२.तिर्यंचगति अन्तराधिकार

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तिर्यंचगति अन्तराधिकार

अथ तिर्यग्गत्यन्तराधिकार:

अथ स्थलसप्तकेन द्वाविंशतिसूत्रै: तिर्यग्गतिनामान्तराधिकार: कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्यतिर्यग्गतौ तिरश्चां गुणस्थानापेक्षया अन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इति सूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले पंचेन्द्रियादित्रिविधतिरश्चां मिथ्यादृष्टीनां अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं तृतीयस्थले त्रिविधतिरश्चां सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्ट्यो: अन्तरप्ररूपणत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले त्रिविधतिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टीनां अन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनन्तरं पंचमस्थले त्रिविधतिर्यक्संयतासंयतानां अंतरनिरूपणत्वेन ‘‘संजदासंजदाण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं । तत्पश्चात् षष्ठस्थले पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तानां अन्तरप्रतिपादनमुख्यत्वेन ‘‘पंचिंदियतिरिक्ख’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं सप्तमस्थले गति-गुणस्थानापेक्षया तिरश्चामन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘एदं गदिं’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।
संप्रति तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्टीनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-तिरिक्खगदीए तिरिक्खेसु मिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।३५।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।३६।।
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि देसूणाणि।।३७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यग्गतौ नानाजीवापेक्षया तिरश्चां नास्त्यन्तरं, ते निरन्तरा: सन्ति। एकजीवापेक्षया-मिथ्यादृष्टितिर्यञ्चं अन्यगुणस्थानं नीत्वा सर्वजघन्येन कालेन पुन: तस्यैव गुणस्थानस्य तस्मिन् प्रत्यानीयमाने अन्तर्मुहूर्तान्तरोपलम्भात्। उत्कृष्टेन देशोनं त्रिपल्योपमप्रमाणमन्तरं। तदेवोच्यते-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी त्रिपल्योपमायु:स्थितिकेषु कुक्कुट-मर्कटादिषु उत्पन्न:, द्वौ मासौ गर्भे स्थित्वा निष्क्रान्त:।
अत्र द्वौ उपदेशौ स्त:-तद्यथा-तिर्यक्षु द्विमास-मुहूर्तपृथक्त्वस्योपरि सम्यक्त्वं संयमासंयमं च जीव: प्रतिपद्यते, मनुष्येषु गर्भाद्यष्टवर्षेषु अन्तर्मुहूर्ताभ्यधिकेषु सम्यक्त्वं संयमं संयमासंयमं च प्रतिपद्यते इति। एषा दक्षिणप्रतिपत्ति:। दक्षिणं ऋजुकं आचार्यपरंपरागतमिति एकार्थ:।
तिर्यक्षु त्रिपक्ष-त्रिदिवस-अन्तर्मुहूर्तस्योपरि सम्यक्त्वं संयमासंयमं च प्रतिपद्यते। मनुष्येषु अष्टवर्षाणामुपरि सम्यक्त्वं संयमं संयमासंयमं च प्रतिपद्यते इति एषा उत्तरप्रतिपत्ति:। उत्तरं अनृजुकं आचार्यपरंपरानागतमितिएकार्थ:।
पुन: स एव जीव: तिर्यङ् मुहूर्तपृथक्त्वेन विशुद्धो वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। अवसाने आयुर्बद्ध्वा मिथ्यात्वं गत:। पुन: सम्यक्त्वं प्रतिपद्य कालं कृत्वा सौधर्मैशानदेवेषु उत्पन्न:। आदिमुहूर्तपृथक्त्वाभ्यधिक-द्विमासै: अवसाने उपलब्धद्विअन्तर्मुहूर्ताभ्यां ऊनं त्रिपल्योपमप्रमाणं मिथ्यात्वोत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं प्रथमस्थले तिरश्चां मिथ्यादृष्टीनां अन्तरकथनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।

अब तिर्यंचगति अन्तराधिकार प्रारंभ होता है-

अब सात स्थलों में बाईस सूत्रों के द्वारा तिर्यंचगति नाम का अन्तराधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य तिर्यंचगति में तिर्यंच जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि चार सूत्र कहेंगे। उसके बाद द्वितीय स्थल में पञ्चेन्द्रियादि तीन प्रकार के मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में तीन प्रकार के तिर्यंच जीवों का सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में अन्तर कथन करने वाले ‘‘सासण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में तीनों प्रकार के असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों का अन्तर बतलाने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनन्तर पंचमस्थल में तीनों प्रकार के संयतासंयत गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘संजदासंजदाण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् छठे स्थल में पंचेन्द्रिय पर्याप्तक तिर्यंचों का अन्तर बतलाने वाले ‘‘पंचिंदियतिरिक्ख’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: आगे सातवें स्थल में गति और गुणस्थान की अपेक्षा तिर्यंच जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु ‘‘एदं गदिं’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब तिर्यंचगति में नाना जीव एवं एक जीव की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में, तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।३५।।

तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।३६।।

तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीवों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्योपम है।।३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंचगति में नाना जीव की अपेक्षा तिर्यंचों में अन्तर नहीं है, वे निरन्तर ही हैं। अर्थात् वे सदाकाल पाये जाते हैं। एक जीव की अपेक्षा कथन करते हैं-

मिथ्यादृष्टि तिर्यंच जीव को अन्य गुणस्थान में ले जाकर सर्वजघन्यकाल से पुन: उसी गुणस्थान में वापस ले आने पर अन्तर्मुहूर्त प्रमाण अन्तर प्राप्त होता है।

उत्कृष्ट से कुछ कम तीन पल्योपमप्रमाण अन्तर है। उसका वर्णन करते हैं- मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक तिर्यंच अथवा मनुष्य तीन पल्योपम की आयुस्थिति वाले भोगभूमि के अंदर कुक्कुट-मर्वâट आदि में उत्पन्न हुआ और दो मास गर्भ में रहकर निकला। इस विषय में दो उपदेश हैं। वे इस प्रकार हैं-तिर्यंचों में उत्पन्न हुआ जीव दो मास और मुहूर्तपृथक्त्व से ऊपर सम्यक्त्व और संयमासंयम को प्राप्त करता है। मनुष्यों में गर्भकाल से प्रारंभकर, अन्तर्मुहूर्त से अधिक आठ वर्षों के व्यतीत हो जाने पर सम्यक्त्व, संयम और संयमासंयम को प्राप्त होता है। यह दक्षिण प्रतिपत्ति है। दक्षिण, ऋजु और आचार्यपरम्परागत, ये तीनों शब्द एकार्थक हैं। तिर्यंचों में उत्पन्न हुआ जीव तीन पक्ष, तीन दिवस और अन्तर्मुहूर्त के ऊपर सम्यक्त्व और संयमासंयम को प्राप्त होता है। मनुष्यों में उत्पन्न हुआ जीव आठ वर्षों के ऊपर सम्यक्त्व, संयम और संयमासंयम को प्राप्त होता है। यह उत्तर प्रतिपत्ति हैं। उत्तर, अनृजु और आचार्यपरम्परा से अनागत, ये तीनों एकार्थवाची हैं।

पुन: वही तिर्यञ्च जीव मुहूर्तपृथक्त्व से विशुद्ध होकर वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। पश्चात् अपनी आयु के अंत में आयु को बांधकर मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त हो, मर करके सौधर्म-ऐशान देवों में उत्पन्न हुआ। आदि के मुहूर्तपृथक्त्व से अधिक दो मासों से और आयु के अवसान में उपलब्ध दो अन्तर्मुहूर्तों से कम तीन पल्योपमकाल मिथ्यात्व का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अधुना तिर्यक्षु सासादनादिसंयतासंयतानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति

अधुना तिर्यक्षु सासादनादिसंयतासंयतानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-सासणसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति ओघं।।३८।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-ओघचतुर्गुणस्थाननानैकजीव-जघन्योत्कृष्टस्यान्तरकालेभ्य: तिर्यग्गतिगुणस्थान-नानैकजीव-जघन्योत्कृष्टान्तरकालानां भेदाभावात् ओघवदुच्यते।
तद्यथा-सासादनगुणस्थानवर्तिनां नानाजीवं प्रतीत्य जघन्येन एकसमय:, उत्कृष्टेन पल्योपमस्यासंख्यातभाग:।
अत्र अन्तरमाहात्म्यज्ञापनार्थमल्पबहुत्वमुच्यते-सर्वस्तोक: सासादनसम्यग्दृष्टिराशि:। तस्यैव काल: नानाजीवगत: असंख्यातगुण:। तस्यैवान्तरमसंख्यातगुणं। एवमल्पबहुत्वं ओघादिसर्वमार्गणासु सासादनानां प्रयोक्तव्यम्।
एकजीवापेक्षया जघन्येन पल्योपमस्यासंख्यातभाग:। एतस्य कालस्य साधनोपदेश: उच्यते-त्रसेषु स्थित्वा येन सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृती उद्वेलिते स सागरोपमपृथक्त्वेन सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्व-स्थितिसत्कर्मणा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यते। एतस्मात् उपरिमासु स्थितिषु यदि सम्यक्त्वं गृण्हाति, तर्हि निश्चयेन वेदकसम्यक्त्वमेव गृण्हाति। अथ एकेन्द्रियेषु येन सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वे उद्वेलिते, स पल्योपमस्य असंख्यातभागेनोनसागरोपममात्रे सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वयो: स्थितिसत्कर्मशेषे त्रसेषु उत्पद्य उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यते। एताभि: स्थितिभि: ऊनशेषकर्मस्थितिउद्वेलनकाल: येन पल्योपमस्यासंख्यातभाग: तेन सासादनैकजीवजघन्यान्तरमपि पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रं भवति।
उत्कृष्टेन अद्र्धपुद्गलपरिवर्तं देशोनं। अत्रास्ति विशेष: तं भणिष्याम:-एक: तिर्यङ् अनादिमिथ्यादृष्टि: त्रीणि करणानि कृत्वा सम्यक्त्वं प्रतिपन्नप्रथमसमये संसारमनन्तं छित्वा पुद्गलपरिवर्ताद्र्धं कृत्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: आसादनं गत: मिथ्यात्वं गत्वा अन्तरित: (१), अद्र्धपुद्गलपरिवर्तं परिभ्रम्य द्विचरमभवे पंचेन्द्रियतिर्यक्षु उत्पद्य मनुष्येषु आयुर्बद्ध्वा त्रीणि करणानि कृत्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। उपशमसम्यक्त्वकाले मनुष्यगतिप्रायोग्यावलिकासंख्यातभागावशेषे आसादनं गत:। लब्धमन्तरं।
आवलिकाया: असंख्यातभागमात्रसासादनकालं स्थित्वा मृत: मनुष्यो जात: सप्तमासान् गर्भे स्थित्वा निष्क्रान्त: सप्तवर्षाणि अन्तर्मुहूत्र्ताभ्यधिकपंचमासान् च गमयित्वा (२) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (३) अनन्तानुबन्धिन: विसंयोज्य (४) दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा (५) अप्रमत्त: (६) प्रमत्त: (७) पुन: अप्रमत्त: (८) पुन: अपूर्वादिषड्भि: अन्तर्मुहूर्तै: (१४) निर्वाणं गत:। एवं चतुर्दशअन्तर्मुहूर्तै: आवलिकाया: असंख्यातभागेन अभ्यधि: अष्टवर्षैश्च ऊनमद्र्धपुद्गलपरिवर्तमन्तरं भवति।
अत्रोपयुक्तोऽर्थ: उच्यते-तद्यथा-सासादनं प्रतिपन्नद्वितीयसमये यदि म्रियते, तर्हि नियमेन देवगतौ उत्पद्यते। एवं यावत् आवलिकाया: असंख्यातभागो देवगतिप्रायोग्य: काल: भवति। तत: उपरि मनुष्यगतिप्रायोग्य: आवलिकाया: असंख्यातभागमात्र: कालो भवति। एवं संज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यगसंज्ञि-पंचेन्द्रियतिर्यक्-चतुरिन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-एकेन्द्रियप्रायोग्यो भवति। एष नियम: सर्वत्र सासादनगुणस्थान-प्रतिपद्यमानानां ज्ञातव्य:।
सम्यग्मिथ्यादृष्टे नानाजीवं प्रतीत्य जघन्येन एकसमय:, उत्कर्षेण पल्योपमस्यासंख्यातभाग:। अत्र द्रव्य-काल-अन्तराल्पबहुत्वस्य सासादनवत्भंग:। एकजीवं प्रतीत्य जघन्येन अंतर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण अद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तं देशोनं। अत्रापि विशेष: उच्यते-एक: तिर्यङ् अनादिमिथ्यादृष्टि: त्रीणि करणानि कृत्वा सम्यक्त्वं प्रतिपन्नप्रथमसमये अद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तमात्रं संसारं कृत्वा प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (१) सम्यग्मिथ्यात्वं गत: (२) मिथ्यात्वं गत्वा अद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तं परिवत्र्य द्विचरमभवे पंचेन्द्रियतिर्यक्षु उत्पद्य मनुष्यायु: बद्ध्वा अवसाने उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य समयग्मिथ्यात्वं गत: (३)। लब्धमन्तरं। तत: मिथ्यात्वं गत: (४) मनुष्येषु उत्पन्न:। उपरि सासादनवद्भंग:। सप्तदशान्तर्मुहूत्र्ताभ्यधिक-अष्टवर्षै: ऊनमद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तं सम्यग्मिथ्यात्वोत्कृष्टान्तरं भवति।
असंयतसम्यग्दृष्टे: नानाजीवं प्रतीत्य नास्त्यन्तरं, एकजीवं प्रतीत्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण अद्र्धपुद्गलपरिवर्तं देशोनं। अत्र विशेष:-एक: अनादिमिथ्यादृष्टि: त्रीणि करणानि कृत्वा प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (१) उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिकाशेषे सासादनं गत्वान्तरित:। अद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तं परिवत्र्य द्विचरमभवे पंचेन्द्रियतिर्यक्षु उत्पन्न:। मनुष्येषु वर्षपृथक्त्वायु: बद्ध्वा उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। तत: आवलिकाया: असंख्यातभागमात्राया: वा एवं गत्वा समयोन-षडावलिकाया: वा उपशमसम्यक्त्वकाले शेषे आसादनं गत्वा मनुष्यगतिप्रायोग्ये मृत: मनुष्यो जात: (२) उपरि सासादनवत्। एवं पंचदशभि: अन्तर्मुहूर्तै: अभ्यधिकाष्टवर्षै: ऊनमद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तं सम्यक्त्वोत्कृष्टान्तरं भवति।
संयतासंयतानां नानाजीवं प्रतीत्य नास्त्यन्तरं, एकजीवापेक्षया जघन्येन अंतर्मुहूर्तं, उत्कृष्टेन अर्धपुद्गलपरिवर्तं देशोनं। अत्र विशेष: उच्यते-एक: अनादिमिथ्यादृष्टि: अद्र्धपुद्गलपरिवर्तस्यादिसमये उपशमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपन्न: (१) षडावलिकाशेषे उपशमसम्यक्त्वकाले आसादनं गत्वा अन्तरित: मिथ्यात्वं गत:। अद्र्धपुद्गलपरिवर्तं परिभ्रम्य द्विचरमभवे पंचेन्द्रियतिर्यक्षु उत्पद्य उपशमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपन्न: (२)। लब्धमन्तरं। ततो मिथ्यात्वं गत: (३) आयुर्बद्ध्वा (४) विश्रम्य (५) कालं गत: मनुष्येषु उत्पन्न:। तत्र गर्भे सप्तमासान् स्थित्वा निष्क्रान्त: सप्तवर्षाणि अन्तर्मुहूर्ताभ्यधिकपंचमासान् च गमयित्वा (६) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (७) अनन्तानुबंधिन: विसंयोज्य (८) दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा (९) अप्रमत्त: (१०) प्रमत्त: (११) पुन: अप्रमत्त: (१२) पुन: अपूर्वादिषडन्तर्मुहूर्तै: (१३ से १८) निर्वाणं गत:।
एवमष्टादशमन्तर्मुहूर्ताभ्यधिक-अष्टवर्षै: ऊनं अद्र्धपुद्गलपरिवर्तं संयतासंयतोत्कृष्टान्तरं भवति।
कश्चिदाह-तिर्यक्षु संयमासंयमग्रहणात्पूर्वमेव मनुष्यायु: किन्न बध्नाति ?
आचार्य:प्राह-न, बद्धमनुष्यायु: मिथ्यादृष्टितिरश्च: संयमासंयमग्रहणाभावात्।
तात्पर्यमत्र-संयमासंयमी तिर्यङ् नियमेन देवगतौ एवोत्पद्यते इति ज्ञातव्यम्।
एवं प्रथमस्थले सामान्येन तिरश्चां अन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
'अधुना त्रिविधपंचेन्द्रियतिरश्चां मिथ्यादृष्टीनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीसु मिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।३९।।'
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।४०।।'
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि देसूणाणि।।४१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-नानाजीवापेक्षया त्रिविधानां तिरश्चां अन्तरं नास्ति मिथ्यात्वगुणस्थानेषु। एकजीवापेक्षया पंचेन्द्रियाणां त्रीन् मिथ्यादृष्टिजीवान् दृष्टमार्गान् सम्यक्त्वं नीत्वा सर्वजघन्यकालेन पुन: मिथ्यात्वे ग्राहिते अंतर्मुहूर्तकालोपलंभात्।
उत्कृष्टेन-त्रय: तिर्यञ्च: मनुष्या: वा अष्टाविंशतिसत्कर्मिण: त्रिपल्योपमायु:स्थितिकेषु पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिक-कुक्कुट-मर्वâटादिषु उत्पन्ना:, द्वौ मासौ गर्भे स्थित्वा निष्क्रान्ता:, मुहूर्तपृथक्त्वेन विशुद्धा: वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्ना: अवसाने आयु: बद्ध्वा मिथ्यात्वं गता:। लब्धमन्तरं। भूय: सम्यक्त्वं प्रतिपद्य कालं कृत्वा सौधर्मैशानदेवेषु उत्पन्ना:। एवं द्वि-अंतर्मुहूर्ताभ्यां मुहूर्तपृथक्त्वाभ्यधिकद्विमासाभ्यां च ऊनं त्रिपल्योपमप्रमाणं त्रयाणां मिथ्यादृष्टीनामुत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं द्वितीयस्थले तिरश्चां मिथ्यात्वगुणस्थानान्तरप्ररूपकत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।


अब तिर्यंचों में सासादन से संयतासंयत गुणस्थान तक के जीवों का अन्तर बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचों में सासादनसम्यग्दृष्टि से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक का अन्तर गुणस्थान के समान है।।३८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ओघ के इन चार गुणस्थानों संबंधी नाना और एक जीव के जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर कालों से तिर्यंचगति संबंधी इन्हीं चारों गुणस्थान संबंधी नाना जीव और एक जीव के जघन्य और उत्कृष्टअन्तर कालों का सारा वर्णन ओघ के समान कहते हैं, क्योंकि इनके अन्तरकालों में किसी का भेद नहीं है।

वह इस प्रकार है-सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय और उत्कृष्ट से पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। यहाँ पर अन्तर के माहात्म्य को बतलाने के लिए अल्पबहुत्व कहते हैं-सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों की राशि सबसे कम है। नाना जीवगत उसी का काल असंख्यातगुणा है और उसी का अन्तर काल असंख्यातगुणा है। यह अल्पबहुत्व ओघादि सभी मार्गणाओं में सासादनसम्यग्दृष्टियों का कहना चाहिए। सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर एक जीव की अपेक्षा जघन्य से पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। इस काल के साधन का उपदेश कहते हैं-त्रस जीवों में रहकर जिसने सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो प्रकृतियों का उद्वेलन कर लिया है, वह जीव सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व की स्थिति के सत्वरूप सागरोपमपृथक्त्व के पश्चात् उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त होता है। यदि इससे ऊपर की स्थिति रहने पर सम्यक्त्व को ग्रहण करता है, तो निश्चय से वेदकसम्यक्त्व को ही प्राप्त होता है और एकेन्द्रियों में जा करके जिसने सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व की उद्वेलना की है, वह पल्योपम के असंख्यातवें भाग से कम सागरोपमकाल मात्र सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व का स्थितिसत्व अवशेष रहने पर त्रस जीवों में उत्पन्न होकर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त होता है। इन स्थितियों से कम शेष कर्मस्थिति उद्वेलन का काल चूँकि पल्योपम के असंख्यातवें भाग है, इसलिए सासादनगुणस्थान का एक जीव संबंधी जघन्य अन्तर भी पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र ही होता है। उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण है। पर यहाँ जो विशेष बात है, उसे कहते हैं-अनादिमिथ्यादृष्टि एक तिर्यंच तीनों करणों को करके सम्यक्त्व को प्राप्त होने के प्रथम समय में अनन्त संसार को छेदकर और अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण करके उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ और सासादनगुणस्थान में चला गया। पुन: मिथ्यात्व में जाकर और अन्तर को प्राप्त होकर (१) अर्धपुद्गलपरिवर्तन परिभ्रमण करके द्विचरम भव में पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में उत्पन्न होकर और मनुष्यों में आयु को बांधकर तीनों करणों को करके उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हो गया। पुन: उपशसम्यक्त्व के काल में मनुष्यगति के योग्य आवली के असंख्यातवें भाग मात्र काल के अवशेष रहने पर सासादनगुणस्थान को प्राप्त हुआ। इस प्रकार उक्त अन्तर प्राप्त हो गया। आवली के असंख्यातवें भागमात्र काल सासादनगुणस्थान में रहकर मरा और मनुष्य हो गया। यहाँ पर सात मास गर्भ में रहकर निकला तथा सात वर्ष और अन्तर्मुहूर्त से अधिक पाँच मास बिताकर (२) वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (३)। पुन: अनन्तानुबंधी कषाय का विसंयोजन करके (४) दर्शनमोहनीय का क्षयकर (५) अप्रमत्त (६) प्रमत्त (७) पुन: अप्रमत्त (८) हो, पुन: अपूर्वकरणादि छह गुणस्थानों संबंधी छह अन्तर्मुहूर्तों से (१४) निर्वाण को प्राप्त हुआ। इस प्रकार चौदह अन्तर्मुहूर्तों से तथा आवली के असंख्यातवें भाग से अधिक आठ वर्षों से कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान का उत्कृष्ट अन्तर काल होता है।

अब यहाँ पर उपर्युक्त अर्थ कहते हैं। वह इस प्रकार है-सासादनगुणस्थान को प्राप्त होने के द्वितीय समय में यदि वह जीव मरता है तो नियम से देवगति में उत्पन्न होता है। इस प्रकार आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल देवगति में उत्पन्न होने के योग्य होता है। उसके ऊपर मनुष्यगति के योग्य काल आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण है। इसी प्रकार से आगे-आगे संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच, असंज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रियों में उत्पन्न होने योग्य होता है। यह नियम सर्वत्र सासादनगुणस्थान को प्राप्त होने वाले जीवों का जानना चाहिए। सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय और उत्कर्ष से पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण अन्तर है। यहाँ पर द्रव्य, काल और अन्तर की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्ष से कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल है। केवल यहाँ जो विशेषता है उसे कहते हैं-अनादि मिथ्यादृष्टि एक तिर्यंच तीनों करणों को करके सम्यक्त्व के प्राप्त होने के प्रथम समय में अर्धपुद्गलपरिवर्तनमात्र संसार की स्थिति को करके प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (१) और सम्यग्मिथ्यात्व में चला गया (२) फिर मिथ्यात्व में जाकर अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण परिभ्रमण करके द्विचरम भव में पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में उत्पन्न होकर मनुष्य आयु को बांधकर अन्त में उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त होकर सम्यग्मिथ्यात्व में चला गया (३) इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। पुन: मिथ्यात्व को गया (४) और मरकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात् का कथन सासादनसम्यग्दृष्टि के समान ही है। यह सत्तरह अन्तर्मुहूर्तों से अधिक आठ वर्षों से कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल सम्यग्मिथ्यात्व का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

असंयतसम्यग्दृष्टि का नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, एक जीव की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्ष से कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अन्तरकाल है। केवल जो विशेषता है वह कही जाती है-एक अनादिमिथ्यादृष्टि जीव तीनों ही करणों को करके प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (१) और उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवलियाँ अवशेष रह जाने पर सासादनगुणस्थान में जाकर अन्तर को प्राप्त हो गया। पश्चात् अर्धपुद्गलपरिवर्तन काल परिभ्रमण करके द्विचरम भव में पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में उत्पन्न हुआ। पुन: मनुष्यों में वर्षपृथक्त्व की आयु को बांधकर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। पीछे आवली के असंख्यातवें भागमात्र काल के, अथवा यहाँ से लगाकर एक समय कम छह आवली काल प्रमाण तक, उपशमसम्यक्त्व के काल में मरा और मनुष्य हुआ (२) उसके ऊपर सासादन के समान कथन जानना चाहिए। इस प्रकार पंद्रह अन्तर्मुहूर्तों से अधिक आठ वर्ष से कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन काल असंयतसम्यग्दृष्टि का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

संयतासंयतों का नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है एक जीव की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्ष से कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन काल अन्तर है। यहाँ पर जो विशेषता है उसे कहते हैं-एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीव अर्धपुद्गलपरिवर्तन के आदि समय में उपशमसम्यक्त्व को और संयमासंयम को युगपत् प्राप्त हुआ (१) उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवलियां अवशेष रह जाने पर सासादन को जाकर अन्तर को प्राप्त होता हुआ मिथ्यात्व में गया। पश्चात् अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल परिभ्रमण करके द्विचरम भव में पंचेन्द्रियतिर्यंचों में उत्पन्न होकर उपशमसम्यक्त्व को और संयमासंयम को युगपत् प्राप्त हुआ (२) इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। पश्चात् मिथ्यात्व को गया (३) व आयु बांधकर (४) विश्राम लेकर (५) मरकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ।

वहाँ गर्भ में सात महीने रहकर निकला तथा सात वर्ष और अन्तर्मुहूर्त से अधिक पाँच मास बिताकर (६) वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (७) पुन: अनन्तानुबंधी का विसंयोजन करके (८) दर्शनमोहनीय का क्षय करके (९) अप्रमत्त (१०) प्रमत्त (११) पुन: अप्रमत्त हो (१२) पुन: अपूर्वकरण आदि छह गुणस्थानों संबंधी छह अन्तर्मुहूर्तों से (१३ से १८) निर्वाण को प्राप्त हो गया। इस प्रकार अठारह अन्तर्मुहूर्तों से अधिक आठ वर्षों से कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल संयतासंयत का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि तिर्यंचों में संयमासंयम ग्रहण करने से पूर्व ही उस मिथ्यादृष्टि जीव को मनुष्य आयु का बंध क्यों नहीं होता है ? आचार्य इसका समाधान देते हैं कि उनके मनुष्य आयु का बंध नहीं होता है, क्योंकि मनुष्यायु का बंध कर लेने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के संयमासंयम का ग्रहण नहीं होता है।

तात्पर्य यह है कि संयमासंयमी तिर्यञ्च नियम से देवगति में ही उत्पन्न होता है, ऐसा जानना चाहिए।

अब तीन प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि नाना जीव और एक जीव का जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंचपर्याप्त और पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों में मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।३९।।

उक्त जीवोें में एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।४०।।

उक्त तीनों ही प्रकार के मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों का अन्तर कुछ कम तीन पल्योपमप्रमाण है।।४१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीव की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि गुणस्थानों में तीनों प्रकार के तिर्यंच का अन्तरकाल नहीं है। एक जीव की अपेक्षा तीनोें ही प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के तीन मिथ्यादृष्टि दृष्टमार्गी जीवों को असंयतसम्यक्त्व में ले जाकर सर्वजघन्य काल से पुन: मिथ्यात्व के ग्रहण कराने पर अन्तर्मुहूर्तकाल प्रमाण अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाले तीन तिर्यंच अथवा मनुष्य, तीन पल्योपम की आयु स्थिति वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंच-त्रिक कुक्कुट, मर्कट आदि में उत्पन्न हुए व दो मास गर्भ में रहकर वहाँ से निकले और मुहूर्तपृथक्त्व से विशुद्ध होकर वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त हुए और आयु के अंत में आगामी आयु को बांधकर मिथ्यात्व को प्राप्त हुए। इस प्रकार से अन्तर प्राप्त हुआ। पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त कर और मरण करके सौधर्म-ईशान देवों मेें उत्पन्न हुए। इस प्रकार इन दो अन्तर्मुहूर्तों से और मुहूर्तपृथक्त्व से अधिक दो मासों से कम तीन पल्योपम तीनों जाति वाले तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंचों के मिथ्यात्व गुणस्थान का अन्तर प्ररूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति सासादन-मिश्रगुणस्थानवर्तितिरश्चामन्तरप्ररूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते

संप्रति सासादन-मिश्रगुणस्थानवर्तितिरश्चामन्तरप्ररूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।४२।।

उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।४३।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, अंतोमुहुत्तं।।४४।।
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।४५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-तद्यथा-पंचेन्द्रियतिर्यक्सासादनसम्यग्दृष्टिप्रवाह: कियन्तमपि कालमागत:। पुन: सर्वेषु सासादनेषु मिथ्यात्वं प्रतिपन्नेषु एकसमयं सासादनगुणस्थानविरहो भूत्वा द्वितीयसमये उपशमसम्यग्दृष्टिजीवेषु सासादनं प्रतिपन्नेषु लब्धमेकसमयमन्तरं। एवं चैव तिर्यक्त्रिकसम्यग्मिथ्यादृष्टीनामपि वक्तव्यं। एतद्जघन्यमन्तरं।
उत्कृष्टेन-पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिक-सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टिजीवेषु सर्वेषु अन्यगुणस्थानं गतेषु द्वयोर्गुणस्थानयो: पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिकेषु उत्कर्षेण पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रान्तरं भूत्वा पुन: द्वयोर्गुणस्थानयो: संभवे जाते लब्धमन्तरं भवति।
एकजीवापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिकसासादनानां पल्योपमस्य असंख्यातभाग:, सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां अंतर्मुहूत्र्तमेकजीवजघन्यान्तरं भवति। शेषं सुगमं।
अत्र तावत् उत्कर्षेण पंचेन्द्रियतिर्यक्सासादनानां उच्यते-एक: मनुष्य: नारक: देवो वा एकसमयावशेषे सासादनकाले पंचेन्द्रियतिर्यक्षु उत्पन्न:। तत्र पंचनवतिपूर्वकोट्यभ्यधिकत्रिपल्योपमानि गमयित्वा अवसाने एकसमयावशेषे आयुषि आसादनं गत: कालं कृत्वा देवो जात:। एवं द्विसमयोनस्वकस्थितिप्रमाणं सासादनोत्कृष्टान्तरं भवति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टीनामुच्यते-एक: मनुष्य: अष्टाविंशतिसत्कर्मी संज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यक्सम्मूच्र्छिमपर्याप्तेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (४) अंतरं कृत्वा पंचनवतिपूर्वकोटिकालं परिभ्रम्य त्रिपल्योपमिकेषु उत्पद्य अवसाने प्रथमसम्यक्त्वं गृहीत्वा सम्यग्मिथ्यात्वं गत:। लब्धमन्तरं (५) सम्यक्त्वं मिथ्यात्वं वा येन गुणस्थानेन आयुष्कं बद्धं तद्गुणस्थानं प्रतिपद्य (६) देवेषु उत्पन्न:। षडन्तर्मुहूर्तैै: ऊना स्वकस्थिति: उत्कृष्टान्तरं भवति। एवं पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तानां। अस्ति विशेषोऽत्र-सप्तचत्वािंरशत्पूर्वकोट्य: त्रिपल्योपमानि च पूर्वोक्तद्विसमयषडन्तर्मुहूर्तै: च ऊनानि उत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं योनिमतीतिरश्चीषु अपि-तथापि सम्यग्मिथ्यादृष्टि-उत्कृष्टकालेऽस्ति विशेष:-एक: नारक: देवो वा मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी पंचेन्द्रियतिर्यक्योनिनी-कुक्कुटमर्कटेषु उत्पन्न: द्वौ मासौ गर्भे स्थित्वा निष्क्रान्त: मुहूर्तपृथक्त्वेन विशुद्ध: सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न:। पंचदशपूर्वकोटिकालं परिभ्रम्य कुरुषु भोगभूमिषु उत्पन्न:। सम्यक्त्वेन वा मिथ्यात्वेन वा स्थित्वा अवसाने सम्यग्मिथ्यात्वं गत:। लब्धमन्तरं। येन गुणस्थानेन आयुर्बद्धं, तेनैव गुणस्थानेन मृतो देवो जात:। त्रिभि: अन्तर्मुहूर्तै: मुहूर्तपृथक्त्वाधिकद्विमासैश्च ऊनानि पूर्वकोटिपृथक्त्वाभ्यधिकत्रिपल्योपमानि उत्कृष्टान्तरं भवति।
सम्मूच्र्छिमेषु उत्पाद्य सम्यग्मिथ्यात्वं किन्न प्रत्यानीत: ?
न, तत्र स्त्रीवेदाभावात्।
सम्मूच्र्छिमेषु स्त्रीपुरुषवेदौ किन्न भवत: ?
न भवत:, स्वभावाच्चैव।
एवं तृतीयस्थले सासादनादिद्विगुणस्थानवर्तिनो: अन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
अधुना त्रिविधतिरश्चां असंयतसम्यग्दृष्टीनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।४६।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।४७।।
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।४८।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्टिभिर्विरहितपंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिकस्य सव्र्वकालमनुपलम्भात् नास्त्यन्तरं। एकजीवापेक्षया-पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिकअसंयतसम्यग्दृष्टीनां दृष्टमार्गणां अन्यगुणस्थानं प्रतिपद्य अत्यल्पकालेन पुनरागतानां अन्तर्मुहूर्तान्तरोलंभात्। उत्कर्षेण कथ्यते-
पंचेन्द्रियतिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टीनां तावत् उच्यते-एक: मनुष्य: अष्टाविंशतिसत्कर्मी संज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यक्-सम्मूच्र्छिमपर्याप्तकेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४) संक्लिष्ट: मिथ्यात्वं गत्वा अंतरं संप्राप्य पंचनवतिपूर्वकोटिकालं गमयित्वा त्रिपल्योपमायु:-स्थितिकेषु उत्पन्न: स्तोकावशेषे जीविते उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। लब्धमन्तरं (५) तत: उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिका: सन्तीति आसादनं गत्वा देवो जात:। पंचभि: अन्तर्मुहूर्तै: ऊनानि पंचनवतिपूर्वकोट्यधिकानि त्रीणि पल्योपमानि पंचेन्द्रियतिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टीनामुत्कृष्टान्तरं भवति।
पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तकेषु एवं चैव। विशेषेण-सप्तचत्वािंरशत्पूर्वकोट्य: अधिका: इति भणितव्यं। पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु अपि एवं चैव। केवलं किञ्चित् विशेषोऽस्ति-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु उत्पन्न:। द्वाभ्यां मासाभ्यां गर्भाद् निर्गत्य मुहूर्तपृथक्त्वेन वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (१) संक्लिष्ट: मिथ्यात्वं गत्वान्तरयित्वा पञ्चदशपूर्वकोटिप्रमाणकालं भ्रमित्वा त्रिपल्योपमायु:स्थितिकेषु उत्पन्न:। अवसाने उपशमसम्यक्त्वं गत:। लब्धमन्तरं (२) षडावलिकाशेषे उपशमसम्यक्त्वकाले आसादनं मृतो देवो जात:। द्विअन्तर्मुहूत्र्ताभ्यां मुहूर्तपृथक्त्वाभ्यधिकद्विमासैश्च ऊना स्वकास्थिति: असंयतसम्यग्दृष्टी-नामुत्कृष्टान्तरं भवति।
तात्पर्यमेतत्-त्रिपल्योपमायु: भोगभूमिजातिरश्चामेव। तत्र गर्भे द्वौ मासौ स्थित्वा ततो निष्क्रम्य त्रिमुहूर्तादुपरि अष्टमुहूर्ताभ्यन्तरे वेदकसम्यक्त्वं भवितुमर्हति इति ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले त्रिविधतिरश्चां असंयतसम्यग्दृष्टीनामन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।


अब सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों का अन्तर प्ररूपण करने के लिए चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

उक्त तीनों प्रकार के तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय होता है।।४२।।

उक्त तीनों प्रकार के तिर्यंच सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का नाना जीवों की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण है।।४३।।

सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमश: पल्योपम के असंख्यातवें भाग और अन्तर्मुहूर्त है।।४४।।

उक्त दोनों गुणस्थानवर्ती तीनों प्रकार के तिर्यंचों का अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपम है।।४५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वह अन्तर इस प्रकार है-पंचेन्द्रिय तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का प्रवाह कितने ही काल तक निरन्तर आया। पुन: सभी सासादन जीवों के मिथ्यात्व को प्राप्त हो जाने पर एक समय के लिए सासादनगुणस्थान का विरह होकर द्वितीय समय में उपशमसम्यग्दृष्टि जीवों के सासादन गुणस्थान को प्राप्त होने पर एक समय प्रमाण अन्तर काल प्राप्त हो गया। इसी प्रकार तीनों जाति वाले तिर्यंच सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का भी अन्तर कहना चाहिए। यह जघन्य अन्तर है।

उत्कृष्ट से-तीनों ही प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि सभी जीवों के अन्य गुणस्थान में चले जाने पर इन दोनों गुणस्थानों का पंचेन्द्रिय तिर्यंचत्रिक में उत्कर्ष से पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र अन्तर होकर पुन: दोनों गुणस्थानों के संभव हो जाने पर यह अन्तर प्राप्त हो जाता है।

एक जीव की अपेक्षा पंचेन्द्रिय तिर्यंचत्रिक सासादनसम्यग्दृष्टियों का पल्योपम के असंख्यातवें भाग और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर्मुहूर्त प्रमाण एक जीव का जघन्य अन्तर होता है। शेष कथन सुगम है।

इनमें से पहले उत्कृष्टरूप से पंचेन्द्रिय तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि का अन्तर कहते हैं। जैसे-कोई एक मनुष्य, नारकी अथवा देव सासादनगुणस्थान के काल में एक समय अवशेष रह जाने पर पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में उत्पन्न हुआ। उनमें पंचानवे पूर्वकोटिकाल से अधिक तीन पल्योपम बिताकर अन्त में आयु का एक समय अवशेष रह जाने पर उपशम सम्यक्त्वपूर्वक सासादनगुणस्थान को प्राप्त हुआ और मरण करके देव हो गया। इस प्रकार दो समय कम अपनी स्थिति सासादन गुणस्थान का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कहते हैंं-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला कोई एक मनुष्य, संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच, सम्मूच्र्छिम पर्याप्तकों में उत्पन्न हुआ और छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (४) तथा अन्तर को प्राप्त होकर पंचानवे पूर्वकोटि कालप्रमाण उन्हीं तिर्यंचों में परिभ्रमण करके तीन पल्योपम की आयु वाले तिर्यंचों में उत्पन्न होकर और अन्त में प्रथम सम्यक्त्व को ग्रहण करके सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हो गया। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ (५)। उसके पश्चात् जिस गुणस्थान से आयु बांधी थी उसी सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व गुणस्थान को प्राप्त होकर (६) देवों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार छह अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थितिप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर होता है। इसी प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्तकों का उत्कृष्ट अन्तर जानना चाहिए। विशेषता यह है कि सैंतालिस पूर्वकोटियाँ और पूर्वोक्त दो समय तथा छह अन्तर्मुहूर्तों से कम तीन पल्योपम काल इनका उत्कृष्ट अन्तर होता है।

इसी प्रकार योनिमति तिर्यञ्चों का भी अन्तर जानना चाहिए। केवल उनके सम्यग्मिथ्यादृष्टि संबंधी उत्कृष्ट अन्तर में विशेषता है, उसे कहते हैं-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला एक नारकी, देव अथवा मनुष्य, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती कुक्कुट, मर्कट आदि में उत्पन्न हुआ, वहाँ दो मास गर्भ में रहकर निकला व मुहूर्तपृथक्त्व से विशुद्ध होकर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। पन्द्रह पूर्वकोटी काल प्रमाण परिभ्रमण करके देवकुरु, उत्तरकुरु इन दो भोगभूमियों में उत्पन्न हुआ। सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व के साथ रहकर अन्त में सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हो गया। पश्चात् जिस गुणस्थान से आयु को बांधा था, उसी गुणस्थान से मरकर देव हुआ। इस प्रकार तीन अन्तर्मुहूर्त और मुहूर्तपृथक्त्व से अधिक दो मासों से कम पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपम उत्कृष्ट अन्तर होता है।

शंका-सम्मूच्र्छिम तिर्यंचों में उत्पन्न कराकर पुन: सम्यग्मिथ्यात्व को क्यों नहीं प्राप्त कराया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि, सम्मूच्र्छिम जीवों में स्त्रीवेद का अभाव है।

शंका-सम्मूच्र्छिम जीवों में स्त्रीवेद और पुरुषवेद क्यों नहीं होते हैं ?

समाधान-स्वभाव से ही नहीं होते हैं।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सासादन आदि दो गुणस्थानवर्ती जीवों का अन्तर कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब तीनों प्रकार के तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टियों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

उक्त तीनों असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों का अन्तर कितने काल तक होता है? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।४६।।

उक्त तीनों असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।४७।।

उक्त तीनों असंयतसम्यम्दृष्टि तिर्यंचों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपमकाल है।।४८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों से विरहित पंचेन्द्रिय तिर्यंचत्रिक किसी भी काल में नहीं पाये जाते हैं। इसलिए उनका अन्तर नहीं है।

एक जीव की अपेक्षा मार्ग को जिन्होंने देख रखा है ऐसे तीनों प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों के अन्य गुणस्थान को प्राप्त होकर अत्यल्प काल से पुन: उसी गुणस्थान में आने पर अन्तर्मुहूर्त कालप्रमाण अन्तर पाया जाता है।

अब पहले पंचेन्द्रिय असंयतसम्यग्दृष्टियों का अन्तर कहते हैं-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला एक मनुष्य संज्ञीपंचेन्द्रियतिर्यंच सम्मूच्र्छन पर्याप्तकों में उत्पन्न हुआ व छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त होकर (४) संक्लिष्ट हो मिथ्यात्व में जाकर वहाँ अन्तर को प्राप्त होकर पंचान्नवे पूर्वकोटि काल बिताकर तीन पल्योपम की आयु स्थिति वाले उत्तम भोगभूमिया तिर्यंचों में उत्पन्न हुआ और जीवन के अल्प अवशेष रहने पर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ (५) पश्चात् उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवलियां अवशेष रह जाने पर सासादन गुणस्थान में जाकर मरा और देव हो गया। इस प्रकार पाँच अन्तर्मुहूर्तों से पंचान्नवे पूर्वकोटियों से अधिक तीन पल्योपम प्रमाणकाल पंचेन्द्रिय तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्तकों में भी इसी प्रकार होता है। विशेषता यह है कि इनके सैंतालीस पूर्वकोटि प्रमाण ही अधिक होता है, ऐसा कहना चाहिए। पञ्चेन्द्रिय योनिमती तिर्यञ्चों में भी इसी प्रकार है। केवल जो थोड़ी विशेषता है उसे कहते हैं। वह इस प्रकार है-

मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक जीव पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों में उत्पन्न हुआ। दो मास के गर्भ से निकलकर मुहूर्तपृथक्त्व में वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (१) वहाँ संक्लिष्ट हो मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हो पन्द्रह पूर्वकोटिकाल परिभ्रमण करके तीन पल्योपम की आयु स्थिति वाले भोगभूमियों में उत्पन्न हुआ। वहाँ आयु के अन्त में उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ (२) पुन: उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवलियाँ अवशेष रह जाने पर सासादन गुणस्थान को प्राप्त हुआ और मरकर देव हो गया। इस प्रकार दो अन्तर्मुहूर्तों से अधिक दो मासों से कम अपनी स्थिति प्रमाण असंयतसम्यग्दृष्टि योनिमती तिर्यंचों का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

तात्पर्य यह है कि तीन पल्य की उत्कृष्ट आयु उत्तम भोगभूमि में उत्पन्न होने वाले तिर्यंचों की ही होती है। वहाँ गर्भ मेें दो मास रहकर वहाँ से निकलकर तीन मुहूर्त से ऊपर आठ मुहूर्त के अन्दर-अन्दर वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त करने के योग्य होता है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में तीन प्रकार के तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टियोें का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति तिरश्चां संयतासंयतानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते

संप्रति तिरश्चां संयतासंयतानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-संजदासंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।४९।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।५०।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडिपुधत्तं।।५१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-संयतासंयतविरहितपंचेन्द्रिय तिर्यक्त्रिकस्य सर्वदानुपलंभात्। एकजीवापेक्षया-पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिकस्य संयतासंयतस्य दृष्टमार्गस्य अन्यगुणस्थानं गत्वा अत्यल्पकालेन पुनरागतस्य अंतर्मुहूर्तान्तरोपलंभात्। उत्कर्षेण-तत्र तावत् पंचेन्द्रियतिर्यक्संयतासंयतानां उच्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्त्कर्मी संज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यक्सम्मूच्र्छिमपर्याप्तकेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपन्न: (४) संक्लिष्ट: मिथ्यात्वं गत्वा अंतरं कृत्वा षण्णवतिपूर्वकोटिकालं परिभ्रम्य अपश्चिमे पूर्वकोटिकाले मिथ्यात्वेन सम्यक्त्वेन वा सौधर्मादिषु आयुर्बद्ध्वा अंतर्मुहूर्तावशेषे जीविते संयमासंयमं प्रतिपन्न: (५) कालं कृत्वा देवो जात:। पंचान्तर्मुहूर्तै: ऊनं षण्णवति-पूर्वकोटिप्रमाणं उत्कृष्टान्तरं भवति।
पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तकेषु एवमेव। विशेषेण अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोटिप्रमाणमिति भणितव्यं।
पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु अपि एवं चैव। अस्ति कोऽपि विशेष: तम् भणिष्याम:-एक: अष्टाविंशतिसत्कर्मी पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु उत्पन्न: द्वौ मासौ गर्भे स्थित्वा निष्क्रान्त: मुहूर्तपृथक्त्वेन विशुद्धो वेदकसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपन्न: (१) संक्लिष्ट: मिथ्यात्वं गत्वा अंतरं कृत्वा षोडशपूर्वकोटिप्रमाणं परिभ्रम्य देवायुर्बद्ध्वा अन्तर्मुहूर्तावशेषे जीविते संयमासंयमं प्रतिपन्न:(२)। लब्धमन्तरं। मृतो देवो जात:। द्वाभ्यामन्तर्मुहूर्ताभ्यां मुहूर्तपृथक्त्वाभ्यधिकद्विमासाभ्यां च ऊना: षोडशपूर्वकोट्य: उत्कृष्टान्तरं भवति।
तात्पर्यमेतत्-सामान्यपंचेन्द्रियतिरश्च: पंचान्तर्मुहूर्तै: ऊनं षण्णवतिपूर्वकोटिप्रमाणमुत्कृष्टान्तरं। पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तस्य अष्टचत्वारिंशतत्पूर्वकोटिप्रमाणं उत्कृष्टान्तरं। पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु मुहूर्तपृथक्त्वाभ्य-धिकद्विमासै: द्वि-अंतर्मुहूर्तै: ऊनं षोडशपूर्वकोटिप्रमाणमुत्कृष्टान्तरं । अत्र सूत्रे पूर्वकोटिपृथक्त्वं वर्तते तेनैव षण्णवतिपूर्वकोटि-अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोटि-षोडशपूर्वकोटिसंख्या गृहीता दृश्यते।
एवं पंचमस्थले तिरश्चां संयतासंयतानां अन्तरप्ररूपकत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-पंचिंदियतिरिक्ख-अपज्जाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।५२।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।५३।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।५४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नानाजीवं प्रतीत्य अपर्याप्ता: तिर्यञ्च: निरन्तरा: सन्ति। एकजीवापेक्षया-पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तकस्य अन्येषु अपर्याप्तकेषु क्षुद्रभवग्रहणायु:स्थितिकेषु उत्पद्य प्रतिनिवृत्य आगतस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रान्तरोपलंभात्। लब्धं जघन्यान्तरं। उत्कर्षेण-पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तकस्य अनर्पितजीवेषु उत्पद्य आवलिकाया: असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवत्र्तानि परिवत्र्य प्रतिनिवृत्य आगत्य पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तेषु उत्पन्नस्य सूत्रोक्तान्तरोपलंभात्।
एवं षष्ठस्थले पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तानां अन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
संप्रति गति-गुणस्थानापेक्षया अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-एदं गदिं पडुच्च अंतरं।।५५।।
गुणं पडुच्च उभयदो वि णत्थि अंतरं।।५६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अत्रैतदन्तरं गतिं प्रतीत्य प्रोक्तमस्ति।
अस्मिन् जीवस्थानखण्डनाम्नि ग्रन्थे मार्गणाविशेषितगुणस्थानानां जघन्योत्कृष्टान्तरं वक्तव्यमासीत्। किन्तु अतीतसूत्रे मार्गणामपेक्ष्य अन्तरमुक्तं। तत: नेदं घटते ?
अस्या: आशंकाया: ग्रन्थकर्ता परिहारं भणति-एवं गतिं प्रतीत्य उक्तमन्तरं शिष्यमतिविस्पुâरितार्थं, ततो न दोषोऽस्ति कश्चित्।
गुणस्थानं प्रतीत्य अन्तरे भण्यमाने जघन्योत्कृष्टप्रकाराभ्यां नानैकजीवाभ्यां वा अन्तरं नास्ति, मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमन्तरेण गुणस्थानान्तरग्रहणाभावात् प्रवाहव्युच्छेदाभावाच्च।
एवं सप्तमस्थले गतिगुणस्थानापेक्षया अन्तरकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति तिर्यग्गतिअन्तराधिकार:।


अब संयतासंयत तिर्यंचों में नाना जीव और एक जीव का जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तीनों प्रकार के संयतासंयत तिर्यंचों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।४९।।

उन्हीं तीनों प्रकार के तिर्यंच संयतासंयत जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक अन्तर्मुहूर्त है।।५०।।

उन्हीं तीनोें प्रकार के तिर्यंच संयतासंयत जीवों का उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व है।।५१।। सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संयतासंयतों से रहित तीनों प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीवों का किसी भी काल में अभाव नहीं पाया जाता है। अर्थात् संयतासंयत तिर्यंच जीव कहीं न कहीं सदैव विद्यमान रहते हैं।

अब एक जीव की अपेक्षा कथन करते हैं-देख लिया है मार्ग को जिन्होंने ऐसे तीनों प्रकार के तिर्यंच संयतासंयत अन्य गुणस्थान में जाकर अति अल्पकाल के बाद पुन: उसी गुणस्थान में वापस आ जाते हैं। उनका वह काल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण होता है।

उत्कृष्टरूप से-इनमें से पहले पंचेन्द्रिय तिर्यंच संयतासंयतों का अन्तर कहते हैं-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला एक जीव संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच सम्मूच्र्छिम पर्याप्तकों में उत्पन्न हुआ व छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) वेदकसम्यक्त्व और संयमासंयम को एक साथ प्राप्त हुआ (४) तथा संक्लिष्ट हो मिथ्यात्व में जाकर और अन्तर को प्राप्त होकर छियान्नवे पूर्वकोटिप्रमाण काल परिभ्रमण कर अंतिम पूर्वकोटि में मिथ्यात्व अथवा सम्यक्त्व के साथ सौधर्मादि कल्पों की आयु को बांधकर व जीवन के अन्तर्मुहूर्त अवशेष रह जाने पर संयमासंयम को प्राप्त हुआ (५) और मरण करके देव हुआ। इस प्रकार पाँच अन्तर्मुहूर्तों से कम छियान्नवे पूर्वकोटि प्रमाण पंचेन्द्रिय तिर्यंच संयतासंयतों का उत्कृष्ट अन्तर काल होता है।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्तकों में भी इसी प्रकार अन्तर होता है। विशेषता यह है कि इनके अड़तालीस पूर्वकोटिप्रमाण अन्तर काल कहना चाहिए। पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों में भी इसी प्रकार अन्तर होता है। केवल कुछ विशेषता है उसे कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला एक जीव पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों में उत्पन्न हुआ व दो मास गर्भ में रहकर निकला, मुहूर्तपृथक्त्व से विशुद्ध होकर, वेदकसम्यक्त्व को और संयमासंयम को एक साथ प्राप्त हुआ (१) पुन: संक्लिष्ट हो मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त होकर, सोलह पूर्वकोटिप्रमाण परिभ्रमण कर और देवायु बांधकर जीवन के अन्तर्मुहूर्तप्रमाण अवशेष रहने पर संयमासंयम को प्राप्त हुआ (२)। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। पश्चात् मरकर देव हुआ। इस प्रकार दो अन्तर्मुहूर्तों और मुहूर्तपृथक्त्व से अधिक दो मास से हीन सोलह पूर्वकोटि प्रमाण पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों का उत्कृष्ट अन्तर होता है। तात्पर्य यह है कि सामान्य पंचेन्द्रिय तिर्यंच का उत्कृष्ट अन्तर पाँच अन्तर्मुहूर्त कम छियान्नवे पूर्वकोटिप्रमाण है। पंचेन्द्रिय पर्याप्तक तिर्यंच का उत्कृष्ट अन्तर अड़तालिस पूर्वकोटि प्रमाण है। पंचेन्द्रिय योनिमती तिर्यंचों में मुहूर्त पृथक्त्व से अधिक दो मास और दो अन्तर्मुहूर्त से न्यून सोलह पूर्वकोटि प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर होता है। यहाँ सूत्र में जो पूर्वकोटिपृथक्त्व शब्द है उसके द्वारा छियान्नवे पूर्वकोटि, अड़तालिस पूर्वकोटि और सोलहपूर्वकोटि की संख्या ग्रहण की गई है। इस प्रकार पंचम स्थल में संयतासंयत तिर्यंचों का अन्तर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक तिर्यंचों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तकों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।५२।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तकों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है।।५३।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तकों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकालप्रमाण असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन है।।५४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा अपर्याप्तक तिर्यंच जीव निरन्तर हैं, अर्थात् उनका कोई अन्तरकाल नहीं है। एक जीव की अपेक्षा-पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तक का क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण आयुस्थिति वाले अन्य अपर्याप्तक जीवों में उत्पन्न होकर और लौटकर आये हुए जीव का क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण अन्तर पाया जाता है। यह जघन्य अन्तर प्राप्त हुआ।

उत्कृष्टरूप से पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तक के अविवक्षित जीवों में उत्पन्न होकर आवली के असंख्यातवें भागमात्र पुद्गलपरिवर्तन परिभ्रमण करके पुन: लौटकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तकों में उत्पन्न हुए जीव का सूत्रोक्त अन्तर पाया जाता है।

इस प्रकार छठे स्थल में पंचेन्द्रिय अपर्याप्त तिर्यंचों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब गति और गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

यह अन्तर गति की अपेक्षा कहा गया है।।५५।।

गुणस्थान की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट, इन दोनों प्रकारों से अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।५६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ यह अन्तर गति की अपेक्षा कहा गया है।

प्रश्न-इस जीवस्थान खण्ड नाम के ग्रंथ में मार्गणा विशेषित गुणस्थानों का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर कहना चाहिए। किन्तु पिछले सूत्र में तो मार्गणा की अपेक्षा अन्तर कहा है। इसलिए वह यहाँ घटित नहीं होता है ?

उत्तर-ऐसी आशंका होने पर ग्रंथकर्ता श्री वीरसेनाचार्य उसका परिहार करते हुए कहते हैं कि यहाँ पर अन्तर कथन गति की अपेक्षा शिष्योें की बुद्धि विस्फुरित करने के लिए किया है, अत: उसमें कोई दोष नहीं है। गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर कहने पर जघन्य और उत्कृष्ट, इन दोनों ही प्रकारों से अथवा नाना जीव और एक जीव इन दोनों अपेक्षा से अन्तर नहीं है, क्योंकि उनके मिथ्यादृष्टि गुणस्थान के सिवाय अन्य गुणस्थान के ग्रहण करने का अभाव है तथा उनके प्रवाह का कभी उच्छेद भी नहीं होता है।

इस प्रकार सातवें स्थल में गति और गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

यह तिर्यग्गति अन्तराधिकार समाप्त हुआ।

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