रत्नमती

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रत्नमती - बीसवी सदी की एक प्रसिद्ध आर्यिका,जो गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की गृहस्थावस्था की मा थी।सन् 1924 मे इनका जन्म महमूदाबाद में हुआ, इन्होंने अपने विवाह में पिता से दहेज मे प्राप्त पùनंदी पंचविंषतिका ग्रथ का स्वघ्याय करके अपने जीवन को सुसंस्कृत किया। जिसके फलस्वरूप इनकी संन्तानो में भी त्याग के बीज अंकुरित हुए। अंतत इन्होने स्वयं भी अर्यिका अवस्था में 13 वर्शों तक रत्नत्रय की साघना करके 15 जनवरी 1985 को हस्तिनापुर मे जम्बुद्धीप स्थल पर गणिनि आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के सानिघ्य में सल्लेखना विघिपूर्वक मरण प्राप्त किया।आर्यिका माता होने के बाद भी उन्होने जैन घर्म की दीक्षा परम्परा के अनुसार ज्ञानमती माताजी की पुत्री न मानकर सदैव गूरू रूप् में स्वीकार किया और उन्ही के निर्यापकाचार्यत्व में क्षपक बनकर समाघि ग्रहण की।


Ratnamati-The mother name of household life of the first famous Aryika in the 20th century ganini pramukh Shri Gyanmati mataji. Shri went through a treatise ‘Padmanandi panchavinshatika’ and ultimaterly turned to the path of salvation of become Aryika. After a long journey of 13 years in asceticism. She got a great holy death with sallekhana of 15th January 1985 at jambudvip in Hastinapur, in the auspicious presence of ganini Gyanmati mataji.