३.मनुष्यगति अन्तराधिकार

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मनुष्यगति अन्तराधिकार

अथ मनुष्यगत्यन्तराधिकार:

अथ षट्स्थलै: सप्तविंशतिसूत्रै: मनुष्यगतिनामान्तराधिकार: कथ्यते-तत्र प्रथमस्थले त्रिविधमनुष्याणां मिथ्यादृष्ट्यादित्रिगुणस्थानवर्तिनां अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तदनु द्वितीयस्थले असंयतसम्यग्दृष्टीनामन्तरकथनत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं तृतीयस्थले संयतासंयतादि-अप्रमत्तान्तानां अन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘संजदासंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले चतुर्णामुपशामकानामन्तरकथनत्वेन ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनंतरं पंचमस्थले क्षपकाणामयोगिनां सयोगिनां च अन्तरकथनप्रकारेण ‘‘चदुण्हं खवा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत: परं षष्ठस्थले लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां अन्तरप्ररूपणत्वेन ‘‘मणुसअपज्जत्ताणं’’ इत्यादि षट्सूत्राणि इति समुदायपातनिका।

संप्रति त्रिविधमनुष्याणां मिथ्यादृष्टीनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-मणुसगदीए मणुस-मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसु मिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।५७।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।५८।।

उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि देसूणाणि।।५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नानाजीवापेक्षया त्रिविधा अपि मनुष्या: निरंतरा: सन्ति, नास्ति तेषामन्तरं। एकजीवापेक्षया त्रिविधमनुष्यमिथ्यादृष्टे: दृष्टमार्गस्य गुणस्थानान्तरं प्रतिपद्य अत्यल्पकालेन प्रतिनिवृत्य आगतस्य सर्वजघन्यान्तर्मुहूर्तान्तरोपलंभात्। उत्कर्षेण-तावत् मनुष्यमिथ्यादृष्टीनां उच्यते-एक: तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मी त्रिपल्योपमिकेषु मनुष्येषु उत्पन्न:। नवमासपर्यंतं गर्भे स्थित:। उत्तानशय्याया: अंगुल्याहारेण सप्त, रिंगन् सप्त, अस्थिरगमणेन सप्त, स्थिरगमनेन सप्त, कलासु सप्त, गुणेषु सप्त, अन्यानपि सप्त दिवसान् गमयित्वा विशुद्ध: वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४९)। तत्र भोगभूमिषु त्रिपल्योपमायु: गमयित्वा मिथ्यात्वं गत:। लब्धमन्तरं (१)। सम्यक्त्वं प्रतिपद्य (२) मृतो देवो जात:। एवं एकोनपंचाशत्दिवसाभ्यधिकनवभि: मासै:, द्वाभ्यामन्तर्मुहूर्ताभ्यां च ऊनं त्रिपल्योपमप्रमाणं मिथ्यात्वोत्कृष्टान्तरं जातं। एवमेव मनुष्यपर्याप्त-मनुष्यिन्योरपि वक्तव्यं, भेदाभावात्।
एवं प्रथमस्थले त्रिविधमनुष्याणां अन्तरकथनमुख्यत्वेन तीणि सूत्राणि गतानि |

अथ मनुष्यगति अन्तराधिकार प्रारंभ

अब छह स्थलों में सत्ताईस सूत्रों के द्वारा मनुष्यगति नामका अन्तराधिकार कहा जा रहा है-उनमें से प्रथम स्थल में मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानवर्ती तीन प्रकार के मनुष्यों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यों का अन्तर कहने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में संयतासंयत गुणस्थान से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्तियों तक का अन्तर कथन करने हेतु ‘‘संजदासंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में चारों उपशामकों का अन्तर बतलाने के लिए ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तदनंतर पाँचवें स्थल में क्षपक गुणस्थानवर्ती महामुनियों का, सयोगिकेवलियों का तथा अयोगिकेवलियों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘चदुण्हं खवा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके पश्चात् छठे स्थल में लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का अन्तर प्ररूपण करने वाले ‘‘मणुसअपज्जत्ताणं’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब तीन प्रकार के मनुष्यों में मिथ्यादृष्टि नाना जीव और एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने के लिए तीन सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्यपर्याप्तक और मनुष्यिनियों में मिथ्यादृष्टि जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।५७।।

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य मिथ्यादृष्टियों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।५८।।

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य मिथ्यादृष्टियों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्योपम है।।५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा तीनों प्रकार के मनुष्य निरन्तर होते हैं, उनमें कोई अन्तरकाल नहीं है। एक जीव की अपेक्षा दृष्टमार्गी तीनों ही प्रकार के मनुष्य मिथ्यादृष्टि के किसी अन्य गुणस्थान को प्राप्त होकर अति स्वल्पकाल से लौटकर आ जाने पर सर्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त प्रमाण अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से उनमें से पहले मनुष्य सामान्य मिथ्यादृष्टि का अन्तर कहते हैं। वह इस प्रकार है-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्तावाला कोई एक तिर्यंच अथवा मनुष्य जीव तीन पल्योपम की स्थिति वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। नौ मास गर्भ में रहकर वहाँ से निकला। फिर उत्तानशय्या से अंगुष्ठ को चूसते हुए सात दिन तथा रेंगते हुए सात दिन, अस्थिर गमन से सात दिन, स्थिर गमन से सात दिन, कलाओं में सात दिन, गुणों में सात दिन तथा और भी सात दिन इस प्रकार ४९ दिन बिताकर विशुद्ध हो वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। उसके पश्चात् उत्तम भोगभूमि की तीन पल्योपम आयु बिताकर मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से अन्तर प्राप्त हो गया (१)। पीछे सम्यक्त्व को प्राप्त होकर (२) मरा और देव हो गया। इस प्रकार उनंचास दिनों से अधिक नौ मास और दो अन्तर्मुहूर्तों से कम तीन पल्योपम आयु मनुष्य सामान्य मिथ्यात्व का उत्कृष्ट अन्तर होता है। इसी प्रकार से मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनियों में अन्तर कहना चाहिए, क्योंकि इनसे उनमें कोई भेद नहीं है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में तीन प्रकार के मनुष्यों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अधुना त्रिविधमनुष्याणां सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।६०।।

उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।६१।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।६२।।
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।६३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-नानाजीवापेक्षया त्रिविधमनुष्येषु स्थितसासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-गुणस्थानपरिणतजीवेषु अन्यगुणस्थानं गतेषु गुणस्थानान्तरस्य जघन्येन एकसमयदर्शनात्। उत्कर्षेण-पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रकालावस्थानदर्शनात् द्विगुणस्थानाभ्यां विना एतेषां।
एकजीवापेक्षया-सासादनस्य जघन्यान्तरं पल्योपमस्यासंख्यातभाग:। एतावत्कालेन विना प्रथम सम्यक्त्वग्रहणयोग्यस्य सागरोपमपृथक्त्वादध: सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वस्थित्यो: उत्पत्तेरभावात्।
सम्यग्मिथ्यादृष्टे: अंतर्मुहूर्तं जघन्यान्तरं, अन्यगुणस्थानं गत्वा अंतर्मुहूर्तेन पुनरागमोपलंभात्।
उत्कर्षेण-सामान्यमनुष्यसासादनस्य तावदुच्यते-एक: तिर्यङ् देवो नारको वा सासादनकाले एकसमयोऽस्तीति मनुष्यो जात:। द्वितीयसमये मिथ्यात्वं गत्वा अंतरं कृत्वा सप्तचत्वारिंशत्पूर्वकोटि-अभ्यधिकत्रिपल्योपमप्रमाणं भ्रमित्वा पश्चात् उपशमसम्यक्त्वं गत:। तस्मिन् एक: समयोऽस्तीति सासादनं गत्वा मृतो देवो जात:। द्विसमयोना मनुष्योत्कृष्टस्थिति: सासादनोत्कृष्टान्तरं जातं।
सम्यग्मिथ्यादृष्टेरुच्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्कर्मी अन्यगतित: आगत: मनुष्येषु उत्पन्न:। गर्भादिअष्टवर्षेषु गतेषु विशुद्ध: सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (१)। मिथ्यात्वं गत:, सप्तचत्वािंरशत्पूर्वकोटी: गमयित्वा त्रिपल्योपमिकेषु मनुष्येषु उत्पन्न: आयुर्बद्ध्वा अवसाने सम्यग्मिथ्यात्वं गत:। लब्धमन्तरं (२) तत: मिथ्यात्वे सम्यक्त्वे वा येन आयुर्बद्धं तद्गुणस्थानं गत्वा मृतो देवो जात: (३)। एवं त्रिभिरन्तर्मुहूर्तै: अष्टवर्षैश्च ऊना स्वकस्थिति: सम्यग्मिथ्यात्वोत्कृष्टान्तरं।
एवं मनुष्यपर्याप्त-मानुष्योरपि ज्ञातव्यं। विशेषेण तु-मनुष्यपर्याप्तेषु त्रयोविंशतिपूर्वकोटिप्रमाणं, मानुषीषु सप्तपूर्वकोट्य: त्रिषु पल्योपमेषु अधिका इति वक्तव्यं।
एवं प्रथमस्थले त्रिविधमनुष्याणां मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां अन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रसप्तकं गतम्।
संप्रति त्रिविधमनुष्यासंयतसम्यग्दृष्टीनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।६४।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।६५।।
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।६६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं। एकजीवापेक्षया त्रिविधमनुष्येषु कश्चिदेक: मनुष्य: सम्यग्दृष्टि: अन्यगुणस्थानं गत्वा अंतरं प्राप्य पुन: प्रतिनिवृत्य अंतर्मुहूर्तेन आगच्छति। इति जघन्यान्तरं।
उत्कर्षेण-एक: अष्टाविंशतिसत्कर्मी अन्यगत्या: आगत: मनुष्येषु उत्पन्न:। गर्भादिअष्टवर्षेषु गतेषु विशुद्ध: वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (१)। मिथ्यात्वं गत्वा अंतरं प्राप्य सप्तचत्वािंरशत्पूर्वकोटी: गमयित्वा त्रिपल्योपमिकेषु उत्पन्न:। तत: बद्धायुष्क: सन् उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (२)। उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिकावशेषे सासादनं गत्वा मृतो देवो जात:। द्वाभ्यामन्तर्मुहूर्ताभ्यां अष्टवर्षैश्च ऊना स्वकस्थिति: असंयतसम्यग्दृष्टीनांं उत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं मनुष्यपर्याप्त-मानुष्योरपि। केवलं तु त्रयोविंशतिपूर्वकोट्य: सप्तपूर्वकोट्यश्च त्रिपल्योपमेषु अधिका: इति वक्तव्यं।
एवं द्वितीयस्थले त्रिविधमनुष्यासंयतसम्यग्दृष्टीनामन्तरकथनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।

अब तीन प्रकार के मनुष्यों में सासादन सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवर्ती नानाजीव और एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।६०।।

उक्त मनुष्यों का उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण है।।६१।।

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्यों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमश: पल्योपम का असंख्यातवाँभाग और अन्तर्मुहूर्त है।।६२।।

उक्त मनुष्यों का उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिवर्षपृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपमकाल है।।६३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा तीनों ही प्रकार के मनुष्यों में स्थित सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से परिणत सभी जीवों के अन्य गुणस्थान में चले जाने पर इन गुणस्थानों का अन्तर जघन्य से एक समय देखा जाता है।

उत्कृष्ट से सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान के बिना तीनों ही प्रकार के मनुष्यों का पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र काल तक अवस्थान देखा जाता है।

एक जीव की अपेक्षा सासादन गुणस्थान का जघन्य अन्तर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है, क्योंकि इतने काल के बिना प्रथम सम्यक्त्व के ग्रहण करने योग्य सागरोपमपृथक्त्व से नीचे होने वाली सम्यक्त्वप्रकृति तथा सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति की स्थिति की उत्पत्ति का अभाव है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त होता है, क्योंकि उसका अन्य गुणस्थान में जाकर अन्तर्मुहूर्त से पुन: आगमन पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-पहले मनुष्य सासादनसम्यग्दृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-एक तिर्यंच देव अथवा नारकी जीव सासादन गुणस्थान के काल में एक समय अवशेष रहने पर मनुष्य हुआ। द्वितीय समय में मिथ्यात्व में जाकर और अन्तर को प्राप्त होकर सैंतालीस पूर्वकोटि प्रमाण से अधिक तीन पल्योपमकाल परिभ्रमण कर पुन: उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। उस उपशमसम्यक्त्व के काल मेें एक समय अवशेष रहने पर सासादन गुणस्थान में जाकर मरा और देव हो गया। इस प्रकार दो समय कम मनुष्य की उत्कृष्ट स्थिति सासादन गुुणस्थान का उत्कृष्ट अन्तर हो गया।

अब मनुष्यसम्यग्मिथ्यादृष्टि का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक जीव अन्य गति से आकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। गर्भ को आदि लेकर आठ वर्षों के व्यतीत होने पर विशुद्ध हो सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (१)। पुन: मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ, सैंतालीस पूर्वकोटि प्रमाणकाल बिताकर तीन पल्योपम की स्थिति वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ और आयु को बांधकर अन्त में सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से अन्तर लब्ध हुआ (२)। तत्पश्चात् मिथ्यात्व या सम्यक्त्व में से जिसके द्वारा आयु बंधी थी, उसी गुणस्थान में जाकर मरा और देव हो गया (३)। इस प्रकार तीन अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्षों से कम अपनी स्थिति सम्यग्मिथ्यात्व का उत्कृष्ट अन्तर है।

इसी प्रकार मनुष्यपर्याय और मनुष्यिनियों का भी अन्तर जानना चाहिए। विशेष बात यह है कि मनुष्य पर्याप्तकों में तेईस पूर्वकोटि प्रमाण और तीन पल्योपम का अन्तर कहना चाहिए और मनुष्यिनियों में सात पूर्वकोटि से अधिक तीन पल्योपम कहना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में तीन प्रकार के मनुष्यों में मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानवर्तियों का अन्तर निरूपण करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब तीनों प्रकार के मनुष्यों में असंयतसम्यग्दृष्टि नाना जीव और एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने के लिए तीन सूत्रों का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यत्रिक का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।६४।।

एक जीव की अपेक्षा मनुष्यत्रिक का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।६५।।

असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यत्रिक का उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि वर्ष पृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपम है।।६६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा इन मनुष्यों का कोई अन्तरकाल नहीं है। एक जीव की अपेक्षा तीनों प्रकार के मनुष्यों में कोई एक सम्यग्दृष्टि मनुष्य अन्य गुणस्थान में जा करके अन्तर को प्राप्त हो पुन: लौटकर अन्तर्मुहर्त से वापस आता है। यह जघन्य अन्तर हुआ।

उत्कृष्ट से-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक जीव अन्यगति से आया और मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। पुन: गर्भ से लेकर आठ वर्ष के बीतने पर विशुद्ध हो वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हो गया (१)ं पुन: मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हो सैंतालिस पूर्वकोटि काल बिताकर तीन पल्योपम वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् आयु को बांधकर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (२)। उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवलियाँ अवशेष रहने पर सासादन गुणस्थान में जाकर मरा और देव हो गया। इस प्रकार आठ वर्ष और दो अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थिति प्रमाण असंयतसम्यग्दृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर है।

इसी प्रकार मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनियों का भी अन्तर कहना चाहिए। विशेष बात केवल यह है कि मनुष्यपर्याप्त असंयतसम्यग्दृष्टियों का अन्तर तेईस पूर्वकोटि अधिक तीन पल्योपम तथा मनुष्यिनियों में सात पूर्वकोटि अधिक तीन पल्योपम होता है, ऐसा कहना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तीनों प्रकार के मनुष्य असंयतसम्यग्दृष्टियों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।


संयतासंयताद्यप्रमत्तसंयतानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-संजदासंजदप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।६७।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।६८।।

उक्कस्सेण पुव्वकोडिपुधत्तं।।६९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रिविधा अपि मनुष्या: संयतासंयता: प्रमत्तसंयता: अप्रमत्तसंयताश्च निरन्तरा: सन्तीति नास्त्यन्तरं। एकजीवापेक्षया त्रिविधमनुष्येषु स्थितत्रिगुणस्थानजीवेषु मध्ये कस्यचिदेकजीवस्य अन्यगुणस्थानं गत्वान्तरं प्राप्य पुनरन्तर्मुहूर्तेन प्राचीनगुणस्थानागमोपलंभात्।
उत्कर्षेण-मनुष्यसंयतासंयतस्य तावदुच्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: अन्यगतेरागत्य मनुष्येषु उत्पन्न:। अष्टवार्षिक: जातो वेदकसम्यक्त्वं संयमासंयमं च समवंâ प्रतिपन्न: (१)। मिथ्यात्वं गत्वान्तरं प्राप्य अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोटी: परिभ्रम्य अवसाने देवायुर्बद्ध्वा संयमासंयमं प्रतिपन्न:। लब्धमन्तरं (२) मृतो देवो जात:। एवं अष्टवर्षै: द्वाभ्यामन्तर्मुहूत्र्ताभ्यां च ऊना अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोट्य: संयतासंयतस्योत्कृष्टान्तरं भवति।
प्रमत्तस्योत्कृष्टान्तरमुच्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: अन्यगतेरागत्य मनुष्येषु उत्पन्न:। गर्भादि-अष्टवर्षै: वेदकसम्यक्त्वं संयमं च प्रतिपन्न: अप्रमत्त: (१) प्रमत्तो भूत्वा (२) मिथ्यात्वं गत्वान्तरं कृत्वा अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोटी: परिभ्रम्य अपश्चिमायां पूर्वकोट्यां बद्धायुष्को सन् अप्रमत्तो भूत्वा प्रमत्तो जात:। लब्धमन्तरं (३)। मृतो देवो जात:। त्रयान्तर्मुहूर्ताभ्यधिकाष्टवर्षैरूना अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोप्य: प्रमत्तस्योत्कृष्टान्तरं भवति।
अप्रमत्तस्योत्कृष्टान्तरमुच्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: अन्यगतेरागत्य मनुष्येषु उत्पद्य गर्भाद्यष्टवार्षिको जात:। सम्यक्त्वं अप्रमत्तगुणस्थानं च युगपत् प्रतिपन्न: (१)। प्रमत्तो भूत्वान्तरित: अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोटी: परिभ्रम्य अपश्चिमायां पूर्वकोट्यां बद्धदेवायुष्क: सन् अप्रमत्तो जात:। लब्धमन्तरं (२)। तत: प्रमत्तो भूत्वा (३) मृतो देवो जात:। त्रिभिरन्तर्मुहूर्तैै: अभ्यधिकै: अष्टवर्षै: ऊना अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोट्य: उत्कृष्टान्तरं।
मनुष्यपर्याप्त-मानुष्यो: एवमेव। केवलं-पर्याप्तेषु चतुर्विंशतिपूर्वकोट्य: मानुषीषु अष्टपूर्वकोट्य: इति वक्तव्यम्।
एवं तृतीयस्थले संयतासंयतादित्रयाणां अन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति चतुर्णां उपशामकानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-चदुण्हमुवसामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।७०।।
उक्कस्सेण वासपुधत्तं।।७१।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।७२।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडिपुधत्तं।।७३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्णां सूत्राणां अर्थ: सुगमो वर्तते। एकजीवापेक्षया उत्कर्षेण-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: मनुष्येषु उत्पन्न: गर्भाद्यष्टवर्षै: सम्यक्त्वं संयमं च समकं प्रतिपन्न: (१) प्रमत्ताप्रमत्त-गुणस्थानयो: सातासातबंधपरावृत्तिसहस्रं कृत्वा (२) दर्शनमोहनीयं उपशाम्य (३) उपशमश्रेणिप्रायोग्याप्रमत्तो जात: (४)। अपूर्व: (५) अनिवृत्ति: (६) सूक्ष्म: (७) उपशान्त: (८) पुनश्च१ सूक्ष्म: (९) अनिवृत्ति: (१०) अपूर्व: (११) अप्रमत्तो भूत्वान्तरित:। अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोटी: परिभ्रम्य अपश्चिमायां पूर्वकोट्यां बद्धदेवायुष्क: सम्यक्त्वं संयमं च प्रतिपद्य दर्शनमोहनीयमुपशाम्य उपशमश्रेणियोग्यविशुद्ध्या विशुद्ध्य अप्रमत्तो भूत्वा अपूर्वो जात:। लब्धमन्तरं। ततो निद्रा-प्रचलयो: बन्धव्युच्छेदप्रथमसमये कालं गत: देवो जात:। अष्टवर्षै: एकादशान्तर्मुहूर्तै: च अपूर्वकरणस्य सप्तमभागेन च ऊना अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोट्य: उत्कृष्टान्तरं भवति। एवमेव त्रयाणामपि उपशामकानां। केवलं तु दशभि: नवभि: अष्टभि: अन्तर्मुहूर्तै: एकसमया-धिकाष्टवर्षैश्च ऊना अष्टचत्वािंरशत्पूर्वकोट्य: उत्कृष्टान्तरं भवतीति वक्तव्यं।
पर्याप्तमनुष्याणां मानुषीणां-भाववेदस्त्रीणां चैव एवमेव। केवलं तु पर्याप्तेषु चतुर्विंशतिपूर्वकोट्य:, मानुषीषु अष्टपूर्वकोट्य: इति वक्तव्यं। एवं चतुर्थस्थले उपशामकानामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति चतुर्णां क्षपकानां अयोगिनां सयोगिनां च नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्र-चतुष्टयमवतार्यते-चदुण्हं खवा अजोगिकेवलीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।७४।।
उक्कस्सेण छम्मासं, वासपुधत्तं।।७५।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिंरतरं।।७६।।
सजोगिकेवली ओघं।।७७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नानाजीवापेक्षया अपूर्वकरणादिएतेषु गुणस्थानेषु अन्यगुणस्थानं निर्वृत्तिं च गतेषु एतेषां एकसमयमात्रजघन्यान्तरोपलंभात्। उत्कर्षेण सामान्यमनुष्य-मनुष्यपर्याप्तयो: षण्मासमन्तरं भवति। मानुषीषु वर्षपृथक्त्वमन्तरं भवति।
एष: क्रम: कथं ज्ञायते ?
गुरूपदेशात्।
एकजीवापेक्षया-क्षपकश्रेणीषु अयोगिष्वपि भूय: आगमनाभावात् नास्त्यन्तरं। सयोगिनामपि नानैकजीवान् प्रतीत्य नास्त्यन्तरं इति ओघवदुच्यते।
एवं पंचमस्थले क्षपकायोगिसयोगिपरमात्मनां अन्तरकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।

अब संयतासंयत से लेकर अप्रमत्तसंयतगुणस्थानवर्ती तक मुनियों में नाना जीव और एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयतासंयतों से लेकर अप्रमत्तसंयतों तक के मनुष्यत्रिकों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।६७।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।६८।।

उक्त तीनों गुणस्थान वाले मनुष्यत्रिकों का उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटीपृथक्त्व है।।६९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीनों प्रकार के मनुष्य संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्ती सभी जीव निरन्तर होते हैं, क्योंकि इनका कोई अन्तरकाल नहीं है। एक जीव की अपेक्षा तीन प्रकार के मनुष्यों में स्थित तीन गुणस्थानवर्ती किसी एक जीव का अन्य गुणस्थान में जाकर अन्तर को प्राप्त होकर पुन: वापस लौटकर अन्तर्मुहूर्त के द्वारा पुराने गुणस्थान का होना पाया जाता है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा से अब सर्वप्रथम संयतासंयत मनुष्य का अन्तर कहते हैं- मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला कोई एक जीव अन्यगति से आकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ पुन: गर्भ से लेकर आठ वर्ष का समय व्यतीत हुआ और वेदक सम्यक्त्व तथा संयमासंयम को एक साथ प्राप्त हुआ (१)। पुन: मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हो अड़तालीस पूर्वकोटि काल तक परिभ्रमण कर आयु के अन्त में देवायु बांधकर संयमासंयम को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से उक्त अन्तर प्राप्त हुआ (२)। पुन: मरा और देव हुआ। इस प्रकार आठ वर्ष और दो अन्तर्मुहूर्तों से कम अड़तालीस पूर्वकोटि काल संयतासंयत का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

अब प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला कोई एक जीव अन्यगति से आकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। पुन: गर्भ से लेकर आठ वर्ष की उम्र में वेदक सम्यक्त्व और संयम को प्राप्त हो गया। पश्चात् वह अप्रमत्तसंयत (१), प्रमत्तसंयत होकर (२), मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त होकर, अड़तालीस पूर्वकोटि तक परिभ्रमण कर अंतिम पूर्वकोटि में बद्धायुष्क होता हुआ अप्रमत्तसंयत होकर पुन: प्रमत्तसंयत हुआ। इस प्रकार से अन्तर प्राप्त हो गया (३)। उसके पश्चात् मरा और देव हो गया। इस प्रकार तीन अन्तर्मुहूर्तों से अधिक आठ वर्ष से कम अड़तालीस पूर्वकोटि काल प्रमाण प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

अब अप्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला कोई एक जीव अन्य गति से आकर मनुष्यों में उत्पन्न होकर गर्भ काल से लेकर आठ वर्ष का हुआ और सम्यक्त्व तथा अप्रमत्त गुणस्थान को एक साथ प्राप्त हुआ (१)। पुन: प्रमत्तसंयत गुणस्थान में आकर अन्तर को प्राप्त हुआ और अड़तालीस पूर्वकोटि काल तक परिभ्रमण कर अंतिम पूर्वकोटि में बद्धदेवायु से सहित होता हुआ अप्रमत्तसंयत हो गया। इस प्रकार से अन्तर प्राप्त हुआ (२)। तत्पश्चात् प्रमत्तसंयत होकर (३) मरा और देव हो गया। ऐसे तीन अन्तर्मुहूर्तों से अधिक आठ वर्षों से कम अड़तालीस पूर्वकोटि प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर होता है।

मनुष्य पर्याप्त तथा मनुष्यिनियों में इसी प्रकार का अन्तर होता है। विशेष बात यह है कि इन पर्याप्त मनुष्यों में चौबीस पूर्वकोटि और मनुष्यिनियों में आठ पूर्वकोटि कालप्रमाण अन्तर कहना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में संयतासंयत आदि तीनों गुणस्थानवर्ती मनुष्यों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब चारों उपशामक महामुनियों में नाना जीव और एक जीव का जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

चारों उपशामकों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।७०।।

चारों उपशामकों का उत्कर्ष से वर्षपृथक्त्व अन्तर है।।७१।।

उक्त गुणस्थानों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।७२।।

चारों उपशामकों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व है।।७३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चारों ही सूत्रों का अर्थ सरल है। यहाँ एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर का कथन करते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला कोई एक जीव मनुष्यों में उत्पन्न हुआ और गर्भ से लेकर आठ वर्ष की उम्र में सम्यक्त्व और संयम को एक साथ प्राप्त कर लिया (१)। प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में साता और असाता वेदनीय के बंध परावर्तनों को हजारों बार करके (२) दर्शनमोहनीय का उपशम करके (३) उपशमश्रेणी के योग्य अप्रमत्तसंयत हुआ (४) पुन: अपूर्वकरण (५) अनिवृत्तिकरण (६) सूक्ष्मसाम्पराय (७) उपशान्तकषाय, पुन: नीचे उतरते हुए (८) सूक्ष्मसाम्पराय (९) अनिवृत्तिकरण (१०) अपूर्वकरण (११) और अप्रमत्तसंयत में आकर अन्तर को प्राप्त होकर अड़तालीस पूर्वकोटि तक परिभ्रमण कर अंतिम पूर्वकोटि में देवायु को बांधकर सम्यक्त्व और संयम को युगपत् प्राप्त होकर दर्शनमोहनीय का उपशम कर उपशमश्रेणी के योग्य विशुद्धि से विशुद्ध होता हुआ अप्रमत्तसंयत होकर अपूर्वकरण संयत हुआ। इस प्रकार से अन्तर उपलब्ध हो गया। तत्पश्चात् निद्रा और प्रचला के बंध-विच्छेद के प्रथम समय में काल को प्राप्त होकर देव हो गया। इस प्रकार आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्तों से तथा अपूर्वकरण के सप्तम भाग से कम अड़तालीस पूर्वकोटिकाल उत्कृष्ट अन्तर होता है। इसी प्रकार से शेष तीन उपशामकों का भी अन्तर होता है।

विशेषता केवल यह है कि उनमें क्रमश: दश, नौ, और आठ अन्तर्मुहूर्तों से तथा एक समय अधिक आठ वर्षों से कम अड़तालीस पूर्वकोटि प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर होता है, ऐसा कहना चाहिए।

पर्याप्त मनुष्यों में तथा मनुष्यिनियों-भावस्त्रीवेदियों में भी ऐसा ही अन्तर है। केवल विशेषता यह है कि पर्याप्तकों में चौबीस पूर्वकोटि और मनुष्यिनियों में आठ पूर्वकोटि कालप्रमाण अन्तर कहना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में उपशामकों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब चारों क्षपक गुणस्थानवर्ती महामुनियों का, अयोगिकेवलियों का और सयोगिकेवलियों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

चारों क्षपक श्रेणी वाले और अयोगिकेवलियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय है।।७४।

उक्त जीवों-क्षपक श्रेणी वाले एवं अयोगिकेवलियों का उत्कृष्ट अन्तर, छह मास और वर्ष पृथक्त्व होता है।।७५।।

चारों क्षपक श्रेणी वाले महामुनियों का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।७६।।

सयोगिकेवली का अन्तर गुणस्थान के समान जानना चाहिए।।७७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा इन अपूर्वकरण आदि गुणस्थानों के चारों क्षपकों के अन्य गुणस्थानों में तथा अयोगिकेवली के निवृत्ति को चले जाने पर एक समय मात्र जघन्य अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्ट से सामान्य मनुष्य और पर्याप्त मनुष्यों का अन्तरकाल छह मास होता है। मनुष्यिनियों में वर्ष पृथक्त्व प्रमाण अन्तर होता है। प्रश्न-यह क्रम कैसे जाना जाता है ? उत्तर-गुरु उपदेश से यह क्रम जाना जाता है। एक जीव की अपेक्षा-क्षपकश्रेणी वाले चारों गुणस्थानवर्ती जीवों में और अयोगिकेवलियों के संसार में पुन: आगमन का अभाव होने से उनमें अन्तर नहीं पाया जाता है।

सयोगिकेवलियों का भी नाना जीव एवं एक जीव की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है, उनका कथन गुणस्थान के समान कहा गया है।

इस प्रकार पाँचवें स्थल में चारों क्षपकों का, अयोगिकेवलियों का एवं सयोगिकेवलियों का अन्तर कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति मनुष्यापर्याप्तानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते

संप्रति मनुष्यापर्याप्तानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-मणुस अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।७८।।


उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।७९।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।८०।।

उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।८१।।

एदं गदिं पडुच्च अंतरं।।८२।।

गुणं पडुच्च उभयदो वि णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।८३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां जघन्येन एकसमयमन्तरं भवति, नानाजीवापेक्षया।
एतस्य महद्राशेरन्तरं कथं भवति ?

स्वभावादेव। न च स्वभावे युक्तिवादस्य प्रवेशोऽस्ति, भिन्नविषयत्वात्। उत्कर्षेण पल्योपमस्या-संख्यातभाग:। एकजीवापेक्षया-अनर्पितापर्याप्तकेषु उत्पद्य अत्यल्पकालेन पुन: लब्ध्यपर्याप्तकेषु आगतस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रान्तरोपलम्भात्। उत्कर्षेण-लब्ध्यपर्याप्तमनुष्यस्य एकेन्द्रियं गतस्य आवलिकाया: असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवत्र्ते परिवत्त्र्य प्रतिनिवृत्त्य आगतस्य सूत्र्रोक्तान्तरोपलम्भात्।
एतदन्तरं गतिं प्रतीत्य कथितं। शिष्याणामन्तरसंभवप्रतिपादनार्थमेतत्सूत्रं। उभयत: जघन्योत्कृष्टाभ्यां नानैकजीवाभ्यां वा नास्त्यन्तरं इति उक्तं भवति। मार्गणां त्यक्त्वा गुणस्थानान्तरग्रहणाभावात् लब्ध्यपर्याप्त-मनुष्याणामिति।
तात्पर्यमेतत्-मनुष्यपर्यायं संप्राप्य वेदकसम्यक्त्वस्य यथान्तरं न स्यात्तथैव प्रयतितव्यं। पुनश्च क्षायिकसम्यक्त्वं लब्ध्वा जैनेश्वरीं दीक्षां आदाय क्षपकश्रेण्यारोहणार्थं पुरुषार्थो विधेय:। द्रव्यक्षेत्रकाल-भावसामग्रीं समग्रां कृत्वा सयोग्ययोगिजिनपरमात्मपदं परमानन्दमयं लब्ध्वा शाश्वतकालं सिद्धशिलाया उपरि निजशुद्धपरमात्मस्वरूपे स्थातव्यमिति।
एवं षष्ठस्थले लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
इति मनुष्यगत्यन्तराधिकार:।


अब मनुष्य अपर्याप्तकों में नाना जीव और एक जीव का जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।७८।।

लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का उत्कृष्ट अन्तर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है।।७९।।

एक जीव की अपेक्षा लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।८०।।

उक्त लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकालात्मक असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।८१।।

यह अन्तर गति की अपेक्षा कहा गया है।।८२।।

गुणस्थान की अपेक्षा तो दोनों प्रकार से भी अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।८३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का जघन्य अन्तर एक समय होता है।

शंका-इतनी बड़ी राशि का अन्तर किसलिए होता है ?

समाधान-इस राशि का ऐसा स्वभाव ही है और स्वभाव में युक्तिवाद का प्रवेश नहीं होता है, क्योंकि उसका विषय भिन्न है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण अन्तर होता है। एक जीव की अपेक्षा अविवक्षित लब्ध्यपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर अति अल्पकाल से पुन: लब्ध्यपर्याप्तकों में आये हुए जीवों का क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्ट से-एकेन्द्रियों में गये हुए लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य का आवली के असंख्यातवें भागमात्र पुद्गलपरिवर्तन परिभ्रमण कर पुन: लौटकर आये हुए जीव के सूत्र में कहा गया उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

यह अन्तर गति की अपेक्षा कहा गया है। शिष्यों को अन्तर की संभावना बतलाने के लिए यह सूत्र कहा गया है।

उभयत: अर्थात् जघन्य और उत्कृष्ट से अथवा नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है ऐसा कहा है। क्योंकि मार्गणा को छोड़े बिना लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के अन्य गुणस्थानों का ग्रहण नहीं हो सकता है।

तात्पर्य यह है कि मनुष्यपर्याय को प्राप्त करके जैसे भी हो, वेदक सम्यक्त्व का अन्तर नहीं हो, उसी प्रकार का प्रयत्न करना चाहिए। उसके पश्चात् क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त करके जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर क्षपक श्रेणी पर आरोहण करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप सम्पूर्ण सामग्री की पूर्णता करके सयोगि और अयोगिजिन परमात्मपदरूप परमानन्दमयी अवस्था को प्राप्त करके शाश्वत काल तक सिद्धशिला के ऊपर जाकर निज शुद्ध परमात्मस्वरूप में स्थित होना चाहिए।

इस प्रकार छठे स्थल में लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का अन्तर बतलाने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

यह मनुष्यगति अन्तराधिकार समाप्त हुआ।


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