यमकशैल पर देवभवन एवं पांडुकवन में जिनमंदिर

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यमकशैल पर देवभवन एवं पांडुकवन में जिनमंदिर

निषधपर्वत के उत्तर में एक हजार योजन जाकर सीतोदा नदी के दोनों किनारों पर यमकशैल स्थित हैं३।।२०७५।।
नदी के पूर्व में प्रकाशमान उत्तम रत्नों के किरणसमूह से सहित यमकूट और पश्चिम में मेघकूट है।।२०७६।।
इन दोनों पर्वतों का अन्तराल पाँच सौ योजन मात्र है। प्रत्येक पर्वत की उँचाई दो हजार योजन और विस्तार मूल में एक हजार योजन प्रमाण है।।२०७७।। ५००। २०००। १०००।
उन प्रत्येक पर्वतों का मध्य विस्तार सात सौ पचास योजन और शिखरतल में विस्तार का प्रमाण पाँच सौ योजन है।।२०७८।। ७५०। ५००।
इनकी परिधियाँ तिगुणे विस्तार से अधिक हैं। यमक पर्वतों की गहराई अपनी उँचाई के चतुर्थ भाग प्रमाण है।।२०७९।।
प्रत्येक यमक पर्वत के ऊपर बहुमध्यभाग में पाँच के घन अर्थात् एक सौ पच्चीस कोस विस्तार से सहित और इससे दूनी उँचाई से सम्पन्न दिव्य प्रासाद हैं।।२०८०।। १२५। २५०।
सुवर्ण, चाँदी एवं रत्नों से निर्मित, फहराती हुई ध्वजापताकाओं से संयुक्त और उत्तम तोरण द्वारों से रमणीय ये सब प्रासाद अपनी उँचाई के अर्धभागप्रमाण विस्तार से सहित हैं।।२०८१।। १२५।
यमक पर्वतों के ऊपर और भी दिव्य प्रासाद हैं। उनकी उँचाई व विस्तारादि का उपदेश नष्ट हो गया है।।२०८२।।
उपवनखण्डों से सहित, पुष्करिणी, कूप व वापिकाओं से रमणीय और प्रकाशमान उत्तम रत्नदीपकों से संयुक्त वे प्रासाद विराजमान हैं।।२०८३।।
इन प्रासादों में पर्वतों के सदृश नाम वाले व्यन्तरदेव निवास करते हैं, इनमें से प्रत्येक दश धनुष उँचे और एक पल्यप्रमाण आयु से सहित हैं।।२०८४।।

उनमें से प्रत्येक के सामानिक, तनुरक्ष, सप्तानीक, तीनों पारिषद, किल्विषिक, आभियोग्य और प्रकीर्णक देव होते हैं।।२०८५।।
सुवर्ण, चाँदी एवं रत्नों से निर्मित सामानिकप्रभृति देवों के प्रासाद और अनुपम आकार वाले उनकी देवियों के भवन शोभायमान हैं।।२०८६।।
यमक और मेघ सुरों के भवनों से पूर्वदिशा में पाण्डुकवन के जिनमन्दिर सदृश एक-एक जिनभवन हैं।।२०८७।।
पहले पाण्डुकवन में स्थित जिनभवनों के मुखमण्डपादिक का जो सब वर्णन किया गया है, वही वर्णन इन जिनभवनों का भी समझना चाहिये।।२०८८।।
भद्रशालवन में सीतोदा नदी के दक्षिण किनारे पर कुमुदशैल और उत्तर किनारे पर पलाशगिरि स्थित है।।२११२।।
ये सम्पूर्ण वर्णनायें दिग्गजेन्द्र पर्वतों के सदृश हैं। विशेष केवल यह है कि यहाँ उत्तरेन्द्र के लोकपाल वरुण का निवास है।।२११३।।
इसके आगे पश्चिम भाग में नील व निषध पर्वत की उपवन वेदी से संलग्न सुवर्णमय भद्रशालवनवेदी है।।२११४।।
वेदी की लम्बाई तेतीस हजार छह सौ चौरासी योजन और उन्नीस से भाजित चार कलाप्रमाण है।।२११५।।
नीलपर्वत के ऊपर केसरी नाम से प्रसिद्ध दिव्य द्रह है। उसके दक्षिणद्वार से सीता नामक उत्तम नदी निकलती है।।२११६।।
सीता नदी सीतोदा के समान ही सीताकुंड में गिरकर दक्षिणमुख होती हुई उसके दक्षिणद्वार से निकलती है।।२११७।।
कुंड से निकलकर वह नदी मेरुपर्वत तक दक्षिण की ओर से जाती हुई दो कोसों से उस मेरु पर्वत को न पाकर उतने मात्र अन्तर सहित पूर्व की ओर मुड़ जाती है।।२११८।।
उक्त नदी माल्यवंत पर्वत की दक्षिणमुख वाली गुफा में प्रवेश करती है। पश्चात् उस गुफा में से निकलकर कुटिल रूप से मेरुपर्वत के मध्यभाग तक जाती है।।२११९।।
उस पर्वत के मध्यभाग को अपना मध्यप्रदेशप्रणिधि करके वह सीता नदी पूर्वविदेह के ठीक बीच में पूर्व की ओर जाती है।।२१२०।।
अनन्तर जम्बूद्वीप की जगती के बिलद्वार में से जाकर वह सीतानदी परिवारनदियों से युक्त होती हुई लवणसमुद्र में प्रवेश करती है।।२१२१।।
सीतानदी का विस्तार व गहराई आदि तथा उसकी वेदी और उपवनादि सब सीतोदा के सदृश ही जानना चाहिये।।२१२२।।
नील पर्वत के दक्षिण में एक हजार योजन जाकर सीता के दोनों पाश्र्वभागों में दो यमकगिरि स्थित हैं।।२१२३।। १०००।
सीता के पूर्व में चित्रनग और पश्चिम भाग में विचित्रकूट है। इनका सब वर्णन यमक और मेघगिरि के सदृश ही समझना चाहिये।।२१२४।।