैं, राजराजेश्वर हैं, अधिराट् हैं और सम्राट हैं। चक्रवर्ती भरत के नवनिधि और चौदह रत्न थे। छह खण्डों से विभूषित यह पृथ्वी, जिनके नाम भरत भूमि या भारत इस नाम को प्राप्त हुई, जिसने दक्षिण समुद्र से लेकर हिमवान् पर्वत तक के इस क्षेत्र में शत्रुओं को जीतकर उसकी रक्षा की। भरत चक्रवर्ती अनेक राजाओं के साथ सर्व भारत वर्ष को जीतकर साठ हजार वर्ष में दिग्विजय पूर्णकर अपनी जन्मभूमि में आ गये। उनके मन में यह चिंता हुई कि दूसरे के उपकार में मेरी इस संपदा का उपभोग किस प्रकार से हो सकता है भरत ने उस समय समस्त राजाओं को बुलाया। भरत सम्राट ने उपासकाध्ययन अंग से इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तप का उपदेश दिया। तत्पश्चात् भरत ने श्रावकाध्ययन संग्रह के आधार से तीन प्रकार की क्रियाओं का उपदेश दिया। भरत चक्रवर्ती ने उन द्विजों को अपने धर्म में स्थापित करते हुए इन त्रेपन गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन किया है।

भरत अपनी दृष्टि को देखते हुए अपने आपको कृतकृत्य मान रहे थे। जिनपूजा और दान में सतत प्रवृत्ति करते हुए चक्रवर्ती भरत अपना बहुत सा समय सुखपूर्वक बिता रहे थे। भरत महाराज एक दिन उज्ज्वल दर्पण में अपना मुखकमल देख रहे थे कि भगवान ऋषभदेव के पास से आये हुए दूत के समान अपने सिर में एक सफेद बाल देखा, उसे देखते ही तत्क्षण उन्हें वैराग्य हो गया, वे सोचने लगे-अहो मेरे जैसा प्रबुद्ध पुरुष भी और इतने काल तक विषयों में सुख मान रहा है, उनका मोहरस गल गया और आत्म ज्ञान उत्पन्न हो गया। वे अवधिज्ञान से विचार करने लगे। मैंने कितनी बार देवों के दिव्य भोगों को सागरोपम की आयु से भोगा लेकिन तृप्ति नहीं हुई। मैं तो चरमशरीरी हूँ। इसी भव से मोक्ष होगा ही होगा, फिर भी जैनेश्वरी दीक्षा धारण किए बिना कर्मों का नाश होना असंभव है। मुझे सबका मोह छोड़कर वन में जाना है। वह वन में जाकर स्वच्छ पत्थर की शिला पर खड़े होकर पंचमुष्टि कोशलोंच कर सर्व वस्त्राभरण कर त्याग कर दिया और जैनेश्वरी दीक्षा लेकर ध्यान में लीन हो गये। तत्क्षण उन्हें मन:पर्ययज्ञान प्रगट हो गया। हे भगवन् आपने दीक्षा लेते ही उसी क्षण घातिया कर्मों का क्षपण कर लिया, जबकि भरत क्षेत्र के दिग्विजय में आपने साठ हजार वर्ष लगये थे। हे परमेश्वर! हे ज्ञान चक्रेश्वर! इस युग की आदि में आप ही एक ऐसे अद्वितीय महापुरुष हुए हैं कि जिन्होंने दीक्षा लेते ही पूर्ण ज्ञानलक्ष्मी को पा लिया। ऐसे अध्यात्मयोगी-आत्मज्ञानी भरतेश्वर अपने अनंत ज्ञान को प्रगट कर सिद्धि धाम को प्राप्त कर चुके हैं।