मांगीतुंगी 108 फुट प्रतिमा

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मांगीतुंगी 108 फुट प्रतिमा

ऋषभगिरि के भगवान ऋषभदेव की कथा

(काव्य कथानक)
-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न चन्दनामती
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जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ-२

कैसे प्रभु प्रगटे पर्वत पर, सबसे ऊँची प्रतिमा बनकर।
चमत्कार हुआ भारत भू पर, मानो इसे डिवाइन पावर।।
जय हो ऋषभगिरि के अधिनाथ, बोलो जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।१।।
दिव्यशक्ति इक गणिनी माता, जिनका नाम ज्ञानमती माता।
इनकी सुन्दर गौरव गाथा, जिनके पद में झुके हर माथा।।
इनसे मिले ऋषभगिरि के अधिनाथ, बोलो जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।२।।
सन् उन्निस सौ छ्यिानवे में, मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में।
चातुर्मास हुआ माता का, शरदपूर्णिमा दिन पावन था।।
ध्यान में आये प्रभु आदिनाथ, बोलो जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।३।।
तब माँ ज्ञानमती ने बताया, प्रतिमा प्रगट करो समझाया।
इक सौ अठ फुट ऊँची हो काया, पूर्वमुखी हो यह भी बताया।।
ये प्रभु होंगे तीरथनाथ, बोलो जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।४।।
प्रात:काल मुझे बतलाया, मेरे मन आश्चर्य समाया।
मोतीसागर पीठाधीश जी, एवं ब्रह्मचारी रवीन्द्र जी।।
शिष्य त्रिवेणी कहे जय जय मात, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।५।।
गुरु माता ने करी घोषणा, पहुँच गई जन जन में सूचना।
सब जन का विश्वास परम था, कार्य पूर्ण तो अवश्य ही होगा।।
क्योंकि प्रेरिका हैं ज्ञानमति मात, बोलो जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।६।।
वह पावन इतिहास दिवस था, स्मरण रखो सब ही उस दिन का।
पर्वत पर पाषाण मिल गया, सिद्धक्षेत्र का भाग्य खिल गया।।
बन गये उसमें प्रभु आदिनाथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।७।।
ऋषभदेव प्रभु का क्या परिचय, यहाँ संक्षेप में जानेंगे सब।
आदम बाबा आदिब्रह्मा, ये हैं प्रजापति जगदानंदा।
इस धरती के प्रथम मुनिनाथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।८।।
पुण्य पुरुष की पुण्य कथा है, सुनके इसे मिट जाती व्यथा है।
दूर से ही जैसे रवि किरणें, धरती का अंधेरा हर लें।
वैसे ही यह भी कथा है सुखकार, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।९।।

तर्ज-वीर महावीर बोलो, जय जय महावीर

जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ, जय जय मांगीतुंगी ऋषभगिरि के आदिनाथ।
इनकी प्रतिमा बनी हैं जहाँ पर, भव्यात्मन्! हम भी चलें वहाँ पर।
ईसवी सन् की इक्कीसवीं सदि, धन्य हुई इसे मिलीं ज्ञानमति।
इस सदि ने पाया आदिनाथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।१।।
                                             
अनुसंधान हुआ पाषाण का, शुरू हुआ काम मूर्ति निर्माण का।
सन् दो हजार दो में शुभ घड़ी आई, प्रथम शिलापूजन करवाई।
सिंघपति को यह मिला सौभाग्य, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।२।।
बड़े बड़े वास्तुविद् आये, इंजीनियर मशीनें लाए।
पत्थर कटने लगा पर्वत पर, खाई में गिरा लाखों ट्रक पत्थर।।
दश वर्षों में बना तब काम, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।३।।
इधर काम चलता था गिरि पर, प्रभु का नाम जपें माताजी उधर।
पूजा विधान अखंड कराए, बीस बरस तक रुकने न पाए।।
यह सब शक्ति थी इनके साथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।४।।
माँ की माला जनता का माल, दोनों से संस्कृत हुई मालामाल।
केवल जैन दिगम्बर जनता, से धन लेकर किया खर्चा।।
उससे ही बने त्रिलोकी नाथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।५।।
दो हजार बारह सन् आया, दिवस पचीस दिसम्बर पाया।
सोने की छेनी लेकर पहुँचे, स्वामी रवीन्द्रकीर्ति पर्वत पे।।

किया शुरू मस्तक से कार्य, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।६।।


प्यारे भाइयों एवं बहनों!

आप लोग समझ गये होंगे कि सन् २००२ से पर्वत पर शिला काटने का कार्य चला। बड़ी-बड़ी मशीनों से लाखों ट्रक पत्थर कटकर खाई में गिरता रहा पुन: १० वर्षों के बाद सन् २०१२ में मूर्ति बनाने लायक लगभग १३० फुट का पाषाण शिलाखण्ड निकल आया और उसमें २५ दिसम्बर २०१२ को सोने की छेनी-हथौड़ी से स्वामी रवीन्द्रकीर्ति जी ने मूर्ति बनाने का काम शुरू किया।

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी उस समय हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर विराजमान थीं, वे वहीं से भगवान के शीघ्र पाषाणसे भगवान बनने की भावना से ‘‘ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:’’ मंत्र की लाखों-करोड़ों माला पेâरती रहीं। उनकी तपस्या का प्रभाव हम सभी ने साक्षात् देखा है अत: सभी मिलकर बोलेंगे-

तर्ज-हम जैन कुल में जन्मे हैं........

गणिनी ज्ञानमती माता पर, अभिमान करो रे।

ये तो जैन कुल की शान हैं, गुणगान करो रे।।टेक.।।
इनने भारतीय संस्कृति की शान बढ़ाई,
ऋषभदेव प्रभु की सबसे बड़ी मूर्ति बनाई।।
मूर्ति प्रेरिका इस माता पर, अभिमान करो रे।

ये तो जैन कुल की शान हैं, गुणगान करो रे।।१।।
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प्रतिमा निर्माण के मध्य अनेकानेक चमत्कार हुए। दिगम्बर जैन समाज के अमीर-गरीब सभी ने इसमें द्रव्य लगाकर आशातीत सुख-सम्पत्ति को प्राप्त किया। एक बार की बात है-एक रिटायर्ड इंजीनियर श्रावक ने हस्तिनापुर में स्वामीजी से कहा कि मैं १ लाख ८ हजार रुपये की राशि देकर प्रतिमा निर्माण के शिलालेख में अपने परिवार का नाम लिखवाना चाहता हूँ, किन्तु स्वामीजी! मुझे केवल १५ हजार रुपये पेंशन के मिलते हैं अत: मैं यदि तीन वर्ष की बजाय यह राशि ६-७ वर्ष में जमा करा दूँ तो क्या आप मुझे ऐसा करने की स्वीकृति देंगे ? दयालु प्रकृति के रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने उत्तर दिया-ठीक है आपकी ऐसी इच्छा है तो हमें स्वीकार है। फिर उन श्रावक महानुभाव के साथ क्या चमत्कार होता है, जानिए-

तर्ज-णमोकार णमोकार.....

आदीनाथ आदीनाथ, ऋषभदेव आदीनाथ.....पुरुदेव आदिनाथ
श्रद्धा भक्ति से दिये दान का है अतिशय रेकार्ड। आदिनाथ.........
छह वर्षों में देने की जो इच्छा थी श्रावक की।
छह महिने में ही लाकर के दे दी उनने राशी।।
बोले मेरा बहुत पुराना धन मिल गया है आज।
आदीनाथ आदीनाथ, ऋषभदेव आदीनाथ।।१।।

बंधुओं! यह कथा है इक्कीसवीं सदी के एक ऐसे स्वर्णयुग की, जिसमें विश्व के सबसे बड़ी प्रतिमा निर्माण का महत्तम कार्य हुआ और सारे संसार ने आस्था-पारस आदि टी.वी. चैनलों के माध्यम से तिल-तिल करते बढ़ते भगवान ऋषभदेव को देखा तथा अपनी शक्ति के अनुसार धनराशि भी विशालकाय मूर्ति निर्माण ट्रस्ट को प्रदान कर पुण्य का अर्जन किया।

आपने टी.वी. चैनल में एक गीत भी खूब सुना और गाया है-

सबसे बड़ी मूर्ति का, मांगीतुंगी तीर्थ का, दुनिया में नाम हो रहा है,

मूर्ति का निर्माण हो रहा है-२।।टेक.।।
देखो जाके पास में, भक्ति लेके साथ में, सबसे बड़ा काम हो रहा है,

मूर्ति का निर्माण हो रहा है-२।।१।।

प्रतिमा निर्माण के मध्य एक दिन एक बड़ा सा शेर-शेरनी और उसका बच्चा ऐसे तीन शेर आये, कार्य करने वाले शिल्पी एवं मजदूर लोग कुछ डरे किन्तु वहाँ उपस्थित इंजीनियर सी. आर. पाटिल-पुणे ने भगवान ऋषभदेव और ज्ञानमती माताजी की जोरदार जय बोलते हुए उन लोगों से कहा-भैय्या! डरो मत ये शेर यहाँ भगवान को देखने आये हैं, तुम्हारा ये कुछ नहीं बिगाड़ेंगे, क्योंकि हमारी आराध्य पूज्य ज्ञानमती माताजी सभी की कुशलता के लिए माला फेर रही हैं और यहाँ पर्वत पर उन्होंने पूरी सुरक्षा का मंत्रकवच भी पहना दिया है........आदि।

बात बिल्कुल सच हुई, तीनों शेर थोड़ी देर वहाँ शान्त भाव से रुके और कुण्ड में भरा शीतल जल पीकर कहाँ चले गये, पता नहीं।

‘‘जय बोलो ऋषभदेव चमत्कारिक भगवान की जय’’। ‘‘मूर्ति निर्माण की सम्प्रेरिका पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की जय’’ आगे और क्या होता है, सुनिए-

तर्ज-ऐसी लागी लगन............

शेर आते रहे, और जाते रहे, वे तो प्रभु पद की महिमा बताते रहे।
ऋषभगिरि पर कई बार शेर दिखे।
जाने वे देवता शेर बन आते थे।।
बिन सताए किसी को वे जाते रहे........शेर आते रहे...।।१।।
जैन शासन की महिमा कही यह ही है।
शेर अरु गाय इक घाट जल पीते हैं।।
प्रभु निकट प्रभु भी मैत्री दिखाते रहे.....शेर आते रहे.......।।२।।

अर्थात् शेर तो कई बार वहाँ आते दिखाई पड़े, किन्तु कभी किसी को कोई कष्ट नहीं दिया।

बंधुओं!

इसी बीच एक दिन यात्रा को आई एक अम्मा जी पर्वत पर पहुँची, वहाँ प्रतिमा निर्माण से निकलते हुए एक पत्थर को उसने उठाया और बड़ी श्रद्धापूर्वक वह उसे अपने घर ले गई। पुन: सन् २०१५ में जब पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी मांगीतुंगी में विराजमान थीं, वे अम्मा जी पुन: मांगीतुंगी पहुँची और सभा में अपने चमत्कारिक अनुभव का बखान करते हुए कहने लगीं-

तर्ज-मैं क्या करूँ राम मुझे......

मैं क्या कहूँ भाई, चमत्कार हो गया।

मैं क्या कहूँ बहनों, मुझे उपहार मिल गया.....हाँ उपहार मिल गया।
बनती हुई मूर्ति का, इक पत्थर लेकर मैं गई।
पानी में डाला फिर उस पानी को मैं पी गई।।
मेरा घुटना ठीक हुआ, चमत्कार हो गया।।मैं क्या....।।१।।
इक भैय्या को पानी दिया, पथरी निकल गई।
माइग्रेन की पीड़ा इक बहन की निकल गई।।

मूर्ति की ऊर्जा का चमत्कार हो गया।।मैं क्या कहूँ भाई....।।२।।

बोलिए चमत्कारिक बाबा, दुनिया के सबसे बड़े भगवान ऋषभदेव की जय।

जिनधर्म के श्रद्धालु भक्तों! ऐसे चमत्कारिक भगवान के एक छोटे से पाषाण से यदि इतने चमत्कार देखे गये हैं, तो सोचिए कि वह सर्वोच्च प्रतिमा कितनी चमत्कारिक होगी, तो आपको एक बार उनके दर्शन करके अपनी मनोकामना अवश्य पूर्ण करनी चाहिए।

देखो! यूँ तो मांगीतुंंगी में महाराष्ट्र की यह सह्याद्री पर्वत माला सैकड़ों किलोमीटर लम्बी पैâली हुई है किन्तु इस पावन सिद्धक्षेत्र पर समुद्री सतह से ३६०० पुâट ऊपर मूर्ति का यह अखण्ड पाषाण मिलना ही सबसे बड़ा चमत्कार है। इस विषय में मेरे द्वारा सन् १९९० में लिखा गया एक गीत जो पूरी समाज में बहुत प्रसिद्ध हुआ है, यहाँ प्रसंगोपात्त बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है-

नाम तिहारा तारण हारा, कब तेरा दर्शन होगा।
तेरी प्रतिमा इतनी सुन्दर, तू कितना सुन्दर होगा।।
पृथ्वी के सुन्दर परमाणु सब तुझमें ही समा गये।
केवल उतने ही अणु मिलकर, तेरी रचना बना गये।।
इसीलिए तुम सम सुन्दर नहिं कोई नर सुन्दर होगा।
तेरी प्रतिमा इतनी सुन्दर, तू कितना सुन्दर होगा।।१।।

एक दिन सन् २०१६ में सम्पन्न हुए पंचकल्याणक महोत्सव के बाद एक उदयपुर (राज.) की तरफ का अजैन व्यक्ति मेरे पास आया और उसने मुझे बताकर अचम्भित कर दिया। उसने बताया कि मैं आपकी मूर्ति बनाने वाले पहाड़ पर पोकलैण्ड मशीन की गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर हूँ।

वह बोला-माताजी! मैं जब शुरू में पोकलैण्ड के अंदर ड्राइवर सीट पर बैठा तो बहुत डर गया और सोचने लगा कि यहाँ काम बड़ा खतरे का है, अगर जरा सी गाड़ी अनबैलेंस हो गई तो मैं कहाँ गिरूँगा, मेरा क्या होगा, मेरी घर गृहस्थी कैसे चलेगी......इत्यादि।

फिर जानिए उसके साथ क्या चमत्कार होता है-

तर्ज-ए री छोरी बांगड़वाली..........

ऋषभगिरि मांगीतुंगी में अतिशय मैंने देखा है-२।।टेक.।।
ज्यों ही सोचा मन के अंदर, मुझे काम नहिं करना है।
खतरे का यह काम छोड़कर, जा अपने घर रहना है।।
तभी सामने ऋषभदेव को, आते मैंने देखा है।।ऋषभगिरि...।।१।।
एक नहीं दो तीन बार, साक्षात् प्रभू का दर्श हुआ।
कहा उन्होंने मत जा बच्चे, बता तुझे क्या कष्ट हुआ।।
फिर तो भाग गया सारा डर, चमत्कार यह देखा है।।ऋषभगिरि...।।२।।

बंधुवर! उस ड्राइवर ने बताया कि मुझे तो भगवान का साक्षात् दर्शन और आशीर्वाद मिला, फिर तो मैंने मूर्ति का निर्माण पूरा होने तक काम किया और आज मैं पूर्ण स्वस्थरूप में अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।

‘‘जय बोलिए परम चमत्कारिक विश्व के सबसे बड़े ऋषभदेव भगवान की जय’।।

इस प्रकार के अनेक चमत्कारिक अनुभवों को हम लोगों ने सुना और साक्षात् देखा भी है। यहाँ पर विषय को ज्यादा न बढ़ाकर अब आपको ले चलती हूँ। प्रतिमा की पूर्णता और पंचकल्याणक महाप्रतिष्ठा की ओर-

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जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ-२........

सिर मुख बनना शुरू हुआ जब, देख देख आश्चर्यचकित सब।
पुण्यमयी पाषाणखण्ड पर, पुण्यवान शिल्पी चढ़े ऊपर।।
ठन ठन छन छन करी आवाज, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।१।।
बहुत कठोर था पत्थर प्रभु का, डेढ़ वर्ष में बना सिर मुख था।
नयन कपोल दिखे अति सुन्दर, मानो प्रगटे मरुदेवी उर।।
शिल्पी नाठा का भी जग गया भाग्य, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।२।।
जब अवयव दिखने लगे प्रभु के, पारसचैनल से देखा सबने।
पंचकल्याण की करें प्रतीक्षा, मांगीतुंगी जाने की इच्छा।।
भक्तों की दृष्टि में बसे जिननाथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।३।।
एक दिवस फिर ऐसा आया, गणिनी माता ने बिगुल बजाया।
दो हजार चौदह ईसवी सन् शरदपूर्णिमा तिथि थी उत्तम।।
जम्बूद्वीप से गूंजा नाद, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।४।।
दो हजार सोलह में होगा, महाबिम्ब का महोत्सव होगा।
माघ सुदी तृतिया से दशमी, ग्यारह से सत्रह थी फरवरी।।
झण्डारोहण से करो शुरूआत, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ पूजा।।५।।
पुन: पूज्य माताजी अपनी शारीरिक अशक्तता देखते हुए कहने लगीं-
संघ चतुर्विध खूब बुलाओ, मुझको टी.वी. में दिखलाओ।
ट्रस्ट को आशिर्वाद है मेरा, यहीं से प्रभु पद नमन है मेरा।।
मेरे हृदय में हैं त्रिभुवननाथ, जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ।।६।।

बंधुओं!

पूरे देश में पंचकल्याण महामहोत्सव की तारीखें घोषित होते ही महाहर्ष की लहर दौड़ गई और चारों ओर से आवाजें आने लगीं कि पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी का सान्निध्य इस महोत्सव में अवश्य होना चाहिए किन्तु माताजी की शारीरिक स्थिति देखते हुए हम संघ के लोग भी अधिक आग्रह की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे।

भक्तों के उत्साह को देखकर मेरे शब्दों ने एक गीत का रूप धारण किया और वह टी.वी. पर आया तो सबके मनमयूर नाचने लगे-

मांगीतुंगी तीर्थ से आमंत्रण आया है, हम सब मांगीतुंगी जाएंगे।
मांगीतुंगी जाएंगे, वहाँ पंचकल्याण रचाएंगे।।मांगीतुंगी.......।।टेक०।।
विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा, पर्वत पर वहाँ प्रगट हुई।
ऋषभदेव भगवान की इक सौ अठ फुट प्रतिमा राज रही।।
उसी के पंचकल्याणक का अब अवसर आया है, हम सब मांगीतुंगी जाएंगे।।१।।

आखिर हम सबके सौभाग्य ने साथ दिया और मार्च २०१५ में एक दिन पूज्य माताजी के मुख से निकला-

चलो, अपन भी चलें प्रभु ऋषभदेव के पास मांगीतुंगी, शरीर तो नश्वर है ही, जो होगा सो देखा जायेगा। इतने बड़े प्रभु के दर्शन करके मेरा जनम सफल हो जायेगा। मेरी प्रेरणा का वृक्ष सामने प्रगट होकर खड़ा है। अब भगवान मुझे शक्ति दे और मैं अपने परमपिता के दर्शन कर सकूँ, ४-५ महीने की मेरी यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न हो, यही भगवान शांतिनाथ से प्रार्थना है।

पुन: १७ मार्च २०१५ चैत्र शुक्ला द्वादशी को वे जब संघ सहित हस्तिनापुर-जम्बूद्वीप से मांगीतुंगी के लिए मंगल विहार करती हैं तो अनेकानेक भक्तों की आँखों में खुशी और दु:ख से मिश्रित आंसू थे।

उस समय सबके मुख से निकल पड़ा-

बड़े-बड़े बाबा ने बड़ी माता को बुलाया है,

माता मांगीतुंगी जाएंगी।

मांगीतुंगी जाएंगी-वहाँ पंचकल्याण कराएंगी।।बड़े-बड़े.....।।

प्यारे भक्तों! जैन साधुओं का विहार हर प्राणी के लिए हितकारी होता है पुन: ज्ञानमती माताजी जैसी अलौकिक साध्वी के संघ विहार से उत्तरप्रदेश-मध्यप्रदेश-राजस्थान और महाराष्ट्र के विभिन्न अंचलों में आशातीत धर्मप्रभावना हुई। ग्वालियर-सोनागिरि-इंदौर आदि महानगरों में तो पूज्य माताजी को साक्षात् सरस्वती मानकर उनके प्रवचनों का खूब लाभ प्राप्त किया। बीच-बीच में पूज्य माताजी को थोड़ी-थोड़ी अस्वस्थता भी आई लेकिन सभी बाधाओं को पार करके वे हम सबको साथ लेकर ३० जुलाई २०१५ आषाढ़शुक्ला चतुर्दशी को मांगीतुंगी पहुँच गईं और बड़े धूमधाम से संघ का मंगल पदार्पण मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर हुआ।

इस संघ विहार के संघपति बनने का सौभाग्य प्राप्त किया औरंगाबाद महाराष्ट्र के श्रावकरत्न श्री प्रमोद कुमार जम्मनलाल जैन कासलीवाल एडवोकेट ने। मांगीतुंगी के ऋषभगिरि पर्वत पर उस समय प्रतिमा का निर्माणकार्य बहुत तेज गति से चल रहा था। जिस दिन वे मांगीतुंगी पधारीं, उस दिन तो वर्षायोग स्थापना का दिन था, अत: संघ ने वर्षायोग स्थापना विधि सम्पन्न किया। पुन: १ अगस्त २०१५ श्रावण कृष्णा एकम् को वे बड़ी आतुरता के साथ पर्वत पर पहुँची। वे क्षण वास्तव में बड़े रोमांचक थे। सैकड़ों भक्त नर-नारी उस समय उपस्थित थे। पूज्य गणिनी माताजी अपने हर्षाश्रुओं से मानो प्रभु ऋषभदेव के चरण पखार रही थीं और अपने को कृतकृत्य महसूस कर रही थीं। उस समय के दुर्लभ चित्र भी अनेक भक्तों ने व्हाट्सअप आदि के माध्यम से देशभर में प्रचारित किये थे। उन रोमांचक क्षणों को आप इस गीत के माध्यम से जानेंगे-


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तर्ज-मेरे गुरुदेव आए...........

ज्ञानमती माता आई मांगीतुंगी तीर्थ में।
मानो माँ ब्राह्मी आई पिता के समीप में।।टेक.।।
सन् उन्निस सौ छियानवे में, मांगीतुंगी आई मात ये।
ऋषभदेव की मूर्ति प्रेरणा, दी माता ने जगी चेतना।।
उन्हीं जिनवर के निकट आई मात तीर्थ पे।
मानो माँ ब्राह्मी आईं पिता के समीप में।।ज्ञानमती.।।१।।
प्रतिमा बन अब पूर्ण हुई है, दुनिया में प्रभु जय गूंज रही है।
पहला महोत्सव उसका आया, स्वर्ग के सदृश आनंद छाया।।
उसी उत्सव के लिए आई मात तीर्थ पे।
मानो माँ ब्राह्मी आई पिता के समीप में।।२।।

चातुर्मास के मध्य पंचकल्याणक महोत्सव की व्यापक तैयारियाँ चलती रहीं। स्वस्तिश्री पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी के कुशल नेतृत्व में पूरा मांगीतुंगी तीर्थ एवं आसपास लगभग १० किलोमीटर का क्षेत्र देवोपुनीत नगरी के रूप में परिवर्तित होकर अयोध्या के सर्वतोभद्र महल के रूप में सज गया और देखते-देखते सन् २०१६ का वर्ष आ गया।

महोत्सव समिति द्वारा आमंत्रण दिये गये अनेक साधु संघों का पदार्पण दिसम्बर २०१५ से शुरू हो गया। बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण परम्परा के सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज २७ दिसम्बर २०१५ को चतुर्विध संघ के साथ मांगीतुंगी पधारे, महोत्सव कमेटी एवं पूज्य ज्ञानमती माताजी सहित सम्पूर्ण संघ ने पट्टाचार्य श्री का भरपूर अभिनंदन किया। उस समय का दृश्य भी बड़ा भावभीना था, जब आचार्यश्री ने अपनी धर्ममाता पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के साथ प्रथम मिलन के अवसर पर भक्तों से माताजी की वृहत् पूजा करवाई।

पुन: १ जनवरी २०१६ को परमपूज्य आचार्यश्री पद्मनंदि महाराज के संघ का पदार्पण हुआ, उनका धर्मवात्सल्य भी अविस्मरणीय रहा। देखते-देखते २४ जनवरी २०१६, माघ कृ. एकम् के पवित्र दिवस की ऐतिहासिक घड़ी आई, जब जयपुर की नाठा फार्म के कुशल शिल्पी ने भगवान के नेत्रों में पुतली का आकार बनाकर प्रतिमा निर्माण को पूर्णता प्रदान किया, तब प्रभु की जय-जयकारों से आकाश मंडल गूंज उठा।

इस अवसर पर पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी क्या भावना अपने प्रभु के चरणों में व्यक्त करती हैं जानें-

हे तीनलोक के नाथ प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान! जैसे आज आपकी प्रतिमा के नेत्र खोलकर शिल्पी ने प्रतिमा पूर्ण किया है, इसी प्रकार कभी ऐसा दिन आवे कि मेरे ज्ञाननेत्र खुल जावें और मैं केवलज्ञानी परमात्मा बन जाऊँ। धन्य हैं धन्य हैं प्रभु ऋषभदेव और धन्य हैं उनकी प्रतिमा निर्मात्री ज्ञानमती माताजी।

फिर ११ फरवरी २०१६, माघ शुक्ला तृतीया की शुभ घड़ी आ गई और श्रीमती सरिता एम.के. जैन-चेन्नई (अध्यक्ष-भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी) ने भारी महोत्सव के साथ झण्डारोहण किया और महाजिनबिम्ब का महापंचकल्याणक महोत्सव महा आयोजनों के साथ सम्पन्न हुआ। इस महोत्सव में भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य सौ. कुमकुमदेवी-डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल (महामंत्री-मूर्ति निर्माण कमेटी) को प्राप्त हुआ। सौधर्म इन्द्र उत्तराखण्ड-हरिद्वार निवासी श्रेष्ठी श्री जे.सी. जैन एवं सौ. सुनीता जैन बने, धनकुबेर का पद श्री मनोज जैन-सौ. नविता जैन-मेरठ (उ.प्र.) ने प्राप्त किया। इसी प्रकार सभी विशिष्ट पदों को प्राप्त करके अनेक पुण्यशाली भक्तों ने अपना नाम इतिहास में अमर कर लिया।

महोत्सव में सान्निध्य प्रदान करने वाले १२५ साधु-साध्वियों के दर्शन कर सम्पूर्ण देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु भक्तों ने स्वर्णयुगीन इतिहास के साक्षी बनकर जिस अनन्त पुय का संचय किया है वह लेखनी से परे है।

‘‘ऋषभगिरि के ऋषभदेव’’ की यह काव्यकथा सम्पन्न करते हुए दो शब्दों में आपको बताना है कि-

साधना को सत्य का शृंगार मिल गया।
भावना को पुरुषार्थ का आकार मिल गया।।
अब ज्ञानमती माता की अर्चना फल लेके आई है,
जब पाषाण को इक मूर्ति का आकार मिल गया।।

सब मिलकर बोलें-

तर्ज-देख तेरे संसार की हालत....................

विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा बनी है आलीशान,

जय जय ऋषभदेव भगवान।।टेक.।।
मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में।
पर्वत के पाषाण खण्ड में।।
गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माता की प्रेरणा महान,
जय जय ऋषभदेव भगवान।।१।।
ऋषभदेव प्रतिमा प्रगटी है।
गुरुमाता की तपशक्ती है।।
उनका गौरवमय ससंघ सानिध्य मिला है महान,
जय जय ऋषभदेव भगवान।।२।।
इक सौ अठ फुट की यह प्रतिमा।
जिनशासन की अद्भुत गरिमा।।
यह आश्चर्य प्रथम है जग में जैनधरम की शान,
जय जय ऋषभदेव भगवान।।३।।
यह है आयडॅल ऑफ अहिंसा।
भारत की पहचान अहिंसा।।
इसे ‘‘चन्दनामती’’ हृदय से कर लो सभी प्रणाम,
जय जय ऋषभदेव भगवान।।४।।
श्री रवीन्द्रकीर्ति का समर्पण।
भक्तों का अर्थाञ्जलि अर्पण।।
अमर रहेगा युग युग तक सबका तन मन धन दान,

जय जय ऋषभदेव भगवान।।५।।

विश्व की इस सर्वोच्च प्रतिमा का नाम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज हो गया-६ मार्च २०१६ को। पुन: विश्व रेकार्ड के रूप में पूरे एक वर्ष तक इस विशाल प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक बिना किसी व्यवधान के चला और लाखों-लाख नर-नारियों ने पंचामृत अभिषेक करके प्राचीन आगम परम्परा को जीवन्त कर दिया। अब भारत की धरती पर सदा-सदा असंख्यों वर्ष काल तक सत्य-अहिंसा-अनेकांत की यह जीवन्त प्रतिमा दिगम्बर जैन प्राकृतिक धर्म एवं भारतीय संस्कृति का ध्वज विश्व के क्षितिज पर फहराती रहेगी। अत: आप ध्यान रखें-

As America is famous by the statue of liberty.Paris is famous by Eiffel Tower. Now India will be famous by The Statue of Ahimsa-Lord Rishabhdev.

जय ऋषभदेव बोलो जय जय आदिनाथ-२............

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भगवान ऋषभदेव के प्रथम पुत्र भरत के जीवन वृत्त पर आधारित

भरत का भारत: एक संक्षिप्त इतिहास
-रचयित्री - प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न चन्दनामति
भरतस्य भारतम्- भरतस्य भारतम्

जय भारतं जय भारतं जय भारतं जय भारतं
भरतस्य भारतम्-२
जयति जय जय चक्रवर्ती भरत जिन का भारतम्।
जयति जय जय ऋषभप्रभु के पुत्र भरत का भारतम्।।
रत जहाँ तल्लीन तन्मय भा-प्रभा अध्यात्म में।
ऋषि मुनी तीर्थेश भी तन्मय रहें निज आत्म में।।
भरत के वैराग्य से सार्थक सुनाम है भारतम्।।
जब भरत को पितु ऋषभ ने
अपना मुकुट पहना दिया
तब
राजा अयोध्या के बने
अनुवूâल सबको बना लिया
सारी प्रजा सुख मग्न थी
भरतेश की वह भक्त थी
फिर एक दिन क्या होता है ?
वनमाली दौड़ा दौड़ा आया
बोला-
राजन्! ऋषभदेव को केवलज्ञान हुआ है
आकाश में समवसरण का निर्माण हुआ है
पीछे पीछे सेनापति आये
कहा उन्होंने स्वामी सुन लो
चक्ररत्न की महिमा लख लो
आयुधशाला चमक उठी है
अब आपके चक्रवर्ती बनने की
शुभ सूचना मिल चुकी है
तुरन्त आ गई दासी अन्त:पुर से
बोली, राजन्! सूरज से पुत्र का जन्म हुआ है
भाग्य आपका धन्य हुआ है
भेंट मुझे अब देनी होगी
नगर सूचना करनी होगी
सबकी बधाई लेनी होगी
एक साथ में तीन सूचना
मिली भरत जी का क्या कहना
चिन्तन करें भरत क्या करना ?
तभी याद आए पुरुषारथ
चार प्रकार कहे हैं ये सब
धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष
पहले पालन किया धर्म का
वन्दन जाकर किया प्रभु को
पूजन करके लौटे घर को
गये पुन: आयुधशाला में
चक्ररत्न की चमक देखने
उसकी यथायोग्य पूजन कर
आये अन्त:पुर में राजन
पुत्र का मुख देखा प्रसन्न मन
सबको दान दिया मुंह मांगा
खुशियों का अम्बार लगा था
अर्थात् तीनों पुरुषार्थों का क्रम से पालन कर
चतुर्थ मोक्ष को साकार किया था
मोक्षमार्ग में चलकर गृहस्थ धर्म को सार्थक किया था
फिर चक्ररत्न को आगे करके
छह खण्डों पर चले विजय प्राप्त करने
जीता सभी को बने चमक्रवर्त
नहीं उनके मन में अहंकार तब भी
घर में भी रहकर भरत जी विरागी
शासन चलाकर भी थी आत्मदृष्टी
यही तो खटकती थी बातें सभी को
हम वैâसे मानें वैरागी भरत को
हैं उनके छियानवे हज्जार रानी
नवनिधि व चौदह रतन हैं जिनकी निशानी
चौरासी लाख हाथी
अठारह करोड़ घोड़े
असंख्यों सैनिक थे उनके विंâकर बने
बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा नमित थे
अयोध्या थी छह खण्डों की राजधानी

सब मिलकर बोलें-
तर्ज—है प्रीत जहाँ की रीत सदा......

प्रभु ऋषभदेव के पुत्र भरत से, भारतदेश सनाथ हुआ।
यह आर्यावर्त इण्डिया हिन्दुस्तान नाम से सार्थ हुआ।। टेक.।।
यहाँ तीर्थंकर प्रभु लार्ड गॉड, साधूजन सेन्ट कहाते हैं। हो......
गुलदस्ते की भांति कई, जाती व पंथ आ जाते हैं।। हो......
तत्त्व की प्राप्ती का-२, संचालित यहाँ से पाठ हुआ।
यह आर्यावर्त इण्डिया हिन्दुस्तान नाम से सार्थ हुआ।।१।।
भारत को भारत रहने दो, इण्डिया न यह बनने पाए। हो......
आध्यात्मिक संस्कृति का, अपमान नहीं होने पाए।। हो......
ऋषभ, राम, महावीर, बुद्ध-२, का अमर सदा सिद्धान्त हुआ।
आर्यावर्त इण्डिया हिन्दुस्तान नाम से सार्थ हुआ।।२।।
की सीता सम नारी पर, छाया न किसी की पड़ पाए। हो......
जन्मीं ब्राह्मी माता सम, माँ ज्ञानमती के गुण गायें।। हो......
भारत की संस्कृति-२, का तब ही उत्थान हुआ।
आर्यावर्त इण्डिया हिन्दुस्तान नाम से सार्थ हुआ।।३।।

Religious Gentlemen!

You have known now that who was king bharat. in short you should know here Bharat was the eldest son of Lord Ayodhya firstly and after some time He conquered six Khandas of Bharat region of Jambudweep, then He become Chakravarti Emperor by his Chakra Ratna. The name of our nation is - BHARAT on the name of Samrat Chakravarti Bharat. you know this freequently that all of us are very lucky, because we have born in Bharat, You donot call this country as India, but call only Bharat Varsh.

जय हो जय हो-भरत का भारत (३ बार सब मिलकर बोलें)

भरतस्य भारतम्

जय भारतम् जय भारतम् जय भारतम् जय भारतम्

भरतस्य भारतम्

-गीत-

हम भारत के भरत में है, अभिमान करो रे।
इस सोने की चिड़िया पे, स्वाभिमान करो रे।।
आम्ही भरताच्या भारत मधे, अभिमान करायचे।
ही स्वर्ण चिड़िया आहे, स्वाभिमान करायचे।।
जिकड़े भरतां ने कठिन तपस्या केली होती।
जिकड़े ऋषि मुनि ने आत्म प्रभा रति केली होती।।
तिकड़े आम्ही जन्म घेतो, हे अभिमान करायचे।
आम्ही भरताच्या भारत मधे अभिमान करायचे।

What He used to think about his Soul & Wordly pleasures or sorrows,you know in kannad also-
गेहवुनन्नदु देहवु नन्नदु येन्नु वेया वरमरुळेला।

नेहव माडिद वस्तु गळाववु निन्नोड नेन्दुगु वरलिल्ला।।
नीरू हालू सेरिद परियलि जीव शरीर बगेयुतिरू।

नीर निळुद वर हालु नेळव चिरु चिन्मय हंस निनागुतिरु।।

भव्यात्माओं! क्या कहा है इस कन्नड़ बारह भावना की अन्यत्व भावना में-गेहवु नन्नदु अर्थात् घर-मकान-कोठी-बंगला-कार-मोटर सब कुछ आत्मा से भिन्न है।

भरत चक्रवर्ती यही तो चिन्तन करते थे कि मेरा यह छह खण्ड का विशाल राज्य-हाथी-घोड़े-नवनिधि-चौदह रत्न सब कुछ मेरे नहीं है-मेरी आत्मा से इनका कोई संबंध नहीं है, ये सर्वथा मुझसे भिन्न हैं-पर हैं-पुद्गल हैं-नश्वर हैं.......आदि।

आगे और क्या कहा है कि भरत जी क्या चिन्तन करते हैं-देहव नन्नदु अर्थात् मेरा शरीर भी मेरा अपना नहीं है, एक दिन यह भी नष्ट होने वाला है यदि अक्षय-अविनश्वर शरीर पाना है तो तपस्या करना पड़ेगा, इस नश्वर शरीर से मोह छोड़कर अनन्तकाल तक रहने वाले शरीर को पाना होगा। वह शरीर कौन सा है ? ‘‘ज्ञानशरीरी त्रिविध कर्ममल वर्जित सिद्ध महन्ता’’ अर्थात् द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म इन तीन प्रकार के कर्ममलों से रहित ज्ञानशरीरी हैं सिद्ध भगवान्! वैसा ही ज्ञानशरीर भरत जी प्राप्त करने के लिए आत्मतत्त्व का सदैव चिंतन करते थे।

‘‘भरत जी घर में वैरागी’’ की बात सुन-सुन कर एक बार अयोध्या के एक नागरिक ने राजसभा में भरत चक्रवर्ती से प्रसन्न किया-

महाराज! गलती की माफी चाहता हूँ।

एक प्रश्न का उत्तर आपसे जानना चाहता हूँ।
पूछो, मेरे बंधुवर! भरतराज ने कहा,
तब कहने लगा वह नागरिक सहृदयता से-
राजन्! आपके पास इतनी सम्पत्ति
छियानवे हजार रानियाँ हैं,
अतुल्य सेना और ३२ हजार मुकुटबद्ध
राजाओं की ३२ हजार राजधानियाँ हैं।
और जाने क्या-क्या है ?
मैं नहीं जानता, आपके मन में क्या है ?
लेकिन जनता का प्रश्न है कि-
आप वैâसे हो सकते हैं घर में वैरागी?
भगवान आत्मा के प्रति वैâसे हो सकते हैं रागी ?
स्वामी! हम भी आपसे शिक्षा चाहते हैं।
आप बताएं, तो आप जैसी दीक्षा चाहते हैं।
बोले चक्रवर्ती भरत जी!
छह खण्ड के अधिप जी!
मैं आपके प्रश्न का उत्तर बताऊँगा
बिल्कुल सच सच समझाऊँगा।
किन्तु उससे पहले
आप मेरी बात सुनो
पहली बार मेरे महल में आए हो
आपका यहाँ स्वागत है
पहले पूरा महल घूमो, देखो और मन में गुनो
खुश हुआ वह अयोध्या का नागरिक
बोला, राजन्! आप भेजें मेरे साथ एक नागरिक
फिर भेजा भरत ने उसके साथ एक सिपाही
नागरिक के हाथों में दिया कटोरा पूरा तेल भर के
सिपाही चला हाथ में नंगी तलवार ले करके
बोले भरतराज
हे मेरे बंधुवर! अयोध्या के प्रिय नागरिक!
आप घूमें पूरा महल
तेल की एक बूंद गिरे ना
यदि गिर गई तो
आपका सिर धड़ से अलग हो जाएगा
बस, इतना ही कहना है तुमसे मेरे बंधुवर!
महल में घूमकर वापस आओ,
मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूँगा
चला नागरिक सुनो मेरे भाई,
केवल उसने दृष्टि तेल के कटोरे पर लगाई।
पूरा महल घूमकर राजसभा में वो आया,
राजन ने पूछा-क्या क्या देख पाया,
वह बोला-मैं कुछ भी न देख पाया,
क्योंकि आपने मुझ पर तलवार लटाकाया।
मैं तो देखता रहा कटोरा,
वह भरा है या अधूरा।
मुझे तो चिंता है अपनी जान की,
नहीं है चाह अपने मान सम्मान की।
यह दृश्य देखकर बोले राजा भरत जी,
ओ मेरे बंधुवर!
मिल गया तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर
सुनो! मेरे राज की बात,
चूँकि मेरे सर पर सदा लटक रही है काल की तलवार
मैं अपनी आत्मा के प्रति सजगता के लिए रहता हूँ सदा तैयार
न जाने कब काल आ जाएगा,
मुझे मेरा राज्य छुड़ा कर ले जाएगा।
इसीलिए मैं अपने कर्तव्य में लीन रहता हूँ,
गृहस्थ धर्म के पालन में तल्लीन रहता हूँ।
झुक गया मस्तक अयोध्या के नागरिक का
बोला राजन्! अब मिल गया हम सबके प्रश्न का।
बंधुओं! आपने अब जान लिया,
एक नागरिक के माध्यम से
सारी अयोध्या और छह खण्ड वसुधा ने जाना था सब युग में
तब से ही पुराणों ने घोषित कर दिया
भरत जी घर में वैरागी, भरत जी घर में वैरागी
जय हो वैरागी भरत भगवान की-२
इस प्रकार का इतिहास
भरत का वैराग्य,
अमर हो गया भारत में
देश का नाम भारत पड़ गया,
उन्हीं के नाम से
सुनो भाई-बहनों!
यहीं यह इतिहास खतम नहीं हो जाता है,
आगे उनके महाव्रतरूप त्याग से जुड़ जाता है।
एक दिन दर्पण में मुख देखते हुए सिर पर सपेâद बाल को देखकर
भरत जी को हो गया राज्य से पूर्ण वैराग्य
छोड़ दिया रानियाँ और छोड़ दिया पूरा छह खण्ड का साम्राज्य
जीर्णतृण के समान सब कुछ छोड़कर पीछे मुड़कर कभी देखा नहीं,
जाकर वैâलाश पर्वत पर जैनेश्वरी मुनि दीक्षा लेकर
केशलोंच करने लगे
बस देखते ही देखते
केशलोंच के मध्य ही उन्हें हो गया केवलज्ञान
उन्हें प्राप्त हो गया आतमज्ञान
ना ही किया आहार
ना गये किसी के द्वार
वे तो गये उस गिरि पर, कैलाश पर्वत पर
जहाँ गये उनके पिता ऋषभदेव भगवान
वे कर्म नष्ट कर वहीं से गये थे शिवधाम
प्रभु के मोक्ष जाने पर जहाँ दुखी हुए थे कभी भरत
पुत्र ऋषभसेन गणधर जी के सम्बोधन से
बोध को प्राप्त हुए थे यही भरत
आज वे भरत वहीं जाकर
पर्वत के पवित्र परमाणु पाकर
सारे दु:खों से छूटकर
आत्मसुख में निमग्न हो गये
इधर माता यशस्वती अपने पौत्र अर्ककीर्ति से कहती हैं-
अर्ककीर्ति सुन मेरो लाडलो!
कद म्हारा भरत जी घर आसी
कद म्हारा भरत जी घर आसी
अर्ककीर्ति कहता है-
सुन म्हारी दादी यशस्वती माँ!
पुत्र न अब धारे घर आसी
पुत्र न अब थारे घर आसी
दादी माँ और पोते का संवाद अयोध्या में चलता है
संसार का यह चक्र तो टाले नहीं टलता है
होनहार ही क्या कभी कभी
अनहोनी भी होकर ही रहती है
तो फिर इन मोक्षगामी पुत्रों की
होनहार कैसे टल सकती है
महानुभावों!
यह है कहानी भरतराज की
युग के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट् की
इन भरत जी की भी आयु पिता के समान ही
थी चौरासी लाख पूर्व वर्ष की
उसी में से अन्त में एक लाख पूर्व वर्ष की आयु
भरत भगवान की केवलीकाल में बीती
पुन: योग निरोध कर लिया वैâलाशपर्वत पर जाकर
मोक्ष प्राप्त कर लिया अघाति कर्म नशाकर
जो घर में भी वैरागी थे
एवं शिव नारी के प्रति अनुरागी थे
उन भरत राज के भारत का
आज भी गौरव है सारे संसार में
अध्यात्म और अहिंसा के रूप में
बंधुओं! यदि आपको भरत के भारत से प्यार है
तो भरत जी की वीतरागी प्रतिमा विराजमान करो
भरत के भारत का पुनर्निमाण करो
तभी जानेगा सारा संसार है
चक्रयुक्त भरत का स्टेचू बनाओ
मंदिर में उनकी मूर्ति पधराओ
उनके परिचय के शिलालेख लगाओ
उनके त्याग-वैराग्य का संदेश
जन जन तक पहुँचाओ
युग के प्रथम चक्रवर्ती
इक्ष्वाकुवंशी
उन्होंने राज्य भी किया
सब कुछ त्याग भी किया
उन भरत के भारत से
हमें अध्यात्म और अहिंसा का निर्यात करना है
यहाँ के तीर्थ-सन्त और भगवन्तों के साथ रहना है

जय हो भरत के भारत की जय
तर्ज-देख तेरे संसार की हालत.....
आदि ऋषभ के पुत्र भरत का भारत देश महान,

मेरा भारत देश महान-२।।
पहले भरतराज बने चक्री।
जीत लिया छह खण्ड की धरती।।
आत्म प्रभा में रत होकर फिर पाया केवलज्ञान,

मेरा भारत देश महान।
तर्ज-दीदी तेरा देवर दीवाना........
ऋषभजयंती सब मनाओ, भरत राज के गुणों को भी गाओ।

तीर्थंकर की महिमा बताओ, भरतराज के गुणों को भी गाओ।।
धरा पर यहाँ कर्मभूमि व्यवस्था, ऋषभदेव प्रभु ने बताई सभी को।
असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य-शिल्प से जीवन कला भी सिखाई है सभी को।

अयोध्या की महिमा बताओ, भरतराज के गुणों को भी गाओ।।

भगवान ऋषभदेव के द्वितीय पुत्र भगवान बाहुबलि का चरित्र काव्य

-रचयित्री - गणिनी ज्ञानमती
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(चौबोल छंद)
श्री जिन श्रुत गुरु वंदन करके वृषभदेव को नमन करूँ।

गुणमणि पूज्य बाहुबलि प्रभु के चरण कमल का ध्यान करूँ।।
श्री श्रुतकेवलि भद्रबाहु मुनि चन्द्रगुप्त नेमीन्दु नमूँ।
शांति सिंधु गणि वीर सिंधु नमि बाहुबली शुभ चरित कहूँ।।१।।
युग की आदि में वृषभदेव प्रभु मरुदेवी उर जन्म लिया।
पृथ्वी तल को तत्त्व रहस्य रु धर्मामृत का बोध दिया।।
श्री नाभेय अयोध्या पुरि में पूर्ण प्रभावी अधिप हुये।
इन्द्रादिक नुत धर्म नीतिमय प्रजानुपालन सुखद किये।।२।।
यशस्वती सुनंदा रानी सरस्वति लक्ष्मी सदृश थीं।
इक सौ तीन सुपुत्र पुत्रिसह शाश्वत कीर्ति प्रसरित थी।।
वृषभदेव ने पुत्र पुत्रि सब विद्या शास्त्र प्रवीण किये।
शस्त्राभ्यासाध्यात्मवादमय विश्व चतुरता रूप किये।।३।।
इन्द्रियजित प्रभु राज काज में योग क्षेम उपकार किये।
असि मसि आदिक षट्कर्मों को सुबोध आदि ब्रह्म हुये।।
सुर निर्मित पुरि इक्यासी तल रत्नमयी प्रासाद महा।
इन्द्रादिक नित सेवा में रत अखंड वसुधा राज्य महा।।४।।
जहाँ जहाँ भगवान प्रजापति प्रजा के सुख सौभाग्य अहो।
वर्णन कोई नहीं कर सकते सुवर्ण युग साक्षात अहो।।
इक्ष्वाकुवंशज कीर्ति पताका लहराती है नभगण में।
महा महिम महनीय त्रिजग पति त्रिवर्ग दर्शक थे जग में।।५।।
राज्य सभा में सुरेन्द्र प्रेरित निलांजना ने नृत्य किया।
त्रिज्ञानधारी वृषभ देव को उसी समय वैराग्य हुआ।।
राज्यपट्ट भरतेश्वर का कर शतसुत में भी बांट दिया।
लौकांतिकनुत दीक्षा ले प्रभु स्वात्म सुधारस पान किया।।६।।
भरत अयोध्यापति बाहुबलि पोदनपुर का राज्य किया।
उभय भ्रात में अमेय शक्ती दल बल महा प्रभाव हुआ।।
उधर वृषभजिन बहु तपकरके केवल ज्ञान कुं प्राप्त किया।
इधर भरतके आयुध गृह में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ।।७।।
भवन में पुत्र जन्म वृत्तांत युगपत त्रय को विदित किया।
प्रथम कैलाश गिरि पर जाकर प्रभु की पूजा भक्ति किया।
धनद रचित शुभ समवसरण में सद्धर्मामृत वरष रहा।।
शिवपथ पथिक भव्य जन का मन चातक सम अति हरष रहा।।८।।
धर्मकल्प द्रुम फल अर्थादिक धर्म प्रथम यह प्रगट किया।
पुन विधिवत षट्खंड जीतकर भारत भू यह नाम दिया।।
योगाभ्यासी भरतचक्रधर विनश्रम सुर नर वशित किये।
सहस बतीस मुकुटबद्धाधिप चरणों में सब नमित किये।।९।।
चौदह रत्न के सहस सहस सुर रक्षक विभव विशालता।
भरतेश्वर प्रमुदित मन अनुदिन रुचि से जिन पूजन करता।।
दानशील उपवास महोत्सव गृहि षट्कर्मी उदारता।
बहु पुण्योदय भोगी ज्ञानी चित्सुख अनुभव सुलीनता।।१०।।
महामहिम भरतेश्वर जब साकेत पुरी प्रस्थान किया।
चक्ररत्न पुर बाह्य रुक गया अभ्यंतर न प्रवेश किया।।
सेनापति अमात्य राजा गण सब दल विस्मय चकित हुआ।
अपूर्व लख यह भरतेश्वर का आस्य चन्द्र निस्तेज हुआ।।११।।
रहसि बुलाकर ज्योतिर्विदको कारण क्या यह प्रश्न किया।
छ: खंड वसुधा जीती प्रभु तुम अनुजों को पर वश न किया।।
तब चक्रेश्वर अमात्य गण सह विमर्श करके कार्य किया।
कुशल दूत कर पत्र दिया शत-भ्रात निकट को भेज दिया।।१२।।
सब भाई मिल विमर्श कर कैलाश गिरी पर जा करके।
आदीश्वर पितु चरण कमल में भक्ती से शीश नमा करके।।
जैनी दीक्षा ले तप करते निज स्वतंत्र सुख पाना है।
भरत राज इस घटना को सुन मन में बहु दु:ख माना है।।१३।।
पुन: मंत्रिगण सह विचारते बाहुबलि प्रति क्या करना।
स्वाभिमानयुत बहु बलशाली स्वानुकूल कैसे करना।।
प्रियवादी व्यवहार कुशल अति श्रेष्ठ दूत को बुला लिया।
युक्ति से कार्य करो तुम जाकर पोदनपुर को भेज दिया।।१४।।
दूत गया सविनय प्रणाम कर सर्व दिग्विजय कथन किया।
नीतिप्रवण बाहुबलि ने भी दूत का बहु सन्मान किया।।
प्रभो! भरतपति छ: खंड जयकर भ्रातृ प्रेम स्मरण किया।
भ्रात मिलन कर सुख अनुभव हो अत: प्रभो! यह विनय किया।।१५।।
बहुत दिवस से नहीं मिले प्रभु भरत हृदय बहु उत्सुक है।
भाई भाई मिल कुशल क्षेम कह मन हरषाओ यह शुभ है।।
सूक्ष्मग्राहि बाहुबलि बोले! पितु ने राज्य विभक्त किया।
पूज्य पिता की दी पृथ्वी पर हमने स्वाधीपत्य किया।।१६।।
अग्रज पितुसम धर्म नीति से नमस्कार हम कर सकते।
पर जब खड्ग लिये शिर ऊपर भ्रात प्रेम क्या कह सकते।।
भरत रहो सुख से निज पुर में हम निजपुर सुख से रहते।
उभय प्रजा पालन सुख करिये नहिं उनसे हम कुछ चहते।।१७।।
षट्खंडाधिप चक्रेश्वर हैं रहें हमें तो क्या करना।
राजनीति से राज राज कह, नहिं लेना उनका शरणा।।
पूज्य पिता कृत है गौरव मम फिर भी यदि गर्विष्ठ भरत।
वश करना चाहें मुझको तो रण में ही दो शक्ति विदित।।१८।।
दूत ने आ भरताधिप से सब समाचार को स्पष्ट कहे।
भरतने चिंतित होकर मन में बहुत प्रकार विचार किये।।
बाहुबलि नुति बिना चक्र यह पुरप्रवेश नहिं कर सकता।
गौरवशाली पोदनेश भी मम अनुकूल न हो सकता।।१९।।
और भ्रात सब पितु शरणागत बाहुबली अवशेष अनुज।
युद्ध बिना यह चक्र विरोधी करने से हो लोक विरुद्ध।।
बहु विमर्श कर भरेश्वरने कुपित हो रण प्रयाण किया।
उभय पक्ष में रण भेरी हुई सब जग विस्मय चकित हुआ।।२०।।
महा महिम भगवंत के पुत्र अतुलबली अरु साम्यबली।
महावीर्य युत उभय पक्ष में वरण करेगि किसे जयश्री।।
सुर विद्याधर बड़े-बडे नृप सब सुन रण में पहुँच गये।
योद्धागण हुंकार महा रव से पृथ्वीतल कंपा दिये।।२१।।
हाथी घोड़े रथ सैनिकगण का विचित्र संघट्ट हुआ।
महाभयंकर कल कल ध्वनि से शब्दात्मक यह जगत हुआ।।
सुर नर किन्नर यक्ष विद्याधर असंख्य जन विस्मित होकर।
बहु कौतुकवश युद्ध देखने चले सभी परिकर लेकर।।२२।।
नये नये भावों की लहरी सबके मन में उठती थीं।
उभय भ्रात सौंदर्य गुण कथा सबके मन को हरती थीं।।
सब नर नारी विस्मित चिंतित विद्वद्जन स्वभाव जगका।
चिंतन करते साम्यभाव से जगत सौख्य बहु दु:खप्रदा।।२३।।
कोई भरत गुण स्तवन करते बाहुबली गुण कोई गाते।
कामदेव चक्रीश उभय गुण शक्ति की तुलना नहिं पाते।।
अपूर्व साहस उभय भ्रात का सु देख मंत्री विचारते।
शक्य पराभव किसी का नहीं है यह मन में चितारते।।२४।।
चरम शरीरी आदीश्वर सुत आदिचक्रपति आदि मदन।
उभय भ्रात को इसही भव में करेगी मुक्तिरमा वरण।।
इति मंत्री गण विमर्श करके त्वरित भरत के पास गये।
देव देव! मम सुनो प्रार्थना हम सब कहते खोल हिये।।२५।।
विवेकशाली धर्म नीति प्रिय त्रिजग ईश के पुत्र उभय।
धर्म अहिंसा प्राण उभय का हाथ जोड़ हम करें विनय।।
आप प्रभो सम वीर्य पराक्रम उभय हार में शंका है।
ऐसा कोई उपाय करिये जिसमें धर्मकी रक्षा है।।२६।।
असंख्य प्राणी हिंसा होगी महा कदन यह करने से।
प्रजा हानि सर्वस्व हानि सम धर्म हानि के बढ़ने से।।
राजा प्रजा को प्राण समझे प्रजा के प्राण प्रिय राजा।
प्रजापति युग स्रष्टा ब्रम्हा के सुत जग यश विख्याता।।२७।।
उभय भ्रात में धर्म युद्ध हो हार जीत उसमें निश्चित।
दृष्टि युद्ध जल मल्ल युद्ध ये धर्म युद्ध हैं पापरहित।।
अमात्यवर्यकी विज्ञप्ति से धर्मा-धर्म विचार किया।
स्वीकृत कर त्रय युद्ध भरतने उभय सैन्य को विदित किया।।२८।।
सुर नर विद्याधर राजा गण बहु विस्मय युत देख रहे।
भुवनाकाश हुवा जन व्यापक जन जन तनु रोमांच बहे।।
दोनों भ्राता दृष्टि युद्ध में अनिमिष दृग कर आपस में।
मानों तृप्त नहीं होते हैं चिर वियुक्त अब मिलने में।।२९।।
भरत देह है पंचशत धतु भुजबलि पंच शतक पच्चीस।
ऊँचे अधिक बाहुबलि अग्रज नेत्र हुए टिमकार सहित।।
पुन: सरोवर में प्रविष्ट हो जल से क्रीड़ा युद्ध किया।
अग्रज के मुख पर बहु जल से व्याकुल करके जीत लिया।।३०।।
पुन: रंगभूमी में उतरे बाहू युद्ध महान हुआ।
मानो भ्रात मिलन आलिंगन प्रेम करें यह भास हुआ।।
युद्ध कुशल व्यायाम सुदृढ़तनु सब जन मन को चकित किया।
लीला मात्र से बाहुबलि ने चक्राधिप को उठा लिया।।३१।।
छ: खंड वसुधापति अग्रज की अविनय करना उचित नहीं।
अत: बिठाया निज वंâधे पर गौरव को रख लिया सही।।
जय जय बाहुबली बलशाली जय जय जय जय कार हुआ।
अहो चक्रिजित्! अहो पराक्रम! सुर नर सब जयघोष किया।।३२।।
लज्जित खिन्न कुपति चक्रेश्वर चक्र रत्न संस्मरण किया।
भुजबलि वध करने को उत्सुक चक्र घुमाकर चला दिया।।
घृणित भाव से कर्ण बंद कर जनता की ध्वनि प्रकट हुई।
बस बस साहस बस होवे अब देख नहीं यह सके मही।।३३।।
ज्वलित चक्र ज्योतिर्मय जगमग प्रभु से सब दिश व्याप्त किया।
सब जन दृग को चकाचौंध कर बाहुबली के पास गया।।
अवध्य वंशज बाहुबली की त्रय प्रदक्षिणा दे करके।
प्रभा रहित रुक गया चक्र श्री बाहुबलि शिष्य सम बनके।।३४।।
पूर्ण विजय श्री वरमाला ले बाहुबली को वरण किया।
परन्तु अग्रज निर्दयता ने भुजबलि हृदय विरक्त किया।।
अहो! भरत बहु विवेक पटु हो कैसे यह अन्याय किया।
अहो! अवध्य जान करके भी गोत्रज प्रति दुर्भाव किया।।३५।।
धिक् धिक् राज्य भोग सुख वैभव भ्रात प्रेम का घात करें।
धिक् धिक् मोह महा माया मय इन्द्रिय सुख बहु दु:ख भरे।।
नहीं रही है नहीं रहेगी लक्ष्मी विद्युत समा चला।
रहती सदा कीर्ति शुभ रमणी अविनाशी जग में अचला।।३६।।
जग जीवन में भोग भोग कर कितने जन्म बिताये हैं।
फिर भी तृप्ति न हुई कदाचित् तृष्णा में दु:ख पाये हैं।।
अगणित बार स्वर्ग में जाकर दिव्य महा सुख भोगे हैं।
अगणित बार नरक में जा जा महा दु:ख भी भोगे हैं।।३७।।
इन्द्रों के वैभव को पाकर भी संतोष नहीं आवे।
आकिंचन्य भाव ही ऐसा जिससे शाश्वत सुख पावे।।
बाहुबलि बोले हे अग्रज! चक्री पद ऐश्वर्य अहो!
शाश्वत है क्या समझ रहें तुम जरा विचारो बंधु अहो।।३८।।
अनंत चक्री तुम समान ही भोग भोग कर चले गये।
अनंत होंगे इस ही भूपर अरे विचारो खोल हिये।।
सभी आप सम समस्त वसुधा जीती है और जीतेंगे।
पुन: सभी ऐश्वर्य छोड़कर चले गये और जावेंगे।।३९।।
वेश्या सम इस लक्ष्मी को पा इसको अचला मान अरे!
उच्छिष्ट भोगी बन करके भी वैभव का अभिमान अरे।।
अथिर राज्य है इन्द्र जालसम स्वप्न सदृश हैं भोग मधुर।
पुत्रमित्र परिजन पुरजन सब प्रेम करें हैं स्वार्थ चतुर।।४०।।
सुन्दर ललनाओं की लीला ललित लास्य लावण्य अहो!
मधुर वचन श्रृँगार हास्यमय वीणा की झांकृत्य अहो!।
केवल मनको रम्य भासते हैं इन्द्रियसुख रागी को।
किन्तु अग्नि विष विषधर से भी अति भयप्रद वैरागी को।।४१।।
वृषभ देव सुत भरतेश्वर ने निज कुल का उद्धार किया।
अहो! भ्रातृवर इस पृथ्वीपर तुमने यह शुभ नाम किया।।
यह वैभव सुख रहे आपका आप इसे अनुभव कीजे।
बाल बुद्धि से किया युद्ध मैं यह अपराध क्षमा कीजे।।४२।।
अहो पूज्य! पितु तुल्य आप हैं यह कह सविनय नमन किया।
बड़े जनों का बड़ा हृदय है क्षमा करो यह विनय किया।।
आज्ञा दो जिनदीक्षा लेंगे यही मुझे अब इच्छा है।
जग वैभव तन सुख असार है यही पिता की शिक्षा है।।४३।।
भरत हृदय में चक्ररत्न भी असह्य दु:खस्वरूप हुआ।
बाहुबली वच श्रवण से हृदय शोक पूर्ण दुखरूप हुआ।।
भ्रातृप्रेम की गंगा ही क्या भीतर नहीं समाती है।
नेत्र मार्ग से बह करके ही पृथ्वीतल पर आती है।।४४।।
क्रोध मान कुछ क्षण पहले का मोह प्रेम में बदल गया।
मन बहु पश्चात्ताप कर रहा बंधु भाव भी प्रखर हुआ।।
अहो भ्रात! तुम बिन पृथ्वी का भोग मुझे क्या रुचिकर हैं।
दीक्षा का यह समय नहीं है यह चर्चा मम दुखकर है।।४५।।
सब लघु भ्राता दीक्षा लेवें हम एकाकी राज्य करें।
हे भ्राता! ऐसा मत कहिये अहो! महा विपरीत अरे।
कुछ दिन भाई-भाई मिलकर राज-काज शुभ काम करें।।
फिर दीक्षा ले योगी बनकर कर्म शत्रु का नाश करें।।४६।।
अग्रज की सुन मृदुमय वाणी भुजबलि सविनय विनय करें।
अहो! विज्ञ! दुख शोक तजो अब अनुग्रह हो हम गमन करें।।
इस आश्चर्यमयी घटना से सब जन हा-हाकार करें।
अविरल अश्रुधारा से भुजबलि चरणों का प्रक्षाल करें।।४७।।
धन्य-धन्य ये त्याग अहो! धन धन्य आपका भुज विक्रम।
षट्खंडाधिपको भी जीते अहो वीर्य है महान तम।।
मुकुटबद्ध भूपति खेचरपति बाहुबलि ढिग आते हैं।
बहु स्तवन प्रशंसन कर चरणों में शीश झुकाते हैं।।४८।।
बाहुबली सब राज्य मोह सुख तजकर वन को जाते हैं।
पुत्र मित्र मंत्री जन पुरजन सब जन दु:ख मनाते हैं।।
इस घटना से अंत:पुर में हा-हाकार महान हुआ।
मात सुनंदा सभी रानियों का मिल करुण विलाप हुआ।।४९।।
अहो! एक छण भी पहले जो समरभूमि कहलाती है।
वहीं स्वजन के दु:ख वियोग से अश्रु नदी बह जाती है।।
कुछ क्षण पहले जहाँ विविध वाद्यों की सुंदर ध्वनी हुई।
अहो! वहीं सब दिशा व्याप्त कर करुणा क्रन्दन ध्वनी हुई।।५०।।
परिजन रोये पुरजन रोये जग का भी कण-कण रोया।
भरत हृदय अति द्रवित हो गया देवों का भी मन रोया।।
उसी समय से पृथ्वी देवी नदियों के कल-कल रव से।
रुदन कर रही है ही मानो शोक पूर्ण कंठ स्वर से।।५१।।
भरत राज यह दृश्य देखकर मन में बहु दुख पाते हैं।
प्रियहित मधुरमयी वाणी से सब जन को समझाते हैं।।
अनहोनी हो गई दुखद यह मन ही मन सकुचाते हैं।
माता के चरणों में नत हो करनी पर पछताते हैं।।५२।।
सभी रानियाँ विचार करतीं हम भी कर्म का नाश करें।
दीक्षा लेकर आर्यिका की क्रम से शिवसुख प्राप्त करें।।
समवसरण में गुरुचरणों का आश्रय ले सुख पाती हैं।
तत्त्वज्ञान वैराग्य भाव से वियोग दु:ख भुलाती हैं।।५३।।
दीक्षा लेकर तप आचरतीं स्त्रीलिंग को नाशेंगी।
दिव्य स्वर्ग सुख भोग मनुज तन पाकर मुक्ति जावेंगी।।
भरताधिप का क्षीरोदधि जल मंगल वाद्य महोत्सव से।
महा राज्य अभिषेक किया सब सुर नर खगपति मिल करके।।५४।।
छत्र फिरे ढुर रहे चमर शुभ एक छत्र शासन जग में।
परन्तु अनुजों में न विभाग किया यह राज्य दु:ख मन में।।
अहो भ्रात बिन सार्व भौम मय चक्ररत्न क्या सुखकारी।
स्वादरहित अलवण भोजन सम भ्रातवियोग दुखद भारी।।५५।।
अहो! जगत में दैव बली है सुघटित को विघटित करता।
अनिर्वार अवितर्कित अघटित दुर्घटनाओं को करता।।
गर्व रहित तत्त्वज्ञ चक्रपति विधिवैचित्र्य विचार करें।
भोग भाग्यमय विधिनियोग से अनासक्तमन राज्य करें।।५६।।
बाहुबली कैलाशगिरी पर जाकर जिनदीक्षा लेकर।
एक वर्ष का महायोग ले खड़े हुए निश्चल होकर।।
भोग चक्रेश्वर भोग भोगते छ्यानवे सहस रानियों में।
फिर भी योगी योगाभ्यासी जैसे कमल रहे जल में।।५७।।
काम चक्रेश्वर कामभोग तज कामदेव मद हरते हैं।
एक वर्ष तक योग लीन हो योग चक्रेश्वर बनते हैं।।
रहसि खड़े निश्चल कल्पद्रुम हरित वर्ण तनु शोभ रहा।
लता छद्म से मुक्ती कन्या सवर्ण प्रभु को देख अहा।।५८।।
वर्ण रूप कुल गुण सदृश लख पुष्प माल ले वरती है।
शुभ एकांत प्रदेश देखकर प्रेमालिंगन करती है।।
परमानंद सुखामृत अनुभव से कुछ-कुछ दृग् मुकुलित हैं।
अविच्छिन्न सुख से ही मानों कायोत्सर्ग तनु अचलित हैं।।५९।।
भक्ति भाव से दर्शन वंदन करके भाक्तिक गण आकर।
मानों पूजें चरण कमल युग नील कमल को ला-लाकर।।
ऐसा भान कराते अजगर सर्प फिरे ऊँचे फण कर।
चरणों में बल्मीक बनावें फुंकारें निर्भय होकर।।६०।।
बड़े प्रेम से हरिणी भी सिंहो-के बच्चे पाल रही।
ब्याघ्र शिशू को दूध पिलाकर गाय अहो फिर चाट रही।।
जात विरोधी जीव सभी आपस में मैत्री भाव करें।
हाथी सिंह शृगाल सर्प खरगोश सभी मिलकर विचरें।।६१।।
सौम्य मूर्तिको शांत छविको देख-देख अनुकरण करें।
शांत भाव से जन्म जात भी क्रूर वैर दुर्भाव हरे।।
वन के वृक्ष पुष्प फल युत हो अतिशय झुकते जाते हैं।
मानों भक्ति में विभोर हो, झुक झुक शीश नमाते हैं।।६२।।
लता वल्लरी निज पुष्पों से, पुष्प वृष्टि करती रहतीं।
मधुकर के मधुर स्वर से गुण गान सदा करती रहती।।
सुखद पवन बह रही सुगंधित लता डालियाँ हिलती हैं।
मानों वन लक्ष्मी भुजप्रसरित, लय से नर्तन करती है।।६३।।
षट् ऋतु के सब फल पुष्पादिक, फलित फूलते हैं वन में।
योगीश्वर दर्शन से मानों, हर्षित होते हैं मन में।।
वनक्रीड़ा के लिए वहाँ पर, विद्याधरियाँ आती हैं।
योगीश्वर को नमस्कार कर, कर विस्मित हो जाती हैं।।६४।।
योगलीन तनु पर बिच्छू, सर्पादिक क्रीड़ा करते हैं।
लता भुजाओं तक चढ़ती हैं बहु वनजंतु विचरते हैं।।
लता मंजरी हटा हटा कर सर्प को दूर भगाती हैं।
फिर भी मानों अधिक प्रेम से ही आ आ लग जाती हैं।।६५।।
अहो! ध्यान है धन्य धन्य धन धन्य योगमय मुद्रा है।
सदा खड़े हैं धर्म ध्यान में नहीं कदाचित् तंद्रा है।।
विद्याधर ज्योतिश व्यंतर सुर के विमान रुक जाते हैं।
उतर उतर कर सब दर्शन पूजन करके सुख पाते हैं।।६६।।
हाथी हथिनी कमल पत्र में प्रीती से जल लाते हैं।
भक्ति भाव से बाहुबलि के श्री चरणों में चढ़ाते हैं।।
अहो! प्रभु की अद्भुत महिमा देख देख सब चकित हुए।
मनो मोहिनी सुंदर छवि को देख देख सब मुदित हुए।।६७।।
प्रिया हजारों छोड़ीं फिर भी मुक्तिरमा से प्रीति करें।
राज्य भोग संपत्ति में निस्पृह कर्मशत्रु से युद्ध करें।।
मनसिज हो मन को वश में कर मनोज मद का नाश किया।
इन्द्रिय सुख में निस्पृह हो भी निरुपम सुख की आश किया।।६८।।
चतुराहार त्याग है तो भी स्वात्म सुधारस पीते हैं।
क्रोध मान से रहित अहो! फिर भी कषाय अरि जीते हैं।।
षट्कायों की दया पालते मोहराज प्रति निर्दयता।
चरित्र व्रत गुण में ममत्व है निज शरीर में निर्ममता।।६९।।
सब जीवों में प्रेमभाव है नहीं किसी से मत्सर द्वेष।
पंचम गति को मन उत्सुक है चतुर्गती दुख से विद्वेष।।
रत्नत्रय निधि के स्वामी हैं फिर भी आकिंचन्य अहो!।
पंच परावर्तन से डर कर पाया निर्भय पंथ अहो!।।७०।।
सब जग से वैरागी होकर आत्म गुणों में रागी हैं।
योगी निजानंद सुख भोगी शुद्धातम अनुरागी हैं।।
ज्ञानी ध्यानी मौनी त्यागी अवंâप निश्चल सुमेरु सम।
महामना हे महाप्रभावी दृढ़प्रतिज्ञ हैं महानतम।।७१।।
बाहुबली भुजबली दोर्बली मनोबली हैं कायबली।
निर्बल भी प्रभु से बल पाते, आत्मबली भी महाबली।।
शीत तुषार ग्रीष्म वर्षादिक सभी परिषह सहते हैं।
महा परीषह विजयी स्वामी महोग्रोग्रतप करते हैं।।७२।।
महा तप:प्रभाव से बुद्धी विक्रिय सर्वौषधि ऋद्धी।
आदि सभी ऋद्धियाँ प्रगट हो करती जन जन की सिद्धी।।
दिव्य मन:पर्यय ज्ञानद्र्धि घोर पराक्रम दीप्त महा।
अणिमा महिमादिक आमर्श जल्लौषधि औ क्षीरस्रवा।।७३।।
अमृतस्रावी मधुरस्रावी महानसालय अक्षीण है।
काय वच्ना मन बल ऋद्ध्यादिक मुक्तिवधू दूतीसम है।।
परन्तु योगी योगलीन हैं नहीं प्रयोजन इनसे है।
जन-जन आकर विष रोगादिक कष्टनिवारण करते हैं।।७४।।
महा तपोबल से देवों के आसन कम्पित हो जाते।
बार बार सब शीश झुकाते नमस्कार हैं कर जाते।।
सब संकल्प विकल्प रहित प्रभु आत्म ध्यान में निश्चल हैं।
एक वर्ष उपवास पूर्ण कर शुक्ल ध्यान के सन्मुख हैं।।७५।।
उस ही दिन भरतेश्वर आकर विधिवत् पूजा करते हैं।
बाहुबली तत्काल परम केवलज्ञानेश्वर बनते हैं।।
बाहुबलिका हृदय कदाचित् स्वल्प विकल्पित हो जाता।
भरत को मुझसे क्लेश हो गया भ्रातृप्रेम यह जग जाता।।७६।।
अत: भरत के पूजन करते केवल ज्ञान प्रकाश हुआ।
निज अपराध निवारण कारण भरत प्रथमत: नमन किया।।
केवलज्ञान सूर्य के उगते देवों के आसन कांपे।
मुकुट कोटि झुक गये स्वयं कल्पद्रुम से सुपुष्प बरसे।।७७।।
स्वर्गों से इन्द्रादिक आकर जय जय जय ध्वनि करते हैं।
गंधकुटी की रचना करके प्रभु की पूजा करते हैं।।
छत्र फिरे ढुर रहे चंवर सिंहासन दुंदुभि ध्वनि होती।
मंद सुगंधित पवन चल रही पुष्पों की वृष्टी होती।।७८।।
भरतेश्वर बहु हर्षित होकर अनुपम पूजा करते हैं।
नहीं समर्थ है सरस्वती, जन क्या वर्णन कर सकते हैं।।
भ्रातृप्रेम धर्मानुराग जन्मान्तरका संस्कार महान।
केवलपद की भक्ति चार के मिलने से वैशिष्ट्य महान।।७९।।
अहो एक के ही निमित्त से भाक्तिक जन का मन खिलता।
फिर जब चारों ही मिल जावें हर्ष पार क्या हो सकता।।
गंगाजल की ही जलधारा गंध सुगंधित चंदन है।
मोती के अक्षत कल्पद्रुम पारिजात के शुभ सुम हैं।।८०।।
अमृतमय नैवेद्य रत्न के दीप मलयगिरि धूप महा।
कल्पवृक्ष के फल रत्नों के अघ्र्य चढ़ावें श्रेष्ठ अहा।।
षट्खंडाधिप भरत चक्रेश्वर स्वयं पुजारी भक्त जहाँ।
योग चक्रेश्वर पूज्य केवली पूजन का क्या ठाठ वहां।।८१।।
सुरविंâनर गंधर्व खगेश्वर नरपति पूजन करते हैं।
जय जय महाबली बाहूबलि जय जय कार उचरते हैं।।
केवलज्ञान ज्योति से प्रभु ने जगत चराचर देख लिया।
सबके स्वामी अंतर्यामी सबको हित उपदेश दिया।।८२।।
इन्द्र नरेन्द्र मुनींद्र मध्य से बाहुबली प्रभु शोभ रहे।
चक्रवर्ति जित घातिकर्मजित अनुपम सुख को प्राप्त हुए।।
मनसिज मर्दन मनुकुल वर्धन कर्माटवि को दहन किया।
मुनिजन हृदय सरोरुह भास्कर स्वात्मसौख्य आनंद लिया।।८३।।
देश देश में बिहार करते धर्मामृत बरसाते हैं।
केवलज्ञान सूर्य किरणों से भव्य कमल विकसाते हैं।।
चतुर्गती परिवर्तन के दुख से भव्यों को बचा लिया।
शिवपथ भ्रष्ट पथिक जन-जन को मुक्तिमार्ग शुभ दिखा दिया।।८४।।
अष्टापद गिरि पर जाकर के त्रिकरण योगनिरोध किया।
कर्म अघाती भी विनाश कर नि:श्रेयससुख प्राप्त किया। ।
परमानंद सुखास्पद अनुपम लोक शिखर पर जाते हैं।
शतेन्द्र वंदित मुनिजन ईडित त्रिजग ईश कहलाते हैं।।८५।।
जय जय हे त्रैलोक्य शिखामणि! जय इक्ष्वाकु वंश भूषण!।
जय जय जन्म जरामृति भयहर! जय जय मोह मल्ल चूरण!।
जय जय कर्मशत्रु मदभंजन नित्य निरंजन नमो नमो।
सिद्ध शुद्ध परमात्म चिदंबर। चिन्मय ज्योती नमो नमो।।८६।।
भरतराज ने पोदनपुर में बाहुबली की मूर्ति महा।
भक्ति भाव से की स्थापित पंचशतक धनु तुंग महा।।
सुर नर मुनि जन प्रति दिन पूजें भक्ति भाव से दर्श करें।
महा महिम जिनबिंब दर्श से जन्म जन्म के पाप हरें।।८७।।
कर्नाटक में श्रवणबेलगुल अतिशय क्षेत्र प्रसिद्ध महा।
भद्रबाहु श्रुतकेवलि गुरु की हुई समाधी श्रेष्ठ जहाँ।।
चन्द्रगुप्त सम्राट् दिगंबर मुनिवर की गुरु भक्त्ती का।
दृश्य दिखा स्मरण कराता गुरुभक्ति भवाब्धि नौका।।८८।।
नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती गुरुवर के शिष्य प्रधान।।
चामुंडराय प्रथित गुणभूषित श्रावककुल अवतंस महान।
विंध्यगिरी पर्वत के ऊपर सत्तावन फुट तुंग महा।
अति मनोज्ञ मूर्ति स्थापित की वीतराग की छवी महा।।८९।।
धैर्य वीर्य गांभीर्य सौम्य शुभ गुण मूर्ती में प्रगट अहो।
सचमुच में ही दर्श दे रहे बाहुबली साक्षात अहो।।
लंबित हैं घुटनों तक बाहू नासा दृष्टि विकाररहित।
स्मित मुख प्रकटित करता अन्त:कालुष्य विषादरहित।।९०।।
सर्पों के मुख की विष अग्नि चरणों का आश्रय पाकर।
शांत हो गई जय जय भुजबलि शांति सुधामय रत्नाकर।।
जय जय सकल मध्य युद्धत्रय में भरतेश्वर को जीता।
राज्यभोग सुख त्याग मुक्ति के लिए आदरी जिनदीक्षा।।९१।।
भरत राजने सकल दिग्विजय कर जो जयकीर्ति पाई।
वो ही चक्र रूप मूर्तिक बन जगमग ज्योति ज्वलित आई।।
सब जन बीच बाहुबलि प्रभु की प्रदक्षिणा त्रय दीनी थी।
फिर भी प्रभु से त्यक्त तिरस्कृत लज्जित सम ही उस क्षण थी।।९२।।
वही कीर्ति श्री योग रूढको लता छद्म से वेढलिया।
अद्यावधि माहात्म्य प्रकट कर रही जगत सब व्याप्त किया।।
स्वानुभूति रस रसिक जनों के मन समुद्र की वृद्धि करे।
ध्यानामृत का बोध करा कर सब संकल्प विकल्प हरे।।९३।।
करना नहीं रहा कुछ भी कृतकृत्य प्रभो! भुज लंबित हैं।
नहीं भ्रमण करना जग में अब अत: चरण युग अचलित हैं।।
देख चुके सब जग की लीला अंतरंग अब देख रहे।
सुन सुन करके शांति न पाई अत: विजन में खड़े हुये।।९४।।
वर्षा ऋतु में मेघदेव भक्ती से जल अभिषेक करें।
शीत काल में हिम कण सुन्दर शर्कर सम अभिषेक करें।।
मेघ पंक्तियाँ घिर घिर आती इक्षु रस इव दिखती हैं।
पुन: सूर्य की किरण सुनहरी घृत अभिसिंचन करती हैं।।९५।।
पूर्ण चंद्र रात्री में आकर भक्ति भाव से मुदित हुआ।
दुग्धाब्धि अमृतसम किरणों से प्रभु का बहु न्वहन किया।।
शशि ज्योत्स्ना शुक्ल ध्यान सम शुभ्र दही ले आती हैं।
भक्ति भाव से स्नपन करती रहती तृप्ति न पाती हैं।।९६।।
भास्कर देव सहस्र करों से केशर चंदन को लेकर।
हर्षित प्रेम भक्ति से गदगद हो अभिषेक करें दिनभर।।
प्रकृती देवी निज सुषमा से नित प्रति पूजन करती हैं।
मधुर हास्यमय सुमन वृष्टि कर जन जन का मन हरती हैं।।९७।।
मुनि जन श्रावक गण आ आकर दर्शन वंदन करते हैं।
भक्ति से हर्षित मन गदगद हो बहु स्तवन उचरते हैं।।
सौम्य मूर्ति को देख देखकर रोमांचित हो जाते हैं।
जन्म जन्म कृत पाप दूर कर प्रेमाश्रु को बहाते हैं।।९८।।
देश विदेशों से जन आते कौतुक से दर्शन करते।
शिल्पकला सौंदर्य देखते मन में बहु हर्षित होते।।
उनके मन का हर्ष भाव भी पापपुंज का नाश करे।
भक्ति बिना अज्ञात रूप ही पुण्य कर्म का बंध करे।।९९।।
प्राकृत रूप अनूप निरंबर निराभरण तनु शोभ रहा।
जग की कला सृष्टि में अनुपम कला रूप सौंदर्य अहा।!
दर्शक गण अपूर्व शांतीरस का अनुभव कर सुख पाते।
यही रूप इक परम शांति प्रद नहीं और यह कह जाते।।१००।।
नास्तिकवादी भी दर्शन कर बहु विस्मित हो जाते हैं।
जिनमत द्विष मिथ्यादृष्टि के भी मस्तक झुक जाते हैं।।
धर्मद्रोहि मूर्तिध्वंसक भी चरणों में नत हुए अहो।
चमत्कार से जन जन के मन आश्चर्यान्वित हुए अहो।।१०१।।
दक्षिणवासी जैनेतर भी प्रभु को इष्ट देव कहते।
मनोकामना पूरी होती दु:ख दारिद्र कष्ट हरते।।
चिंतामणि पारस कल्पद्रुम मन चिंतित फलदायक है।
वीतराग छवि दर्श अहो! अनुपम अचिंत्य फलदायक है।।१०२।।
युग युग से यह मूर्ति जगत को शुभ संदेश सुनाती है।
यदि सुख शांति विभव चाहो सब त्याग करो सिखलाती है।।
यदि नश्वर धन इन्द्रिय सुख तज तन निर्मम बन जावोगे।
अविनश्वर अनंत सुख पा त्रैलोक्य धनी बन जावोगे।।१०३।।
जय जय संवत्सर निश्चल तनु! जय जय महा तपस्वी हे।
जात रूपधर! विश्व हितंकर! जय जय महा मनस्वी हे।।
नाभिराज के पौत्र मदनतनु पुरुदेवात्मज नमो नमो।
मात सुनंदासुत भरताधिप-नुत पादाम्बुज नमो नमो।।१०४।।
इन्द्र नरेन्द्र मुनीन्द्र भक्ति से घिस घिस शीश प्रणाम करें।
लिखी भाल में कुकर्म रेखा मानों घिस घिस नाश करें।।
चित्सुखशांति सुधारस दाता भविजन त्राता नमो नमो।
शिवपथनेता शर्म विधाता मन वच तन से नमो नमो।।१०५।।
जो जन भक्ति भाव से प्रभु का गुण संकीर्तन करते हैं।
नर सुर के अभ्युदय भोगकर नि:श्रेयस को पाते हैं।।
मुनि जन हृदय सरोरुहबंधु! भवि कुमुदेंदु! नमो नमो।
भुक्तिमुक्ति फलप्रद! गुण सिंधु! हे जग बंधु! नमो नमो।।१०६।।
हे दु:खित जन वत्सल! शरणागत-प्रतिपालक! बाहुबली।
त्राहि त्राहि हे करुणासिंधो। पाहि जगत से महाबली।।
जय जय मंगलमय लोकोत्तम जय जय शरणभूत जग में।
जय जय सकल अमंगल दु:खहर। जय जयवंतो प्रभु जग में।।१०७।।
जय जय हे जग पूज्य! जिनेश्वर जय जय श्री गोम्मटेश्वर की।
जय जय जन्म मृत्यु हर! सुख कर! जय जय योग चक्रेश्वर की।।
जय जय हे त्रैलोक्य हितंकर सब जग में मंगल कीजे।

जय जय मम रत्नत्रय पूर्ती कर जिन गुणसंपद दीजे।।१०८।।
-दोहा-
‘‘वीर’’ अब्द चउवीस शत, इक्यानवे प्रमान।

आश्विन श्यामा द्वादशी, रचना पूरण जान।।१०९।।
यावत् रवि शशि मेदिनी, का है जग में वास।
श्री बाहूबलिचरित ये, तावत् करो प्रकाश।।११०।।
‘‘ज्ञानमती’’ प्रभु दीजिये, हरिये तम अज्ञान।

पढ़िये भविजन भाव से, लहिये पद निर्वाण।।१११।।
।। इति भद्रं भूयात् ।।

भगवान ऋषभदेव की दो पुत्री गणिनी आर्यिका श्री ब्राह्मी एवं सुन्दरी

-रचयित्री - गणिनी आर्यिका ज्ञानमती


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आदि ब्रह्मा तीर्थंकर ऋषभदेव के दो रानियाँ थीं-यशस्वती और सुनन्दा। बड़ी रानी यशस्वती ने भरत, वृषभसेन आदि सौ पुत्रों को जन्म दिया, पश्चात् एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम ब्राह्मी रक्खा गया। सुनन्दा के कामदेव बाहुबली पुत्र हुए और एक कन्या हुई जिसका नाम सुन्दरी रक्खा गया। ये दोनों कन्यायें अपनी बालक्रीड़ा से सभी के मन को हरण करती रहती थीं। क्रम-क्रम से इन कन्याओं ने किशोरावस्था को प्राप्त कर लिया।

एक समय तीर्थंकर ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे। ये दोनों पुत्रियाँ मांगलिक वेषभूषा में पिता के निकट पहुँचीं। विनय के साथ उन्हें प्रणाम किया। तब तीर्थंकर ऋषभदेव ने शुभ आशीर्वाद देकर उन दोनों पुत्रियों को उठाकर प्रेम से अपनी गोद में बिठा लिया। उनके मस्तक पर हाथ फेरा, हँसकर बोले—

‘‘आओ बेटी! तुम समझती होंगी कि हम आज देवों के साथ अमरवन को जायेंगे परन्तु अब तुम नहीं जा सकती क्योंकि देवलोग पहले ही चले गये।’’ इत्यादि प्रकार से कुछ क्षण हास्य-विनोद के बाद प्रभु ने कहा—

‘‘पुत्रियों! तुम दोनों शील और विनय आदि गुणों के कारण इस किशोरावस्था में भी वृद्धा के समान हो। तुम दोनों का यह शरीर, यह अवस्था और यह अनुपम शील यदि विद्या से विभूषित कर दिया जाए तो तुम दोनों का यह जन्म सफल हो सकता है। इसलिए हे पुत्रियों! तुम विद्या ग्रहण करने में प्रयत्न करो क्योंकि तुम्हारे विद्या ग्रहण करने की यही उम्र है।’’

तीर्थंकर ऋषभदेव ने ऐसा कहकर तथा बार-बार आशीर्वाद देकर अपने चित्त में स्थित श्रुतदेवता को आदरपूर्वक सुवर्ण के विस्तृत पट्टे पर स्थापित किया पुन: ‘सिद्धं नम:’ मंगलाचरण करके अपनी दाहिनी तरफ बैठी हुई ब्राह्मी को दाहिने हाथ से ‘‘अ आ इ ई’’ आदि वर्णमाला लिखकर लिपि लिखने का उपदेश दिया और बाईं तरफ बैठी सुन्दरी पुत्री को बायें हाथ से १, २ ,३ आदि अंक लिखकर गणित विद्या को सिखाया। इस प्रकार ब्राह्मी पुत्री ने आदिब्रह्मा पिता के मुख से स्वर-व्यंजन युक्त विद्या सीखी, इसी कारण आज वर्णमालालिपि की ब्राह्मीलिपि कहते हैं तथा सुन्दरी ने गणित शास्त्र को अच्छी तरह से सीखा था। वाङ्मय के बिना न तो कोई शास्त्र है और न कोई कला है। व्याकरण शास्त्र, छन्द शास्त्र और अलंकार शास्त्र इन तीनों के समूह को वाङ्मय कहते हैं।

उन दोनों पुत्रियों ने सरस्वती देवी के समान अपने पिता के मुख से संशय, विपर्यय आदि दोषों से रहित शब्द तथा अर्थपूर्ण समस्त वाङ्मय का अध्ययन किया था। उस समय स्वयंभू ऋषभदेव का बनाया हुआ एक बड़ा भारी व्याकरण शास्त्र प्रसिद्ध हुआ था। उसमें सौ से भी अधिक अध्याय थे और वह समुद्र के समान अत्यन्त गम्भीर था। प्रभु ने अनेक अध्यायों में छन्दशास्त्र का उपदेश दिया था और उसके उक्ता, अत्युक्ता आदि छब्बीस भेद भी दिखलाये थे। अनेक विद्याओं के अधिपति भगवान ने प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्वित्रिलघुक्रिया, संख्या और अध्वयोग, छन्दशास्त्र ने इन छह प्रत्ययों का भी निरूपण किया था। प्रभु ने अलंकार संग्रह ग्रन्थ में उपमा, रूपक, यमक आदि अलंकारों का कथन किया था। उनके शब्दालंकार और अर्थालंकार रूप दो भागों का विस्तार के साथ वर्णन और माधुर्य, ओज आदि दश प्राण (गुणों) का भी निरूपण किया था।

अनंतर ब्राह्मी और सुन्दरी दोनों पुत्रियों की पदज्ञान- व्याकरणज्ञानरूपी दीपिका से प्रकाशित हुई समस्त विद्यायें और कलायें अपने आप ही परिपक्व अवस्था को प्राप्त हो गई थीं। इस प्रकार गुरु अथवा पिता के अनुग्रह से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर वे दोनों इतनी अधिक ज्ञानवती हो गई थीं कि साक्षात् सरस्वती भी उनमें अवतार ले सकती थी।

जगद्गुरु ऋषभदेव ने इसी प्रकार अपने एक सौ पुत्रों को भी सर्वविद्या और कलाओं में पारंगत कर दिया था। इसके बाद आदिप्रभु ऋषभदेव असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन ६ कर्मों द्वारा प्रजा को आजीविका के उपाय बतलाकर प्रजापति, ब्रह्मा, विधाता, स्रष्टा आदि नामों से पुकारे गये थे।

एक समय नीलांजना के नृत्य को देखते हुए प्रभु को वैराग्य प्राप्त हो गया और स्वयंबुद्ध हुए प्रभु लौकांतिक देवों के द्वारा स्तुति को प्राप्त करके स्वयं ‘‘ॐ नम: सिद्धेभ्य:’’ मंत्रोच्चारण- पूर्वक मुनि बन गये। छह महीने का योग धारण कर लिया। उसके बाद जब चर्या के लिए निकले, तब किसी को भी आहार विधि का ज्ञान न होने से प्रभु को छह महीने तक आहार नहीं मिला। अनंतर हस्तिनापुर में राजा श्रेयांसकुमार को जातिस्मरण द्वारा आहार विधि का ज्ञान हो जाने से यहाँ उन्होंने वैशाख सुदी तीज के दिन प्रभु को इक्षुरस का आहार दिया था। दीक्षा के अनंतर एक हजार वर्ष तक तपश्चरण करने के बाद तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव को पुरिमतालपुर के बाहर उद्यान में केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई। उसी समय देवों ने समवसरण की रचना कर दी।

पुरिमताल नगर के स्वामी वृषभसेन२ समवसरण के प्रभु का दर्शन करके दैगम्बरी दीक्षा लेकर भगवान के प्रथम गणधर हो गये। उसी क्षण सात ऋद्धियों से विभूषित और मन:पर्ययज्ञान से सहित हो गये। उसी समय सोमप्रभ, श्रेयांस आदि राजा भी दीक्षा लेकर भगवान के गणधर हुए थे।

ब्राह्मी की दीक्षा—भरत की छोटी बहन ब्राह्मी गुरुदेव की कृपा आर्यिका दीक्षा लेकर वहाँ समवसरण में सभी आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी३ स्वामिनी हो गर्इं। बाहुबली की बहन सुन्दरी ने भी उसी समय आर्यिका दीक्षा धारण कर ली। हरिवंशपुराण में सुन्दरी आर्यिका को ब्राह्मी के साथ गणिनीरूप में माना है। उस काल में अनेक राजाओं ने तथा राजकन्याओं ने दीक्षा ली थी। भगवान के साथ जो चार हजार राजा दीक्षित हो भ्रष्ट हो गये थे उनमें मरीचिकुमार को छोड़कर शेष सभी ने समवसरण में दीक्षा ले ली थी।

उसी काल में भरत को एक साथ तीन समाचार मिले—पिता को केवलज्ञान की प्राप्ति, आयुधशाला में चक्ररत्न की उत्पत्ति और महल में पुत्ररत्न की प्राप्ति। भरत ने पहले समवसरण में पहुँचकर भगवान ऋषभदेव की पूजा की, अनंतर चक्ररत्न की पूजा कर पुत्र का जन्मोत्सव मनाया। बाद में दिग्विजय के लिए प्रस्थान कर दिया।

भगवान ऋषभदेव के समवसरण में चौरासी गणधर थे। चौरासी हजार मुनि, ब्राह्मी आदि तीन लाख, पचास हजार आर्यिकायें थीं। दृढ़व्रत आदि तीन लाख श्रावक और सुव्रता आदि पाँच लाख श्राविकायें थीं।

इस प्रकार भगवान के समवसरण में जितनी भी आर्यिकायें थीं, सबने गणिनी ब्राह्मी आर्यिका से ही दीक्षा ली थी। जैसा कि सुलोचना के बारे में भी आया है। जयकुमार के दीक्षा लेने के बाद सुलोचना५ ने भी ब्राह्मी आर्यिका से दीक्षा ले ली।

आज जो किंवदन्ती चली आ रही है कि ब्राह्मी-सुंदरी ने पिता से पूछा— ‘‘पिताजी! इस जगत में आपसे बड़ा भी कोई है क्या?’’ तब पिता ऋषभदेव ने कहा—हाँ बेटी, जिसके साथ हम तुम्हारा विवाह करेंगे उसे हमें नमस्कार करना पड़ेगा, उसके पैर छूना पड़ेगा। इतना सुनकर दोनों पुत्रियों ने यह निर्णय किया कि हमें ब्याह नहीं करना है, हम ब्रह्मचर्यव्रत ले लेंगी।

यह किंवदन्ती बिल्कुल गलत है। किसी भी दिगम्बर सम्प्रदाय के ग्रन्थ में यह बात नहीं आई है। तीर्थंकरों का स्वयं का विवाह होता है तो भी वे अपने स्वसुर को नमस्कार नहीं करते यहाँ तक कि वे अपने माता-पिता को भी नमस्कार नहीं करते थे। तीर्थंकर शांतिनाथ चक्रवर्ती थे। उनके ९६००० रानियों की पुत्रियाँ भी होंगी, सभी कुमारिकायें ही नहीं रहीं होंगी। विवाह के बाद जमाई के चरण छूना जरूरी नहीं है। भरत चक्रवर्ती आदि सम्राट भी अपनी कन्या को विवाहते थे किन्तु वे जमाई आदि किसी के पैर नहीं छूते थे प्रत्युत सब लोग उन्हीं के चरण छूते थे अत: यह किंवदन्ती गलत है। ब्राह्मी-सुन्दरी ने स्वयं विवाह नहीं किया था।

दूसरी किंवदन्ती यह है कि जब बाहुबली ध्यान में खड़े थे, उन्हें केवलज्ञान नहीं हुआ, तब ब्राह्मी सुन्दरी ने जाकर सम्बोधन किया—भैया! गज से उतरो। यह भी गलत है क्योंकि भगवान को केवलज्ञान होते ही ब्राह्मी सुन्दरी ने दीक्षा ले ली थी। तभी भरत को चक्ररत्न की प्राप्ति हुई थी। बाद में भरत ने ६० हजार वर्ष तक दिग्विजय किया है। इसके बाद भरत-बाहुबली का युद्ध होकर बाहुबली ने दीक्षा ली है। वहाँ भी भरत के नमस्कार करते ही बाहुबली को केवलज्ञान प्रगट हुआ, ऐसी बात है, न कि ब्राह्मी-सुन्दरी के सम्बोधन की। अत: प्रत्येक व्यक्ति को भगवान ऋषभदेव, भरत-बाहुबली एवं ब्राह्मी-सुन्दरी से संबंधित जानकारियों के लिए आदिपुराण का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।

१०८ फुट मूर्ति निर्माण का ऐतिहासिक चित्रमयी झलकियाँ

(सन् १९९६ से २०१६)


मूर्ति निर्माण का चित्रमयी इतिहास : एक दृष्टि में (सन् १९९६ से २०१६)

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गणिनी आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा मूर्ति निर्माण की प्रेरणा शरदपूर्णिमा, 26 अक्टूबर १९९६,मांगीतुंगी प्रवास


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शिलापूजन
३ मार्च २००२


-द्वारा-
संघपति श्री महावीर प्रसाद जैन-सौ. कुसुमलता जैन परिवार,
बंगाली स्वीट्स, दिल्ली।
 
         


        विशेष उपस्थित-श्री कमलचंद जैन

         खारीबावली, दिल्ली


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शिला निकालने हेतु पर्वत की कांट - छांट सन्न 2002 से 2006

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"अदम्य साहस के साथ जान हथेली पर लेकर रस्सों के सहारे इस कच्चे मार्ग से चिन्हित मूर्तिस्थल तक जाने का यह प्रारंभिक उपक्रम हैं | समिति ने इस मार्ग को भी प्रारंभिक रूप से स्वत: निर्मित किया |"

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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन सन्न 2007

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पर्वत की थोड़ी - बहुत कटाई- छटाई के बाद मूर्ति के लिए उभरते शिला-स्थल का दृश्य


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पर्वत को ऊँचाई से कांटने- छांटने के बाद मूर्ति के मस्तक स्थल पर बना यह प्लेट फार्म अद्भुत कार्य की कहानी कहता है |

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इसके बाद पुन: पर्वत की कटिंग करते हुए पैरों की गहराई तक पत्थर को कांटा- छांटा गया |

मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन सन्न २००८-२००९

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ऊपर पहुँचने के लिए कड़ी मेहनत के साथ ऐसा मार्ग तैयार किया गया सन्न 2008


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मजदूरों द्वारा महान साहस के साथ पहाड़ पर किये गये कार्य की एक झलक - सन् 2008


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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन सन्- 2010

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मूर्ति हेतु पर्वत में से कांट- छांटकर निकलती शिला का एक विहंगम दृश्य एवं वायरसॉ- चैनसॉ आदि मशीनों का प्रयोग कर पर्वत को कांटते- छांटते कारीगर - सन् २०१०



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"अंततोगत्वा पर्वत को कांट - छांटकर विशाल अखण्ड पाषाण शिला की प्राप्ति जैनधर्म की विजय पताका को प्रदर्शित कर रही हैं |"

मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन सन् 2011

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असंभव जैसी कठिनाईयों के साथ शिला के सर्वोच्च भाग अर्थात् मूर्ति के मस्तक स्थल पर पोकलैण्ड मशीन द्वारा कार्य का अद्भुत दृश्य |



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अन्य चित्रों में शिला की कटाई- छटाई करके मूर्ति बनाने हेतु शिर भाग और कंधे भाग उकेरने का सफल उपक्रम |


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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन- सन् 2012

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"मूर्ति निर्माण हेतु निकाली गई शिला को जब घिसाई आदि करके मूर्ति की गढ़ाई के योग्य बना दिया गया, तो मानों समिति ने एक बहुत बड़ा किला फतह कर लिया |"


इस अवसर पर अनुष्ठानपूर्वक खुशियाँ मनाई गई और 25 दिसम्बर 2012 को सोने - चांदी की छैनी से प्रतिमा के मस्तक से कार्य का शुभारंभ किया गया |


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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन- सन् 2013

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सन्न 2013 में सर्वप्रथम शिला पर शिर की गोलाई करके चेहरे का निर्माण प्रारम्भ किया गया | चित्र में देंखे बनते आँख,नाक, कान,गाल आदि के ऐतिहासिक दृश्य


"इससे पूर्व वसुनंदी प्रतिष्ठापाठ आदि प्राचीन,मान्य ग्रंथों के आधार पर नवताल की मूर्ति निर्माण हेतु पेन्टर से सम्पूर्ण शिला पर वास्तविक माप के साथ मूर्ति का चित्र रेखांकित करवाया गया |"




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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन- सन् 2014

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सन् 2014 में मूर्ति निर्माण के कार्य को गति प्राप्त हुई और कारीगरों द्वारा चेहरे पर आँख,नाक,कान,गाल और पीछे गर्दन के साथ

वक्षस्थल का भी आकार लगभग निर्मित कर लिया गया |



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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन- सन् 2015

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सन् -2015 में मूर्ति के मस्तक पर सुन्दर बालों का निर्माण हुआ और मूर्ति का चेहरा,वक्षस्थल,दोनों भुजाएं तथा


पैरों की बनावट लगभग पूर्णता को प्राप्त हुई |


इस वर्ष की कार्य- प्रगति नीचे दिये चित्रों में विशेष प्रतिबिम्बित होती हैं |


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मूर्ति निर्माण कार्य का विकासीय अवलोकन- सन् 2016

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जनवरी - २००६ में,चरण,बैल चिन्ह तथा आजु-बाजू यक्ष - यक्षिणी की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण करने के साथ मूर्ति निर्माण का कार्य पूर्ण हुआ |

इसके उपरांत भगवान का अति सुन्दर एवं विशाल कमलासन निर्मित किया गया |



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24 जनवरी 2016 को चली मूर्ति निर्माण कार्य की अंतिम छैनी

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प्रतिमा के मुखमंडल पर नेत्रों को खोलने हेतु शुभ मुहूर्त में अंतिम बार कारीगर द्वारा छैनी चलाई गई और ऊपर दिख रहे चित्र में भगवान की दिव्यदृष्टि इस सृष्टि पर प्रथम बार तिथि-माघ कृ. एकम् , २४ जनवरी २०१६ को प्रात: ९ बजे से १० बजे के मध्य पड़ी।




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अखण्ड पाषाण में १०८ फुट ऊँची भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का निर्माण, विगत पृष्ठों में क्रमश: प्रतिमा निर्माण के इतिहास को जीवंत चित्रांकित कर रहा है, जो हम सभी के लिए महान संग्रहणीय एवं स्मृति योग्य है।


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"जय हो भगवान ऋषभदेव, जय हो गणिनी ज्ञानमती मात"

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वसुनंदि प्रतिष्ठापाठ आदि प्राचीन ग्रंथों में निहित

प्रतिमा निर्माण हेतु

नवताल के सिद्धान्त अनुसार निर्मित


१०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा की माप : एक दृष्टि में


प्रतिमा के विभिन्न अंग माप
भगवान का मुख १२ फुट
गर्दन ४ फुट
वक्षस्थल १२ फुट
वक्षस्थल से नाभी तक १२ फुट
नाभी से इन्द्री १२ फुट
इन्द्री से घुटने तक २४ फुट
घुटने ४ फुट
घुटने से पैर २४ फुट
पगतली ४ फुट
प्रतिमा की कुल माप- १०८ फुट

इसके अतिरिक्त

प्रतिमा के बालों की ऊँचाई ५ फुट
प्रतिमा के प्रशस्ति व कमल की ऊँचाई ८ फुट
इस प्रकार प्रतिमा की कुल ऊँचाई - १२१ फुट






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मूर्ति निर्माण कार्य की ऐतिहासिक तिथियाँ : एक दृष्टि में

प्रेरणा आश्विन शु. १५ (शरदपूर्णिमा), वी. नि. सं. २५२२, विक्रम सं. २०५३,

२६ अक्टूबर १९९६, शनिवार द्वारा-पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी

शिलापूजन- फाल्गुन वदी ५, वी. नि. सं. २५२८,विक्रम सं. २०५८,३ मार्च २००२,रविवार

नोट-ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन (स्वामीजी) एवं अनेक राजनेताओं की उपस्थिति में संघपति श्री महावीर प्रसाद जैन-श्रीमती कुसुमलता जैन, साउथ एक्स., दिल्ली परिवार द्वारा। विशेष उपस्थित-श्री कमलचंद जैन, खारीबावली-दिल्ली आदि।

मूर्ति निर्माण कार्य शुभारंभ मगसिर शुक्ला त्रयोदशी, वी. नि. सं. २५३९, विक्रम सं. २०६९,२५ दिसम्बर २०१२, मंगलवार

नोट-शिला उकेरने के उपरांत कर्मयोगी पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी, कार्याध्यक्ष-श्री अनिल कुमार जैन, प्रीतविहार-दिल्ली, महामंत्री डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल- पैठण (महा.), मंत्री इंजी. श्री सी. आर. पाटील-पुणे, सदस्य-श्री नरेश बंसल-गुड़गाँवा सहित कमेटी के पदाधिकारियों ने सोने व चांदी की छैनी-हथौड़ी से शुभ मुहूर्त में शिला पर मूर्ति बनाने का कार्य प्रारंभ किया।

मूर्ति निर्माण की पूर्णता माघ कृ. एकम्, वी. नि. सं. २५४२, विक्रम सं. २०७२, २४ जनवरी २०१६, रविवार

नोट - शुभ तिथि में कारीगरों द्वारा भगवान के नेत्र खोलने के उपरांत मूर्ति निर्माण कार्य की पूर्णता घोषित की गई। इस अभूतपूर्व दृश्य को देखने के लिए मूर्ति निर्माण की प्रेरिका पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ वहाँ पर्वत पर विराजमान थीं।

अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक माघ शु. ३ से १०, वी. नि. सं. २५४२, विक्रम सं. २०७२, ११ से १७ फरवरी २०१६, गुरुवार से बुधवार
प्रथम महामस्तकाभिषेक माघ शु. एकादशी, वी. नि. सं. २५४२, विक्रम सं. २०७२, १८ फरवरी २०१६, गुरुवार
गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड- फाल्गुन कृ. द्वादशी, वी. नि. सं. २५४२, विक्रम सं. २०७२, ६ मार्च २०१६, रविवार

नोट -इस दिन महोत्सव के समापन अवसर पर गिनीज वल्र्ड रिकार्ड (लंदन) के अधिकारियों ने स्वयं मांगीतुंगी पधारकर भगवान ऋषभदेव को विश्व की सबसे ऊँची जैन प्रतिमा (११३ फुट) के रूप में अपने रिकॉर्ड में दर्ज किया और पूज्य माताजी के करकमलों में सर्टिफिकेट प्रदान किया।



१०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के आसन पर उत्कीर्ण प्रशस्ति आलेख : एक ऐतिहासिक दस्तावेज

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आसन के मध्य भाग में लिखित प्रशस्ति

ॐ नम: सिद्धेभ्य:-अथाद्यानामाद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे भारतदेशे महाराष्ट्रप्रदेशे मांगीतुंगीसिद्धक्षेत्रे नवनवतिकोटीनां मुनीनां निर्वाणक्षेत्रे ऋषभगिरिमस्तके विराजमान १०८ पुâट उत्तुंगऋषभ-देवमहापंचकल्याणक-प्रतिष्ठायां वीरनिर्वाणसंवत्-पञ्चविंशतिशत- द्विचत्वारिंशत्तमे (२५४२) विक्रमाब्दे द्विसहस्रद्वासप्ततितमे (वि. सं. २०७२) मासोत्तममासे माघमासे शुक्लपक्षे दशमीतिथौ श्री ऋषभदेवतीर्थंकरपरम्परायां अंतिम-तीर्थंकरश्रीमहावीर-जिनशासने मूलसंघे वुंâदवुंâदाम्नाये सरस्वती-गच्छे बलात्कारगणे विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यचारित्रचक्रवर्ती-श्रीशांतिसागरमहामुनीन्द्रस्तस्य अक्षुण्णमूलपरम्परायां प्रथमपट्टाधीश आचार्यश्रीवीरसागर-द्वितीयपट्टाचार्य श्रीशिवसागर-तृतीयपट्टाचार्य श्रीधर्मसागर-चतुर्थपट्टाचार्य श्रीअजितसागर-पंचमपट्टाचार्य श्रीश्रेयांससागर-षष्ठपट्टाचार्य श्रीअभिनंदनसागर परम्परायां वर्तमानसप्तमपट्टाचार्य श्रीअनेकांतसागरससंघसानिध्ये तथा च-प्रथमाचार्य श्रीशांतिसागरपरम्परायां प्रथमपट्टाचार्य श्रीवीरसागरस्य शिष्या शताष्टपुâट उत्तुंग भगवान ऋषभदेवप्रतिमानिर्माणप्रेरिका १०८ पुâट भगवान ऋषभदेवविशालकायमूर्ति निर्माणकमेटीसंस्थापिका गणिनीप्रमुख-आर्यिका श्रीज्ञानमतीमातु: ससंघसानिध्ये आर्यिकाश्रीचंदनामतीमार्गदर्शने दिगम्बरजैनत्रिलोक-शोधसंस्थान (जम्बूद्वीप-हस्तिनापुरस्य) प्रथमपीठाधीशक्षुल्लकश्रीमोतीसागरप्रयासेन वर्तमानपीठाधीश-रवीन्द्रकीर्तिस्वामिसानिध्ये च जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर निवासि प्रतिष्ठाचार्य पं. विजय कुमार जैन, पं. नरेश कुमार जैन, सांगली नि. पं. दीपक जैन इत्येतै: प्रतिष्ठाचार्यै: विधिविधानेन इयं प्रतिमा प्रतिष्ठापिता।

-गणिनी ज्ञानमती करवियले-





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१०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के संदर्भ में मूर्ति निर्माण की पावन प्रेरिका गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा समस्त दिगम्बर जैन समाज के नाम प्रदत्त अमृत सन्देश

अनादिनिधन जैनधर्म व शाश्वत जिनशासन के श्रद्धालु भक्तों!

ऋषभगिरि-मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में निर्मित प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की सर्वोच्च दिगम्बर जैन प्रतिमा जैन संस्कृति एवं भारतीय संस्कृति की महान अलौकिक निधि है। युग-युग तक यह वीतरागता एवं अपरिग्रह का संदेश सम्पूर्ण विश्व को प्रदान करती रहेगी। भगवान ऋषभदेव भारतीय संस्कृति के आद्यप्रणेता हैं इन्होंने ही आज से करोड़ों-करोड़ों वर्ष पूर्व कृतयुग की आदि में इस धरती की जनता को असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य और शिल्प इन षट् क्रियाओं के द्वारा जीवन जीने की कला (art of living) सिखाई थी। उनकी तीर्थंकर परम्परा में महावीर स्वामी तक चौबीस तीर्थंकर हुए हैं। इन सभी ने अपने सर्वोदय सिद्धान्तों से यह सिद्ध किया है कि जैनधर्म किसी व्यक्ति या जाति विशेष का न होकर विश्वधर्म के रूप में प्राणीमात्र के लिए कल्याणकारी होने से सार्वभौम धर्म है। मैंने सन् १९९६ में २६ अक्टूबर, शरदपूर्णिमा के दिन अपने चिंतन के आधार पर इन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की पूर्वाभिमुखी १०८ फुट प्रतिमा बनाने की प्रेरणा सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज के समक्ष प्रदान की थी। पुन: मेरे शिष्यत्रय (आर्यिका चन्दनामती माताजी, जम्बूद्वीप के प्रथम पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर महाराज एवं कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जी ने मेरी भावनानुसार वन विभाग द्वारा पर्वत की भूमि को क्रय करके दिगम्बर जैन समाज को जोड़कर सभी के सहयोग से ३ मार्च २००२, फाल्गुन वदी ५, वी. नि. सं. २५२८, विक्रम सं. २०५८ को शिलापूजन की धार्मिक विधि के साथ कार्य का शुभारंभ किया पुन: १० वर्ष तक पर्वत खण्ड से पाषाण को काट-छांटकर अखण्ड पाषाण शिला प्राप्त हुई तब २५ दिसम्बर २०१२, मगसिर शुक्ला त्रयोदशी, वी. नि. सं. २५३९, विक्रम सं. २०६९को भारत के प्रसिद्ध शिल्पकार मूलचंद रामचंद नाठा-जयपुर के शिल्पियों ने उस शिला पर मूर्ति बनाने का कार्य शुरू किया। ३ वर्ष-१ माह के पश्चात् २४ जनवरी २०१६ माघ कृ. एकम् को पुष्टा नक्षत्र के पवित्र योग में मेरी आँखों के सामने प्रतिमा बनकर पूर्ण हुई, वे रोमांचक क्षण मेरे लिए तथा सम्पूर्ण उपस्थित जनसमूह के लिए अप्रतिम थे। पुन: ११ फरवरी २०१६ से १७ फरवरी २०१६, माघ शुक्ला तृतीया से माघ शुक्ला दशमी तक इनका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व पंचकल्याणक महोत्सव सम्पन्न हुआ। जिसमें चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की मूल अक्षुण्ण परम्परा के सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज सहित १२५ साधु-साध्वियों का गौरवमयी सानिध्य प्राप्त हुआ। पुन: १८ फरवरी २०१६ से प्रारंभ हुआ प्रथम महामस्तकाभिषेक ६ फरवरी २०१७ तक (माघ शुक्ला ग्यारस से माघ शु. दशमी तक) लगातार १ वर्ष तक इस महामस्तकाभिषेक ने एक नूतन कीर्तिमान स्थापित किया है। ६ मार्च २०१६ को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज इस १०८ फुट प्रतिमा का संरक्षण करना आप सभी दिगम्बर जैन समाज का परम कर्तव्य है। इस प्रतिमा के संदर्भ में विशेष ज्ञातव्य है- १. प्रत्येक ६ वर्ष में इनका महामस्तकाभिषेक महोत्सव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्पन्न किया जायेगा। २. वह मस्तकाभिषेक प्राचीन आर्षपरम्परानुसार पंचामृत सामग्री से किया जायेगा। ३. इसके अतिरिक्त भगवान के श्रीचरणों का अभिषेक भी पंचामृत से होता रहेगा। ४. भगवान के आजू-बाजू में निर्मित शासन देव (गोमुख यक्ष) एवं शासन देवी (चक्रेश्वरी माता) सदैव अवस्थित रहेंगे एवं उनका पदयोग्य सम्मान (अर्घ्य आदि समर्पण करके) होता रहेगा। ५. मूर्ति निर्माण कमेटी के द्वारा यह आर्षमार्गीय बीसपंथ परम्परा हमेशा चलाई जावेगी तथा आने वाले श्रद्धालु भक्तों के लिए बीसपंथ-तेरहपंथ का भेदभाव नहीं रहेगा, वे अपनी-अपनी श्रद्धानुसार केवल जलाभिषेक करें अथवा केशर-दूध आदि से अभिषेक कर सकते हैं। इस प्रकार पंथ के भेद भाव को छोड़कर इस सर्वोच्च दिगम्बर जैन प्रतिमा के दर्शन-वंदन करके आप सभी भक्तगण आत्मोन्नति की ओर अग्रसर हों तथा जिनधर्म की व्यापक प्रभावना इस प्रतिमा के माध्यम से हो, यही सम्पूर्ण जैन समाज के लिए संदेश एवं आशीर्वाद है।

।।इयं जिनप्रतिमा सर्वलोककल्याणाय भवतु।।



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मुक्तक

-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न चन्दनामति
अन्न का हर दाना, शालिधान्य नहीं होता।

हर मानव का बाना इंसान नहीं होता।।
प्रत्येक व्यक्ति का खजाना पुण्यवान नहीं होता।
ऐसे ही बंधुओं! तुम्हें भी ध्यान रखना है,
हर पर्वत के पाषाण का दाना भगवान नहीं होता।।
                   कविता
जरा सोचो बनी कैसे ऋषभगिरि पर ऋषभ प्रतिमा।
जहाँ पर मार्ग भी दिखता न था, वहाँ बन गई प्रतिमा।।१।।
कहानी यह है चेतन और अचेतन तीर्थ मिलने की।
परस्पर वार्ता दोनों की, हो गई दिल से मिलने की।।२।।
कहा चैतन्य तीरथ ज्ञानमती, माता ने पर्वत से।
तुम्हें चैतन्य निधि दूँगी, बात यदि तुम करो मुझसे।।३।।
फुला छाती कहा तब मांगी-तुंगी की पहाड़ी ने।
हे माँ! कब से खड़ा हूँ मैं तुम्हारी इन्तजारी में।।४।।
अगर तुम कह दो तो, दिल चीर कर तुमको दिखा दूँ मैं।
कहो माँ तो तुम्हारी आज्ञा पर, दौलत बिछा दूँ मैं।।५।।
करोड़ों साल से मैं इक तपस्वी बन खड़ा तो हूँ।
कोटि निन्यानवे मुनियों की साक्षी बन खड़ा तो हूँ।।६।।
अचेतन तीर्थ की अन्तर्ध्वनी सुन ज्ञानमती माँ ने।
नमन कर सिद्धभूमी को, विचारा ज्ञानमती माँ ने।।७।।
कहा पाषाण से माँ ने, तुम्हें मैं वन्दना करती।
तुम्हारे गर्भ के अंदर, मुझे इक मूर्ति है दिखती।।८।।
अगर छेनी हथौड़े की, चोट सह लोगे हे पर्वत!
तो सच समझो तुम्हारे में ही, प्रगटेंगी ऋषभ मूरत।।९।।
हुआ सहमत तभी पर्वत, कहा यह सब मैं सह लूँगा।
तुम्हारी कल्पना की मूर्ति, हे माँ! मैं तुम्हें दूँगा।।१०।।
सुनो भाई! यह एग्रीमेंट भावात्मक हुआ जबसे।
जुड़ा संबंध दोनों का, तभी सन् उन्निस सौ छ्यानवे से।।११।।
बहुत पर्वत हैं दुनिया में, बहुत नदियाँ व सागर हैं।
बहुत गंभीर गहरे और, लहरों युत समन्दर हैं।।१२।।
मगर पर्वत हिमालय और नील नदि सम न है शानी।
नही है किसी समन्दर में, प्रशांत महासागर सा पानी।।१३।।
आज के आधुनिक विज्ञान ने इनको भी नापा है।
इनकी ऊँचाई लम्बाई व गहराई को मापा है।।१४।।
हिमालय साढ़े आठ हजार किलोमीटर से भी ऊँचा।
नील नदि लम्बाई का प्रमाण छह हजार किलोमीटर में पहुँचा।।१५।।
सभी सागर की गहराई व क्षेत्रफल से भी ज्यादा।
विश्व के इक प्रशांत महासागर का है, क्षेत्रफल ज्यादा।।१६।।
एशिया नाम का महाद्वीप, द्वीप सबसे बड़ा माना।
पाँच करोड़ वर्ग किलोमीटर तक फैला इसे माना।।१७।।
किन्तु वृषभेश के आदर्श, हिमालय से भी ऊँचे हैं।
इनकी दिव्यध्वनि वाणी, नील नदि से भी लम्बी है।।१८।।
इनकी यशकीर्ति के सम्मुख न कोई द्वीप टिक सकते।
प्रभु के दिल की गहराई में, सब सागर समा सकते।।१९।।
तभी इनके निकट आकर, सभी के काम बनते हैं।
ये सूरज सम दमकते हैं, ये चन्दा सम चमकते हैं।।२०।।
हे भव्यात्माओं! देखो जब चोट झेली है पर्वत ने।
शिल्पियों ने गढ़ी प्रतिमा, बड़ी मुश्किल से पर्वत में।।२१।।
तुम्हीं सब से मिली अर्थाञ्जलि इसमें लगाई है।
रवीन्द्रकीर्ति जी स्वामी ने मातृभक्ति दिखाई है।।२२।।
यह दुनिया की धरोहर है, और भारत की गरिमा है।
वीतरागी छवी से युक्त, तीर्थंकर की प्रतिमा है।।२३।।
यह स्टेचू ऑफ अहिंसा नाम से पहचानी जाएगी।
‘‘चन्दनामति’’ यही प्रतिमा अखण्डित मानी जाएगी।।२४।।
गिनीज बुक वर्ल्ड के रेकार्ड में, हुई दर्ज यह प्रतिमा।

प्रथम भारत की जिनप्रतिमा, बन गई देश की गरिमा।।२५।।

सर्वोच्च जैन साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा ६ मार्च २०१७ को ऋषभदेवपुरम्, मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र से महाराष्ट्र तीर्थ यात्रा हेतु हुए ऐतिहासिक मंगल विहार के संदर्भ में प्रस्तुत

महाराष्ट्र तीर्थ यात्रा (काव्य कथानक)
- आर्यिका चन्दनामती
तर्ज-राम जी की निकली सवारी.....
महाराष्ट्र की तीर्थ यात्रा, जिनशासन की है कीर्तियात्रा।

गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी की बनी ऐतिहासिक ये यात्रा।।महा.।।
एक बार सन् उन्निस सौ छ्यानवे में,
पंचकल्याणक हुआ मांगीतुंगी में।
दिव्यशक्ति बन तब माता पधारीं,
चौबीस प्रभु का उत्सव हुआ भारी।।
सहस्रवूâट कमलमंदिर जिनालय, कर्मयोगी रवीन्द्र जी ने बनाया।
महाराष्ट्र की तीर्थयात्रा, जिनशासन की है कीर्तियात्रा हो..।।१।।
उसी चमुर्मास में शदर पूर्णमा को,
मिली अन्तप्र्रेरण माता को।
एक सौ आठ फिट प्रतिमा बनाओ,
पूर्वमुखी ऋषभदेव प्रगटाओ।।
वह प्रेरणा ही, साकार होकर बन गई जिन संस्कृति की गाथा।
महाराष्ट्र की तीर्थयात्रा, जिनशासन की है कीर्तियात्रा हो..।।२।।
उत्सव महोत्सव का रेकार्ड बन गया,
गिनीज बुक में नाम दर्ज हो गया।
एक वर्ष महामस्तकाभिषेक हुआ,
सबने खूब पंचामृत अभिषेक किया।।
पुन: मातु श्री ने, मंगल विहार कर प्रारंभ की तीर्थयात्रा।

महाराष्ट्र की तीर्थयात्रा, जिनशासन की है कीर्तियात्रा हो..।।३।।



तर्ज-कान खोलकर बात....
ध्यान लगाकर बात मेरी सुनलो भैय्या, मेरी सुनलो बहना,

माता की रोमांचक यात्रा।।टेक.।।
मांगीतुंगी से विहार कर, तीर्थ वंदना लक्ष्य बनाकर।
सारे संघ को साथ लेकर, वे तो चल दी भैय्या, मेरी सुनलो बहना,
माता की रोमांचक यात्रा।।१।।
नगर सटाणा मालेगांव में, कवलाना से नांदगांव में।
आचार्यकल्प श्री चंद्रसागर, जन्मभूमि में ये तो पहुँची भैय्या,
मेरी सुनलो बहना, माता की रोमांचक यात्रा।।२।।
फिर सिबूर देवगांवरंगारी, सज्जनपुर की भक्ति न्यारी।
एलोरा में पारसनाथ प्रभु का पंचामृत अभिषेक देखा सुनलो भैय्या
मेरी सुनलो बहना, माता की रोमांचक यात्रा।।३।।
फिर अड़गांव अडूल में जाकर, धर्मतीर्थ के भी दर्शन कर।
कचनेर तीर्थ की ओर माता चल दीं भैय्या, मेरी सुनलो बहना।
माता की रोमांचक यात्रा।।४।।
श्री कचनेर जी अतिशय क्षेत्र में, पाश्र्वनाथ जिनवर के पास में।
दर्शन करके खुश हुई मात, मेरे सुनलो भैय्या, मेरी सुनलो बहना
माता की रोमांचक यात्रा।।५।।
पिम्पलबाड़ी से पैठण जाकर, मुनिव्रत प्रभु के दर्शन पाकर
देखा पंचमृत अभिषेक प्रभु का, सुनलो भैय्या मेरी सुनलो बहना,
माता की रोमांचक यात्रा।।६।।
ढोरकिन बिडकिन में पहुँची, हुई औरंगाबाद में वीर जयंती।
सज गये घर-घर वंदनवार, मेरी सुनलो भैय्या मेरी सुनलो बहना,

माता की रोमांचक यात्रा।।७।।


तर्ज-फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी....
आगे सुनो आगे सुनो, आगे सुनो, भाई आगे सुनो।
ज्ञानमती माताजी की यात्रा सुनो, कहाँ कहाँ पहुँची माता आगे सुनो।।टेक.।।



तर्ज-श्री बाहुबली की आरती उतारो मिलके....
माँ ज्ञानमती की यात्रा में आओ मिलके।

आओ मिलके, खुशी मनाओ मिलके।।
माँ ज्ञानमती की यात्रा....।।
औरंगाबाद से चली जटवाड़ा, बालूज में भी बजा नगाड़ा।
बजाजनगर में भक्ति गुलाल उड़ाओ मिलके उड़ाओ मिलके।।
माँ ज्ञानमती की....।।१।।
फिर लासूर स्टेशन आया, दीक्षा जयंती उत्सव मनाया।
ज्ञानमती माँ का बांसठवां उत्सव सभी मनाओ मिलके,
सभी मनाओ मिलके।।माँ ज्ञानमती की...।।२।।
बैजापुर से वीर गांव में, वीर सिन्धु गुरु जन्मगांव में।
दीक्षागुरु के जन्मतीर्थ की रज को शीश चढ़ाओ मिलके
शीश चढ़ाओ मिलके।।माँ ज्ञानमती की...।।३।।
श्रीरामपुर शिरडी नगरी, ज्ञानतीर्थ में पाश्र्वनाथ जी
कमल जिनालय पर कलशारोहण कर ध्वज चढ़ाओ मिलके
ध्वजा चढ़ाओ मिलके।।माँ ज्ञानमती की...।।४।।
कोपरगांव से नाशिक पहुँचे, ज्ञानवाटिका के दर्शन करके।
गजपंथा जी सिद्धक्षेत्र में कोटि कोटि मुनियों को शीश नमाओ मिलके,

शीश नमाओ मिलके।।माँ ज्ञानमती की...।।५।।


तर्ज-रेल चली भई रेल चली.....
सुनो सुनो भई सुनो सुनो, आगे की यात्रा सुनो सुनो.
कहाँ चलती है, क्या कहती हैं, ज्ञानमती माता की बात सुनो।।टेक.।।


तर्ज-मैं तो छोड़ चली बाबुल का देश....
चलीं मुम्बई शहर की ओर, ज्ञानमती माताजी।

मची जयकार जहाँ चहुं ओर, ज्ञानमती माताजी।।टेक.।।
छोटी व शाहपुर के नर और नारी, माता के चरणों में बलि बलिहारी।
पुष्पवृष्टि करें चारों ओर, ज्ञानमती माताजी।।चलीं मुम्बई.।।१।।
मुम्बई निकट जब कल्याण पहुँची, डोम्बीवली की टोली आ पहँुची।
चलीं मुम्ब्रा बाहुबली की ओर, ज्ञानमती माताजी।।चलीं मुम्बई.।।२।।
मस्तकाभिषेक बाहुबली का कराया, ‘‘बाहुबलिगिरि’’ का डंका बजाया।
बढ़ीं वाशी ऐरोली की ओर, ज्ञानमती माताजी।।चलीं मुम्बई.।।३।।
मुम्बई में भाण्डुप से साकीनाका आर्इं, आगे असल्फा से घाटकोपर आर्इं।
चलीं पन्तनगर सायन की ओर, ज्ञानमती माताजी।।चलीं मुम्बई.।।४।।
अन्ट्राप हिल घोड़पदेव जाकर, श्रद्धालु भक्तों की खुशियाँ बढ़ाकर।
पुन: ताड़देव मंदिर की ओर, ज्ञानमती माताजी।।चलीं मुम्बई.।।५।।
फिर भक्त लाये गुलालवाड़ी में, भक्ति करें माँ की आंगनवाड़ी में।
चौपाटी गर्इं पाश्र्वनाथ, ज्ञानमती माताजी।।चलीं. मुम्बई.।।६।।
वर्ली-कमाठीपुरा-खार पहुंचीं, अंधेरी से गोरेगांव मंदिर जी।
प्रभु के दर्शन से पुलकित हैं मात, ज्ञानमती माताजी।।चलीं. मुम्बई.।।७।।
तीनमूर्ति पोदनपुरी तीर्थ पाया, मस्तकाभिषेक तीनों प्रभु का कराया।

‘‘चन्दनामती’’ है जय जय का शोर, ज्ञानमती माताजी।।चलीं मुम्बई.।।८।।
१०८ फुट ऊँची भगवान ऋषभदेव प्रतिमा निर्माण के प्रमुख स्तंभ

१ - भगवान ऋषभदेव प्रतिमा निर्माण की महान प्रेरिका भारतगौरव, दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का परिचय

आर्यिका चन्दनामति


कुन्दकुन्दान्वयो जीयात्, जीयात् श्री शांतिसागर:।

जीयात् पट्टाधिपस्तस्य, सूरि: श्री वीरसागर:।।
श्री ब्राह्मी गणिनी जीयात्, जीयादन्तिमचन्दना।

जीयात् ज्ञानमती माता, गणिन्यां प्रमुखा कलौ।।

जैनशासन के वर्तमान व्योम पर छिटके नक्षत्रों में दैदीप्यमान सूर्य की भाँति अपनी प्रकाश-रश्मियों को प्रकीर्णित कर रहीं पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर उठी लेखनी की अपूर्णता यद्यपि अवश्यंभावी है, तथापि आत्मकल्याण की भावना से पूज्य माताजी के श्रीचरणों में उनके दीर्घकालीन त्यागमयी जीवन के प्रति विनम्र विनयांजलिरूप मेरा यह विनीत प्रयास है।

१. जन्म, वैराग्य और दीक्षा-२२ अक्टूबर सन् १९३४, शरदपूर्णिमा के दिन टिकैतनगर ग्राम (जि. बाराबंकी, उ.प्र.) के श्रेष्ठी श्री छोटेलाल जैन की धर्मपत्नी श्रीमती मोहिनी देवी के दांपत्य जीवन के प्रथम पुष्प के रूप में ‘‘मैना’’ का जन्म परिवार में नवीन खुशियाँ लेकर आया था। माँ को दहेज मेें प्राप्त ‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’ ग्रन्थ के नियमित स्वाध्याय एवं पूर्वजन्म से प्राप्त दृढ़वैराग्य संस्कारों के बल पर मात्र १८ वर्ष की अल्प आयु में ही शरद पूर्णिमा के दिन मैना ने आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज से सन् १९५२ में आजन्म ब्रह्मचर्यव्रतरूप सप्तम प्रतिमा एवं गृहत्याग के नियमों को धारण कर लिया। उसी दिन से इस कन्या के जीवन में २४ घंटे में एक बार भोजन करने के नियम का भी प्रारंभीकरण हो गया।


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नारी जीवन की चरमोत्कर्ष अवस्था आर्यिका दीक्षा की कामना को अपनी हर साँस में संजोये ब्र. मैना सन् १९५३ में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से ही चैत्र कृष्णा एकम् को श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र में ‘क्षुल्लिका वीरमती’ के रूप में दीक्षित हो गर्इं। सन् १९५५ में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की समाधि के समय वुंâथलगिरी पर एक माह तक प्राप्त उनके सान्निध्य एवं आज्ञा द्वारा ‘क्षुल्लिका वीरमतीr’ ने आचार्य श्री के प्रथम पट्टाचार्य शिष्य-वीरसागर जी महाराज से सन् १९५६ में ‘वैशाख कृष्णा दूज’ को माधोराजपुरा (जयपुर-राज.) में आर्यिका दीक्षा धारण करके ‘‘आर्यिका ज्ञानमती’’ नाम प्राप्त किया।

२. अध्ययन और अध्यापन-ज्ञानप्राप्ति की पिपासा माता ज्ञानमती जी के रोम-रोम में प्रारंभ से ही वूâट-वूâट कर भरी थी। दीक्षा लेते ही स्वाध्याय-मनन-चिंतन की धारा में ही उन्होंने स्वयं को निबद्ध कर लिया। ज्ञान प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ स्रोत बना-संघस्थ मुनियों, आर्यिकाओं एवं संघस्थ शिष्य-शिष्याओं को जैनागम का तलस्पर्शी अध्यापन। ‘कातंत्र रूपमाला’ रूपी बीज से पूज्य माताजी की ज्ञानसाधना रूप वृक्ष प्रस्फुट ित हुआ, जिस पर जो पत्ते, फूल-फल इत्यादि लगे, उन्होंने समस्त संसार को सुवासित कर दिया। गोम्मटसार, परीक्षामुख, न्यायदीपिका, प्रमेयकमलमार्तण्ड, अष्टसहस्री, तत्त्वार्थराजवार्तिक, सर्वार्थसिद्धि, अनगारधर्मामृत, मूलाचार, त्रिलोकसार आदि अनेक ग्रंथों को अपनी शिष्याओं और संघस्थ साधुओं को पढ़ा-पढ़ाकर आपने अल्प समय में ही विस्तृत ज्ञानार्जन कर लिया। हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत, कन्नड़, मराठी इत्यादि भाषाओं पर आपका पूर्ण अधिकार हो गया।

३. लेखनी का प्रारंभीकरण संस्कृत भाषा से-भगवान महावीर के पश्चात् २६०० वर्ष के जिस इतिहास में जैन साध्वियों के द्वारा शास्त्र लेखन की कोई मिसाल दृष्टिगोचर नहीं होती थी, वह इतिहास जागृत हो उठा जब क्षुल्लिका वीरमती जी ने सन् १९५४ में सहस्रनाम के १००८ मंत्रों से अपनी लेखनी का प्रारंभ किया। यही मंत्र सरस्वती माता का वरदहस्त बनकर पूज्य माताजी की लेखनी को ऊँचाइयों की सीमा तक ले गये। सन् १९६९-७० में न्याय के सर्वोच्च ग्रंथ ‘अष्टसहस्री’ के हिन्दी अनुवाद ने उनकी अद्वितीय विद्वत्ता को संसार के सामने उजागर कर दिया। कितने ही ग्रंथों की संंस्कृत टीका, कितनी ही टीकाओं के हिंदी अनुवाद, संस्कृत एवं हिन्दी में अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना मिलकर आज ४०० से भी अधिक संख्या हो चुकी है। पूज्य माताजी द्वारा लिखित समयसार, नियमसार इत्यादि की हिन्दी-संस्कृत टीकाएँ, जैनभारती, ज्ञानामृत, कातंत्र व्याकरण, त्रिलोक भास्कर, प्रवचन निर्देशिका इत्यादि स्वाध्याय ग्रंथ, प्रतिज्ञा, संस्कार, भक्ति, आदिब्रह्मा, आटे का मुर्गा, जीवनदान इत्यादि जैन उपन्यास, द्रव्यसंग्रह-रत्नकरण्डश्रावकाचार इत्यादि के हिन्दी पद्यानुवाद व अर्थ, बाल विकास, बालभारती, नारी आलोक आदि का अध्ययन किसी को भी वर्तमान में उपलब्ध जैन वाङ्गमय की विविध विधाओं का विस्तृत ज्ञान कराने में सक्षम है। अध्यात्म, व्याकरण, न्याय, सिद्धांत, बाल साहित्य, उपन्यास, चारों अनुयोगोंरूप विविध विधाओं के अतिरिक्त पूज्य माताजी की लेखनी से विपुल भक्ति साहित्य उद्भूत हुआ है। इन्द्रध्वज, कल्पदु्रम, सर्वतोभद्र, तीन लोक, सिद्धचक्र, विश्वशांति महावीर विधान इत्यादि अनेकानेक भक्ति विधानों ने देश के कोने-कोने में जिनेन्द्र भक्ति की जो धारा प्रवाहित की है, वह अतुलनीय है। पूज्य माताजी का चिंतन एवं लेखन पूर्णतया जैन आगम से संबद्ध है, यह उनकी महान विशेषता है। धन्य हैं ऐसी महान प्रतिभावान् सरस्वती माता!

४. सिद्धांत चक्रेश्वरी- पूज्य माताजी ने जैनशासन के सर्वप्रथम सिद्धांत ग्रंथ ‘षट्खण्डागम’ की सोलहों पुस्तकों के सूत्रों की संस्कृत टीका ‘सिद्धांत चिंतामणि’ का लेखन करके महान कीर्तिमान स्थापित किया है। क्रम-क्रम से हिन्दी टीका सहित इन पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य चल रहा है। आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व आचार्य श्री नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती ने जिस प्रकार छह खण्डरूप द्वादशांगरूप जिनवाणी को परिपूर्ण आत्मसात करके साररूप में द्रव्य संग्रह, गोम्मटसार, लब्धिसार इत्यादि ग्रंथ अपनी लेखनी से प्रसवित किये थे, उसी प्रकार इस बीसवीं सदी की माता ज्ञानमती जी ने समस्त उपलब्ध जैनागम का गहन अध्ययन-मनन-चिंतन करके इस सिद्धांतचिंतामणिरूप संस्कृत टीका लेखन के महत्तम कार्य से ‘सिद्धांत चक्रेश्वरी’ के पद को साकार कर दिया है। आचार्य श्री वीरसेन स्वामी द्वारा १००० वर्ष पूर्व लिखित ‘धवलाटीका’ के पश्चात् इस महान ग्र्रंथ की सरल टीका लेखन का कार्य प्रथम बार हुआ है।

५. शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर-जैन सिद्धांतों का मर्म विद्वत् वर्ग समझ सवेंâ, इस भावना से कितने ही शिक्षण-प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन पूज्य माताजी की प्रेरणास्वरूप किया गया। सन् १९६९ में जयपुर चातुर्मास के मध्य ‘जैन ज्योतिर्लोेक’ पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया, जिसमें पूज्य माताजी द्वारा ‘जैन भूगोल एवं खगोल’ का विशेष ज्ञान विद्वत्वर्ग को कराया गया। अक्टूबर सन् १९७८ में हस्तिनापुर में पं. मक्खनलाल जी शास्त्री, पं. मोतीचंद जी कोठारी, डा. लाल बहादुर शास्त्री सहित जैन समाज के उच्चकोटि के लगभग १०० विद्वानों का विद्वत् प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया, जिसमें पूज्य माताजी ने विद्वत्समुदाय को यथेष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया। समय-समय पर आज तक यह श्रृंखला चल रही है।

६. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार-सन् १९८५ में ‘जैन गणित एवं त्रिलोक विज्ञान’ पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में सम्पन्न हुआ, पुन: अनेक संगोष्ठियाँ सम्पन्न होती रहीं और सन् १९९८ में ‘भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन’ के भव्य आयोजन द्वारा देश भर के विश्वविद्यालयों से पधारे कुलपतियों को भगवान ऋषभदेव को भारतीय संस्कृति एवं जैनधर्म के वर्तमानयुगीन प्रणेता पुरुष के रूप में जानने का अवसर प्राप्त हुआ। ११ जून २००० को ‘जैनधर्म की प्राचीनता’ विषय पर आयोजित इतिहासकारों के सम्मेलन द्वारा पाठ्य पुस्तकों में जैनधर्म संबंधी भ्रांतियों के सुधार के लिए विशेष दिशा-निर्देश ‘राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद’ (Nण्ERऊ) तक पहुँचाये गये। इनके अतिरिक्त अनेक अन्य सेमिनार भी समय-समय पर सम्पन्न हुए हैं, जिनके प्रतिफल में देश के समक्ष समय-समय पर साहित्यिक कृतियाँ (झ्rदमा्ग्हुे) प्रस्तुत हो चुकी हैं।

७. दिगम्बर समाज की साध्वी को दो-दो बार डी.लिट्. की उपाधि प्रदान कर विश्वविद्यालय भी गौरवान्वित हुए-किसी महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि में पारम्परिक डिग्रियों को प्राप्त किये बिना मात्र स्वयं के धार्मिक अध्ययन के बल पर विदुषी माताजी ने अध्ययन, अध्यापन, साहित्य निर्माण की जिन ऊँचाइयों को स्पर्श किया, उस अगाध विद्वत्ता के सम्मान हेतु डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, पैâजाबाद द्वारा ५ फरवरी १९९५ को डी.लिट्. की मानद् उपाधि से पूज्य माताजी को सम्मानित करके स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया गया तथा दिगम्बर जैन साधु-साध्वी परम्परा में पूज्य माताजी यह उपाधि प्राप्त करने वाली प्रथम व्यक्तित्व बन गर्इं। पुन: इसके उपरांत ८ अप्रैल २०१२ को पूज्य माताजी के ५७वें आर्यिका दीक्षा दिवस के अवसर पर तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद में विश्वविद्यालय का प्रथम विशेष दीक्षांत समारोह आयोजित करके विश्वविद्यालय द्वारा पूज्य माताजी के करकमलों में डी.लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की गई। इसी प्रकार से समय-समय पर विभिन्न आचार्यों एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा पूज्य माताजी को न्याय प्रभाकर, आर्यिकारत्न, आर्यिकाशिरोमणि, गणिनीप्रमुख, वात्सल्यमूर्ति, तीर्थोद्धारिका, युगप्रवर्तिका, दिव्यशक्ति, संस्कृति संरक्षिका, जिनशासन प्रभाविका, चारित्रचन्द्रिका, राष्ट्रगौरव, वाग्देवी, भारतगौरव इत्यादि अनेक उपाधियों से अलंकृत किया गया है, किन्तु पूज्य माताजी इन सभी उपाधियों से निस्पृह होकर अपनी आत्मसाधना को प्रमुखता देते हुए निर्दोष आर्यिका चर्या में निमग्न रहने का ही अपना मुख्य लक्ष्य रखती हैं।

८. पूज्य माताजी की प्रेरणा से त्याग में बढ़े कदम-त्यागमार्ग में अग्रसर सम्यग्दृष्टी जीव की यह विशेषता रहती है कि वह संसार परिभ्रमण से आक्रान्त अन्य भव्य जीवों को भी मोक्षमार्ग का पथिक बनाने हेतु विशेष रूप से प्रयासरत रहता है। इसी भावना की परिपुष्टि करते हुए पूज्य माताजी ने अनेकानेक शिष्य-शिष्याओं का सृजन किया।

संघस्थ साधुओं-मुनिजनों एवं आर्यिकाओं को अध्ययन कराते हुए सन् १९५६-५७ में ब्र. राजमल जी को राजवार्तिक आदि अनेक ग्रंथों का अध्ययन कराकर पूज्य माताजी ने उन्हें मुनिदीक्षा लेने की प्रेरणा प्रदान की। पुनश्च ब्र. राजमल जी कालांतर में आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के रूप में चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की परम्परा में चतुर्थ पट्टाचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

सन् १९६७ में सनावद चातुर्मास के मध्य पूज्य माताजी ने ब्र. मोतीचंद एवं युवक यशवंंत कुमार को घर से निकाला, उन्हें खूब विद्याध्ययन कराया तथा यशवंत कुमार को मुनिदीक्षा दिलवायी, जो वर्तमान में आचार्यश्री वर्धमानसागर के नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हैं। ब्र. मोतीचंद जी भी क्षुल्लक मोतीसागर बनकर जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर के प्रथम पीठाधीश के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

षष्ठम् पट्टाचार्यश्री अभिनंदनसागर जी महाराज ने भी पूज्य माताजी से राजवार्तिक, गोम्मटसार आदि ग्रंथों का अध्ययन किया था। मुनि श्री भव्यसागर जी महाराज, मुनि श्री संभवसागर जी महाराज इत्यादि ने भी पूज्य माताजी से विद्याध्ययन किया तथा उनकी प्रेरणा से ही मुनि दीक्षा प्राप्त की। वर्तमान में चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की निर्दोष अक्षुण्ण परम्परा के सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज ने भी इनकी प्रेरणा से मुनिदीक्षा प्राप्त करके पट्टाचार्य पद पर अभिशिक्त होकर चतुर्विध संघ का संचालन कर रहे हैं तथा पूज्य माताजी के अनन्य शिष्य स्वस्तिश्री कर्मयोगी पीठाधीश अभिनव चन्द्रगुप्त की उपाधि सार्थक करते हुए रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी अत्यंत कर्मठ व्यक्तित्व के रूप में समस्त समाज में प्रसिद्धि को प्राप्त हैं।

आर्यिका माताओं की शृँखला में आर्यिका श्री पद्मावती माताजी, आर्यिका श्री जिनमती माताजी, आर्यिका श्री आदिमती माताजी, आर्यिका श्री श्रेष्ठमती माताजी, आर्यिका श्री अभयमती माताजी, आर्यिका श्री श्रुतमती माताजी, मैं स्वयं (आर्यिका चन्दनामती) तथा आर्यिका श्री सम्मेदशिखरमती माताजी, आर्यिका श्री वैâलाशमती माताजी आदि अन्य कई माताजी पूज्य माताजी से प्राप्त वैराग्यमयी संस्कारों एवं अध्यापन का ही प्रतिफल हैं। पूज्य माताजी से सर्वांगीण ग्रंथों का अध्ययन करके पूज्य जिनमती माताजी ने प्रमेयकमलमार्तण्ड, पूज्य आदिमती माताजी ने गोम्मटसार कर्मकाण्ड का हिन्दी अनुवाद किया है। मुझे भी षट्खण्डागम एवं अन्य महान ग्रंथों की हिन्दी टीका, महावीर स्तोत्र की संस्कृत टीका एवं कतिपय संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मराठी, अंग्रेजी भाषा में रचनाएँ लिखने का सुअवसर पूज्य माताजी की अनुकम्पा से प्राप्त हुआ है। अपने दीक्षित जीवन की सुदीर्घ अवधि में कितने ही भव्य जीवों ने पूज्य माताजी से आर्यिका-क्षुल्लिका दीक्षा, आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत, शक्ति अनुसार प्रतिमाएँ, पंच अणुव्रत इत्यादि ग्रहण करके संयम के मार्ग को आत्मसात किया है। वर्तमान में पूज्य माताजी के साक्षात् सान्निध्य में रहकर अनेक ब्रह्मचारीगण (ब्र. अध्यात्म, बाल ब्र. विजय जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन, बाल ब्र. नवनीत जैन, बाल ब्र. संजय जैन, ब्र. सुभाष जैन साहू आदि)-ब्रह्मचारिणी बहनें(संघ संचालिका कु. बीना दीदी, कु. सारिका, कु. इन्दू, कु. अलका, कु. दीपा, कु. श्रेया, ब्र. मंजु जैन, कु. डॉ.अनुप्रेक्षा, कु. श्वेता जैन, कु.सुरभि जैन , मधुबाला, कुसुम, कुमुदनी, सौ. मीना, ब्र. मंगला जैन साहू, सौ. मुन्नी देवी आदि) त्यागमार्ग में संलग्न हैं। पूज्य माताजी की प्रेरणा से मोक्षमार्ग में प्रवृत्त ऐसे सैकड़ों भव्य जीवों की संख्या हमारे समक्ष है।

९. तीर्थ विकास की भावना-तीर्थंकर भगवन्तों की कल्याणक भूमियों एवं विशेष रूप से जन्मभूमियों के विकास की ओर पूज्य माताजी की विशेष आंतरिक रुचि सदा से रही है। पूज्य माताजी का कहना है कि हमारी संस्कृति का परिचय प्रदान करने वाली ये कल्याणक भूमियाँ हमारी संस्कृति की महान धरोहर हैं अत: इनका संरक्षण-संवर्धन-विकास अत्यंत आवश्यक है। सर्वप्रथम भगवान शांतिनाथ, कुन्थुनाथ, अरहनाथ की जन्मभूमि ‘हस्तिनापुर’ में पूज्य माताजी की प्रेरणा से निर्मित जैन भूगोल की अद्वितीय रचना ‘जम्बूद्वीप’ आज विश्व के मानस पटल पर अंकित हो गयी है, उ.प्र. सरकार के पर्यटन विभाग ने जम्बूद्वीप से हस्तिनापुर की पहचान बताते हुए उसे एक अतुलनीय ‘मानव निर्मित स्वर्ग’ A man made heaven of unparallel superlatives and natural wonders) की संज्ञा प्रदान की है। सन् १९९३ से १९९५ तक शाश्वत जन्मभूमि ‘अयोध्या’ में ‘समवसरण मंदिर’ और ‘त्रिकाल चौबीसी मंदिर’ का निर्माण करवाकर उसका विश्वव्यापी प्रचार, अकलूज (महाराष्ट्र) में नवदेवता मंदिर निर्माण की प्रेरणा, सनावद (म.प्र.) में णमोकार धाम, प्रीत विहार-दिल्ली में कमलमंदिर, मांगीतुंगी (महाराष्ट्र) में सहस्रवूâट कमल मंदिर, अहिच्छत्र में ग्यारह शिखर वाला तीस चौबीसी मंदिर और भगवान ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञान कल्याणक भूमि-प्रयाग (इलाहाबाद) में ‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ’ का भव्य निर्माण पूज्य माताजी की ही प्रेरणा के प्रतिफल हैं।

कितने ही अन्य स्थानों पर भी जैसे-खेरवाड़ा में वैâलाशपर्वत निर्माण की प्रेरणा, पिड़ावा में समवसरण रचना की प्रेरणा, सोलापुर (महा.) में भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा की स्थापना, श्री महावीर जी के शांतिवीर नगर में मंदारवृक्ष की स्थापना, अतिशयक्षेत्र श्री त्रिलोकपुर में पारिजातवृक्ष की स्थापना, केकड़ी (राज.) में सम्मेदशिखर की रचना आदि अनेकानेक निर्माण पूज्य माताजी के निर्देशन द्वारा सम्पन्न हुए और हो रहे हैं। भगवान महावीर स्वामी की जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा-बिहार) के विकास हेतु भगवान महावीर स्वामी कीर्तिस्तंभ, भगवान महावीर की विशाल खड्गासन प्रतिमा सहित विश्वशांति महावीर मंदिर, नवग्रह शांति जिनमंदिर, त्रिकाल चौबीसी मंदिर एवं नंद्यावर्त महल आदि अनेक निर्माण आपकी प्रेरणा से इस क्षेत्र पर हुए हैं तथा कुण्डलपुर तीर्थ विश्व भर के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

भगवान मुनिसुव्रतनाथ की जन्मभूमि ‘राजगृही’ में ‘मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर’ एवं विपुलाचल पर्वत की तलहटी में मानस्तंभ रचना, भगवान महावीर की निर्वाणस्थली पावापुरी में जलमंदिर के समक्ष पाण्डुकशिला परिसर में भगवान की खड्गासन प्रतिमा सहित ‘भगवान महावीर जिनमंदिर’, गौतम गणधर स्वामी की निर्वाणस्थली गुणावां जी में गौतम स्वामी की खड्गासन प्रतिमा सहित जिनमंदिर, श्री सम्मेदशिखर जी में भगवान ऋषभदेव मंदिर इत्यादि समस्त निर्माण भी पूज्य माताजी की संप्रेरणा से ही सम्पन्न हुए हैं।

तीर्थंकर जन्मभूमि विकास की शृँखला में भगवान पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि कावंâदी में ‘श्री पुष्पदंतनाथ जिनमंदिर’ का निर्माणकार्य होकर उसमें भगवान पुष्पदंतनाथ की विशाल सवा ९ फुट उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा पंचकल्याणक प्रतिष्ठापूर्वक विराजमान हो चुकी हैं।

तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में वर्तमानकालीन वहाँ जन्में पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि की टोकों पर जिनमंदिर निर्माण की प्रेरणा प्रदान कर आपने संस्कृति को जीवन्त करने का अभूतपूर्व प्रयास किया है। उस शृँखला में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की टोंक पर सन् २०११ में सुन्दर कलात्मक मंदिर बनकर उसमें सवा चार फुट पद्मासन श्वेत प्रतिमा विराजमान हुई हैं तथा सरयू नदी के तट पर जून २०१३ में भगवान अनन्तनाथ के मंदिर का निर्माण होकर वेदी में भगवान की सवा दस फुट उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा विराजमान की गई है। इसी प्रकार जून २०१४ में भगवान अजितनाथ की टोंक पर विशाल जिनमंदिर का निर्माण तथा दिसम्बर २०१४ में भगवान अभिनंदननाथ की टोंक पर विशाल जिनमंदिर का निर्माण करके वेदी में ५-५ फुट की सुन्दर पद्मासन प्रतिमाएं विराजमान की गई हैं और भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं सम्पन्न हुई हैं। साथ ही वहाँ निर्मित ‘भरत-बाहुबली’ टोंक का भी नवनिर्माण होकर आज अयोध्या तीर्थ एक विकसित स्वरूप में जनमानस के आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

उसी शृँखला में श्री सुमतिनाथ भगवान की टोंक पर भी भव्य मंदिर निर्माण किया जा रहा है।

अनेक वर्षों से अड़चनों को प्राप्त हो रही भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि सिंहपुरी-सारनाथ में भगवान की विशाल प्रतिमा का पंचकल्याणक महोत्सव जनवरी २००५ में सानंद सम्पन्न हुआ। भगवान वासुपूज्य की जन्मभूमि चम्पापुरी में भगवान वासुपूज्य की लाल ग्रेनाइट की ३१ फुट विशाल खड्गासन प्रतिमा पूज्य माताजी की प्रेरणा का ही सुफल है। वर्तमान में भगवान शीतलनाथ की जन्मभूमि भद्दिलपुर-भद्रिकापुरी का विकासकार्य पूज्य माताजी के विशेष आशीर्वाद से अविरल गति से चल रहा है और भगवान मल्लिनाथ-नमिनाथ की जन्मभूमि मिथिलापुरी के लिए भी पूज्य माताजी प्रयासरत हैं। ऐसी तीर्थंकर भगवन्तों के पंचकल्याणकों से पवित्र भूमियों के विकास-जीर्णोद्धार हेतु सतत संलग्न पूज्य माताजी को शतश: नमन।

उल्लेखनीय है कि पूज्य माताजी के आर्यिका दीक्षास्थल-माधोराजपुरा (राज.) में पदमपुरा अतिशय क्षेत्र के निकट में भी ‘गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती दीक्षा तीर्थ’ के विकास का कार्य सम्पन्न किया जा चुका है। यहाँ सुन्दर कृत्रिम सम्मेदशिखर पर्वत का निर्माण करके १५ फुट उत्तुंग काले पाषाण वाली भगवान पाश्र्वनाथ की खड्गासन प्रतिमा एवं चौबीसी विराजमान की गई हैं। इस तीर्थ की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा २१ नवम्बर से २६ नवम्बर २०१० तक पीठाधीश क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज के सान्निध्य में एवं कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन (वर्तमान पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी) के निर्देशन में विशेष महोत्सवपूर्वक सम्पन हुई है।

इसी शृँखला में अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी (राज.) में पूज्य माताजी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से महावीर धाम परिसर में पंचबालयति दिगम्बर जैन मंदिर का भव्य निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ है। यहाँ पर पाँचों बालयति भगवान की प्रतिमाएँ विराजमान करके पृथक् वेदियों में पद्मावती, क्षेत्रपाल की प्रतिमाएँ भी विराजमान की गई हैं। संस्थान द्वारा उक्त जिनमंदिर का पंचकल्याणक दिनाँक २९ जनवरी से २ फरवरी २०१२ तक सानंद सम्पन्न किया गया।

विशेष : तेरहद्वीप रचना, तीर्थंकरत्रय प्रतिमा एवं तीनलोक रचना- जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर तीर्थ के विकास की अद्वितीयता को अमरता प्रदान करने वाली इन रचनाओं का निर्माण पूज्य माताजी की प्रेरणा से इतिहास में प्रथम बार हुआ। अप्रैल सन् २००७ में स्वर्णिम तेरहद्वीप रचना की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई। विश्व में प्रथम बार निर्मित इस रचना में विराजमान २१२७ जिनप्रतिमाओं के दर्शन करके लोग इच्छित फल की प्राप्ति करते हैं। इसके अतिरिक्त हस्तिनापुर में जन्मे भगवान शांतिनाथ-वुंâथुनाथ-अरहनाथ की ३१-३१ फुट उत्तुंग खड्गासन प्रतिमाओं एवं ५६ फुट उत्तुंग निर्मित तीनलोक रचना की जिनप्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा फरवरी सन् २०१० में हुई जो हस्तिनापुर के अतिशय में चार चाँद लगा रही हैं। हस्तिनापुर तीर्थ की गरिमा को वृद्धिंगत करते हुए इसी जम्बूद्वीप परिसर में सन् २०१४ में भगवान चन्द्रप्रभु मंदिर का भव्य निर्माण होकर प्राणप्रतिष्ठा हुई तथा वर्तमान में वहाँ अद्वितीय आगमोक्त ‘भगवान शांतिनाथ समवसरण’ का निर्माणकार्य सम्पूर्णता की ओर है, जो धरती से ७२ फुट ऊँचा बनाया गया है।

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१०. मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की ऐतिहासिक यात्रा एवं अमर कृति : १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा निर्माण की प्रेरणा-सन् १९९६ में पूज्य माताजी द्वारा प्रदत्त प्रेरणानुसार विश्व के अप्रतिम आश्चर्य के रूप में १०८ फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव की खड्गासन प्रतिमा के निर्माण का कार्य मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र के पर्वत पर दु्रतगति से हुआ अत: लगभग २० वर्षों के अथक परिश्रम से ‘‘भगवान ऋषभदेव १०८ फुट मूर्ति निर्माण कमेटी’’ द्वारा यह कार्य सम्पन्न हुआ और स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी एवं देश भर के भक्तों की बारम्बार प्रार्थना से पूज्य माताजी का १७ मार्च २०१५ को संघ सहित मांगीतुंंगी सिद्धक्षेत्र की ओर एक बार पुन: विहार हुआ और उस ऐतिहासिक विहार ने स्वर्णिम इतिहास का निर्माण कर दिया।


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अपने सर्वोदयी व्यक्तित्व के द्वारा पूज्य माताजी ने जैन संस्कृति के संरक्षण हेतु ऐसी ‘‘अमरकृति’’ के निर्माण की प्रेरणा समाज को प्रदान की, जिसकी इस संसार में कोई मिशाल नहीं है। आज मांगी पर्वत के अखण्ड पाषाण में निर्मित १०८ फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव की यह प्रतिमा विश्व के लिए एक महान आश्चर्य है। जैन समाज ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में ‘‘गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड-लंदन’’ ने इस प्रतिमा को अपने रिकॉर्ड में दर्ज करके यह सिद्ध कर दिया है कि इस प्रतिमा के समान अन्य कोई प्रतिमा नहीं है। शास्त्रीय प्रमाण के अनुसार यह प्रतिमा श्री आचार्य वसुनन्दि प्रतिष्ठा पाठ के आधार से पूरे माप के साथ अंगूठे से लेकर ललाट तक १०८ फुट उत्तुंग बनाई गई है, लेकिन प्रतिमा की प्रशस्ति, कमलासन एवं बालों की ऊँचाई तक यह प्रतिमा १२१ फुट उत्तुंग निर्मित की गई है तथा गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रेकार्ड के मेजर्मेन्ट अनुसार चरण से केशों तक माप करके इसे ११३ फुट की ऊaत्तेू व्aग्ह घ््दत् घोषित किया गया है। इस वीतराग प्रतिमा के निमित्त से सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों को जैनधर्म में वर्णित अहिंसा-अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने हेतु प्रतिमा को ‘‘द स्टेचू ऑफ अहिंसा’’ का नाम दिया गया है। इस तरह पूज्य माताजी की अमर कृति के रूप में यह प्रतिमा युगों-युगों तक जिनशासन की महिमा को विकसित करके जैन संस्कृति के विशाल व्यक्तित्व का परिचय जनमानस को प्रदान करेगी और ‘‘विश्वशांति’’ हेतु सम्पूर्ण विश्व के राजा व प्रजा को अहिंसा धर्म के पालन हेतु प्रेरित करती रहेगी। इस विशालतम प्रतिमा का भव्यतम व ऐतिहासिक पंचकल्याणक (फरवरी सन् २०१६ में सम्पन्न) ‘न भूतो न भविष्यति’ की सूक्ति को चरितार्थ करता हुआ स्वयं में अद्वितीय रहा है।


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११. श्री ऋषभदेवपुरम् से संचालित हो रहा है ऋषभगिरि महातीर्थ का प्रबंधन-९९ करोड़ महामुनियों की सिद्धभूमि होने से अतिशय पावन सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी को सम्पूर्ण विश्व में ख्याति प्राप्त कराने के उद्देश्य से पूज्य माताजी की प्रेरणा से मांगीतुंगी फाटा के निकट ऋषभदेवपुरम् नामक नगर की स्थापना हुई है, जहाँ फरवरी सन् २०१७ में नवग्रह शांति जिनमंदिर में विराजित होने वाले ९ तीर्थंकर भगवन्तों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई है। वर्तमान में उस तीर्थ पर प्रस्तावित सर्वतोभद्र महल, नवग्रह शांति जिनमंदिर, सुख-सुविधा सम्पन्न यात्री निवास, संत निवास आदि निर्माण कार्य द्रुतगति पर हैं। शीघ्र ही यह केन्द्र भी जनमानस के सम्मुख जैनधर्म की महिमा का परिज्ञान नूतन रूप में आगन्तुक यात्रियों को कराएगा।


१२. शिरडी (महाराष्ट्र) में ज्ञानतीर्थ-शिरडी (महाराष्ट्र) को जैन संस्कृति केन्द्र के रूप में स्थापित करने हेतु वहाँ पर ‘ज्ञानतीर्थ’ का निर्माण हुआ है, जिसमें पूज्य माताजी के निर्देशानुसार कालसर्पयोग निवारक भगवान पाश्र्वनाथ की विशाल प्रतिमा विराजमान करके पंचकल्याणक महोत्सव (मई २०१३ में) सम्पन्न हो चुका है और वहाँ सुन्दर कमल मंदिर निर्मित है।

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१३. जृम्भिका तीर्थ विकास की प्रेरणा-भगवान महावीर स्वामी की वैâवल्यज्ञान भूमि जृंभिका जो आज बिहार प्रान्त में जमुई के नाम से प्रसिद्ध है, वहाँ एक नूतन भूमि पर कमलासनयुक्त भगवान की सवा ११ फुट उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा मई २०१४ में की गई है और आगे इस जृम्भिका तीर्थ का विकास हो रहा है।

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१४. धर्मप्रभावना के विविध आयाम-जम्बूद्वीप रचना के निर्माण का प्रमुख लक्ष्य लेकर ‘दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान’ नामक संस्था का राजधानी दिल्ली में पूज्य माताजी की प्रेरणा से सन् १९७२ में गठन किया गया। इसी संस्थान ने विविध धर्मप्रभावना के कार्यों का संचालन किया है। संस्थान स्थित ‘वीर ज्ञानोदय ग्रन्थमाला’ द्वारा लाखों की संख्या में ग्रंथ प्रकाशन, चारों अनुयोगों के ज्ञान से समन्वित ‘सम्यग्ज्ञान’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन, णमोकार महामंत्र बैंक इत्यादि कितनी ही कार्ययोजनाएँ जिनशासन की कीर्ति को निरंतर प्रसारित कर रही हैं।

पूज्य माताजी की प्रेरणा से सन् १९८२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा राजधानी दिल्ली से उद्घाटित ‘जम्बूद्वीप ज्ञान ज्योति’ ने तीन वर्ष तक सम्पूर्ण भारतवर्ष में जैनधर्म के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया और अंत में यह ज्योति अखण्डरूप से तत्कालीन केन्द्रीय रक्षामंत्री-श्री पी.वी. नरसिंहाराव द्वारा जम्बूद्वीप स्थल पर स्थापित कर दी गयी।

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इसी प्रकार अप्रैल सन् १९९८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार’ का राजधानी दिल्ली से प्रवर्तन किया, जो समस्त प्रांतों में प्रवर्तन के पश्चात् भगवान ऋषभदेव की दीक्षास्थली-प्रयाग तीर्थ पर निर्मित ‘समवसरण मंदिर’ में स्थापित होकर युगों-युगों तक के लिए भगवान ऋषभदेव के वास्तविक समवसरण की याद दिला रहा है।

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भगवान महावीर जन्मभूमि-कुण्डलपुर (नालंदा) से सन् २००३ में ‘भगवान महावीर ज्योति रथ’ का विविध प्रांतों में सफल प्रवर्तन भी इसी शृँखला की विशिष्ट कड़ी है।

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रथ प्रवर्तन प्रेरणा के क्रम में चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के गुणानुवादरूप सन् २०१४ में ‘‘आचार्यश्री शांतिसागर सम्मदेशिखर ज्योति रथ’’ का भ्रमण दक्षिण भारत में हुआ तथा सन् २०१५ में मांगीतुंगी तीर्थ पर निर्मित हो रही भगवान ऋषभदेव १०८ फुट उत्तुंग प्रतिमा के बारे में जनमानस को बताकर जैनधर्म की प्राचीनता, सार्वभौमिकता एवं व्यापकता आदि सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार हेतु ‘‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति कलश यात्रा रथ’’ नाम से दो रथों का सम्पूर्ण भारत में अपूर्व प्रभावनापूर्वक भ्रमण हुआ।


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जैनधर्म की प्राचीनता तथा भगवान ऋषभदेव के नाम एवं सिद्धांतों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए पूज्य माताजी ने सन् १९९७ में राजधानी दिल्ली में विशाल ‘चौबीस कल्पदु्रम महामण्डल विधान’ आयोजित कराया, जिसका झण्डारोहण पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने किया एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री साहिब सिंह वर्मा, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह तथा श्रीमती सुषमा स्वराज

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आदि अनेक वैâबिनेट मंत्रियों ने उपस्थित होकर धर्मलाभ लिया। साथ ही ‘भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती वर्ष’ (सन् १९९७-१९९८ में) तथा ‘भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव वर्ष’ (सन् २००० में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा उद्घाटित) भी पूज्य माताजी की प्रेरणा द्वारा विविध धर्मप्रभावना के कार्यक्रमों सहित सम्पन्न हुए। विभिन्न टी.वी. चैनलों द्वारा पूज्य माताजी के ‘तीर्थंकर जीवन दर्शन (सचित्र)’ एवं अन्य विषयों पर प्रभावक प्रवचन लम्बे समय तक प्रसारित हुए एवं हो रहे हैं। पूज्य माताजी की प्रेरणा से स्थापित ‘अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महिला संगठन’ अपनी सैकड़ों इकाइयों द्वारा दिगम्बर जैन समाज की नारी शक्ति को सृजनात्मक कार्यों हेतु संगठित कर रहे हैं।

पूज्य माताजी की पावन प्रेरणा से ही सन् २०१६-२०१७ में ‘‘श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन ८४ जातीय महासंगठन’’ का निर्माण हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य जैनधर्म में वर्णित ८४ जातियों का अपना एक सशक्त संगठन बनाकर जिनधर्म का प्रचार-प्रसार करना एवं अपनी खानदान व खानपान शुद्धि को विशेष सुरक्षित रखना है। सन् २०१५ में मांगीतुंगी विहार के मध्य ग्वालियर (म.प्र.) में हुई श्री पाश्र्वनाथ भगवान की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा ऐसी अतिशायी माता के अतिशय से सभी को परिचित करवा रही है।

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इसके अतिरिक्त कितने ही अन्य धर्मप्रभावना के कार्य पूज्य माताजी ने सम्पन्न किये हैं जिनका यहाँ लेखन तो संभव नहीं है, किन्तु आज पूरा समाज उनके कार्यकलापों से परिचित होकर उन्हें कर्मठता की मूर्ति दिव्यशक्ति के रूप में पहचानता है। वस्तुत: पूज्य माताजी के जीवन में बने किसी भी छोटे या बड़े लक्ष्य की सम्पूर्ति इतनी उचित योजना-संयोजना के साथ कार्यकुशलतापूर्वक सम्पन्न हुई कि प्रत्येक लक्ष्य की सिद्धि कार्य से पूर्व ही अवश्यंभावी सिद्ध हो गई। १५. संघर्ष विजेत्री-पूज्य माताजी ने प्रारंभ से अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया- प्रत्येक कार्य आगमानुवूâल ही करना। पुन: उन कार्यों के निष्पादन में जो भी विघ्न आते हैं, उन्हें बहुत ही शांतिपूर्वक झेलकर पूरी तन्मयता के साथ उस कार्य को परिपूर्ण करना उनकी विशेषता रही है। उनका पूरा जीवन आर्ष परम्परा का संरक्षण करते हुए अपने मूलगुणों में बाधा न आने देकर जिनधर्म की अधिकाधिक प्रभावना के साथ व्यतीत हुआ है।

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१६. भगवान पाश्र्वनाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहस्राब्दि महोत्सव का आयोजन-२३वें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ की जन्मभूमि वाराणसी में ६ जनवरी २००५ को पूज्य माताजी की प्रेरणा एवं ससंघ सानिध्य में ‘भगवान पाश्र्वनाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहस्राब्दि महोत्सव’ का उद्घाटन किया गया। भगवान की केवलज्ञान कल्याणक भूमि ‘अहिच्छत्र’, निर्वाणभूमि ‘श्री सम्मेदशिखर जी’ इत्यादि अनेकानेक तीर्थों पर विविध आयोजनों के साथ यह वर्ष मनाया गया। वर्ष २००६ को ‘‘सम्मेदशिखर वर्ष’’ के रूप में मनाने की प्रेरणा पूज्य माताजी ने प्रदान की, ताकि तन-मन-धन से दिगम्बर जैन समाज अपने महान तीर्थराज ‘श्री सम्मेदशिखर जी’ के प्रति समर्पित हो सके। पुन: दिसम्बर २००७ में अहिच्छत्र में आयोजित ‘सहस्राब्दि महामस्तकाभिषेक’ के साथ इस त्रिवर्षीय महोत्सव का समापन किया गया।

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१७. शताब्दी का अभूतपूर्व अवसर : दीक्षा स्वर्ण जयंती-वैशाख कृष्णा दूज, वी.नि.सं. २५३२ अर्थात् १५ अप्रैल २००६ को अपनी आर्यिका दीक्षा के ५० वर्ष पूर्ण करने वाली प्रथम साध्वी पूज्य माताजी वर्तमान दिगम्बर जैन साधु परम्परा में सर्वाधिक प्राचीन दीक्षित होने के गौरव से युक्त होकर हम सभी के लिए अतिशयकारी प्राचीन प्रतिमा के सदृश बन गर्इं। जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में १४ से १६ अप्रैल २००६ तक ‘गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी आर्यिका दीक्षा स्वर्ण जयंती महोत्सव’ का भव्य आयोजन करके समस्त समाज ने पूज्य माताजी के श्रीचरणों में अपनी विनम्र विनयांजलि अर्पित की। इसी शृँखला में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपनी आर्यिका दीक्षा के ६० वर्ष भी २४ अप्रैल २०१६, वैशाख कृ. दूज को मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर परिपूर्ण किये हैं, मोक्षप्रदायिनी इस पिच्छिका को धारण करके दीक्षित अवस्था के ६५ वर्ष परिपूर्ण करने वाली वर्तमान की सबसे प्राचीन दीक्षित, शारदास्वरूपा, दिव्यशक्ति पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के चरणों में शतश: नमन।

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१८. भारत गणतंत्र के राष्ट्रपति जी का पदार्पण-हस्तिनापुर तीर्थ पर जम्बूद्वीप में पौष कृ. १० (२१ दिसम्बर २००८) के दिन तत्कालीन भारत की सर्वोच्च नागरिक महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील का आगमन हुआ। उन्होंने पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल आशीर्वाद प्राप्त करके अतीव प्रसन्नता की अनुभूति करते हुए नवनिर्मित तेरहद्वीप की स्वर्णिम रचना का दर्शन किया तथा महाभारतकालीन हस्तिनापुर का ऐतिहासिक परिचय भी प्राप्त किया।

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१९. ‘प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर वर्ष’ मनाने की प्रेरणा-बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के महान उपकारों से जन-जन को परिचित कराने के उद्देश्य से पूज्य माताजी ने वर्ष २०१० को ‘‘प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर वर्ष’’ के रूप में मनाने की प्रेरणा समस्त समाज को प्रदान की। इस वर्ष का उद्घाटन ज्येष्ठ कृ. चतुर्दशी, ११ जून २०१० को जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में भगवान शांतिनाथ जन्म-दीक्षा एवं निर्वाणकल्याणक के शुभ दिवस किया गया तथा ज्येष्ठ कृ. चतुर्दशी, ३१ मई २०११ तक यह वर्ष पूरे देश के विभिन्न अंचलों में अनेक धर्मप्रभावनात्मक कार्यक्रमों के साथ विभिन्न आयोजनपूर्वक मनाया गया।

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२०. प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर वर्ष मनाने की प्रेरणा-शरदपूर्णिमा-२०११ के शुभ अवसर पर पूज्य माताजी द्वारा प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज, जो पूज्य माताजी के दीक्षा गुरु भी हैं, का वर्ष मनाने की घोषणा की अत: यह वर्ष समाज द्वारा विभिन्न आयोजनपूर्वक सानंद मनाया गया।

२१. चारित्रवर्धनोत्सव वर्ष-जिनकी दीर्घकालिक तपस्या के वर्षों की गिनती जानकर अनेक आचार्य, मुनि, आर्यिकाएँ इत्यादि भी इस बात को कहते हुए गौरव का अनुभव करते हैं कि आज जितनी मेरी उम्र भी नहीं है उससे अधिक तो पूज्य माताजी की दीक्षा की आयु है, अर्थात् १८ वर्ष की उम्र से त्याग मार्ग पर जिन्होंने कदम रखा, अपनी जन्मतिथि-शरदपूर्णिमा को भी त्याग से सार्थक कर उस त्यागमयी जीवन के ६० वर्ष भी उन्होंने निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण किये। इसीलिए इनके ७९वें जन्मदिवस एवं ६१वें त्यागदिवस पर अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला संगठन के आह्वान पर चारित्रवर्धनोत्सव वर्ष २०१२-२०१३ मनाने की घोषणा हुई। इस वर्ष में सभी को शक्ति अनुसार चारित्र ग्रहण करने का संदेश दिया गया।

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२२. श्री गौतम गणधर वर्ष-श्रावण कृ. एकम्, वीरशासन जयंती, १३ जुलाई २०१४ के शुभ अवसर पर भगवान महावीर स्वामी के प्रमुख गणधर श्री गौतम स्वामी की आज भी उपलब्ध साक्षात् वाणी से जन-जन को परिचित कराने के लिए तथा गौतम स्वामी के उपकारों को याद कराने के लिए पूज्य माताजी ने जुलाई २०१४-२०१५ को ‘‘श्री गौतम गणधर वर्ष’’ के रूप में मनाने की प्रेरणा प्रदान की, जिसके अन्तर्गत विशेषरूप से अनेक स्थानों पर दशलक्षण जैसे महापर्व में दस दिनों तक लगातार गौतम गणधर वाणी पुस्तक के १० अध्यायों का क्रमश: विद्वानों का वाचन किया गया तथा विभिन्न संगोष्ठी, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता आदि भी आयोजित किये गये हैं।

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२३. मंगलमय अमृत महोत्सव-संस्थान द्वारा जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में शरदपूर्णिमा, १८ अक्टूबर २०१३ को पूज्य माताजी की ८०वीं जन्मजयंती ‘‘गणिनी ज्ञानमती अमृत महोत्सव’’ के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाई गई। इस अवसर पर ‘‘सम्मेदशिखर विधान’’ के ८० मांडले बनाकर ८० परिवारों के द्वारा विधान किया गया तथा सभी ने पूज्य माताजी की पूजन करके विहंगम दृश्य उपस्थित किया। इसके साथ ही भव्य विनयांजलि सभा भी आयोजित की गई, जिसमें प्रतिवर्ष के विभिन्न पुरस्कारों के साथ ही विशेषरूप से ‘‘अमृत महोत्सव पुरस्कार’’ भी प्रदान किया गया, जिसका सौभाग्य श्राविका आश्रम, सोलापुर को प्राप्त हुआ।

२४. शाश्वत सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर में ‘‘आचार्य श्री शांतिसागर धाम’’-प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज द्वारा सन् १९२७-२८ में की गई सम्मेदशिखर यात्रा की स्मृति को दिग्दिगंत व्यापी बनाने हेतु पूज्य माताजी की प्रेरणा से शाश्वत सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर जी में मेन रोड पर ‘‘आचार्य श्री शांतिसागर धाम’’ नामक ऐतिहासिक स्मारक का निर्माण किया जा रहा है। यहाँ सम्मेदशिखर जी से प्रथम मोक्षगामी भगवान अजितनाथ की ३१ फुट उत्तुंग विशाल खड्गासन प्रतिमा विराजमान हो चुकी है, उसके जिनमंदिर निर्माण के साथ ही मंदिर में नवग्रह अरिष्ट निवारक २४ तीर्थंकरों की प्रतिमा विराजमानपूर्वक आचार्य श्री के जीवनदर्शन को प्रदर्शित करता भव्य स्मारक भी निर्मित किया जायेगा। साथ ही विशाल धर्मशालाएं आदि समुचित व्यवस्थाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।

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२५. बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी का सर्वाधिक विशाल पंचकल्याणक महामहोत्सव-यूँ तो इन दिव्यशक्ति, गणिनीप्रमुख, भारतगौरव परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा, आशीर्वाद एवं मंगल सान्निध्य में हजारों की संख्या में वृहद् एवं लघु पंचकल्याणक सम्पन्न हुए हैं पर इन पंचकल्याणकों में सर्वाधिक विशाल, पंचम काल का अद्वितीय पंचकल्याणक मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में निर्मित ‘‘१०८ फुट भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक एवं महामस्तकाभिषेक’’ हुआ। इस विशालतम महोत्सव ने देश और विदेश की जैन समाज के साथ ही भारत के सम्पूर्ण शासन-प्रशासन को भी अपनी सुगंधि से महकाया है। आज केन्द्र शासन और महाराष्ट्र शासन में ऋषभगिरि-मांगीतुंगी के १०८ फुट भगवान ऋषभदेव की प्रभावना से जैनधर्म की अनादिनिधन तीर्थंकर परम्परा का शंखनाद जन-जन तक पहुँचा है।

विशेष रूप से अखण्ड पाषाण में निर्मित इस प्रतिमा को जब लंदन के गिनीज वल्र्ड रिकार्ड में शामिल किया गया, तब तो जैनधर्म के इस माहात्म्य को सारे देश के विभिन्न नेशनल टी.वी. चैनल यथा ‘‘आज तक, न्यूज नेशन, जी. न्यूज, ए.बी.पी.माजा, डी.डी. न्यूज, डी.डी. सहयाद्री चैनल आदि ने कवरेज किया। देश के विभिन्न अखबारों के मुख पृष्ठोें पर ऋषभदेव की गूंज मच गई। ११ फरवरी २०१६, माघ शुक्ला तृतीया से प्रारंभ हुई इस पंचकल्याणक में १२५ साधु-साध्वियों का महत्वपूर्ण सान्निध्य रहा जिससे यह महोत्सव स्वयं में ऐतिहासिक बन गया। इस पंचकल्याणक में ५००१ दीपकों से हुई विराट महाआरती को गोल्डेन बुक ने अवार्ड दिया, शासन-प्रशासन ने इसमें पूर्ण सहयोग प्रदान किया।

पंचकल्याणक के साथ-साथ इन्द्रादि परिकर व आगन्तुक यात्रियों की सुविधा हेतु १० भोजनशाला का संचालन, १ लाख स्क्वायर फुट का पाण्डाल और कालोनियाँ, विशाल कार्यालय, मेला, झूले आदि विशेष प्रशंसनीय रहे। महोत्सव के मध्य हुए अधिवेशन-सम्मेलन, विमोचन-लोकार्पण एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने लाखों की संख्या में पधारे भक्तों का ज्ञानवर्धन व मनोरंजन किया। अनेक संस्थाओं, समितियों ने पूज्य माताजी को विशेष उपाधियाँ प्रदान कर अभिनंदन करते हुए स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया। वस्तुत: यह पंचकल्याणक प्रतिष्ठा स्वयं में अद्वितीय और अवर्णनीय रही है।

२६. विभिन्न विशिष्ट नेताओं ने किए पूज्य माताजी के दर्शन-जिनागम की महान साधिका पूज्य माताजी के ८३ वर्षीय जीवन में सन् १९७९ से लेकर आज तक अनेक राजनेता जैसे प्रधानमंत्री-श्रीमती इन्दिरा गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, महामहिम डॉ. शंकर दयाल शर्मा, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, मुख्यमंत्री-श्री मुलायम सिंह यादव, श्री साहब सिंह वर्मा, श्री नारायणदत्त तिवारी, श्री दिग्विजय सिंह, श्री कल्याण सिंह आदि तथा अनेक केन्द्रीय मंत्री, राज्यमंत्री, वित्तमंत्री आदि मंत्री, राज्यपाल, सांसद, विधायक, मुख्य न्यायाधीश, अनेक कुलपति-पूर्व कुलपति, मेयर, पुरातत्त्वविद, पत्रिका सम्पादक, वैज्ञानिक, शासन-प्रशासन अधिकारी आदि विशिष्ट महानुभावों ने पधारकर पूज्य माताजी के प्रति विनय भक्ति समर्पित की है।

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२७. जैन इन्साइक्लोपीडिया : जैन समाज हेतु एक विशिष्ट उपलब्धि- www.encyclopediaofjainism.com दिगम्बर जैनधर्म से संबंधित समस्त विधाओं यथा-संस्कृत, साहित्य, तीर्थ एवं मंदिर, परम्पराएं, साधु-साध्वियाँ, पर्व, पूजाएँ, विद्वान, संस्थाएँ, ज्योतिष, वास्तु इत्यादि को परिष्कृत, समग्र एवं प्रामाणिक रूप से इंटरनेट पर उपलब्ध कराने हेतु एक महत्वपूर्ण कार्य योजना है। दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हfिस्तनापुर द्वारा संचालित एवं श्री रोशनलाल जैन ट्रस्ट-हरिद्वार के आर्थिक सहयोग से क्रियान्वित इस बहुआयामी प्रोजेक्ट को पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से मेरे (आर्यिका चंदनामती के) प्रधान सम्पादकत्व में प्रारंभ किया गया है, जिसे हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती भाषाओं में देखा जा सकता है। अथक परिश्रम से तैयार इस इन्साइक्लोपीडिया में मुख्य पृष्ठ पर बायीं ओर ‘मुख्य श्रेणियाँ’ पर क्लिक करके आपको वर्णमाला के क्रम में संयोजित लगभग २०० विविध विषयों की श्रेणियाँ प्राप्त होंगी। ेंग्व्ग्ज्ग्a साफ्टवेयर में विकसित इस अनुपम प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आप भी इसमें सबंधित आलेख/तथ्य/ जानकारियाँ/फोटो/ऑडियो/ वीडियो स्वतंत्र रूप में अपलोड कर सकते हैं, किसी प्रस्तुत तथ्य को पुन: सम्पादित भी कर सकते हैं, दिगम्बर जैन परम्परा से संबंधित अपनी पुस्तक को अपने नाम से ही अपलोड कर सकते हैं।

इस प्रकार सर्वतोमुखी प्रतिभा की धनी पूज्य माताजी के चरणों में कोटिश: नमन है तथा भगवान जिनेन्द्र से यही प्रार्थना है कि उनके इस पवित्र त्यागमयी जीवन का हमें शताब्दी महोत्सव भी मनाने का लाभ प्राप्त हो एवं आपके द्वारा नया-नया साहित्य जनता को प्राप्त होता रहे, यही मंगलकामना है।

दीक्षित जीवन के 66 चातुर्मास(1953-2018)

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१. टिकैतनगर (उ.प्र.) -१९५३
२. जयपुर (राज.) -१९५४
३. म्हसवड़ (महा.) -१९५५
४. जयपुर (खानियां) -१९५६
५. जयपुर (खानियां) -१९५७
६. ब्यावर (राज.) -१९५८
७. अजमेर (राज.) -१९५९
८. सुजानगढ़(राज.) -१९६०
९. सीकर (राज.) -१९६१
१०. लाडनूँ (राज.) -१९६२
११. कलकत्ता (पं. बंगाल) -१९६३
१२. हैदराबाद (आंध्रप्रदेश) -१९६४
१३. श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) -१९६५
१४. सोलापुर (महाराष्ट्र) -१९६६
१५. सनावद (मध्यप्रदेश) -१९६७
१६. प्रतापगढ़(राज.) -१९६८
१७. जयपुर (राज.) -१९६९
१८. टोंक (राज) -१९७०
१९. अजमेर (राज.) -१९७१
२०. दिल्ली (पहाडी धीरज) -१९७२
२१. दिल्ली (नजफगढ़) -१९७३
२२. दिल्ली (लालमंदिर) -१९७४
२३. हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर) -१९७५
२४. खतौली (मुज.-उ.प्र.) -१९७६
२५. हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर) -१९७७
२६. हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर) -१९७८
२७. दिल्ली (मोरी गेट) -१९७९
२८. दिल्ली (वूâचासेठ) -१९८०
२९. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८१
३०. दिल्ली (कम्मो जी धर्मशाला) -१९८२
३१. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८३
३२. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८४
३३. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८५
३४. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८६
३५. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८७
३६. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८८
३७. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९८९
३८. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९९०
३९. सरधना (मेरठ-उ.प्र.) -१९९१
४०. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९९२
४१. अयोध्या -१९९३
४२. टिकैतनगर -१९९४
४३. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९९५
४४. मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र (महा.) -१९९६
४५. लाल मंदिर-दिल्ली -१९९७
४६. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -१९९८
४७. दिल्ली (कनॉट प्लेस) -१९९९
४८. दिल्ली (प्रीत विहार -२०००
४९. दिल्ली (अशोक विहार) -२००१
५०. प्रयाग तीर्थ (इलाहाबाद) -२००२
५१. भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा-बिहार) -२००३
५२. कुण्डलपुर (नालंदा-बिहार) -२००४
५३. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२००५
५४. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२००६
५५.हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२००७
५६. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२००८
५७. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२००९
५८. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२०१०
५९. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२०११
६०. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२०१२
६१. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२०१३
६२. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) -२०१४
६३. मांगीतुंगी (महा.) -२०१५
६४. मांगीतुंगी (महा.) -२०१६
६५. मुम्बई (महा.) -२०१७
६६. ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी (महा.) -२०१८
६६.टिकैतनगर २०१९
६८. हस्तिनापुर (जम्बूद्वीप) २०२०
६६.दिल्ली (कनॉट प्लेस) २०२१

गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी : एक दृष्टि में

-आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी
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जन्मस्थान- टिकैतनगर (बाराबंकी) उ.प्र.
जन्मतिथि- आसोज सुदी १५ (शरदपूर्णिमा) वि. सं. १९९१, (२२ अक्टूबर सन् १९३४)
जाति- अग्रवाल दि. जैन,
गोत्र- गोयल,
नाम- कु. मैना
माता-पिता- श्रीमती मोहिनी देवी एवं श्री छोटेलाल जैन
आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत- ई. सन् १९५२, बाराबंकी में शरदपूर्णिमा के दिन
क्षुल्लिका दीक्षा- चैत्र कृ. १, ई. सन् १९५३ को महावीरजी अतिशय क्षेत्र (राज.) में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज से।
नाम- क्षुल्लिका वीरमती
आर्यिका दीक्षा- वैशाख कृ. २, ई. सन् १९५६ को माधोराजपुरा (राज.) में चारित्रचक्रवर्ती १०८ आचार्य श्री शांतिसागर जी की परम्परा के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज के करकमलों से।
साहित्यिक कृतित्व- अष्टसहस्री, समयसार, नियमसार, मूलाचार, कातंत्र-व्याकरण, षट्खण्डागम आदि ग्रंथों के अनुवाद/टीकाएं एवं लगभग ४०० ग्रंथों की लेखिका।
डी.लिट्. की मानद उपाधि- सन् १९९५ में अवध वि.वि. (पैâजाबाद) द्वारा एवं तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय मुरादाबाद द्वारा ८ अप्रैल २०१२ को ‘‘डी.लिट्.’’ की मानद उपाधि से विभूषित।
तीर्थ निर्माण प्रेरणा- हस्तिनापुर में जंबूद्वीप, तेरहद्वीप, तीनलोक आदि रचनाओं के निर्माण, शाश्वत तीर्थ अयोध्या का विकास एवं जीर्णोद्धार, प्रयाग-इलाहाबाद (उ.प्र.) में तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ का निर्माण, तीर्थंकर जन्मभूमियों का विकास यथा-भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा-बिहार) में ‘नंद्यावर्त महल’ नामक तीर्थ का निर्माण, भगवान पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि काकन्दी तीर्थ (निकट गोरखपुर-उ.प्र.) का विकास, भगवान पाश्र्वनाथ केवलज्ञानभूमि अहिच्छत्र तीर्थ पर तीस चौबीसी मंदिर, हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर भगवान शांतिनाथ-वुंâथुनाथ-अरहनाथ की ३१-३१ फुट उत्तुंग खड्गासन प्रतिमा, मांगीतुंगी में ऋषभगिरि पर र्नििमत १०८ फुट उत्तुंंग भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा, महावीर जी तीर्थ पर महावीर धाम में पंचबालयति मंदिर, शिर्डी में ज्ञानतीर्थ, सम्मेदशिखर में आचार्य श्री शांतिसागर धाम इत्यादि।
महोत्सव प्रेरणा- पंचवर्षीय जम्बूद्वीप महामहोत्सव, भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव, अयोध्या में भगवान ऋषभदेव महावुंâभ मस्तकाभिषेक, कुण्डलपुर महोत्सव, भगवान पाश्र्वनाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहस्राब्दि महोत्सव, दिल्ली में २४ कल्पद्रुम महामण्डल विधान का ऐतिहासिक आयोजन इत्यादि। विशेषरूप से २१ दिसम्बर २००८ को जम्बूद्वीप स्थल पर विश्वशांति अिंहसा सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसका उद्घाटन भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील द्वारा किया गया।
शैक्षणिक प्रेरणा- ‘जैन गणित और त्रिलोक विज्ञान’ पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी, राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन, इतिहासकार सम्मेलन, न्यायाधीश सम्मेलन एवं अन्य अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार, इंटरनेट पर जैन इनसाइक्लोपीडिया आदि।
रथ प्रवर्तन प्रेरणा- जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति (१९८२ से १९८५), समवसरण श्रीविहार (१९९८ से २००२), महावीर ज्योति (२००३-२००४) आचार्य श्री सम्मेदशिखर ज्योति रथ (२०१४) भगवान ऋषभदेव विश्वशांति कलश यात्रा रथ मांगीतुंगी (२०१५) के दो रथों का भारत भ्रमण।

इस प्रकार नित्य नूतन भावनाओं की जननी पूज्य माताजी चिरकाल तक इस वसुधा को सुशोभित करती रहें, यही मंगल कामना है।


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की जन्मदात्री माँ

पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी का परिचय
-आर्यिका चन्दनामती
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आदिब्रह्मा भगवान ऋषभदेव की जन्मभूमि अयोध्या और उसके आस-पास के क्षेत्र को भी अवध के नाम से जाना जाता है। वैसे इन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और उनके प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् भरत के समय वह अयोध्या नगरी १२ योजन लम्बी थी अत: ९६ मील होने से लखनऊ, टिकैतनगर , त्रिलोकपुर, बाराबंकी, महमूदाबाद आदि नगर उस समय अयोध्या नगरी की पवित्र भूमि की सीमा में विद्यमान थे। वस्तुत: आज भी अयोध्या तीर्थ की पवित्रता से सम्पूर्ण अवध का वातावरण सुवासित, धर्मपरायण एवं परम पवित्र है।

उसी अवधप्रान्त के जिला सीतापुर के अन्तर्गत महमूदाबाद नामक एक नगर है, जहाँ विशाल जिनमंदिर के निकट वर्तमान में ६०-७० जैन घर हैं। उसी नगरी में एक सुखपालदास जी नाम के श्रेष्ठी निवास करते थे। अग्रवाल जातीय लाला सुखपालदास जी की धर्मपत्नी का नाम मत्तोदेवी था। पूरे नगर में धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध सुखपालदास जी भगवान की नित्य पूजन के साथ-साथ स्वाध्याय भी करते थे। सात्त्विक प्रवृत्ति वाले इन महामना श्रावक की धर्मपत्नी भी पतिव्रता आदि गुणों से सहित धर्मपरायण एवं अत्यन्त सरल प्रकृति की थीं। इन धर्मनिष्ठ दम्पत्ति के चार संताने थीं, जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं-१. शिवप्यारी देवी २. मोहिनी देवी ३. महिपालदास ४. भगवानदास। पिता सुखपालदास जी ने इन सभी संतानों को धर्ममय संस्कारोें से विशेष संस्कारित किया था।

ईसवी सन् १९१४ में इन धर्मपरायण दम्पत्ति की बगिया में द्वितीय सन्तान के रूप में जन्मी कन्या का नाम पिता ने बड़े ही प्यार से ‘मोहिनी’ रखा था और माता-पिता, कुटुम्बीजनों, यहाँ तक की नगरवासियों का भी इस कन्या पर विशेष स्नेह था। कन्या के कुछ बड़ी होने पर पिता सुखपालदास जी उसकी विशेष देखरेख करते, वे प्रतिदिन रात्रि में अपने हाथों से बादाम भिगोकर प्रात: छीलकर दूध के साथ उस मोहिनी को देते तथा रोज उसे अपने साथ मंदिर भी ले जाते थे। ५-६ वर्ष की उम्र में स्वूâल जाने पर थोड़े ही दिनों में मोहिनी देवी ने ३-४ कक्षा तक अध्ययन कर लिया। चूँकि महमूदाबाद का इलाका मुस्लिम इलाका था अत: पिताजी ने अपने महीपाल पुत्र की शिक्षा हेतु एक मौलवी अध्यापक की व्यवस्था कर रखी थी, वे उन्हें उर्दू पढ़ाते थे और तीक्ष्ण बुद्धि की धनी कन्या मोहिनी अपने छोटे भाई को उर्दू पढ़ते देख स्वयं भी उर्दू पढ़ना सीख गई। घर में सबसे छोटे भाई भगवानदास के जन्म लेते ही मोहिनी का उसके प्रति विशेष वात्सल्य होने से मोहिनी ने स्वूâल जाना छोड़ दिया। प्राय: देखा जाता है कि होनहार, कुशाग्र बुद्धि के छात्र-छात्राएं गुरु के लिए विशेष कृपापात्र होते हैं और गुरु का उन पर विशेष स्नेह रहता है अत: जब कन्या मोहिनी कुछ दिन स्वूâल नहीं गर्इं, तो उनकी अध्यापिकाएँ आकर लाला सुखपालदास जी से उसकी कुशाग्र बुद्धि के कारण उसे स्वूâल भेजने का आग्रह करतीं, साथ ही कहतीं कि इसके बगैर तो हमारा स्वूâल ही सूना हो जाता है। पिताजी की प्रेरणा के बाद भी मोहिनी भाई को खिलाने का बहाना कर स्वूâल जाने को मना कर देंती। चूँकि उस समय कन्याओं को ज्यादा पढ़ाने की परम्परा नहीं थी और मुसलमानी इलाका होने के कारण माँ मत्तोदेवी भी कन्या को स्वूâल भेजने का आग्रह नहीं करती थीं, अत: उनकी लौकिक शिक्षा अल्प ही रही। पुन: पिताजी ने मोहिनी के अन्दर धार्मिक संस्कार डालने हेतु उसे भक्तामर, तत्त्वार्थसूत्र आदि का अध्ययन कराना प्रारंभ किया और रात्रि में पूरे परिवार को एक साथ बिठाकर मोहिनी से शास्त्र पढ़वाते और बड़े खुश होते थे पुन: सबको शास्त्र का अर्थ भी समझाते थे।

एक बार पिता ने मोहिनी को एक मुद्रित ग्रंथ ‘पद्मनन्दिपंचविंशतिका’ देकर उसका स्वाध्याय करने को कहा। मोहिनी ने पिता की आज्ञा स्वीकार कर उस ग्रंथ का स्वाध्याय किया और उस स्वाध्याय का प्रतिफल यह रहा कि मोहिनी ने उस ग्रंथ में ब्रह्मचर्य व्रत वेâ महत्त्व को पढ़कर भगवान की प्रतिमा के सम्मुख अष्टमी, चतुर्दशी के दिन ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने का आजीवन नियम ले लिया और किसी को इस व्रत के बारे में विदित भी न हो सका। चूँकि जिनमंदिर में प्रतिदिन सुखपालदास जी ही शास्त्र वांचते थे अत: सभी इन्हें पण्डित जी कहकर पुकारते थे। बड़े पुत्र महिपालदास जी कुश्ती के अच्छे खिलाड़ी बन गए थे और इलाके में बड़ी-बड़ी कुश्ती कर कई एक प्रतियोगिता जीती थीं।

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मोहिनी देवी के पिताजी पहले कपड़े का व्यवसाय करते थे इनका नियम था देवपूजा करके ही दुकान खोलना और अगर मंदिर न हो तो ‘जाप्य’ करके ही ग्राहक से बात करना। उनके इस नियम के कारण ही उनकी अंत समाधि बहुत ही अच्छी हुई। एक बार वे बिसवां में व्यापार हेतु गये, प्रात: ही एक ग्राहक आ गया, तब उन्होंने कहा-भाई! मैं जाप्य करके ही वार्तालाप करूँगा। तब वह ग्राहक बाहर बैठ गया पुन: वह शुद्ध वस्त्र पहनकर जाप्य करने बैठे और जाप्य करते-करते ही उनके प्राण पखेरू उड़ जाने से उन्हें उत्तम गति की प्राप्ति हुई। उधर जब बहुत देर हो गई, तो उस ग्राहक ने अंदर जाकर देखा, तो उन्हें मृत पाया। तब परिवार के लोगों को बुलाकर उनकी अन्त्येष्टि की गई। वास्तव में बंधुओं! एक छोटा से छोटा नियम भी इस जीव को संसार से पार करने में सहकारी कारण बन जाता है, इसीलिए धर्मगुरु सदैव हमें कोई न कोई व्रत नियम लेने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

सेठ सुखपालदास जी ने अपने सामने ही अपने सभी पुत्र-पुत्रियों का विवाह कर दिया था, जिसमें लाडली पुत्री मोहिनी का उन्होंने अयोध्या के निकट बसे धर्मपरायण नगर बाराबंकी जिले में स्थित टिकैतनगर नामक ग्राम के धर्मात्मा श्रावक लाला धन्यकुमार जी एवं उनकी धर्मपत्नी पूâलमती के द्वितीय पुत्र छोटेलाल जी के साथ किया था। लाला धन्यकुमार जी ने महमूदाबाद के लाला सुखपाल जी की बहुत ही प्रशंसा सुन रखी थी, साथ ही मोहिनी के गुणों से भी बहुत प्रभावित थे। सुखपालदास जी ने भी उनके पुत्र में एक वर के सभी गुणों को देखकर तुरंत स्वीकृति प्रदान कर दी और शुभ मुहूर्त में चि. छोटेलाल जी के साथ आयु. मोहिनी देवी का पाणिग्रहण संस्कार हो गया। माता-पिता ने अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी प्यारी पुत्री को विदाई दी, उस समय सन् १९३२ में मोहिनी देवी की उम्र १८ वर्ष मात्र थी। विदाई के समय यूँ तो पिता जी ने अपनी दुलारी को दहेज में यथायोग्य सब कुछ प्रदान किया, किन्तु जब उनके मन को पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई, तो उन्होंने मोहिनी को ‘‘पद्मनन्दिपंचविंशतिका’’ ग्रंथ को सच्चे दहेज के रूप में देकर कहा-बिटिया मोहिनी! तुम हमेशा इस ग्रंथ का स्वाध्याय करती रहना, इसी से तुम्हारे गृहस्थाश्रम में सुख और शांति की वृद्धि होगी और तुम्हारा यह नरभव पाना सफल हो जायेगा। पुत्री मोहिनी ने भी पिता के द्वारा स्नेहपूर्वक प्रदत्त सच्चे दहेजरूप ग्रंथ को सबसे अधिक मूल्यवान समझा।

ससुराल में मंगल प्रवेश कर मोहिनी ने पिता द्वारा प्रदत्त उस ग्रंथ को अनमोल निधि के रूप में संभाल कर रखा और नियमपूर्वक प्रतिदिन देवदर्शन के पश्चात् उसका स्वाध्याय किया। यहाँ इस भरे-पूरे परिवार में मोहिनी को घुलते-मिलते देर न लगी। घर में देवदर्शन, रात्रि भोजन त्याग, जल छानकर पीना, सायंकाल मंदिर जाकर आरती करना और शास्त्र सभा में बैठकर विनयपूर्वक शास्त्र सुनना आदि श्रावकोचित्त सभी क्रियाएँ होती थीं। घर के निकट जिनमंदिर होने से मंदिर के घंटे, पूजा-पाठ व आरती की आवाज
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घर बैठे कानों में गूंजा करती थी। गृहस्थधर्म का परिपालन करती हुई मोहिनी देवी ने सन् १९३४ में आसोज सुदी पूर्णिमा-शरदपूर्णिमा की रात्रि में प्रथम पुष्प के रूप में एक कन्या रत्न को जन्म दिया, जिसकी शुभ्र चांदनी आज सारे भारतवर्ष में पैâल रही है। मैना के जन्म से पहले ही मोहिनी देवी ने मैनासुन्दरी नाटक पढ़ा था और उन्हें सुरसुन्दरी-मैनासुन्दरी का संवाद याद था, उसे वे हमेशा गुनगुनाया करती थीं और यही संस्कार गर्भस्थ बालिका पर अच्छी तरह से पड़ गए। माता मोहिनी प्रतिदिन प्रात: उठकर सामायिक करती, पुन: स्नानादि से निवृत्त होकर मंदिर में जाकर भगवान की पूजा करके रसोई बनाती थीं और छोटे बच्चों को दूध पिलाते समय स्वाध्याय और भक्तामर आदि के पाठ किया करती थीं, जिससे वह दूध भी अमृत तुल्य बन जाता था और बच्चों में धार्मिक संस्कार पड़ते जाते थे। प्रतिदिन सायंकाल वे स्वयं मंदिर जातीं और बच्चों को भी भेजती थीं, प्रतिदिन किसी भी बालक को मंदिर जाए बिना नाश्ता भी नहीं मिलता था, यही कारण था कि माता मोहिनी की १३ संतानें इसी धर्म के साँचे में ढलती चली गर्इं। माता मोहिनी अपनी पुत्री मैना की बातों को जैनागम से प्रमाणित समझकर सदैव उनकी बातों को मान्यता प्रदान करती थीं।

सन् १९५२ मेें जब आपकी पुत्री मैना ने गृहत्याग किया, उस समय आपने उन्हें अपनी स्वीकृति देते हुए मैना से वचन लिया था कि बेटी! जैसे आज मैं तुझे संसार से पार होने में सहयोग दे रही हूँ, इसी प्रकार एक दिन तुम भी मुझे गृहस्थी के जाल से निकालकर मोक्षमार्ग में लगा देना।

इस प्रकार माता मोहिनी ने अपनी सभी सन्तानों को सुसंस्कारित कर गृहस्थोचित सभी क्रियाओं का कुशल संचालन करते हुए अपने पति लाला छोटेलाल जी के अन्त समय में उनकी सुन्दर समाधि कराकर नारी जाति के लिए एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। अपने पुत्र-पुत्रियों को उन्होंने उसी प्रकार पालने में शिक्षा प्रदान की, जिस प्रकार रानी मदालसा ने अपने पुत्रों को पालने में शिक्षा दिया था कि-शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि, संसार माया परिवर्जितोऽसि’ हे पुत्र! तू शुद्ध है, बुद्ध है, निरंजन है और संसार की माया से रहित है। ऐसा सुन-सुनकर उसके सभी पुत्र युवा होकर विरक्त हो घर से चले जाते थे। उन पुत्र-पुत्रियों की भांति ही माता मोहिनी की भी तीन पुत्रियाँ एवं एक पुत्र गृहबंधन से निकल गए और शेष ६ पुत्रियाँ व ३ पुत्र गृहस्थ धर्म में रहकर देव-शास्त्र-गुरु का दृढ़श्रद्धान कर धर्माराधनापूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

मोहिनी माता बनीं आर्यिका रत्नमती-सन् १९७१ में संघ का चातुर्मास अजमेर शहर में हो रहा था। उस समय मोहिनी देवी अपने बड़े पुत्र वैâलाशचंद व पुत्रवधू के साथ संघ के दर्शनार्थ आर्इं। वहाँ एक दिन वे ज्ञानमती माताजी से कहने लगीं-माताजी! अब मेरी इच्छा घर जाने की नहीं है। अब मेरा मन पूर्णरूपेण विरक्त हो चुका है, मैं दीक्षा लेकर अपना आत्मकल्याण करना चाहती हूँ। उस समय ज्ञानमती माताजी ने अपने दिये हुए वचन को निभाया और उनके मुख से इतना सुनते ही बहुत प्रसन्न होकर कहने लगीं कि आपने बहुत अच्छा सोचा है। देखो-

‘‘जब लो न रोग जरा गहे, तब लो झटिति निज हित करो।’’

इस पंक्ति के अनुसार अभी आपका शरीर साथ दे रहा है अत: अब आपको किसी की भी परवाह न कर आत्मसाधना में ही लग जाना चाहिए। इसके साथ ही माताजी ने उन्हें यह भी बता दिया कि मैंने सुगंधदशमी के दिन माधुरी को आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया है, उसकी शादी का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह सुनकर आश्चर्यचकित मोहिनी माता बोलीं कि माताजी! अभी तो माधुरी मात्र १३ वर्ष की है, वह ब्रह्मचर्य का अर्थ क्या समझे। अभी से व्रत न देकर कुछ दिन संघ में रखकर धर्म पढ़ा देतीं, तो अच्छा था। पुन: वे कहने लगीं कि अब मैं किसी के मोक्षमार्ग में बाधक क्यों बनूँ, जिसका जो भाग्य होगा, सो होगा। मुझे तो अब र्आियका दीक्षा लेनी है।’’

माताजी ने उसी समय रवीन्द्र कुमार को बुलाकर माँ के भाव बता दिये, जिसे सुनकर माँ के कमजोर शरीर एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से रवीन्द्र जी एकदम विचलित हो गये, किन्तु माता मोहिनी ने उस हेतु अपना दृढ़निश्चय रखा। माताजी ने रवीन्द्र जी का माँ के प्रति मोह देख संघस्थ मोतीचंद जी को बुलाकर सारी बात बताई और बाजार से श्रीफल लाने को कहा। मोतीचंद जी ने यह सुनकर बहुत ही प्रसन्न हो श्रीफल लाकर माता मोहिनी के हाथ में दे दिया और मोहिनी देवी उसी समय माताजी के साथ सेठसाहब (सेठ भागचंद सोनी) की नशिया में आचार्यश्री के समक्ष श्रीफल लेकर बोलीं-महाराज जी! मैं आपके करकमलों से आर्यिका दीक्षा लेना चाहती हूँ और श्रीफल चढ़ा दिया। आचार्य श्री उस समय प्रसन्नमना हो ज्ञानमती माताजी की ओर देखने लगे। उपस्थित सभी साधुवर्ग उनके वैराग्य की सराहना करने लगे। तब आचार्यश्री ने कहा कि तुम्हारा शरीर बहुत कमजोर है और यह जैनी दीक्षा तलवार की धार है।
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तब मोहिनी माता ने सारपूर्ण उत्तर देते हुए कहा कि महाराज जी! संसार में रहकर भी तो कितने कष्ट सहन करने पड़ते हैं, दीक्षा में जो कष्ट होंगे, उन्हें सहन करने में मैं अपना सौभाग्य समझूंगी। फिर माताजी ने अजमेर के एक अति विश्वस्त श्रावक जीवनलाल जी को टिकैतनगर भेजकर यह समाचार पहुँचा दिया। इधर घर में समाचार पहुँचते ही सबको बहुत झटका लगा और सब विक्षिप्त हो रोने लगे पुन: येन-केन प्रकारेण मन को समझाकर शीघ्र ही उनके पुत्र-पुत्री, भाई आदि सब अजमेर पहुँच गए और सभी मोहिनी जी से चिपककर रोने लगे। सभी ने इनकी दीक्षा रोकने के बहुत प्रयत्न किए और बहुत उपद्रव भी किया। इन सभी प्रसंगों में मोहिनी जी निर्मोहिनी बन गर्इं और अपने निर्णय पर अडिग रहीं, अन्ततोगत्वा माता मोहिनी की दीक्षा का कार्यक्रम बहुत ही उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ, जो कि अजमेर नगर के लिए ऐतिहासिक अवसर था। दीक्षा के दिन मोहिनी जी के सिर के बाल छोटे थे क्योंकि उन्होंने एक माह पूर्व ही अपने केश काटे थे अत: छोटे केशों का लुंचन करना बड़ा कठिन था। जब माताजी ने चुटकी से इनको केश निकालना शुरू किया तो सारा सिर लाल-लाल हो गया उस समय माता मोहिनी के पुत्र-पुत्री और कुटुम्बी ही क्या अनेक देखने वाले लोग भी खूब रोने लगे और मोहिनी के साहस एवं वैराग्य की प्रश्ांसा करने लगे।

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उस समय दीक्षा के अवसर पर अनेक साधुओं ने निर्णय लिया कि चूँकि माता मोहिनी साक्षात् रत्नों की खान हैं अत: इनका ‘रत्नमती’ यह सार्थक नाम रखना चाहिए, तब आचार्य श्री धर्मसागर महाराज ने इन्हें ‘‘आर्यिका रत्नमती माताजी’’ के नाम से सम्बोधित किया।

आर्यिका श्री रत्नमती माताजी ने दीक्षा के पश्चात् पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के संघ में रहते हुए १३ चातुर्मास किए और दीक्षा के पूर्व तो अनेक ग्रंथों के स्वाध्याय किए ही थे, दीक्षा के पश्चात् चारों अनुयोगों के ग्रंथों का अच्छी तरह स्वाध्याय किया। समय-समय पर, आगत यात्रियों, महिलाओं, बालिकाओं को धर्म का उपदेश देकर देवदर्शन, पूजन, रात्रि भोजन त्याग, स्वाध्याय आदि का वे उपदेश देती थीं और क्षेत्र पर आगत जैनेतर बंधुओं को मद्य, मांस, मधु त्याग की प्रेरणा देती रहती थीं। आर्यिका रत्नमती माताजी का स्वास्थ्य पित्त प्रकोप की बहुलता से युक्त था। इनका आहार अति अल्प था, मूंंग की दाल के पानी में भीगी दो रोटी और लौकी का उबला साग वे लेती थीं तथा थोड़ी सी दूध की दलिया, थोड़ा सा दूध, अनार का रस और कभी-कभी थोड़ा सा फल, बस यही उनका आहार था। इनके इतने अधिक पथ्य को देखकर कभी-कभी वैद्य भी हैरान होकर कहते थे कि माताजी! श्रावक आहार में जो आपको देता है, सो यदि आपका त्याग न हो, तो ले लिया करें। मौसम में आने वाले फल तथा खिचड़ी, चावल भी ले लिया करें, किन्तु ये किसी की नहीं सुनती थीं। घर में भी यह अपनी सन्तानों को भी ऐसे ही पथ्य कराती रहती थीं, यही कारण है कि इनके पुत्र-पुत्रियों में खाने की जिह्वा लोलुपता नहीं दिखती है। र्आियका श्री ज्ञानमती माताजी का प्राय: सब त्याग है, मात्र दो अन्न, दो रस और गिने-चुने फल और उसमें भी अक्सर उनका भी त्याग कर देती हैं, महीने में कई दिन नीरस भोजन करती हैं एवं अष्टमी-चतुर्दशी को तो उनका सदैव अन्न का त्याग रहता है।

आर्यिका श्री रत्नमती माताजी प्रात: ३ बजे उठकर महामंत्र का जाप्य करके अपररात्रि स्वाध्याय में तत्त्वार्थसूत्र का पाठ कर पुन: सहस्रनाम, भक्तामर, त्रिलोकवंदना, निर्वाणकाण्ड आदि स्तोत्रों का पाठ करती थीं। ७ से ८ बजे तक सामूहिक स्वाध्याय में बैठतीं, अनन्तर आहार के बाद सामायिक कर विश्राम करती थीं। पुन: २ बजे से ४ बजे तक मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय सुनती थीं, अनन्तर वृद्धावस्था के कारण कुछ क्षण शरीर की सेवा करवाकर दैवसिक प्रतिक्रमण करतीं पुन: सायंकाल भगवान के दर्शन कर सामायिक करती थीं। रात्रि में सर्दी के दिनों में तो पूर्वरात्रिक स्वाध्याय में छहढाला का पाठ सुनती थीं। इन्हें छहढाला से विशेष प्रेम था, यदि किसी कारणवश यह छहढ़ाला न सुन सवेंâ, तो उन्हें लगता कि मैंने कुछ सुना ही नहीं है। इस प्रकार यह अपनी आगम चर्या का पूर्णत: पालन करती थीं। यदि कदाचित् पित्त प्रकोप आदि से विशेष अस्वस्थ रहती थीं, तो संघस्थ आर्यिकाएँ उन क्रियाओं को सुनाती थीं। इन्हें ऋषिमण्डल स्तोत्र और उसके मंत्र से भी विशेष प्रेम था। इनकी अस्वस्थता के कारण प्राय: संघ में चैत्यालय रहता था फिर भी मंदिर जाकर भगवान का दर्शन करके ही इन्हें संतोष होता था। पित्त प्रकोप होने से इनके शरीर के लिए उपवास हितकर नहीं था, फिर भी व्रतों का प्रेम और सल्लेखना विधि की भावना से पंचमेरु आदि व्रत उपवासपूर्वक किया करती थीं।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता थी-इनकी निरभिमानता। ये कभी ज्ञानमती माताजी का नाम न लेकर उन्हें ‘माताजी’ कहकर सम्बोधित करती थीं। वास्तव में धन्य थीं उनके जीवन की वह घड़ियाँ, जब १५ जनवरी १९८५-माघ कृ. नवमी को उन्होंने पूज्य माताजी के चरण सानिध्य में हृदयस्पर्शी धार्मिक संबोधन प्राप्त कर सल्लेखना विधिपूर्वक जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में समाधिमरण किया। दिन में १ बजकर ४५ मिनट पर इस नश्वर शरीर से वह दिव्यआत्मा निकलकर देवलोक में जाकर विराजमान हो गर्ई। यूँ तो एक जगतमाता के हमारे बीच से जाने पर एक अपूर्णीय क्षति हुई फिर भी मृत्यु से संघर्ष करना वीरता का परिचायक है और यह निश्चित है कि शीघ्र ही उन्हें सिद्धगति की प्राप्ति होगी।

पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी के जीवन में १३ का अंक विशेष शुभ रहा। १३ सन्तानों को जन्म देने वाली, दीक्षा लेकर १३ प्रकार के चारित्र का परिपालन कर १३ वर्ष तक दीक्षित जीवन में रहकर उन्होंने सदैव स्व-परकल्याण का भाव रखा।

वस्तुत: ऐसी तप:पूत रत्नों की खान, निरभिमानी, वात्सल्यमयी, अनमोल निधि की प्रदात्री माता रत्नमती जी शीघ्र ही सिद्धगति की प्राप्ति करें, उनके चरण कमलों में कोटिश: वंदन।

अनेकरत्नैरतिदीप्तिमद्भि:, यथा प्रसूतै: समलंकृतोर्वी।
अन्वर्थसंज्ञामनवद्यकीर्तिम्, तामार्यिकां रत्नमतीं नमामि।।


१०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा निर्माण की कुशल मार्गदर्शिका

प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न श्री चंदनामती माताजी का परिचय
प्रस्तुति-आर्यिका स्वर्णमती
(संघस्थ-गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी)


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जन्म- १८ मई १९५८, ज्येष्ठ कृ. अमावस्या, वीर नि. सं. २४८४
जन्मस्थान- टिकैतनगर (बाराबंकी) उ.प्र.
नाम- कु. माधुरी जैन
माता-पिता- श्रीमती मोहिनी देवी जैन (आर्यिका रत्नमती माताजी) एवं श्री छोटेलाल जैन
बहन-भाई- आठ बहनें (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी-सबसे बड़ी बहन एवं चारित्रश्रमणी समाधिस्थ आर्यिका श्री अभयमती माताजी सहित) तथा चार भाई (पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी सहित)
लौकिक शिक्षा- हाईस्वूâल
धार्मिक शिक्षा- शास्त्री (सन् १९७२ में सोलापुर से), विद्यावाचस्पति (सन् १९७३ में)
ब्रह्मचर्य व्रत- सन् १९६९, जयपुर में शरदपूर्णिमा-२५ अक्टूबर को २ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत, सन् १९७१ में सुगंधदशमी को अजमेर (राज.) में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत।
द्वितीय प्रतिमा- सन् १९८२ में मोरीगेट (दिल्ली) चातुर्मास के मध्य।
सप्तम प्रतिमा- जुलाई १९८७, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में (पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा द्वितीय एवं सप्तम प्रतिमा)
आर्यिका दीक्षा- श्रावण शुक्ला ग्यारस, १३ अगस्त १९८९, रविवार को पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के करकमलों से जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में (पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी से प्रथम आर्यिका दीक्षा प्राप्त)।
उपाधियाँ- ‘प्रज्ञाश्रमणी’ पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा राजधानी दिल्ली में २४ कल्पद्रुम महामण्डल विधान के मध्य अक्टूबर १९९७ में, ‘मर्यादा शिष्योत्तमा’ एवं ‘गुणरत्न’ उपाधियाँ समाज द्वारा जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में १७ अगस्त २०१३ को आपके रजत आर्यिका दीक्षा समारोह के अवसर पर। मांगीतुंगी (महा.) में फरवरी २०१६ में आयोजित १०८ फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव अन्तर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अवसर पर-‘आर्षमार्ग संरक्षिका’ (भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा द्वारा), ‘दिव्यज्योति’ (दक्षिण भारत जैन सभा द्वारा), ‘रत्नत्रय पूर्णा’ (अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला संगठन द्वारा), ‘सद्धर्म प्रभाविका’ (सर्वोदय तीर्थ-धारूहेड़ा, हरियाणा द्वारा), ‘आर्यिकारत्न’ गणिनी ज्ञानमती अभिनंदन समिति-मुम्बई द्वारा २८ मई २०१७ को आजाद मैदान-मुम्बई में। धर्म-विज्ञान ज्योतिपुंज-सकल दिगम्बर जैन समाज-मुम्बई द्वारा ३ अगस्त २०१७, २९वें आर्यिका दीक्षा दिवस पर एवं कवि हृदया-भाण्डुप जैन समाज-मुम्बई द्वारा अक्टूबर २०१७ में।
पीएच.डी. की मानद उपाधि- तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय (टी.एम.यू.)-मुरादाबाद (उ.प्र.) द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में ८ अप्रैल २०१२ को।
कार्यकलाप- पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में १८ वर्ष तक संघ की वैय्यावृत्ति, स्वाध्याय, ध्यान, लेखन-सम्पादन, धर्मप्रवचन इत्यादि।दीक्षा के पश्चात् हजारों किमी. की पदयात्रा द्वारा भारतवर्ष के विविध अंचलों में जैनधर्म की प्रभावना एवं जनमानस को शाकाहार, नैतिकता के पथ की प्रेरणा। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की विविध कार्ययोजनाओं-यथा-मांगीतुंगी, अयोध्या, प्रयाग, कुण्डलपुर तीर्थ विकास आदि के सफलतापूर्वक निष्पादन कराने में अग्रणी भूमिका।

विविध टीकाओं, विधानों, नाटक इत्यादि सहित २०० से अधिक जैन पुस्तकों की लेखिका। हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी भाषाओं की सिद्धहस्त लेखिका। अंग्रेजी में विविध विधान, पूजा, भजन आदि का लेखन। षट्खण्डागम ग्रंथ (प्राचीनतम जैन सिद्धांत ग्रंथ) की संस्कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका (पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा लिखित) की १३ पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद (१२ पुस्तवेंâ प्रकाशित), भगवान ऋषभदेव चरितम् (संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद), भगवान महावीर स्तोत्र की संस्कृत एवं हिन्दी टीका, चारित्र चन्द्रिका, ज्ञानज्योति की भारतयात्रा इत्यादि ; भगवान महावीर हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश, गणिनी ज्ञानमती गौरव ग्रंथ, कुण्डलपुर अभिनंदन ग्रंथ, भगवान पाश्र्वनाथ तृतीय सहस्राब्दि ग्रंथ आदि का प्रधान सम्पादन; नवग्रहशांति विधान, भक्तामर विधान, समयसार विधान, तीर्थंकर जन्मभूमि विधान, मनोकामना सिद्धि विधान ; जैन वर्शिप, भगवान शांतिनाथ विधान (अंग्रेजी) आदि अनेक।

भजन- पूजन आदि के लेखन एवं गायन की विशिष्ट प्रतिभा से सम्पन्न। लगभग १५०० भजन-आरती-चालीसा-तीर्थंकर भगवान काव्य कथा इत्यादि की रचनाकत्र्री।

पूज्य माताजी द्वारा लिखित णमोकार चालीसा, नवग्रह शांति विधान, नवग्रह स्तोत्र, सम्मेदशिखर वंदना जैन समाज में अत्यन्त लोकप्रिय हैं।

वर्तमान में, षट्खण्डागम ग्रंथ की सिद्धान्तचिंतामणि संस्कृत टीका के हिन्दी अनुवाद एवं इंटरनेट पर दिगम्बर जैनधर्म की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रभावना हेतु ज्ञान के महासागर ‘इन्साइक्लोपीडिया ऑफ जैनिज्म’ (https://www.encyclopediaofjainism.com) के मुख्य संपादन में संलग्न।

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जम्बूद्वीप धर्मपीठ के प्रथम पीठाधीश एवं १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के निर्देशक

पूज्य क्षुल्लकरत्न श्री मोतीसागर जी महाराज का परिचय
‘‘जिन्होंने अंतिम समय में मुनि अवस्था प्राप्त कर समाधिमरण किया’’
-डॉ. जीवन प्रकाश जैन, जम्बूद्वीप

गुरु और शिष्य के उपकार तथा कृतज्ञता के उदाहरण प्राचीन इतिहास में तो अनेकों मिल जाते हैं किन्तु वर्तमान में हमें बिरले ही ऐसे व्यक्ति मिलेंगे, जिन्होंने अपने जीवन में कृतज्ञता का अद्वितीय आदर्श उपस्थित किया हो। इसी क्रम में पूज्य क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी का व्यक्तित्व आज प्रत्यक्ष में हमारे सामने उपस्थित हुआ, जिन्होंने प्रारंभ से ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया कि गुरु के प्रति अपना सर्वस्व समर्पित कर अपने कर्तव्य का पालन करना। कृतज्ञता और समर्पण भाव ये दोनों ही गुण व्यक्ति में दुर्लभता से मिलते हैं। पूज्य क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज के इन गुणों के कारण आज हमें विश्व प्रसिद्ध जम्बूद्वीप रचना के दर्शन हो रहे हैं, जो अपने आप में एक अद्वितीय कृति है। सम्राट चन्द्रगुप्त और एकलव्य के उदाहरण हम पढ़ते हैं, जिन्होंने अपनी गुरुभक्ति के बल पर अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति की थी। उसी के समान आदर्श प्रस्तुत करने वाले पूज्य क्षुल्लक जी, जिन्होंने अंत में मुनि अवस्था प्राप्त कर समाधिमरण प्राप्त किया, का संक्षिप्त परिचय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है-

दिनाँक ३० सितम्बर सन् १९४०, आश्विन वदी १४, सोमवार के शुभ दिन सनावद (म.प्र.) के सुप्रसिद्ध श्रेष्ठी श्री अमोलकचंद जी सर्राफ की धर्मपत्नी श्रीमती रूपाबाई ने एक पुत्ररत्न को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया ‘मोतीचंद’। आप कुल चार भाई और तीन बहनें रहे। बड़ी दो बहनें-श्रीमती गुलाबबाई व चतुरमणीबाई, एक छोटी बहन श्रीमती किरणबाई एवं इन्दरचंद, प्रकाशचंद और अरुण कुमार ये तीनों छोटे भाई। आपके परिवार का मूल व्यवसाय सर्रापेâ का रहा है।

ब्रह्मचर्य व्रत-इतने सम्पन्न परिवार के मध्य रहते हुए भी मोतीचंद जी को सांसारिक वैभव में रुचि नहीं रही और सन् १९५८ में १८ वर्ष की उम्र में ही स्वरुचि से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर लिया।

वैराग्य का कारण-प्रत्येक माता-पिता का सपना होता है कि मेरा बेटा बड़ा होकर घर के सारे कार्यभार को संभाल ले तथा शादी करके वह अपना सुखी गृहस्थ जीवन व्यतीत करे। किन्तु मोतीचंद जी के लिए ये सब व्यर्थ था क्योंकि उन्होंने पहले ही अपना रास्ता चयन कर लिया था। व्यापार के कार्यों में रचे-पचे रहने पर भी वे हमेशा वङ्कानाभि चक्रवर्ती की वैराग्य भावना की इन पक्तियों का चिंतन करते रहते थे-

किस ही घर कलिहारी नारी, वैâ बैरी सम भाई।
किस ही के दु:ख बाहर दीखे, किस ही उर दुचिताई।।
कोई पुत्र बिना नित झूरे, होय मरे तब रोवे।
खोटी संतति सो दुख उपजे, क्यों प्राणी सुख सोवे।।
मोह महारिपु बैर विचारे, जग जिय संकट टारे।
घर कारागृह वनिता बेड़ी, परिजन जन रखवारे।।

धार्मिक कार्यकलाप-इनका गृहस्थ जीवन बड़ा सुकुमाल था, इसलिए ब्रह्मचर्य व्रत होते हुए भी कभी साधु संघ में रहने का विचार नहीं आया। ये अपने नगर में होने वाले प्रत्येक धार्मिक कार्य में अग्रणी रहते थे तथा समय-समय पर धार्मिक झाकियों व नाटकों के माध्यम से भी समाज में धार्मिक अभिरुचि जागृत किया करते थे।

स्वयं भी नाटकों में भाग लेते थे। एक बार अपने नाटक में निकलंक के पात्र का अभिनय किया, वही अभिनय आपके जीवन में अमिट छाप छोड़ गया कि संघर्षों के समय भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होना, जो कि व्यक्ति को उन्नति के पथ पर ले जाता है। धार्मिक पाठशाला भी चलाते थे, जिससे बच्चों में धार्मिक संस्कार बनें।

संघ में प्रवेश- ‘‘होनहार को कौन टाल सकता है’’ इस सूक्ति के अनुसार मोतीचंद जी के जीवन में भी एक नया अध्याय जुड़ा और सन् १९६७ में पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती माताजी का संघ सहित सनावद में चातुर्मास हुआ। पूज्य माताजी को जब इनके ब्रह्मचर्य व्रत के बारे में पता चला, तो उन्होंने मोतीचंद को संबोधित किया। चातुर्मास के पश्चात् पूज्य माताजी के साथ मुक्तागिरी की यात्रा का कार्यक्रम बना। उसके पश्चात् पूज्य माताजी आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज (आचार्य शांतिसागर परम्परा के द्वितीय पट्टाचार्य) के संघ में आ गर्इं, तभी सन् १९६८ में ब्र. मोतीचंद भी संघ में अध्ययन के उद्देश्य से आये और माताजी की प्रेरणा से संघस्थ शिष्य के रूप में रहने लगे।

धार्मिक शिक्षण-आपने पूज्य ज्ञानमती माताजी के पास गोम्मटसार जीवकांड, कर्मकांड, कातंत्र व्याकरण, परीक्षामुख, न्यायदीपिका, अष्टसहस्री आदि ग्रंथों का अध्ययन किया। तीन-चार वर्षों के अंदर आपने शास्त्री व न्यायतीर्थ की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लीं। तब से सदैव आप पूज्य माताजी के पास रहकर चारों अनुयोगों के स्वाध्याय में तत्पर रहे।

जम्बूद्वीप रचना निर्माण में प्रमुख भूमिका-सन् १९६५ में पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के मस्तिष्क में जम्बूद्वीप रचना की योजना आई। जिसे साकाररूप देने में पूज्य माताजी के निर्देशानुसार कई स्थानों का निर्णय हुआ, किन्तु जिस भूमि पर योग था, वहीं इस रचना का निर्माण हुआ। ब्र. मोतीचंद जी ने संघ में आते ही पूज्य माताजी को यह लिखकर दिया कि ‘‘मैं तन-मन-धन से आपकी इस योजना को सफल बनाऊँगा और आपके संयम में किसी प्रकार की बाधा नहीं आने दूँगा। आपको किसी से पैसे की याचना नहीं करनी पड़ेगी।’’ तब से लेकर सदैव उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन कर इस अद्भुत रचना का निर्माण हस्तिनापुर की धरा पर सम्पन्न होने में प्रमुख भूमिका निभाई। यदि आपको वर्तमान का चामुण्डराय भी कहा जाये, तो कोई अतिशयोक्ति नहंीं होगी, क्योंकि आपने पूज्य माताजी को जन्मदात्री माँ से भी अधिक मानकर उनकी आज्ञा का शत-प्रतिशत पालन किया है।

ज्ञानज्योति रथ के साथ भारत भ्रमण-४ जून सन् १९८२ को भारत की राजधानी दिल्ली के लालकिला मैदान से पूज्य माताजी की प्रेरणा व आशीर्वाद से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ‘‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ’’ का भारत भ्रमण हेतु प्रवर्तन किया। आपने १०४५ दिन तक रथ के साथ पूरे भारत में भ्रमण किया और अपने ओजस्वी वक्तव्यों से जन-जन तक अहिंसा व जैनधर्म के सिद्धान्तों का प्रचार किया। तब से अंत तक आप जम्बूद्वीप स्थल पर होने वाली प्रत्येक गतिविधियों-निर्माण कार्य, साहित्य प्रकाशन आदि कार्यों में अपना पूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने में समय देते रहे।

त्यागमय जीवन-माताजी ने इनकी सुकुमारता देखकर इन्हें अधिक त्याग की प्रेरणा नहीं दी किन्तु सन् १९७१ में पूज्य ज्ञानमती माताजी की जननी मोहिनी देवी को अजमेर में आचार्य श्री धर्मसागर महाराज से आर्यिका दीक्षा लेते और उनका केशलोंच होते देखकर मोतीचंद जी के हृदय में भारी परिवर्तन आया कि जब यह १३ सन्तानों को जन्म देकर ५७ वर्ष की उम्र में दीक्षा ले सकती हैं, तो मैं संयम-नियम का पालन क्यों नहीं कर सकता ? अर्थात् तब से उनके मन में भी दीक्षा लेने की भावना जागृत हुई।

आपने सन् १९८१ में स्वरुचि से माताजी के समक्ष नमक व मीठे का त्याग कर दिया, जो सन् १९८५ की जम्बूद्वीप पंचकल्याणक प्रतिष्ठा तक रहा। ४ वर्ष के पश्चात् आपने उस त्याग के संकल्प को पूर्ण किया।

दीक्षा के पथ पर-सन् १९८५ से आप दीक्षा के लिए आतुर थे किन्तु सन् १९८७ में आपने पूज्य माताजी के समक्ष जम्बूद्वीप स्थल पर ही दीक्षा लेने की भावना व्यक्त की, जिसे पूज्य माताजी ने सहर्ष स्वीकृति प्रदान की।

जम्बूद्वीप स्थल पर प्रथम ऐतिहासिक दीक्षा समारोह-पूज्य माताजी की भावनानुसार परमपूज्य आचार्यश्री विमलसागर महाराज ने संघ सहित हस्तिनापुर आगमन की स्वीकृति प्रदान की तथा फाल्गुन शुक्ला नवमी, ८ मार्च १९८७ को शुभ मुहूर्त में विशाल जनसमुदाय के बीच आचार्यश्री ने मोतीचंद जी पर क्षुल्लक दीक्षा के संस्कार कर ‘‘मोतीसागर’’ नाम प्रदान किया। पूज्य आचार्यश्री ने अपने शुभाशीर्वाद में कहा कि-आज मुझे इन्हें दीक्षा देते हुए गर्व है क्योंकि मोतीचंद जी की दीक्षा एक चक्रवर्ती की दीक्षा जैसी है। जिस प्रकार चक्रवर्ती ने छह खण्ड पर विजय प्राप्त की थी, उसी प्रकार इन्होंने पूरे भारत में भ्रमण कर धर्म का डंका बजाया है। इस दीक्षा महोत्सव से हस्तिनापुर की पुण्य भूमि पर एक और इतिहास स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया।

पीठाधीश पद-दीक्षा के पश्चात् भी पूज्य क्षुल्लक मोतीसागर जी संस्थान की गतिविधियों में पूर्ववत् निर्देशन प्रदान कर अपने पद के योग्य कार्यों को सम्पन्न करवाते थे। अपने स्वाध्याय, पठन-पाठन व अपनी चर्या का निर्बाधरूप से पालन करते थे। इसी प्रकार सदा जम्बूद्वीप तीर्थ एवं यहाँ से संबंधित अन्य संस्थाओं का संचालन ऐसे ही त्यागी व्रती, गृहविरत व्यक्तित्व के द्वारा होता रहे, इसके लिए पूज्य माताजी ने सन् १९८७ में जम्बूद्वीप तीर्थ पर एक धर्मपीठ बनाकर यहाँ पीठाधीश पद की स्थापना की। पूज्य माताजी के द्वारा निर्धारित नियमानुसार पीठाधीश पद पर सदैव सातवीं से ग्यारहवीं प्रतिमा धारी तक के किसी भी योग्य एवं संस्थान के प्रति समर्पित त्यागी-व्रती को अभिषिक्त किया जा सकता है। पूज्य माताजी द्वारा ऐसी धर्मपीठ पर सर्वप्रथम पीठाधीश के रूप में क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज को २ अगस्त सन् १९८७, श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन आसीन किया गया। प्रत्येक कार्य में अग्रणी रहते थे-पूज्य माताजी द्वारा प्रारंभ किये गये प्रत्येक कार्य में पूज्य क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज का विशेष योगदान रहता था। किसी भी कार्य को किस प्रकार पूर्ण सफलता एवं अनुशासनपूर्वक सफल किया जाये, यही इनका प्रयास रहता था। सन् १९९३ में पूज्य माताजी ने अयोध्या तीर्थक्षेत्र के लिए विहार किया तथा १९९४ में वहाँ भगवान ऋषभदेव का महामस्तकाभिषेक कराया। पुन: सन् १९९५ में महाराष्ट्र प्रान्त के मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र के लिए विहार किया तथा लम्बी यात्रा कर वहाँ विशाल पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं मस्तकाभिषेक कराया। पुन: वहाँ से आकर सन् १९९७ में दिल्ली में ‘‘चौबीस कल्पद्रुम महामण्डल विधान’’ का महा आयोजन हुआ, जो दिल्ली के इतिहास में ही नहीं अपितु सारे भारत में प्रथम बार एक अद्भुत अनुष्ठान था। इन सभी कार्यों में पूज्य क्षुल्लक जी ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर इन्हें सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके कार्यकलापों को देखकर पूज्य माताजी ने सन् १९९७ में दिल्ली के लाल मंदिर की सभा में ‘‘धर्म दिवाकर क्षुल्लकरत्न’’ की उपाधि से विभूषित किया। २२ मार्च १९९८ को दिल्ली के लालकिला मैदान से पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा एवं मंगल आशीर्वाद से ‘‘भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार’’ रथ का उद्घाटन हुआ, जिसका प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत भ्रमण हेतु प्रवर्तन किया। ४ फरवरी २००० को भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव वर्ष मनाने की घोषणा हुई, जिसके अन्तर्गत सर्वप्रथम ४ से १० फरवरी तक दिल्ली के लाल किला मैदान में भगवान ऋषभदेव मेले का आयोजन किया गया, जिसका उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। प्रधानमंत्री जी के साथ तथा हजारों श्रद्धालुओं ने वैâलाश पर्वत के समक्ष निर्वाण लाडू चढ़ाकर अपने को धन्य माना। पश्चात् संगोष्ठियों, प्रश्नमंच, भाषण, वादविवाद प्रतियोगिता आदि के माध्यम से भगवान ऋषभदेव का खूब प्रचार-प्रसार किया गया। इस प्रकार पूज्य पीठाधीश क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज के निर्देशन में पूज्य माताजी की प्रेरणा से अनेकानेक कार्यक्रम सम्पन्न हुए तथा विभिन्न तीर्थों का निर्माण एवं विकास भी सम्पन्न हुआ। तीर्थ निर्माण एवं विकास की शृँखला में वर्ष २००१ में भगवान ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञान भूमि प्रयाग-इलाहाबाद में ‘‘भगवान ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ प्रयाग’’ का निर्माण एवं विकास किया गया। वर्तमान में यह तीर्थ जैन समाज में विशेष प्रसिद्धि को प्राप्त हो रहा है और प्रतिदिन सैकड़ों भक्तजन यहाँ आकर युग की आदि में भगवान ऋषभदेव द्वारा ली गई दीक्षा के क्षणों को याद करते हैं और उन महामना की भक्ति कर पुण्य अर्जित करते हैं। प्रयाग-इलाहाबाद का यह तीर्थ पूज्य महाराज जी के मन को सर्वाधिक आकर्षित करता था। इसी शृँखला में वर्ष २००३-२००४ में भगवान महावीर स्वामी की जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा) बिहार का विकास किया गया, जहाँ अत्यन्त आकर्षक स्वरूप में बने विभिन्न जिनमंदिर एवं भगवान का जन्म महल ‘नंद्यावर्त महल’ आज बिहार प्रान्त ही नहीं अपितु सम्पूर्ण देश एवं विदेश में प्रसिद्धि को प्राप्त हो चुका है। सम्मेदशिखर से लौटने वाले हजारों यात्री प्रतिदिन इस तीर्थ का दर्शन करके भगवान महावीर स्वामी के जन्म से पवित्र इस भूमि को नमन करके महान पुण्य का बंध करते हैं। तीर्थ निर्माण एवं विकास की शृँखला में भगवान पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि कावंâदी एवं पूज्य महाराज जी की विशेष भावना के फलस्वरूप निर्मित गणिनी ज्ञानमती दीक्षा तीर्थ, माधोराजपुरा (जयपुर) राज. में भी भव्य रचनाओं के निर्माण सम्पन्न हुए। जून २०१० में कावंâदी (देवरिया-गोरखपुर) उ.प्र. में भव्य जिनमंदिर का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं नवम्बर २०१० में माधोराजपुरा (जयपुर) राज. में भव्य सम्मेदशिखर की प्रतिकृति का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव भारी धूमधाम के साथ पूज्य पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर महाराज जी के ही सान्निध्य में सम्पन्न हुआ था। पूज्य महाराज जी के मन में हस्तिनापुर तीर्थ के लिए एक विशेष भावना व्याप्त थी। वे चाहते थे कि चूँकि हस्तिनापुर भगवन शांतिनाथ-वुंâथुनाथ-अरहनाथ की जन्मभूमि है अत: कम से कम इस तीर्थ भूमि पर भगवान शांतिनाथ की विशाल प्रतिमा अवश्य स्थापित करना चाहिए। पूज्य माताजी के आशीर्वाद से उनकी यह भावना भी अत्यन्त भव्य रूप में फलीभूत हुई और कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन के कुशल नेतृत्व में भगवान शांतिनाथ जी के साथ ही भगवान वुंâथुनाथ एवं भगवान अरहनाथ की ३१-३१ फुट उत्तुंग विशाल प्रतिमाओं का निर्माण करके जम्बूद्वीप तीर्थ पर पंचकल्याणकपूर्वक फरवरी २०१० में स्थापित किया गया। इस पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में पूज्य माताजी ससंघ के साथ पूज्य १०८ मुनि श्री अमितसागर महाराज ससंघ ने विशेष सान्निध्य प्रदान किया एवं क्षुल्लक मोतीसागर जी महाराज ने भी उत्साहपूर्वक भाग लेकर महान पुण्य अर्जित किया। चूँकि सनावद नगरी पूज्य महाराज जी एवं देश के अनेक मुनि-आर्यिकाओं की जन्मस्थली के नाम से प्रसिद्ध है अत: पूज्य महाराज की सदा ये भावना थी कि वहाँ पर कोई एक विशेष तीर्थ का निर्माण होवे अत: उनकी प्रेरणा से सन् १९९६ में सनावद नगरी में पूज्य माताजी के आशीर्वाद से उनके संघ सान्निध्य में णमोकार धाम तीर्थ का शिलान्यास होकर णमोकार धाम तीर्थ का उद्भव हुआ। इस प्रकार अपने जीवन में महान कार्यों को जन्म देने वाली चारित्रचन्द्रिका गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के चरण सान्निध्य में ४५ वर्षों के इस दीर्घ समय में उनसे अनुभव ज्ञान प्राप्त कर अपने ज्ञान व चारित्र की वृद्धि करते हुए पूज्य क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज ने अपने जीवन को सार्थक किया है। पूज्य महाराज जी ने २६ सितम्बर सन् २०००, आश्विन कृष्णा चतुर्दशी को अपने जीवन के ६० वर्ष पूर्ण कर ६१वें वर्ष में प्रवेश किया था, तब उनकी षष्ठीपूर्ति का विशेष आयोजन सन् २००१ में पूज्य माताजी के ससंघ सान्निध्य में कमल मंदिर, प्रीतविहार-दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस प्रकार अनेक गुणों के पुंज पूज्य महाराज जी ने अपने जीवन का पल-पल एवं क्षण-क्षण धर्म एवं गुरु की आराधना में व्यतीत किया और अंत में १० नवम्बर २०११, कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा, गुरुवार को मध्यान्ह १.०५ बजे मुनि अवस्था प्राप्त करके तीर्थ और गुरु की छत्र छाया में धर्म का उद्बोधन सुनते हुए निर्विकल्प समाधिमरण प्राप्त किया। ऐसे पूज्य महाराज की समाधि पर हम इस संक्षिप्त परिचय के माध्यम से उनके कार्यों, उपदेशों और आदर्शों के प्रति नमन करते हुए उस रत्नत्रयधारी आत्मा के प्रति भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।


१०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा निर्माण के यशस्वी अध्यक्ष एवं कर्मठ नेतृत्वकर्ता कर्मयोगी पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी का परिचय


(१) जन्म-आपका जन्म ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी (श्रुतपंचमी) को सन् १९५० में हुआ। (२) जन्म स्थान-टिकैतनगर (बाराबंकी) उ.प्र. (३) माता-पिता-माता मोहिनी देवी (आर्यिका श्री रत्नमती माताजी हुर्इं) एवं पिता श्री छोटेलाल जैन (४) जन्म नाम-रवीन्द्र कुमार जैन (५) शिक्षा-लखनऊ युनिवर्सिटी से बी.ए. तक अध्ययन (६) भाई बहन- बहनें- -कु. मैना जैन (वर्तमान-गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी) -कु. मनोवती जैन (वर्तमान-आर्यिका श्री अभयमती माताजी) -कु. माधुरी जैन (वर्तमान-आर्यिका श्री चंदनामती माताजी) -श्रीमती शांति देवी जैन ध.प. श्री राजकुमार जैन, डालीगंज, लखनऊ (उ.प्र.) -सौ. श्रीमती जैन ध.प. श्री प्रेमचंद जैन, बहराइच (उ.प्र.) -श्रीमती कुमुदिनी जैन ध.प. स्व. श्री प्रकाशचंद जैन, कानपुर (उ.प्र.) -श्रीमती मालती जैन ध.प. श्री यशवीर जैन, मोरीगेट-दिल्ली -श्रीमती कामिनी जैन ध.प श्री जयप्रकाश जैन, दरियाबाद (उ.प्र.) -श्रीमती त्रिशला जैन ध.प. श्री चन्द्रप्रकाश जैन, नाका हिण्डोला, लखनऊ (उ.प्र.) भाई- -श्री वैâलाशचंद जैन सर्राफ, लखनऊ (उ.प्र.) -स्व. श्री प्रकाशचंद जैन, टिकैतनगर (उ.प्र.) -श्री सुभाषचंद जैन सर्राफ, लखनऊ-टिकैतनगर (उ.प्र.) (७) त्याग की प्रेरणा-सन् १९६८ में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा २ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत (८) आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत-सन् १९७२ में आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज द्वारा, नागौर (राज.) में (९) सप्तम प्रतिमा के व्रत एवं गृह त्याग-सन् १९८७ में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा (१०) दशम प्रतिमा एवं पीठाधीश पदारोहण के संस्कार-मगसिर कृष्णा दशमी, २० नवम्बर २०११, पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा (११) उपाधि अलंकरण- - ‘कर्मयोगी’ (सन् १९९२ में अ.भा. दि. जैन शास्त्री परिषद द्वारा) - ‘धर्मसंरक्षणाचार्य’ (सन् १९९६ में मांगीतुंगी-महा. में पंचकल्याणक के अवसर पर वीर सेवा दल द्वारा) - ‘संस्कृति संरक्षक’ (सन् २००६ में भट्टारकवृंद द्वारा) - ‘धर्मालंकार’ (सन् १९९६, मांगीतुंगी में) - ‘संस्कृति सार्थवाह’ (१२ जून २०१०, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में आयोजित ज्ञान ज्योति विद्वत् प्रशिक्षण शिविर के समापन अवसर पर समस्त विद्वत्जनों द्वारा) - ‘तीर्थोद्धारक’ (३० नवम्बर २०११, औरंगाबाद-महा. में समस्त दिगम्बर जैन समाज औरंगाबाद एवं गणिनी ज्ञानमती भक्तमण्डल महाराष्ट्र द्वारा पीठाधीश पदारोहण के उपरांत आयोजित स्वामी जी के सम्मान समारोह में प्रदत्त) (१२) विदेश यात्रा-भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव वर्ष के अन्तर्गत सन् २००० में न्यूयार्वâ-अमेरिका में आयोजित ‘विश्वशांति शिखर सम्मेलन’ में जैन धर्माचार्य के रूप में विशेष सहभागिता (१३) साहित्यिक अवदान-विगत ३८ वर्षों से संस्थान द्वारा प्रकाशित की जाने वाली सम्यग्ज्ञान मासिक पत्रिका का सम्पादन। -वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला द्वारा प्रकाशित होने वाले पूज्य माताजी द्वारा लिखित ग्रंथों का सम्पादन कर प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में छपवाकर विशेष धर्मप्रचार में महत्वपूर्ण सहयोग। (१४) विशेष सौभाग्य-आपको पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी जैसी जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी के लघु भ्राता होने का सौभाग्य प्राप्त है। साथ ही आपकी अन्य दो बहनें भी उपरोक्तानुसार आर्यिका व्रतों का अनुपालन करते हुए आत्मकल्याण एवं धर्मप्रभावना के कार्य कर रही हैं। इसके साथ ही सबसे महान सौभाग्य यह है कि आपकी जन्म प्रदात्री माँ ने भी तेरह संतानों का लालन-पालन करने के उपरांत स्वयं आर्यिका दीक्षा धारण की और अपने मानव जीवन को सफल किया, ऐसी पूज्य महान आत्माओं के साथ आपका गृहस्थ संबंध होना अत्यन्त विशेष सौभाग्य एवं पुण्य का विषय है। (१५) विभिन्न नेतृत्व- अध्यक्ष-दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर (मेरठ) उ.प्र. अध्यक्ष-भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर दि. जैन समिति, कुण्डलपुर (नालंदा) बिहार अध्यक्ष-तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ प्रयाग प्रबंध समिति, प्रयाग-इलाहाबाद (उ.प्र.) अध्यक्ष-दिगम्बर जैन अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी, अयोध्या (पैâजाबाद) उ.प्र. अध्यक्ष-भगवान पुष्पदंतनाथ जन्मभूमि कावंâदी दि. जैन समिति, कावंâदी (देवरिया-गोरखपुर) उ.प्र. अध्यक्ष-भगवान ऋषभदेव १०८ फुट उत्तुंग मूर्ति निर्माण कमेटी, मांगीतुंगी (सटाणा) महा. चेयरमैन-गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी दीक्षा तीर्थ, माधोराजपुरा (जयपुर) राज. अध्यक्ष-तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ अध्यक्ष-अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद अध्यक्ष-भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थंकर जन्मभूमि विकास कमेटी कार्याध्यक्ष-बिहार प्रान्तीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी, कार्यालय-आरा (बिहार) उपाध्यक्ष-भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा, दिल्ली परामर्शदाता-भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी प्रेरणास्रोत-श्रुत सेवा निधि न्यास, फिरोजाबाद (उ.प्र.) चेयरमैन-अग्रवाल दिगम्बर जैन महासभा


अपने दृढ़ संकल्प और कर्मठता से सृष्टि पर नया चमत्कार पैदा करने वाली तीन विश्वविभूतियों को चरणवंदन ‘‘जब व्यक्ति के जीवन में किसी पराक्रम, साहस और पौरुष की बात आती है, तब आसमान से सितारे तोड़ लाने और छप्पर फाड़कर अपने हर उद्देश्य में सफल हो जाने की कल्पना करता है। लेकिन आज हमारे समक्ष ऐसी बातें केवल सुनने के योग्य नहीं, अपितु प्रत्यक्ष देखने और महसूस करने के योग्य बन चुकी हैं। क्योेंकि ऋषभगिरि, मांगीतुंगी में एक ऐसा अजूबा निर्मित होकर तैयार हो चुका है, जो सोचने में सैकड़ों साल में किया जाने योग्य कार्य दिखता है और किसी दृष्टि से तो पूर्ण असंभव ही नजर आता है। यह कार्य है-‘एक विशाल पर्वत को कांट-छांटकर उसी पर्वत से अखण्ड पाषाण वाली विश्व की सबसे बड़ी शिला को तराशना और उसके उपरांत उस शिला में तीनों लोक के सर्वसुन्दर मानुष आकार को गढ़कर उसमें प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की स्थापना करना।’ यह एक महाअसंभव कार्य था, जिसकी पूर्णता विश्व की सबसे ऊँची १०८ फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के रूप में हुई है, जिसे गिनीज वल्र्ड रिकार्ड में भी विश्व इतिहास के रूप में दर्ज किया गया है। इस कार्य की संभवता के पीछे तीन विश्वविभूतियों के दृढ़ संकल्प और कर्मठता की कहानी आज के युवाओं को सीख और चुनौती देती है कि जीवन में सोचा हुआ हर असंभव कार्य भी संभव हो सकता है, यदि हमारे संकल्पों में मजबूती और परिश्रम में लगनशीलता का अखण्ड सामंजस्य सदैव हमारे लक्ष्य में स्थापित रह सके। विश्व के समक्ष आज ऐसे दृढ़ संकल्प और कर्मठता की सफलता का एक आदर्श उदाहरण बन चुकी वे तीन विभूतियाँ हैं-१) सर्वोच्च जैन साध्वी दिव्यशक्ति परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी, जिन्होंने भारत में अनेक तीर्थों की विकास प्रेरणा के साथ स्वत: जीवन में केवल चौथी कक्षा तक अध्ययन के बावजूद संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी भाषाओं में ४०० ग्रंथों का लेखन किया है। पुन: २) द्वितीय विश्वविभूति पूज्य माताजी की शिष्या प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी हैं, जिनका सशक्त मार्गदर्शन कार्ययोजनाओं को अनुशासनपूर्वक सफलता की दिशा में ले जाता है तथा ३) तृतीय विभूति के रूप में कर्मयोगी पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी को यह सम्पूर्ण देश पूर्ण विश्वास के साथ स्वीकारता है, जब उनकी कार्य कुशलता के समक्ष मुश्किल से मुश्किल योजनाएं आसान बनकर इस धरती पर नये उपहार प्रदान करती हैं। तो आइये, आज विश्व के समक्ष १०८ फुट ऊँची भगवान ऋषभदेव प्रतिमा को प्रदान करने वाली इन तीन विश्वविभूतियों के प्रति सादर प्रणाम करते हुए उनकी चरण वंदना करते हैं और अपनी आसमान को छूती भावनाओं के साथ इनके प्रति कतिपय शब्दांशों में विनयांजलि समर्पित करने का एक सूक्ष्म प्रयास करते हैं-’’ १) ‘‘वर्तमानयुगीन संत परम्परा शिरोमणि’’ : गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी बंधुओं! यूँ तो अलग-अलग विचाराधाराओं में सिद्धान्तों व संतों की परम्पराएं ंअपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर अविरल इस सृष्टि पर चल रही है। हर परम्परा में अपने-अपने सिद्धान्तों के आधार पर आराधकों के जीवन को समुन्नत बनाने की कला सिखाई जाती है। लेकिन परम्पराओं के सच्चे प्रवर्तन हेतु संतों की भूमिका सर्वमान्य मानी जाती है। जब-जब इस धरती पर विभिन्न सिद्धान्तों के प्रभावी संत विचरण करते हैं, तब-तब उन सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार एवं उनकी मान्यताएं लोकव्यापी बन जाती हैं और उन संतों की प्रेरणा से हजारों नहीं, लाखों नहीं, करोड़ों भव्य आत्माओं का कल्याण होता है। इसी क्रम में वर्तमान समय पर यदि हम विशेष दृष्टिपात करें, तो विभिन्न परम्पराओं के कतिपय विशिष्ट संतों के साथ ही विश्व व्यापी स्तर पर जैनधर्म की एकमात्र विदुषी साध्वी का नाम जगत विख्यात हो रहा है, जिनका नाम है - दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी। इस सृष्टि पर धर्म का पराक्रम पुरजोर पैâलाने के लिए आज ऐसी ही दिव्यशक्ति महासाधिका की इस संसार को आवश्यकता है, जिनकी तीव्र सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणाओं से जन-जन का कल्याण होता है और कल-कल बहती अमृत की धारा के समान घर-घर में विश्वशांति, आपसी प्रेम, सौहाद्र्र, भगवान की भक्ति, अहिंसा के संदेश, सहिष्णुता आदि सिद्धान्तों को प्रमुखता प्राप्त होती है। सरस्वतीस्वरूपा पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की तपस्या का प्रभाव वर्तमान में सारे जगत पर दिख रहा है, जिनकी प्रेरणा से तीर्थंकर जैसे तीन लोक के नाथ कहे जाने वाले महापुरुषों की वाणी आज घर-घर में पहुँच रही है। ८२ वर्ष की उम्र में जिन्होंने बालब्रह्मचारिणी बनकर अपने जीवन के ६४ वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्य के साथ त्याग व तपस्या में व्यतीत किये हैं, निश्चित ही आज उनकी आत्मा एक दिव्यस्वरूप को प्राप्त हो रही है और उनके दर्शन से, उनकी वंदना से, उनके आशीर्वाद से व उनकी वाणी से जैनधर्म का जिन ऊँचाईयों के साथ प्रचार-प्रसार हो रहा है, वह सर्वोत्कृष्ट है। उपरोक्त वर्णन का सबसे महत्वपूर्ण एवं जीता-जागता एक ऐसा उदाहरण हमारे सामने है, जो एक सामान्य व्यक्तित्व ही नहीं, अपितु किसी विशेष व्यक्तित्व के लिए भी कल्पनातीत है। वह उदाहरण है, ‘‘ऋषभगिरि-मांगीतुंगी के पर्वत पर अखण्ड पाषाण में निर्मित विश्व की सबसे ऊँची दिगम्बर जैन प्रतिमा अर्थात् १२१ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा’’। इस प्रतिमा की मान्यता न सिर्पâ जैनधर्म के अनुयायियों के लिए है अपितु यह प्रतिमा ‘‘स्टेचू ऑफ अहिंसा’’ के रूप में समूचे विश्व के सर्वधर्मानुयायियों के लिए पूज्य एवं विख्यात हो रही है। सैद्धान्तिक आधार पर निश्चित ही जैनधर्म के अनुयायी ही इस प्रतिमा की पूजा-पाठ व अभिषेक करेंगे, लेकिन हम समझते हैं कि इस प्रतिमा के दर्शन से प्रत्येक धर्म के अनुयायी को अपने जीवन में अहिंसा धर्म को अपनाने की प्रेरणा प्राप्त होगी और विशेषरूप से अपरिग्रह के साथ वीतरागता, सर्वज्ञता, हितोपदेशिता तथा जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाकर भगवान बनने की युक्ति और दिशा की भी प्राप्ति होगी। आज सम्पूर्ण संसार के लोग अपने जीवन में शांति की कामनाएं करते हैं। जो लोग संसार की वास्तविकताओं से काफी हद तक परिचित हो गये हैं, वे अपने जीवन में धन-दौलत की कामनाओं को छोड़कर आत्म शांति की कामनाएं करते हैं और स्वस्थ शरीर के साथ धर्माराधना करते हुए इस संसार से गमन की अपेक्षा रखते हैं। वे लोग समझ जाते हैं कि धन, वैभव के भोग-उपभोग नश्वर हैं, लेकिन आत्मा की शांति अविनश्वर है। ऐसी परिस्थितियों में आज भगवान ऋषभदेव की सर्वोच्च प्रतिमा का निर्माण समूचे विश्व को आत्म शांति की ओर प्रेरित करने का एक सबल एवं प्रमुख माध्यम बनकर प्रगट हुआ है। अत: ऐसी प्रतिमा का निर्माण कराने वाली पूज्य माताजी ने आज जैनधर्म की परम्परा को सारे जगत में सर्वतोमुखी बनाने का जो कार्य किया है, वह युगों-युगों के लिए इस सृष्टि पर एक बहुत बड़ा अमृतमयी वरदान सिद्ध हुआ है, ऐसा हमारा आत्म विश्वास है। अत: अखण्ड पाषाण में विश्व की सर्वोच्च तीर्थंकर प्रतिमा के निर्माण पर आज हम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को समूचे विश्व की विभिन्न आध्यात्मिक-विभूतियों में श्रेष्ठ दिव्यशक्ति मानकर उन्हें ‘‘वर्तमानयुगीन संत परम्परा शिरोमणि’’ की उपमा से बहुमानित करने का साहस प्रगट करते हैं। २) ‘‘ज्ञान चन्द्रिका’’ प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का निर्माणकार्य वास्तव में एक असंभवता से संभवता का सफरनामा है, एक आश्चर्य है, एक चमत्कार है। इसीलिए इस कार्य की सिद्धि भी किसी सामान्य विधि से नहीं हुई है अपितु इस कार्य की सिद्धि में आध्यात्मिक जगत की तीन विशिष्ट शक्तियों का समावेश व उनकी त्याग-तपस्या का प्रभाव मूल रहा है। सर्वप्रथम दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा ‘‘दीपक’’ के समान प्राप्त हुई। पश्चात् कर्मयोगी पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी का प्रवेश ‘‘घृत’’ के समान निमित्त बना और इसके साथ ही प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की शक्ति एक ‘‘बाती’’ के समान सिद्ध हुई। इस प्रकार इन त्रिवेणी शक्तियों के संगम से आज सम्पूर्ण विश्व ही नहीं तीनोंलोक, सूर्य की भांति दैदिप्यमान १०८ पुुुâट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा पाकर आलोकित हो रहे हैं। इस महान कार्य की पूर्णता में जिन्होंने ‘बाती’ बनकर इस सूर्य-प्रकाश को चहुँओर पैâलाया है, वे आर्यिका श्री चंदनामती माताजी हम सभी के लिए महान आराधना के योग्य हैं क्योंकि उन्होंने इस महान कार्य में विगत २० वर्षों से सतत अपना प्रतिभाशील मार्गदर्शन प्रदान किया और उनकी सूझ-बूझ व ज्ञान-चन्द्रिका से मूर्ति निर्माण कमेटी सदैव ही सशक्त हुई है। अनेक कठिनाईयों के रास्ते पर आपके मार्गदर्शन ने कमेटी को नई उम्मीदों की किरणें प्रदान करके पुन: ऊर्जावान बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। अत: ऐसी वात्सल्यमयी प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के व्यक्तित्व को आज हम ‘‘ज्ञानचन्द्रिका’’ की उपमा से अभिवंदित करके गौरव का अनुभव करते हैं। ऐसी आदर्शमयी ज्ञानचन्द्रिका पूज्य माताजी के साथ सदैव ही मूर्ति निर्माण कमेटी को भरपूर वात्सल्य, अपनापन, सौम्य समागम एवं समय-समय पर उचित निर्णय प्राप्त होते रहे, अत: आज हम इस विशाल प्रतिमा के अंतर्राष्ट्रीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की अद्भुत सफलता पर सम्यग्ज्ञान पत्रिका की ओर से उनके श्रीचरणों में शत-शत नमन करते हैं। ३) दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह अमर हुए स्वामीजी किसी कृति का निर्माण यदि सर्वोत्तम हो जाये, तो उस कृति के निर्माण के साथ कृतिकार की छाया भी सदैव के लिए अमर हो जाती है। विभिन्न विधाओं की कृतियों का निर्माण, विभिन्न पक्ष के उत्कृष्ट व्यक्तित्वों की पहचान को अजर-अमर करता है। आज समयसार ग्रंथ के आलोढन पर आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी को याद किया जाता है। षट्खण्डागम ग्रंथ के लिए पुष्पदंत-भूतबली आचार्य को याद किया जाता है। तत्त्वार्थसूत्र के लिए उमास्वामी आचार्य को याद किया जाता है। इसी प्रकार किसी आविष्कार के लिए उसके आविष्कारकर्ता को याद किया जाता है और किसी कविता के लिए उसके कविकार को याद किया जाता है। ठीक इसी प्रकार की एक ऐतिहासिक कृति के आज हम स्वयं साक्षी बन रहे हैं और स्वयं अपने नेत्रों को धन्य कर रहे हैं, वह कृति कुछ और नहीं ‘‘१२१ फुट भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा है, जिसका निर्माण युगों-युगों के लिए जैन संस्कृति ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति के लिए एक वरदान है। ऐसी अमिट कृतियों के निर्माण की कल्पना करना भी स्वयं एक आश्चर्य है, जिसके माध्यम से इतने दूरगामी और अजर-अमर लक्ष्य की आज सिद्धि हुई है। पर्वत को तोड़ने से पहले इतना बड़ा आत्मविश्वास पैदा करना कि वहाँ प्रतिमा निर्माण के लिए इतने बड़े अखण्ड पाषाण की शिला प्राप्त हो सकेगी, यह भी एक चमत्कारिक व्यक्तित्व का ही परिणाम हो सकता है। ऐसे व्यक्तित्व भी स्वयं एक सामान्य सोच से कल्पनातीत होते हैं। ऐसी अथाह कल्पनाशक्ति, दृढ़विश्वास और अटूट आत्मसाधना की धनी पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी हैं, जिन्होंने आज से २० वर्ष पूर्व ही ऋषभगिरि मांगीतुंगी के पर्वत में १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का मानों दर्शन कर लिया था और आज उनका आत्मविश्वास साकार होकर हम सभी के समक्ष प्रत्यक्षदर्शी हो रहा है। मूर्ति निर्माण के साथ पूज्य माताजी का व्यक्तित्व तो निश्चित ही अजर-अमर हुआ है, लेकिन इस प्रेरणा को शिरोधार्य करने वाले कर्मयोगी पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी का व्यक्तित्व भी आज दैदीप्यमान नक्षत्र के समान अजर-अमर हो गया है, जिन्होंने इस साहसिक कार्य को अपने सीने में भरी सांसों की ताकत से पूर्ण किया है। पूज्य स्वामीजी द्वारा इस महान एवं दीर्घपरिणामी कार्य के लिए किया गया कठोर परिश्रम उनके धैर्य की पराकाष्ठा को प्रतिबिम्बित करता है। इस कार्य की सफलता के लिए प्रयोजनभूत हुर्इं नेतृत्व क्षमता, सामाजिक सामंजस्य, मजबूत संगठन, एकता, उत्कृष्ट प्रबंधन, आर्थिक समायोजन, तकनीकी युक्तियाँ एवं इस विशाल योजना के प्रति जन-जन में स्पुâरित हुई आत्म विश्वास की सतत् लहर के पीछे स्वामीजी के मौन व्यक्तित्व की परछाई किसी भी बुद्धिजीवी के द्वारा पढ़ी जा सकती है। २० वर्ष के लम्बे अंतराल का धैर्य, आपसी सामंजस्य की स्थापना, समाज के बुद्धिजीवियों का मार्गदर्शन लेना, सटीक प्रबंधन की कुशाग्रता, अर्थविनिमय की कुशलता, तकनीकी युक्तियों का परिक्षण व उपयोग तथा इस कार्य के प्रति जन-जन में उत्साह जागृति के पीछे कर्मयोग के धनी पूज्य स्वामीजी का गुणवान व्यक्तित्व ही परिलक्षित होता है, जिसके कारण आज समाज को इतनी बड़ी उपलब्धि हुई है। बंधुओं! महापुरुषों द्वारा जन-जन की गुणग्राहकता के साथ स्वयं कठिनाईयों के रास्ते पर चलकर मिसालें कायम की जाती हैं अत: आज हम इतने प्रबल गुणों के धनी पूज्य स्वामीजी को भी एक ‘‘महापुरुष’’ की संज्ञा प्रदान करते हुए उनके व्यक्तित्व का बखान करना चाहते हैं, जिनके अनथक कर्तृत्व एवं बेजोड़ सूझ-बूझ से इस विशाल प्रतिमा का निर्माण सम्पन्न हुआ है। ऐसे पूज्य स्वामीजी वेâ प्रति हम सभी का हार्दिक अभिवंदन एवं शत-शत नमन।



मूर्ति निर्माण के प्रमुख स्तंभों का सादर अभिवादन पूज्य स्वामीजी के साथ १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा निर्माण में सम्पूर्ण मूर्ति निर्माण कमेटी ने अपने-अपने स्तर से महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया, लेकिन प्रमुख रूप से जिन्होंने अपना तन-मन-धन और समय का एक लम्बा अरसा व्यतीत किया, ऐसे दो महान व्यक्तित्व, डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल-पैठण (महामंत्री) एवं इंजी. श्री सी. आर .पाटिल-पुणे (मंत्री) के अवदान के प्रति हम श्रद्धा से उनका अभिवादन करते हैं। डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल जी ने सतत् मांगीतुंगी में प्रवास करके मूर्ति निर्माण के कार्य को बहादुरी के साथ अंजाम दिया और पूज्य माताजी व स्वामीजी की भावनानुसार प्रतिदिन के लक्ष्य में सफलता हासिल की। इसी प्रकार इंजी. सी. आर.पाटिल जी ने भी पर्वत की ऊँचाइयों पर रहकर सदैव ही मौसम की अनुवूâलता या प्रतिवूâलता में भरसक मेहनत की और मूर्ति निर्माण के कार्य में ऐतिहासिक योगदान दिया। विशेषरूप से तकनीकी योग्यताओं का आधार लेकर आपने इस कठिन कार्य को अनेक स्थानों पर सरलता के साथ निभाने का प्रयास किया और सफल हुए तथा प्रात: से सायंकाल और देर रात्रि तक भी इस कार्य की पूर्ति में आपने अनंत पुण्य अर्जित किया है। ऐसे इन दोनों ही व्यक्तित्वों की निष्काम सेवा, समर्पण, गुरुभक्ति एवं आज्ञापालन के प्रति आज हम दोनों स्तंभों का सादर अभिवादन करते हैं। इसी प्रकार प्रारंभिक तौर पर आमदार जयचंद जी कासलीवाल-चांदवड़ एवं श्री जम्मनलाल जी कासलीवाल एडवोकेट-औरंगाबाद के योगदान भी भुलाएं नहीं जा सकते, जिन्होंने मूर्ति निर्माण की प्रारंभिक योजनाओं को मूर्तरूप प्रदान करने में बहुमूल्य सहयोग प्रदान किया है। इस कार्य में अन्य व्यक्तित्वों का भी विशिष्ट सहयोग प्राप्त हुआ, जिसमें विशेषरूप से श्री महावीर प्रसाद जैन संघपति-दिल्ली, श्री कमलचंद जैन, खारीबावली-दिल्ली, श्री अनिल कुमार जैन, प्रीतविहार-दिल्ली, श्री नरेश बंसल-गुड़गाँवा, इंजी. श्री हीरालाल तात्या मेढेंगिरी-सांगली आदि की भूमिकाएं प्रशंसनीय एवं सराहनीय हैं।


१०८ फुट मूर्ति निर्माण का इतिहास एवं ऐतिहासिक चित्रमयी झलकियाँ (सन् १९९६ से २०१६)