सुदर्शन मुनिराज की पूजा

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सिद्धपदप्राप्त सुदर्शन महामुनिराज की पूजा

-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती
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-स्थापना-

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सिद्धीकन्या के नाथ सुदर्शन सेठ परम आराध्य बने।
उपसर्ग विजेता शील धुरंधर मुनि हो त्रिभुवननाथ बने।।
निर्वाण प्राप्त उन मुनिवर की पूजन का थाल सजाया है।।
आह्वानन स्थापन करके गुरुपद में शीश नमाया है।।१।।

ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्रीसुदर्शनमहामुनीन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्रीसुदर्शनमहामुनीन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्रीसुदर्शनमहामुनीन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।


-अष्टक-

गंगा का शीतल जल केवल तन की ही प्यास बुझाता है।
उसको प्रभु चरण चढ़ाने से, मन शान्त स्वयं हो जाता है।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।१।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन का शीतल गुण केवल तन की ही दाह मिटाता है।
प्रभु पद में उसे लगाने से संसारताप नश जाता है।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।२।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

मोती की माला कण्ठ पहनना सबको अच्छा लगता है।
प्रभुपद में मुक्तापुंज चढ़ाने से अक्षय पद मिलता है।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।३।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

फूलों की सुरभी घ्राणेन्द्रिय को सदा सुहानी लगती है।
प्रभु पद में पुष्प चढ़ाने से ही कामव्यथा नश सकती है।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।४।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
 
हलवा बरफी पूरनपोली खाकर सब तृप्ती करते हैं।
पूजन में इन्हें चढ़ाकर हम क्षुधरोग की शांती करते हैं।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।५।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

यह बात सभी को मालुम है दीपक अंधेर मिटाता है।
दीपक से प्रभु आरति करने से मोहतिमिर नश जाता है।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।६।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

घर को सुरभित करने हेतू मलयागिरि धूप जलाते हैं।
पूजन में धूप जलाने से सब अष्टकर्म नश जाते हैं।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।७।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
 
अंगूर आम बादाम आदि तन को सम्पुष्ट तो करते हैं।
पूजन में इन्हें चढ़ाकर मानव मोक्ष महाफल वरते हैं।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।८।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

आठों द्रव्यों का अर्घ्य नाथ हम तुम्हें समर्पित करते हैं।
‘‘चन्दनामती’’ हम पद अनर्घ्य पाने की वाञ्छा करते हैं।।
पद सिद्ध प्राप्त मुनिराज सुदर्शन चरण कमल में वन्दन है।
इनकी पूजन से कट जाते भव्यात्मा के भवबंधन हैं।।९।।

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ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्री सुदर्शनमहामुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-दोहा-

पूजन में जलधार कर, आत्मशान्ति मिल जाय।
जग की शांति हेतू भी, शान्तिधार सुखदाय।।१०।।
शांतये शांतिधारा।
पुष्पांजलि से अर्चना, दे गुण पुष्प खिलाय।
फैले मैत्री भावना, वैर भाव मिट जाय।।११।।

दिव्य पुष्पांजलि:।

मंत्र जाप्य-ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्रीसुदर्शनमहामुनीन्द्राय नम:।।

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जयमाला

-शेरछंद-
जैवन्त हों जिनधर्म के सिद्धान्त जगत में।
जैवन्त हों जिनधर्म के मुनिराज जगत में।।
जैवन्त हो जिनधर्म का अध्यात्म जगत में।
जैवन्त हो जिनधर्म का विज्ञान जगत में।।१।।
जिनधर्म अनादी से चल रहा है जगत में।
चलता रहेगा धर्म ये शाश्वत ही जगत में।।
तीर्थंकरों के जन्म हुआ करते हैं यहाँ।
इस युग में महावीर का शासन है चल रहा।।२।।
प्रभुवीर के शासन से कथानक जुड़ा सच्चा।
चम्पापुरी में एक सुभग ग्वाला रहता था।।
इक बार एक मुनि को शीतयोग में देखा।
अग्नी जला के उसने उनके तन को था सेंका।।३।।
प्रात: मुनी ने ध्यान को समाप्त जब किया।
भव्यात्मा की भक्ति देख मंत्र इक दिया।।
जप करके णमोकार मंत्र भक्त तिर गया।
उसने गुरू की सेवा का फल प्राप्त कर लिया।।४।।
उस मंत्र की महिमा से वह भव पार हो गया।
अगले जनम में ग्वाला श्रेष्ठिपुत्र हो गया।।
वह सेठ सुदर्शन प्रसिद्ध हो गये जग में।
गुरुभक्ति का साक्षात फल भी पा लिया उनने।।५।।
बन करके सेठ फिर सहे उपसर्ग अनेकों।
फिर भी वे शील शिरोमणि बन गये देखो।।
संसार की असारता लख दीक्षा ले लिया।
रानी के किये कृत्य को भी सहन कर लिया।।६।।
बन करके व्यन्तरनी पुन: भी उसने सताया।
मुनिराज सुदर्शन का धैर्य डिग नहीं पाया।।
शमशान भूमि पटना में ध्यान लगाया।
आतम मगन हो करके केवलज्ञान को पाया।।७।।
पटना नगर से मुनी सुदर्शन जी शिव गये।
तब पौष शुक्ल पंचमी को इन्द्र आ गये।।
जय जय ध्वनी से देवों ने आकाश गुंजाया।
निर्वाण महोत्सव श्री सुदर्शन का मनाया।।८।।

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हम भी करें जिनराज सुदर्शन की वन्दना।
इन्द्रों से पूज्य शील धुरन्धर महामना।।
निर्वाण की पूजा रचा पूर्णार्घ्य चढ़ायें।
निर्वाणभूमि वन्दना निर्वाण दिलाये।।९।।
पटना में है गुलजारबाग सिद्धस्थली।
श्री सेठ सुदर्शन की जो उपसर्ग स्थली।।
उस तीर्थ कमलदह की करें वन्दना स्तुती।
निर्वाणपद के लिए पाएं हम भी सद्गती।।१०।।
गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माता की शिष्या।
इक ‘‘चन्दनामति’’ आर्यिका ने भाव से लिखा।
श्री सेठ सुदर्शन के सदृश आत्मबल मिले।
पूजन के फल में आत्मतत्त्व का कमल खिले।।११।।

ॐ ह्रीं सिद्धपदप्राप्त श्रीसुदर्शनमहामुनीन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, दिव्यपुष्पांजलि:।

-दोहा-

सेठ सुदर्शन सिद्ध प्रभु, करें सिद्ध सब काम।
इनकी पूजन से मिले, क्रम से आतम राम।।

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।।इत्याशीर्वाद:, पुष्पांजलि:।।