श्रेणी:दश धर्म का विवेचन

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आर्जव धर्मका लक्षण

मोत्तूण कुडिलभावं, णिम्मलहिदएण चरदि जो समणो ।
अज्जवधम्म तइओ, तस्स दु सभवदि णियमेण । । ७३ । ।
जो मुनि कुटिलभावको छोड्कर निर्मल हृदयसे आचरण करता है उसके नियमसे तीसरा आर्जव धर्म होता है । । ७३ । ।
सत्यधर्मका लक्षण
परसतावणकारणवयण मोत्तूण सपरहिदवयण ।
जो वददि भिक्खु तुरियो, तस्स दु धम्म हवे सच्चं । । ७४ । ।
दूसरोंको संताप करनेवाले वचन को छोड्कर जो भिक्षु स्वपरहितकारी वचन बोलता है उसके चौथा सत्यधर्म होता है । । ७४ । ।
शौच धर्मका लक्षण
कखाभावणिवित्ति, किच्चा वेरग्गभावणाजुत्तो ।
जो वहुदि परममुणी, तस्स दु धम्मो हवे सोच्च । । ७५ । ।
जो उत्कृष्ट मुनि कांक्षा भावसे निवृत्ति कर वैरत्यभावसे रहता है उससे शौचधर्म होता है । । ७५ । ।
संयमधर्मका लक्षण
वदसमिदिपालणाए, दंडच्चाएण इदियजएण ।
परिणममाणस्स पुणो, संजमधम्मो हवे णियमा । । ७६ । ।
मन वचन कायकी प्रवृत्तिरूप दंडको त्यप्ताकर तथा इंद्रियोंको जीतकर जो व्रत और समितियोंसे पालनरूप प्रवृत्ति करता है उसके नियमसे संयमधर्म होता है । । ७६ । ।
उत्तम तपका लक्षण
विसयकसायविणिग्गहभाव काऊण झाणसज्वाए ।
जो भावइ अप्पाणं, तस्स तवं होदि णियमेण । । ७७ । ।
विषय और कषायके विनिग्रहरूप भावको करके जो ध्यान और स्वाध्यायके द्वारा आत्माकी भावना करता है उसके नियमसे तप होता है । । ७७ । ।
णिब्बेगतिय भावइ, मोह चइऊण सज्जदब्बेसु ।
जो तस्स हवे चागो, इदि भणिद जिणवरिदेहि । । ७८ । ।