महासती चंदना

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महासती चन्दना

सिन्धु देश की वैशाली नगरी में राजा चेटक राज्य करते थे। वे जिनेन्द्रदेव के परम भक्त थे, उनकी रानी का नाम सुभद्रा था। इन दम्पत्ति के दस पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सुकम्भोज, अवंâपन, पतंगक, प्रभंजन और प्रभास नाम से प्रसिद्ध हुए तथा उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों के समान जान पड़ते थे। इन पुत्रों के सिवाय सात ऋद्धियों के समान सात पुत्रियाँ भी थीं, जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी सुप्रभा, उससे छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलना, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी।

विदेहदेश के कुण्डलपुर नगर में नाथवंश के शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियों से सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्य के प्रताप से प्रियकारिणी उनकी पत्नी हुई थीं। वत्सदेश के कौशाम्बी नगर में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे, मृगावती नाम की दूसरी पुत्री इन्हें ब्याही गई। दशार्ण देश के हेमकच्छ नगर के स्वामी राजा दशरथ थे, ये सूर्यवंश के तिलक थे। सूर्य की निर्मल प्रभा के समान सुप्रभा इनकी रानी हुई थीं। कच्छदेश के रोरुक नामक नगरी में उदयन नाम का प्रतापशाली राजा था उसको प्रभावती नाम की चौथी पुत्री विवाही गई थी। अच्छी तरह शीलव्रत के पालन करने से उसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था। गांधार देश के महीपुर नगर में राजा सत्यक रहता था, उसने राजा चेटक से उसकी ज्येष्ठा नाम की पुत्री की याचना की परन्तु राजा ने नहीं दी। इससे उसने कुपित होकर रणांगण में युद्ध किया परन्तु युद्ध में वह हार गया। जिससे मान भंग होने से उसने दमवर मुनिवर के समीप जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली।

तदनन्तर राजा चेटक ने स्नेह के कारण सदा देखने के लिये पट्टक पर अपनी सातों पुत्रियों के उत्तम चित्र बनवाये। राजा चेटक देव की पूजा के समय जिनप्रतिमा के समीप ही अपनी पुत्रियों का चित्रपट पैâलाकर सदा पूजा किया करते थे। किसी समय राजा चेटक अपनी सेना के साथ मगध देश के राजगृह नगर में गये। वहाँ उन्होंने नगर के बाह्य उपवन में डेरा डाला। स्नान करने के बाद उन्होंने पहले जिनप्रतिमाओं की पूजा की और उसके बाद समीप में रखे हुए चित्रपट की पूजा की। यह देखकर राजा श्रेणिक ने समीपवर्ती लोगों से पूछा कि यह क्या है ? तब उन लोगों ने कहा कि राजन्! ये राजा की सातों पुत्रियों के चित्रपट हैं। इनमें से चार पुत्रियाँ तो विवाहित हो चुकी हैं परन्तु तीन अविवाहित हैं, उन्हें ये अभी नहीं दे रहा है। इन तीन कन्याओं में दो तो यौवनवती हैं और छोटी अभी बालिका है।

लोगों के उक्त वचनों को सुनकर राजा ने मंत्रियों से बतलाया कि मेरा मन इन दोनों पुत्रियों में अनुरक्त हो रहा है। मन्त्री लोगों ने यह समाचार अभयकुमार से कहा और यह भी बतलाया कि राजा चेटक अपनी इन पुत्रियों को राजा श्रेणिक की अवस्था ढल जाने के कारण देना नहीं चाहता है। मंत्रियों के वचन सुनकर कार्य के उपाय में चतुर अभयकुमार ने कहा कि आप लोग चुप बैठिये, मैं इस कार्य को सिद्ध करता हूँ। इस प्रकार सन्तुष्ट करके अभयकुमार ने मन्त्रियों को तो विदा कर दिया और स्वयं एक पटिये पर अपने पिता राजा श्रेणिक का सुन्दर चित्र बनाया। उसे वस्त्र से ढककर बड़े यत्न से ले गया। वैशाली में प्रवेश कर एक व्यापारी का वेष बनाकर युक्ति से राजा चेटक के घर में प्रवेश किया। अपने पुरुषार्थ से दोनों कन्याओं को आकर्षित कर सुरंग के मार्ग से उन्हें लाने लगा। बीच में चेलना ने ज्येष्ठा को आभूषण लाने हेतु भेज दिया और स्वयं अभयकुमार के साथ राजगृह नगर आ गई। राजा श्रेणिक ने बड़ी प्रीति से चेलना के साथ विवाह करके उसे महादेवी का पट्ट बाँधा, जिससे वह बहुत ही सन्तुष्ट हुई।

ज्येष्ठा ने इस घटना से विरक्त होकर यशस्वती आर्यिका के समीप आर्यिका दीक्षा ले ली। उस समय कुमारी चन्दना ने भी उन्हीं आर्यिका के समीप सम्यग्दर्शन और श्रावकों के व्रत ग्रहण कर लिये।

किसी एक समय वह चन्दना अपने परिवार के लोगों के साथ अशोक नामक वन में क्रीड़ा कर रही थी। उसी समय दैवयोग से विजयाद्र्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी सुवर्णाभ नगर का राजा मनोवेग विद्याधर अपनी मनोवेगा रानी के साथ क्रीड़ा करता हुआ वहाँ से निकला और क्रीड़ा करती हुई चन्दना को देखकर काम के द्वारा छोड़े गये बाणों से जर्जर शरीर हो गया। वह शीघ्र ही अपनी स्त्री को घर भेजकर और रूपिणी विद्या से अपना दूसरा रूप बनाकर उसे सिंहासन पर बैठा दिया तथा आप तत्क्षण ही अशोक वन में आकर चन्दना का हरण करके शीघ्र वापस चला गया। उधर मनोवेगा रानी उसकी माया को समझ गयी। जिससे क्रोध के कारण उसके नेत्र लाल होकर भयंकर दिखने लगे। उसने उस देवता को बायें पैर की ठोकर देकर मार दिया जिससे वह अट्टहास करती हुई सिंहासन से उसी समय चली गई। तदनन्तर वह मनोवेगा रानी आलोकिनी विद्या से अपने पति की सब चेष्टा जानकर उसके पीछे दौड़ी और आधे मार्ग में विलाप करती हुई चन्दना सहित लौटते हुए अपने पति को देखकर बोली कि यदि आप अपना जीवन चाहते हो तो इसे छोड़ दो। इस प्रकार क्रोध से उसने उसे बहुत ही डाँटा।

मनोवेग विद्याधर अपनी रानी से बहुत ही डर गया अत: उसने हृदय में शोक से व्याकुल होकर पर्णलघ्वी नाम की विद्या से उस चन्दना को भूतरमण नामक वन में ऐरावती नदी के दाहिने किनारे पर छोड़ दिया। पंचनमस्कार का जाप करते हुए चन्दना ने वह रात्रि वहाँ पर बड़े ही कष्ट से बिताई। प्रात:काल जब सूर्य का उदय हुआ तब भाग्यवश एक बालक नामक भील वहाँ आ पहुँचा। चन्दना ने उसे अपने बहुमूल्य आभूषण दिये और धर्मोपदेश भी दिया, जिससे वह भील बहुत ही सन्तुष्ट हुआ। वहीं भीमवूâट पर्वत के पास भयंकर नामक पल्ली का स्वामी सिंह नाम का एक भील राजा था। उस बालक भील ने चन्दना को ले जाकर उस सिंह राजा को सौंप दी। सिंह पापी था, अत: चन्दना को देखकर उसका हृदय काम से मोहित हो गया। वह चन्दना को अपने आधीन करने के लिए उद्यत हुआ। यह देखकर उसकी माता ने समझाया कि हे पुत्र! तू ऐसा मत कर, यह प्रत्यक्ष देवता है, यदि कुपित हो गई तो कितने ही संताप, शाप और दु:खों को देने वाली होगी। इस प्रकार माता के कहने से डरकर उसने स्वयं दुष्ट होने पर भी चन्दना छोड़ दी। तदनन्तर उस चन्दना ने उस भील की माता के साथ निश्चिन्त होकर कुछ काल वहीं पर व्यतीत किया। वहाँ भील की माता अच्छी तरह उसका भरण-पोषण करती थी।

तदनन्तर वत्सदेश के कौशाम्बी नगर में वृषभसेन नाम का सेठ रहता था। उसके मित्रवीर नाम का कर्मचारी था, जो कि उस भीलराज का मित्र था। भीलों के राजा ने वह चन्दना उस मित्रवीर के लिए दे दी और मित्रवीर ने भी बहुत धन के साथ भक्तिपूर्वक वह चन्दना अपने सेठ के लिये सौंप दी। किसी एक दिन वह चन्दना उस सेठ को जल पिला रही थी, उसी समय उसके केशों का कलाप छूट गया और जल से भीगा पृथ्वी पर लटक रहा था। उसे वह बड़े प्रयत्न से एक हाथ से सम्भाल रही थी। सेठ की स्त्री भद्रा नामक सेठानी ने जब चन्दना का वह रूप देखा, तो वह शंका से भर गयी। उसने मन में समझा कि हमारे पति का इसके साथ सम्पर्वâ है। ऐसा मानकर वह बहुत ही कुपित हुई और क्रोध से उसके होंठ काँपने लगे। उस दुष्टा ने चन्दना को सांकल से बाँध दिया तथा खराब भोजन और ताड़न मारण आदि के द्वारा निरन्तर ही उसे कष्ट पहँुचाने लगी। परन्तु चन्दना यही विचार करती थी कि ये सब मेरे द्वारा पूर्व संचित पाप कर्मों का ही फल है। यह बेचारी सेठानी क्या कर सकती है ? वह निरन्तर आत्मनिन्दा किया करती थी। उसने यह सब समाचार अपनी बड़ी बहन मृगावती के पास भी कहलाकर नहीं भेजे।

किसी एक दिन उस नगरी में आहार के लिये भगवान महावीर आये। उन्हें नगरी में प्रवेश करते देख चन्दना उनके सामने जाने लगी। उसी समय उसके सांकल के सब बन्धन टूट गये। चंचल भ्रमर के समान काले बड़े-बड़े केश चंचल हो उठे और उनसे मालती की माला टूटकर नीचे गिरने लगी। उसके वस्त्र आभूषण सुन्दर हो गये, वह प्रभु की नवधाभक्ति करते हुये भक्तिभाव के भार से झुक गई१। शील के माहात्म्य से उसका मिट्टी का सकोरा स्वर्णपात्र बन गया और कोदों का भात शाली चावल का भात हो गया। उस बुद्धिमती चन्दना ने भगवान की विधिपूर्वक पड़गाहना कर आहारदान दिया। इसलिये वहाँ पर पंचाश्चर्य हुए, रत्नों की वर्षा हुई सो ठीक ही है क्योंकि उत्कृष्ट पुण्य के अपने बड़े भारी फल तत्काल ही फलते हैं।

तदनन्तर चन्दना की बड़ी बहन मृगावती, जो कि वहाँ की महारानी थी, वह सारा समाचार सुनकर वहाँ आई। स्नेह से चन्दना का आलिंगन कर सारा वृत्तान्त विदित किया। पिछला समाचार सुनकर बहुत ही व्याकुल हुई और चन्दना को अपने साथ लिवा ले गई। यह देख भद्रा सेठानी और वृषभसेन सेठ दोनों ही भय से घबराये हुये मृगावती के चरणों की शरण में आये। दयालु रानी ने उन दोनों से चन्दना के चरणों में प्रणाम करवाया। चन्दना के क्षमा कर देने पर वे दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि यह मूर्तिमती क्षमा ही है। चन्दना के समाचार को प्राप्त कर वैशाली से उसके भाई आदि भी मिले और परम आनन्द माना।

इधर जगद्बन्धु भगवान वर्धमान ने भी छद्मस्थ अवस्था के बारह वर्ष व्यतीत किये और जृंभिक नगर के समीप ऋजुवूâला नदी के किनारे मनोहर नामक वन के मध्य में रत्नमयी शिला पर सालवृक्ष के नीचे ध्यान में आरूढ़ हुये। उसी समय उन्हें केवलज्ञान प्रकट हो गया। समवसरण में चन्दना ने आर्यिका की दीक्षा लेकर गणिनी का स्थान प्राप्त किया जिसके अनुशासन में छत्तीस हजार आर्यिकायें थीं।

बहुत से लोग इस कथानक का वर्णन करते हुए कहते हैं कि चंदना नामक दासी का उद्धार हुआ या चन्दना को वेश्या ने खरीदा पुन: सेठ ने वेश्या से खरीदा, यह सब कल्पनाएँ गलत ही हैं।

किसी विद्वान् ने एक बार उपदेश में कहा कि ‘‘भगवान महावीर को आहार देते समय चन्दना के पास मिट्टी का सकोरा सुवर्ण का हो गया और कोदों का भात शाली चावल का भात हो गया यह भी कल्पना है, सर्वथा असत्य है।’’

हमें कभी भी अपने आर्ष ग्रन्थों पर ऐसी अश्रद्धा नहीं करना चाहिये, अन्यथा शील के प्रभाव से सीता के अग्निकुण्ड में वूâदने पर वह जल का सरोवर हो गया, सेठ सुदर्शन के शूली का सिंहासन हो गया आदि सब धर्म के फल झूठे ही मानने होंगे। साक्षात् तीर्थंकर के प्रभाव से इन चमत्कारों का हो जाना सम्यग्दृष्टि श्रद्धालु के लिये अमान्य नहीं कहा जा सकता है। </div>