४.देवगति अन्तराधिकार

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देवगति अन्तराधिकार

अथ देवगत्यन्तराधिकार:

अथ स्थलपंचकेन सप्तदशसूत्रै: देवगतिनामान्तराधिकार: कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले देवगतौ सामान्येन मिथ्यात्वासंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानवर्तिनो: अंतरप्रतिपादनत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले सासादन-मिश्रयोरन्तरप्ररूपणत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत: परं तृतीयस्थले भवनत्रिकादारभ्य द्वादशस्वर्गपर्यन्तानां मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्ट्यो: अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘भवणवासिय’’ इत्यादि पुनश्च, एष्वेव सासादनमिश्रयो: अन्तरकथनत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले आनतादिनवग्रैवेयकेषु चतुर्गुणस्थानवर्तिनां देवानामन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘आणद जाव’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनंतरं पंचमस्थले अनुदिशादिसर्वार्थसिद्ध्यन्तं देवानामन्तरकथनत्वेन ‘‘अणुदिसादि’’ इत्यादिसूत्रद्वयमिति समुदायपातनिका।
अधुना देवगतौ मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्ट्यो: नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-देवगदीए देवगदीए मिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।८४।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।८५।।
उक्कस्सेण एक्कत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।८६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवगतौ सामान्यतया नानाजीवानां मिथ्यादृष्टीनां असंयतसमयग्दृष्टीनां च नास्त्यन्तरं। एकजीवापेक्षया गुणस्थानान्तरं अपेक्ष्य जघन्येन अन्तर्मुहूर्तमन्तरं। उत्कर्षेण-देशोनं एकत्रिंशत्सागरप्रमाणं। तदेवोच्यते-एक: द्रव्यलिंगी दिगम्बरमुद्राधारी मुनि: मोहनीयकर्माष्टाविंशतिप्रकृति-सत्तायुत: उपरिमग्रैवेयकेषु क्वचिदुत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। एकत्रिंशत्सागरप्रमाणं सम्यक्त्वेनान्तरं प्राप्यावसाने मिथ्यात्वं गत:। लब्धमन्तरं (४)। च्युत: मनुष्यो जात:। एवं चतुर्भिरन्तर्मुहूर्तै: न्यूनमेकत्रिंशत्सागरप्रमाणमुत्कृष्टान्तरं भवति।
पुनश्चासंयतसम्यग्दृष्टेरन्तरमुच्यते-एको द्रव्यलिंगी दिगम्बर: साधु: अष्टाविंशतिसत्ताक: उपरिमग्रैवेयकेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४) मिथ्यात्वं गत्वान्तरं प्राप्य एकत्रिंशत्सागरं स्थित्वा आयुर्बद्ध्वा सम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। लब्धमन्तरं (५)। एवं पंचान्तर्मुहूर्तै: ऊनमेकत्रिंशत्सागरप्रमाणं असंयतसम्यग्दृष्टेरूत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं प्रथमस्थले द्विगुणस्थानयो: देवयोरंतरप्रतिपादनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
सासादन-सम्यग्मिथ्यात्वयोर्देवयोरन्तरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।८७।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।८८।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, अंतो-मुहुत्तं।।८९।।
उक्कस्सेण एक्कत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।९०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्णां सूत्राणामर्थ: सुगम: वर्तते। उत्कर्षेण तु एको द्रव्यलिंगी मुनि: उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य सासादनं गत्वा तत्रैकसमयोऽस्ति मृतो देवो जात:। एकसमयं सासादनेन दृष्ट:। द्वितीयसमये मिथ्यादृष्टिर्भूत्वा एकत्रिंशत्सागरं व्यतीत्य आयुर्बद्ध्वा उपशमसम्यक्त्वं संप्राप्य सासादनं गत:। लब्धमन्तरं। सासादनगुणस्थानैकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मृत्वा मनुष्यो जात:। द्वाभ्यां समयाभ्यामूनमेक-त्रिंशत्सागरप्रमाणं सासादनोत्कृष्टान्तरं।
तथैव एको द्रव्यलिंगी मुनि: अष्टाविंशतिसत्त्वसहित: उपरिमग्रैवेयकेषु उत्पन्न: षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (४) मिथ्यात्वं गत्वा अंतरयित्वा एकत्रिंशत्सागरं गमयित्वा आयुर्बद्ध्वा सम्यग्मिथ्यात्वं गत: (५)। येन गुणस्थानेन आयुर्बद्धं तेनैव मृत्वा मनुष्यो जात: (६) एवं षडन्तर्मुहूर्तै: हीनमेकत्रिंशत्सागरप्रमाणं सम्यग्मिथ्यात्वोत्कृष्टान्तरम्।
एवं द्वितीयस्थले द्विगुणस्थानयोरन्तरकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।

अथ देवगति अन्तराधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में सत्रह सूत्रों के द्वारा देवगति नाम का अन्तराधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में देवगति में सामान्य से मिथ्यात्व और असंयतसम्यग्दृष्टि इन दो गुणस्थानों के देवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु ‘‘देवगदीए....’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। उसके बाद द्वितीय स्थल में सासादन और मिश्रगुणस्थानवर्ती देवों का अन्तर प्ररूपण करने वाले ‘‘सासण......’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में भवनत्रिक से आरंभ करके बारहवें स्वर्ग तक के मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘भवणवासिय.....’’ इत्यादि पुन: इन्हीं में ही सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती देवों का अन्तरकाल बतलाने हेतु ‘‘सासण.......’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में आनत स्वर्ग से लेकर नवग्रैवेयक विमानों तक के चारों गुणस्थानवर्ती देवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘आणद जाव......’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तदनंतर पाँचवें स्थल में नव अनुदिश विमानों से लेकर सर्वार्थसिद्धि नामक अंतिम अनुत्तर विमान तक के अहमिन्द्र देवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘अणुदिसादि......’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब देवगति में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देवों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।८४।

उक्त मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।८५।।

उक्त मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागरोपम कालप्रमाण है।।८६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवगति में सामान्यरूप से मिथ्यादृष्टि नाना जीव और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अंतर नहीं पाया जाता है। एक जीव की अपेक्षा गुणस्थान के अंतर को अपेक्षित करके जघन्य से अंतर्मुहूर्त काल का अंतर है। उत्कृष्ट से-कुछ कम इकतीस सागर प्रमाण अंतर है। उसी को बताते हैं-

मोहनीय कर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों के सत्व वाला एक द्रव्यलिंगी दिगम्बर मुद्राधारी मुनि उपरिम ग्रैवेयकों में कहीं उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) पुन: वहाँ विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। इकतीस सागरोपमकाल सम्यक्त्व के साथ बिताकर आयु के अंत में मिथ्यात्व को प्राप्त हो गया। इस प्रकार से अंतर लब्ध हुआ (४) पश्चात् वहां से च्युत होकर मनुष्य हुआ। इस प्रकार चार अन्तर्मुहूर्तों से कम इकतीस सागरोपमकाल मिथ्यादृष्टि देव का उत्कृष्ट अंतर होता है।

अब असंयतसम्यग्दृष्टि देव का अंतर कहते हैंं — मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों के सत्व वाला कोई एक द्रव्यलिंगी दिगम्बर मुनि उपरिम ग्रैवेयकों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (४) पश्चात् मिथ्यात्व में जाकर अंतर को प्राप्त हो इकतीस सागरोपम रहकर और आयु को बांधकर, पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त कर लिया। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ (५)। ऐसे पाँच अंतर्मुहूर्तों से कम इकतीस सागरोपम काल असंयतसम्यग्दृष्टि देव का उत्कृष्ट अंतर होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में दो गुणस्थानों के देवों का अंतर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब सासादन और सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानवर्ती देवों का अंतर बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य अंतर एक समय है।।८७।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अंतर पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है।।८८।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर क्रमश: पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग और अंतर्मुहूर्त है।।८९।।

उक्त दोनों गुणस्थानवर्ती देवों का उत्कृष्ट अंतर कुछ कम इकतीस सागरोपम काल है।।९०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन चारों सूत्रों का अर्थ सरल है। यहाँ उत्कृष्टरूप से कथन करते हैं- एक द्रव्यलिंगी मुनि उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हो करके और सासादनगुणस्थान में जाकर उसमें एक समय अवशेष रहने पर मरा और देव हो गया। वह देव पर्याय में एक समय सासादन गुणस्थान के साथ दृष्ट हुआ-देखा गया और दूसरे समय में मिथ्यात्वगुणस्थान में जाकर अंतर को प्राप्त हो इकतीस सागरोपमकाल बिताकर, आयु को बाँधकर उपशम सम्यक्त्व को प्राप्त हो गया। पुन: सासादन गुणस्थान में चला गया। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ। तब सासादन गुणस्थान के साथ एक समय रहकर द्वितीय समय में मरा और मनुष्य हो गया। इस प्रकार दो समयों से कम इकतीस सागरोपमकाल सासादन सम्यग्दृष्टि देव का उत्कृष्ट अंतर होता है।

इसी प्रकार से मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों के सत्ववाला कोई एक द्रव्यलिंगी साधु उपरिम ग्रैवेयकों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१)। विश्राम लेकर (२)। विशुद्ध होकर (३)। सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होकर (४)। पश्चात् मिथ्यात्व में जाकर अंतर को प्राप्त हो इकतीस सागरोपम काल बिताकर आगामी भव की आयु को बाँधकर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (५)। उसके बाद जिस गुणस्थान से आयु को बाँधा था उसी गुणस्थान से मरा और मनुष्य हो गया (६)। इस प्रकार छह अंतर्मुहूर्तों से कम इकतीस सागरोपमकाल सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव का उत्कृष्ट अंतर होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में दो गुणस्थानों का अंतर कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अधुना भवनत्रिक-सौधर्मादिसहस्रारकल्पपर्यंतानां देवानां जघन्योत्कृष्टान्तरप्ररूपणाय सूत्रचतुष्टय-मवतार्यते

अधुना भवनत्रिक-सौधर्मादिसहस्रारकल्पपर्यंतानां देवानां जघन्योत्कृष्टान्तरप्ररूपणाय सूत्रचतुष्टय-मवतार्यते-भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसिय-सोधम्मीसाणप्पहुडि जाव सदार-सहस्सारकप्पवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं णिरंतरं।।९१।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।९२।।
उक्कस्सेण सागरोवमं पलिदोवमं वे सत्त दस चोद्दस सोलस अट्ठारस सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।९३।।
सासणसम्मादिट्ठी-सम्मामिच्छादिट्ठीणं सत्थाणमोघं।।९४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भवनत्रिकाणां द्वादशस्वर्गानां च वर्तमानानां मिथ्यादृष्टीनां असंयतसम्यग्दृष्टीनां वा अन्यगुणस्थानं गत्वा अंतरं प्राप्य लघुकालेनागतानां जघन्यान्तरमन्तर्मुहूर्तमुच्यते एकजीवापेक्षया।
उत्कर्षेण-एक: तिर्यङ्मनुष्यो वा अर्पितदेवेषु स्व-स्वोत्कृष्टायु: स्थितिकेषु उत्पन्न:। पर्याप्त: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। अन्तरित: आत्मन: उत्कृष्टस्थितिमनुपाल्य अवसाने मिथ्यात्वं गत:। लब्धमन्तरं (४)। एवं चतुर्भिरन्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्वक-स्वकोत्कृष्टायु:स्थितिप्रमाणमुत्कृष्टान्तरं मिथ्यादृष्टेर्गुणस्थानस्य भवति।
एवमसंयतसम्यग्दृष्टेरपि ज्ञातव्यं। केवलं अत्र पंचभिरन्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्वोत्कृष्टस्थितिप्रमाणमन्तरं भवति।
तथैव सासादनदेवानां सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां च ओघवदन्तरं ज्ञातव्यं।
एवं तृतीयस्थले भवनादिदेवानां अन्तरकथनप्रकारेण सूत्रचतुष्टयं गतम्।
अधुना आनतादिनवग्रैवेयकविमानवासिनां चतुर्गुणस्थानवर्तिनां जघन्योत्कृष्टान्तरनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-आणत जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मा-दिट्टीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।९५।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।९६।।
उक्कस्सेण वीसं वावीसं तेवीसं चउवीसं पणवीसं छव्वीसं सत्तावीसं अट्ठावीसं ऊणत्तीसं तीसं एक्कत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।९७।।
सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणं सत्थाणमोघं।।९८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नानाजीवं प्रतीत्य अन्तराभावात्। एकजीवापेक्षया आनतादिचतु:स्वर्गेषु नवग्रैवेयकेषु अन्यगुणस्थानं आगतेनैव अन्तर्मुहूर्तप्रमाणमन्तरं मन्यते। उत्कर्षेण-द्रव्यलिंगी मुनि: अर्पितदेवेषु उत्पन्न:। तत्र पूर्ववच्चतुर्भिरन्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्व-स्वोत्कृष्टदेवस्थितिप्रमाणमन्तरमुत्कृष्टं मिथ्यादृष्टे: तस्य देवस्य ज्ञातव्यं।
एवमसंयतसम्यग्दृष्टेरपि द्रव्यलिंगिसाध्वपेक्षया तत्र पंचभिरन्तर्मुहूर्तै: हीनं स्व-स्वोत्कृष्टस्थिति-प्रमाणमुत्कृष्टान्तरं पूर्ववत् कथयितव्यं।
सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्ट्योरपि सामान्यदेववद् ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले नवस्थानगानां देवानामन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।

अब भवनत्रिक एवं सौधर्मस्वर्ग से लेकर सहस्रार कल्प तक के देवों का जघन्य और उत्कृष्ट अंतर प्ररूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भवनवासी, वानव्यन्तर, ज्योतिष्क और सौधर्म-ऐशान से लेकर शतार सहस्रार तक के कल्पवासी देवों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरन्तर है।।९१।।

उक्त देवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।९२।।

उक्त देवों का उत्कृष्ट अंतर क्रमश: सागरोपम, पल्योपम और कुछ अधिक दो, सात, दश, चौदह, सोलह और अट्ठारह सागरोपमप्रमाण है।।९३।।

उक्त स्वर्गों के सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों का अंतर अपने-अपने गुणस्थानों के समान है।।९४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भवनत्रिक और बारहवें सहस्रार स्वर्गों तक के रहने वाले तथा वर्तमान मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों के अन्य गुणस्थान में जाकर अंतर को प्राप्त होकर, पुन: लघुकाल से आये हुए देवों के अंतर्मुहूर्त प्रमाण जघन्य अंतरकाल पाया जाता है। यह अंतर एक जीव की अपेक्षा है।

अब उत्कृष्ट अंतर कहते हैं-कोई एक तिर्यंच अथवा मनुष्य अपने-अपने स्वर्ग की उत्कृष्ट आयु वाले विवक्षित देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१)। विश्राम लेकर (२)। विशुद्ध होकर (३)। वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हो अंतर को प्राप्त हुआ। पश्चात् अपनी उत्कृष्ट आयुस्थिति को बिताकर अंत में मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से अंतर प्राप्त हुआ (४)। इन चार अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी आयुस्थिति प्रमाण उन-उन स्वर्गों के मिथ्यादृष्टि देवों का उत्कृष्ट अंतर माना जाता है।

इसी प्रकार से असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का भी अंतर जानना चाहिए। विशेष बात केवल यह है कि उनके पाँच अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण अंतर होता है।

इसी प्रकार से सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का अंतर गुणस्थानों के समान जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में भवनवासी आदि देवों का अंतर कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब आनत स्वर्ग से लेकर नव ग्रैवेयक विमानवासी देवों में चारों गुणस्थानवर्ती देवों का जघन्य और उत्कृष्ट अंतर बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

आनतकल्प से लेकर नवग्रैवेयकविमानवासी देवों में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टियों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरन्तर है।।९५।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर अन्तर्मुहूर्त है।।९६।।

उक्त तेरह भवनों में रहने वाले देवों का उत्कृष्ट अंतर क्रमश: कुछ कम बीस, बाईस, तेईस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस सागरोपम कालप्रमाण होता है।।९७।।

उक्त आनतादि तेरह भवनवासी सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों का अंतर अपने-अपने गुणस्थान के समान है।।९८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीवों की अपेक्षा करके उपर्युक्त सभी देवों में अंतर का अभाव है। एक जीव की अपेक्षा आनतादि चार स्वर्गों में, नवग्रैवेयकों में देवों का अन्य गुणस्थान में जाकर वापस आने वाले जीवों का अंतर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण पाया जाता है। अब उत्कृष्ट अंतर बताते हैं-

कोई एक द्रव्यलिंगी दिगम्बर मुनि विवक्षित देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ पूर्ववत् चार अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण उक्त मिथ्यादृष्टि देवों का उत्कृष्ट अंतर जानना चाहिए।

इसी प्रकार असंयतसम्यग्दृष्टि का भी द्रव्यलिंगी दिगम्बर साधु की अपेक्षा वहाँ पाँच अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थिति प्रमाण उत्कृष्ट अंतर पूर्ववत् कहना चाहिए।

सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवर्ती देवों का अंतर सामान्य देवों के समान जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में नव स्थानों को प्राप्त देवों का अंतर कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति अनुदिशादि-अहमिन्द्राणां अन्तरकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते

संप्रति अनुदिशादि-अहमिन्द्राणां अन्तरकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-अणुदिसादि जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवेसु असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च (णत्थि) अंतरं, णिरंतरं।।९९।।

एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिंरतरं।।१००।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अर्चि-अर्चिमालि-वैर-वैरोचन-सोम-सोमप्रभ-अंक-स्फटिक-आदित्या-ख्यनवानुदिशविमानेषु विजयवैजयन्तजयंतापराजितसर्वार्थसिद्धिविमानेषु च सर्वेऽपि देवा-अहमिन्द्रा: सम्यग्दृष्टय एव, तेषां गुणस्थानपरिवर्तनाभावात् नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया वा नास्त्यन्तरं निरंतरं ते तत्र स्वात्मोत्थसुखामृतपानतृप्ता: तत्त्वचिंतनतत्परा: सुखिनो भवन्ति। ततश्च्युत्वा एकभवेन द्वित्रिभवग्रहणेन वा मनुष्या: भूत्वा कर्माणि दग्ध्वा सिद्धिपदं लप्स्यन्ते।
एवं अवबुध्य सम्यग्दर्शनं स्थिरीकृत्य सम्यग्ज्ञानं आराधयद्भि: भवद्भि: सम्यक्चारित्रं अवलम्ब्य सर्वार्थसिद्धये प्रयत्नो विधेय:।
एवं पंचमस्थले नवानुदिशपंचानुत्तरविमानवासि-अहमिन्द्राणां अंतरकथनमुख्यत्वेन सूत्रे द्वे गते।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्त-चिंतामणिटीकायां मार्गणासु गतिमार्गणानामप्रथमोऽधिकार: समाप्त:।


अब अनुदिश आदि विमानों के अहमिन्द्रों का अंतर कथन करने के लिए दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अनुदिश को आदि लेकर सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों में असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरंतर है।।९९।।

उक्त देवों में एक जीव की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरन्तर है।।१००।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अर्चि-अर्चिमालिनी-वैर-वैरोचन-सोम-सोमप्रभ-अंक-स्फटिक-आदित्य नाम वाले नौ अनुदिश विमानों में तथा विजय-वैजयन्त-जयन्त-अपराजित और सर्वार्थसिद्धि नामक पाँच अनुत्तर विमानों में रहने वाले सभी अहमिन्द्र देव नियम से सम्यदृष्टि ही होते हैं, इसलिए गुणस्थान परिवर्तन का अभाव होने से नाना जीव अथवा एक जीव की अपेक्षा इनमें कोई अंतर नहीं पाया जाता है, वे सभी निरंतर रहकर वहाँ निज आत्मा से उत्पन्न सुखरूपी अमृत का पान करते हुए तृप्त रहते हैं तथा तत्त्वचिंतन में तत्पर रहकर परमसुखी रहते हैं। वहाँ से च्युत होकर वे सर्वार्थसिद्धि की अपेक्षा एक भव लेकर अथवा दो, तीन भव ग्रहण करके मनुष्य होकर कर्मों को नष्ट करके सिद्धपद को प्राप्त करेंगे।

इस प्रकार जानकर हम सभी को अपने सम्यग्दर्शन को दृढ़ करके सम्यग्ज्ञान की आराधना करना चाहिए तथा सम्यक् चारित्र का अवलम्बन लेकर सर्वार्थसिद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

इस प्रकार पंचम स्थल में नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तर विमानवासी अहमिन्द्रों का अंतर कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खंडागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ में अन्तरानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी कृत सिद्धान्तचिन्तामणि टीका में मार्गणाओं में गतिमार्गणा नामका प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।

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