मुख्यपृष्ठ

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


जैन इनसाइक्लोपीडिया
जैन विश्वकोश
जैनधर्म के ज्ञान का महासागर


Diya.gif
बेसिक/एडवांस डिप्लोमा इन जैनोलोजी ऑनलाइन फॉर्म
बेसिक डिप्लोमा इन जैनोलोजी पुस्तक पढ़ें
एडवांस डिप्लोमा इन जैनोलोजी पुस्तक पढ़ें
प्रमुख विषय


जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

गर्भ संस्कार शिविर


IMG-20220103-WA0013.jpg
श्री सप्तऋषि पूजा


श्री सप्तऋषि पूजा

Saptrishi Images.JPG
[सप्तऋषि व्रत में]
-स्थापना-(अडिल्ल छंद)-
Cloves.jpg
Cloves.jpg

सुरमन्यू श्रीमन्यु आदि ऋषि सात हैं।

चारण ऋद्धि समन्वित जो विख्यात हैं।।

मथुरापुरि में चमत्कार इनका हुआ।

रोग महामारी इन तप से भग गया।।१।।

-दोहा-

इन सातों ऋषिराज की, पूजा करें महान।

रोग शोक की शांति हित, करें प्रथम आह्वान।।२।।

ॐ ह्रीं चारणऋद्धिसमन्वित श्रीसुरमन्यु-श्रीमन्यु-श्रीनिचय-सर्वसुन्दर-जयवान-विनयलालस-जयमित्रनाम-सप्तऋषिसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।

ॐ ह्रीं चारणऋद्धिसमन्वित श्रीसुरमन्यु-श्रीमन्यु-श्रीनिचय-सर्वसुन्दर-जयवान-विनयलालस-जयमित्रनाम-सप्तऋषिसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।

ॐ ह्रीं चारणऋद्धिसमन्वित श्रीसुरमन्यु-श्रीमन्यु-श्रीनिचय-सर्वसुन्दर-जयवान-विनयलालस-जयमित्रनाम-सप्तऋषिसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं स्थापनं।

-अष्टक-शंभु छंद-

गंगा यमुना अरु सरस्वती, नदियों का जल भर लाए हैं।

हो जन्म जरा मृत्यू का क्षय, गुरुचरण चढ़ाने आए हैं।।

सुरमन्यु आदि ऋद्धिधारी, सातों ऋषियों को वन्दन है।

आरोग्य प्राप्ति के हेतु सभी, मुनियों के पद में प्रणमन है।।१।।

Jal.jpg
Jal.jpg

ॐ ह्रीं चारणऋद्धिसमन्वित श्रीसुरमन्युआदि सप्तऋषिभ्यो जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रमशः...
देश के इतिहास में स्वर्णिम दिवस


राष्ट्रपति भवन में सर्वोच्च जैन साध्वी का मंगल उद्बोधन

WhatsApp Image 2021-11-17 at 12.32.17 PM (1).jpeg

भारत गणतंत्र के राष्ट्रपति माननीय श्री रामनाथ जी कोविंद के व्यक्तिगत आमंत्रण पर जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी भरतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल आगमन बड़े आत्मीय एवं विशिष्ट आदर सम्मान के साथ दिनांक 14 नवम्बर 2021 को प्रातः 9.30 बजे राष्ट्रपति भवन में हुआ। सर्वप्रथम संघ सहित पधारीं पूज्य माताजी का साउथ कोर्ट के प्रवेश द्वार पर राष्ट्रपति जी के सचिव महोदय ने अभिवंदन किया। पुनः गाइड के माध्यम से 350 एकड़ में विकसित राष्ट्रपति भवन के विभिन्न विशेष स्थानों पर समस्त संघ को भ्रमण कराया गया, जिसमें अशोका हॉल, दरबार हॉल, मुग़ल गार्डन आदि स्थान शामिल रहे।

क्रमशः...

सभी फोटोज देखें...

सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के कारण


सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के कारण

सम्यग्दर्शन किसको, कब और कैसे होता है ? ये तीन बातें ही मुख्यतया ज्ञातव्य हैं। वह भव्य जीव के ही होता है, अभव्य को नहीं। काललब्धि आदि के मिलने पर ही होता है, उसके बिना नहीं और अन्तरंग तथा बहिरंग कारणों से ही होता है बिना कारण के नहीं! हम और आप भव्य हैं या अभव्य ? काललब्धि आई है या नहीं ? इसका निर्णय तो सर्वज्ञ के सिवाय अन्य कोई नहीं कर सकता क्योंकि कोई अभव्य जीव ग्यारह अंग का ज्ञानी और निर्दोष, निरतिचार चारित्र का पालन करने वाला महातपस्वी मुनि होकर ही नवमें ग्रैवेयक में जा सकता है, हम और आप जैसे आज के साधारण जन नहीं। उसमें किस रूप से मिथ्यात्व रहता है उसका निर्णय साधारण जन नहीं कर सकते। वह तो सर्वज्ञगम्य ही है। हां, काललब्धि आदि कारणों को आगम से जान लेने की जिज्ञासा अवश्य होनी चाहिए। अब सर्वप्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारणों पर प्रकाश डाला जा रहा है। सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारण-सम्यक्त्व की प्राप्ति के उपाय, साधन या हेतु को कारण कहते हैं। आजकल यह ‘कारण’ ही विसंवाद का मूल कारण हो रहा है। जिसके होने पर कार्य हो जावे अथवा नहीं भी होवे किन्तु जिसके बिना नहीं होवे वह कारण है। जैसे मुनि मुद्रा के होने पर मोक्ष होवे अथवा नहीं भी होवे किन्तु उसके बिना नहीं हो सकता तथा जिसके होने पर नियम से कार्य हो जावे वह कारण, कारण न कहला कर ‘करण’ कहलाता है और वह साधकतम माना जाता है। जैसे कि अधःकरण आदि तीन करणरूप करण लब्धि के होने पर नियम से सम्यक्त्व रूप कार्य प्रकट हो जाता है। कुछ लोग कारणों को अत्यन्त हेय अथवा उपेक्षा बुद्धि से देखते हैं। इन्हीं बातों को इसमें सप्रमाण बताया गया है। यहां एक बात यह भी समझ लेने की है कि जिस प्रकार से हमें श्रीकुन्दकुन्द आचार्य के वचन प्रमाण हैं उसी प्रकार से श्री गुणधर आचार्य, श्री पुष्पदंत और श्री भूतबलि आचार्य के वचन भी प्रमाण होने चाहिए क्योंकि श्री गुणधर आचार्य का ‘कषायपाहुड़’ नामक सिद्धांत ग्रंथ तो द्वादशांग का अंश है जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है कि-

पुव्वम्मि पंचमम्मि दु दसमे, वत्थुम्मि पाहुडे तदिये।

पेज्जं पाहुडम्मि दु हवदि, कसायाणं पाहुडं णाम१।।१।।

क्रमशः...

सम्यग्ज्ञान पत्रिका



समाचार


सूचना

कोरोना आदि महामारी से सुरक्षित रहने के लिए जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य एवं पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के मार्गदर्शन में सोमवार 24 जनवरी से 30 जनवरी, रविवार तक सात दिन लगातार शांतिभक्ति मण्डल विधान आयोजित किया गया है, जो भी अपने परिवार को इस शांतिभक्ति विधान में ऑनलाइन सम्मिलित करना चाहें मात्र 5100/-रुपये की दानराशि प्रदान करके यह सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

प्रात: 6 बजे महाशांतिधारा में एवं मध्यान्ह 3.30 बजे मण्डल विधान में अपने परिवार का नाम पारस चैनल पर सुनें।

संपर्क-

9717331008, 7906961165, 7895712431, 7060049160

Whatsapp number-7599002108

प्रेरणा-

पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी

स्वाध्याय प्रतियोगिता


IMG-20220113-WA0004.jpg

उपासक धर्म


उपासक धर्म

आद्य जिन— श्री ऋषभदेव भगवान् तथा राजा श्रेयांस ये दोनों क्रम से व्रतविधि और दानविधि के आदिप्रवर्तक पुरुष हैं।अणुव्रत और महाव्रत आदि व्रतविधि का प्रचारक इस युग के आदि में सर्वप्रथम भगवान् ऋषभदेव ने किया है। और दानविधि का प्रचार भगवान को आहार दान देकर राजा श्रेयांस ने किया है। इसलिये ये दोनों महापुरुष व्रत और दान के आदिप्रवर्तक माने गये हैं। इनका परस्पर संबंध होने पर ही यहाँ भरतक्षेत्र में धर्म की स्थिति हुई है।

सम्यगदर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों को ‘धर्म’ कहते हैं । यह धर्म ही मुक्ति का मार्ग है जो कि प्रमाण से सिद्ध है। जो जीव रत्नत्रय स्वरूप इस मोक्षमार्ग में संचार नहीं करते हैं उनके लिये मोक्षस्थान तो दूर है ही, उनका संसार अतिशय लंबा—बहुत बड़ा हो जाता है। अर्थात् रत्नत्रय से रहित जीव अनंत काल तक इस चतुर्गतिरूप संसार में ही परिभ्रमण किया करते हैं।

यह धर्म संपूर्णधर्म— परिपूर्ण और देशधर्म — एकदेश के भेद से दो प्रकार का है। इनमें से प्रथम भेद में दिगंबर मुनि रहते हैं और द्वितीय भेद में गृहस्थ—श्रावक रहते हैं। वर्तमान में भी उस रत्नत्रय स्वरूप धर्म की प्रवृत्ति उसी मार्ग से— पूर्णधर्म और देशधर्मरूप से हो रही है। इसीलिये देशधर्म के अनुयायी गृहस्थ भी धर्म के कारण माने जाते हैं। तात्पर्य यही है कि गृहस्थधर्म भी मोक्षमार्ग है— मोक्ष का कारण है। सर्वथा निरर्थक, व्यर्थ अथवा हेय नहीं हैं। अन्यथा भगवान् आदिनाथ, भगवान, शांतिनाथ, सम्राट् भरत, मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र आदि महापुरुष गृहस्थाश्रम में प्रवेश क्यों करते ?

‘इस समय यहाँ इस कलिकाल — पंचमकाल में मुनियों का निवास जिनालय में हो रहा है और उन्हीं के निमित्त से धर्म एवं दान की प्रवृत्ति है। इस प्रकार मुनियों की स्थिति, धर्म और दान इन तीनों के मूल कारण गृहस्थ श्रावक हैं’। संप्रत्यत्र कलौ काले जिनगेहे मुनिस्थिति: । धर्मश्च दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम् ।।६।।।

आज इस पंचमकाल में मुनियों का संघ जिनमंदिर में ही प्राय: रहता है क्योंकि उत्तम संहनन का अभाव होने से वन में, पर्वतों पर या श्मशान आदि स्थानों में मुनिसंघ नहीं रह पाता है। ये मुनिराज भव्यजीवों को मुनिधर्म और श्रावकधर्म का उपदेश देते हैं। मोक्ष के अभिलाषी अथवा सुख के इच्छुक भव्यों को महाव्रत औरअणुव्रतआदि प्रदान करते हैं इसलिये धर्म की स्थिति और प्रवृत्ति इन मुनियों के द्वारा ही होती है तथा मुनियों को संघस्थ आर्यिका, क्षुल्लक— क्षुल्लिका को, व्रतियों को आहारदान देने का अवसर श्रावकों को मिलता है। आहार, औषधि, ज्ञान और अभय ये चारदान की प्रवृत्ति भी मुनिसंघ के निमित्त से ही होती है। और मुनियों के निवासरूप वसतिका को बनवाने वाले श्रावक हैं । यही कारण है कि गहस्थ श्रावक मुनियों की स्थिति, धर्म और दान की प्रवृत्ति के मूल कारण माने गये हैं। १. संप्रत्यत्र कलौ काले जिनगेहे मुनिस्थिति: । धर्मश्च दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम् ।।६।।

क्रमशः..

वास्तु


दिशाएँ बदल देती हैं दशा

वास्तु शास्त्र में दिशाओं को भी सुदृढ़ तर्कों के आधार पर धर्म से जोड़ा गया है। इन सभी दिशाओं की अपनी विशेषता और महत्त्व है। उदाहरणार्थ—पूर्व दिशा से सूर्य उदित होता है अत: सूर्योपासना में पूर्व का महत्त्व है। वास्तु शास्त्र में सूर्य की जीवनदायिनी ऊर्जा के कारण ही पूर्व दिशा को प्रधानता दी गई है। लाखों वर्ष पहले ही ऋषि-मुनियों ने पूर्व दिशा में उपासना करना श्रेष्ठ बताया था, जिस पर वास्तु शास्त्र ने अपने नियम बनाए। वास्तु शास्त्र पंच तत्वों एवं दिशाओं पर आधारित है, कहते हैं कि दिशाएँ दशा बदल देती हैं। सो वह काफी हद तक ठीक है और इसी सूत्र पर पूरा वास्तु शास्त्र आधारित है। बहुत से लोगों ने जब वास्तु अनुसार अपने घर में परिवर्तन किया तो उनको अपार सफलता मिली, पूर्व में आ रही समस्याओं से मुक्ति भी मिली।

अरुणोदय या सूर्योदय होने वाली दिशा को पूर्व कहा जाता है। विभिन्न वास्तु ग्रंथों में इसके लिए प्राक्, प्राची आदि विशेषणों का प्रयोग किया गया है। पूर्व दिशा पितृ स्थान की सूचक है। ऐसा माना गया है कि पितरों की उपासना इसी दिशा की ओर मुंह करके की जानी चाहिए। अग्नि तत्व भी पूर्व दिशा द्वारा प्रभावित होता है। इस दिशा के स्वामी इंद्र हैं। पूर्व दिशा सूर्य की ओजस्वी किरणों का प्रवेश द्वार है अत: वास्तु निर्माण में इस दिशा को सदैव खाली छोड़कर किरणों को स्वतन्त्र रूप से प्रविष्ट होने का मार्ग दिया जाना चाहिए।

पश्चिम

पश्चिम वह दिशा है, जहाँ सायंकाल सूर्यास्त होता है। वरूण या वायु को इस दिशा का अधिष्ठाता माना गया है अत: यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है। पश्चिम दिशा को सुख एवं समृद्धिदायी कहा गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि वायु चंचल और चलायमान है अत: जिस घर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में होता है, उस घर के निवासी प्रसन्नचित्त तथा विनोदप्रिय होते हैं। यह दिशा प्राय: अपना सामान्य प्रभाव ही दिखाती है।

क्रमशः...

श्री पद्मप्रभ भगवान


पदमप्रभुदेव भगवान का परिचय
Padamprabhu.jpg

परिचय

धातकीखंड द्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में सीता नदी के दक्षिण तट पर वत्सदेश है। उसके सुसीमा नगर के अधिपति अपराजित थे। किसी दिन भोगों से विरक्त होकर पिहितास्रव जिनेन्द्र के पास दीक्षा धारण कर ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। अन्त में ऊर्ध्व ग्रैवेयक के प्रीतिंकर विमान में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।

गर्भ और जन्म

इसी जम्बूद्वीप की कौशाम्बी नगरी में धरण महाराज की सुसीमा रानी ने माघ कृष्ण षष्ठी के दिन उक्त अहमिन्द्र को गर्भ में धारण किया। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन पुत्ररत्न को उत्पन्न किया। इन्द्रों ने जन्मोत्सव के बाद उनका नाम ‘पद्मप्रभ' रखा।

क्रमश:

आज का दिन - २४ जनवरी २०२२ (भारतीय समयानुसार)


Icon.jpg तिथीदर्पण Icon.jpg

दिनाँक २४ जनवरी २०२२
तिथी- माघ कृष्ण ७
दिन- सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४८
विक्रम संवत- २०७८

सूर्योदय ०७.०९
सूर्यास्त १८.०७


अथ माघ मास फल विचार



Calender.jpg



यदि दिनांक सूचना सही नहीं दिख रही हो तो कॅश मेमोरी समाप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें

०-९ अं
परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


कुल पृष्ठ- २९,६४९  •   इस साइट पर कुल देखे गये पृष्ठ- २,३६,७९,२१६   •   कुल लेख- १,०५८   •   कुल चित्र- 43,839