रत्नत्रय :

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रत्नत्रय :

सम्मद्दंसंण—णाणं चरणं मुक्खस्स कारणं जाणे।
—द्रव्यसंग्रह : ३९

सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यग्चारित्र—यही रत्नत्रय मोक्ष का साधन है।

तत्त्वरुचि: सम्यक्त्वं, तत्त्व—प्रख्यापकं भवेत् ज्ञानम्।

पापक्रियानिवृत्तिश्चारित्रमुक्तं जिनेन्द्रेण।।

—ज्ञानार्णव : ९१

जिनेन्द्र भगवान ने तत्त्वविषयक रुचि को सम्यग्दर्शन, तत्त्वविषयक ज्ञान को सम्यग्ज्ञान और पापमय क्रिया से निवृत्ति को सम्यक् चारित्र कहा है।