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गृह चैत्यालय का होना दोष नहीं
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शरद पूर्णिमा महोत्सव


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मिथ्यादृष्टि के ध्यानसिद्धि संभव नहीं


मिथ्यादृष्टि के ध्यानसिद्धि संभव नहीं है!

श्री शुभचन्द्राचार्य ने ‘‘ज्ञानार्णव’’ नामक ग्रंथ में ध्यान का प्रमुखता से विचेन किया है। ज्ञान ± अर्णव: अर्थात् ज्ञान का समुद्र। कहने का तात्पर्य यह है कि ध्यान के द्वारा ही ज्ञानरूपी समुद्र में गोता लगाया जा सकता है। प्रस्तुत ग्रंथ में ध्यान का वर्णन करते—करते आचार्यश्री कहते हैं कि आकाश में पुष्प और गधे के सींग कदाचित् हो सकते हैं परन्तु गृहस्थों को किसी भी स्थिति में शुक्ल ध्यान की सिद्धि नहीं हो सकती है।

इसी ग्रंथ में कहा गया है कि मिथ्यादृष्टियों को भी ध्यान की सिद्धि कदापि नहीं हो सकती है। यथा—

दुर्दशामपि न ध्यान—सिद्धि: स्वप्नेऽपि जायते।
गृण्हतां दृष्टिवैकल्याद् वस्तुजातं यदृच्छया।।१८।।

क्रमशः...

गृहचैत्यालय के आगमप्रमाण


गृहचैत्यालय के आगमप्रमाण

[यह आलेख परमपूज्य आचार्य श्री विद्यानन्दजी मुनिराज की डायरी से परमपूज्य एलाचार्य श्री प्रज्ञसागरजी मुनिराज द्वारा संपादित किया गया है । आशा है इसे पढ़कर सुधी पाठकों की जिज्ञासाओं का समाधान होगा। ]

१.

जिज्ञासा : घर में चैत्यालय; स्थापना कर सकते हैं क्या ?

समाधान : शास्त्रों में घर में चैत्यालय की स्थापना एवं प्रतिमा की ऊँचाई आदि के बारे में कथन मिलता है। घर में प्रतिमा रखने की प्रेरणा देते हुए आचार्य सकलर्कीित इस प्रकार कहते हैं—

‘यस्य गेहे जिनेन्द्रस्य बिम्बं न स्याच्छुभप्रदम्।
पक्षिगृहसमं तस्य गेहं स्यादतिपापप्रदम्।।’’
—(प्रश्नोत्तर श्रावकाचार, १८५)

अर्थ — जिसके घर में पुण्य उपार्जन करने वाली भगवान जिनेन्द्रदेव की प्रतिमा नहीं है उसका घर पक्षियों के घोंसले के समान है और वह अत्यन्त पाप उत्पन्न करने वाला है।

न वितस्त्यधिकां जातु प्रतिमां स्वगृहेऽर्चयेत्।
—(प्रतिष्ठासारोद्धार, १/८१)

अपने घर के चैत्यालय में एक विलस्त (१२ अंगुल प्रमाण) से अधिक प्रमाण वाली प्रतिमा नहीं रखे। उक्तं च—

द्वादशांगुलपर्यंतं यवाष्टांशानतिक्रमात्।
स्वगृहे पूजयेद्विबं न कदाचित्ततोधिकम्।।

अर्थ — घर में एक यव के आठवें भाग से कम द्वादश अंगुल वाली प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए, उससे अधिक की कभी भी पूजा नहीं करनी चाहिए।

क्रमशः...

महासती चन्दना


महासती चन्दना

सिन्धु देश की वैशाली नगरी में राजा चेटक राज्य करते थे। वे जिनेन्द्रदेव के परम भक्त थे, उनकी रानी का नाम सुभद्रा था। इन दम्पत्ति के दस पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सुकम्भोज, अवंâपन, पतंगक, प्रभंजन और प्रभास नाम से प्रसिद्ध हुए तथा उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों के समान जान पड़ते थे। इन पुत्रों के सिवाय सात ऋद्धियों के समान सात पुत्रियाँ भी थीं, जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी सुप्रभा, उससे छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलना, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी।

विदेहदेश के कुण्डलपुर नगर में नाथवंश के शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियों से सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्य के प्रताप से प्रियकारिणी उनकी पत्नी हुई थीं। वत्सदेश के कौशाम्बी नगर में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे, मृगावती नाम की दूसरी पुत्री इन्हें ब्याही गई। दशार्ण देश के हेमकच्छ नगर के स्वामी राजा दशरथ थे, ये सूर्यवंश के तिलक थे। सूर्य की निर्मल प्रभा के समान सुप्रभा इनकी रानी हुई थीं। कच्छदेश के रोरुक नामक नगरी में उदयन नाम का प्रतापशाली राजा था उसको प्रभावती नाम की चौथी पुत्री विवाही गई थी। अच्छी तरह शीलव्रत के पालन करने से उसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था। गांधार देश के महीपुर नगर में राजा सत्यक रहता था, उसने राजा चेटक से उसकी ज्येष्ठा नाम की पुत्री की याचना की परन्तु राजा ने नहीं दी। इससे उसने कुपित होकर रणांगण में युद्ध किया परन्तु युद्ध में वह हार गया। जिससे मान भंग होने से उसने दमवर मुनिवर के समीप जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली।

तदनन्तर राजा चेटक ने स्नेह के कारण सदा देखने के लिये पट्टक पर अपनी सातों पुत्रियों के उत्तम चित्र बनवाये। राजा चेटक देव की पूजा के समय जिनप्रतिमा के समीप ही अपनी पुत्रियों का चित्रपट पैâलाकर सदा पूजा किया करते थे। किसी समय राजा चेटक अपनी सेना के साथ मगध देश के राजगृह नगर में गये। वहाँ उन्होंने नगर के बाह्य उपवन में डेरा डाला। स्नान करने के बाद उन्होंने पहले जिनप्रतिमाओं की पूजा की और उसके बाद समीप में रखे हुए चित्रपट की पूजा की। यह देखकर राजा श्रेणिक ने समीपवर्ती लोगों से पूछा कि यह क्या है ? तब उन लोगों ने कहा कि राजन्! ये राजा की सातों पुत्रियों के चित्रपट हैं। इनमें से चार पुत्रियाँ तो विवाहित हो चुकी हैं परन्तु तीन अविवाहित हैं, उन्हें ये अभी नहीं दे रहा है। इन तीन कन्याओं में दो तो यौवनवती हैं और छोटी अभी बालिका है।

क्रमशः...

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कुण्डलपुर के राजकुमार


सत्य अहिंसा के अवतार कुण्डलपुर के राजकुमार

संसार को सत्य—अहिंसा रूप शाश्वत मूल्यों का उत्कृष्ट पथ प्रदर्शित करने वाले इस युग के तीर्थंकर भगवन्तों की परम्परा में अंतिम एवं २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने २६०१ वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त की कुण्डलपुर नगरी (नालन्दा) में महाराजा सिद्धार्थ एवं महारानी त्रिशला के आंगन में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को जन्म लिया था। अपने उज्ज्वल शरीर की कान्ति से अन्धकार को विनष्ट करने वाला, जगत का हित करने वाला, मति,श्रुत, अवधि तीनों ज्ञान को धारण करने वाला, महादेदीप्यमान एवं धर्मतीर्थ का प्रवर्तक ऐसा यह जिनशिशु प्रारम्भ से ही महान अलौकिक व्यक्तित्व का धारी था। सुमेरुपर्वत पर १००८ कलशों का जन्माभिषेक सहज रूप से झेलने की सामथ्र्य तीर्थंकर शिशु में ही हो सकती थी।

भगवान की बाल्यावस्था—

वीर, वर्धमान, सन्मति जैसे नामों से अलंकृत भगवान की सेवा के लिए सौधर्म इन्द्र अनेक देव, देवियों को राजमहल - नंद्यावर्त में नियुक्त कर गए थे। उनमें से कोई धाय का काम करती, कोई स्वर्ग से लाए गए वस्त्र-आभूषण आदि से उनके अंगों को सजाती, कोई अनेक प्रकार के खिलौनों आदि के द्वारा उनका विशेष मनोरंजन करती थी। जब वे देवियां उन्हें सम्बोधन कर बुलातीं तो भगवान मुस्कुराते हुए उनके पास चले जाते थे। तीर्थंकर भगवान चन्द्रकला की भांति बढ़ने लगे। उनकी बाल-सुलभ चपलता से माता-पिता एवं कुटुम्बियों को बड़ा ही आनन्द होता था।

जब उनकी अवस्था कुछ अधिक बढ़ी तो उनके मुख से सरस्वती की भांति वाणी निकलने लगी। रत्नजटित भूमि पर चलते हुए उनके आभूषण सूर्य की किरणों की तरह दमदमाते थे एवं वे स्वयं किरणों से परिवेष्टित सूर्य सम प्रतीत होते थे। उनकी क्रीडा के लिए देव स्वयं गजराज, अश्व आदि का कृत्रिम रूप ले लिया करते थे। वे उनके साथ क्रीडा किया करते थे। इस प्रकार विभिन्न क्रीडाओं से स्वयं प्रसन्न होकर दूसरों को प्रसन्न करते हुए वे भगवान कुमार अवस्था को प्राप्त हुए।

क्रमशः..

श्री अनन्तनाथ भगवान


अनन्तनाथ भगवान का परिचय
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परिचय

धातकीखंडद्वीप के पूर्व मेरू से उत्तर की ओर अरिष्टपुर नगर में पद्मरथ राजा राज्य करता था। किसी दिन उसने स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के समीप जाकर वंदना-भक्ति आदि करके धर्मोपदेश सुना और विरक्त हो दीक्षा ले ली। ग्यारह अंगरूपी सागर का पारगामी होकर तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। अन्त में सल्लेखना से मरण कर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में [इन्द्रपद]] प्राप्त किया।

गर्भ और जन्म

इस जम्बूद्वीप के दक्षिण भारत की अयोध्या नगरी में इक्ष्वाकुवंशी सिंहसेन महाराज राज्य करते थे, उनकी महारानी का नाम जयश्यामा था। कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा के दिन वह अच्युतेन्द्र रानी के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। नव माह के बाद ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन पुत्र उत्पन्न हुआ। इन्द्र ने पुत्र का नाम ‘अनन्तनाथ' रखा।

तप

भगवान को राज्य करते हुए पन्द्रह लाख वर्ष बीत गये, तब एक दिन उल्कापात देखकर भगवान विरक्त हो गये। भगवान देवों द्वारा निर्मित पालकी पर सवार होकर सहेतुक वन में गये तथा ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गये।

केवलज्ञान और मोक्ष

छद्मस्थावस्था के दो वर्ष बीत जाने पर चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। अन्त में सम्मेदशिखर पर जाकर एक माह का योग निरोध कर छह हजार एक सौ मुनियों के साथ चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन परमपद को प्राप्त कर लिया।

क्रमश:

आज का दिन - १७ अक्टूबर २०२१ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक १७ अक्टूबर २०२१
तिथी- आश्विन शुक्ल १२
दिन- रविवार
वीर निर्वाण संवत- २५४७
विक्रम संवत- २०७८

सूर्योदय ०६.२६
सूर्यास्त १७.५९


अथ आश्विन मास फल विचार



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