यक्ष—यक्षी—प्रतिमा विज्ञान

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यक्ष—यक्षी—प्रतिमा विज्ञान

डॉ. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी

(७) मातंग यक्ष

शास्त्रीय परम्परा— मातंग जिन सुपार्श्वनाथ‎ का यक्ष है। श्वेतांबर परम्परा में मातंग का वाहन गज और दिगंबर परम्परा में सिंह है।

श्वेताम्बर परम्परा — नर्वाणकलिका में चतुर्भुज मातंग को गजारूढ़ तथा दाहिने हाथों में बिल्वफल और पाश एवं बायें में नकुल और अंकुश से युक्त कहा गया है। आचारदिनकर में पाश एवं नकुल के स्थान पर क्रमश: नागपाश और वज्र का उल्लेख है। अन्य ग्रन्थों में निर्वाणकलिका के ही आयुध उल्लिखित हैं। मातंग के साथ गजवाहन एवं अंकुश और वज्र का प्रदर्शन हिन्दू देव इन्द्र का प्रभाव हो सकता है।

दिगम्बर परम्परा— प्रतिष्ठासारसंग्रह में द्विभुज यक्ष के करों में वज्र एवं दण्ड के प्रदर्शन का निर्देश है, पर वाहन का अनुल्लेख है। प्रतिष्ठासारोद्धार में मातंग का वाहन सिंह है और उसकी भुजाओं में दण्ड और शूल का वर्णन है।अपराजितपृच्छा में मातंग का वाहन मेष है और उसकी भुजाओं में गदा और पाश वर्णित है।

दक्षिण भारतीय परम्परा— दोनों परम्पराओं में मातंग (या वरनंदि) का वाहन सिंह है। श्वेतांबर एवं दिगंबर ग्रन्थों में द्विभुज यक्ष के हाथों में त्रिशूल एवं दण्ड का उल्लेख है। यक्ष—यक्षी—लक्षण में चतुर्भुज यक्ष के करों में त्रिशूल,दण्ड एवं दो में पद्म के साथ ध्यान किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है यहाँ भी दक्षिण भारतीय परम्परा उत्तर भारत की दिगंबर परम्परा से प्रभावित है।

मूर्ति परम्परा— विमलवसही के रंगमण्डप से सटे उत्तरी छज्जे पर एक देवता की अतिभंग में खड़ी षड्भुज मूर्ति उत्कीर्ण है। देवता का वाहन गज है। उसके चार हाथों में वज्र, पाश, अभयमुद्रा एवं जलपात्र हैं तथा शेष दो मुद्राएं व्यक्त करते हैं । देवता की सम्भावित पहचान मातंग से की जा सकती है। मातंग की कोई और स्वतन्त्र मूर्ति नहीं प्राप्त होती है।

विभिन्न क्षेत्रों की सुपार्श्वनाथ‎ की मूर्तियों (११वीं—१२ वीं शती ई.) में यक्ष का चित्रण प्राप्त होता है। पर इनमें पारम्परिक यक्ष नहीं निरूपित है। सुपाश्र्व से सम्बन्ध करने के उद्देश्य से यक्ष को सामान्यत: सर्पफणों के छत्र से युक्त दिखाया गया है। देवगढ़ के मन्दिर की मूर्ति (११वीं शती ई.) में तीन सर्पफणों के छत्र से युक्त द्विभुज यक्ष के हाथों में पुष्प एवं कलश है। राज्य संग्रहालय, लखनऊ (ज.९३५, ११ वीं सती ई.) की एक मूर्ति में तीन सर्पफणों के छत्रवाला यक्ष चतुर्भुज है जिसके हाथों में अभयमुद्रा, चक्र, चक्र एवं चक्र प्रदर्शित हैं। कुम्भारिया के नेमिनाथ मन्दिर के गूढ़मण्डप की मूर्ति (११५७ ई.) में गजारूढ़ यक्ष चतुर्भुज है और उसके हाथों में वरदमुद्रा, अंकुश, पाश एवं धन का थैला हैं। विमलवसही की देवकुलिका १९ की मूर्ति में भी गजारूढ़ यक्ष चतुर्भुज है और उसके करों में वरदमुद्रा, अंकुश, पाश एवं फल प्रदर्शित है।

(७) शान्ता (या काली) यक्षी

शास्त्रीय परम्परा — शान्ता (या काली) जिन सु पार्श्वनाथ‎ की यक्षी है। श्वेताम्बर परम्परा में चतुर्भुजा शान्ता गजवाहना एवं दिगंबर परम्परा में चतुर्भुजा काली वृषभवाहना है।

श्वेताम्बर परम्परा'—निर्वाणकलिका में गजवाहना शान्ता की दक्षिण भुजाओं में वरदमुद्रा और अक्षमाला एवं वाम में शूल और अभयमुद्रा का उल्लेख है।आचारदिनकर में अक्षमाला के स्थान पर मुक्तामाला एवं देवतामूर्तिप्रकरण में शूल के स्थान पर त्रिशूल के उल्लेख हैं। मन्त्राधिराजकल्प में यक्षी मालिनी एवं ज्वाला नामों से सम्बोधित है। ग्रन्थ के अनुसार गजवाहना यक्षी भयानक दर्शन वाली है और उसके शरीर से ज्वाला निकलती है। यक्षी के हाथों में वरदमुद्रा , अक्षमाला, पाश एवं अंकुश का वर्णन है।

दिगम्बर परम्परा —प्रतिष्ठासारसंग्रह में वृषभारूढ़ा काली के करों में घण्टा, त्रिशूल, फल एवं वरदमुद्रा के प्रदर्शन का निर्देश है।अन्य ग्रन्थों में त्रिशूल के स्थान पर शूल मिलता है। अपराजितपृच्छा में महिषवाहना काली का अष्टभुज रूप में ध्यान किया गया है। काली के हाथों में त्रिशूल, पाश, अंकुश, धनुष, वाण, चक्र,अभयमुद्रा एवं वरदमुद्रा का वर्णन है। दिगंबर परम्परा की वृषभवाहना यक्षी काली का स्वरूप हिन्दू काली और शिवा से प्रभावित प्रतीत होता है।

दक्षिण भारतीय परम्परा— दिगंबर परम्परा में वृषभवाहना यक्षी के करों में त्रिशूल,घण्टा, अभयमुद्रा एवं कटकमुद्रा का उल्लेख है। अज्ञातनाम श्वेताम्बर ग्रन्थ में चतुर्भुजा यक्षी का वाहन मयूर है। यक्षी की दो भुजाएँ अंजलिमुद्रा में हैं और शेष दो में वरदमुद्रा एवं अक्षयमाला हैं। यक्ष—यक्षी—लक्षण में वृषभारूढ़ा यक्षी के हाथों में घण्टा, त्रिशूल एवं वरदमुद्रा का वर्णन है। दक्षिण भारतीय दिगंबर परम्परा एवं यक्ष—यक्षी —लक्षण के विवरण उत्तर भारतीय दिगंबर परम्परा के समान है।

मूर्ति परम्परा: यक्षी की दो स्वतंत्र मूर्तियाँ देवगढ़ (मन्दिर १२,८६२ ई.) एवं बारभुजी गुफा के सामूहिक अकंनों में उत्कीर्ण हैं । इन मूर्तियों में यक्षी के साथ पारम्परिक विशेषताएं नहीं प्रदर्शित हैं। देवगढ़ में सुपार्श्व की चतुर्भुजा यक्षी मयूरवाहि (नी) नामवाली है। मयूरवाहन से युक्त यक्षी के करों में व्याख्यानमुद्रा, चामर—पद्म, पुस्तक एवं शंख प्रदर्शित हैं। यक्षी का निरूपण स्पष्टत: सरस्वती से प्रभावित है। बारभुजी गुफा की मूर्ति में यक्षी अष्टभुजा है और उसका वाहन सम्भवत: मयूर है। यक्षी के दक्षिण करों में वरमुद्रा, फलों से भरा पात्र, शूल एवं खड्ग और वाम में खेटक,शंख,मुद्गर एवं शूल प्रदर्शित हैं।

जिन संयुक्त मूर्तियों में भी यक्षी का पारम्पारिक या कोई स्वतन्त्र स्वरूप नहीं परिलक्षित होता है। देवगढ़ एवं राज्य संग्रहालय, लखनऊ की दो सु पार्श्वनाथ‎ की मूर्तियों में तीन सर्पफणों के छत्रोंवाली द्विभुज यक्षी के हाथों में पुष्प (या पद्म) और कलश प्रदर्शित हैं। कुम्भारिया के महावीर एवं नेमिनाथ मन्दिरों की दो मूर्तियों में यक्षी अम्बिका है। पर विमलवसही की देवकुलिका १९ की मूर्ति में सुपार्श्व के साथ यक्षी रूप में पद्मावती निरूपित है।

(८) विजय (या श्याम) यक्ष

शास्त्रीय परम्परा: विजय (या श्याम) जिन चन्द्रप्रभ का यक्ष है। श्वेताम्बर परम्परा में द्विभुज विजय का वाहन हंस है और दिगंबर परम्परा में चतुर्भुज श्याम का वाहन कपोत है।

श्वेताम्बर परम्परा—नर्वाणकलिका में द्विभुज विजय त्रिनेत्र है और उसका वाहन हंस है। विजय के दाहिने हाथ में चक्र और बायें में मुद्गर है। अन्य ग्रन्थों में भी इन्हीं लक्षणों के उल्लेख हैं। पद्मानन्दमहाकाव्य में चक्र के स्थान पर खड्ग का उल्लेख है।

दिगंबर परम्परा—प्रतिष्ठासारसंग्रह में चतुर्भुज श्याम त्रिनेत्र है और उसकी भुजाओं में फल, अक्षमाला, परशु एवं वरदमुद्रा हैं। ग्रन्थ में वाहन का अनुल्लेख है। प्रतिष्ठासारोद्धार में यक्ष का वाहन कपोत बताया गया है। अपराजितपृच्छा में यक्ष को विजय नाम से सम्बोधित किया गया है और उसके दो हाथों में फल और अक्षमाला के स्थान पर पाश और अभयमुद्रा के प्रदर्शन का निर्देशन है।

दक्षिण भारतीय परम्परा'— दगंबर परम्परा में हंस पर आरुढ़ यक्ष की एक भुजा से अभयमुद्रा के प्रदर्शन का उल्लेख है। अज्ञातनाम श्वेताम्बर ग्रन्थ में कपोत वाहन से युक्त चतुर्भुज यक्ष के हाथों में कशा, पाश, वरदमुद्रा एवं अंकुश वर्णित हैं। यक्ष—यक्षी—लक्षण में कपोत पर आरूढ़ यक्ष त्रिनेष है और उसके करों में फल, अक्षमाला, परशु एवं वरदमुद्रा का उल्लेख है। प्रस्तुत विवरण उत्तर भारतीय दिगंबर परम्परा का अनुकरण है।

मूर्ति—परम्परा: यक्ष की एक भी स्वतन्त्र मूर्ति नहीं मिली है। जिन—संयुक्त मूर्तियों (९ वीं—शती ई.) में चन्द्रप्रभ का यक्ष सामान्य लक्षणों वाला है। इनमें द्विभुज यक्ष अभयमुद्रा (या फल) एवं धन के थैले (या फल या कलश या पुष्प) से युक्त है। देवगढ़ के मन्दिर २१ की मूर्ति (११वीं शती ई.) में यक्ष चतुर्भुज है और उसके हाथों में अभयमुद्रा, गदा, पद्म एवं फल प्रदर्शित हैं।

(८) भुकुटि (या ज्वालामालिनी) यक्षी

शास्त्रीय परम्परा भृकुटि (या ज्वालामालिनी) जिन चन्द्रप्रभ की यक्षी है। श्वेतांबर परम्परा में चतुर्भुजा भृकुटि (या ज्वाला) का वाहन वराल (या मराल) है और और दिगंबर परम्परा में अष्टभुजा ज्वालामालिनी का वाहन महिष है।

श्वेतांबर परम्परा—निर्वाणकलिका में चतुर्भुजा भृकुटि का वाहन २९ वराह है और उसकी दाहिनी मुजाओं में खड्ग एवं मुद्गर और बायीं में फलक एवं परशु का वर्णन है। अन्य ग्रन्थ आयुधों के सन्दर्भ में एकमत हैं, पर वाहन के सन्दर्भ में उसमें पर्याप्त भिन्नता प्राप्त होती है। मन्त्राधिराजकल्प में यक्षी की भुजा में फलक के स्थान पर मातुर्लिंग मिलता है। आचारदिनकर एवं प्रवचनसारोद्धार में यक्ष का वाहन बिडाल या वरालक बताया गया है।त्रिषष्टिशलापुरुषचरित्र एवं पद्मानन्दमहाकाव्य में वाहन हंस है। देवतामूर्तिप्रकरण में वाहन सिंह है।

दिगंबर परम्परा—प्रतिष्ठासारसंग्रह में अष्टभुजा ज्वालिनी का वाहन महिष है और उसके करों में बाण, चक्र, त्रिशूल और पाश का वर्णन है। अन्य करों के आयुधों का उल्लेख नहीं किया गया है। प्रतिष्ठासारोद्वार में अष्टभुजा ज्वालिनी के हाथों में चक्र, धनुष, पाश, चर्म, त्रिशूल, बाण, मत्स्य एवं खड्ग के प्रदर्शन का निर्देश है। प्रतिष्ठातिलकम् में अष्टभुजा यक्षी के करों में पाश, चर्म एवं त्रिशूल के स्थान पर नागपाश, फलक एवं शूल के प्रदर्शन का उल्लेख है। अपराजितपृच्छा में ज्वालामालिनी चतुर्भुजा है। यक्षी का वाहन वृषभ है और उसके करों में घण्टा, त्रिशूल, फल एवं वरदमुद्रा प्रदर्शित है। यक्षी का निरूपण ग्यारहवीं महाविद्या महाज्वाला (या ज्वालामालिनी) से प्रभावित है।

दक्षिण भारतीय परम्परा— दगंबर परम्परा में वृषभवाहना यक्षों अष्टभुजा है। ज्वालामय मुकुट से शोभित यक्षी के दक्षिण करों में त्रिशूल, शर, सर्प एवं अभयमुद्रा, और वाम में वज्र, चाप, सर्प एवं कटकमुद्रा का वर्णन है। श्वेतांबर ग्रन्थों में महिषवाहना यक्षी अष्टभुजा है। अज्ञातनाम एक ग्रन्थ में यक्षी के हाथों में चक्र,मकर, पताका, बाण,त्रिशूल, पाश एवं वरदमुद्रा वर्णित हैं। यक्ष यक्षी—लक्षण में बाण , चक्र त्रिशूल, वरदमुद्रा (या फल), कार्मुक, पाश, झष एवं खेटक धारण करने का उल्लेख है। स्पष्टत: दक्षिण भारत की दोनों परम्पराओं के विवरण उत्तर भारत की दिगंबर परम्परा से प्रभावित हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पद्मावती के बाद कर्नाटक में ज्वालामालिनी ही सर्वाधिक लोकप्रिय थी। ज्वालामालिनी के बाद लोकप्रियता के क्रम में अम्बिका का नाम था।

मूर्ति—परम्परा : यक्षी की केवल दो स्वतन्त्र मूर्तियां मिली है। ये मूर्तियां देवगढ़ (मन्दिर १२, ८६२ ई.) एवं बारभुजी गुफा के सामूहिक चित्रणों में उत्कीर्ण हैं। देवगढ़ में चन्द्रप्रभ के साथ सुमालिनी नाम की चतुर्भुजा यक्षी आमूर्तित है। यक्षी के तीन हाथों में खड्ग, अभयमुद्रा एवं खेटक प्रदर्शित हैं, चौथी भुजा जानु पर स्थित है। वाम पाश्र्व में सिंहवाहन उत्कीर्ण है। सुमालिनी का लाक्षणिक स्वरूप निश्चित ही १६ वीं महाविद्या महामानसी से प्रभावित है। वारभुजी गुफा की मूर्ति में सिहवाहना यक्षी द्वादशभुजा है। यक्षी की दाहिनी भुजाओं में वरदमुद्रा, कृपाण, चक्र, बाण, गदा एवं खड्ग और बायी में वरदमुद्रा, खेटक, धनुष, पाश एवं घण्ट प्रदर्शित हैं। सिंहवाहन के अतिरिक्त मूर्ति की अन्य विशेषताएं सामान्यत: दिगंबर ग्रन्थों से मेल खाती हैं।

जिन— संयुक्त मूर्तियां (९वीं—१२वीं शती ई.) कौशाम्बी, देवगढ़, खजुराहो,एवं राज्य संग्रहालय, लखनऊ में हैं। इनमें अधिकाशत: द्विभुजा यक्षी सामान्य लक्षणों वाली है। यक्षी के हाथों में अभयमुद्रा (या पुष्प) और फल (या कलश या पुष्प) प्रदर्शित हैं। देवगढ़ (मन्दिर २०, २१) एवं खजुराहो (मन्दिर ३२) की तीन चन्द्रप्रभ मूर्तियों में यक्षी चतुर्भुजा है। यक्षी के दो हाथों में पद्म एवं पुस्तक, और शेष दो में अभयमुद्रा, कलश एवं फल में से कोई दो प्रदर्शित हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि जिन—संयुक्त मूर्तियों में भी यक्षी को पारम्परिक या स्वतन्त्र स्वरूप में अभिव्यक्ति नहीं मिली।

(९) अजित यक्ष

शास्त्रीय परम्परा अजित जिन सुविधिनाथ (या पुष्पदन्त) का यक्ष है। दोनों परम्पराओं में चतुर्भुज यक्ष का वाहन कूर्म है।

श्वेतांबर परम्परा—निर्वाणकलिका में चतुर्भुज अजित के दक्षिण करों में मातुलिंग एवं अक्षसूत्र और वाम में नकुल एवं शूल का वर्णन है। अन्य ग्रन्थों में भी इन्हीं आयुधों के उल्लेख हैं। पर मन्त्राधिराजकल्प में अक्षसूत्र के स्थान पर अभयमुद्रा और आचारदिनकर में शूल के स्थान पर अतुल रत्नराशि के प्रदर्शन के निर्देश हैं।

दिगंबर परम्परा—प्रतिष्ठासारसंग्रह में कूर्म पर आरूढ़ अजित के हाथों में फल, अक्षसूत्र, शक्ति एवं वरदमुद्रा वर्णित हैं। परवर्ती ग्रन्थों में भी इन्हीं आयुधों के उल्लेख हैं। उपर्युक्त से स्पष्ट है कि दिगंबर परम्परा श्वेतांबर परम्परा की अनुगामिनी है। नकुल के स्थान पर वरदमुद्रा का उल्लेख दिगंबर परम्परा की नवीनता है।

दक्षिण भारतीय परम्परा: दोनों परम्परा के ग्रन्थों में कूर्म पर आरूढ़ अजित चतुर्भुज है। दिगंबर ग्रन्थ में यक्ष के दाहिने हाथों में अक्षमाला एवं अभयमुद्रा और बायें में शूल एवं फल का उल्लेख है। अज्ञातनाम श्वेतांबर ग्रन्थ में यक्ष के हाथों में कशा, दण्ड, त्रिशूल एवं परशु के प्रदर्शन का विधान है।यक्ष—यक्षी—लक्षण में फल , अक्षसूत्र, त्रिशूल एवं वरदमुद्रा का उल्लेख है। दोनों परम्पराओं के विवरण उत्तर भारतीय दिगंबर परम्परा से प्रभावित प्रतीत होते हैं। अजित यक्ष की एक भी स्वतन्त्रत या जिन—संयुक्त मूर्ति नहीं मिली है।

(९) सुतारा (या महाकाली) यक्षी

शास्त्रीय परम्परा: सुतारा (या महाकाली) जिन सुविधिनाथ (या पुष्पदन्त) की यक्षी है। श्वेताम्बर परम्परा में यक्षी को सुतारा (या चाण्डालिका) और दिगंबर परम्परा में महाकाली कहा गया है।

श्वेताम्बर परम्परा—नर्वाणकलिका में वृषभवाहना सुतारा चतुर्भुजा है। यक्षी के दाहिने हाथों वरदमुद्रा एवं अक्षमाला और बायें में कलश एवं अंकुश वर्णित है। अन्य ग्रन्थों में भी इन्हीं लक्षणों के उल्लेख हैं।

दिगम्बर परम्परा—प्रतिष्ठासारसंग्रह में कूर्मवाहना महाकाली चतुर्भुजा है। यक्षी तीन भुजाओं में वज्र, मुद्गर और फल लिए हैं। चौथी भुजा की सामग्री का अनुल्लेख है। अन्य ग्रन्थों में चौथी भुजा में वरदमुद्रा बतायी गयी है। अपराजितपृच्छा में मुद्गर और फल के स्थान पर गदा और अभयमुद्रा का उल्लेख है। यक्षी का स्वरूप सम्भवत: ८ वीं महाविद्या महाकाली से प्रभावित है। यक्षी का कूर्मवाहन अजित यक्ष के कूर्मवाहन से सम्बन्धित हो सकता है।

दक्षिण भारतीय परम्परा— दिगंबर ग्रन्थ में चतुर्भुज यक्षी के ऊपर हाथों में दण्ड एवं फल (या वज्र) और नीचे के हाथों में अभय एवं कटक मुद्रा का उल्लेख है। अज्ञातनाम श्वेताम्बर ग्रन्थ में सिंहवाहना यक्षी के करों में खड्ग, फल, वज्र एवं पद्म वर्णित हैं। यक्ष—यक्षी—लक्षण में कूर्मवाहना यक्षी के करों में सर्वज्ञ (आयुध या ज्ञानमुद्रा) मुद्गर, फल एवं वरदमुद्रा के प्रदर्शन का निर्देश हैं।

मूर्ति परम्परा: महाकाली की केवल दो स्वतन्त्र मूर्तियां मिली हैं। ये मूर्तियां देवगढ़ (मन्दिर १२,८६२ ई.) और बारभुजी गुफा के सामूहिक चित्रणों में उत्कीर्ण है। इनमें देवी के निरूपण में पारम्परिक विशेषताएँ नहीं प्रदर्शित है।देवगढ़ में पुष्पदन्त के साथ बहुरूपी नाम की सामान्य लक्षणों वाली द्विभुजी यक्षी आमूर्तित है। यक्षी के दाहिने हाथ में चामर—पद्म है और बायां जानु पर स्थित है। बारभुजी गुफा की मूर्ति में दशभुजा यक्षी वृषभवाहना है। यक्षी के दक्षिण करो में वरदमुद्रा, चक्र, पक्षी, फलों से भरा पात्र एवं चक्र और वाम में अर्धचन्द्र, तर्जनीमुद्रा, कर्प, पुष्प एवं मयूरपंख (या वृक्ष की डाल) प्रदर्शित है।

(१०) ब्रह्मयक्ष

शास्त्रीय परम्परा: ब्रह्म जिन शीतलनाथ का यक्ष है। दोनों परम्पराओं में चतुर्भुज एवं अष्टभुज ब्रह्म यक्ष का वाहन पद्म बताया गया है।

श्वेताम्बर परम्परा'—निर्वाणकलिका में चतुर्मुख और त्रिनेत्र ब्रह्मा के दाहिने हाथों में मातुलिंग, मुद्गर, पाश एवं अभयमुद्रा और बायें में नकुल, गदा, अंकुश एवं अक्षसूत्र का वर्णन है। अन्य ग्रन्थों में भी इन्हीं आयुधों का उल्लेख है। मन्त्राधिराजकल्प में अभयमुद्रा के स्थान पर वरदमुद्रा का उल्लेख है।आचारदिनकर में यक्ष दस भुजाओं और बारह नेत्रों वाला है। उसकी आठ भुजाओं में निर्वाणकलिका के आयुधों का और शेष दो में पाश एवं पद्य का उल्लेख है।

दिगंबर परम्परा—प्रतिष्ठारसंग्रह में चतुर्मुख ब्रह्म सरोज पर आसीन है। ग्रन्थ में उसके आयुधों का अनुल्लेख है। प्रतिष्ठासारोद्धार में केवल छह हाथों के ही आयुधों का उल्लेख है। दाहिने हाथों में बाण, खड्ग, वरदमुद्रा और बायें में धनुष, दण्ड, खेटक वर्णित हैं। प्रतिष्ठातिलकम् में यक्ष की केवल सात भुजाओं के ही आयुध स्पष्ट हैं।

प्रतिष्ठासारोद्धार से भिन्न प्रतिष्ठातिलकम् में वज्र और परशु का उल्लेख है, किन्तु बाण का अनुल्लेख है। अपराजितपृच्छा में ब्रह्म चतुर्भुज है और उसका वाहन हंस है। यक्ष के करों में पाश, अंकुश, अभयमुद्रा और वरदमुद्रा का वर्णन है।

यक्ष का नाम (ब्रह्म), उसका चतुर्मुख होना, पद्य और हंसवाहनों के उल्लेख तथा एक हाथ में अक्षमाला का प्रदर्श्ना—ये सभी बातें ब्रह्मयक्ष के निरूपण में हिन्दूदेव ब्रह्मा—प्रजापति का प्रभाव दरशाती हैं।

दक्षिण भारतीय परम्परा— दगम्बर ग्रन्थ में पद्मकलिका पर आसीन अष्टभुज ब्रह्मेश्वर (या ब्रह्मा) यक्ष को त्रिनेत्र एवं चतुर्मुख बताया गया है। यक्ष के छह हाथों में गदा, खड्ग, खेटक, एवं दण्ड जैसे आयुधों और शेष दो में अभय एवं कटक—मुद्रा का उल्लेख है। अज्ञातनाम श्वेताम्बर ग्रन्थ में सिंह पर आरूढ़ यक्ष अष्टभुज है और उसके हाथों में खड्ग, खेटक, बाण, धनुष, परशु, वज्र, पाश एवं अभय (या वरद) मुद्रा का वर्णन है। यक्ष—यक्षी—लक्षण में पद्म वाहन से युक्त चतुर्भुज एवं अष्टभुज यक्ष के करों में खड्ग, खेटक, वरदमुद्रा, बाण, धनुष, दण्ड, परशु एवं वज्र, के प्रदर्शन का निर्देश है। उपर्युक्त से स्पष्ट है कि दोनों परम्पराओं के आयुधों एवं वाहन के सन्दर्भ में विवरण उत्तर भारतीय दिगंबर परम्परा से प्रभावित हैं। ब्रह्म यक्ष की एक भी स्वतन्त्र या जिन—संयुक्त मूर्ति नहीं है।

(१०) अशोका (या मानवी) यक्षी

शास्त्रीय परम्परा: अशोका (या मानवी) जिन शीतलनाथ की यक्षी है। श्वेताम्बर परम्परा में चतुर्भुजा अशोका (या गोमेधिका) पद्मवाहना है। और दिगम्बर परम्परा में चतुर्भुजा मानवी शूकरवाहना है।

श्वेताम्बर परम्परा' —निर्वाणकलिका में पद्मवाहना अशोका के दक्षिण करों में वरदमुद्रा एवं पाश और वाम में फल एवं अंकुश वर्णित हैं। अन्य ग्रन्थों में भी यही लक्षण है। आचारदिनकर में नृत्यरत अप्सराओं से वेष्टित यक्षी के एक हाथ में फल के स्थान पर वष्र्म का उल्लेख है। देवतामूर्तिप्रकरण में पाश के स्थान पर नामपाश दिया गया है।

दिगम्बर परम्परा—'प्रतिष्ठासारसंग्रह में शूकरवाहाना मानवी के तीन हाथों में फल, वरदमुद्रा एवं झष के प्रदर्शन का निर्दोश है, चौथे हाथ के आयुध का अनुल्लेख है। प्रतिष्ठासारोद्धार से मानवी का वाहन काला नाग है। और उसकी चौथी भुजा में पाश का उल्लेख है। प्रतिष्ठातिलकम् में पुन: तीन ही हाथों के आयुधों के उल्लेख के कारण पाश का अनुल्लख है, और वरदमुद्रा के स्थान पर माला का उल्लेख है। अपराजितपृच्छा में शूकरवाहना मानवी के करों में पाश, अंकुश, फल और वरदमुद्रा का वर्णन है। मानवीय का स्वरूप दिगंबर परम्परा की १२वीं महाविद्या मानवी से प्रभावित है।

दक्षिण भारतीय परम्परा— दिगंबर ग्रन्थ में चतुर्भुजा यक्षी के ऊपरी हाथों में अक्षमाला एवं झष और निचले में अभय—एवं कटक —मुद्रा का उल्लेख है। अज्ञातनाम श्वेताम्बर ग्रन्थ में द्विभुजा यक्षी मकरवाहना है एवं उसके आयुध वरदमुद्रा एवं पद्म हैं। यक्ष—यक्षी—लक्षण में चतुर्भुजा मानवी का वाहन कृष्ण शूकर है और उसके हाथों में झष, अक्षसूत्र, हार एवं वरदमुद्रा का वर्णन है।७८ शूकरवाहन एवं झष का प्रदर्शन सम्भवत: उत्तर भारतीय दिगंबर परम्परा से प्रभावित है।

मूर्ति परम्परा -यक्षी की केवल दो स्वतन्त्र मूर्तियां मिली हैं। ये मूर्तियां देवगढ़ (मन्दिर १२,८६२) एवं वारभुजी गुफा के सामूहिक अंकनों में उत्कीर्ण है। इनमें यक्षी के साथ पारम्परिक विशेषताएं नहीं प्रदर्शित है। देवगढ़ में शीतलनाथ के साथ ‘श्रीया देवी’ नाम की चतुर्भुजा यक्षी निरूपित है। यक्षी के तीन हाथों में फल, पद्म, फल (या कलश) प्रदर्शित हैं और चौथी भुजा जानु पर स्थित है। यक्षी के दोनों पार्श्व में वृक्ष के तने उत्कीर्ण हैं। सम्भव है कि श्रीयादेवी नाम श्रीदेवी का सूचक हो जो लक्ष्मी का ही दूसरा नाम है। बारभुजी गुफा की मूर्ति में चतुर्भुजा यक्षी का वाहन कोई पशु है। यक्षी के नीचे के हाथों में एवं दण्ड और ऊपरी हाथों में चक्र एवं शंख (या फल) प्रदर्शित है।


१. मातंगयक्षं नीलवर्ण गज वाहनं चतुर्भुजं बिल्वपाशयुक्तदक्षिणपार्णि नकुलकांकुशान्वितवामपार्णि चेति।निर्वाणकलिका १८.७

२. नीलोगजेन्द्रगमनश्च चतुर्भुजोपि बिल्वाहिपाशयुतदक्षिणपाणियुग्म:। वज्रकुशप्रगुणितीकृतवामपाणिर्मातंगराड् ...........।। आचारदिनकर ३४, पृष्ठ १७४

३. त्रि.श.पु.च.३.५.११०—११; पद्मानन्दमहाकाव्य: परिशिष्ट—सु पार्श्वनाथ‎ १८—१९; मन्त्राधिराजकल्प ३.३२

४. सुपार्श्वनाथ‎ देवस्य यक्षो मातंग संज्ञक :। द्विभुजो वज्रदण्डोसौ कृष्णवर्ण: प्रकीर्तित:।।प्रतिष्ठासारसंग्रह ५.२९

५. सिंहाधिरोहस्य सदण्डशूलसव्यान्यपाणे: कुटिलाननस्य। प्रतिष्ठासारोद्धार ३.१३५; प्रतिष्ठातिलकम् ७.७, पृ.३३३

६. मातंग : स्याद् गदापाशौ द्विभुजो मेषवाहन:। अपराजितपृच्छा २२१.४७

७. रामचन्द्रन, टी.एन., पू.नि., पृ.२००

८. देवगढ़ की मूर्तियों पर श्वेतांबर परम्परा की महाविद्या रोहिणी का प्रभाव है। गोवाहना रोहिणी महाविद्या की भुजाओं में बाण, अक्षमाला, धनुष एवं शंख प्रदर्शित हैं।

९. कुम्भारिया एवं विमलवसही की उपर्युक्त दोनों ही मूर्तियों की लाक्षणिक विशेषताएं श्वेतांबर ग्रन्र्थों में वर्णित मातंग की विशेषताओं से मेल खाती हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि गुजरात एवं राजस्थान के श्वेतांबर स्थलों पर इन्हीं लक्षणों वाले यक्ष को सभी जिनों के साथ निरूपित किया गया है और उसकी पहचान सर्वानुभूति से की गई है। ज्ञातव्य है कि कुम्भारिया की सुपार्श्व—मूर्ति में यक्षी अम्बिका ही है ।

१०. शान्तादेवी सुवर्णवर्णा गजवाहनां चतुर्भुजां वरदाक्षसूत्रयुक्तदक्षिणकरां शूलाभययुतवामहस्ता चेती। निर्वाणकलिका १८.७, त्रि.श.पु.च. ३.५.११२—१३; पद्मानन्दमहाकाव्य: परिशिष्ट—सु पार्श्वनाथ‎ १९-२०

११. ....... लसन्मुक्तामालां वरदमपि सव्यान्यकरयो:। आचारदिनकर ३४, पृ, १७६

१२. वरदं चाक्षसूत्रं चाभयं तस्मात्त्रिशूलकम् । देवतामूर्तिप्रकण ७.३१

१३. ज्वालाकरालवदना द्विरदेन्द्रयाना दद्यात् सुखं वरभथो जपमालिकां च । पाशं शृणि मम च पाणिचतुष्टयेन ज्वालाभिधा च दधती किल मालिनीव।। मन्त्राधिराजकल्प ३.५६.२४

१४. सितगोवृषभारूढा कालिदेवी चतुर्भुजा । घण्टात्रिशूलसंयुक्तफलहस्तावरप्रदा।। प्रतिष्ठासार संग्रह ५.३०;

१५. सिता गोवृषगा घण्टां फलशूलवरावृताम् । प्रतिष्ठासारोद्वार ३.१६१प्रतिष्ठातिलकम् ७.७. पृ.३४२

१६. कृष्णाऽष्टबाहुस्त्रिशूलपाशांकुशधनु:शरा। चक्रमामयवरदाश्च महिषस्था च कालिका।। अपराजितपृच्छा २२१.२१

१७. राव, टी.ए. गोपीनाथ, एलिमेन्ट्स ऑव हिन्दू आइकानोग्राफी, खं, १, भाग २, वाराणसी, १९७१ (पु.मु.), पृ.३६६

१८. रामचन्द्रन, टी.एन., पू.नि., पृ.२००

१९. जि.इ.दे., पृ. १०५

२०. मित्रा, देवला, पू.नि., पृ. १२१

२१. तीन सर्पफणों के छत्र वाली यक्षी का वाहन सम्भवत: कुक्कुट—सर्प है और उसके करों में वरदमुद्रा, अंकुश, पद्म एवं फल प्रदर्शित हैं।

२२. विजययक्षं हरितवर्ण त्रिनेत्रं हंसवाहनं द्विभुजं दक्षिणहस्तेचव्र वामे मुद्गरमिति। निर्वाणकलिका १८.८

२३. त्रि.श.पु.च.३.६.१०८; मन्त्राधिराजकल्प ३.३३; आचारदिनकर ३४, पृ.१७४; पद्मानन्दमहाकाव्य; परिशिष्ट—चन्द्र प्रभ १७; त्रि.श.पु.च.एवं पद्मानन्दमहाकाव्य में यक्ष के त्रिनेत्र होने का उल्लेख नहीं है।

२४. चन्द्र प्रभजिनेन्द्रस्य श्यामो यक्ष: त्रिलोचन:। फलाक्षसूत्रकं धत्ते परसुं च वरप्रद: ।।प्रतिष्ठासारसंग्रह ५.३१

२५. प्रतिष्ठासारोद्धार ३.१३६

२६. पर्शुपाशाभयवरा: कपोते विजय: । अपराजितपृच्छा २२१.४८

२७. रामचन्द्रन, टी.एन., पू.नि., पृ.२०१

२८. जिन संयुक्त मूर्तियां देवगढ़, खजुराहों, राज्य संग्रहालय, लखनऊ (जे.८८१) एवं इलाहाबाद संग्रहालय (२९५) में हैं।

२९. ग्रन्थ के पाद टिप्पणी में उसका पाठान्तर विराल दिया है।

३०. भृकुटिदेवी पीतवर्णा वराह (विढ़ाल) वाहनां चतुर्भुजां। खड्गमुद्गरान्वितदक्षिणभुजां फलकपरशुयुतवामहस्तां चेति।। निर्वाणकलिका १८.८

३१. पीता वराहगमना ह्यसिमुद्गरांका भूयात् कुठारफलभृद् भुकुटि: सुखाय। मन्त्राधिराजकल्प ३.५७

३२. आचारदिनकर ३४, पृ. १७६, प्रवचनसारोद्धार ८

३३. त्रि.श.पु.च. ३.६.१०९-१०

३४. पद्मानन्दमहाकाव्य : परिशिष्ट—चन्द्रप्रभ १८-१९

३५. देवतामूर्तिप्रकण ७.३३

३६. ज्वालिनी मलिषारूढ़ा देवी श्वेता भुजाष्ठका। काण्डंचव्रंत्रिशूलं च धत्ते पाशं च मू (क) षं ।। प्रतिष्ठासारसंग्रह ५.३२

३७. चन्द्रोज्ज्वलां चक्रशरासपाश चर्मत्रिशूलेषुझपासिहस्ताम् । प्रतिष्ठासारोद्धार ३.१६२

३८. चव्रं चापमहीशपाशफलके सव्र्यैश्चतुर्भि: करैरम्यै: । शूलभिषुं झपं ज्वलदसिं धत्तेऽत्र या दुर्जया।। प्रतिष्ठातिलकम् ७.८,पृ.३४३

३९. कृष्णा चतुर्भुजा घण्टा त्रिशूलं च फलं वरम् । पद्मासना वृषारूढ़ा कामदा ज्वालमालिनी।। अपराजितपृच्छा २२१.२२

४०. जैन परम्पंरा में महाविद्या महाज्वाला का वाहन महिष, शूकर, हंस एवं बिडाल बताया गया है। दिगंबर ग्रन्थों में महाविद्या के हाथों में खड्ग, खेटक, बाण और धनुष प्रदर्शित हैं।

४१. रामचन्द्रन , टी.एन.,पू.नि. पृ.२०१

४२. देसाई, पी.बी. जैनिजम इन साऊथ इण्डिया ऐण्ड सम जैन एपिग्राफ्स, शालापुर, १९६३ , पृ. १७२

४३. जि. इ.दे. पृ.१०७

४४. श्वेतांबर परम्परा में सिंहवाहना महामानसी के मुख्य आयुध खड्ग एवं खेटक हैं।

४५. मित्रा, देवला, पू.नि., पृ. १३१

४६. अजितयक्षं श्वेतवर्ण कूर्मवाहनं चतुर्भुजं मातुलिंगाक्षसूत्रयुक्तदक्षिणापार्णि नकुलकुन्तान्वितवामपार्णि चेति। निर्वाणकलिका १८.९ , द्रष्टव्य, त्रि.श.पु.च.३.६.१३८—३९

४७. मन्त्राधिराजकल्प ३.३३, आचारदिनकर ३४, पृ.१७४

४८. अजित : पुष्पदन्तस्य यक्ष: श्वेतश्चतुर्भुज:। फलाक्षसूत्रशक्तयाढ्यंवरद: कुर्मवाहन:।।प्रतिष्ठासारसंग्रह ५.३३ द्रष्टव्य, प्रतिष्ठासारोद्धार: ३.१३७; प्रतिष्ठातिलकम् ७.९, पृ.३३३; अपराजितपृच्छा २२१.४८

४९. रामचन्द्रन, टी.एन., पू.नि. २०१

५०. केवल शक्ति के स्थान पर त्रिशूल का उल्लेख है।

५१. सुतारादेवी गौरवर्णा वृषवाहनां चतुर्भुजां वरदाक्षसूत्रयुक्तदक्षिणभुजां कलशांकुशाहन्वतवामपाणि चेति।।निर्वाणकलिका१८.९

५२. त्रि.श.पु.च. ३.७.१४०—४१, पद्मानन्दमहाकाव्य: परिशिष्ट — सुविधिनाथ १८—१९, मन्त्राधिराजकल्प ३.५७, आचारदिनकर ३४,पृ.१७६

५३. देवी तथा महाकाली विनीता कूर्मवाहना । सवज्रमुद्गरा (कृष्णा) फलहस्ता चतुर्भुजा ।।प्रतिष्ठारसंग्रह ५.३४

५४. प्रतिष्ठासारोद्धार ३.१६३, प्रतिष्ठातिलकम् ७.९, पृ.३४३

५५. चतुर्भुजा कृष्णवर्णा वज्र गदावराभया:। अपराजितपृच्छा २२१.२३

५६. स्मरणीय है कि सुविधिनाथ (या पुष्पदंत) का लांछन मकर है।

५७. रामचन्द्र,टी.एन., पू.नि. पृ. २०२

५८. जि.इ.दे., पृ. १०७

५९. मित्रा. देबला, पू. नि., पृ. १३१

६०. ब्रह्मयक्षं चतुर्मुखं त्रिनेत्रं धवलवर्ण पद्मासनभष्टभुजं मातुलिंगमुद्गरपाशाभयुक्तदक्षिणपाणिं नकुलगदांकुशाक्षसूत्रान्वितवामपार्णि चेति। निर्वाणकलिका १८.१०

६१. त्रि.श.पु.च. ३.८.१११—१२, पद्मानन्दमहाकाव्य: परिशिष्ट—शीतलनाथ १७-१८

६२. मन्त्राधिराजकल्प ३.३४

६३. वसुमितभुजयुक् चतुर्वक्त्रभाग् द्वादशाक्षो रुचा सरसिजविहिजासनो मातुलिंगाभये पाशयुग्मुद्गरं दधेदतिगुणमेवहस्तोत्करे दक्षिणे चापि वामे गदां सृणिनकुलसरोद्भवाक्षावलीब्रह्मयनाया सुपर्वोत्तम:। आचारदिनकर ३४,पृ.१७४

६४.शीतलस्य जिनेन्द्रस्य बह्मयक्षश्चतुर्मुख्स:। अष्टबाहु: सरोजस्थ: श्वेतवर्ण: प्रकीर्तित: ।।।प्रतिष्ठासारसंग्रह ५.३५

६५. श्री वृक्षकेतननतो धनुदण्डखेटवज्ञ— (? वज्र—) ढ्यसव्यसय इन्दुसितोम्बुजस्थ:। ब्रह्मासरश्वधितिखड्गवरप्रदानव्यप्रान्यपाणिरुपयातु चतुर्मुखोर्चाम् ।। प्रतिष्ठासारोद्धार ३.१३८

६६. सचापदण्डोर्जितखेटवज्रसव्योद्धपाणि नुतशीतलेशम् । सव्यान्यहस्तेषु परश्वेसीष्टदानं यजे ब्रह्मसमाख्ययक्षम् ।।प्रतिष्ठातिलकम् ७.१०, पृष्ठ ३३४

६७. पाशाङ्कुशाभयवरा ब्रह्मा स्याद्धंसवाहन: । अपराजितपृच्छा २२१.४९

६८. रामचन्द्रन, टी.एन., पू.नि., पृ. २०२—२०३

६९. अशोकां देवी मुद्गवर्णां पद्मवाहनां चतुर्भुजां वरदपाशयुक्तदक्षिणकरां फलांकुशयुक्तवामकरां चेति। निर्वाणकलिका १८.१०

७०. त्रि.श.पु.च.३.८.११३—११४, पद्मानन्दमहाकाव्य: परिशिष्ट—शीतलनाथ १९-२०, मन्त्राधिराजकल्प ३.५८

७१. .... वामे चांकुशवष्र्मेणी बहुगुणाऽशोका विशोका जनं कुर्यादप्सरसां गणै: प्ररिवृता नृत्यद्भिरानन्दितै:। आचारदिनकर ३४,पृ. १७६

७२. वरदं नागपाशं चांकुशं वै बीजपूरकम् । देवतामूर्तिप्रकरण ७.३७

७३. मानवी च हरिद्वर्णा झषहस्ताचरूर्भुज: । कृष्णशूकरयानस्था फलहस्तवरप्रदा।। प्रतिष्ठासारसंग्रह ५.३६

७४. झषदामरुचकदानोचितहस्तां कृष्णकालगां हरिताम् । प्रतिष्ठासारोद्धार ३.१६४

७५. ऊध्र्वद्धिहस्तोद् धृतमत्स्यमालां अधोद्विहस्ताक्षफलप्रदानाम् । प्रतिष्ठातिलकम् ७.१०. पृ.३४३

७६. चतुर्भुजा श्यामवर्णा पाशाङ्कशफलंवरम् । सूकरोपरिसंस्था व मानवी चार्धदायिनी।। अपराजितपृच्छा २२१.२४

७७. यह प्रकाव यक्षी के नाम, कूकरवाहन एवं भुजा में झष के प्रदर्शन के सन्दर्भ में देखा जा सकता है। दिगंबर परम्परा में महाविद्या मानवी का वाहन शूकर है और उसके करों में झष, त्रिशूल एवं खड्ग प्रदर्शित हैं।

७८. रामचन्द्रन टी.एन., पू.नि., पृ.२०३

७९. जि.इ.दे., पृ. १०७

८०. मित्रा, देवला, पू.नि., पृ.१३१