यागमंडल विधान

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यागमण्डल विधान

मंगलाचरण


मध्ये वेदि सर्किणवंâ दलचतुष्कोणाष्टसंख्यैर्दलै-
र्युत्तंâ द्वित्रिचतुर्हताष्टदलवत्पद्मं बृहत्तद्बहि:।
सद्वा:कोणकपंचमंडलवृतं संलिख्य तत्र क्रमात्।
मंत्रांगान्नवदेवतावृतिसुरान् सर्वान् समाराधये।।१।।

-चौबोल छंद-
वेदीमध्ये बनी कर्णिका, चउदल अठदल कमल बना।
आठ व चौबिस बत्तिस दल के, कमल बना उस बाह्य पुन:।।
चतुष्टकोण के मंडल पाँच, बनाये चउदिश द्वार बने।
मंत्रसहित नवदेव प्रभू, सुरसहित सर्व आराधूँ मैं।।१।।
ॐ परब्रह्मणे नमो नम: स्वस्ति स्वस्ति जीव जीव नन्द नन्द वर्धस्व वर्धस्व, विजयस्व विजयस्व, अनुशाधि अनुशाधि पुनीहि पुनीहि पुण्याहं पुण्याहं मांगल्यं मांगल्यं पुष्पांजलि:।

-शंभु छंद-
अर्हंत बने मोहारि प्रमुख, घातिया कर्म का घात किया।
सर्वज्ञ बने त्रिभुवन ज्ञाता, शिवपथ नेता शिवराज्य लिया।।
इनकी पूजा मैं करूँ आज, तुम सर्व अमंगल दूर करो।
हे मुनिपुंगव! तुम यहाँ विराजो, जिनमत का उद्योत करो।।१।।

विक्रिया ऋद्धि से सहित सभी, सौधर्म इन्द्र आदिक आवो।
सब विघ्नों का परिहार करो, पूजा तक यहीं ठहर जावो।।
यह पूजाविधि उत्तम होवे, सब जग में मंगलकारी हो।
सूरीगण चउविध संघ का भी, सानिध्य सर्वहितकारी हो।।२।।

प्रभावकसिंहसान्निध्यविधानाय समंतात् पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
सभी आर्यगण साधर्मिकजन, पूजा में शामिल होवो।
सब सुरगण निज-निज आयुध युत, निज-निज वाहन चढ़कर आवो।।
लौकान्तिकसुर अहमिन्द्र सभी, पूजा की अनुमोदना करो।
इस यागविधी के विघ्नों को, सब दूर भगा संतुष्ट करो।।३।।

त्रिभुवनसाधर्मिकाध्येषणाय समंतात् पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
संपूर्ण मंत्रमय सर्वशक्तियुत, शब्दब्रह्म महिमाशाली।
संपूर्ण तत्त्व को प्रगट करे, यह परमब्रह्म गुणमणिमाली।।
यह परमज्योतिमय द्रव्यशास्त्र है, द्वादशांग वाणीमय है।
वैâवल्यज्ञान का मूल बीज, इसका आह्वानन सुखमय है।।४।।

शब्दब्रह्मावर्जनाय कर्णिकामध्ये पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
परमेष्ठी पाँच मान्य जग में, उन सबका ध्यान करूँ रुचि से।
जो शब्दब्रह्म है परमब्रह्म, उसको भी वंदूँ भक्ती से।।
हो चुके हो रहे होवेंगे, त्रैकालिक सब अर्हंतों को।
इस यंत्र कर्णिका में पूजूँ, पुष्पांजलि क्षेपण कर प्रभु को।।५।।

परब्रह्मयज्ञप्रतिज्ञापनाय कर्णिकान्त: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।


यागमण्डल पूजा


-शंभु छंद-
अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय, साधु पंचपरमेष्ठी हैं।
त्रयकालिक चौबिस तीर्थंकर, शत इन्द्रों से नित वंदित हैं।।
चउ मंगल लोकोत्तमशरणं, जिनधर्म जिनागम जिनप्रतिमा।

जिन चैत्यालय इन सोलह को, मैं पूजूँ इनकी अति महिमा।।१।।
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ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागम-जिनचैत्य-चैत्यालय समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागम-जिनचैत्य-चैत्यालय समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागम-जिनचैत्य-चैत्यालय समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

-अथ अष्टक (नरेन्द्र छंद)-

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गंगा नदि का शीतल जल ले, जिनपद धार करूँ मैंं।
साम्य सुधारस शीतल पीकर, भव-भव त्रास हरूँ मैं।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

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काश्मीरी केशर चंदन घिस, जिनपद में चर्चंू मैं।
मानस-तनु-आगन्तुक त्रयविध, ताप हरो अर्चूं मैं।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

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मोतीसम उज्ज्वल अक्षत ले, प्रभु नव पुंज चढ़ाऊँ।
निज गुणमणि को प्रगटित करके, पेâर न भव में आऊँ।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

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जुही मोगरा सेवंती, बासंती पुष्प चढ़ाऊँ।
कामदेव को भस्मसात् कर, आतम सौख्य बढ़ाऊँ।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

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घेवर पेâनी लड्डू पेड़ा, रसगुल्ला भर थाली।
तुम्हें चढ़ाऊँ क्षुधा नाश हो, भरें मनोरथ खाली।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

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स्वर्णदीप में ज्योति जलाऊँ, करूँ आरती रुचि से।
मोह अंधेरा दूर भगे सब, ज्ञान भारती प्रगटे।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

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धूप दशांगी अग्निपात्र में, खेवत उठे सुगंधी।
कर्म जलें सब सौख्य प्रगट हो, पैâले सुयश सुगंधी।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

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आडू लीची सेब संतरा, आम अनार चढ़ाऊँ।
सरस मधुर फल पाने हेतू, शत-शत शीश झुकाऊँ।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

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जल गंधादिक अर्घ्य बनाकर, सुवरण पुष्प मिलाऊँ।
भक्तिभाव से गीत-नृत्य कर, प्रभु को अर्घ्य चढ़ाऊँ।।
श्री अरिहंत सिद्ध आदी को, मन वच तन से पूजूूँ।
सर्व अमंगल दूर भगाकर, सब दु:खों से छूटूँ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरुत्रैकालिकतीर्थंकर-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-सोरठा-
यमुना सरिता नीर, प्रभु चरणों धारा करूँ।
मिले निजात्म समीर, शांतीधारा शं करे।।
शांतये शांतिधारा।
सुरभित खिले सरोज, जिन चरणों अर्पण करूँ।
निर्मद करूँ मनोज, पाऊँ निज गुण संपदा।।

दिव्य पुष्पांजलि:।


जयमाला


-दोहा-
चिन्मय चिंतामणि सकल, चिंतित फल दातार।
तुम गुणकण भी गाय के, पाऊँ सौख्य अपार।।१।।
-शंभु छंद-
जय जय जिन मोह अरी हन के, अरिहंत नाम तुमने पाया।
जय जय शत इन्द्रों से पूजित, अर्हत् का यश सबने गाया।।
प्रभु गर्भागम के छह महिने, पहले ही सुरपति आज्ञा से।
धनपति ने रत्नमयी पृथ्वी, कर दी रत्नों की धारा से।।२।।

जब जन्म लिया तीर्थेश्वर ने, त्रिभुवन जन में आनंद हुआ।
इन्द्रोें द्वारा मंदरगिरि पर, प्रभु का अभिषेक प्रबंध हुआ।।
दीक्षा कल्याणक उत्सव कर, इन्द्रों ने अनुपम पुण्य लिया।
जब केवलज्ञान हुआ प्रभु को, जन-जन ने निज को धन्य किया।।३।।

इन पंचकल्याणक के स्वामी, तीर्थंकरगण ही होते हैं।
कुछ दो या तीन कल्याणक पा, निज पर का कल्मष धोते हैं।।
बहुतेक भविक निज तप बल से, चउ घाति कर्म का घात करें।
ये सब अरिहंत कहाते हैं, जो केवलज्ञान विकास करें।।४।।

जिन अष्टकर्म को नष्ट किया, लोकाग्र विराजें जा करके।
वे सिद्ध हुए कृतकृत्य हुए, निज शाश्वत सुख को पा करके।।
आचार्य परमगुरु चतु:संघ, अधिनायक गणधर कहलाते।
जो पढ़े पढ़ावें जिनवाणी, वे उपाध्याय निज पद पाते।।५।।

जो करें साधना निज की नित, वे साधु परमगुरु माने हैं।
त्रयकालिक चौबिस तीर्थंकर, उनकी पूजा भव हाने हैं।।
अर्हंत सिद्ध साधू केवलि-भाषित वरधर्म चार मानें।
ये मंगलकारी लोकोत्तम, हैं शरणभूत भवि सरधानें।।६।।

जिनधर्म अहिंसा धर्म परम, त्रिभुवन में शान्ति प्रदाता है।
जिन आगम द्वादशांग वाङ्मय, भवि को शिवपथ दिखलाता है।।
जिनप्रतिमा कृत्रिम-अकृत्रिम, आनन्त व असंख्यात जग में।
जिनचैत्यालय भी इतने ही, त्रयकालों में मानें श्रुत में।।७।।

इनको अर्चूं पूजूँ वंदूँ, औ नमस्कार भी नित्य करूँ।
निज हृदय कमल में धारण कर, सम्पूर्ण अमंगल विघ्न हरूँ।
दु:खों का क्षय कर्मों का क्षय, होवे मम बोधि लाभ होवे।
मुझ सुगती गमन समाधिमरण, होकर जिनगुण संपति होवे।।८।।

-दोहा-
सोलह देवों का यजन, करे भवोदधि पार।
केवल ‘ज्ञानमती’ सहित, मिले स्वात्म सुखसार।।९।।
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमगुरु-त्रैकालिक-चतुर्मंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्मजिनागम-जिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।

(कर्णिका में अर्हंत की पूजा करना)


अर्हंत पूजा


-चौबोल छंद-
श्री अरिहंत प्रथम परमेष्ठी, घाति चतुष्टय नाश किया।
धर्मतीर्थ का वर्तन करते, नंत चतुष्टय प्राप्त किया।।
गणधर मुनिगण सुरपति नरपति, इनकी भक्ती नित्य करें।
हम भी उनका आह्वानन कर, अतिशय पूजा भक्ति करें।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं परब्रह्मन्अर्हत्परमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं परब्रह्मन्अर्हत्परमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं परब्रह्मन्अर्हत्परमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जलं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीं अर्हत्परमेष्ठिने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।

(मंडल पर पूर्व दिशा में पुष्पांजलि क्षेपण कर सिद्धों की पूजा करना)


सिद्धपूजा


-गीताछंद-
श्रीसिद्ध त्रिभुवन के शिखर पर, सर्वकाल विराजते।
सब गुण अनंतानंत युत, भविवृंद दुख संहारते।।
निज आतमा की शुद्धि हेतू, सिद्ध की आराधना।
हम पूजते आह्वान कर, थापें यहाँ कर वंदना।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।

(दक्षिण दिशा में पुष्पांजलि क्षेपण करके आचार्य की पूजा करना)


आचार्य पूजा


-गीता छंद-
जो स्वयं पंचाचार पालें, अन्य से पलवावते।
छत्तीस गुण धारें सदा, निज आत्मा को ध्यावते।।
ऐसे परम आचार्यवर, भवसिंधु से भवि तारते।
इस हेतु उनकी अर्चना हित, हम हृदय में धारते।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीमदाचार्यपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीमदाचार्यपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीमदाचार्यपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं श्रीमदाचार्यपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
शांतिधारा, पुष्पांजलि:।

(पश्चिम दिशा में पुष्पांजलि क्षेपण करके उपाध्याय की पूजा करना)


श्री उपाध्याय पूजा


-गीता छंद-
जो अंग ग्यारह पूर्व चौदह, धारते निज बुद्धि में।
पढ़ते पढ़ाते या उन्हें, जो शास्त्र हैं तत्काल में।।
वे गुरू पाठक मोक्षपथ, दर्शक उन्हीं की वंदना।
आह्वान विधि करके यहाँ पर, मैं करूँ नित अर्चना।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्यायपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्यायपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्यायपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्यायपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
शांतिधारा, पुष्पांजलि:।

(उत्तर दिशा में पुष्पांजलि क्षेपण करके सर्वसाधु की पूजा करना)


सर्वसाधु पूजा


-गीता छंद-
जो नग्न मुद्रा धारते, दिग्वस्त्रधारी मान्य हैं।
निज मूलगुण उत्तरगुणों से, युक्त पूज्य प्रधान हैं।।
सुर असुर मुकुटों को झुकाकर, अर्चते हैं भाव से।
मैं भी यहाँ आह्वान कर, पूजूँ उन्हें अति चाव से।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीसर्वसाधुपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीसर्वसाधुपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीसर्वसाधुपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं श्रीसर्वसाधुपरमेष्ठिने जलं निर्वपामीति स्वाहा।(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)

शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।


तीन चौबीसी अर्घ्य


(स्वरवलय के अभ्यन्तर में भूतकालीन तीर्थंकर की पूजा करना)
-गीताछंद-
जंबूद्रुमांकित प्रथम जंबूद्वीप में दक्षिण दिशी।
वर भरत क्षेत्र प्रधान तहं, षट्काल वर्ते नितप्रती।।
जहं भूतकाल चतुर्थ में, चौबीस तीर्थंकर भये।
थापूँ यहाँ वर भक्ति पूजन, हेतु मन हर्षित भये।।१।।
ॐ ह्रीं निर्वाणसागराद्यतीतकालतीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं निर्वाणसागराद्यतीतकालतीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं निर्वाणसागराद्यतीतकालतीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं निर्वाणसागराद्यतीतकालतीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा।(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
(चाल-नंदीश्वर पूजा)
जल चंदन अक्षत पुष्प, नेवज दीप लिया।
वर धूप फलों से युक्त, अर्घ्य समप्र्य किया।।
इस भरत क्षेत्र के भूतकालिक तीर्थंकर।
मैं पूजूँ भक्ति समेत, होऊँ क्षेमंकर।।१।।
ॐ ह्रीं निर्वाणसागराद्यतीतकालतीर्थंकरेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(मंत्रवलय के अभ्यन्तर में वर्तमानकालीन तीर्थंकर की पूजा करना)
-गीताछंद-
वृषभादि चौबिस तीर्थकर, इस भरत के विख्यात हैं।
जो प्रथित जम्बूद्वीप के, संप्रति जिनेश्वर ख्यात हैं।।
इन तीर्थकर के तीर्थ में, सम्यक्त्व निधि को पायके।
थापूँ यहाँ पूजन निमित, अति चित्त में हरषाय के।।१।।
ॐ ह्रीं वृषभाजितादिवर्तमानकालतीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं वृषभाजितादिवर्तमानकालतीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं वृषभाजितादिवर्तमानकालतीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं वृषभाजितादिवर्तमानकालतीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा।
(इसी मंत्र से चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
-स्रग्विणी छंद-
तोयगंधादि वसु द्रव्य ले थाल में।
अर्घ्य अर्पण करूँ नाय के भाल मैं।।
श्री ऋषभ आदि चौबीस जिनराज को।
पूजते ही लहूँ स्वात्म साम्राज को।।
ॐ ह्रीं वृषभाजितादिवर्तमानकालतीर्थंकरेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(ठकारवलय के अभ्यन्तर में भविष्यत्कालीन तीर्थंकर की पूजा करना)
-गीताछंद-
इस भरत क्षेत्र विषे जिनेश्वर, भविष्यत् में होएंगे।
उनके निकट में भव्य अगणित, कर्मपंकिल धोएंगे।।
चौबीस तीर्थंकर सतत, वे विश्व में मंगल करें।
मैं पूजहूँ आह्वान कर, मुझ सर्वसंकट परिहरें।।१।।
ॐ ह्रीं महापद्मसुरदेवादिअनागतकालतीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं महापद्मसुरदेवादिअनागतकालतीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं महापद्मसुरदेवादिअनागतकालतीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं महापद्मसुरदेवादिअनागतकालतीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा।(इसी मंत्र से चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
-चामर छंद-
तोय गंध अक्षतादि, अष्टद्रव्य लाइये।
अर्घ्य को चढ़ाय के, अखंड सौख्य पाइये।।
भाविकाल के जिनेन्द्रदेव की समर्चना।
जो करेंगे वे यहाँ, कभी धरेंगे जन्म ना।।

ॐ ह्रीं महापद्मसुरदेवादिअनागतकालतीर्थंकरेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


अर्हंतमंगलादि चार अर्घ्य


(अब अष्टकमल के अन्तर्गत चतुर्दिशा के चार दलों में क्रम से पूजा करना है।)
पूर्वदल के अभ्यंतर में-
-शंभुछंद-
अर्हंतदेव मल गालन करके, ‘‘मंग-सौख्य’’ को देते हैं।
त्रिभुवन में उत्तम लोकोत्तम, शरणागत रक्षक होते हैं।।
इनकी पूजा मंगलकारी, उत्तमपद दे रक्षा करती।
हम पूजें अर्घ्य चढ़ा करके, प्रभु पूजा सब संकट हरती।।१।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं अर्हन्मंगललोकोत्तमशरणेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दक्षिण दिशा के दल में-
श्रीसिद्धप्रभु मलगालन करके, ‘‘मंग-सर्वसुख’’ दाता हैं।
त्रिभुवन के शेखर लोकोत्तम, शरणागत भविजन त्राता हैं।।
इनकी पूजा मंगलप्रद उत्तम, पददायी रक्षाकारी।
हम पूजें अर्घ्य चढ़ा करके, प्रभु पूजा सिद्ध सौख्यकारी।।२।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं ाqसद्धमंगललोकोत्तमशरणेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पश्चिम दिशा में-
निर्गं्रथ साधु मल क्षालन कर, सुख देते रत्नत्रय देते।
मंगलकारी लोकोत्तम हैं, शरणागत के दु:ख हर लेते।।
आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु, इनकी पूजा मंगलकारी।
हम पूजें अर्घ्य चढ़ा करके, गुरु की पूजा भवदु:ख हारी।।३।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं साधुमंगललोकोत्तमशरणेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तर दिशा में-
केवलिप्रणीत है धर्म पापक्षालन कर सर्वसौख्य देता।
त्रिभुवन में मंगलकर उत्तम, शरणागत के दु:ख हर लेता।।
जो पूजें केवलिकथित धर्म, वे स्वयं धर्म अवतार धरें।
हम पूजें अर्घ्य चढ़ा करके, हम भी भवसागर शीघ्र तरें।।४।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं केवलिप्रज्ञप्तधर्ममंगललोकोत्तमशरणाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(अब अष्टकमल की विदिशा के दलों में स्थापित जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य और चैत्यालय की पूजा करना है)


आग्नेय विदिशा के दल में : जिनधर्म पूजा



-गीता छंद-
वर रत्नत्रय जिनधर्म हैं, औ दया धर्म प्रधान है।
वस्तू स्वभाव सु धर्म है, उत्तम क्षमादिक मान्य हैं।।
जो जीव को ले जाके धरता, सर्व उत्तम सौख्य में।
वह धर्म है जिनराज भाषित, पूजहूँ तिहुंकाल मैं।।१।।
-दोहा-
भरतैरावत क्षेत्र में, चौथे पाँचवे काल।
शाश्वत रहे विदेह में, धर्म जगत् प्रतिपाल।।२।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक धर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक धर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक धर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मकधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा।(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
सलिलादिक द्रव्य मिलाय, वंâचनपात्र भरें।
जिनवृष को अर्घ्य चढ़ाय, शिवसाम्राज्य वरें।।
जिनधर्म विश्व का धर्म, सर्व सुखाकर है।
मैं जजूँ सार्वहित धर्म गुण रत्नाकर है।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मकधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।


नैऋत्यविदिशा के दल में : जिनागम पूजा


-गीता छंद-
जिनदेव के मुख से खिरी, दिव्यध्वनी अनक्षरी।
गणधर ग्रहण कर द्वादशांगी, ग्रंथमय रचनाकरी।।
उन अंग पूरब शास्त्र के ही, अंश ये सब शास्त्र हैं।
उस जैनवाणी को जजूँ, जो ज्ञान अमृत सार है।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीजिनागम! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीजिनागम! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीजिनागम! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्रीं श्रीजिनागमाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।(इसी मंत्र से चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
वारि गंध शालि पुष्प चरू सुदीप धूप ले।
सत्फलों समेत अर्घ से जजें सुयश मिले।।
द्वादशांग जैनवाणि पूजते उद्योत हो।
मोहध्वांत नष्ट हो उदीत ज्ञान ज्योति हो।।५।।
ॐ ह्रीं श्रीजिनागमाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।।


वायव्यविदिशा के दल में पूजा करना : जिनचैत्य पूजा


-नरेन्द्र छंद-
त्रिभुवन में जिनप्रतिमा शाश्वत, असंख्यात हैं वर्णित।
ढाई द्वीप में कृत्रिम प्रतिमा, सुर नर निर्मित अगणित।।
इन सबका आह्वानन कर मैं, भक्ति भाव से ध्याऊँ।
जिनप्रतिमा जिनसदृश पूज्य हैं, वंदन कर सुख पाऊँ।।१।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनबिंबसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनबिंबसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनबिंबसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनबिंबसमूहाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
(ऐसे ही चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
जल चंदन अक्षत माला चरु, दीप धूप फल अर्घ्य लिया।
त्रिभुवन पूजित पद के हेतू, तुम पद वारिज अर्घ्य किया।।
नव सौ पचीस कोटी त्रेपन, लाख सत्ताइस सहस कहीं।
नव सौ अड़तालिस असंख्य भी, कृत्रिम अगणित जजूँ यहीं।।
ॐ ह्रीं र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनबिंबसमूहाय अनघ्र्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।


ईशान विदिशा के दल में पूजा करना : त्रैलोक्य जिनालय पूजा


-नरेन्द्र छंद-
त्रिभुवन के जिनमंदिर शाश्वत, आठ कोटि सुखराशी।
छप्पन लाख हजार सत्यानवे, चार शतक इक्यासी।।
व्यंतर ज्योतिष सुरगृह में हैं, असंख्यात जिनमंदिर।
ढाईद्वीप के कृत्रिम जिनगृह, पूजूँ सर्व हितंकर।।१।।
ॐ ह्री र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनचैत्यालयसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्री र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनचैत्यालयसमूह!अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्री र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनचैत्यालयसमूह!अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
ॐ ह्री र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनचैत्यालयेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा।(इसी मंत्र से चंदन आदि आठों द्रव्य चढ़ावें)
स्त्र्रग्विणी छंद-अर्घ में स्वर्ण चाँदी कुसुम ले लिये।
जैन मंदिर जजूँ सर्व सुख के लिए।।
सर्व शाश्वत अशाश्वत जिनालय जजूँ।
रत्नत्रय पायके स्वात्म अमृत चखूँ।।
ॐ ह्री र्हं श्रीं जगत्त्रयवर्तिजिनचैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।
इस प्रकार अर्हंतादि की पूजा करके इन भगवन्तों का हृदय में चिंतन करते हुए अनादिसिद्ध मंत्र से कर्पूर चंदन केशर से चर्चित ऐसे श्वेत सुगंधित पुष्पों से इक्कीस बार मंत्र पढ़कर पूर्णाघ्र्य चढ़ावें। अर्थात् नीचे लिखे मंत्र को २१ बार पढ़ें और पुष्पांजलि क्षेपण करें, पुन: पूर्णाघ्र्य चढ़ावें.....।
-अनादिसिद्धमंत्र-
ॐ णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।
चत्तारि मंगलं-अरिहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा-अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि-अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहुसरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।
ॐ ह्रौं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।
इस अनादिसिद्ध मंत्र के द्वारा श्वेत पुष्पों से २१ बार आराधना करना।

-पूर्णाघ्र्य-शंभु छंद-
जिसमें अर्हंत जिनेन्द्र मुख्य, ये सब सोलह१ देवता कहे।
इनकी पूजा विधिवत् की है, ये मुक्तिश्री सुखदायि कहे।।
हम महा अर्घ्य लेकर पूजें, भक्तों को स्वात्मसौख्य दाता।
इनका वंदन-पूजन जग में, भव-भव के दु:खों से त्राता।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधु-भूतवर्तमान-भाविकालीनचतुर्विंशति-तीर्थंकर-अर्हन्मंगललोकोत्तमशरण-सिद्धमंगललोकोत्तमशरण-साधुमंगललोकोत्तम-शरण-केवलिप्रज्ञप्तधर्ममंगललोकोत्तमशरण-जिनधर्म-जिनागम-जिनचैत्य-जिनचैत्यालयेभ्यो महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।

अथ अष्टदलस्थापितजयादिदेवतार्चना
(अब अष्टदल कमल में स्थापित जया आदि आठ देवियों की क्रम से पूजा करना है। इन जयादि देवियों की पूजा के लिए एक थाल में पूजन सामग्री लेकर जिनेन्द्रदेव के चरण कमलों में अवतरणविधि करके अपने पास में रख लेवें। इसी सामग्री से देवियों की पूजा करें।)
पुष्पांजलि:-नरेन्द्र छंद
त्रिभुवन विजयी कामदेव को मोहशत्रु को जीता।
ऐसे श्रीजिनदेव देव के चरणकमल की भक्ता।।
कुमत विजय में दक्ष जिनेश्वर मार्ग रक्षिका मानीं।
ऐसी जयादि आठ देवियाँ पूजन योग्य बखानी।।१।।
जयादिदेवीपूजाप्रतिज्ञापनाय अष्टदलकमलेषु पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

-अथ प्रत्येक पूजा-नरेन्द्र छंद-
ज्ञानावरण पाँच प्रकृती को जीत बने ‘‘जिन’’ देवा।
आप भक्त श्री जिन बन जाते अत: आप भव छेवा।।
जिनचरणों की भक्ता देवी ‘‘जया’’ आपको जजते।
जिनभक्तों के विघ्न हरण में दक्षा हो वृषरुचि से।।१।।
ॐ ह्रीं जये देवि! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं जये देवि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं जये देवि! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
(इन मंत्रों से कमल के प्रथम दल पर पुष्पांजलि क्षेपण करते हुए स्थापना विधि करें। पुन: आगे लिखे मंत्र को बोलकर अर्घ्य समर्पित करें।)
ॐ ह्रीं जयायै इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
नवविध कर्म दर्शनावरणी उन पर विजय किया है।
स्याद्वाद से मिथ्यादृक् के वच पर विजय लिया है।।
ऐसे जिनवर चरणकमल की ‘विजया देवी’ भक्ता।
भजूँ सदा मैं धर्मप्रेम से नित्य धर्म आसक्ता।।२।।
ॐ ह्रीं विजया देवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विजयादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
द्वितीय दल में पुष्पांजलि क्षेपण करें-
अट्ठाइस विध मोहकर्म को जीत जिनेन्द्र हुए हैं।
भक्तों के भी कर्मनिवारक जग में ख्यात हुए हैं।।
उनके चरण कमल की नितप्रति भक्ति करें अतिरुचि से।
‘अजिता’ देवी यहाँ पधारो यज्ञभाग लो मुद से।।३।।
ॐ ह्रीं अजितादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अजितादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
अन्तराय अरिकर्म जगत् में विघ्न करें सब विध से।
किया पराजय अत: जिनेश्वर भक्ति करें भवि रुचि से।।
विघ्नपराजय करने हेतु ‘‘अपराजिता’’ यहाँ अब।
आवो यज्ञभाग लो जिनपद, भक्ता सौख्य भरो सब।।४।।
ॐ ह्रीं अपराजितादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अपराजितादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
वेदनीय के सात असाता भेद विनाश किया है।
ऐसे जिनवर चरणकमल का आश्रय स्वयं लिया है।।
इन्द्र आदि से पूज्य जिनेश्वर भक्ती में नित तत्पर।
‘जंभा देवी’ यज्ञ भाग लो विघ्न निवारो दुखकर।।५।।
ॐ ह्रीं जम्भादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जम्भादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
नाना विध आयू को नाशा काल अनन्तानंते।
सिद्धालय में जिनवर तिष्ठें भोगें सौख्य अनंते।।
‘मोहादेवी’ जिनचरणोें की भक्ति करें अति मुद से।
उनकी अर्चा भक्ति से अब जिनभक्ता ये इससे।।६।।
ॐ ह्रीं मोहादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मोहादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
नाम कर्म के सभी भेद को जिनने नाश किया है।
उनके चरणाम्बुज में रत हो सम्यक्रत्न लिया है।।
विघ्नजाल स्तंभित करती नाम ‘स्तंभा’ धरती।
यज्ञ भाग देवूँ मैं रुचि से इनमें अति जिनभक्ती।।७।।
ॐ ह्रीं स्तंभादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं स्तंभादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
द्विविध गोत्र को नाश लोक के अग्र निवास किया है।
ऐसे प्रभु के पादयुगल का आश्रय स्वयं लिया है।।
नाम कहा ‘स्तंभिनि देवी’, आवो यज्ञ विधी में।
विघ्न निवारो यज्ञभाग लो, भजूँ तुम्हें सविधी मैं।।८।।
ॐ ह्रीं स्तंभिनीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं स्तंभिनीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
हे जयादि देवी तुम आवो, पूर्ण अर्घ्य स्वीकार करो।
जिनवर के पूजा विधान में, सर्वविघ्न परिहार करो।।
जिन भक्तों पर प्रसन्न होकर, धर्मप्रेम को दर्शावो।
पूर्ण अर्घ्य हम करें समर्पण, जिनगुणप्रीती दर्शावो।।९।।
ॐ ह्रीं जयाद्यष्टदेवीभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इति पूर्णाघ्र्यं।

इस प्रकार जयादिदेवताओं की अर्चना पूर्ण हुई।


सोलह विद्यादेवताओं की पूजा


(अब सोलह कमलदल पर स्थापित विद्या देवताओें की पूजा करना, यहाँ पर भी पूजन सामग्री के थाल को लेकर भगवान के चरण कमलों में अवतारण विधि करके अपने पास रख लेवें और इसी से देवियों की पूजा करें।)
।। अथ पुष्पांजलि:।।
-चौबोल छंद-
चतुर्भुजायुत विद्यादेवी, सोलह रोहिणी आदि हैं।
सोलहकारण दर्शविशुद्धी आदिक में अति प्रीती है।।
मिथ्यामत विध्वंसनकरिणी जैन धर्म उद्योत करें।
इन सब विद्या देवताओं का हम यहाँ पर आह्वान करें।।१।।
इति रोहिण्यादिविद्यादेवतापूजाप्रतिज्ञापनाय षोडशदलेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
-अथ प्रत्येक अर्घ्य -
कलश शंख पंकज व विजौरा एक एक हाथों में है।
‘‘दर्शशुद्धि’’ जिनगुण में रागी नाम ‘‘रोहिणी’’ देवी है।।
तपे स्वर्णसम सुन्दर कांती वाहन कमल तुम्हारा है।
यज्ञविधी में यहाँ पधारो यह आह्वान हमारा है।।१।।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेवि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेवि! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेव्यै इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
सम्यक् ‘‘विनय’’ गुणों में प्रीती ‘‘प्रज्ञप्ती’’ विद्या देवी।
चतुर्भुजा में क्रम से चक्र खड्ग पंकज फल को लेतीं।।
अर्हत् आज्ञा में तत्पर हो तेरा आह्वानन करते।
जिनवरयज्ञविधी में आवो विघ्न दूर कर दो मुद से।।२।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञप्तिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्रज्ञप्तिदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘शीलव्रतों की तृतियभावना’’ तीर्थंकर पद की जननी।
इनमें अनुरागी जिनभक्ता ‘‘वङ्काशृंखला’’ देवि गुणी।।
वङ्काशृंखला शंख कमल अरु बीजूपुर१ चउहाथों में।
आवो आवो विघ्न निवारो जिनवरपूजा करने में।।३।।
ॐ ह्रीं वङ्काशृंखलादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वङ्काशृंखलादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
सतत ‘‘ज्ञान उपयोग’’ भावना में अतिशय प्रीती धारें।
चतुर्भुजा में अंकुश पंकज बीजपूर फल को धारें।।
तीर्थंकर प्रकृति कारण की तीर्थंकर की भक्ति करें।
देवी ‘‘वङ्काांकुशा’’ तुम्हें हम यज्ञ भाग दें मोद भरें।।४।।
ॐ ह्रीं वङ्काांकुशादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वङ्काांकुशादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
धर्मप्रीति भवभीति यही ‘‘संवेग’’ भावना कहलाती।
इसमें प्रीति तीर्थंकरभक्ती ‘‘जांबूनदा’’ नाम पातीं।।
खड्ग व भाला कमल विजौरा क्रम से चउ कर में धारें।
हम उनका आह्वानन करके यज्ञ विघ्न को निरवारें।।५।।
ॐ ह्रीं जांबूनदादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जांबूनदादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
-शंभु छंद-
श्री संयम ‘‘त्याग’’ भावना से तीर्थंकर नाम कर्म बंधता।
इन तीर्थंकर पदकमल भक्ति है नाम ‘‘पुरुषदत्ता’’ सुभगा।।
चउकर में वङ्का पयोज शंख फल धरें धर्म को चमकावें।
इन सबको यज्ञभाग देकर सम्पूर्ण विघ्न से बच जावें।।६।।
ॐ ह्रीं पुरुषदत्तादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पुरुषदत्तादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
दुष्कर ‘‘तप’’ कर तीर्थंकर बन वृषचक्र धरें भव पार करें।
उनके गुण में अनुरागी ये ‘‘काली’’ देवी शुभ कार्य करें।।
चउ कर में मूसल खड्ग कमल फल धरतीं दयाधर्म धारें।
उनको हम यज्ञ भाग देकर जिनधर्म अिंहसा विस्तारें।।७।।
ॐ ह्रीं कालीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं कालीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
जो ‘‘साधुसमाधि’’ भावना से तीर्थंकर प्रकृति उपाज्र्य करें।
ऐसे तीर्थंकर चरणों में रत जो ‘‘महाकाली’’ नाम धरें।।
चउ कर में धनु फल वाण खड्ग जिनभक्त रक्षिका मुनि कहते।
इक दयाधर्म में प्रीति धरें हम उन्हें अर्घ्य देवें रुचि से।।८।।
ॐ ह्रीं महाकालीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं महाकालीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
जो ‘‘वैयावृत्य’’ भावना से, तीर्थंकर पुण्य बाँध करके।
जिनधर्मचक्र के नाथ बने उनकी अतिशय भक्ती करके।।
‘‘गौरी’’ देवी कर कमल धरें जिनचरणकमल को आराधें।
हम उनका आह्वानन करके जिनधर्म प्रभावन को साधें।।९।।
ॐ ह्रीं गौरीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं गौरीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘अर्हंतभक्ति’’ भावन करके अर्हंत अवस्था प्राप्त किया।
उन पादकमल की भक्ता बन, ‘‘गांधारी’’ नाम को सार्थ किया।।
कर चक्र खड्ग धारण करतीं उनको गंधादिक से यजते।
जग में जिनधर्म प्रभावन कर जिनपूजा से भव दु:ख टलते।।१०।।
ॐ ह्रीं गांधारीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं गांधारीrदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘आचार्यभक्ति’ भावन करके तीर्थंकर हो सर्वज्ञ हुये।
उनचरणकमल अनुरागी ये ‘‘ज्वालामालिनी’’ शुभ नाम लिये।।
भुज आठ धरें धनु वाण आदि जिनपूजा में अतिप्रीती है।
हम उनको यज्ञभाग देकर सब विघ्न निवारें नीति ये।।११।।
ॐ ह्रीं ज्वालामालिनीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं ज्वालामालिनीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘बहुश्रुतभक्ती’’ से पुण्य लिया तीर्थंकर धर्मतीर्थ कर्ता।
उन प्रभु के चरणकमल भजतीं जो कहीं ‘‘मानवी’’ दुखहर्ता।।
तलवार त्रिशूल धरें कर में जिनधर्म महात्म्य बढ़ाती हैं।
हम अर्घ्य प्रदान करें इनको ये विघ्न समूह नशाती हैं।।१२।
ॐ ह्रीं मानवीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मानवीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘प्रवचनभक्ती’’ कारण पाकर जो धर्मचक्र को चला रहे।
उनके श्रीचरणकमल सेवें ‘‘वैरोटी’’ देवी नाम लहें।।
कर सर्प धरें जिनधर्मप्रकाश करें जग में सुख शांति करें।
हम उनको अर्घ्य प्रदान करें सम्पूर्ण अमंगल दूर करें।।१३।।
ॐ ह्रीं वैरोटीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वैरोटीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘षट् आवश्यक’’ में हानि नहीं यह चौदहवीं भावना कही।
इससे तीर्थंकर प्रकृति बाँध जगवंद्य जिनेश्वर हुये सही।।
उन जिनवर का अर्चन करके ‘‘अच्युता’’ नाम को प्राप्त किया।
कर खड्ग धरें देवी उनको आह्वानन कर हम जजें यहाँ।।१४।।
ॐ ह्रीं अच्युतादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अच्युतादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
तप श्रुत आदिक से ‘‘मार्गप्रभावन’’ करके शिवपथ नेता हैं।
उन जिनवर को नित प्रणमन कर जो ख्यात ‘‘मानसी’’ देवी हैं।।
इनको जिनपूजन में आकर सम्पूर्ण विघ्न अपहरना है।
हम इसीलिए पूजें इनको जिनपूजन से भव तरना है।।१५।।
ॐ ह्रीं मानसीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मानसीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘चउविध संघ में वत्सल’’ करके जो तीर्थंकर जगवंद्य हुये।
उन प्रभु की अतिशय भक्ती कर जो ‘‘महामानसी’’ नाम लिये।।
चउकर में अक्षमाल माला वरदा मुद से अंकुश धारें।
हम इनका आह्वानन करके जिनधर्म सुयश को विस्तारें।।१६।।
ॐ ह्रीं महामानसीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं महामानसीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
इस विध रोहिणी आदी देवी, को मैंने यहाँ प्रसन्न किया।
हे देवी! तुम सबके प्रसाद, ये यज्ञविघ्न को नष्ट किया।।
तुम जिनवर चरण सरोरूह की, भक्ती से सेवा करती हो।
हम पूर्ण अर्घ्य तुमको अर्पें, तुम धर्मप्रीति विस्तरती हो।।१७।।
ॐ ह्रीं रोहिण्यादिविद्यादेवताभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इति पूर्णाघ्र्यं।

इस प्रकार विद्यादिकदेवताओं की अर्चना समाप्त हुई।


अथ चौबीस दलों में स्थापित जिनमाता की पूजन


-पुष्पांजलि:—शंभु छंद-
इक्ष्वाकु वंश कुरु उग्र नाथ हरि वंश श्रेष्ठ में जो जन्में।
क्षत्रिय राजा जो हुये उन्हीं की रानी जिनमाता जग में।।
ये विश्वेश्वरी जगन्माता पूज्या सुमंगला महासती।
सुरपति इन्द्राणी देव देवियों से वंदित हैं श्रेष्ठमती।।१।।
ॐ जिनमातृसमुदायपूजाप्रतिज्ञापनाय पत्रेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
अथ प्रत्येक अर्घ्य
-शेर छंद-
श्रीनाभिराज अयोध्यापती की प्रिया हो।
जगदम्बिके जिनमात ‘‘मरुदेवी’’ आप हो।।
ऋषभेश को दे जन्म आप धन्य हो गर्इं।
तुम पूजते सौभाग्य सुयश प्राप्त हो यहीं।।१।।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, संवौषट्।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात:! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात:! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
साकेतपुरी के पती जितशत्रु की प्रिया।
‘‘विजयावती’’ माता ने पुत्ररत्न को दिया।।
इन्द्रों ने न्हवन करके ‘‘अजित’’ नाम को दिया।
हे मात! आप पूजते मन पुण्य से भरा।।२।।
ॐ ह्रीं विजयावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विजयावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
दृढ़राज नृपति की पुरी श्रावस्ति वंद्य है।
इनकी प्रिया ‘‘सुषेणा’’ देवेन्द्र वंद्य हैं।।
श्रीदेवियाँ तुम पास गूढ़ प्रश्न करें थीं।
‘संभव’ जिनेन्द्र जनम दे तुम धन्य हुई थीं।।३।।
ॐ ह्रीं सुषेणाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुषेणाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
साकेतपुरी पति ‘‘स्वयंवर’’ नृपति कहे।
‘‘सिद्धारथा’’ प्रिया को नमन देव कर रहें।।
‘अभिनंदनेश’ को जना तुम धन्य हो गर्इं।
तुम अर्चना से भूमि ये पवित्र हो गई।।४।।
ॐ ह्रीं सिद्धार्थाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सिद्धार्थाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
साकेतपती ‘मेघरथ’ की आप हो प्रिया।
माँ ‘‘मंगला’’ मलमूत्र रहित आप तनु कहा।।
श्री आदि देवियों ने गर्भ शोधना करी।
‘‘सुमती’’ प्रभू को जन्म दे मंगल किया घरी।।५।।
ॐ ह्रीं मंगलाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मंगलाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
कौशाम्बि अधिप ‘धरणराज’ की प्रिया अहो।
हे अम्बिके! ‘‘सुषीमा’’ जिनराज प्रसू हो।।
श्रीपद्मप्रभ’ के जन्म से जग पूजता तुम्हें।
हम भी यहाँ पे अर्घ्य दे भव वन में ना भ्रमें।।६।।
ॐ ह्रीं सुषीमाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुषीमाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘वाराणसी’ के ‘सुप्रतिष्ठ’ नृपति की रानी।
माँ ‘‘पृथ्वीषेणा’’ पुत्ररत्न से रतन खनी।।
‘सुपाश्र्वतीर्थंकर’ ने तुमसे जनम लिया।
तुमने अपूर्व सुत दे जीवन सफल किया।।७।।
ॐ ह्रीं पृथ्वीषेणाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पृथ्वीषेणाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘महासेन’ नृपति ‘चंद्रपुरी’ के अधीश थे।
सल्लक्षणा ‘स्त्रीलक्ष्मणा’ रानी से धन्य थे।।
श्रीचंद्रप्रभ के जन्म से इन्द्रादि आ गये।
थी धन्य घड़ी मात तुम्हें पूजते भये।।८।।
ॐ ह्रीं लक्ष्मणाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं लक्ष्मणाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘कावंâदी’ के अधिप ‘सुग्रीवराज’ पिता थे।
माता कही ‘जयरामा’ तीर्थेंश जन्म से।।
‘श्रीपुष्पदंत’ गर्भ में ज्यों सीप में मोती।
माता को गर्भपीड़ा िंकचित् नहीं होती।।९।।
ॐ ह्रीं जयरामाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जयरामाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
दृढ़रथ पिता थे ‘राजभद्र’ पुरी के पती।
उनकी प्रिया ‘सुनन्दा’ ना हुर्इं ऋतुमती।।
फिर भी सुपुत्र फल दिया ‘श्रीशीतलेश’ को।
मुनियों से मान्य माता जजते सभी तुमको।।१०।।
ॐ ह्रीं सुनन्दाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुनन्दाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘विष्णूनृपति’ सिंहपुरी के अधिप हुये।
‘विष्णुश्री’ रानी से ‘श्रेयांस’ जिन हुये।।
माँ एक पुत्र जन्म देय अंत कर दिया।
फिर स्त्रीिंलग छेद मुक्तिधाम ले लिया।।११।।
ॐ ह्रीं विष्णुश्रीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विष्णुश्रीrजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘चंपापुरी’ के राजा ‘वसुपूज्य’ थे पिता।
माता ‘जयावती’ के जीवन की सफलता।।
जिन ‘वासूपूज्य’ को जना इन्द्रों से पूज्य हो।
हम भी जजें तुम्हें नित सौभाग्य वृद्धि हो।।१२।।
ॐ ह्रीं जयावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जयावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘कांपिल्यपुर’ के नृप श्री ‘कृतवर्म’ की प्रिया।
माता ‘जयश्यामा’ ने ‘विमलेश’ सुत दिया।।
तुम गर्भवती माँ को इन्द्राणियाँ भजें।
मुनिराज भी तुम कीर्ती गाते नहीं थवेंâ।।१३।।
ॐ ह्रीं जयश्यामाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जयश्यामाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
श्रीसिंहसेन अयोध्यानगरी के पती थे।
श्री ‘सुव्रता’ रानी से युत इन्द्रवंद्य थे।।
हे मात! प्रसवपीड़ा बिना पुत्र की जननी।
जिनवर अनंत से तुम दु:ख शोक की हरणी।।१४।।
ॐ ह्रीं सुव्रताजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुव्रताजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
श्रीभानुराज रत्नपुरी के अधीश थे।
श्रीधर्मनाथ सुत से जग में प्रपूज्य थे।।
माँ ‘सुप्रभा’ कुरुवंश के भास्कर के जन्म से।
त्रिभुवन के इंद्र से भी वंदित हुर्इं भू पे।।१५।।
ॐ ह्रीं सुप्रभाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुप्रभाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
यह हस्तिनापुरी श्रीविश्वसेन से पालित।
माँ ‘ऐरावती’ भी थीं सुरदेवियों सेवित।।
तीर्थेश मदन चक्री इन तीन पद सहित।
सुत शांतिनाथ को जनी थीं ये जगत् महित।।१६।।
ॐ ह्रीं ऐरावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं ऐरिणीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
नृप सूरसेन भी थे हस्तिनापुरी अधिप।
रानी कहीं ‘‘सुमित्रा’’ श्रीवुंâथुनाथ सुत।।
रत्नों के पालने में सुत को झुला रहीं।
स्वर्गों की देवियाँ भी जिन गीत गा रहीं।।१७।।
ॐ ह्रीं सुमित्राजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुमित्राजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
थे हस्तिनापुरी के ‘‘सुदर्शन’’ जगत्पिता।
रानी ‘‘प्रभावती’’ थी जगपूज्य अम्बिका।।
ये गर्भवती फिर भी त्रिवली न भंग थी।
‘‘अरनाथ’’ को जना था सुरइन्द्र वंद्य थीं।।१८।।
ॐ ह्रीं प्रभावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्रभावतीrजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
मिथिलापुरी के राजा पितु वुंâभराज थे।
‘‘पद्मावती’’ प्रिया से त्रिभुवन ललाम थे।।
श्रीमल्लिनाथ सुत ने तीर्थेश पद लिया।
माता पिता किसी को भी प्रणमन नहीं किया।।१९।।
ॐ ह्रीं पद्मावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पद्मावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
थे राजगृही के अधिप सुमित्र जगपिता।
‘‘वप्रा’’ प्रसू से मुनिसुव्रत जन्म लिया था।।
बस एक पुत्र से ही माँ वीरसू हुर्इं।
पूजें तुम्हें कुलमंडन सुत पावते वही।।२०।।
ॐ ह्रीं वप्रावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वप्रावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
ाqमथिलापुरी के नृपति विजयराज पितु हुये।
माता ‘‘विनूता’’ से सुपुत्र नमिजिन हुये।।
सुर के घरों में बाजे स्वयमेव बज उठे।
सुर इन्द्र भी माँ के चरणों में थे झुके।।२१।।
ॐ ह्रीं विनूताजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विनूताजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
शौरीपुरी के नृप ‘‘समुद्रविजय’’ थे महान्।
माता ‘‘शिवादेवी’’ हुर्इं महिलाओं में प्रधान।।
तीर्थेश नेमिनाथ को सुख से जनम दिया।
सुरशैल पे शिशू का सुरपति न्हवन किया।।२२।।
ॐ ह्रीं शिवादेवीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं शिवादेवीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
वाराणसी के नाथ विश्वसेन जगपिता।
इनकी प्रिया थी ‘‘देवदत्ता’’ प्रसू विश्रुता।।
सुत पाश्र्व को जन्मा शची प्रसूतिगृह गर्इं।
बालक को गोद में लिया रोमांच हो गर्इं।।२३।।
ॐ ह्रीं देवदत्ताजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं देवदत्ताजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
वुंâडलपुरी के नाथ सिद्धारथ महान थे।
त्रिशला महासती से हुये वर्धमान थे।।
इन्द्रों ने जन्म उत्सव सुमेरु पर किया।
माता के चरण पूजके जीवन सफल किया।।२४।।
ॐ ह्रीं प्रियकारिणीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्रियकारिणीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
-शंभु छंद-
इसविध जिनमाता की पूजा करके जिनवर गुणगान किया।
हे माता! मुझ पर हो प्रसन्न इसलिये आप यशगान किया।।
त्रिभुवनगुरु की जननी मानी मुनिगण भी तुम कीर्ती गाते।
हम पूर्ण अर्घ्य देकर तुमको निजकीर्ति पताका लहराते।।२५।।
ॐ ह्रीं मरुदेवीप्रभृतिप्रियकारिणीपर्यंतजिनमातृभ्य: पूर्णाघ्र्यं समर्पयामि।

दोहा- तीर्थंकर सुत जन्म दे, जिनजननी विख्यात।
धर्म स्थिति के हेतु हैं, नमूँ नमाकर माथ।।२६।।
(वन्दना मुद्रा से इस श्लोक को पढ़कर भक्तिपूर्वक जिनमाता को पंचांग नमस्कार करें।)

इस प्रकार जिनमातृ पूजा पूर्ण हुई।


अथ बत्तीस दलों में स्थापित बत्तीस इन्द्र पूजा


अथ पुष्पांजलि:
-शेर छंद-
चारों निकाय देव के जो इन्द्र मान्य हैं।
जिनदेव की भक्ती करें इससे महान् हैं।।
वैभव द्युती सुख ज्ञान आदि से प्रसिद्ध हैं।
मंत्रों से आराधन करूँ पूजूँ ये इष्ट हैं।।१।।
इति द्वात्रिंशदिन्द्रपूजाप्रतिज्ञापनाय पत्रेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।

जो सातकोटि लक्ष बाहत्तर भवन कहें।
इनके अधिप भवनेन्द्र के दश भेद हो रहे।।
भवनामरेन्द्र सर्व आप आइये यहाँ।
पूजाविधि के विघ्न को निवारिये यहाँ।।२।।
भवनेन्द्रसमुदायपूजाविधानाय पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
अथ प्रत्येक पूजा
-दोहा-
असुरइन्द्र आवो यहाँ, निज परिवार समेत।
जिनधर्मी वत्सल यहाँ, यज्ञभाग तुम हेत।।१।।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्राय इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

अथ अष्टदलस्थापितजयादिदेवतार्चना
(अब अष्टदल कमल में स्थापित जया आदि आठ देवियों की क्रम से पूजा करना है। इन जयादि देवियों की पूजा के लिए एक थाल में पूजन सामग्री लेकर जिनेन्द्रदेव के चरण कमलों में अवतरणविधि करके अपने पास में रख लेवें। इसी सामग्री से देवियों की पूजा करें।)
पुष्पांजलि:-नरेन्द्र छंद
त्रिभुवन विजयी कामदेव को मोहशत्रु को जीता।
ऐसे श्रीजिनदेव देव के चरणकमल की भक्ता।।
कुमत विजय में दक्ष जिनेश्वर मार्ग रक्षिका मानीं।
ऐसी जयादि आठ देवियाँ पूजन योग्य बखानी।।१।।
जयादिदेवीपूजाप्रतिज्ञापनाय अष्टदलकमलेषु पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

-अथ प्रत्येक पूजा-नरेन्द्र छंद-
ज्ञानावरण पाँच प्रकृती को जीत बने ‘‘जिन’’ देवा।
आप भक्त श्री जिन बन जाते अत: आप भव छेवा।।
जिनचरणों की भक्ता देवी ‘‘जया’’ आपको जजते।
जिनभक्तों के विघ्न हरण में दक्षा हो वृषरुचि से।।१।।
ॐ ह्रीं जये देवि! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं जये देवि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं जये देवि! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
(इन मंत्रों से कमल के प्रथम दल पर पुष्पांजलि क्षेपण करते हुए स्थापना विधि करें। पुन: आगे लिखे मंत्र को बोलकर अर्घ्य समर्पित करें।)
ॐ ह्रीं जयायै इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
नवविध कर्म दर्शनावरणी उन पर विजय किया है।
स्याद्वाद से मिथ्यादृक् के वच पर विजय लिया है।।
ऐसे जिनवर चरणकमल की ‘विजया देवी’ भक्ता।
भजूँ सदा मैं धर्मप्रेम से नित्य धर्म आसक्ता।।२।।
ॐ ह्रीं विजया देवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विजयादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
द्वितीय दल में पुष्पांजलि क्षेपण करें-
अट्ठाइस विध मोहकर्म को जीत जिनेन्द्र हुए हैं।
भक्तों के भी कर्मनिवारक जग में ख्यात हुए हैं।।
उनके चरण कमल की नितप्रति भक्ति करें अतिरुचि से।
‘अजिता’ देवी यहाँ पधारो यज्ञभाग लो मुद से।।३।।
ॐ ह्रीं अजितादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अजितादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
अन्तराय अरिकर्म जगत् में विघ्न करें सब विध से।
किया पराजय अत: जिनेश्वर भक्ति करें भवि रुचि से।।
विघ्नपराजय करने हेतु ‘‘अपराजिता’’ यहाँ अब।
आवो यज्ञभाग लो जिनपद, भक्ता सौख्य भरो सब।।४।।
ॐ ह्रीं अपराजितादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अपराजितादेव्यै इदं जलं गंधं..............।

वेदनीय के सात असाता भेद विनाश किया है।
ऐसे जिनवर चरणकमल का आश्रय स्वयं लिया है।।
इन्द्र आदि से पूज्य जिनेश्वर भक्ती में नित तत्पर।
‘जंभा देवी’ यज्ञ भाग लो विघ्न निवारो दुखकर।।५।।
ॐ ह्रीं जम्भादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जम्भादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
नाना विध आयू को नाशा काल अनन्तानंते।
सिद्धालय में जिनवर तिष्ठें भोगें सौख्य अनंते।।
‘मोहादेवी’ जिनचरणोें की भक्ति करें अति मुद से।
उनकी अर्चा भक्ति से अब जिनभक्ता ये इससे।।६।।
ॐ ह्रीं मोहादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मोहादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
नाम कर्म के सभी भेद को जिनने नाश किया है।
उनके चरणाम्बुज में रत हो सम्यक्रत्न लिया है।।
विघ्नजाल स्तंभित करती नाम ‘स्तंभा’ धरती।
यज्ञ भाग देवूँ मैं रुचि से इनमें अति जिनभक्ती।।७।।
ॐ ह्रीं स्तंभादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं स्तंभादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
द्विविध गोत्र को नाश लोक के अग्र निवास किया है।
ऐसे प्रभु के पादयुगल का आश्रय स्वयं लिया है।।
नाम कहा ‘स्तंभिनि देवी’, आवो यज्ञ विधी में।
विघ्न निवारो यज्ञभाग लो, भजूँ तुम्हें सविधी मैं।।८।।
ॐ ह्रीं स्तंभिनीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं स्तंभिनीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
-चौबोल छंद-
हे जयादि देवी तुम आवो, पूर्ण अर्घ्य स्वीकार करो।
जिनवर के पूजा विधान में, सर्वविघ्न परिहार करो।।
जिन भक्तों पर प्रसन्न होकर, धर्मप्रेम को दर्शावो।
पूर्ण अर्घ्य हम करें समर्पण, जिनगुणप्रीती दर्शावो।।९।।
ॐ ह्रीं जयाद्यष्टदेवीभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
 इति पूर्णाघ्र्यं।

इस प्रकार जयादिदेवताओं की अर्चना पूर्ण हुई।


सोलह विद्यादेवताओं की पूजा


(अब सोलह कमलदल पर स्थापित विद्या देवताओें की पूजा करना, यहाँ पर भी पूजन सामग्री के थाल को लेकर भगवान के चरण कमलों में अवतारण विधि करके अपने पास रख लेवें और इसी से देवियों की पूजा करें।)
।। अथ पुष्पांजलि:।।
-चौबोल छंद-
चतुर्भुजायुत विद्यादेवी, सोलह रोहिणी आदि हैं।
सोलहकारण दर्शविशुद्धी आदिक में अति प्रीती है।।
मिथ्यामत विध्वंसनकरिणी जैन धर्म उद्योत करें।
इन सब विद्या देवताओं का हम यहाँ पर आह्वान करें।।१।।
इति रोहिण्यादिविद्यादेवतापूजाप्रतिज्ञापनाय षोडशदलेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।

-अथ प्रत्येक अर्घ्य -
कलश शंख पंकज व विजौरा एक एक हाथों में है।
‘‘दर्शशुद्धि’’ जिनगुण में रागी नाम ‘‘रोहिणी’’ देवी है।।
तपे स्वर्णसम सुन्दर कांती वाहन कमल तुम्हारा है।
यज्ञविधी में यहाँ पधारो यह आह्वान हमारा है।।१।।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेवि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेवि! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं रोहिणीदेव्यै इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
सम्यक् ‘‘विनय’’ गुणों में प्रीती ‘‘प्रज्ञप्ती’’ विद्या देवी।
चतुर्भुजा में क्रम से चक्र खड्ग पंकज फल को लेतीं।।
अर्हत् आज्ञा में तत्पर हो तेरा आह्वानन करते।
जिनवरयज्ञविधी में आवो विघ्न दूर कर दो मुद से।।२।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञप्तिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्रज्ञप्तिदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘शीलव्रतों की तृतियभावना’’ तीर्थंकर पद की जननी।
इनमें अनुरागी जिनभक्ता ‘‘वङ्काशृंखला’’ देवि गुणी।।
वङ्काशृंखला शंख कमल अरु बीजूपुर१ चउहाथों में।
आवो आवो विघ्न निवारो जिनवरपूजा करने में।।३।।
ॐ ह्रीं वङ्काशृंखलादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वङ्काशृंखलादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
सतत ‘‘ज्ञान उपयोग’’ भावना में अतिशय प्रीती धारें।
चतुर्भुजा में अंकुश पंकज बीजपूर फल को धारें।।
तीर्थंकर प्रकृति कारण की तीर्थंकर की भक्ति करें।
देवी ‘‘वङ्काांकुशा’’ तुम्हें हम यज्ञ भाग दें मोद भरें।।४।।
ॐ ह्रीं वङ्काांकुशादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वङ्काांकुशादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
धर्मप्रीति भवभीति यही ‘‘संवेग’’ भावना कहलाती।
इसमें प्रीति तीर्थंकरभक्ती ‘‘जांबूनदा’’ नाम पातीं।।
खड्ग व भाला कमल विजौरा क्रम से चउ कर में धारें।
हम उनका आह्वानन करके यज्ञ विघ्न को निरवारें।।५।।
ॐ ह्रीं जांबूनदादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जांबूनदादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
-शंभु छंद-
श्री संयम ‘‘त्याग’’ भावना से तीर्थंकर नाम कर्म बंधता।
इन तीर्थंकर पदकमल भक्ति है नाम ‘‘पुरुषदत्ता’’ सुभगा।।
चउकर में वङ्का पयोज शंख फल धरें धर्म को चमकावें।
इन सबको यज्ञभाग देकर सम्पूर्ण विघ्न से बच जावें।।६।।
ॐ ह्रीं पुरुषदत्तादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पुरुषदत्तादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
दुष्कर ‘‘तप’’ कर तीर्थंकर बन वृषचक्र धरें भव पार करें।
उनके गुण में अनुरागी ये ‘‘काली’’ देवी शुभ कार्य करें।।
चउ कर में मूसल खड्ग कमल फल धरतीं दयाधर्म धारें।
उनको हम यज्ञ भाग देकर जिनधर्म अिंहसा विस्तारें।।७।।
ॐ ह्रीं कालीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं कालीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
जो ‘‘साधुसमाधि’’ भावना से तीर्थंकर प्रकृति उपाज्र्य करें।
ऐसे तीर्थंकर चरणों में रत जो ‘‘महाकाली’’ नाम धरें।।
चउ कर में धनु फल वाण खड्ग जिनभक्त रक्षिका मुनि कहते।
इक दयाधर्म में प्रीति धरें हम उन्हें अर्घ्य देवें रुचि से।।८।।
ॐ ह्रीं महाकालीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं महाकालीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
जो ‘‘वैयावृत्य’’ भावना से, तीर्थंकर पुण्य बाँध करके।
जिनधर्मचक्र के नाथ बने उनकी अतिशय भक्ती करके।।
‘‘गौरी’’ देवी कर कमल धरें जिनचरणकमल को आराधें।
हम उनका आह्वानन करके जिनधर्म प्रभावन को साधें।।९।।
ॐ ह्रीं गौरीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं गौरीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘अर्हंतभक्ति’’ भावन करके अर्हंत अवस्था प्राप्त किया।
उन पादकमल की भक्ता बन, ‘‘गांधारी’’ नाम को सार्थ किया।।
कर चक्र खड्ग धारण करतीं उनको गंधादिक से यजते।
जग में जिनधर्म प्रभावन कर जिनपूजा से भव दु:ख टलते।।१०।।
ॐ ह्रीं गांधारीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं गांधारीrदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘आचार्यभक्ति’ भावन करके तीर्थंकर हो सर्वज्ञ हुये।
उनचरणकमल अनुरागी ये ‘‘ज्वालामालिनी’’ शुभ नाम लिये।।
भुज आठ धरें धनु वाण आदि जिनपूजा में अतिप्रीती है।
हम उनको यज्ञभाग देकर सब विघ्न निवारें नीति ये।।११।।
ॐ ह्रीं ज्वालामालिनीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं ज्वालामालिनीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘बहुश्रुतभक्ती’’ से पुण्य लिया तीर्थंकर धर्मतीर्थ कर्ता।
उन प्रभु के चरणकमल भजतीं जो कहीं ‘‘मानवी’’ दुखहर्ता।।
तलवार त्रिशूल धरें कर में जिनधर्म महात्म्य बढ़ाती हैं।
हम अर्घ्य प्रदान करें इनको ये विघ्न समूह नशाती हैं।।१२।
ॐ ह्रीं मानवीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मानवीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘प्रवचनभक्ती’’ कारण पाकर जो धर्मचक्र को चला रहे।
उनके श्रीचरणकमल सेवें ‘‘वैरोटी’’ देवी नाम लहें।।
कर सर्प धरें जिनधर्मप्रकाश करें जग में सुख शांति करें।
हम उनको अर्घ्य प्रदान करें सम्पूर्ण अमंगल दूर करें।।१३।।
ॐ ह्रीं वैरोटीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वैरोटीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘षट् आवश्यक’’ में हानि नहीं यह चौदहवीं भावना कही।
इससे तीर्थंकर प्रकृति बाँध जगवंद्य जिनेश्वर हुये सही।।
उन जिनवर का अर्चन करके ‘‘अच्युता’’ नाम को प्राप्त किया।
कर खड्ग धरें देवी उनको आह्वानन कर हम जजें यहाँ।।१४।।
ॐ ह्रीं अच्युतादेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अच्युतादेव्यै इदं जलं गंधं..............।
तप श्रुत आदिक से ‘‘मार्गप्रभावन’’ करके शिवपथ नेता हैं।
उन जिनवर को नित प्रणमन कर जो ख्यात ‘‘मानसी’’ देवी हैं।।
इनको जिनपूजन में आकर सम्पूर्ण विघ्न अपहरना है।
हम इसीलिए पूजें इनको जिनपूजन से भव तरना है।।१५।।
ॐ ह्रीं मानसीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मानसीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
‘‘चउविध संघ में वत्सल’’ करके जो तीर्थंकर जगवंद्य हुये।
उन प्रभु की अतिशय भक्ती कर जो ‘‘महामानसी’’ नाम लिये।।
चउकर में अक्षमाल माला वरदा मुद से अंकुश धारें।
हम इनका आह्वानन करके जिनधर्म सुयश को विस्तारें।।१६।।
ॐ ह्रीं महामानसीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं महामानसीदेव्यै इदं जलं गंधं..............।
इस विध रोहिणी आदी देवी, को मैंने यहाँ प्रसन्न किया।
हे देवी! तुम सबके प्रसाद, ये यज्ञविघ्न को नष्ट किया।।
तुम जिनवर चरण सरोरूह की, भक्ती से सेवा करती हो।
हम पूर्ण अर्घ्य तुमको अर्पें, तुम धर्मप्रीति विस्तरती हो।।१७।।
ॐ ह्रीं रोहिण्यादिविद्यादेवताभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इति पूर्णाघ्र्यं।

इस प्रकार विद्यादिकदेवताओं की अर्चना समाप्त हुई।


अथ चौबीस दलों में स्थापित जिनमाता की पूजन


-पुष्पांजलि:—शंभु छंद-
इक्ष्वाकु वंश कुरु उग्र नाथ हरि वंश श्रेष्ठ में जो जन्में।
क्षत्रिय राजा जो हुये उन्हीं की रानी जिनमाता जग में।।
ये विश्वेश्वरी जगन्माता पूज्या सुमंगला महासती।
सुरपति इन्द्राणी देव देवियों से वंदित हैं श्रेष्ठमती।।१।।
ॐ जिनमातृसमुदायपूजाप्रतिज्ञापनाय पत्रेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।

अथ प्रत्येक अर्घ्य
-शेर छंद-
श्रीनाभिराज अयोध्यापती की प्रिया हो।
जगदम्बिके जिनमात ‘‘मरुदेवी’’ आप हो।।
ऋषभेश को दे जन्म आप धन्य हो गर्इं।
तुम पूजते सौभाग्य सुयश प्राप्त हो यहीं।।१।।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, संवौषट्।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात:! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात:! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मरुदेवीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
साकेतपुरी के पती जितशत्रु की प्रिया।
‘‘विजयावती’’ माता ने पुत्ररत्न को दिया।।
इन्द्रों ने न्हवन करके ‘‘अजित’’ नाम को दिया।
हे मात! आप पूजते मन पुण्य से भरा।।२।।
ॐ ह्रीं विजयावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विजयावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
दृढ़राज नृपति की पुरी श्रावस्ति वंद्य है।
इनकी प्रिया ‘‘सुषेणा’’ देवेन्द्र वंद्य हैं।।
श्रीदेवियाँ तुम पास गूढ़ प्रश्न करें थीं।
‘संभव’ जिनेन्द्र जनम दे तुम धन्य हुई थीं।।३।।
ॐ ह्रीं सुषेणाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुषेणाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
साकेतपुरी पति ‘‘स्वयंवर’’ नृपति कहे।
‘‘सिद्धारथा’’ प्रिया को नमन देव कर रहें।।
‘अभिनंदनेश’ को जना तुम धन्य हो गर्इं।
तुम अर्चना से भूमि ये पवित्र हो गई।।४।।
ॐ ह्रीं सिद्धार्थाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सिद्धार्थाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
साकेतपती ‘मेघरथ’ की आप हो प्रिया।
माँ ‘‘मंगला’’ मलमूत्र रहित आप तनु कहा।।
श्री आदि देवियों ने गर्भ शोधना करी।
‘‘सुमती’’ प्रभू को जन्म दे मंगल किया घरी।।५।।
ॐ ह्रीं मंगलाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मंगलाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
कौशाम्बि अधिप ‘धरणराज’ की प्रिया अहो।
हे अम्बिके! ‘‘सुषीमा’’ जिनराज प्रसू हो।।
‘श्रीपद्मप्रभ’ के जन्म से जग पूजता तुम्हें।
हम भी यहाँ पे अर्घ्य दे भव वन में ना भ्रमें।।६।।
ॐ ह्रीं सुषीमाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुषीमाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘वाराणसी’ के ‘सुप्रतिष्ठ’ नृपति की रानी।
माँ ‘‘पृथ्वीषेणा’’ पुत्ररत्न से रतन खनी।।
‘सुपाश्र्वतीर्थंकर’ ने तुमसे जनम लिया।
तुमने अपूर्व सुत दे जीवन सफल किया।।७।।
ॐ ह्रीं पृथ्वीषेणाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पृथ्वीषेणाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘महासेन’ नृपति ‘चंद्रपुरी’ के अधीश थे।
सल्लक्षणा ‘स्त्रीलक्ष्मणा’ रानी से धन्य थे।।
श्रीचंद्रप्रभ के जन्म से इन्द्रादि आ गये।
थी धन्य घड़ी मात तुम्हें पूजते भये।।८।।
ॐ ह्रीं लक्ष्मणाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं लक्ष्मणाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘कावंâदी’ के अधिप ‘सुग्रीवराज’ पिता थे।
माता कही ‘जयरामा’ तीर्थेंश जन्म से।।
‘श्रीपुष्पदंत’ गर्भ में ज्यों सीप में मोती।
माता को गर्भपीड़ा िंकचित् नहीं होती।।९।।
ॐ ह्रीं जयरामाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जयरामाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
दृढ़रथ पिता थे ‘राजभद्र’ पुरी के पती।
उनकी प्रिया ‘सुनन्दा’ ना हुर्इं ऋतुमती।।
फिर भी सुपुत्र फल दिया ‘श्रीशीतलेश’ को।
मुनियों से मान्य माता जजते सभी तुमको।।१०।।
ॐ ह्रीं सुनन्दाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुनन्दाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘विष्णूनृपति’ सिंहपुरी के अधिप हुये।
‘विष्णुश्री’ रानी से ‘श्रेयांस’ जिन हुये।।
माँ एक पुत्र जन्म देय अंत कर दिया।
फिर स्त्रीिंलग छेद मुक्तिधाम ले लिया।।११।।
ॐ ह्रीं विष्णुश्रीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विष्णुश्रीrजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘चंपापुरी’ के राजा ‘वसुपूज्य’ थे पिता।
माता ‘जयावती’ के जीवन की सफलता।।
जिन ‘वासूपूज्य’ को जना इन्द्रों से पूज्य हो।
हम भी जजें तुम्हें नित सौभाग्य वृद्धि हो।।१२।।
ॐ ह्रीं जयावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जयावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
‘कांपिल्यपुर’ के नृप श्री ‘कृतवर्म’ की प्रिया।
माता ‘जयश्यामा’ ने ‘विमलेश’ सुत दिया।।
तुम गर्भवती माँ को इन्द्राणियाँ भजें।
मुनिराज भी तुम कीर्ती गाते नहीं थवेंâ।।१३।।
ॐ ह्रीं जयश्यामाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं जयश्यामाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
श्रीसिंहसेन अयोध्यानगरी के पती थे।
श्री ‘सुव्रता’ रानी से युत इन्द्रवंद्य थे।।
हे मात! प्रसवपीड़ा बिना पुत्र की जननी।
जिनवर अनंत से तुम दु:ख शोक की हरणी।।१४।।
ॐ ह्रीं सुव्रताजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुव्रताजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
श्रीभानुराज रत्नपुरी के अधीश थे।
श्रीधर्मनाथ सुत से जग में प्रपूज्य थे।।
माँ ‘सुप्रभा’ कुरुवंश के भास्कर के जन्म से।
त्रिभुवन के इंद्र से भी वंदित हुर्इं भू पे।।१५।।
ॐ ह्रीं सुप्रभाजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुप्रभाजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
यह हस्तिनापुरी श्रीविश्वसेन से पालित।
माँ ‘ऐरावती’ भी थीं सुरदेवियों सेवित।।
तीर्थेश मदन चक्री इन तीन पद सहित।
सुत शांतिनाथ को जनी थीं ये जगत् महित।।१६।।
ॐ ह्रीं ऐरावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं ऐरिणीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
नृप सूरसेन भी थे हस्तिनापुरी अधिप।
रानी कहीं ‘‘सुमित्रा’’ श्रीवुंâथुनाथ सुत।।
रत्नों के पालने में सुत को झुला रहीं।
स्वर्गों की देवियाँ भी जिन गीत गा रहीं।।१७।।
ॐ ह्रीं सुमित्राजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुमित्राजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
थे हस्तिनापुरी के ‘‘सुदर्शन’’ जगत्पिता।
रानी ‘‘प्रभावती’’ थी जगपूज्य अम्बिका।।
ये गर्भवती फिर भी त्रिवली न भंग थी।
‘‘अरनाथ’’ को जना था सुरइन्द्र वंद्य थीं।।१८।।
ॐ ह्रीं प्रभावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्रभावतीrजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
मिथिलापुरी के राजा पितु वुंâभराज थे।
‘‘पद्मावती’’ प्रिया से त्रिभुवन ललाम थे।।
श्रीमल्लिनाथ सुत ने तीर्थेश पद लिया।
माता पिता किसी को भी प्रणमन नहीं किया।।१९।।
ॐ ह्रीं पद्मावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पद्मावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
थे राजगृही के अधिप सुमित्र जगपिता।
‘‘वप्रा’’ प्रसू से मुनिसुव्रत जन्म लिया था।।
बस एक पुत्र से ही माँ वीरसू हुर्इं।
पूजें तुम्हें कुलमंडन सुत पावते वही।।२०।।
ॐ ह्रीं वप्रावतीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वप्रावतीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
ाqमथिलापुरी के नृपति विजयराज पितु हुये।
माता ‘‘विनूता’’ से सुपुत्र नमिजिन हुये।।
सुर के घरों में बाजे स्वयमेव बज उठे।
सुर इन्द्र भी माँ के चरणों में थे झुके।।२१।।
ॐ ह्रीं विनूताजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विनूताजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
शौरीपुरी के नृप ‘‘समुद्रविजय’’ थे महान्।
माता ‘‘शिवादेवी’’ हुर्इं महिलाओं में प्रधान।।
तीर्थेश नेमिनाथ को सुख से जनम दिया।
सुरशैल पे शिशू का सुरपति न्हवन किया।।२२।।
ॐ ह्रीं शिवादेवीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं शिवादेवीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
वाराणसी के नाथ विश्वसेन जगपिता।
इनकी प्रिया थी ‘‘देवदत्ता’’ प्रसू विश्रुता।।
सुत पाश्र्व को जन्मा शची प्रसूतिगृह गर्इं।
बालक को गोद में लिया रोमांच हो गर्इं।।२३।।
ॐ ह्रीं देवदत्ताजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं देवदत्ताजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।
वुंâडलपुरी के नाथ सिद्धारथ महान थे।
त्रिशला महासती से हुये वर्धमान थे।।
इन्द्रों ने जन्म उत्सव सुमेरु पर किया।
माता के चरण पूजके जीवन सफल किया।।२४।।
ॐ ह्रीं प्रियकारिणीजिनमात:! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्रियकारिणीजिनमात्रे जलादि अर्घ्यं समर्पयामि स्वाहा।

-शंभु छंद-
इसविध जिनमाता की पूजा करके जिनवर गुणगान किया।
हे माता! मुझ पर हो प्रसन्न इसलिये आप यशगान किया।।
त्रिभुवनगुरु की जननी मानी मुनिगण भी तुम कीर्ती गाते।
हम पूर्ण अर्घ्य देकर तुमको निजकीर्ति पताका लहराते।।२५।।
ॐ ह्रीं मरुदेवीप्रभृतिप्रियकारिणीपर्यंतजिनमातृभ्य: पूर्णाघ्र्यं समर्पयामि।

दोहा- तीर्थंकर सुत जन्म दे, जिनजननी विख्यात।
धर्म स्थिति के हेतु हैं, नमूँ नमाकर माथ।।२६।।
(वन्दना मुद्रा से इस श्लोक को पढ़कर भक्तिपूर्वक जिनमाता को पंचांग नमस्कार करें।)

इस प्रकार जिनमातृ पूजा पूर्ण हुई।


अथ बत्तीस दलों में स्थापित बत्तीस इन्द्र पूजा


अथ पुष्पांजलि:
-शेर छंद-
चारों निकाय देव के जो इन्द्र मान्य हैं।
जिनदेव की भक्ती करें इससे महान् हैं।।
वैभव द्युती सुख ज्ञान आदि से प्रसिद्ध हैं।
मंत्रों से आराधन करूँ पूजूँ ये इष्ट हैं।।१।।
इति द्वात्रिंशदिन्द्रपूजाप्रतिज्ञापनाय पत्रेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
जो सातकोटि लक्ष बाहत्तर भवन कहें।
इनके अधिप भवनेन्द्र के दश भेद हो रहे।।
भवनामरेन्द्र सर्व आप आइये यहाँ।
पूजाविधि के विघ्न को निवारिये यहाँ।।२।।
भवनेन्द्रसमुदायपूजाविधानाय पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
अथ प्रत्येक पूजा
-दोहा-
असुरइन्द्र आवो यहाँ, निज परिवार समेत।
जिनधर्मी वत्सल यहाँ, यज्ञभाग तुम हेत।।१।।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्राय इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
हे नागेन्द्र पधारिये, निज परिवार समेत।
जिनवर भाक्तिक्त हो तुम्हें, यज्ञभाग हम देत।।२।।
ॐ ह्रीं नागेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं नागेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सुपर्णेन्द्र निजसैन्य सह, यहाँ पधारो आज।
जिनवरगुण में रत तुम्हें अर्घ्य चढ़ाऊँ आज।।३।।
ॐ ह्रीं सुपर्णेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुपर्णेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
द्वीपकुमार अधिप यहाँ, आवो जिनवर भक्त।
यज्ञभाग ले तुष्ट हो, जिनपूजा में नित्त।।४।।
ॐ ह्रीं द्वीपकुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं द्वीपकुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
उदधिकुमार अधिप तुम्हीं, जलधिनाथ जिनभक्त।
जिनपूजा के विघ्न को, दूर करो तुम अद्य।।५।।
ॐ ह्रीं उदधिकुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं उदधिकुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
हे स्तनितकुमार के, इन्द्र पधारो आज।
निज परिवार समेत तुम, यज्ञभाग लो आज।।६।।
ॐ ह्रीं स्तनितकुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं स्तनितकुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
विद्युत्कुमर अधिप यहाँ, जिनवर यज्ञविधान।
अर्घ्य ग्रहण कर प्रीति से, करो विघ्न की हान।।७।।
ॐ ह्रीं विद्युत्वुुâमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विद्युत्कुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
दिक्कुमार अधिनाथ तुम, निज परिवार समेत।
आवो निज का भाग लो, जिनपूजा भव सेतु।।८।।
ॐ ह्रीं दिक्कुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं दिक्कुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
अग्निकुमार अधिप यहाँ, विघ्न समूह निवार।
अग्नी के उपसर्ग हर, करो सुधर्म प्रचार।।९।।
ॐ ह्रीं अग्निकुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अग्निकुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सात सैन्य के साथ में, वायुकुमार अधीश।
यज्ञ भाग ले जिनचरण, नित्य नमाओ शीश।।१०।।
ॐ ह्रीं वातकुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वातकुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
भवनवासि दश भेद के, भावनेन्द्र दश आप।
पूर्ण अर्घ्य लेकर यहाँ, भक्ति करो निष्पाप।।११।।
ॐ ह्रीं असुरेन्द्रादिदशभावनेन्द्रेभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इति पूर्णाघ्र्यं।

।। इति भावनेन्द्रार्चनं।।


अथ व्यन्तरेन्द्रार्चनं


व्यन्तरदेवों के भवन, असंख्यात श्रुत मान्य।
आठ इन्द्र उनमें प्रमुख, उन्हें जजत सुख साम्य।।१।।
व्यन्तरेन्द्रसमुदायपूजाविधिप्रतिज्ञापनाय पत्रेषु पुष्पांजिंल क्षिपेत्।
जिनपद पंकज भक्त हैं, किन्नरेन्द्र सुरमान्य।
यज्ञ भाग लो आयके, विघ्न विनाशो आन।।१।।
ॐ ह्रीं किन्नरेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं किन्नरेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं किन्नरेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं किन्नरेन्द्राय इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
िंकपुरुषेन्द्र जिनेन्द्रपद, पंकज भ्रमर समान।
यहाँ पधारो यज्ञ में, करो पूर्ण सब काम।।२।।
ॐ ह्रीं िंकपुरुषेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं िंकपुरुषेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
महोरगेन्द्र यहाँ अभी, आवो सह परिवार।
जिनभक्ती में ‘‘धुर्य तुम’’ करो अर्घ्य स्वीकार।।३।।
ॐ ह्रीं महोरगेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं महोरगेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
गंधर्वेन्द्र पधारिये, निज परिवार समेत।
तीर्थंकर पद भक्त तुम, करो अमंगल छेद।।४।।
ॐ ह्रीं गंधर्वेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं गंधर्वेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
जिनपदपंकज भक्तिरस, हे यक्षेन्द्र! हमेश।
यज्ञभाग से तुष्ट हो, हरो विघ्नघन क्लेश।।५।।
ॐ ह्रीं यक्षेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं यक्षेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सिंहारूढ़ जिनेशपद, सेवक राक्षस इंद्र।
यागविधि में आयके, करो विघ्न शत खंड।।६।।
ॐ ह्रीं राक्षसेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं राक्षसेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
स्याद्वादध्वनि के धनी, जिनवर पद सेवंत।
भूत अधिप यहाँ आयके, करो अमंगल अंत।।७।।
ॐ ह्रीं भूतेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं भूतेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
अर्हत्पदपंकेज को, पूजें प्रीति धरंत।
हे पिशाच अधिपति यहाँ, आवो सौख्य करंत।।८।।
ॐ ह्रीं पिशाचेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पिशाचेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
अष्टविधा व्यन्तर अधिप, निज निज परिकर साथ।
यज्ञ भाग लो शांतिकर, जिनवर भक्त सनाथ।।९।।
ॐ ह्रीं अष्टविधव्यन्तरेन्द्रेभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

इस प्रकार व्यन्तरेन्द्र पूजा समाप्त हुई।


अथ ज्योतिष्केन्द्र पूजा


-दोहा-
असंख्यात ज्योतिर्भवन, उनके इन्द्र प्रतीन्द्र।
निजपरिकरयुत आयके, करो भक्ति जिनचंद्र।।१।।
ॐ ज्योतिष्केन्द्रपूजाप्रतिज्ञापनाय पत्रेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
-शेर छंद-
उत्तान अर्ध गोलक सम, चन्द्रबिम्ब हैं।
इन मध्य जिनालय में जिनराज बिंब हैं।।
नक्षत्र ग्रह व तारों से सहित शोभते।
इस यज्ञ में उन्हें हम जजते प्रमोद से।।१।।
ॐ ह्रीं सोमेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं सोमेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं सोमेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सोमेन्द्राय इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
रवि के विमान मध्य जिनालय वहाँ बने।
रविदेव सपरिकर के भवन भी वहाँ बने।।
रवििंबब भ्रमण से ही दिन रात हो रहे।
उन इंद्र को हम अर्घ्य दे प्रसन्न कर रहे।।२।।
ॐ ह्रीं सूर्येन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सूर्येन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
इक चंद्र के परिवार में भास्कर प्रतीन्द्र है।
अठासी ग्रह अठाइस नक्षत्र भ्रमत हैं।।
छ्यासठ सहस नौ सौ पचहत्तर कोटिकोटि भी।
तारे कहें ऐसे असंख्य रवि हैं सही।।३।।

ॐ ह्रीं सपरिवारज्योतिष्केन्द्रेभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।


अथ द्वादश कल्पेन्द्र की पूजा


-दोहा-
सौधर्मेद्रादिक सभी, द्वादश इन्द्र प्रसिद्ध।
वैमानिक सुर स्वर्ग के, आवो जिनवर भक्त।।१।।
ॐ कल्पेन्द्रसमुदायपूजाप्रतिज्ञापनाय पुष्पांजिंल क्षिपेत्।
बत्तीस लाख विमान के, सौधर्मेन्द्र अधीश।
यहाँ पधारो अर्घ्य लो, जिनपद नावो शीश।।१।।
ॐ ह्रीं सौधर्मेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं सौधर्मेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं सौधर्मेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सौधर्मेन्द्राय इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
अट्ठाइस लख भवन के, पति ईशान सुरेश।
यज्ञविधि के विघ्न हर, तिष्ठो यहाँ हमेश।।२।।
ॐ ह्रीं ईशानेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं ईशानेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
बारह लाख विमान के, सनत्कुमार अधीश।
जिनपूजा में आइये, यज्ञ भाग लो इष्ट।।३।।
ॐ ह्रीं सनत्कुमारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सनत्कुमारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
आठ लाख सुर भवन के, अधिप कहे माहेन्द्र।
यज्ञभाग ले तुष्ट हो, जिनपदभक्त सुरेन्द्र।।४।।
ॐ ह्रीं माहेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं माहेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
चार लाख सुरभवन हैं, ब्रह्मअधिप आधीन।
अर्घ्य चढ़ाकर मैं जजूँ, जिनपद में मन लीन।।५।।
ॐ ह्रीं ब्रह्मेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं ब्रह्मेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सहस पचास विमान के, लांतवेन्द्र अधिनाथ।
यज्ञोत्सव में आयके, ग्रहणकरो निज भाग।।६।।
ॐ ह्रीं लान्तवेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं लान्तवेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
चालीस सहस विमान के, अधिप शुक्रदिव इन्द्र।
यज्ञ भाग लो भक्त तुम, जिनवर पद अरविंद।।७।।
ॐ ह्रीं शुव्रेâन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं शुव्रेâन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
छह हजार सुरभवन के, शतारेन्द्र अधिनाथ।
अर्घ्य चढ़ाकर आपको, नमूँ जिनेश्वर पाद।।८।।
ॐ ह्रीं शतारेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं शतारेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सात शतक सुरभवन के, स्वामी आनत इंद्र।
अर्घ्य चढ़ाऊँ प्रीति से, पाऊँ सौख्य अिंनद्य।।९।।
ॐ ह्रीं आनतेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं आनतेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सात शतक सुविमान के, प्राणत इंद्र अधीश।
अर्घ्य चढ़ाकर आपको, नाऊँ जिनपद शीश।।१०।।
ॐ ह्रीं प्राणतेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं प्राणतेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सप्तशतक सुर भवन के, आरणेन्द्र अधिपत्य।
अर्घ्य चढ़ाकर आपको, हरूँ उपद्रव सर्व।।११।।
ॐ ह्रीं आरणेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं आरणेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
सप्तशतक सुरभवन के, अधिपति अच्युत इंद्र।
यज्ञ भाग देकर तुम्हें, करते सदा प्रसन्न।।१२।।
ॐ ह्रीं अच्युतेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अच्युतेन्द्राय इदं जलं गंधं..............।
स्वर्गों के सुख में मगन, जिनपद पंकज भक्त।
सुरभवनों के जिन भवन, जजतें इंद्र समस्त।।१३।।
ॐ ह्रीं द्वािंत्रशदिन्द्रा: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

इस प्रकार बत्तीस इन्द्रों की पूजा पूर्ण हुई।


चतुष्कोण मंडल में स्थापित पंचदशतिथिदेवता पूजा


(यागमंडल में छह वलय के छह कमलों की रचना के बाद पाँच चौकोन मंडल बनाये हैं, उनमें से प्रथम चौकोन मंडल में पंद्रह तिथिदेवताओं के अर्घ्य चढ़ावें।)
-पुष्पांजलि:-शंभु छंद-
जो अणिमा महिमा आदि आठविध विक्रिययुत अवधीज्ञानी।
नंदा भद्रादिक तिथि प्रवर्तन विधि में दक्ष-कुशल ज्ञानी।।
इन यक्षादिक का आह्वानन, कर यज्ञभाग हम देते हैं।
ये यज्ञविधी में मंगल कर, संपूर्ण विघ्न हर लेते हैं।।१।।
ॐ तिथिदेवतासमुदायपूजाविधानाय प्रथमचतुरस्रमंडले पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
-चौपाई छंद-
कर्मशत्रुजित श्रीजिनराज, त्रिभुवनप्राणी रक्षक नाथ।
ऐसे जिनवरपद के भक्त, तिथिसुर ‘‘यक्ष’’ जजूँ मैं अद्य।।१।।
ॐ ह्रीं यक्षतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं यक्षतिथिदेव! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं यक्षतिथिदेव! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं यक्षतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
पापेन्धन को अग्निसमान, ऐसे तीर्थंकर भगवान्।
उन भाक्तिक ‘‘वैश्वानर देव’’, उनको जजूँ करूँ इत सेव।।२।।
ॐ ह्रीं वैश्वानरतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वैश्वानरतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
मोहनाम राक्षस बलवान् उनको नाश लिया निर्वाण।
शिवप्रद विघ्न क्षपण अतिदक्ष, ‘‘राक्षस’’ तिथिसुर पूजूँ सद्य।।३।।
ॐ ह्रीं राक्षसतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं राक्षसतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
घातिशैल दुर्भेदक ईश, सर्वविश्वज्ञाता जगदीश।
इनकी भक्ती में नित लीन, ‘‘नधृत’’ तिथिसुर जजूँ प्रवीन।।४।।
ॐ ह्रीं नधृततिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं नधृततिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
जो सर्वज्ञ भक्ति में लीन, जन की विपदा हरण प्रवीन।
ऐसे ‘‘पन्नग’’ तिथिसुर मान्य, अर्घ्य चढ़ाते संकट हान्य।।५।।
ॐ ह्रीं पन्नगतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पन्नगतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
सुर असुरों से पूजित पाद, मोहासुर विध्वंसक नाथ।
ऐसे जिनको पूजें नित्य, ‘असुर’ तिथीश जजूँ मैं इत्य।।६।।
ॐ ह्रीं असुरतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं असुरतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इंद्रों से पूजित पदपद्म, ऐसे जिनवर शिवसुख सद्म।
इनके सेवक ‘‘सुरसुकुमार’’, जजतें होय विघ्न परिहार।।७।।
ॐ ह्रीं सुकुमारतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सुकुमारतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
भव दु:खों से रक्षक नाथ, अत: पितामह त्रिभुवन नाथ।
ऐसे जिनवरपद के भक्त, ‘‘पिता’’ तिथीश्वर देऊँ अर्घ्य ।।८।।
ॐ ह्रीं पितृतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं पितृतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
विश्वपदारथ ज्ञानसमुद्र, चूर्ण किया सब विघ्न महाद्रि।
ऐसे तीर्थंकर पद लीन, ‘‘विश्वमालि’’ सुर जजूँ प्रवीन।।९।।
ॐ ह्रीं विश्वमालितिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विश्वमालितिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
-शेर छंद-
चौंसठकला व्यवहार का उपदेश दे दिया।
संपूर्ण विश्व एक साथ आप देखिया।।
चौंसठ चँवर ढुरावते जिनदेव के ऊपर।
उन भक्त ‘‘चमर’’ तिथिपती को जजूँ प्रीति धर।।१०।।
ॐ ह्रीं चमरतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं चमरतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
करुणा दमन व त्याग समाधी सहित धरम।
सब बाध रहित जैन मत अनादि व अनिधन।।
ऐसा धरम रुचे जिसे उस नाम ‘‘विरोचन’’।
तिथिसुर उन्हें हम अर्घ्य दे करते सदा प्रसन्न।।११।।
ॐ ह्रीं वैरोचनतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वैरोचनतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
जो विश्वविद्याईश महाविद्य जिनेश्वर।
उनके चरण सेवे सदा ‘महाविद्य’ तिथीश्वर।।
उनको समप्र्यं अर्घ्य विघ्न वृंद नशाऊँ।
विधि मंगलीक हेतू तिथिसुर को मनाऊँ।।१२।।
ॐ ह्रीं महाविद्यतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं महाविद्यतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
-रोला छंद-
कामदेव को मार अर्हत्पदवी पाई।
ऐसे श्रीजिनराज, उन पूजा सुखदाई।।
तिथिसुर उन पद भक्त, ‘‘मार’’ नाम को धारें।
यज्ञभाग उन देय सर्व उपद्रव टारें।।१३।।
ॐ ह्रीं मारतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं मारतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
विश्वहितंकर देव श्रीजिनदेव जगत में।
उनके पद की सेव करें नित्य बहुरुचि से।।
‘‘विश्वेश्वर’’ तिथिदेव, यज्ञभाग तुम लेवो।
सर्व उपद्रव हान, जिनवर कीर्ती गावो।।१४।।
ॐ ह्रीं विश्वेश्वरतिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं विश्वेश्वरतिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
शत इंद्रों से वंद्य, तीर्थंकर पद पंकज।
उन पद में अनुरक्त ‘‘िंपडाशिन्’’ तिथिसुर नित।।
उनको अर्घ्य समर्प, जिनवर यज्ञ करूँ मैं।
सब उपद्रव नाश, मंगल सौख्य भरूँ मैं।।१५।।
ॐ ह्रीं िंपडाशिन्तिथिदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं िंपडाशिन्तिथिदेवाय इदं जलादि अर्घ्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इसविध तिथिसुर पूज्य सबको तुष्ट किया है।
जिनपूजा के सर्व, विघ्न समाप्त किया है।।
पंद्रह तिथिपति आज आवो यहाँ रुची से।
पूर्ण अर्घ्य वर लेय, जिनगुण गावो मुद से।।१६।।
ॐ ह्रीं पंचदशतिथिदेवाय इदं पूर्णाघ्र्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।</font>

इस प्रकार तिथि देवताओं की पूजा पूर्ण हुई।


अथ द्वितीय चतुष्कोण मंडल में स्थापित नवग्रह पूजा


-शंभु छंद-
रवि लाल धवल शशि भौम लाल, बुध गुरु व शुक्र पीले माने।
शनि राहु केतु काले रंग के, ये नवग्रह भविजन सरधाने।।
जिनभक्ती में ये लीन रहें, जिनभक्तों के अनुवूâल रहें।
मंडल पर इनको स्थापित कर, हम नवग्रहों की शांति चहें।।१।।
ॐ नवग्रहसमुदायपूजाप्रतिज्ञापनाय चतुष्कोणमंडलस्योपरि पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
(अब प्रत्येक पूजा की प्रतिज्ञा करने के लिये आह्वानन आदि पूर्वक द्वितीय चतुष्कोण मंडल में उन्हीं-उन्हीं वर्णों के अक्षत के पुंज स्थापित कर उन पुंजों के ऊपर सूर्य आदिकों के लिये क्रम से वुंâकुम आदि से सहित दर्भासन स्थापित करें।)

पूर्व दिशा में—
-दोहा-
लाडू खीर गुड़ादि बहु, नारंगी फल आदि।
‘‘रविग्रह’’ पूजत दूर हों, ग्रह अरिष्ट की व्याधि।।१।।
ॐ ह्रीं आदित्य! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं आदित्य! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं आदित्य! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
आदित्याय स्वाहा। आदित्यपरिजनाय स्वाहा। आदित्यानुचराय स्वाहा। आदित्यमहत्तराय स्वाहा। अग्नये स्वाहा। अनिलाय स्वाहा। वरुणाय स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा। ॐ स्वाहा। भू: स्वाहा। भुव: स्वाहा। स्व: स्वाहा। ॐ भूर्भूव: स्व: स्वाहा स्वधा।
ॐ आदित्याय स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं, पाद्यं, गंधं, अक्षतान्, पुष्पं, चरुं, दीपं, धूपं, चरुं, बिंल, फलं, स्वस्तिवंâ, यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
यस्यार्थं क्रियते पूजा, स प्रसन्नोऽस्तु न: सदा।
शांतिवंâ पौष्टिवंâ चैव, सर्वकार्येषु सिद्धिदा:।।

आग्नेय दिशा में—
श्वेत पुष्प चंदन सुरभि, अक्षत दुग्ध फलादि।
‘‘शशिग्रह’’ की पूजा करूँ, हों अनुवूâल ग्रहादि।।२।।
ॐ ह्रीं सोम! अत्र आगच्छ आगच्छ....।
ॐ सोमाय स्वाहा। सोमपरिजनाय स्वाहा। सोमानुचराय स्वाहा। सोममहत्तराय स्वाहा.......।
ॐ सोमाय स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

दक्षिण दिशा में—
-दोहा-
‘‘मंगलग्रह’’ को पूजने, खदिर काष्ठ गुड़ आदि।
अर्घ्य देव ग्रह दोष हर, हरूँ अमंगल व्याधि।।३।।
ॐ ह्रीं कुज! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ कुजाय स्वाहा। कुजपरिजनाय स्वाहा। कुजानुचराय स्वाहा। कुजमहत्तराय स्वाहा......।
ॐ कुजाय स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

नैऋत्य दिशा में—
अपामार्ग समिधादि घी, दुग्ध व बहुपकवान।
‘‘बुधग्रह’’ को पूजूँ यहाँ, ग्रह अरिष्ट की हान।।४।।
ॐ ह्रीं बुध! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ बुधाय स्वाहा। बुधपरिजनाय स्वाहा। बुधानुचराय स्वाहा। बुधमहत्तराय स्वाहा..।
ॐ बुधाय स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

पश्चिम दिशा में—
अक्षमाल पुस्तक लिये, ‘‘गुरुग्रह’’ जिनपद भक्त।
खीर आदि से पूजते, नशे विघ्नघन सर्व।।५।।
ॐ ह्रीं गुरो! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ गुरवे स्वाहा। गुरु परिजनाय स्वाहा। गुरु अनुचराय स्वाहा। गुरु महत्तराय स्वाहा......।
ॐ गुरवे स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

वायव्य दिशा में—
अक्षमाल आदिक धरें, ‘‘शुक्र’’ नाम ग्रह आप।
अक्षत पुष्पादिक लिये, अर्घ्य करूँ निष्पाप।।६।।
ॐ ह्रीं शुक्र! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ शुक्राय स्वाहा। शुक्रपरिजनाय स्वाहा। शुक्रानुचराय स्वाहा। शुक्रमहत्तराय स्वाहा......।
ॐ शुक्राय स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

उत्तर दिशा में—
शयामवर्ण ‘‘शनिग्रह’’ तुम्हें, तिल अक्षत से पूज्य।
ग्रह अरिष्ट पीड़ा हरण, हेतु भेजूँ अब इत्य।।७।।
ॐ ह्रीं शनैश्चर! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ शनैश्चराय स्वाहा। शनैश्चरपरिजनाय स्वाहा। शनैश्चरानुचराय स्वाहा। शनैश्चरमहत्तराय स्वाहा......।
ॐ शनैश्चराय स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

ईशान दिशा में—
‘‘राहु’’ विधुंतुद को यहाँ, गंधादिक से अर्घ्य ।
ग्रह बाधा निरवारहूँ, जिनपद भक्ति अनघ्र्य।।८।।
ॐ ह्रीं राहो! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ राहवे स्वाहा। राहुपरिजनाय स्वाहा। राहुअनुचराय स्वाहा। राहुमहत्तराय स्वाहा......।
ॐ राहवे स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।

ऊध्र्व दिशा में—
नानाविध व्यंजन लिये, ‘‘केतूग्रह’’ को अर्घ्य ।
ग्रह पीड़ा सब दूर हों, जिनपद भक्ति अनघ्र्य।।९।।
ॐ ह्रीं केतो! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
ॐ केवते स्वाहा। केतुपरिजनाय स्वाहा। केतुअनुचराय स्वाहा। केतुमहत्तराय स्वाहा......।
ॐ केतवे स्वगणपरिवृताय इदमघ्र्यं......।
यहाँ पर जलहोम िकरने का विधान है। जल होम के पूर्व की सारी विधि करके जौ, तिल और शालि इन तीन धान्यों को मिलाकर आगे के नवग्रह के एक-एक मंत्रों से जलवुंâभ में सात-सात बार आहुति देवें।

-्नारेन्द्र छंद-
जौ तिल शाली मिश्रण करके, नवग्रह के मंत्रों से।
नीरवुंâभ में आहुति देवूँ, सप्त-सप्त मैं रुचि से।।
नवग्रह को प्रसन्न करने हित, यह जल होम करूँ मैं।
यागविधि मंडल विधान में, नवग्रह यजन करूँ मैं।।१०।।

एक-एक ग्रहों के आहुति मंत्र—
ॐ ह्रीं आदित्य महाग्रह! अमुकस्य१—शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं सोममहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं मंगलमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं बुधमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं गुरुमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं शुक्रमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं शनैश्चरमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं राहुमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं केतुमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

अनंतर२ नवग्रह के नववुंâड बनाकर अग्निहवन की पूर्णविधि करके पुन: नवग्रहों के मंत्रों से आगे कही गर्इं उन्हीं-उन्हीं समिधा से एक-एक ग्रहों के एक-एक मंत्र पढ़कर आहुति देवें। सूर्यग्रह के वुंâड में आक की समिधा, सोमग्रह के वुंâड में पलास—ढाक की समिधा, मंगलग्रह वुंâड में खैर की, बुधग्रह के वुंâड में चिरचिर (चिरचिटा), गुरु ग्रह के वुंâड में पीपल की, शुक्र ग्रह के वुंâड में गूलर की, शनिग्रह वुंâड में शमी—सपेâद कीकर की, राहुग्रह वुंâड में दूब से और केतुग्रह वुंâड में डाभ से आहुति देवें।

-नरेन्द्र छंद-
नवग्रह अग्निवुंâड में समिधा, क्रम से पृथव्â-पृथव्â हैं।
आक पलास खैर चिरचिटा, पीपल गूलर की हैं।।
शनिग्रह में सपेâद कीकर की, समिधा से आहुति है।
राहु केतु में दूब डाभ से, विधिवत् हवन करूँ मैं।।

नवग्रहों के अग्निवुंâडों में पृथव्â-पृथव्â आहुति के मंत्र—
ॐ ह्रीं ह्र: आदित्यमहाग्रह! अमुकस्य—शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: सोममहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: मंगलमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: बुधमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: गुरुमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: शुक्रमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: शनैश्चरमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: राहुमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: केतुमहाग्रह! —शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

-पूर्णाघ्र्य-चौबोल छंद-
इस विध जिनवर भक्त नवग्रह, देवों की पूजा विधि की।
हे रवि चंद्र आदि नव देवों! तुम प्रसन्न होवो नित ही।।
इस सर्वज्ञ यागमंडल में, अर्घ्य लेय सब विघ्न हरो।
सब पूजाविधि पूर्णफलित हों, अनुग्रह कर सब दोष हरो।।१।।
ॐ ह्रीं आदित्यादिनवग्रहदेवेभ्य: इदं पूर्णाघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

-चौबोल छंद-
सूर्य शौर्यगुण चंद्र कुशलता, मंगल सन्मंगलकारी।
बुध बुद्धीप्रद गुरु शुभजीवन, करें शुक्र शुभयश भारी।।
शनिग्रह बहु संपत्तीदाता, राहू बाहूबल देवें।
केतु जगत में श्रेष्ठ बनावें, नवग्रह पूजन का फल ये।।२।।
।। इष्टप्रार्थनाय पुष्पांजलि:।।

इस प्रकार नवग्रहों की पूजा पूर्ण हुई।


अथ तृतीय चतुष्कोण मंडल में स्थापित : चौबीस यक्षों की पूजा


-चौबोल छंद-
जिनभक्तों का पक्ष ग्रहण कर, जिनमत की रक्षा में दक्ष।
सर्वविपक्षी का मद चूरें, जिनशासन के चौबीस यक्ष।।
समवसरण में जिनवर सन्निध, सदा रहें सम्यग्दृष्टी।
इनका आह्वानन कर पूजें, करो सभी पर दयदृष्टी।।१।।
ॐ गोमुखादिचतुर्विंशतियक्षसमुदायपूजाविधानप्रतिज्ञापनाय तृतीयमंडले पुष्पांजिंल क्षिपेत्।
-शेर छंद-
श्रीआदिनाथ के निकट जो भक्ति से रहें।
‘‘गोवदन’’ यक्ष नाम जिनका सूरिवर कहें।।
जिननाथ के शासन के देव आइये यहाँ।
निज यज्ञ भाग लीजिये सुख कीजिये यहाँ।।१।।
ॐ ह्रीं शासनदेव गोमुखयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


श्री अजितनाथ के निकट जो नित्य ही रहे।
शासनसुदेव ‘‘महायक्ष’’ नाम श्रुत कहे।।जिन.।।२।।
ॐ ह्रीं शासनदेव महायक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


सम्भव जिनेश के समोसरण में नित रहे।
जिनपाद कमल भक्त ‘‘त्रिमुख’’ नाम यक्ष है।।जिन.।।३।।
ॐ ह्रीं शासनदेव त्रिमुखयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


तीर्थेश अभीनंदन के पास में सदा।
प्रभुपाद कमलभक्ति ‘‘यक्षेश्वर’’ करे मुदा।।जिन.।।४।।
ॐ ह्रीं शासनदेव यक्षेश्वरयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


तीर्थेश सुमतिनाथ समवसरण में सदा।
नित पास रहे ‘‘तुंबुरव’’ सुभक्त शर्मदा।।जिन.।।५।।
ॐ ह्रीं शासनदेव तुंबुरवयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


श्रीपद्मनाथ पास भक्तिभाव से रहे।
‘‘पुष्पाख्य’’ यक्षनाथ, भक्त के विघन दहे।।जिन.।।६।।
ॐ ह्रीं शासनदेव पुष्पयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


‘‘मातंग’’ यक्ष नित सुपाश्र्वनाथ पद नमें।
ये नाथ भक्त भव्य के रक्षक सदा बनें।।जिन.।।७।।
ॐ ह्रीं शासनदेव मातंगयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


चन्दाप्रभू के पास ‘‘श्याम’’ यक्ष नित्य है।
जिन भक्तगणों के सभी विघ्नों को हरत है।।जिन.।।८।।
ॐ ह्रीं शासनदेव श्यामयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


श्री पुष्पदंत भक्तिलीन ‘‘अजितयक्ष’’ हैं।
प्रभु भक्त के समस्त कष्ट हरण दक्ष हैं।।जिन.।।९।।
ॐ ह्रीं शासनदेव ब्रह्मयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


शीतल जिनेश समवसरण में सदा रहे।
वो नाथ भक्ति लीन ‘‘ब्रह्मनाम’’ यक्ष है।।जिन.।।१०।।
ॐ ह्रीं शासनदेव ब्रह्मयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


श्रेयांसनाथ पास में ‘‘ईश्वरसुयक्ष’’ है।
तीर्थेश भक्त विपद दूर करन दक्ष है।।जिन.।।११।।
ॐ ह्रीं शासनदेव ईश्वरयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


श्रीवासूपूज्य पास में ‘‘कुमारयक्ष’’ है।
जिन पूजकों के विघ्न दूर करन दक्ष है।।जिन.।।१२।।
ॐ ह्रीं शासनदेव कुमारयक्ष!अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


-दोहा—
सतत यक्ष ‘‘षण्मुख’’ रहें, विमलनाथ के पास।
यज्ञ भाग उनके लिये, अर्पूं रुचि से आज।।१३।।
ॐ ह्रीं शासनदेव षण्मुखयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


श्री अनंत जिन पास में, सुर ‘‘पाताल’’ वसंत।
यज्ञ भाग उनके लिये, अर्पण करूँ तुरंत।।१४।।
ॐ ह्रीं शासनदेव पातालयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


धर्मनाथ का ‘‘किन्नरा’’, शासन देव प्रसिद्ध।
जिन भक्तों के कार्य सब, करें शीघ्र ही सिद्ध।।१५।।
ॐ ह्रीं शासनदेव किन्नरयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


शांतिनाथ के पास में, ‘‘गरुड़’’ यक्ष निवसंत।
जिन भक्तों का भक्त है, करे विघन घन अंत।।१६।।
ॐ ह्रीं शासनदेव गरुड़यक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


वुंâथुनाथ के पास में, यक्ष रहे ‘‘गंधर्व’’।
जिन भक्तों के प्रेम से, पूरे वांछित सर्व।।१७।।
ॐ ह्रीं शासनदेव गंधर्वयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


अरहनाथ के निकट में, रहते ‘‘खेन्द्र’’ सुयक्ष।
जिन पूजा के विघ्न को, दूर करन में दक्ष।।१८।।
ॐ ह्रीं शासनदेव खेन्द्रयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


मल्लिनाथ के पास में, ‘‘धनद’’ यक्ष निवसंत।
जिन पूजक के प्रेम से, करें उपद्रव शांत।।१९।।
ॐ ह्रीं शासनदेव कुबेरयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


मुनिसुव्रत के पास में, ‘‘वरुण’’ नाम के यक्ष।
जिनपद भक्तों के सतत, इष्ट सिद्धि में दक्ष।।२०।।
ॐ ह्रीं शासनदेव वरुणयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


नमि जिनके सानिध्य में, रहते ‘‘भृकुटी’’ यक्ष।
जिन शासन के भक्त ये, हरे भव्यजन कष्ट।।२१।।
ॐ ह्रीं शासनदेव भृकुटियक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


नेमिनाथ के पास में, यक्ष ‘‘गोमेध’’ वसंत।
भक्तों को सुख शांति दे, हरे परस्पर द्वंद।।२२।।
ॐ ह्रीं शासनदेव गोमेधयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


समवसरण में पाश्र्व के, यक्ष रहें ‘‘धरणेन्द्र’’।
धरणीपति ‘‘धरणेन्द्र’’ ये, रहें भक्त के संग।।२३।।
ॐ ह्रीं शासनदेव धरणेन्द्रयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


महावीर जिन पास में, सुर ‘‘मातंग’’ वसंत।
जिन शासन रक्षक कहे, अर्घ चढ़ा पूजंत।।२४।।
ॐ ह्रीं शासनदेव मातंगयक्ष! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।


-पूर्णाघ्र्य-गीता छंद-
तीर्थंकरों के पास रहते सदा जिनवर भक्त हैं।
गोमुख प्रमुख ये यक्ष चौबिस धर्म में अनुरक्त हैं।।
ये जैन शासन की सतत रक्षा करें वृद्धी करें।
सम्यक्त्व धारी हैं स्वयं, जजतें सकल संकट हरें।।

दोहा— महाकल्पतरु यज्ञ में, आवो शासनदेव।
यज्ञ भाग तुम अर्पिहूँ, करो सहाय सदैव।।२५।।

ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरशासनदेवगोमुखप्रमुखसर्वयक्षेभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं अर्घ्यं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां इति स्वाहा।


अथ चौथे चतुष्कोण मंडल में स्थापित : चौबीस यक्षिणी की पूजा


-पुष्पांजलि:—्नारेन्द्र छंद-
भव्यजनों का पक्ष धारती, यक्षी शासनदेवी।
जगविभूति को देने में क्षम, जिनवर पद की सेवी।।
जीवदयादिक गुण में प्रमुदित, सम्यग्दर्शन युक्ता।
यागविधी में पूजन करके, शीघ्र हरूँ दुख शोका।।१।।
ॐ ह्रीं चव्रेâश्वर्यादिचतुर्विंशतिशासनदेवतासमुदायपूजाविधिप्रतिज्ञापनाय पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
चौबीस यक्षिणी के अर्घ
-नरेन्द्र छंद-
वृषभदेव के समवसरण में, ‘‘चव्रेâश्वरी’’ सुयक्षी।
सम्यग्दर्शन गुण से मंडित, खंडे सर्व विपक्षी।।
महायज्ञ पूजा विधान में, आवो आवो माता।
यज्ञ भाग मैं अर्पण करता, करो सर्व सुख साता।।१।।
ॐ ह्रीं अप्रतिचव्रेâ शासनदेवि चव्रेâश्वरीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं अप्रतिचव्रेâ शासनदेवि चव्रेâश्वरीयक्षि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं अप्रतिचव्रेâ शासनदेवि चव्रेâश्वरीयक्षि! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

अजितनाथ के समवसरण में, ‘‘अजिता’’ यक्षी रहतीं।
जिन भक्ती में रत महिलायें, नितप्रति पूजा करतीं।।महायज्ञ.।।२।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि रोहिणीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

संभव जिनके निकट ‘‘भक्तिरत’’, ‘‘प्रज्ञप्ती’’ यक्षी हैं।
जिन भक्तों के संकट हरतीं, अधर्म प्रतिपक्षी हैं।।महायज्ञ.।।३।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि नम्रेक्षीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

अभिनन्दन के निकट रहें नित, ‘‘वङ्काशृंखला देवी’’।
जिन पूजक के विघ्न निवारें, जिन चरणाम्बुज सेवी।।महायज्ञ.।।४।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि दुरितारिदेवियक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

‘‘पुरुषदत्तिका’’ यक्षी नितप्रति, सुमतिनाथ पद्भक्ता।
जो जिनभक्त धर्म के प्रेमी, उन गुण में अनुरक्ता।।महायज्ञ.।।५।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि संसारिदेवीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

कही ‘‘मोहिनी देवी’’ यक्षी, पद्मप्रभू पद सेवें।
जो जिनशासन में अनुरागी, उनको सब सुख देवें।।महायज्ञ.।।६।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि मोहिनीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

श्री सुपाश्र्व के पास रहें नित, सूरी ‘‘मानवी’’ सोहें।
जैनधर्म की वृद्धि करें नित, जिनगुण अनुरक्ता हैं।।महायज्ञ.।।७।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि मानवीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

चंद्रप्रभू के चरण लीन प्रभु भक्त यक्षिणी मानी।
अपर नाम है ‘‘ज्वालामालिनी’’ धर्मनीतिज्ञानी की।।महायज्ञ.।।८।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि ज्वालामालिनीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

पुष्पदंत के चरण कमलरत, ‘‘भृकुटीदेवी’’ यक्षी।
सम्यग्दर्शन गुण से भूषित, भविजन विघ्न विपक्षी।।महायज्ञ.।।९।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि भृकुटियक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

शीतल जिनकी ‘‘चामुंडी’’ ये, देवी प्रियंवदा हैं।
सुख संपति सौभाग्य बढ़ातीं, जिन भक्तों के सदा हैं।।महायज्ञ.।।१०।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि चामुण्डीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

नाम कही ‘‘गोमेधयक्षिणी’’ ये सम्यग्दर्शन युत।
श्री श्रेयांस के समवसरण में, जिनपदपंकज में रत।।महायज्ञ.।।११।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि गोमेधायक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

वासुपूज्य जिनशासन देवी विद्युन्मालिनि सूरि हैं।
शुक्लवर्ण सम शुभ्र गुणों से, जिनपद भक्ति करे हैं।।महायज्ञ.।।१२।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि विद्युन्मालिनियक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

-दोहा—
‘‘विद्यादेवीयक्षिणी’’ विमलनाथ पद भक्त।
अर्घ समर्पूं प्रीति से, ग्रहण करो हे यक्षि।।महायज्ञ.।।१३।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि विद्यादेवीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

‘‘विजृंभिणी’’ यक्षी रहें, प्रभु अनंत जिन पास।
अर्घ समर्पूं प्रेम से, ग्रहण करो तुम आज।।महायज्ञ.।।१४।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि विजृंभिणीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

शासनदेवि ‘‘परभृता’’ धर्मनाथ गुणलीन।
अर्घ समर्पूं नित्य मैं, करो विघन सब क्षीण।।महायज्ञ.।।१५।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि परभृतायक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

शांतिनाथ की यक्षिणी ‘‘वंâदर्पा’’ सुरि मान्य।
पूजूँ अर्घ समप्र्य मैं, करो शांति जगमान्य।।महायज्ञ.।।१६।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि वंâदर्पादेवियक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

‘‘गांधारिणी’’ सुयक्षिणी, वुंâथुनाथ पद भक्त।
अर्घ समर्पंू प्रीति से, करो उपद्रव नष्ट।।महायज्ञ.।।१७।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि गांधारिणीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

अरहनाथ की यक्षिणी, ‘‘काली’’ नाम विख्यात।
अर्घ समर्पंू यज्ञ में, करो विजय सुप्रभात।।महायज्ञ.।।१८।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि कालीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

मल्लिनाथ की यक्षिणी, ‘‘अपराजिता’’ लसंत।
रुचि से अर्र्घ समप्र्यते, धर्मविजय विलसंत।।महायज्ञ.।।१९।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि अपराजितायक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

मुनिसुव्रत शासनरता, ‘‘सुगंधिनी’’ विख्यात।
अर्घ समर्पूं प्रेम से, करो पराजित पाप।।महायज्ञ.।।२०।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि सुगंधिनीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

नमि की ‘‘कुसुमसुमालिनी’’, शासन देवी सिद्ध।
अर्घ समर्पूं प्रीति से, हो धन धान्य समृद्ध।।महायज्ञ.।।२१।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि कुसुममालिनीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

‘‘वूâष्मांडिनी’’ यक्षिणी, नेमिनाथ पद भक्त।
रुचि से अर्घ चढ़ावते, नाशो सर्व अनिष्ट।।महायज्ञ.।।२२।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि वूâष्मांडिनीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

माता ‘‘पद्मावति’’ करें, पाश्र्वनाथ गुणगान।
अर्घ समर्पण कर जजूँ, भरो सौख्य धनधान।।महायज्ञ.।।२३।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि पद्मावतीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

महावीर जिन भक्तिका, ‘‘सिद्धायिनी’’ प्रसिद्ध।
रुचि से अर्घ चढ़ावते, करो मनोरथ सिद्ध।।महायज्ञ.।।२४।।
ॐ ह्रीं शासनदेवि सिद्धायिनीयक्षि! अत्र आगच्छ आगच्छ.......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

-पूर्णाघ्र्य—गीता छंद-
तीर्थंकरों के निकट में, चौबीस शासन देवियाँ।
सम्यक्त्व गुण से मंडिता, जिनपाद पंकज सेवियाँ।।
जिनधर्म वत्सल भाव से, जिनभक्त के संकट हरें।
उनको यहाँ यज्ञांश देकर, धर्म प्रीति विस्तरें।।२५।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरशासनदेवीचव्रेâश्वरीप्रमुखसर्वयक्षीभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।</font>

इस प्रकार यक्षिणियों की पूजा पूर्ण हुई।


अथ पंचम चतुष्कोण मंडल में स्थापित : आठ दिक्कन्याओं की पूजा


-शंभु छंद-
मेरु के दक्षिण उत्तर में, कुलपर्वत हिमवन् आदी हैं।
उनमें सरवर पर कमल बने, उनपर रहती श्री आदी हैं।।
ये श्री ह्री धृति कीर्ति बुद्धी, लक्ष्मी शान्ती पुष्टी देवी।
इनको यजते जिन यज्ञ में ये, तीर्थंकर पदपंकज सेवी।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीआदिदेवीसमुदायपूजाप्रतिज्ञापनाय पंचममंडलेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
-नरेन्द्र छंद-
तीर्थंकर माता के अन्दर, दिव्य कांति विस्तारें।
पुष्प सहित कलशों से संयुत चारभुजा को धारें।।
‘‘श्रीदेवी’’ को यहाँ बुलाकर यज्ञभाग मैं देऊँ।
यागविधी में धर्मप्रभावन करके विघ्न नशाऊँ।।१।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते श्रीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट्।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

जिनमाता की सेवा करतीं, लज्जा गुण विकसातीं।
गूढ़ प्रश्न कर नाना विध से माँ का ज्ञान बढ़ातीं।।
‘‘ह्री देवी’’ को यहाँ बुलाकर अर्घ्य चढ़ाऊँ रुचि से।
यागविधी के विघ्न दूर कर धर्म बढ़ाऊँ मुद से।।२।।
ॐ ह्रीं रक्तवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते ह्रीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

सामानिक परिवार सहित हो ‘‘धृति देवी’’ आती हैं।
जिनमाता में धृती बढ़ाकर अतिशय गुण गाती हैं।।
चतुर्भुजायुत कलश हाथ में, कमल पुष्प से शोभें।
यागविधी में यज्ञभाग दें, धृतिगुण से जन लोभें।।३।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते धृतिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ.....।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

माता में जिनसंस्तव रूपी, कीर्ति योजना करतीं।
स्वयं तीर्थंकर माता की, नित कीर्ति बखाना करतीं।।
खिले पूâलयुत कलश हाथ में, ‘‘कीर्तिदेवि’’ यहाँ आतीं।
नील अद्रि के कमल भवन, से आ नियोग दर्शातीं।।४।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते कीर्तिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

जिनमाता में अखिललोकयात्रा की बुद्धि बढ़ावें।
‘‘बुद्धीदेवी’’ अतिशय बुद्धी प्रगटित कर हर्षावें।।
रुक्मी पर्वत के सरवर से आकर यज्ञविधी में।
यज्ञभाग ले प्रमुदित होतीं विघ्न हटाती क्षण में।।५।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते बुद्धिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ......।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

जिनमाता में तीन वर्गसाधन की व्यवस्था करतीं।
‘‘लक्ष्मीदेवी’’ बहुविध लक्ष्मी को विस्तारा करतीं।।
पुंडरीकद्रह की निवासिनी देवी यहाँ पधारो।
यज्ञभाग लेकर यहाँ तिष्ठो धर्मकीर्ति विस्तारो।।६।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते लक्ष्मीदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ.....।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

मन:तुष्टि को वृद्धिंगत कर अन्तराय को नाशें।
जिनमाता को सदा शांति दें अनुपम सौख्य प्रकाशें।।
‘‘शांतीदेवि’’ यज्ञभाग लो, धर्मप्रेम विस्तारो।
भक्तों के मन में शान्ती हो, जिनवर सुयश उचारो।।७।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते शान्तिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ.....।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

जिनमाता के तनु आदिक में पुष्टि विशेष करंती।
‘‘पुष्टीदेवी’’ पुष्पसहित कलशा ले मात भजंती।।
दिक्कन्या ये यज्ञभाग ले जिनपूजा में तिष्ठो।
भक्तों के सब गुण पोषित कर धर्मप्रभावन वर्धो।।८।।
ॐ ह्रीं सुवर्णवर्णे चतुर्भुजे पुष्पमुखकलशहस्ते पुष्टिदेवि! अत्र आगच्छ आगच्छ.....।
इदं जलादि अर्घ्यं गृहाण गृहाण स्वाहा।

इसविध मैंने दिक्कन्याओं की पूजा विस्तारी।
आठों देवी प्रसन्न होवो तुम उज्ज्वल गुणधारी।।
यज्ञभाग लेकर प्रमुदित हो सर्वविघ्न परिहारो।
जिनमाता की सेवा करके जिनगुण कीर्ति उचारो।।९।।
ॐ ह्रीं श्र्यादिअष्टदिक्कन्याभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।</font>

इस प्रकार दिक्कन्याओं की पूजा पूर्ण हुई।


दशदिक्पाल पूजा


(अब उसी मंडल पर दशदिक्पालों की पूजा करना है।)

-गीता छंद-
जगदेकपालक श्रीजिनेश्वर पाद पंकज अर्चना।
इस यागमंडल में यहाँ दिक्पाल की भी स्थापना।।
आवो यहाँ परिवार सह स्वीकृत करो इस अर्घ्य को।
जिनधर्म के सब विघ्न संहारो करो वर क्षेम को।।१।।
ॐ दिक्पालसमुदायपूजाविधिप्रतिज्ञापनाय पंचममंडले पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
-दोहा-
जिनपद भक्त महेन्द्र भो! जिनपरिवार समेत।
वङ्काायुधधर आइये, जजूँ विघ्नहर हेतु।।१।।
ॐ ह्रीं इंद्र! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्। ॐ ह्रीं इंद्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:। ॐ ह्रीं इंद्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इन्द्राय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

रक्तकांति हे अग्निसुर! अक्षमाल कर धार।
यज्ञ भाग को लीजिये, सब मंगल करतार।।२।।
ॐ ह्रीं अग्ने! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ अग्नये स्वाहा। अग्नये इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

कृष्णवर्ण शिर पर जटा, यमसुर आवो अत्र।
यज्ञभाग लो यज्ञ में, क्षेम करो सर्वत्र।।३।।
ॐ ह्रीं यम! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ यमाह स्वाहा। यमाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

कृष्ण कांति नैऋत्यसुर, मुद्गरकर में लेय।
कटकमुकुट भूषणसहित, जिनपद भक्ति अमेय।।४।।
ॐ ह्रीं नैऋत्य! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ नैऋत्याय स्वाहा। नैऋत्याय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

श्वेतवर्ण हे वरुणसुर! धृत मुक्ताफलमाल।
नागपाश तुम हाथ में, जिनपद में नत भाल।।५।।
ॐ ह्रीं वरुण! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ वरुणाय स्वाहा। वरुणाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

भ्रमरकांति धर हे पवन! त्रिभुवनपति के भक्त।
अघटित बाधा दूर कर, यज्ञभाग लो अद्य।।६।।
ॐ ह्रीं पवन! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ पवनाय स्वाहा। पवनाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

त्रिभुवन के चूड़ामणी, प्रभु की भक्ति करंत।
धन की वृद्धि हेतु मैं, अर्घ्य देय पूजंत।।७।।
ॐ ह्रीं कुबेर! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ कुबेराय स्वाहा। कुबेराय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

हे ईशान! सुन्दर वदन, कर में लिये त्रिशूल।
जिनपद पंकजरत तुम्हें, जजत जगत् अनुवूâल।।८।।
ॐ ह्रीं ईशान! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ ईशानाय स्वाहा। ईशानाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

फण में मणि से चमकते, धरणीपति दिक्पाल।
अंकुशकर परिवार सह, तुम्हें जजूँ जगपाल।।९।।
ॐ ह्रीं धरणेन्द्र! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ धरणेन्द्राय स्वाहा। धरणेन्द्राय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

जिनगुणमाला वंâठ धर, मोतियन हार धरंत।
भाला कर में चन्द्र तुम, पूजत विघ्न नशंत।।१०।।
ॐ ह्रीं सोम! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ सोमाय स्वाहा। सोमाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

(आगे जौ, गेहूँ, मूँग, चना, तुवर, शाली और उड़द इन सात धान्यों की एक-एक दिक्पाल के मंत्र सात-सात बार पढ़ते हुये जलवुंâभ में आहुति देवें। यह जल होम है।)
(यहाँ ‘‘जलहोमविधि’’ से होम करना है।)

-नरेन्द्र छंद-
दिक्पालों की पूजा करके, अब जल होम करूँ मैं।
जौ गेहूँ मूँग चना तुवर शाली औ उड़द लेउँ मैं।।
सप्तधान्य से नीरवुंâड में एक-एक मंत्रों से।
सप्त-सप्त आहुती करूँ दश दिक्पालों के जप मैं।।

आहुति के मंत्र-
ॐ आँ क्रों ह्रीं इन्द्राय स्वाहा। (७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं अग्नये स्वाहा। (७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं यमाय स्वाहा। (७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं नैऋत्याय स्वाहा।(७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं वरुणाय स्वाहा।(७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं पवनाय स्वाहा। (७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं कुबेराय स्वाहा। (७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं ईशानाय स्वाहा।(७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं धरणेन्द्राय स्वाहा।(७ बार)

ॐ आँ क्रों ह्रीं सोमाय स्वाहा।(७ बार)

इति आहुतिमंत्रा:।
-दोहा-
दिक्पालों की अर्चना, विधिवत् भव्य करंत।
जिनपूजा के विघ्नहर, इच्छित फल पावंत।।१।।
ॐ ह्रीं इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्य: इदं पूर्णाघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
(इस प्रकार दिक्पाल पूजा पूर्ण हुई।)

अथ द्वारपालानुवूâलनं
(अब द्वारपालों को अनुवूâल करना)
-नरेन्द्र छंद-
जिनवरयज्ञ जलधि वर्धन में शशिसम सोम कहाते।
यम दुष्टों के लिये कहे यम सम यम द्वार रखाते।।
वरुण कष्ट सज्जन के चूरें अतिशय शूर कुबेर कहें।
इन्हें बुलाकर यज्ञभाग दें, जिनवर पूजा विघ्न दहें।।१।।
ॐ सोमादिद्वारपाल-सांमुख्यविधानाय द्वारेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।

पूर्व द्वार में—पुष्पांजलि करके अर्घ्य चढ़ाना—
-दोहा-
‘‘सोम’’ हाथ में धनुष ले, पूर्व द्वार रक्षंत।
द्वारपाल को अर्घ्य दे, पूजत विघ्न हरंत।।१।।
ॐ ह्रीं धनुर्धराय अर अर त्वर त्वर हूँ सोम! अत्र आगच्छ आगच्छ....।
ॐ ह्रीं धनुर्धराय अर अर त्वर त्वर हूँ सोम! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं धनुर्धराय अर अर त्वर त्वर हूँ सोम! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं सोमाय इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

दक्षिण दिशा में पुष्पांजलि व अर्घ्य —
द्वारपाल ‘‘यम’’ दण्डधर, दंडित शत्रु करंत।
परिकर सह जिनभक्तिरत, तुम्हें जजूँ हर्षंत।।२।।
ॐ ह्रीं दण्डधराय अर अर त्वर त्वर हूँ यम! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ ह्रीं यमाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
पश्चिम दिशा में पुष्पांजलि व अर्घ्य —
पश्चिम दिक रक्षक ‘‘वरुण’’ जिनपदपंकज भृंग।
यज्ञभाग देकर तुम्हें, नाशूँ संकट वृंद।।३।।
ॐ ह्रीं पाशधराय अर अर त्वर त्वर हूँ वरुण! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ ह्रीं वरुणाय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
उत्तर दिशा में पुष्पांजलि व अर्घ्य —
गदा धार वैरी सकल, वंâपित करें कुबेर।
उत्तरदिश रखें सदा, अर्घ्य करूँ गतवैर।।४।।
ॐ ह्रीं गदाधराय अर अर त्वर त्वर हूँ कुबेर! अत्र आगच्छ आगच्छ.........।
ॐ ह्रीं कुबेराय इदमघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
दौवारिक चारों यहाँ, पूर्ण अर्घ्य लो आज।
चहुँदिश में मंगल करो, करो पूर्ण सब काज।।५।।
ॐ ह्रीं सोमादिचतुद्र्वारपालेभ्य: इदं पूर्णाघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।</font>

इस प्रकार द्वारपालानुवूâलन विधि पूर्ण हुई।


अथ यक्ष चतुष्टय पूजा


(अब विजय आदि चार यक्षों की पूजा है।)
-दोहा—
मोहशत्रुजित् त्रिजगविभु, पाद कमल अर्चंत।
‘‘विजययक्ष’’ को पूर्वदिक् यज्ञभाग अर्पंत।।१।।
ॐ ह्म्ल्व्र्यूं िंव विजययक्ष! बिंल (यज्ञभागं) गृहाण गृहाण स्वाहा।
मालाचिन्ह ध्वजा धरें, ‘‘वैजयंत’’ जिनभक्त।
दक्षिणदिक् में अर्घ्य दे, विघ्नसमूह विनष्ट।।२।।
ॐ ह्म्ल्व्र्यूं वैं वैजयंतयक्ष! बिंल गृहाण गृहाण स्वाहा।
पापजयी जिनपद नमत यक्ष ‘‘जयंत’’ त्रिकाल।
पश्चिमदिक् में अर्घ्य दे, हों जिनभक्त निहाल।।३।।
ॐ ह्म्ल्व्र्यूं जं जयंत! बिंल गृहाण गृहाण स्वाहा।
भुवनाराध्य जिनेन्द्रपद, ‘‘अपराजित’’ सेवंत।
उत्तरदिक् में अर्घ्य दे, फलते इष्ट तुरंत।।४।।
ॐ ह्म्ल्व्र्यूं अं अपराजित! बिंल गृहाण गृहाण स्वाहा।
दिग्निवासि यक्षेश चउ, जिनपूजा में आज।
पूर्ण अर्घ्य लो विघ्नहर पूर्ण करो सब काज।।५।।
ॐ ह्रीं विजयादियक्षेभ्य:! इदं पूर्णाघ्र्यं यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

इस प्रकार विजयादि यक्षों की पूजा पूर्ण हुई।


अनावृत यक्ष पूजा


(अब ईशान दिशा में अनावृत यक्ष की पूजा करना)
मेरु के ईशान में उत्तरकुरू भोगभूमि में।
मणिमय जंबूतरु की शाखा उपरि रहे जिनगृह में।।
शंख चक्र वुंâडिका अक्षमाला धरते चउकर में।
गरुड़ वाहनारूढ़ अनावृत यक्ष जजूँ भवदिशि१ में।।
ॐ दशदिशाधिनाथं त्रैलोक्यदंडनायवंâ जंबूद्वीपाधिपिंत गरुड़पृष्ठमारूढं स्निग्धभृंगांजनाभमक्षसूत्रकमंडलुव्यग्रहस्तं चतुर्भुजं शंखचक्रविधृतभुजादण्डं यक्षिणीसहितं सपरिजनसपरिवारमनावृतं देवमाह्वानयामहे स्वाहा।
हे अनावृत! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। अनावृताय स्वाहा। अनावृतपरिजनाय स्वाहा....
ॐ अनावृताय स्वगणपरिवृताय इदं अर्घ्यं ...........
।।इति अनावृतयक्षार्चनं।।

इति ब्रह्मेद्रोपरि देवर्षिसत्कार:
(ब्रह्मेन्द्र के ऊपर लौकांतिकदेवों की पूजा करना)
-नरेन्द्र छंद-
तीर्थंकर वैराग्य बढ़ाते चौदह पूरब जाने।
ब्रह्म स्वर्ग के उपरि भाग में लौकांतिक सुर माने।।
ब्रह्मचर्ययुत देवर्षी ये जिनपूजन में आवो।
यज्ञभाग ले धर्म बढ़ाओ वत्सलता दर्शाओ।।
ॐ ह्रीं लौकांतिकदेवेभ्य: पुष्पांजिंल क्षिपामि स्वाहा।
ॐ ह्रीं लौकांतिकदेवेभ्य: अर्घ्यं समर्पयामीति स्वाहा।
इति ब्रह्मेन्द्रोपरि देवर्षिसत्कार:।

अच्युतेन्द्र के ऊपर अहमिन्द्र का सत्कार
-शंभु छंद-
‘‘इंद्रोऽहं’’ नहिं है अन्य कोई भी ‘इंद्र’ यही कल्पना जहाँ।
श्रीजिनवर के नित भक्त कीर्ति, गाते संज्ञा ‘‘अहिंमद्र’’ वहाँ।।
पूजन में इनको यहाँ यजन, करके सम्यक्त्वी सदा बनें।
जिनपूजा करके अखिल विश्व में, सुयश शांति चाहूँ मन में।।१।।
ॐ ह्रीं अहमिन्द्रदेवेभ्य: पुष्पांजिंल क्षिपामि स्वाहा।
ॐ ह्रीं अहमिन्द्रदेवेभ्य: इदं जलं गंधं अक्षतान् पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं स्वस्तिवंâ यज्ञभागं च यजामहे, प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
इत्यच्युतेन्द्रोपरि अहमिन्द्रपुष्पांजलि:।

मंगलाष्टक स्थापना
(अब पृथ्वी मंडल पर आठ मंगल द्रव्य स्थापित करना)
-नरेन्द्र छंद-
श्वेत छत्र दर्पण ध्वज चामर, तोरण पंखा लाये।
नंद्यावर्त व दीपक अठदिश, मंगलद्रव्य चढ़ाये।।
मंत्रों से वेदी में आठों, मंगल द्रव्य धरूँ मैं।
जग में सर्वअमंगल हर कर, मंगल पूर्ण करूँ मैं।।१।।

एक-एक मंत्र बोलकर वेदी में एक-एक मंगलद्रव्य स्थापित करें।
१. ॐ श्वेतच्छत्रश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर श्वेत छत्र स्थापित करें।
२. ॐ अब्दश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर दर्पण स्थापित करें।
३. ॐ ध्वजश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर ध्वजा स्थापित करें।
४. ॐ चामरश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर चंवर स्थापित करें।
५. ॐ तोरणश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर तोरण स्थापित करें।
६. ॐ तालवृंतश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर पंखा स्थापित करें।
७. ॐ नंद्यावर्तश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर स्वस्तिक स्थापित करें।
८. ॐ दीपश्रियै स्वाहा।यह मंत्र बोलकर दीपक स्थापित करें।
।। इति मंगलाष्टकस्थापनं।।

अथ आयुधाष्टस्थापनं
(वहीं मंडल पर आठ आयुधों की स्थापना करें)
-दोहा—
गजारूढ़ सुवरणप्रभा, वङ्काायुध धारंत।
‘‘इन्द्राणी’’ पूरबदिशि, तिष्ठो विघ्न हरंत।।१।।
ॐ इन्द्राण्यै स्वाहा।(इस मंत्र से पूर्व दिशा में वङ्का आयुध स्थापित करें।)
नीलवर्ण सूरि ‘‘वैष्णवी’’ गरुड़ासन पर चक्र।
दक्षिण दिशि तिष्ठो सतत, जिनपद भक्ति सुभद्र।।२।।
ॐ वैष्णव्यै स्वाहा।(इस मंत्र से दक्षिण दिशा में चक्र आयुध स्थापित करें।)
‘‘कौमारी’’ विद्रुमप्रभा कर में ले तलवार।
वाहन मोर चढ़ी यहाँ, यज्ञ विघ्न निरवार।।३।।
ॐ कौमार्यै स्वाहा।(इस मंत्र से पश्चिम दिशा में तलवार आयुध स्थापित करें।)
श्यामवर्ण ‘‘वाराहिका’’ वाराही आरुढ़।
हल आयुध ले जिन यजत विघ्न करो चकचूर।।४।।
ॐ वाराहिकायै स्वाहा।(इस मंत्र से उत्तर दिशा में हल आयुध स्थापित करें।)
‘‘ब्रह्माणी’’ कमलप्रभा, कमलासन पर बैठ।
मुद्गर से आग्नेय दिश, यज्ञविघ्न हर हेत।।५।।
ॐ ब्रह्माण्यै स्वाहा।(इस मंत्र से आग्नेय दिशा में मुद्गर आयुध स्थापित करें।)
उंदुरवाहन गदाधर, ‘‘लक्ष्मी’’ सितवर्णाभ।
नैऋतदिश जिनयज्ञ के, विघ्न करो सब नाश।।६।।
ॐ लक्ष्म्यै स्वाहा।(इस मंत्र से नैऋत्य दिशा में गदा आयुध स्थापित करें।)
सूर्यकांति ‘‘चामुंडिका’’ दण्डहस्त वायव्य।
जिनवरपूजा विघ्न को, नाशो इत आगत्य।।७।।
ॐ चामुण्ड्यै स्वाहा।(इस मंत्र से वायव्य दिशा में दण्ड आयुध स्थापित करें।)
चंद्रकांति ‘‘रुद्राणि’’ सूरि, िंभडिमाल कर धार।
दिशिईशान विराजिये, पूजा विघ्न निवार।।८।।
ॐ रुद्राण्यै स्वाहा।(इस मंत्र से ईशान दिशा में िंभडिमाल आयुध स्थापित करें।)
इस प्रकार आठ आयुध की स्थापना विधिपूर्ण हुई।

आठ पताका स्थापना विधि
(अब वेदी—मंडल में आठों दिशाओं में आठ पताका स्थापित करना है)
-दोहा—
‘‘पीतप्रभा’’ देवी यहाँ, पीतवर्ण ध्वज लेय।
श्रीवेदी में पूर्वदिशि, जय हेतु तिष्ठेय।।१।।
ॐ प्रभावत्यै स्वाहा।(इस मंत्र को बोलकर पूर्व दिशा में पीतवर्ण की ध्वजा स्थापित करें।)
पद्मवर्ण ‘‘पद्मा’’ सुरी, पद्मवर्ण ध्वज लेय।
श्रीवेदी आग्नेय में, जयहेतू तिष्ठेय।।२।।
ॐ पद्मायै स्वाहा।(इस मंत्र को पढ़कर लालवर्ण की ध्वजा आग्नेय दिशा में स्थापित करें।)
‘‘मेघमालिनी’’ कृष्णप्रभ, कृष्णवर्ण ध्वज हस्त।
श्रीवेदी में दक्षिणी, दिक् तिष्ठो जयकर्त।।३।।
ॐ मेघमालिन्यै स्वाहा।(इस मंत्र से दक्षिण दिशा में काली ध्वजा स्थापित करें।)
‘‘मनोहरा’’ सुरि हरितप्रभ, हरी ध्वजा कर धार।
श्रीवेदी नैऋत दिशा, तिष्ठो जय करतार।।४।।
ॐ मनोहरायै स्वाहा।(इस मंत्र से नैऋत्य दिशा में हरी ध्वजा स्थापित करें।)
‘‘चंद्रमालिका’’ श्वेतप्रभ, श्वेत ध्वजा कर लेय।
श्रीवेदी पश्चिमदिशा, जयहेतू तिष्ठेय।।५।।
ॐ चन्द्रमालायै स्वाहा।(इस मंत्र से पश्चिम दिशा में श्वेत ध्वजा स्थापित करें।)
नीलाभा सुरि ‘‘सुप्रभा’’ नीलवर्ण ध्वज हस्त।
श्रीवेदी वायव्यदिशि, जय हेतू यहाँ तिष्ठ।।६।।
ॐ सुप्रभायै स्वाहा।(इस मंत्र से वायव्य दिशा में नीलवर्ण ध्वजा स्थापित करें।)
‘‘जया’’ देवि श्यामाभ हो, कृष्णवर्ण ध्वज लेय।
श्रीवेदी में उत्तरी, जयहेतू तिष्ठेय।।७।।
ॐ जयायै स्वाहा।(इस मंत्र से उत्तर दिशा में कृष्णवर्ण ध्वजा स्थापित करें।)
‘‘विजया’’ पाँचवरणयुता, पंचवर्ण ध्वज लेय।
श्रीवेदी ईशान में, जयनिमित्त तिष्ठेय।।८।।
ॐ विजयायै स्वाहा।(इस मंत्र से ईशान दिशा में पंचवर्णी ध्वजा स्थापित करें।)
।। इति ध्वजस्थापना विधि पूर्ण हुई ।।

अष्ट कलश स्थापना विधि
(अब वेदी—मंडल पर पूर्वादि दिशाओं में आठ कलश स्थापित करें।)
-गीता छंद-
जो तीर्थ जल से भरित शरणोत्तम व मंगल हेतु हैं।
पुष्पादि से लंकृत कलश ये आठ अतिशय श्वेत हैं।।
पणवर्ण सूत्र त्रिबार वेष्टित आठ दिश में स्थापते।
मंडल उपरि में स्थाप कर हम सर्वसिद्धी चाहते।।१।।
ॐ इति कलशाष्टकस्थापनं करोमि स्वाहा।

वाणचतुष्टय स्थापनं
(वेदी—मंडल पर चारों दिशाओं में एक-एक बाण स्थापित करें।)
-चौबोल छंद-
बाण तीक्ष्ण चउ जय हेतू हैं, मंडल कोणों पर रखते।
सपेâद सरसों पुंज धरत ही, सर्व इष्ट सिद्धी करते।।
धान्यांकुर संतानवृद्धि कर, यवारकों को मंडल पर।
श्री वेदी में स्थापित करके, चतुष्टकोण भूषित सुन्दर।।१।।
वाणचतुष्टयादिस्थापनाय वेदीकोणेषु पुष्पाक्षतं क्षिपेत्।
(मंडल के ऊपर चारों कोनों में पुष्पांजलि क्षेपण करें। पुन: एक-एक श्लोक पढ़कर उन-उन वाण आदि को स्थापित करें)
-दोहा—
भव्यों को जयप्राप्त हित, तीक्ष्ण चतुष्टय वाण।
मंडल के चउकोण में स्थापूँ यहाँ महान्।।१।।
आग्नेयादिविदिक्षु वाणान् स्थापयामि स्वाहा।(चारों कोनों पर वाण स्थापित करें।)
भविजन इच्छित सिद्धिकर, सरसों पुंज धरेय।
आग्नेयादि कोण में, सर्व अनिष्ट हरेय।।२।।
ॐ सिद्धार्थपुंजस्थापनं करोमि स्वाहा।(चारों कोनों पर सरसों के पुंज स्थापित करें।)
पूजक के संतान की, वृद्धि करें ये श्रेष्ठ।
धान्यांकुर भृत वुंâड ये नाम ‘‘यवारक’’ श्रेष्ठ।।३।।
ॐ यवारकस्थापनं करोमि स्वाहा।(मंडल के ऊपर धान्यांकुरों के वुंâडे स्थापित करें।)

शिलास्थापना
(अब वेदी—मंडल के ऊपर अग्रभाग में सिल-बट्टा को सूत्र से वेष्टित कर उस पर लवण की डली और गुड़ रखकर श्लोक व मंत्र पढ़कर स्थापित करें।)
-चौबोल छंद-
शिला विशाला लोष्ट सहित है, लवण व गुड़ उस पर रखा।
श्वेत सूत्र से वेष्टित करके, मंडल पर मैंने स्थापा।।
सुख सम्पति की पुष्टी करती, पापवृंद पीसे सबके।
जिनवर यागविधी पूजन में, आगम कथित विधी करते।।४।।
ॐ सर्वजनानंदकारिणि सौभाग्यवति! तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य-चौबोल छंद-
मंडल मध्ये बनी कर्णिका, चउ दल अठ दल कमल रचा।
आठ व चौबिस बत्तिस दल के, कमल बना उस बाह्य रचा।।
चतुष्कोण के मंडल पाँच, बनाये चउदिश द्वार बने।
मंत्र सहित नवदेव प्रभू, सुरसहित अर्घ्य दें उन्हें भजें।।५।।
ॐ ह्रीं यंत्रस्थापितसर्वदेवताभ्य: पूर्णाघ्र्यं यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां यजमानप्रभृतीनां शांिंत कुरुत कुरुत स्वाहा।
पुष्पांजलि क्षेपण करना।
-चौबोल छंद-
त्रय प्रदक्षिणा देते देते, चतुर्दिशा में पृथक्-पृथक्।
तीन-तीन आवर्त करें, एवैâक शिरोनति भी विधिवत्।।
यंत्रराज इस यागमंडल की, त्रय प्रदक्षिणा हम करते।
तीन लोक का भ्रमण दूर कर, त्रिलोकाग्र पर जा बसते।।१।।

(इस पद्य को बोलकर पुष्पांजलि क्षेपण करके यागमंडल की तीन प्रदक्षिणा देते हुये आगे की जयमाला पढ़ें।)


जयमाला

<poem>

-शंभु छंद- जय जय अर्हंत देव जिनवर, जय जय छ्यालिस गुण के धारी। जय समवसरण वैभव श्रीधर, जय जय अनंत गुण के धारी।। जय जय जिनवर केवल ज्ञानी, गणधर अनगार केवली सब। जय गंधकुटी में दिव्य ध्वनी, सुनते असंख्य सुर नर पशु सब।।१।।

इक सौ सत्तर कर्मभूमि में, केवल ज्ञानी होते रहते। फिर कर्म अघाती भी हनकर, वे सिद्धि वधू वरते रहते।। ऐसे ये सिद्ध अनंत हुये, हो रहे और भी होवेंगे। जय जय सब सिद्धों की वे मुझ, सिद्धी में निमित्त होवेंगे।।२।।

निज साम्य सुधारस आस्वादी, मुनिगण यहाँ नित्य विचरते हैं। आचार्य प्रवर चउविध संघ के, नायक यहाँ मार्ग प्रवर्ते हैं।। दीक्षा शिक्षा देकर शिष्यों, पर अनुग्रह निग्रह भी करते। प्रायश्चित देकर शुद्ध करें, बालकवत् पोषण भी करते।।३।।

गुरु उपाध्याय मुनि अंग पूर्व, शास्त्रों का वाचन करते हैं। चउविध संघों को यथायोग्य, श्रुत का अध्यापन करते हैं।। मिथ्यात्व तिमिर से मार्ग भ्रष्ट, जन को सम्यक् पथ दिखलाते। जो परम्परा से गुरुमुख से, पढ़ते वे निज निधि को पाते।।४।।

निज आत्म साधना में प्रवीण, अतिघोर तपस्या करते हैं। वे साधू शिवमारग साधें, बहु ऋद्धि सिद्धि को वरते हैं।। विक्रिया ऋद्धि चारण ऋद्धी, सर्वौषधि ऋद्धी धरते हैं। अक्षीण महानस ऋद्धी से, सब जन को तर्पित करते हैं।।५।।

तीर्थंकर धर्म चक्रधारी, जिन धर्म प्रवर्तन करते हैं। इन कर्म भूमियों में ही वे, शिव पथ का वर्तन करते हैं।। जय जय इस जैनधर्म की जय, यह सार्वभौम है धर्म कहा। सब प्राणि मात्र को अभयदान, देवे सब सुख की खान कहा।।६।।

तीर्थंकर के मुख से खिरती, वाणी सब जन कल्याणी है। गणधर गुरु उसको धारण कर, सब ग्रंथ रचें जिनवाणी है।। गुरु परम्परा से अब तक भी, यह सारभूत जिनवाणी है। इसकी जो पूजा भक्ति करें, उनके भव भव दुख हानी है।।७।।

नवसौ पचीस कोटि त्रेपन, अरु लाख सत्ताइस सहस कहीं। नवसौ अड़तालिस जिन प्रतिमा, इन सबको मैं नित नमूँ सही।। व्यंतर ज्योतिष के असंख्यात, जिनगृह की जिन प्रतिमायें हैं। प्रति जिनगृह इक सौ आठ, एक सौ आठ रहें प्रतिमायें हैं।।८।।

अठ कोटि सुछप्पन लक्ष सत्तानवे, सहस चार सौ इक्यासी। सब जिनगृह व्यंतर ज्योतिष के, उन संख्यातीत कही राशी।। इन कर्म भूमि में अगणित भी, कृत्रिम जिनगृह जिन प्रतिमायें। सुरपति चक्री हलधर आदिक, नर सुरकृत वंदत सुख पाएँ।।९।।

जो प्रतिमा प्रातिहार्य संयुत, अरु यक्ष यक्षिणी से युत हैं। निज चिन्ह व मंगल द्रव्य सहित; वे अर्हंतों की प्रतिकृति हैं।। सब प्रातिहार्य चिन्हादि रहित, प्रतिमा सिद्धों की कहलाती। अथवा अकृत्रिम प्रतिमायें, सब सिद्धों की मानी जाती।।१०।।

अर्हंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय, साधु पंच परमेष्ठी हैं। जिनधर्म जिनागम जिनप्रतिमा, जिनगृह सब मिल नवदेव कहें।। ये होते कर्मभूमियों में, हो चुके अनंतों होवेंगे। इन सबको वंदन बार-बार, भक्तों के कलिमल धोवेंगे।।११।।

इन ढाई द्वीपों से बाहर, बस शाश्वत जिनगृह जिनप्रतिमा। निंह पंच परमगुरु आदि वहाँ, निंह शिवपथ निंह नर गमन वहाँ।। सब इंद्र इंद्राणी देव देवियाँ, भक्ती से वहाँ जाते हैं। वंदन पूजन अर्चन करके, अतिशायी पुण्य कमाते हैं।।१२।।

हे नाथ! अनादी से लेकर, अब तक भी अनंतों कालों तक। चारों गति में मैं घूम रहा, दुख सहा अनंतों कालों तक।। अब धन्य हुआ तुम भक्ति मिली, सम्यग्दर्शन को प्राप्त किया। बस रत्नत्रय को पूर्ण करो, इस हेतू से ही शरण लिया।।१३।।

जय जय अर्हंत सिद्ध सूरी, जय उपाध्याय साधूगण की। जय जय जिनधर्म जिनागम की, जय जय जिनिंबब जिनालय की।। जय जय त्रैकालिक तीर्थंकर, जय अनादि अनिधन मंत्रों की। मंगल लोकोत्तम शरण भूत, अर्हंत सिद्ध साधू वृष की।।१४।।

जो जयादिदेवी रोहिणि आदी, जिनमाता बत्तिस इन्द्र कहे। तिथिसुर नवग्रह सुर यक्ष, यक्षिणी दिक्कन्या दिक्पाल कहें।। चउ द्वारपाल चउ यक्ष अनावृत यक्ष ब्रह्मेन्द्र अहिंमद्रादी। ये देव देवियाँ जिनमाता, जयशील रहें जग में नित ही।।१५।।

-सोरठा— यागमंडल श्रुतमान्य, सर्व अमंगल को हरे। मिले ‘‘ज्ञानमती’’ धाम, जहाँ पूर्ण मंगल सदा।।१६।। ॐ ह्रीं यंत्रस्थापितबहुविधसुरसमन्वितनवदेवताभ्यो जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस जयमाला को पढ़ते हुये मंडल की या भगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर पंचांग नमस्कार करें। (यागमंडल के चारों तरफ धूपघट स्थापित कर धूप खेते हुए मंडल के चारों तरफ आर्यपुरुष—यजमानों को बैठाकर श्वेत सुगंधित पुष्पों से उनसे अनादिसिद्ध मंत्र की जाप्य करावें। ७ बार या २१ बार या १०८ बार मंत्र जप करावें।)

-शंभु छंद- मंडल के चारों ओर धूपयुत धूपघड़ों को रखवायें। फिर चउ या आठ पूजकों को मंडल चउतरपेâ बिठलायें।। वर श्वेत सुरभि पुष्पों से अनादी-सिद्ध मंत्र जप करवायें। यागमंडल पूजन विधान कर, याजक मनवांछित फल पावें।।

अनादिसिद्ध मंत्र ॐ णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं।। चत्तारि मंगलं—अरिहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा—अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि—अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहु सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि। ॐ ह्रौं शांतिं कुरु कुरु स्वाहा। इस प्रकार यागमंडल को विभूषित करके जाप्य करने की विधि पूर्ण हुई।

-शंभु छंद- इस विध जो त्रिभुवन जन अर्चित, जिनवर सिद्धादिक को पूजें। जिनवर पदपंकज भ्रमर सदृश, सब प्रशस्त देवगण को भि भजें।। द्रव्यादि शुद्धियुत भक्ति सहित, विधिवत् आराधन करते हैं। वे धर्मसुरथ के नेमि बने, फिर सिद्धी लक्ष्मी वरते हैं।।१।।

-दोहा- यागमण्डल नाम का, यह विधान अतिशायि। गणिनी ‘‘ज्ञानमती’’ किया, भाषामय सुखदायि।।२।।

।।इत्याशीर्वाद:।।