योगमार्गणा अधिकार

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योगमार्गणा अधिकार

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ पंचभ:स्थलै: पंचविंशतिसूत्रै: योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: प्रतिपाद्यते। तत्र प्रथमस्थले पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगि-औदारिककाययोगिनां अन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तत: परं द्वितीयस्थले औदारिकमिश्रकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया अन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘ओरालियमिस्स-‘‘ इत्यादिसूत्रनवकं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले वैक्रियिककाय-वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनो: गुणस्थानस्थानापेक्षया अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। पुनश्च चतुर्थस्थले आहारकआहारकमिश्रयोगिनो: अन्तरकथनत्वेन ‘‘आहारकाय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया अन्तरकथनप्रकारेण ‘‘कम्मइय’’ इत्यादिसूत्रमेकं इति समुदायपातनिका।
संप्रति मनोयोगि-वचनयोगि-औदारिककाययोगिनां गुणस्थानापेक्षयान्तरनिरूपणाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-जोगाणुवादेण पंचमणजोगि-पंचवचिजोगीसु कायजोगि-ओरालिय-कायजोगीसु मिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजद-पमत्त-अपमत्त-संजद-सजोगिकेवलीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणेगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१५३।।
सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एकसमयं।।१५४।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।१५५।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१५६।।
चदुण्हमुवसामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं।।१५७।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१५८।।
चदुण्हं खवाणमोघं।।१५९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अर्पितयोगसहितविवक्षितगुणस्थानानां सर्वकालं संभवात्।
एकजीवमाश्रित्य कथं अन्तराभाव:?
न तावद् योगान्तरगमनेनान्तरं संभवति, मार्गणाया: विनाशापत्ते:। न चान्यगुणस्थानगमनेनान्तरं संभवति, गुणस्थानान्तरं गतस्य जीवस्य योगान्तरगमनेन विना पुन: आगमनाभावात्। तस्मात् एकजीवस्यापि नास्त्यन्तरं। शेषं सुगमं।
चतुर्णां उपशामकानां जघन्येन एकसमयं, उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वमन्तरं।
एकजीवापेक्षया एषां नास्त्यन्तरं, किंच एकयोगपरिणमनकालात् गुणस्थानकाल: संख्यातगुण: वर्तते।
चतु:क्षपकानामपि जघन्येन एकसमयं उत्कर्षेण षण्मासं। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं।
एवं प्रथमस्थले पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगि-काययोगि-औदारिककाययोगिनां अन्तरकथनत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।

अथ योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में पच्चीस सूत्रों के द्वारा योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार प्रतिपादित किया जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी और औदारिककाययोगी जीवों का अन्तर बतलाने हेतु ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में गुणस्थान की अपेक्षा औदारिकमिश्रकाययोगियों का अन्तर कथन करने हेतु ‘‘ओरालियमिस्स’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में वैक्रियिककाययोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर बतलाने हेतु ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: चतुर्थ स्थल में आहारक और आहारकमिश्रकाययोगियों का अन्तर कथन करने हेतु ‘‘आहारकाय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर पंचम स्थल में कार्मणकाययोगियों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर बतलाने हेतु ‘‘कम्मइय’’ इत्यादि एक सूत्र है। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब सर्वप्रथम मनोयोगी-वचनयोगी और औदारिककाययोगी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर बतलाने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुवाद से पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, काययोगी और औदारिककाययोगियों में मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और सयोगिकेवलियों का अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवों की और एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१५३।।

उक्त योग वाले सासादन सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।१५४।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है।।१५५।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१५६।।

उक्त योग वाले चारों उपशामकों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा गुणस्थान के समान अन्तर है।।१५७।।

एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१५८।।

उक्त योग वाले चारों क्षपकों का अन्तर गुणस्थान के समान है।।१५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्र में कहे गये विवक्षित योगों से सहित विवक्षित गुणस्थान सर्वकाल में संभव हैं।

शंका-एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव कैसे कहा ?

समाधान-सूत्रोक्त गुणस्थानों में न तो अन्य योग में गमन का अन्तर संभव है, क्योंकि ऐसा मानने पर विवक्षित मार्गणा के विनाश की आपत्ति आती है और न अन्य गुणस्थान में जाने से भी अन्तर संभव है, क्योंकि दूसरे गुणस्थान को गये हुए जीव के अन्य योग को प्राप्त हुए बिना पुन: आगमन का अभाव है। इसलिए सूत्र में बताये गये जीवों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं होता है। शेष कथन सुगम है।

चारों उपशामकों का जघन्य अन्तर एक समय है, उत्कृष्ट अन्तर वर्ष पृथक्त्व है।

एक जीव की अपेक्षा उनका कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि एक योग के परिणमन काल से गुणस्थान का काल संख्यातगुणा होता है।

चारों क्षपक श्रेणी वाले मुनियों का भी जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है। एक जीव की अपेक्षा उनका कोई अन्तर नहीं है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, काययोगी और औदारिककाययोगी जीवों का अन्तर बतलाने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति औदारिकमिश्रकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते

संप्रति औदारिकमिश्रकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-ओरालिय मिस्स कायजोगीसु मिच्छादिट्ठीण मंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणेगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१६०।।

सासणसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं।।१६१।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१६२।।
असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरंं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।१६३।।
उक्कस्सेण वासपुधत्तं।।१६४।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१६५।।
सजोगिकेवलीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।१६६।।
उक्कस्सेण वासपुधत्तं।।१६७।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१६८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-औदारिकमिश्रयोगिनां मिथ्यादृष्टि-सासादनयो: नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं। देवनारकमनुष्याणां असंयतसम्यग्दृष्टीनां मनुष्येषु उत्पत्तेर्विना मनुष्यासंयतसम्यग्दृष्टीनां तिर्यक्षु उत्पत्तेर्विना एकसमयं अन्तरं, असंयतसम्यग्दृष्टिविरहितौदारिकमिश्रकाययोगस्य संभवात्। उत्कर्षेण तिर्यग्मनुष्ययो: वर्षपृथक्त्वकालमात्रमसंयतसम्यग्दृष्टीनामुत्पादाभावात्। एकजीवापेक्षया तस्मिन् तस्य गुणस्थानयोगान्तर-संक्रांतेरभावात्। सयोगिकेवलिनां कपाटपर्यायविरहितानामेकसमयोपलंभात् जघन्येनैकसमयं। उत्कर्षेण कपाटपर्यायेण विना केवलिनां वर्षपृथक्त्वावस्थानसंभवात्।
एकजीवापेक्षया योगान्तरं अगत्वा औदारिकमिश्रकाययोगे चैव स्थितस्य अन्तरासंभवात् निरंतरं नास्त्यन्तरं वा इति।
एवं औदारिकमिश्रकाययोगिमिथ्यादृष्टि-सासादन-असंयत-सयोगिकेवलिनामन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्राणि नव गतानि।
अधुना वैक्रियिककाययोगि-वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनोरन्तरकथनाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते-वेउव्वियकायजोगीसु चदुट्ठाणीणं मणजोगिभंगो।।१६९।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगीसु मिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।१७०।।
उक्कस्सेण बारस मुहुत्तं।।१७१।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१७२।।
सासणसम्मादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीणं ओरालियमिस्सभंगो।।१७३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वैक्रियिककाययोगिनां नानैकजीवं अपेक्ष्य अन्तराभावेन साधम्र्यात् मनोयोगिवत् अन्तरं। वैक्रियिकमिश्रकाययोगिमिथ्यादृष्टय: सर्वे वैक्रियिककाययोगं गता:। एकसमयं वैक्रियिकमिश्रकाययोगो मिथ्यादृष्टिभि: विरहितो दृष्ट:। द्वितीयसमये सप्ताष्टजना: वैक्रियिकमिश्रकाययोगे दृष्टा:। लब्धमेकसमयमन्तरं।
उत्कर्षेण वैक्रियिकमिश्रकाययोगिमिथ्यादृष्टय: सर्वेऽपि वैक्रियिककाययोगं गता:, तत्र द्वादशमुहूर्तमात्रमंतरं कृत्वा पुन: सप्ताष्ट जना: वैक्रियिकमिश्रकाययोगं प्रतिपन्ना:। लब्धं द्वादशमुहूर्तान्तरं।
एकजीवापेक्षया योग-गुणस्थानान्तरगमनाभावात् नास्त्यन्तरं।
सासादनानां नानाजीवापेक्षया जघन्येन एकसमयं। उत्कर्षेण पल्योपमस्य असंख्यातभाग:। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं।
असंयतसम्यग्दृष्टीनां नानाजीवापेक्षया जघन्येन एकसमयं, उत्कर्षेणमासपृथक्त्वान्तरं। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोरन्तरकथनमुख्यत्वेन पंचसूत्राणि गतानि।


अब औदारिकमिश्रकाययोगियों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर प्रतिपादन करने हेतु नौ सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

औदारिकमिश्रकाययोगियों में मिथ्यादृष्टि जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहंीं है, निरन्तर है।।१६०।।

औदारिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर गुणस्थान के समान है।।१६१।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१६२।।

औदारिकमिश्रकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।१६३।।

औदारिकमिश्रकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्वप्रमाण है।।१६४।।

औदारिकमिश्रकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टियों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है।।१६५।।

औदारिकमिश्रकाययोगी सयोगिकेवली जिनों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।१६६।।

औदारिकमिश्रकाययोगी केवली जिनों का नाना जीवों की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है।।१६७।।

औदारिकमिश्रकाययोगी केवली जिनों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१६८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टि और सासादन गुणस्थान में औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का नाना जीव एवं एक जीव की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है।

क्योंकि देव, नारकी और मनुष्य असंयतसम्यग्दृष्टियों का मनुष्यों में उत्पत्ति के बिना तथा मनुष्य असंयतसम्यग्दृष्टियों का तिर्यंचों में उत्पत्ति के बिना असंयतसम्यग्दृष्टियों से रहित औदारिकमिश्रकाययोग का एक समय प्रमाण काल अन्तर संभव है।

क्योंकि उत्कृष्ट से तिर्यंच और मनुष्यों में वर्ष पृथक्त्वप्रमाण काल तक असंयतसम्यग्दृष्टियों का उत्पाद नहीं होता है।

क्योंकि एक जीव की अपेक्षा औदारिकमिश्रकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टि जीव में उक्त गुणस्थान और औदारिकमिश्रकाययोग के परिवर्तन का अभाव है। कपाटसमुद्घात से रहित सयोगिकेवली जिनों का जघन्य से एक समय अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्ट से कपाटसमुद्घात के बिना केवली जिनों का वर्ष पृथक्त्व तक रहना संभव है।

एक जीव की अपेक्षा अन्य योग को नहीं प्राप्त होकर औदारिकमिश्रकाययोग में ही स्थित केवली जिनों के अन्तर का होना असंभव है। वह निरन्तर है अथवा वहाँ कोई अन्तर नहीं है, ऐसा समझना चाहिए।

इस प्रकार औदारिकमिश्रकाययोगी मिथ्यादृष्टि-सासादन-असंयत एवं सयोगिकेवलियों का अन्तर बतलाने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

अब वैक्रियिककाययोगी एवं वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का अन्तर कथन करने के लिए पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगियों में आदि के चारों गुणस्थानवर्ती जीवों का अन्तर मनोयोगियों के समान है।।१६९।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नानाजीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।१७०।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी मिथ्यादृष्टियों का नाना जीवों की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर बारह मुहूर्त है।।१७१।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी मिथ्यादृष्टियों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१७२।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर औदारिकमिश्रकाययोगियों के समान है।।१७३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वैक्रियिककाययोगी जीवों में नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव होने से दोनों में समानता है, इनका अन्तर मनोयोगियों के समान है।

सभी वैक्रियिकमिश्रकाययोगी मिथ्यादृष्टि जीव वैक्रियिककाययोग को प्राप्त हुए। इस प्रकार एक समय वैक्रियिकमिश्रकाययोग, मिथ्यादृष्टि जीवों से रहित दिखाई दिया। द्वितीय समय में सात-आठ जीव वैक्रियिकमिश्रकाययोग में दृष्टिगोचर हुए-दिखाई दिए। इस प्रकार एक समय का अन्तर उपलब्ध हुआ।

उत्कृष्ट से वैक्रियिकमिश्रकाययोगी सभी मिथ्यादृष्टि जीव वैक्रियिककाययोग को प्राप्त हो गये, वहाँ पर बारह मुहूर्त प्रमाण अन्तर करके पुन: सात-आठ जीव वैक्रियिकमिश्रकाययोग को प्राप्त हुए। यह बारह मुहूर्तप्रमाण अन्तर होता है।

एक जीव की अपेक्षा अन्य योग और अन्य गुणस्थान में गमन का अभाव है, इसलिए अन्तर नहीं है।

सासादनसम्यग्दृष्टियों का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है, इनमें एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है। असंयतसम्यग्दृष्टियों का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य एक समय और उत्कृष्ट मासपृथक्त्व अन्तर है। एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव है।

इस प्रकार तृतीयस्थल में वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्र जीवों का अन्तर बतलाने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

आहार-आहारमिश्रयोगिनो: नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयं अवतार्यते

आहार-आहारमिश्रयोगिनो: नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयं अवतार्यते-आहारकायजोगीसु आहारमिस्सकायजोगीसु पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।१७४।।

उक्कस्सेण वासपुधत्तं।।१७५।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१७६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रयाणामपि सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। एकजीवापेक्षयापि तस्मिन् योगे योग-गुणस्थानान्तरग्रहणाभावात् नास्त्यन्तरं। आहारशरीरप्रकृतिबंध: सप्तमगुणस्थाने एव भवति किंतु अस्योदयस्तु षष्ठगुणस्थानेऽस्ति एतज्ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले आहार-आहारमिश्रयोरन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
कार्मणकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-कम्मइयकायजोगीसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठि सजोगिकेवलीणं ओरालियमिस्सभंगो।।१७७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टीनां नानैकजीवं प्रतीत्य अन्तराभाव:। सासादनानां नानाजीवापेक्षया जघन्येन एकसमयं, उत्कर्षेण पल्योपमासंख्यातभाग:। एकजीवापेक्षया अन्तराभाव:। असंयतसम्यग्दृष्टीनां नानाजीवगतजघन्योत्कृष्टाभ्यां एकसमय-मासपृथक्त्वेऽन्तरे एकजीवगतान्तराभाव:। सयोगिनां नानापेक्षया एकसमयं जघन्येन, वर्षपृथक्त्वं उत्कर्षेण। एकजीवापेक्षया अन्तराभावोऽस्ति इति।
एवं पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनां अन्तरकथनप्रकारेण सूत्रमेकं गतं।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचम ग्रंथे अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणि-
टीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।

अब आहारक और आहारकमिश्रकाययोगी नाना जीव और एक जीव का जघन्य एवं उत्कृष्ट अंतर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों में प्रमत्तसंयतों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।१७४।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है।।१७५।।

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों में प्रमत्तसंयतों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१७६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। एक जीव की अपेक्षा उस योग में अन्य योग या अन्य गुणस्थान के ग्रहण करने का अभाव होने से दोनों प्रकार के योगियों में कोई अन्तर नहीं है। आहारकशरीर प्रकृति का बंध सप्तम गुणस्थान में ही होता है, किन्तु इसका उदय छठे गुणस्थान में होता है ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में आहारक और आहारकमिश्रकाययोगियों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब कार्मणकाययोगियों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगियों में मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और सयोगिकेवलियों का अन्तर औदारिकमिश्रकाययोगियों के समान है।।१७७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टियों में नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव है। सासादनसम्यग्दृष्टियों का नाना जीवगत जघन्य एक समय और उत्कृष्ट पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण अन्तर है तथा एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव है। असंयतसम्यग्दृष्टियों का नाना जीवगत जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्व में एक जीवगत अन्तर का अभाव है। सयोगिकेवलियों का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य एक समय और उत्कृष्ट वर्षपृथक्त्व अन्तर पाया जाता है तथा एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव है।

इस प्रकार पंचम स्थल में कार्मणकाययोगियों का अन्तर कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अन्तरानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त चिंतामणिटीका मेंयोगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।