(०२) स्वयंवर मण्डप

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स्वयंवर मण्डप

     स्वयंवर मंडप में एक तरफ उच्चस्थान पर दोनों धनुष रखे हुए हैं और एक तरफ उच्चस्थान पर सात सौ कन्याओं के मध्य सीता सुन्दरी बैठी हुई है। उसके चारों तरफ शूरवीर योद्धा हाथ में तलवार आदि लेकर सुरक्षा में सन्नद्ध हैं। हजारों राजपुत्र सीता को प्राप्त करने की इच्छा से वहाँ आये हुए हैं। एक-एक करके क्रम से उस धनुष को चढ़ाने के लिए वहाँ पहुँचते हैं, किन्तु वह धनुष अग्नि के स्पुâलिंगे छोड़ रहा है और उसके चारों तरफ भयंकर सर्प फुंकार रहे हैं। राजपुत्र निकट जाकर उसके तेज से परास्त होकर लौट पड़ते हैं। कोई-कोई तो वहीं पर मूर्छित हो पृथ्वी पर लोटने लगते हैं। कोई अपने प्राणों की रक्षा हेतु भागने लगते हैं। श्रीरामचन्द्र गंभीर मुद्रा से बैठे हुए सभी की नाना चेष्टाओं को देख रहे हैं। अंत में श्री जनक महाराज की दृष्टि जब रामचन्द्र की ओर उठती है कि वे महापुरुष अपने स्थान से उठकर मन्थर गति से धनुष के पास आते हैं। अपने स्वामी को आते हुए देखकर जैसे भृत्य निस्तब्ध हो जाता है अथवा अपने गुरु के सामने जैसे शिष्य विनीत हो जाता है वैसे ही वह धनुष मूल स्वभाव में आ जाता है। उसके रक्षक हजारों देवता मानों स्वामी की प्रतीक्षा में स्थिर हो जाते हैं। लीलामात्र में श्रीरामचन्द्र उस धनुुष को उठाकर उसे चढ़ा देते हैं। श्रीरामचन्द्र की गर्जना और उस धनुष की टंकार से सारी दिशाएं क्षणभर के लिए बहरी हो जाती हैं। सभा में बैठे हुए लोग तो भंवर में पड़े हुए के समान घूमने लगते हैं। आकाश से ‘साधु-साधु , ठीक-ठीक’ इस प्रकार से देव और विद्याधरों के शब्द गूँज उठते हैं। देवों के द्वारा पुष्पों की वर्षा हो जाती है और व्यंतर लोग नृत्य करने लगते हैं। उसी क्षण सीता अपने हाथ में सुन्दर माला लेकर मंदगति से वहाँ आ जाती है और श्रीराम के गले में माला पहना कर उन्हीं के पास खड़ी हो जाती है। लज्जा से संकुचित हो रही सीता के साथ श्रीरामचन्द्र वहाँ से आकर अपनेआसन पर बैठ जाते हैं।अनंतर लक्ष्मण उठकर भाई की आज्ञा लेकर द्वितीय सागरावर्त धनुष के पास पहुँचकर उसे चढ़ा देते हैं। तब चन्द्रवर्धन विद्याधर अपनी अठारह कन्याओं को उनके समीप खड़ी कर देते हैं। मंगलवाद्य और नगाड़ों की ध्वनि के साथ सभा विसर्जित हो जाती है। उधर भरत के मन में विकल्प उठता है कि अहो! देखो, हम दोनों का एक कुल है, एक पिता हैं, पर इन दोनोंअग्रजों ने ऐसा आश्चर्य प्राप्त किया और पुण्य की मंदता से मैं ऐसा आश्चर्य प्राप्त नहीं कर सका अथवा व्यर्थ के इस संताप से क्या? इस असार संसार में सारभूत एक धर्म ही है। इत्यादि रूप से सोचते हुए भरत के मुख की कांति हीनता को देखकर माता वैâकयी ने पुत्र के मन की चेष्टा को जानकर तत्काल ही राजा दशरथ से कहा-‘‘स्वामिन् ! आप शीघ्र ही पुनः स्वयंवर विधि से राजा जनक के भाई कनक की पुत्री से भरत का पाणिग्रहण कर दीजिए।’’ लोक-व्यवहार में कुशल दशरथ ने शीघ्र ही अपने मित्र जनक को सूचित किया। द्वितीय दिवस पुनः स्वयंवर विधि से राजा कनक की पुत्री लोक-सुन्दरी ने भरत के गले में वरमाला डाल दी। अनंतर बड़े उत्सव के साथ इन तीनोंभाइयों की विधिवत विवाह विधि सम्पन्न हुई। पिता जनक चन्द्रवर्धन और कनक ने अपनी पुत्रियों को यथायोग्य शिक्षा देकर हर्ष और विषाद से मुक्त होेते हुए सबका अयोध्या के लिए प्रस्थान करा दिया और विद्याधर लोग भी राम, लक्ष्मण के गुणों में आकृष्ट होते हुए रथनूपुर चले गये। कुछ दिन व्यतीत होने के बाद पुनः भामण्डल ने सभी बड़े जनों के समक्ष अपने मित्र से कहा
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    ‘‘मित्र! आप बड़े दीर्घसूत्री हैं। उस सीता की आशा में डूबते हुए मेरा कितना समय निकल गया है, मुझे सहारा क्यों नहीं दिया जा रहा है?’’ इस प्रकार के भामंडल के वचनों को सुनकर एक बृहत्केतु नामक विद्याधर बोल उठा
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    ‘‘अब तक इस सीता संबंधी बात को क्यों छिपाया जा रहा है? सारा वृतान्त प्रकट कर देना चाहिए कि जिससे कुमार इस विषय में निराश हो जावें।’’ तब सभी ने चन्द्रगति विद्याधर नरेश को आगे करके लड़खड़ाते हुए अक्षरों में सारी विगत घटना सुना दी और बोले
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    ‘‘कुमार! उन दोनों देवोपनीत धनुषों के चले जाने से अब तो हम लोग बिल्कुल सारहीन निःसार हो गये हैं। इस समय राम-लक्ष्मण के पुण्य की कल्पना कर सकना भी हम लोगों की शक्ति से परे है।’’ इन सारी बातों को सुनकर भामंडल आवेश में उठ खड़ा होता है और बोलता है
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    ‘‘ठीक है, अब मैें स्वयं राम की शक्ति का परीक्षण करने जा रहा हूूँ।’’ विमान में बैठ कर बहुत से सामंत और सेना को साथ लेकर भामंडल आकाश मार्ग से आर्यखण्ड की ओर जा रहा है। कुछ दूर पहुँच कर आकाश मार्ग से ही उसने पृथ्वीतल पर विदग्ध नाम का एक देश देखा। मन में सोचने लगा ‘यह नगर मैंने पूर्व में भी देखा है’ इतना सोचते ही उसे जातिस्मरण हो गया और वह वहीं मूच्र्छित हो गया। इस स्थिति में सभी विद्याधर उसे तत्क्षण ही पिता के पास वापस ले आये। अनेक शीतोपचार से सचे त होने पर अत्यधिक लज्जा से नम्रित हो मुख नीचा कर विलाप करने लगा। तब चन्द्रगति पुत्र को अपनी गोद में लेकर मस्तक पर हाथ पेâरते हुए बोले
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    ‘‘बेटा! तुम इतने विक्षिप्त क्योें हो रहे हो?’’ भामंडल ने कहा-‘‘हे पिताजी! मैं पूर्व जन्म में विदग्धपुर का राजा कुलमंडित था। मैंने किसी समय पिंगल नाम के ब्राह्मण की पत्नी का अपहरण कर लिया था। अनंतर पाप से डरकर एक बार दिगंबर मुनि के समीप अणुव्रत आदि ग्रहण कर लिये। उसके प्रभाव से मरणकर जनक की रानी विदेहा के गर्भ में आ गया, उसी समय उस ब्राह्मणी का जीव भी मरकर विदेहा के गर्भ में आ गया। उधर वह पिंगल आर्तध्यान से तपस्या के द्वारा मरकर महाकाल नाम का असुर हो गया। वही द्वेष वश मुझे जन्मते ही हरण कर ले गया, किन्तु कुछ दया रूप परिणाम के होने से उसने मेरे कानों में कुण्डल पहनाकर और पर्णलघ्वी विद्या के बल से मुझे आकाश से छोड़ दिया। मध्य में ही गिरते हुए अपने उद्यान में स्थित आपने मुझे झेल लिया और माता पुष्पवती ने बड़े ही प्यार से मेरा लालन-पालन किया है। ओह.........वह सीता मेरी सगी बहन है। नारद ने मुझे चित्रपट दिखाया और उस सीता में आसक्त हो उसे पाने के लिए मैं बेचैन हो उठा। धिक्कार हो इस अज्ञान को.....।’’ कुमार भामंडल के मुख से सारी विस्तृत भवावली सुनकर राजा चन्द्रगति उसी क्षण संसार से विरक्त हो गये। वेभामंडल का राज्याभिषेक करके अयोध्या के उद्यान में स्थित ‘सर्वभूतहित’ मुनिराज के निकट पंहुच गये और मुनिराज से दीक्षा की याचना की। मुनिराज ने भी सभी के विस्तृत भव-भवांतर सुनाये। उस समय रात्रि में ही बंदीजन जोर- जोर से शब्द करने लगे कि
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    ‘‘राजा जनक का लक्ष्मीशाली पुत्र भामंडल जयवंत हो रहा है।’’ इस उच्चध्वनि को सुनते ही अयोध्या के महल में सोई हुई सीता जाग उठी और विलाप करने लगी-‘‘हाय! जन्मकाल में ही मेरे भाई का अपहरण हुआ था, वह कहाँ है?’’ रामचन्द्र ने सीता को सान्त्वना देते हुए कहा
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    ‘‘हे वैदेहि! शोक छोडो, हो सकता है तुम्हारा भाई आज तुम्हें मिल जाये।’’ पुनः सब लो ग महा-वैभव के साथ प्रभात के हो ने के पहले ही महेन्द्रो दय उद्यान में पहुँच गये। गुरु की वंदना कर यथास्थान बैठ गये। प्रभात होते चन्द्रगति विद्याधर का दीक्षा महोत्सव देखा। पुनः मुनि के द्वारा परिचय को प्राप्त भामण्डल से मिलकर सीता भाई से चिपट कर बहुत ही रोती रही। दशरथ ने तत्क्षण ही मिथिला नगरी आदमी भेजा जो कि विद्या के विमान से जनक को परिवार सहित ले आये। जन्म देने के बाद प्रथम बार पुत्र का मुख देखकर रानी विदेहा पहले तो मूर्छा को प्राप्त हो गई पुनः सचेत हो पुत्र को प्राप्त कर एक अद्भुत ही आनन्द को प्राप्त किया। एक मही ने तक सब लोग अयोध्या में ठहरे। अनन्तर भामण्डल पिता के साथ मिथिला पंहुचे, वहाँ का राज्य अपने चाचा कनक को देकर अपने माता-पिता को साथ ले कर रथनूपुर आ गये।