१.नरकगति अन्तराधिकार

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नरकगति अन्तराधिकार

अथ गतिमार्गणाधिकार:

अत्र प्रथमतस्तावत् अशीतिसूत्रै: चतुर्भिरन्तराधिकारै: द्वितीये महाधिकारे गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: कथ्यते। तत्र नरकगतिनाम प्रथमान्तराधिकारे स्थलचतुष्टयेन चतुर्दशसूत्राणि सन्ति। तस्मिन्नपि प्रथमस्थले मिथ्यात्वअसंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां अन्तरप्ररूपणत्वेन ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टिनारकाणां अन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत: परं तृतीयस्थले प्रथमादिपृथिवीषु मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां अन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘पढमादि जाव’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले एषामेव नारकाणां सासादनमिश्रगुणस्थानवर्तिनां अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं इति समुदायपातनिका।
अधुना सामान्येन नरकगतौ मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठि-असंजद-सम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।२१।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।२२।।
उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।२३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिभि: विरहितनरकपृथिवीनां सर्वकालमनुपलम्भात्।
एकजीवापेक्षया मिथ्यादृष्टेर्जघन्यान्तरमुच्यते-एक: मिथ्यादृष्टि: दृष्टमार्ग: परिणामप्रत्ययेन सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं वा प्रतिपद्य सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा पुन: मिथ्यादृष्टिर्जात:। लब्धमन्तर्मुहूर्तमन्तरं। सम्यग्दृष्टिं अपि मिथ्यात्वं नीत्वा सर्वजघन्येन अन्तर्मुहूर्तेन प्रापय्य असंयतसम्यग्दृष्टेर्जघन्यान्तरं वक्तव्यं।
एकजीवापेक्षया उत्कृष्टान्तरमुच्यते-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी अधस्तनसप्तम्यां पृथिव्यां नारकेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपद्य अन्तरित: स्तोकावशेषे आयुषि मिथ्यात्वं गत: (४)। लब्धमन्तरम्। स एव तिर्यगायु: बद्ध्वा (५) विश्रम्य (६) निर्गत:। एवं षडन्तर्मुहूर्तै: ऊनानि त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमानि मिथ्यात्वस्योत्कृष्टान्तरं भवति।
असंयतसम्यग्दृष्टेरूच्यते-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी मिथ्यादृष्टि: अध: सप्तम्यां पृथिव्यां नारकेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४) संक्लिष्ट: मिथ्यात्वं गत्वान्तरित:। अवसाने तिर्यगायु: बद्ध्वा अंतर्मुहूर्तं विश्रम्य विशुद्धो भूत्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (५) लब्धमन्तरं। भूय: मिथ्यात्वं गत्वा निर्गत: (६)। एवं षडन्तर्मुहूर्तै: त्रयस्त्रिंशत्सागरप्रमाणम-संयतसम्यग्दृष्टेरूत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं प्रथमस्थले मिथ्यात्व-असंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां अन्तरप्रतिपादनपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति सासादन-मिश्रनारकाणां नानाजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्ररूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।२४।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।२५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-नरकगतौ स्थितसासादनसम्यग्दृष्टय: सम्यग्मिथ्यादृष्टयश्च सर्वे गुणस्थानान्तरं गता:। द्वे अपि गुणस्थाने एकसमयं अन्तरिते। पुन: द्वितीयसमये केऽपि उपशमसम्यग्दृष्टय: आसादनं गता:, मिथ्यादृष्टय: असंयतसम्यग्दृष्टयश्च सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्ना:। लब्धमन्तरं द्वयोर्गुणस्थानयोरेकसमय:।
उत्कृष्टान्तरं उच्यते-नरकगतौ स्थितसासादन-सम्यग्दृष्टय:, सम्यग्मिथ्यादृष्टयश्च सर्वे अन्यगुणस्थानान्तरं गता:। द्वे अपि गुणस्थाने अंतरिते। उत्कृष्टेन पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्र: द्वयोर्गुणस्थानयोरन्तरकालो भवति। पुन: तावन्मात्रकालेऽतिक्रान्ते स्वस्वात्मन: कारणीभूतगुणस्थानेभ्य: द्वयोर्गुणस्थानयो: संभवे जाते लब्धमुत्कृष्टान्तरं पल्योपमस्य असंख्यातभाग:।


अथ गतिमार्गणा अधिकार प्रारंभ

यहाँ सर्वप्रथम अस्सी (८०) सूत्रों के द्वारा चार अन्तराधिकार वाले द्वितीय महाधिकार में गतिमार्गणा नामका प्रथम अधिकार कहा जा रहा है। उनमें नरकगति नामके प्रथम अन्तराधिकार में चार स्थलों के द्वारा चौदह (१४) सूत्र कहेंगे। उसमें भी प्रथम स्थल में मिथ्यात्व गुणस्थानवर्ती एवं असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती नारकियों का अन्तर बतलाने हेतु ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकी जीवोें का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु ‘‘सासण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके अनन्तर तृतीय स्थल में प्रथम आदि पृथिवियों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों का अन्तर कथन करने हेतु ‘पढमादि जाव’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में इन्हीं नारकियों में सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती नारकियों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘सासण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। सूत्रों की यह समुदायपातनिका प्रस्तुत की गई है।

अब सामान्यरूप से नरकगति में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों में नाना जीव और एक जीव का जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्रों का अवतार हो रहा है-

सूत्रार्थ-

आदेस की अपेक्षा गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति में, नारकियों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।२१।।

एक जीव की अपेक्षा उक्त दोनों गुणस्थान का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।२२।।

मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेंतीस सागरोपम है।।२३।।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों से रहित रत्नप्रभादि पृथिवियाँ किसी भी काल में नहीं पायी जाती हैं।

इनमें से पहले एक जीव की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि का जघन्य अन्तर कहते हैं-देख लिया है मार्ग को जिसने ऐसा कोई एक मिथ्यादृष्टि जीव परिणामों के निमित्त से सम्यग्मिथ्यात्व को अथवा सम्यक्त्व को प्राप्त होकर, सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्तकाल रहकर पुन: मिथ्यादृष्टि हो गया। इस प्रकार से अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तरकाल लब्ध हुआ। इसी प्रकार किसी एक असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी को भी मिथ्यात्व गुणस्थान में ले जाकर सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्त काल के द्वारा पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त कराकर असंयतसम्यग्दृष्टि जीव का जघन्य अन्तर कहना चाहिए। अब एक जीव की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि नारकी का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-कोई एक तिर्यंच अथवा मनुष्य मोह कर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला नीचे सातवीं पृथिवी के नारकियों में उत्पन्न हुआ और छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१), विश्राम लेकर (२), विशुद्ध होकर (३), वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त कर आयु के थोड़े अवशेष रहने पर अन्तर को प्राप्त हो मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (४)। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। पुन: तिर्यंच आयु को बांधकर (५), विश्राम लेकर (६) निकला। इस प्रकार छह अन्तर्मुहूर्तों से कम तेंतीस सागरोपम काल मिथ्यात्व का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

अब असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी का अन्तर कहते हैं-मोहकर्म की अट्ठाईस कर्मप्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक तिर्यंच, अथवा मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव नीचे सातवीं पृथिवी के नारकियों में उत्पन्न हुआ और छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१), विश्राम लेकर (२), विशुद्ध होकर (३), वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (४) पुन: संक्लिष्ट हो मिथ्यात्व को प्राप्त होकर अन्तर को प्राप्त हुआ। आयु के अंत में तिर्यंचायु बांधकर पुन: अन्तर्मुहूर्त विश्राम करके विशुद्ध होकर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (५)। इस प्रकार इस गुणस्थान का अन्तर लब्ध हुआ। पुन: मिथ्यात्व में जाकर नरक से निकला (६)। इस प्रकार छह अन्तर्मुहूर्तों से कम तेंतीस सागरोपमकाल असंयतसम्यग्दृष्टि का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मिथ्यात्व और असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती नारकियों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब सासादन और मिश्रगुणस्थानवर्ती नारकियों में नानाजीवों की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्ररूपित करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियों का अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर होता है।।२४।।

उक्त दोनों गुणस्थानों का उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है।।२५।।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-नरकगति में स्थित सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि सभी जीव अन्य गुणस्थान को प्राप्त हुए और दोनों ही गुणस्थान एक समय के लिए अन्तर को प्राप्त हो गये। पुन: द्वितीय समय में कितने ही उपशमसम्यग्दृष्टि नारकी जीव सासादन गुणस्थान को प्राप्त हुए और मिथ्यादृष्टि तथा असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीव सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान को प्राप्त हुए। इस प्रकार दोनों ही गुणस्थानों का अन्तर एक समयप्रमाण प्राप्त हो गया।

अब उत्कृष्ट अन्तर बतलाते हैं-नरकगति में स्थित सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि ये सभी जीव अन्य गुणस्थानों को प्राप्त हुए और दोनों ही गुणस्थान अन्तर को प्राप्त हो गये। इन दोनों गुणस्थानों का अन्तरकाल उत्कर्ष से पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र होता है। पुन: उतना काल व्यतीत होने पर अपने-अपने कारणभूत गुणस्थानों से उक्त दोनों गुणस्थानों के संभव हो जाने पर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर लब्ध हो गया।

संप्रति एकजीवापेक्षया जघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते

संप्रति एकजीवापेक्षया जघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, अंतोमुहुत्तं।।२६।।

उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।२७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका'-सासादनस्य पल्योपमस्य असंख्यातभाग:, सम्यग्मिथ्यादृष्टेरन्तर्मुहूर्तं जघन्यान्तरं भवति। अनयोरुदाहरणं-एक: नारक: अनादिमिथ्यादृष्टि: उपशमसम्यक्त्वप्रायोग्यसादिमिथ्यादृष्टि: वा त्रीणि करणानि कृत्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। उपशमसम्यक्त्वेन कियन्तं कालं स्थित्वा आसादनं गत्वा मिथ्यात्वं गतोऽन्तरित:। पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रकालेन उद्वेलनखण्डै: सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वस्थिती सागरोपमपृथक्त्वात् अध: कृत्वा पुन: त्रीणि करणानि कृत्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिकावशेषे आसादनं गत:। लब्धमन्तरं पल्योपमस्यासंख्यातभाग:।
एक: सम्यग्मिथ्यादृष्टि: मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं वा गत्वा अन्तर्मुहूर्तमन्तरयित्वा पुन: सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न:। लब्धमन्तर्मुहूर्तमन्तरं सम्यग्मिथ्यादृष्टेर्नारकस्य। उत्कृष्टान्तरं कथ्यते-एक: सादिरनादिर्वा मिथ्यादृष्टि: सप्तमपृथिवीनारकेषु उत्पन्न: षड्भि: पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४) आसादनं गत्वा मिथ्यात्वं गतोऽन्तरित:। अवसाने तिर्यगायु: बद्ध्वा विशुद्धो भूत्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। उपशमसम्यक्त्वकाले एकसमयावशेषे आसादनं गत:। लब्धमन्तरं। तत: मिथ्यात्वं गत्वा अन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा (५) निर्गत:। एवं पंचभि: अंतर्मुहूर्तै: समयाधि: ऊनानि त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमानि सासादनोत्कृष्टान्तरं भवति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टेरुत्कृष्टान्तरं उच्यते-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी सप्तमपृथिवीनारकेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (४)। पुन: सम्यक्त्वं मिथ्यात्वं वा गत्वा देशोनत्रयस्त्रिंशत्सागरप्रमाणायु:स्थितिं अन्तरयित्वा मिथ्यात्वेनायु: बद्ध्वा विश्रम्य सम्यग्मिथ्यात्वं गत: (५)। तत: मिथ्यात्वं गत्वा अंतर्मुहूर्तं स्थित्वा (६) निर्गत:। षड्भि: अंतर्मुहूर्तैै: ऊनानि त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमानि सम्यग्मिथ्यात्वोत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं द्वितीयस्थले सामान्यनारकाणां सासादन-मिश्रगुणस्थानवर्तिनां जघन्योत्कृष्टअन्तरप्रतिपादनमुख्यत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति प्रथमादिसप्तमनरकभूमिषु मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिनारकयो: नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तर-निरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-पढमादि जाव सत्तमीए पुढवीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठी-णमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।२८।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।२९।।
उक्कस्सेण सागरोवमं तिण्णि सत्त दस सत्तारस वावीस तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिविरहितप्रथमादिसप्तमीपर्यंतपृथिवीगतनारकाणां सर्वकालमनुपलम्भात्।
एकजीवापेक्षया-मिथ्यादृष्टि: असंयतसम्यग्दृष्टिर्वा अन्यगुणस्थानं गत्वा सर्वजघन्येन अंतर्मुहूर्तेन स्थित्वा पुनस्तदेव गुणस्थानं प्रतिपद्यते तत: अंतर्मुहूर्तमात्रान्तरोपलम्भात्।
उत्कृष्टेन-प्रथमपृथिव्यां देशोनैकसागर:, द्वितीयायां देशोना: त्रय: सागरा:, तृतीयपृथिव्यां देशोना: सप्तसागरा:, चतुर्थपृथिव्यां देशोना: दशसागरा:, पंचमपृथिव्यां देशोना: सप्तदशसागरा:, षष्ठ्यां देशोनद्वाविंशतिसागरा:, सप्तम्यां देशोनत्रयस्त्रिंशत्सागरा: इति वक्तव्यं। विशेषेण तु-द्वयो: गुणस्थानयो: सप्तमपृथिव्यां देशोनप्रमाणं षडन्तर्मुहूर्तमात्रं। तच्च गुणस्थानप्ररूपणायां प्ररूपितं पुन: नेह प्ररूपयिष्यते। शेषपृथिवीषु मिथ्यादृष्टीनां स्वक-स्वकायु:स्थितय: चतुर्भि: अन्तर्मुहूर्तैै: ऊना:।
के ते चत्वारोऽन्तर्मुहूर्ता: ?
षट्पर्याप्तिसमापने एक:, विश्रमणे द्वितीय:, विशुद्ध्यापूरणे तृतीय: अवसाने मिथ्यात्वं गतस्य चतुर्थोऽन्तर्मुहूर्त:।
असंयतसम्यग्दृष्टीनां शेषपृथिवीषु स्वक-स्वकायु:स्थितय: पंचभि: अन्तर्मुहूर्तै: ऊना: अन्तरं भवति। तद्यथा-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी प्रथमादि यावत् षष्ठीषु पृथिवीषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) सम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४) सर्वलघु मिथ्यात्वं गत्वा अन्तरित:। स्वकस्थितिं स्थित्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (५) सासादनं गत्वा निर्गत:। एवं पंचभिरन्तर्मुहूर्तै: ऊना: स्वकस्वकस्थितय: सम्यक्त्वोत्कृष्टान्तरं भवति।
तात्पर्यमेतत्-कश्चित् सप्तमपृथिवीगतनारक: तत्रोत्पद्य षडन्तर्मुहूर्तानन्तरं सम्यक्त्वं गृहीत्वा सर्वलघुकालं सम्यक्त्वे स्थित्वा मिथ्यात्वं गत: पुन: स्वायु:पर्यंतं तत्र मिथ्यात्वेन स्थित्वा उपशम सम्यक्त्वं संप्राप्य सासादनो भूत्वा तन्नरकान्निर्गत:। एवं शेषपृथिवीषु चतुर्भिरन्तर्मुहूर्तै: न्यूनं स्वक-स्वकायु:स्थितिप्रमाणं सम्यक्त्वस्यान्तरं ज्ञातव्यं।
एवं तृतीयस्थले सप्तपृथिवीषु मिथ्यादृष्टिसम्यग्दृष्टिजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।

अब एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

उक्त दोनों गुणस्थानों का जघन्य अन्तर एक जीव की अपेक्षा पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है।।२६।।

उक्त दोनों गुणस्थानों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेंतीस सागरोपम है।।२७।।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-सासादनसम्यग्दृष्टि का जघन्य अन्तरकाल पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है तथा सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव का जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है।

इन दोनों के उदाहरण बताते हैं-एक अनादिमिथ्यादृष्टि नारकी जीव अथवा उपशमसम्यक्त्व के प्रायोग्य सादि मिथ्यादृष्टि नारकी जीव, तीन करणों को करके उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ और उपशमसम्यक्त्व के साथ कितने ही काल तक रहकर पुन: सासादनगुणस्थान में जाकर मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार अन्तर को प्राप्त होकर पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र काल से उद्वेलना कांडकों से सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनों प्रकृतियों की स्थितियों को सागरोपमपृथक्त्व से नीचे अर्थात् कम करके पुन: तीनों करण करके और उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करके उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली काल अवशेष रह जाने पर सासादनगुणस्थान को प्राप्त हुआ। इस प्रकार पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण अन्तरकाल उपलब्ध हो गया।

एक सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यात्व को अथवा सम्यक्त्व को प्राप्त होकर और वहाँ पर अन्तर्मुहूर्त का अन्तर देकर पुन: सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार सम्यग्मिथ्यादृष्टि का अन्तर्मुहूर्त प्रमाण अन्तर प्राप्त हो गया। अब उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-एक सादि अथवा अनादि मिथ्यादृष्टि जीव सातवीं पृथिवी के नारकियों में उत्पन्न हुआ। छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१), विश्राम लेकर (२), विशुद्ध होकर (३), उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (४) पुन: सासादनगुणस्थान में जाकर मिथ्यात्व को प्राप्त हो, अन्तर को प्राप्त हुआ। आयु के अंत में तिर्यंच आयु को बांधकर विशुद्ध हो उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। पुन: उपशमसम्यक्त्व के काल में एक समय अवशेष रहने पर सासादनगुणस्थान को प्राप्त हुआ। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। पुन: मिथ्यात्व में जाकर अन्तर्मुहूर्त रहकर (५) निकला। इस प्रकार समयाधिक पाँच अन्तर्मुहूर्तों से कम तेंतीस सागरोपम काल सासादन गुणस्थान का उत्कृष्ट अन्तर होता है। अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला एक तिर्यंच अथवा मनुष्य सातवीं पृथिवी के नारकियों में उत्पन्न होकर छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१), विश्राम लेकर (२), विशुद्ध होकर (३), सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (४), पुन: सम्यक्त्व में अथवा मिथ्यात्व में जाकर देशोन-कुछ कम तेंतीस सागरोपमप्रमाण आयु स्थिति को अन्तररूप से बिताकर मिथ्यात्व के द्वारा आयु को बांधकर विश्राम लेकर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (५)। पश्चात् मिथ्यात्व को प्राप्त होकर अन्तर्मुहूर्त रहकर (६) निकला। इस प्रकार छह अन्तर्मुहूर्तों से कम तेंतीस सागरोपमकाल सम्यग्मिथ्यात्व का उत्कृष्ट अन्तर होता है। इस प्रकार द्वितीय स्थल में सामान्यरूप से सासादन और मिश्रगुणस्थानवर्ती नारकियों का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब प्रथम नरक से लेकर सातों नरकभूमियों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल प्रतिपादित करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

प्रथम पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक के नारकियों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर काल कितना है ? नाना जीवों की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।२८।।

उक्त दोनों गुणस्थानों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।२९।।

उक्त दोनों गुणस्थानों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक सागरोपम, तीन, सात, दस, सतरह, बाईस और तेंतीस सागरोपम काल है।।३०।।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टियों से रहित नारकियों की प्रथमादि सातों नरकपृथिवियों में सदा उपलब्धि नहीं होती है। अर्थात् सभी नरकों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि दोनों अवस्था वाले नारकी पाये जाते हैं।

अब एक जीव की अपेक्षा बताते हैं- मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि, इन दोनों को ही अन्य गुणस्थान में ले जाकर सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर पुन: उसी गुणस्थान में पहुँचाने पर अन्तर्मुहूर्त मात्र काल का अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्टरूप से कहते हैं-प्रथम पृथिवी में कुछ कम एक सागरोपम, द्वितीय पृथिवी में कुछ कम तीन सागरोपम, तीसरी पृथिवी में कुछ कम सात सागरोपम, चौथी पृथिवी में कुछ कम दश सागरोपम, पाँचवी पृथिवी में कुछ कम सतरह सागरोपम, छठी पृथिवी में कुछ कम बाईस सागरोपम और सातवीं पृथिवी में कुछ कम तेंतीस सागरोपम अन्तर कहना चाहिए। विशेष बात यह है कि प्रथम और चतुर्थ, इन दोनों गुणस्थानों का सातवीं पृथिवी में कुछ कम का प्रमाण छह अन्तर्मुहूर्तमात्र है। वह नारकियों के गुणस्थान प्रकरण में कह आये हैं, इसलिए यहाँ नहीं कहते हैं। शेष अर्थात् प्रथम से लगाकर छठी पृथिवी तक की छह पृथिवियों में मिथ्यादृष्टि नारकियों का उत्कृष्ट अन्तर चार अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी आयु स्थिति प्रमाण है।

शंका-वे चार अन्तर्मुहूर्त कौन से हैं ?

समाधान-छहों पर्याप्तियों को सम्यक् निष्पन्न करने में एक, विश्राम में दूसरा, विशुद्धि को पूर्ण करने में तीसरा और आयु के अन्त में मिथ्यात्व को प्राप्त होने का चौथा अन्तर्मुहूर्त है।

असंयत सम्यग्दृष्टियों का शेष पृथिवियों में पाँच अन्तर्मुहूर्र्तोें से कम अपनी-अपनी आयुस्थितिप्रमाण अन्तर होता है। वह इस प्रकार है-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्तावाला कोई एक तिर्यंच अथवा मनुष्य प्रथम पृथिवी से लेकर छठी पृथिवी तक कहीं भी उत्पन्न हुआ और छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१), विश्राम ले (२), विशुद्ध होकर (३), सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (४) पुन: सर्वलघुकाल से मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हुआ और अपनी स्थितिप्रमाण मिथ्यात्व में रहकर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (५)। पुन: सासादन गुणस्थान में जाकर वहाँ से निकला। इस प्रकार पाँच अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी पृथिवी की स्थिति प्रमाण वहाँ के सम्यक्त्व का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

तात्पर्य यह है कि कोई सातवीं नरकपृथिवी में उत्पन्न हुआ नारकी वहाँ उत्पन्न होने के छह अन्तर्मुहूर्तों के पश्चात् सम्यक्त्व को ग्रहण करके सबसे छोटे काल तक सम्यक्त्व अवस्था में रहकर मिथ्यात्व को प्राप्त हो गया पुन: अपनी सम्पूर्ण नरक आयु पर्यन्त वहाँ मिथ्यात्व अवस्था में स्थित रहकर उपशम सम्यक्त्व प्राप्त करके सासादन गुणस्थान में आकर उस सातवें नरक से निकला। इसी प्रकार शेष नरकपृथिवियों में चार अन्तर्मुहूर्त से न्यून अपनी-अपनी आयु स्थिति प्रमाण सम्यक्त्व का अन्तर जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सातों नरक पृथिवियों में मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि नारकियों का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति सप्तस्वपि पृथिवीषु सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टिनानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते

संप्रति सप्तस्वपि पृथिवीषु सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टिनानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?

णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।३१।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।३२।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, अंतोमुहुत्तं।।३३।।
उक्कस्सेण सागरोवमं तिण्णि सत्त दस सत्तारस वावीस तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका - चतुर्णां सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। उत्कृष्टेन अनयो: अन्तरं निरूप्यते-सप्तमपृथिवीगतसासादन-सम्यग्मिथ्यदृष्ट्यो: पूर्ववदन्तरं ज्ञातव्यं। प्रथमादिषट्पृथिवीनां सासादनस्य उत्कृष्टान्तरं भण्यते-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा प्रथमादिषट्पृथिवीषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य आसादनं गत: (४) मिथ्यात्वं गत्वा अन्तरित:। तत्र स्वक-स्वकोत्कृष्टस्थितिप्रमाणं स्थित्वा अवसाने उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: उपशमसम्यक्त्वकाले एकसमयावशेषे सासादनं गत्वा तस्मात् निर्गत:। एवं समयाधिकचतुर्भि: अन्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्वक-स्वकोत्कृष्टस्थितिप्रमाणं सासादनस्योत्कृष्टान्तरं भवति।
अधुना सम्यग्मिथ्यादृष्टेरन्तरमुच्यते-एक: अष्टाविंशतिमोहनीयसत्ताक: विवक्षितनारकेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (४) मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं वा गत्वा अन्तरित: स्वकस्थितिं स्थित्वा सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (५)। लब्धमन्तरं। मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं वा गत्वा निर्गत: (६)। षड्भि: अन्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्वक-स्वकोत्कृष्टस्थितिप्रमाणं सम्यग्मिथ्यात्वो-त्कृष्टान्तरं भवति।
संप्रति सर्वगतिभ्य: सम्यग्मिथ्यादृष्टिनि:सरणक्रम: उच्यते-यो जीव: सम्यग्दृष्टि: भूत्वा आयुर्बद्ध्वा सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यते स: सम्यक्त्वेनैव निर्गच्छति। अथवा मिथ्यादृष्टिर्भूत्वा आयुर्बद्ध्वा यो सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यते स मिथ्यात्वेनैव निर्गच्छति।
कथमेतत् ज्ञायते ?
आचार्यपरंपरागतोपदेशात्।
तात्पर्यमेतत्-नरकधरासु सप्तस्वपि पृथिवीषु ये केचित् सासादना: सम्यग्मिथ्यादृष्टय: सम्यग्दृष्टयश्च ते अल्पसंसारा: भव्या एव नियमेन मनुष्यगतिं लब्ध्वा धर्मपुरुषार्थबलेन मोक्षं यास्यन्ति। केचित् दीर्घसंसारा: अपि अधिकतमाद्र्धपुद्गलपरिवर्तप्रमाणं कालं संसारे परिवत्र्य निर्वान्ति। अत: सम्यग्दर्शनमाहात्म्यं ज्ञात्वा तदेव रत्नं रक्षणीयं प्रयत्नशतेनेति।
एवं चतुर्थस्थले नरकगतसासादनमिश्रगुणस्थानवर्तिनानैकजीवजघन्योत्कृष्टअन्तरप्रतिपादनपरत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इति नरकगत्यन्तराधिकार:

अब सातों पृथिवियों में सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नाना जीव एवं एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

उक्त सातों ही पृथिवियों के सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियों का अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय है।।३१।।

उक्त पृथिवियों में ही उक्त गुणस्थानों का उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम के असंख्यातवें भाग है।।३२।।

उक्त गुणस्थानों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमश: पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है।।३३।।

सातों ही पृथिवियों में उक्त दोनों गुणस्थानों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर क्रमश: कुछ कम एक, तीन, सात, दस, सतरह, बाईस और तेंतीस सागरोपम है।।३४।।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-उपर्युक्त चारों सूत्रों का अर्थ सरल है। यहाँ उत्कृष्टरूप से सासादन और मिश्र इन दोनों गुणस्थानों का अन्तर कहते हैं-

सातवीं पृथिवी के सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवर्ती नारकियों का अन्तरकाल पूर्व के समान ही जानना चाहिए।

प्रथम आदि छह पृथिवियों के सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-एक तिर्यंच अथवा मनुष्य प्रथमादि छह पृथिवियों में से किसी में उत्पन्न हुआ। छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१), वहाँ विश्राम लेकर (२), विशुद्ध होकर (३), उपशम सम्यक्त्व को प्राप्त होकर सासादन गुणस्थान को प्राप्त हुआ (४)। फिर मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हो गया। वहाँ अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण रहकर आयु के अन्त मेें उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ उपशमसम्यक्त्व के काल में एक समय अवशेष रह जाने पर सासादन गुणस्थान को प्राप्त होकर वहाँ से निकला। इस प्रकार एक समय से अधिक चार अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी पृथिवी की उत्कृष्टस्थितिप्रमाण सासादनसम्यग्दृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर होता है। अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियों का अन्तर कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला कोई एक तिर्यंच अथवा मनुष्य विवक्षित पृथिवी के नारकियों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१), विश्राम लेकर (२), विशुद्ध होकर (३), सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (४)। पुन: मिथ्यात्व में अथवा सम्यक्त्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हुआ और जिस गुणस्थान में गया उसमें अपनी आयु स्थिति प्रमाण रहकर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (५)। इस प्रकार अन्तरकाल प्राप्त हो गया। पुन: मिथ्यात्व को अथवा सम्यक्त्व को प्राप्त होकर निकला (६)। इन छहों अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी पृथिवी की उत्कृष्ट स्थिति प्रमाण नारकी सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर होता है। अब सर्व गतियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टियों के निकलने का क्रम कहते हैं-जो जीव सम्यग्दृष्टि होकर और आयु को बांधकर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होता है, वह सम्यक्त्व के साथ ही उस गति से निकलता है अथवा जो मिथ्यादृष्टि होकर और आयु को बांधकर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होता है, वह मिथ्यात्व के साथ ही निकलता है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य परम्परागत उपदेश से ऐसा जाना जाता है।

तात्पर्य यह है कि सातों ही नरकपृथिवियों में जो कोई सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि नारकी हैं वे सभी अल्प संसारी भव्य ही हैं, वे वहाँ से निकलकर नियम से मनुष्यगति प्राप्तकर धर्मपुरुषार्थ के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करेंगे। कोई दीर्घसंसारी जीव भी हैं तो भी वे अधिकतम अद्र्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण काल संसार में परिवर्तन करके पार हो जाते हैं-निर्वाण को प्राप्त कर लेते हैं। अत: सम्यग्दर्शन के माहात्म्य को जानकर उसी सम्यक्त्व रत्न की सैकड़ों प्रयत्नों द्वारा रक्षा करना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में नरकगति को प्राप्त सासादन और मिश्रगुणस्थानवर्ती नाना जीव और एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

यह नरकगति अन्तराधिकार पूर्ण हुआ।

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