भारतीय अर्थतंत्र की रीढ़ — गाय

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भारतीय अर्थतंत्र की रीढ़ — गाय

आज यत्र—तत्र—सर्वत्र शाकाहार की चर्चा है किन्तु धर्मप्राण देश भारत, जहां की संस्कृति में गाय को माता तुल्य आदर प्राप्त है, वहां मांसाहार तथा मांसनिर्यात हेतु गो हत्या अत्यन्त शर्मनाक है। अहिल्या माता गोशाला जीव दया मण्डल ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस निबन्ध प्रतियोगिता में सम्पूर्ण देश से ५६ प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई थीं। निर्णायक मण्डल ने कु. पटेल के आलेख को प्रथम घोषित किया। जनरुचि का विषय होने तथा शाकाहार के प्रचार में महत्वपूर्ण होने की दृष्टि से अर्हत् वचन के पाठकों के लिये यह आलेख प्रस्तुत है।

धेनु: सदनम् रचीयाम्’’ (अर्थववेद—११.१.३४)

अर्थात् ‘‘गाय संपत्तियों का भण्डार है।’’

भारतदेश आंरभ काल से ही कृषि प्रधान देश रहा है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव पर खड़ा हुआ है, जिसकी ८०% जनता किसान एवं मजदूर है,जो अधिकांशत:गांवों में निवास करती है। गाय को केन्द्र में रखकर देखें तो गांव की तस्वीर कुछ ऐसी बनती है:—

गाय—बैल से जुड़ा हमारा छोटा किसान, किसान से जुड़ी खेती और खेती से जुड़ी देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था। यह देश इसी ग्रामीण अर्थरचना की नींव पर खड़ा है जिसकी प्रथम कड़ी गाय है।

औद्यौगिकीकरण की आंधी अभी तक इस ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ नहीं पायी थी किन्तु नई आर्थिक नीति के कारण ग्रामीण अर्थनीति को खतरा पैदा हो गया है। ये अपनी विशाल पूंजी और अचूक प्रचारशक्ति से शीघ्र ही भारतीय बाजारों पर पूर्ण अधिकार कर लेंगे और भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने में आत्मसात कर लेंगे। इस विषम परिस्थितियों में गोरक्षा नई जीवन पद्धति को दृष्टि दे सकती है। पूरी अर्थव्यवस्था के परिवर्तन की व्यापक मांग का गाय एक प्रतीक है। उसे ‘गाय बचाओ’ के रूप में देखने जैसा है। गाय भारत की आत्मा है। शरीर में जितना महत्व आत्मा का है वही महत्व गाय का भारत के जीवन में आदिकाल से रहा है और आज भी है| अभ्युदय (सांसारिक सुख समृद्धि) और नि:श्रेयस (मोक्ष) दोनों की प्राप्ति के लिए लोग इसे एक प्रधान कारण मानते हैं। राष्ट्र की उन्नति, अवनति, स्वतंत्रता और परतंत्रता सभी की कल्पना गाय की स्थिति से की जा सकती है। यह हमारे आर्थिक जीवन की ही नहीं, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन की भी आधारशिला रही है। हिन्दू परम्परानुसार ३३ करोड़ देवताओं का वास स्थान होने के कारण वह हमारी श्रद्धा और पूजा का स्थान तथा गोमाता के रूप मेें हमारी ममता और वत्सलता का भी स्रोत है। राष्ट्र के मानचिन्हों में उसका स्थान सर्वोपरि नहीं तो अद्वितीय अवश्य ही है।

गाय संपूर्ण भारत की एकता की द्योतक है। गौमाता भारत के प्रत्येक व्यक्ति के लिये, फिर वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का क्यों न हो, समान रूप से मान्य है। इसी संदर्भ में सूफी संत अब्बूल शाह, वीर तेजाजी एवं शिवाजी की गोभक्ति एवं प्रेम से सभी वाकिफ हैं इसीलिए ‘गाय’ का हमारी मान्यताओं में सदैव से विशेष स्थान रहा है। भारतीय विधान की धारा ४८ में भी गोरक्षण तथा गोसंवर्धन की नीति स्वीकार की गई है।

वेदों में भी इसकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि-

‘‘माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसाऽऽदिव्यानाम मृतस्य नाभि:।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट।।’

अर्थात् गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन और धृतरुप अमृत का खजाना है। गाय परोपकारी एवं वध न करने योग्य है। अथर्ववेद के मंत्रों में भी कहा है कि गाय घर को कल्याण का स्थान बनाती है एवं मनुष्य का पोषण करती है। गाय को ही संपत्ति माना गया है तभी तो भारतीय राजाओं की गोशालाऐं असंख्य गायों से भरी रहती थीं।

गोपालन की प्रवृत्ति एवं महत्व:— कौटिल्य के अर्थशास्त्र को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि उस समय गायों की समृद्धि और स्वास्थ्य के लिये विशेष विभाग ‘‘गोऽअध्यक्ष’’ चलाने में आता था। भगवान श्रीकृष्ण के समय भी गायों की अधिक संख्या सामाजिक प्रतिष्ठा एवं ऐश्वर्य का प्रतीक मानी जाती थी। नंद, उपनंद, नंदराज, वृषभानु, वृषभानुवर आदि उपाधियां गोसंपत्ति के आधार पर ही दी जाती थीं। श्रीकृष्ण गाय के असंख्य गुणों को जानते थे और इसी कारण गाय उन्हें अत्यंत प्रिय थी एवं वे उनका पालन करते थे और इसी कारण उनका प्रिय और पवित्र नाम गोपाल ही है। गोधन को सर्वोत्तम धन मानने के कारण ही ब्राह्मण की सबसे बड़ी दक्षिणा ’’गाय’’ मानी जाती रही है।

गर्ग संहिता गोलोक—खण्ड अध्याय—४ में लिखा है:— जिस गोपाल के पास पाँच लाख गाय हों उसे उपनंद और जिसके पास नव लाख गायें हो उसे नंद कहते हैंं। दस हजार गायों के समूह को व्रज अथवा गोकुल कहने में आता था।

इससे ये बात तो स्पष्ट हो जाती है कि ‘गाय’ द्वापर युग से ही हमारे अर्थतंत्र का मुख्य आधार रही है।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न ‘‘अमृत किम् ?’’ (अमृत क्या है?) के उत्तर में ‘‘गवाऽमृतम्’’ (गाय का दूध) कहा था।

गांधीजी ने भी लिखा है कि ‘‘देश की सुख—समृद्धि गाय के साथ ही जुड़ी हुई है।’’ ये बात अनेक प्रकार से सार्थक है और इसी कारण ही संसार से विरक्त हुए सोने चाँदी के भण्डार को ठुकरा कर जंगल की शरण लेने वाले ऋषियों और महाराजाओं ने सर्वस्व के त्याग में भी ‘‘गाय’’ का त्याग नहीं किया था।

अंग्रेजों ने देखा कि हमारा देश संपन्न है और यहां के लोग बौद्धिक दृष्टि से भी तेज हैं इसलिए अंग्रेजों ने हमारी ‘गाय’ को नष्ट कर दिया। वह ऐसे ही था कि जैसे किसी कार के पहिये की हवा निकाल दे तो कितनी भी बढ़िया कार हो, रुक जाती है। यही हालत हमारे देश की कर दी। हमारे देश से गाय गई, देश की कृषि पंगु हुई और सारे देश के लघु व कुटीर उद्योग खत्म हो गये। देश से बुद्धि गई और यहां पर चाय, काफी व शराब आ गई।

आप जानते हैं कि जो पशु सूर्य की किरण को सर्वाधिक आत्मा में ग्रहण करता है, वह है ‘गाय’ और यह पशु दूध के माध्यम से हमें भरपूर सौर ऊर्जा देता है और यदि इस दूध को हम पीते हैं तो उससे हमारी बुद्धि तेज होगी और हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका धनात्मक प्रभाव जरूर पड़ेगा।

आज पश्चिम के देश क्यों उन्नति कर रहे हैं? यह कभी सोचा? पश्चिम में आप चले जाइये, कहीं आपको भैंस नहीं मिलेगी, सर्वत्र आपको गाय मिलेगी। पिछले १८ वर्षों से पश्चिमी देशों में एक श्वेत क्रांति चल रही है, उस क्रांति का उदृेश्य है, अधिक से अधिक गाय पालो, गाय के दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करो। आज एक अमेरिकन व्यक्ति प्रतिदिन एक से दो लीटर गाय का दूध पीता है व मक्खन खाता है जबकि भारतीय व्यक्ति को औसतन मात्र २०० ग्राम दूध भी मुश्किल से प्राप्त होता है। अमेरिकन व्यक्ति का आहार आप देखिये, सारा का सारा सात्विक होता जा रहा है और भारतीय तमोगुणी पदार्थों को अपनाकर अपनी बुद्धि एवं अर्थव्यवस्था को विकृत कर रहे हैं। ये हमारी स्थिति है कि एक ओर हम गाय और उसके दूध से बने पदार्थों से दूर होते जा रहे हैं और दूसरी ओर श्रीकृष्ण के नारे लगाते हैं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं और जो लोग कृष्ण जन्माष्टमी नहीं मानते वे लोग गाय का दूध पीकर श्रीकृष्ण का अनुसरण कर रहे हैं। जबकि प्रथम बार कोलम्बस १४९२ में अमेरिका गया था तब वहाँ एक भी गाय नहीं थी। मात्र जंगली भैसों का पालन होता था। लोग उसे दुहते नहीं थे परन्तु मांस और चमड़े के लिये उसकी हत्या करते थे। कोलम्बस दूसरी बार अमेरिका गया तब अपने साथ चालीस गायों तथा दो साण्डों को अपने साथ ले गया, जिससे दूध की जरूरत पूरी हो सके। १६४० में ४० गायें बढ़कर ३०,००० हो गयीं और १८४० में ड़ेढ करोड़ और सन् १९०० में ४ करोड़ हो गईं। १९३० में ६ करोड़ ४० लाख हो गयीं तथा सन् १९३५ में (मात्र पांच वर्ष में) बढ़कर ७ करोड़ १८ हजार हो गयीं। तब वहां सन् १९८५ में ९४% लोगों के पास गायें थीं तथा हरेक किसानों के पास दस पंद्रह तक गायें थीं।(आर्य जगत—८ अगस्त ९३)

इसी कारण आज अमेरिका में गाय का दूध ऐसे है जैसे भारत में कभी दूध की नदियां बहती थीं, आज अमेरिका के अंदर दूध की नदियां बह रही हैं। वे घी को जला रहे हैं क्योंकि उनको पता चल चुका है कि गाय के घी को जलाने से प्रदूषण नष्ट हो जाता है। वाशिंगटन से २५० किलोमीटर की दूरी पर सन् १९७८ से यज्ञ चल रहा है जहाँ ‘‘परनाले’’ के समान घी गिरता है और जलता है। इससे वाशिंगटन का प्रदूषण दूर किया जा रहा है परन्तु इसका विज्ञापन इसलिए नहीं होता क्योंकि उनकी ईसाई संस्कृति मार खा जायेगी, यदि इस गाय के घी की महत्ता को वे लोग प्रसारित करें। (आर्य जगत, अगस्त ९३)

भारतीय अर्थव्यवस्था की आत्मा गाय

हमारा खेतिहर देश जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर खड़ा है, जिसकी आत्मा गाय है। संसार के अन्य देशों के लोग दूध के लिये गाय और खेती के लिये घोड़े या मशीन रखते हैं। वहां के किसानों का काम भिन्न भिन्न पशुओं से चलता है पर हमारे पूर्वजों ने एक ही गाय से दोनों काम किए, गाय से दूध और गोपुत्र बैल से हल चलाना। गांव नगरों में भार—बोझ ढोने, कुएँ—रहट तथा तेलघानी चलाने आदि का काम भी बैलों से लिया जाता है। आज भी ७०% खेती का आधार बैल ही है। हमारे जीवन की आवश्यक खाद्यान्न वस्तुएँ खेती से ही प्राप्त होती हैं और इस हेतु गोवंश हमारे कृषि जीवन का बहुत बड़ा आधार है। वस्तु का मूल्यांकन आर्थिक दृष्टि से होता है। विश्वविख्यात पशु विशेषज्ञ डॉ.राइट के मतानुसार:—‘‘गोवंश से होने वाली वार्षिक आय ११ अरब रुपये से अधिक है।’’ यह गणना १९३५ के वस्तुओं के भावों के अनुसार लगाई गयी है, आज सन् १९३५ की उपेक्षा वस्तुओं के भाव कई गुना अधिक बढ़ गये हैं अत: गोवंश से होने वाली आय १०० अरब रुपये से अधिक है। कपड़ा, चीनी,लोहा आदि कारखानों और रेलों से भी इतनी आय नहीं होती, जितनी गोधन से होती है। वास्तव में गाय भारतीय आर्थिक ढांचे का आधारस्तंभ और हमारे जीवन का मुख्य सहारा है क्योंकि खेती को वे जुआ मानते हैं। जब तक अनाज घर में नहीं आ जाता तब तक किसान के सिर पर कच्चे धागे से बंधी संदेह की तलवार लटकती रहती है। कह नहीं सकते कि ये कब टूट जायेगी? अतिवृष्टि, अनावृष्टि, हिमपात के धक्कों से उसके सपनों का शीशमहल परिवार की व्यवस्था का आधार तथा देश की समृद्धि का महल कब टूट जायेगा ?

भारत में पूरे वर्ष में केवल साढ़े तीन माह की वर्षा होती है, वह भी अनिश्चितता लिए हुए होती है। इस अनिश्चितता में किसान किसका सहारा ले? अत: प्रत्येक किसान को गोपालन को पूरक व्यवसाय बनाना चाहिए ताकि जब कभी प्रकृति माता उस पर क्रोधित होगी तब उसे गोमाता मदद करेगी। महाराज शंभु ने दयानंद सरस्वती के वाक्यों को ठीक ही दोहराया है कि—

गाय है तो हम हैं, गाय नहीं तो हम नहीं।

गाय मरी तो बचेगा कौन?

गाय बची तो मरेगा कौन?।(कोई नहीं)

भारतीय कृषि एवं गाय

हम अपनी अर्थव्यवस्था पर नजर डालें तो मन में एक प्रश्न उठता है कि भारतीय कृषि की प्रगति में कौन से बाधक तत्व हैं? क्योंकि विश्व की कृषि योग्य भूमि का १४% अपने पास है अर्थात् अपने देश में ज्यादा कृषि ही नहीं ‘‘गहन’’ व उत्तम कृषि हो सकती है और थोड़ी जमीन पर ज्यादा फसल प्राप्त करने के लिए उत्तम खाद की जरूरत पड़ती है, ये खाद गाय के पालन से ही मिल सकती है। गोबर के खाद की किस्म आज वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार की है तथा इसे बनाने के लिये नये तरीके भी खोजे गये हैं, जैसे नाडेप कम्पोस्ट। क्योंकि कृत्रिम खाद फर्टिलाइजर के प्रयोग से कुछ स्थानों पर अमेरिकी भूमि बांझ हो चुकी है और बुलडोजरों से १० फुट मिट्टी को ऊपर से निकालकर गोबर के खाद से खेती हो रही है। आज हमारे देश में उसी खाद का प्रचलन हो रहा है। क्या हम भी अपनी जमीन को बांझ बनाना चाह रहे हैं? और दूसरी ओर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। (डा. मनमोहन बजाज,आर्य जगत ९३)

आज भी हमारी खेती ट्रैक्टरों से नहीं बल्कि बैलों से ही होती हैं क्योंकि हमारे ५०% किसानों के पास मात्र २ एकड़ तक की जोत के खेत हैं। ये छोटे किसान ट्रैक्टर खरीद भी नहीं सकते। इन मशीनों का उपयोग तो मात्र १५% बड़े किसान ही कर पाते हैं। छोटे किसान इन यंत्रों का उपयोग करें भी कैसे? क्योंकि इन यंत्रों को डीजल चाहिये और डीजल तो कोई खेती में पैदा नहीं होता अत: हमारी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भविष्य ‘गाय’ और ‘बैल’ पर जितना निर्भर है, उतना सिंचाई को छोड़कर किसी और साधन पर निर्भर नहीं है। (युग शक्ति गायत्री—जनवरी ९५, गुजराती)

हमें दूध देने वाली एवं बैल उत्पन्न करने वाली गाय स्वयं मनुष्य का खाद्य नहीं खाती, वह हमारे भोजन का या खेती का शेष भाग ही ग्रहण करती है अर्थात् गाय घास, भूसा, निंदाई से निकला खर पतवार आदि चारा खाती है। कृषि विशेषज्ञों का अध्ययन है कि ‘‘गाय जितनी भूमि में लगी घास खाती है, उसके मलमूत्र से उतनी भूमि पर आठ गुना उत्पादन बढ़ जाता है। गाय कभी किसान व कृषि के लिये बोझ नहीं होती, मरने के बाद भी नहीं।’’ प्रकृति से हम जितना लें उसे उतना ही वापिस भी करें, इसका पालन गोवंश की तरह अगर हम मनुष्य ने भी किया होता तो बहुत सी समस्याएं पैदा ही नहीं होतीं।

गाय का अर्थशास्त्र

गाय के ग्रामीण अर्थशास्त्र को समझने के लिये ‘गाय’ को केन्द्र में रखें तो उसका नक्शा कुछ ऐसा बनता है:— गाय से घी—दूध, मक्खन, मट्ठा, गाय से खेतों के लिये बैल, गाय—बैल से खेतों के लिये खाद, परिवहन के लिये बैलगाड़ी, चमड़े के लिये मृत गाय बैल और गाय बैल के पोषण के लिये घास, भूसा जो खेती के उपउत्पाद हैं। इस प्रकार खेती पर आधारित किसान के लिये संपूर्ण गोवंश अत्यंत महत्वपूर्ण है। खेती भारतीय किसान के लिये एक पूजा है, जीवंत श्रम है, साधना है। गाय मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन का पाठ सिखाती है, वह हमें दूध जैसा उत्तम पदार्थ देती है, जो माता के दूध के बाद सर्वश्रेष्ठ आहार माना जाता है। किस जाति, धर्म या संप्रदाय का ऐसा बच्चा है जिसे माता के दूध के बाद गाय के दूध की आवश्यकता न पड़ती हो इसे सांप्रदायिकता का प्रश्न बनाना मानसिक दिवालियापन ही कहा जावेगा।

आधुनिक युग में गोरक्षा के जन्मदाता महर्षि दयानंद सरस्वती ने एक छोटी सी परन्तु सारगर्भित पुस्तक ‘‘गोकरुणानिधि’’ के एक अंश में लिखा कि ‘‘यदि एक गाय कम से कम दो सेर दूध देती है और दूसरी गाय बीस सेर तो प्रत्येक गाय का औसत ग्यारह सेर होगा। इसी प्रकार एक माह में सवा आठ मन (१ मन= ४० सेर) दूध होगा। एक गाय कम से कम ६ मास व ज्यादा से ज्यादा १८ मास दूध देती है तो औसत हर गाय १२ माह दूध देती है। इस प्रकार १२ महीने का दूध ९९ मन होगा।

इस दूध में से प्रति सेर एक छटाक चावल व डेढ़ छटाक चीनी डालकर खीर बनाकर प्रतिव्यक्ति को एक सेर दूध की खीर के हिसाब से १९८० व्यक्तियों को खिलाया जा सकता है। इस प्रकार एक बार ब्याहने में १९८० व्यक्तियों को तृप्त कर सकती है। गाय कम से कम ८ व ज्यादा से ज्यादा १८ बार ब्याहती है, जिसका औसत १३ होगा, इस प्रकार एक गाय अपने जीवनकाल में २५७४० व्यक्तियों को एक बार में तृप्त कर सकती है।

एक गाय को अपने जीवनकाल में ६ बछड़ी व 7 बछड़े होते हैं जिनमें से एक की रोग आदि से मृत्यु हो तो १२ रहेंगे। उन छ: बछड़ियों के दूध मात्र से इसी प्रकार १,५४,४४० मनुष्यों का पालन होगा। छ: बछड़ों की दो—दो की जोड़ी बने तो उनमें से एक जोड़ी से दो फसल में २०० मन अनाज उत्पन्न हो सकता है एवं तीन जोड़ी से ६०० मन। इन बैलों का औसत जीवन मात्र ८ वर्ष मानें तो तीन जोड़ी बैल अपने जीवनकाल में ४८०० मन अनाज उत्पन्न करेंगे। एक मनुष्य को एक समय में भोजन के लिए तीन पाव अनाज चाहिये इस प्रकार २,५६,००० मनुष्य एक बार खाना खा सकेंगे।

दूध व अन्न दोनों का योग करें तो ४,१०,४४० मनुष्यों का पालन एक समय के भोजन हेतु होता है जबकि इसी प्राणी के मांस से मात्र ८० मांसाहारी एक समय तृप्त हो सकेंगे। (डा. करमरकर, उपसंचालक—जैविक खेती, इन्दौर)

‘‘एक गाय एक दिन में औसतन १० किलोग्राम गोबर देती है। यदि इस गोबर का उत्तम तरीकों (जैसे नाड़ेप) से खाद बनायें तो दस दिन के गोबर से ३० टन उत्तम गुणवत्ता वाली खाद प्राप्त हो सकती है, जिसकी कीमत १२०० रु.बनती है।’’

इस प्रकार गाय का प्रत्येक उत्पाद तथा अंग मनुष्य के लिये आर्थिक लाभ प्रदान करने वाला होता है। मरणोपरांत उसकी चमड़ी से विभिन्न साज सज्जा की सामग्री एवं वाद्य यंत्र बनाये जाते हैं, जिसकी कीमत बहुत अधिक होती है।

आज कितना भी औद्योगिकीकरण क्यों न हो जाये, जैविक खाद की आवश्यकता निरंतर बढ़ती ही है। गोमूत्र, घी, दूध आदि के महत्व व औषधीय गुणों को कौन नहीं जानता। ‘‘इसी कारण तो ‘‘गाय’’ को हमारी सभ्यता का मेरुदण्ड एवं अर्थव्यवस्था का आधार कहा गया है।’’

राष्ट्र के आर्थिक विकास में गोवंश का योगदान

भारत में गाय मात्र दुधारू पशु नहीं है, यह सारी कामनायें पूर्ण करने वाली ‘‘कामधेनु’’है। इससे लाखों परिवारों का पोषण होता है। डेयरी इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में ४९ हजार ग्रामीण दुग्ध उत्पादन सहकारी संगठनों के लगभग ५० लाख से ज्यादा ग्वाल परिवार प्रतिदिन ८० लाख टन दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। सन् १९८७ में दुग्ध उत्पादन ४ करोड़ टन के आसपास रहा, जो १९९५ में बढ़कर ५ करोड़ ४९ लाख टन हो गया है। दुग्ध उत्पादन में ग्वाल परिवार के अलावा सहकारी एवं निजी डेयरियां एवं गोभक्तों की बड़ी जमात सक्रिय है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का १५००० करोड़ रुपये का योगदान माना जाता है,उसमें ७०% दूध तथा इसके उत्पादों का हिस्सा है।

दुनिया की २.५% जमीन भारत के पास है किन्तु पशु १६% है अर्थात् विश्व के सर्वाधिक पशु हमारे पास ही हैं (यह संख्या निरन्तर घट रही है— सम्पादक), यदि उनकी शक्ति का पूरा—पूरा उपयोग हो तो बेरोजगारी एवं आर्थिक विकास व अन्य सभी बाधाओं को दूर किया जा सकता है। जो किसान केवल खेतिहर है और उर्वरकों का इस्तेमाल कर मालामाल होने की कोशिश में हैं, उन पर "चार दिन की चाँदनी फिर वही अंधेरी रात’’ चरितार्थ होती है।

हम अपने राष्ट्र का कैसा विकास करना चाहते हैं, यह हमारी बुद्धि एवं दूरदर्शिता पर निर्भर है। जिन किसानों के पास गोवंश है और उनके गोबर गोमूत्र का उपयोग खाद में हो रहा है, उनकी आमदनी तथाकथित उन्नत कृषि करने वाले किसानों से डेढ़ गुनी होती है। प्रसिद्ध भू—रसायन विशेषज्ञ डॉ एच.एच.कौढ़ ने कहा भी है कि ‘‘आधुनिक कृषि से रोग तथा कीटाणु बढ़ रहे हैं क्योंकि उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा है, वहीं परम्परागत कृषि से जमीन की उर्वरा शक्ति भी कायम है और उपज भी स्वादिष्ट होती है तथा पशु एवं मानव की क्षमता का पूरा पूरा उपयोग होता है।’’ आज वैसा नहीं है इसी कारण भारत की ८८ करोड़ की आबादी में लगभग आधे लोग गरीब हैं और इसमें से भी आधे गरीबी रेखा के नीचे। बड़े उद्योगों के भरोसे २२ करोड़ लोगों यानि ५ करोड़ परिवारों का जीवन स्तर कब उठेगा, यह कहना कठिन है परन्तु गोपालन की योजना से तत्काल उन्हें लाभ पहुंचाने की गारण्टी दी जा सकती है। देश के आर्थिक विकास को सुदृढ़, स्थायी एवं उच्च स्थान पर पहुंचाने के लिये योजना आयोग को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि गांधीजी की आर्थिक विकेन्द्रीयकरण एवं अन्त्योदयी अर्थव्यवस्था की नीति भी यही है। किसी देश का आर्थिक विकास तभी होता है जब वह अपने आधार को या पाये को मजबूत बनाये रखता है। इसी प्रकार हमारे देश के आर्थिक विकास का आधार ‘गाय’ है परन्तु हम उसकी निरंतर उपेक्षा कर रहे हैं और गौवंश की इस उपेक्षा के कारण ही हमारी अर्थव्यवस्था पिछढ़ रही है अत: यदि हमें विकास की ओर अग्रसर होना है तो लघु व कुटीर उद्योगों की तरफ पुन: जाना होगा ताकि बढ़ती जनसंख्या तथा बेराजगारी का निराकरण हो सके और देश की आर्थिक स्थिति ऊंची उठ सके, इसके लिये इसका आधार ‘गोवंश का पालन’ ही एकमात्र रास्ता है।

गोवंश और रोजगार

किसान के लिये केवल खेती तथा ग्वाले के लिये केवल दूध का उत्पादन व दूध की कमाई आर्थिक दृष्टि से अधिक लाभप्रद नहीं है। खेती का उत्पादन व दूध की कमाई मिलकर ही किसान को संभाल सकते हैं इसीलिए हमारी सरकार भी हरित क्रांति के साथ दुग्ध क्रांति की योजना चला रही है। हरित क्रांति से कृषि का उत्पादन बढ़ा है जो उसका लक्ष्य था पर हरित क्रांति तब तक अपूर्ण है, जब तक कि दुग्ध क्रांति नहीं होती है। गांवों में भूमिहीनों की बढ़ती बेरोजगारी देखकर सरकार ने डेयरी उद्योग को प्राथमिकता दी है जिससे गांवों के लोगों को रोजगार मिले। पूरे देश के आंकड़े बताते हैं कि १९५१ में दुग्ध उत्पादन १७ मिलियन टन था जबकि १९८८ में ३६ मिलियन टन हो गया। जनसंख्या के हिसाब से ये कोई बहुत अच्छी प्रगति नहीं है फिर भी पशुओं की अच्छी देखभाल हो तो गोरस उत्पादोें में भारी वृद्धि की संभावना है। समुचित साज संभाल, पशुनस्ल सुधार तथा संतुलित दाना पानी देने की व्यवस्था कर वाराणसी स्थित रामेश्वर गोशाला में सुरिभ शोध संस्थान ने सिद्ध कर दिखाया है कि १ लीटर से ८०० ग्राम दूध देने वाली गायें ४ लीटर तक दूध देने लगीं, उनकी बछिया ७ लीटर तथा उसकी भी बछिया ११ लीटर तक दूध देने वाली हुई। इस प्रकार दुग्ध उत्पादन में लगकर लाखों लोग तथा परिवार अपनी रोजी रोटी चला सकते हैं तथा अपने आपको बेरोजगारी के अभिशाप से मुक्त कर देश का व स्वयं का विकास कर सकते हैं।

हमारे देश में आज भी पशु ऊर्जा महत्वपूर्ण है क्योंकि ५०% खेती योग्य जोत दो एकड़ से भी कम है इसमें ट्रैक्टर चल नहीं सकते और आज भी ६०% गांवों में कच्ची सड़के हैं, जिसमें ट्रक आदि सवारियां चल नहीं सकतीं। यह पूरा काम अभी भी पशु और बैलगाड़ियों से ही होता है। इस पूरी प्रक्रिया में २० करोड़ लोगों को आधा या पूरा रोजगार मिला हुआ है। बैलगाड़ी के विकास की पूर्ण उपेक्षा हुई है फिर भी लकड़ी के पहियों की जगह टायर ने ले ली है। टायर के पहियों का चमत्कार यह है कि जो पुरानी बैलगाड़ी ७५० किलोग्राम वजन ढोती है उन्हीं बैलों से टायर वाली बैलगाड़ी २५०० किलोग्राम वजन उठाती है। इस प्रकार गाड़ीवान की कमाई ३ गुना बढ़ गई। हरियाणा, पंजाब और दिल्ली की चार पहियों वाली टायर गाड़ियां उन्हीं बैलों से ३००० किलोग्राम से ४००० किलोग्राम तक वजन ढोती हैं।मशीन के बारे में गांधीजी की यही कल्पना व्याप्त बेरोजगारी को दूर करने का यही सही एवं दूरदर्शितापूर्ण तरीका है न कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकर बनाना। ऐसा करना तो बेरोजगारी जैसी कम गंभीर बीमारी को ‘गुलामी’ जैसी भयंकर बीमारी में बदलने जैसा ही होगा।

ऊर्जा संकट में गोवंश

भारत में पशुधन आज भी ऊर्जा का शक्तिशाली स्रोत है। पिछड़ेपन का प्रतीक मानी जाने वाली बैलगाड़ी हमारे देश के सारे के सारे बिजली घरों से अधिक ऊर्जा देती है। यदि पशुओं को उनके काम से हटाना हो तो हमें अतिरिक्त ऊर्जा के लिये लगभग ३००० अरब रूपये खर्च करने पड़ेंगे। देश के बोझा ढ़ोने वाले पशुओं की संख्या १२ करोड़ मानी जाती है। यदि प्रतिपशु आधा हार्स पावर ऊर्जा मानी जाय तो इनसे हमें ६ करोड़ हार्सपावर ऊर्जा मिलती है।

अनुमान है कि देश में ४ करोड़ ६ लाख ७० हजार हल तथा १ करोड़ ३० लाख बैलगाडियां हैं और उनसे जुड़े ३ करोड़ लोगों का जीवन यापन होता है। यदि हलों की जगह ट्रैक्टर ले तो उसके लिए २ लाख ८ हजार करोड़ की पूंजी अपेक्षित होगी, जो कर्ज में आकण्ठ डूबे हमारे देश के लिए जुटा पाना मुश्किल है। इस समय ट्रैक्टरों से जितनी जुताई होती है उतनी तो भैंसे कर देते हैं, बैल उससे आठ गुना अधिक जुताई कर रहे हैं। खेतों में लगभग पांच करोड़ रुपये की पशुशक्ति लग रही है। इसी तरह ट्रक और मालगाड़ियां जितना माल ढोती हैं, बैलगाडियाँ उससे अधिक ढोती हैं। वे ऊबड़—खाबड़ रास्तों पर भी जाती हैं और घर के दरवाजे तक माल पहुंचाती हैं। ढुलाई में पशुशक्ति के उपयोग से २५ अरब रूपये के डीजल की बचत होती है। भोपाल के केन्द्रीय यांत्रिकी अनुसंधान ने बैलों की उत्पादकता बढ़ाने तथा किसानों का श्रम कम करने हेतु पशु चालित ट्रैक्टर बनाये हैं। वह हल के मुकाबले तीन चार गुना कार्य करता है। इसी तरह पंक्चररहित बैलगाड़ियां निर्मित हुई हैं, जिससे बैलों पर भार कम पड़ता है और परिवहन की क्षमता बढ़ी है। बम्बई की ‘‘नाइटी’’(National Institute For Traning in Industrial Engineering) ने ऐसा उपकरण बनाया है जिससे रहट के साथ बैलों के घूमने पर विद्युतधारा उत्पादित होती है। उस उपकरण के सहारे एक हार्स पावर अर्थात् ७८६ वॉट बिजली पैदा कर सकते हैं। भारत के नेताओं ने स्वयं नेरोबी के ऊर्जा सम्मेलन में स्वीकार किया था कि भारत में हमारे सभी बिजलीघरों, जिनकी अधिष्ठापित क्षमता २२ हजार मेगावॉट है से अधिक शक्ति पशु प्रदान करते हैं। यदि उनको हटा दिया जाय तो बिजली उत्पादन पर २५४० अरब डॉलर पूंजी निवेश करने के अतिरिक्त कृषि अर्थव्यवस्था को खाद और र्इंधन की हानि होगी। गोबर गैस, नाडेप खाद, चारा काटने की बैलचलित मशीन से मिलने वाले लाभ कौन नहीं जानता?

विभिन्न रूपों में पशुओं से ४०,००० मेगावॉट के बराबर ऊर्जा मिलती है तथा इससे देश को २७००० करोड़ रु. का लाभ है। आधे टन वजन की गाय, दिन रात में १२०० वॉट गर्मी देती है। जर्मनी के विद्युत अभियंता संघ ने २० गायों से एक बड़ा मकान गर्म रखने का प्रयोग किया और उससे वर्ष में ३००० लीटर से अधिक तेल की बचत की। (सम्पादकीय—आर्य जगत, २ मई १९९४)

विदेशों में जहाँ इस तरह ऊर्जा स्रोत के रुप में गायों को बढ़ावा मिल रहा है वहीं भारत में गोहत्या बढ़ रही है क्योंकि हम गोवंश में समाहित ऊर्जा शक्ति के भण्डार को पहचान नहीं पा रहे हैं। जब समस्त खनिज तेलों तथा परम्परागत ऊर्जा के स्रोत नष्ट हो जायेंगे तब हमें इन्हीं पशु ऊर्जा की ओर हाथ पसारना पड़ेगा।

इक्कीसवीं सदी में बैलों का भविष्य

भारत में अधिकतर किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है,लेकिन भारत सरकार की जो नीतियां चल रही हैं वे अधिकतर बड़े किसानों के लिये हैं। यंत्रीकरण और ट्रेक्टरों के लिए ऋण, अनुदान व अन्य सुविधायें उपलब्ध कराई जाती है, जिनका उपयोग वे किसान नहीं कर सकते जिनके पास चार पाँच हेक्टेयर भूमि है। उन्हें तो पशुशक्ति पर ही आधारित रहना होगा। प्रश्न यह उठता है कि क्या पशुशक्ति आर्थिक दृष्टि से ट्रैक्टर का मुकाबला नहीं कर सकती? यदि सभी पहलू देखे जाएं और उनका मूल्यांकन किया जाय तो पशुशक्ति न केवल इक्कीसवीं सदी में बल्कि शायद २५ वीं सदी में भी अधिक उपयोगी बनी रहेगी।

अमेरिका के एक प्रतिष्ठित संस्थान ‘‘वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट’’ ने अपनी हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट में सिफारिश की है कि ‘‘स्थायी कृषि और पर्यावरण सुधार के लिए कृषि का आधार पशुओं को ही दोबारा बनाना होगा।’’ फिर हम यंत्रीकरण की ओर क्यों भाग रहे हैं? १९८२ की पशुगणना के आधार पर हमारे देश में ८ करोड़ २० लाख बैल खेती में लगे थे। उसके बाद के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं अत: इसी को आधार मानकर:— एक ट्रैैक्टर चार बैलों का काम कर पाता है अत: ८ करोड़ २० लाख बैलों के लिये हमें २ करोड़ ५ लाख ट्रैक्टरों की आवश्यकता होगी।

आज हमारे देश में केवल ५ लाख ट्रैक्टर कार्यरत् हैं, इनकी संख्या २ करोड़ ५ लाख करने में कितने वर्ष लगेंगे? इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं।

प्रतिवर्ष ५० से ६० हजार ट्रैक्टर ही अधिकाधिक बढ़ पाते हैं और दस बारह वर्षों के बाद नये ट्रैक्टर भी बेकार हो जाते हैं।

इन ट्रैक्टरों के लिए आज विदेशी मुद्रा में पेट्रोलियम पदार्थों का आयात प्रतिवर्ष कम से कम ५० हजार करोड़ का करना होगा। इस समय पेट्रोलियम पदार्थों का आयात मात्र १५ हजार करोड़ रुपये का है लेकिन इसके लिये भी हमें विदेशी कर्ज लेना पड़ता है।

जिन बड़े किसानों ने ट्रैक्टर ले भी लिए हैं उन्हें भी कुछ बैल तो रखने ही पड़ते हैं, बहुत से ऐसे कार्य हैं जो सिर्फ बैलों से होते हैं।

बैलों द्वारा जो भार वहन का कार्य होता है, वह भी करीब २५०० करोड़ किलोमीटर के बराबर है। इतना भारवाहनतो हमारी संपूर्ण रेलवे भी नहीं कर पाती है। यदि इसका भी यंत्रीकरण किया जाय तो न जाने कितने ट्रकों की आवश्यकता होगी और फिर इनके लिये वही प्रश्न उठेगा,पेट्रोलियम पदार्थों का आयात।

गोवंश एक ऐसा धन है जिसका बहुउद्देशीय उपयोग है। जब ट्रैक्टरों के माध्यम से खेती करते हैं तो न तो गोमूत्र और न ही गोबर मिलेगा। गोबर व सेन्द्रिय खाद के कितने गुण हैं इसे अमेरिका व पाश्चात्य देशों ने बहुत अच्छी तरह से समझ लिया है और वहां लाखों ऐसी दुकाने खुल गई हैंं जो ऐसे खाद्यान्न और फलफूल बेचती हैं जिन्हें गोबर व सेन्द्रिय खाद द्वारा ही उत्पादित किया गया है। ऐसे पदार्थों के वे अधिक दाम देने में भी नहीं हिचकिचाते हैं।’’

गाय व उससे प्राप्त पदार्थों की महत्ता

‘‘गाय ही श्रेष्ठ क्यों’’? मात्र कम फैट वाले दूध के कारण हमने गाय को पालना कम कर दिया और भैंसों का पालन बढ़ा दिया। कभी ये नहीं सोचा कि फैट व दूध की मात्रा के साथ गुणों का ध्यान भी रखा जाना चाहिये। ‘शंख’ चाहे जितना बड़ा हो पर छोटे से ’’मोती’ की बराबरी नहीं कर सकता। वनस्पति घी तथा देशी घी में फैट समान है फिर भी दोनों के भावों में दुगना अंतर है क्योंकि दोनों के गुणों में अंतर है। तो फिर गाय और भैंस के दूध—दही—मक्खन, घी आदि में भी अतंर होता है इस बात को स्वीकार करना चाहिये। पशुओं के स्वयं के गुण दोष का प्रभाव उनके उत्पाद अर्थात् दूध—दही पर भी पड़ता ही है। आओ निम्न तथ्यों पर इसका परीक्षण करें:—

गाय का बछड़ा तीन घण्टे में उछल कूद शुरू कर देता है जबकि भैंस का नहीं। इससे स्पष्ट है कि भैंस का दूध—दही आदि में जड़ता या आलस स्वाभाविक रूप से ज्यादा होता है जबकि गाय के दूध में चेतनता।

पचास गायों के झुण्ड मेें बछड़े को छोड़ देने पर भी वह अपनी मां के पास सीधे पहुंचता है जबकि भैंस का बच्चा बीस के झुण्ड में छोड़ते हैं तब भी एक के बाद एक सूंघकर अपनी मां के पास पहुंचता है। इससे दोनों की बुद्धिमत्ताका अनुमान लगा सकते हैं।

गायों को उनका नामकरण करने पर नाम से बुलाने पर दौड़कर आती है पर भैंस में यह बुद्धि नहीं होती है।

राजस्थान में अनेकों जिलो में मात्र एक गाय के गले में घण्टी बांध देने से घण्टी वाली गाय के साथ—साथ अन्य गायें भी आठ दस मील घूम कर घास चर के आ जाती हैं, वापसी में एक गाय भी छूट नहीं पाती

जबकि मात्र दस भैंसें भी घण्टी बांध के छोड़ें तो साथ नहीं रहेंगी। उन्हें समय स्थान के अनुशासन का भान नहीं रहता है।

जैसी उत्तम खेती गाय की संतान बैल से हो सकती है, वैसे पाड़ों से नहीं।

गाय सूर्य किरणों के ताप का सामना कर सकती है, इससे गाय (विशेष रूप से देशी गाय) का दूध ज्यादा स्वास्थ्यप्रद होता है। (युगशक्ति गायत्री, सित. ९०)

इन सब तथ्यों से बुद्धिमान व्यक्ति सहज रूप से ही समझ सकता है कि ‘‘गाय ही हमारी अर्थव्यवस्था के लिये श्रेष्ठ क्यों है?’’ क्योंकि हमारे अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाले व्यक्ति तथा बच्चे (कल के नागरिक) जैसा गुणों वाला भोज्य पदार्थ ग्रहण करेंगे, वे वैसे बनेंगे और देश को भी वैसी ही गति एवं विकास प्रदान करेंगे।

गाय से प्राप्त पदार्थों की महत्ता

आयुर्वेद में बताया गया है कि ‘‘गाय के दूध में विविध प्रकार के १०१ पदार्थ होते हैं जिनमें १९ प्रकार के स्नेहाल्म (फेटीओसड) हैं, ६ विटामिन, ८ क्रियाशील रस, २५ खनिज, १ शक्कर, ५ फास्फेट,१४ नाइट्रोजन पदार्थ हैं। इसमें २०% मक्खन होता है तथा कैल्शियम होता है जो हड्डियोें को मजबूत कर उसके क्षय को रोकता है। विटामिन तथा जैविक प्रोटीन भी खूब होता है,जिससे प्रक्रिया स्वाभाविक गति से चलती है। इस प्रकार गोदुग्ध पूर्ण आहार है।’’

‘‘चरक संहिता’’ में गाय के दूध के १० गुण बताये गये हैं— गाय का दूध स्वादिष्ट, ठण्डा, कोमल, स्निग्ध, सौम्य, गाढ़ा,लसदार, पुष्ट, बाहर के असर से काफी समय तक निष्प्रभावी, स्वचित्त को प्रसन्न करने वाला होता है।’’

गाय के दूध व अन्य पदार्थों पर किये कई वैज्ञानिक अनुसंधान निम्न तथ्य प्रकट करते हैं:—

गाय का दूध पीला रंग लिये होता है, जो केशर जैसा होता है, यह ‘‘क्यूरोसिन’’ नामक प्रोटीन के कारण होता है। यह केशर जैसा पदार्थ आरोग्यवर्धक, बुद्धिवर्धक, शीतलतादायक औषधि है जिससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।

भैंस के दूध में ‘लांग चेन फैट’ होती है जो शरीर की नसों में जम जाती है और बाद में हृदय रोगों को उत्पन्न करती है अत: हृदयरोगियों के लिए गाय के दूध का सेवन ही सर्वोत्तम है। (डा. शांतिलाल शाह—अध्यक्ष, इन्टर— नेशनल कार्डियोलाजी कान्फ्रेंस)

भैंस के दूध में गाय के दूध की तुलना ज्यादा मलाई व अन्य एस.एम.एफ.तत्व दिखते हैं, इसलिए भैंस का दूध महंगा बिकता है परन्तु गाय के दूध को गर्म करने पर उसके विटामिन्स और प्रोटीन अधिकांश मात्रा में सुरक्षित रहते हैं जबकि भैंस के दूध को गरम करने पर विटामिन्स व प्रोटीन की अधिकांश मात्रा नष्ट हो जाती है।

भैंस जीवजंतुयुक्त घास खा लेती है। पानी व कीचड़ के गड्ढों में पड़ी रहती है इसलिए उसका दूध ठण्डा और कषाययुक्त होता है। जबकि गाय घास के अग्रभाग को खाती है अत: इसका दूध मधुर रसयुक्त व लवण रस प्रधान होता है, जो विरेचक होता है।

डॉ. फ्रैंक लाऊन्टेन ने ‘‘एक लीटर गाय का दूध लेकर उसका प्रथक्करण किया तो देखने में आया कि इसमें आठ अण्डे तथा पांच सौ ग्राम मुर्गी का मांस तथा ७५० ग्राम मछली जितने तत्व मिल सकते हैं। मांस से गाय का दूध इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि इसके विटामिन तथा पोषक तत्व उच्च कोटि के होने के साथ साथ सुपाच्य और सात्विक होते हैं। इन तत्वों को शरीर स्वाभाविक रूप से ग्रहण करता है।

गाय के कच्चे दूध में आक्साइड रिडक्टेस जैसे पाचक रस अच्छी मात्रा में होते हैं जो शरीर में पैदा होने वाले टोकिसन्स तथा टोमेन्स जैसे विकारों को दूर करता है।

ठंड पोषक आहार से परवरिश की गई गाय के गोबर में जैसी कीटाणुनाशक शक्ति है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं।

गाय के ताजे गोबर की गंध से बुखार एवं मलेरिया के रोगाणु का नाश होता है।

—(डॉ. ब्रिगेड इटली)

रतौंधी में गो के ताजे गोबर का रस निचोड़ कर आंखों में आंझने से दस दिन में रोग से छुटकारा मिल जाता है।

(आर्य जगत—दिसम्बर १९९४)

पश्चिम के डॉक्टर गाय के सूखे गोबर पाउडर से धूम्रपान करवा कर दमे के रोग को दूर करने में रुचि ले रहे हैं।

गाय के घी को जलाने से उत्पन्न होने वाली गैस के चार प्रकार ज्ञात हुए हैं। घी जलाने से एसिटिलीन का निर्माण होता है, जो अशुद्ध वायु को स्वयं की तरफ खींचकर शुद्ध करती है।

गाय के घी में बहुत सारे रोग तथा मन की चिंताओं को दूर करने की अद्भुत क्षमता होती है तथा चूँकि इसके कण सूक्ष्म व नरम होते हैं जो जल्दी पच जाते हैं व मस्तिष्क की सूक्ष्मतम नाड़ियों में पहुंचकर ऊर्जा प्रदान करते हैं।

—‘‘अग्निहोत्र’’

गोमूत्र पीने अथवा सूंघने से बीटा तरंगें बलवान होती हैं और मगज में प्राणवायु की कमी दूर होती है।

—‘‘डॉ.फ्रैंकलीन’’

आस्ट्रेलिया में फसल के ऊपर कीटनाशक औषधियों के स्थान पर ‘‘गोमूत्र’’ छींटने में आता है। इससे हानिकारक जीवाणु का नाश होता है और फसल अच्छी होती है।

गाय के गोबर व गोमूत्र में पानी के प्रदूषित बैक्टीरिया को नाश करने की शक्ति होती है।

गाय पालने से या संपर्क में रहने से मनुष्य की उम्र बढ़ती है क्योंकि मनुष्य के सांस के हानिकारक लार्वा, बैक्टीरिया, गाय की श्वांस मेें नष्ट होते हैं।

(एशियन वैज्ञानिक शिरोमियना)

गाय के उक्त वर्णित औषधि गुणों के अतिरिक्त कई अन्य गुण एवं विशेषताएं भी हैं। कई गंभीर बीमारियों की औषधि के रूप में ‘घी’ तथा ‘गोमूत्र’ का प्रयोग किया जाता है। क्षय रोग, कैंसर आदि बीमारियों तथा सर्पदंश में भी गाय के गोबर का प्रयोग होता है।

इसी प्रकार गुजरात के एक क्षेत्र की इस घटना से हम गाय के दूध की महत्ता को सहज ही स्वीकार कर पायेंगे:-

‘मांझरी’ के पास एक घोड़ा पालन या परवरिश केन्द्र है। जिसे रेस’ के घोड़े परवरिश करने वाली कोई संस्था वर्षों से चलाती आ रही है। इनके घोड़े ‘रेस’ में हमेशा आगे रहते थे। अचानक उन्होेंने देखा कि घोड़े रेस में पिछड़ते जा रहे हैं। रेस के घोड़े पालना खर्चीला भी बहुत होता हे पर कमाई भी बहुत होती है अत:व्यवस्थापकों ने बारीकी से तलाश प्रांरभ की पर कोई कारण दिखाई नहीं दिया, बस घोड़े ‘रेस’ में आगे आना बंद होते गये। विदेशों से विशेषज्ञों को बुलाया गया उन्होंने वैज्ञानिक रूप से सब कुछ देखा पर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाये क्योंकि सब कुछ तो बराबर पूर्ववत ही था।

निराश होकर बाहर निकल रहे थे, तभी दरवाजे के पास ‘तबेला’ देखा और उसमें बंधी भैंस को देखकर बोले, ये कौन सा प्राणी है ? जबाब मिला— भैंस है, इसे इन घोड़ों को दूध पिलाने हेतु रखा गया है। वे विशेषज्ञ नीचे उतरे और पूछा पहले किसका दूध पिलाते थे उत्तर मिला गाय का। वे उसी समय बोले—‘‘गाय का दूध पिलाना शुरू करो और कुछ करने की जरूरत नहीं है।’’

गाय के दूध पर परवरिश शुरू की और घोड़े पुन: रेस में आगे आना शुरू हो गये। इस प्रकार के अनेकों उदाहरण हमें मिलते हैं जिसे देखकर गाय के गुणों को पहचान सकते हैं। हमें हमारी अर्थव्यवस्था यदि बहुआयामी एवं सुदृढ़ व स्वस्थ मानसिकतायुक्त बनाना है तो गाय को ही इसका प्रमुख आधार बनाना पड़ेगा।

उपसंहार

ईश्वर ने हरेक प्रजा को भले ही फिर वह भारतीय हो, अफगानिस्तानी हो या यूरोपीय हो, शारीरिक और बौद्धिक शक्ति बराबर दी है। इस सम्पत्ति को मानव स्वयं के कर्म से घटा—बढ़ा सकता है। जिस प्रजा या मानव में यह सम्पत्ति अधिक है व मानव अथवा प्रजा कम संपत्ति वाले मानव या प्रजा पर राज्य करते हैं। रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ इसके साक्षी हैं कि उस समय जब आर्य मात्र गाय का पालन करते थे, तब पृथ्वी पर उन्हीं की सत्ता थी। इतिहास देखने से यह भी ज्ञात होता है कि लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व भारत में भैंस का आगमन हुआ और उसके दूध, घी के सेवन से भारतीयों के बुद्धि, बल, विवेक तथा शांति का विनाश होता चला गया। इसके बाद भारतीय अफगानिस्तानी, मुस्लिम और अंग्रेजों से पराधीन होते रहे। यूरोप में भैंस के दूध का सेवन कभी नहीं होता है। गाय के दूध व उससे बनी वस्तुओं का ही सेवन होता है क्योंकि वे गाय के गुणों से सुपरिचित हैं जबकि दूसरी ओर भारत में स्थिति यह है कि आज खेती के सारे संसाधन गांवों से निकल रहे हैं। खेती के लिए खाद, बीज, पानी, बिक्री के लिए बाजार सब सरकार के हाथों में केन्द्रित हो गये हैं। महंगाई के आगे किसान घुटने टेक चुका है इसीलिए बैल की अच्छी कीमत जब मांस का व्यापारी उनके सामने फेंकता है तो वे लालच या लाचारी में उसे बेच देता है। आज गांव में बैल की कीमत आसमान छू रही है। उसे कौन खरीदे और कौन पाले? जब किसान को बैलों की आवश्यकता होती है तो वह गांव के भूपति से जो चार बैलों की हैसियत रखता हे, किराये पर ले लेता है। इसी कारण गाय जैसे उपयोगी पशु कत्लखाने की ओर जा रहे हैं। गौवंश की हत्या का सवाल वर्षों से उलझा हुआ है। इस समय देश में गोमांस का निर्यात करके अधिक से अधिक विदेशी मुद्रा कमाने की दौड़ चल रही है। इस कारण सरकार ने भी बड़े बड़े कत्लखाने बनवाये हैं। बंबई का देवनार कत्लखाना एशिया में अपने ढंग का सबसे बड़ा कत्लखाना है।

यहाँ के मांस के सबसे बड़े ग्राहक अरब देश हैं। गोमांस की कीमत २५०/ रु. प्रति किलो तक बताई जाती है। इन कत्लखानों में जानवरों को कत्ल करने के कुछ कानून बनाये गये हैं परन्तु इन कानूनों का कितना पालन हो रहा है, इसको कोई व्यक्ति किसी भी कत्लखाने के मुख्य द्वार पर खड़े होकर देख सकता है। अगर यही क्रम चलता रहा तो हमारी दूध देने वाली ९०% गायेेंं खत्म हो जायेंगी और दूध का उत्पादन ७०% कम हो जायेगा। बंबई, कलकत्ता और मद्रास जैसे शहरों में ५० हजार से ज्यादा उपयोगी व कम उम्र के पशुओं का कत्ल होता है क्योंकि सरकार इस योजनावधि में ५०० करोड़ रुपये का मांस निर्यात करना चाहती है।

विदेशी लोगों की कूटनीति तो देखिए कि वे गाय के दूध को पीने के लिये गायों को हमारे यहाँ से ले गये और अब गाय के मांस को खाने के लिये हमसे ही हमारी गायों को कत्ल करवाकर मांस आयात कर रहे हैं। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो भविष्य मेें भारत के बच्चे गाय को प्राणी संग्रहालयों में ही देख पायेंगे। यह हमारे लिये कितने शर्म की और त्रासदी की बात है। इसे देखकर तो रघुवंश की यह उक्ति याद आती है जिसे गाय की रक्षा के लिये अपने आपको समर्पित करने वाले महाराजा दिलीप ने कहा है कि—

अल्पस्य हे बहुहातुमिच्छन् विचारमूढ: प्रतिभासि मे त्वम्।।

अर्थात् छोटी से छोटी चीज के लिये बहुत बड़ा लुटा देने वाले विचारमूढ़ होते हैं।

यह विचारमूढ़ता ही है कि जो वृहद् मुंबई नगरपालिका द्वारा संचालित देवनार बूचड़खाने में प्रतिवर्ष १८० करोड़ रुपये मूल्य का पशुधन काटा जा रहा है। यदि ये काटना बन्द हो जाये तो ३ लाख ७० हजार टन अनाज,१० लाख टन चारा,३० लाख टन खाद, २० करोड़ ५७ हजार टन दूध और ९ लाख ८० हजार लोगों को रोजगार मिल सकता है।

अपने देश के कृषकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी तो ही हम समय के साथ दौड़ सकेंगे। किसानों के पास उत्तम बीज खरीदने हेतु पर्याप्त धन होगा, जमीन के लिये छोटे—छोटे टुकड़ों में गहन खेती करने हेतु पर्याप्त भोजन होगा तभी तो बढ़ती जनसंख्या का भार वे उठा सकेंगे।

गोपालन को प्रत्येक किसान पूरक व्यवसाय के रूप में अपनायेगा तो उसकी समस्त समस्याओं का समाधान हो जायेगा तथा देश की आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ बना सकेगा।

अत: ग्राम एवं राष्ट्रीय विकास के लिये अधिष्ठान रूप गोवंश का सार्थक उपयोग करें ताकि कुपोषण रुके, पौष्टिक अनाज, स्वस्थ पर्यावरण, स्थानीय उद्योग बढ़े और पुरुषार्थ प्रकट हो।

कु.जया पटेल