(११) हनुमान की लंका यात्रा

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हनुमान की लंका यात्रा

      हनुमान विमान में बैठे हुए बहुत ऊँचे आकाश में उड़ते चले जा रहे हैं। प्राकृतिक शोभा को देखते हुए दधिमुख नगर के ऊपर से निकलते हैं। उस नगर के बाहर चारों तरफ के उद्यान की शोभा हनुमान के मन को बरबस अपनी ओर खींच रही है। धीरे-धीरे विमान आगे बढ़ता जा रहा है, कुछ दूर चलकर भंयकर वन दिखता है। वहाँ पर तमाम जंगली पशु विचरण कर रहे हैं, आगे बढ़ते ही देखते हैं कि उस वन में भयंकर अग्नि की ज्वाला अपनी लपटों से मानों आकाश को छूने का ही उपक्रम कर रही है। एकदम घबराते हुए हनुमान तत्क्षण ही दूसरी तरफ दृष्टि डालते हैं तो क्या देखते हैं -

      दो महामुनि अपनी भुजाओं को नीचे लटकाये हुए नासाग्र दृष्टि सौम्यमुद्रा से युक्त कायोत्सर्ग से खड़े हुए हैं। उनसे कुछ दूर ही वह अग्नि मानों उनके दर्शन की अभिलाषा से ही अथवा उनके ध्यान का परीक्षण करने के लिए उधर की ओर बढ़ती आ रही है। वहीं से लगभग पांच कोश की दूरी पर तीन कन्यायें ध्यान मुद्रा में स्थित हैं। वे शुक्ल वस्त्र को धारण किए हुए हैं उनका मनोहर रूप उनके विशेष पुण्य को सूचित कर रहा है।

      हनुमान के हृदय में उन महामुनियों के प्रति परम भक्ति-भाव उमड़ पड़ता है और साथ ही वात्सल्य भाव से प्रेरित हो सोचने लगते हैं -

      ‘‘अहो! सुख-दुख में समभावी ये महामुनि कुछ क्षण में ही इस अग्नि के उपसर्ग से इस नश्वर शरीर को छोड़ने को प्रयत्नशील हैं। इनके लिए जीवन और मरण एक समान है फिर भी मेरा क्या कर्तव्य है?......क्या मैं इनके उपसर्ग को दूर करके सातिशय पुण्य का भागी बन सकता हूँ? और ये कन्यायें कौन हैं?....जो भी हो’।

      इतना सोचते ही हनुमान शीघ्रता से ही समुद्र का जल खींच कर उसे मेघरूप में परिणत कर लेते हैं और उन मेघों को हाथ में लेकर आकाश में ऊँचे जाकर वर्षा शुरू कर देते हैं। देखते ही देखते दावानल अग्नि शांत हो जाती है और हनुमान कृतकृत्य हुए के समान नीचे आकर गुरु के चरणों में नमस्कार कर पुष्प, अक्षत आदि सामग्री से उनके चरणों की पूजा करना शुरू कर देते हैं।

      इसी बीच वे कन्यायें मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देकर वहीं पर आ जाती हैं और गुरु की वंदना करके बैठ जाती हैं पुनः हनुमान से कहती हैं -

      ‘अहोबन्धु! आप जिन शासन के परमभक्त हैं। आज आपने अन्यत्र कहीं जाते हुए जो इन महामुनियों के उपसर्ग का निवारण किया है सो आपका यह धर्मी के प्रति वात्सल्य आपके अपूर्व माहात्म्य को प्रकट कर रहा है।’

      तब हनुमान पूछते हैं -

      ‘‘इस भयंकर निर्जन वन में आप लोग कौन हैं? और यह दावानल कब एवं वैâसे प्रज्ज्वलित हुआ था?’’

      ज्येष्ठ कन्या कहती है -

      ‘भद्र! दधिमुख नगर के राजा गंधर्व की अमरा नाम की रानी से उत्पन्न हुई हम तीनों बहने हैं। मैं चन्द्रलेखा हूँ मेरी यह दूसरी बहन विद्युत्प्रभा है एवं यह तीसरी तरंगमाला है। एक बार अष्टांग निमित्त ज्ञाता महामुनि से हमें यह मालूम हुआ कि जो महापुरुष युद्ध में विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी के अधिपति साहसगति विद्याधर को मारेगा वही इन तीनों का भर्ता होगा। कितने ही विद्याधर हम तीनों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं उनमें से एक अंगारक नाम का विद्याधर है वह विशेष रूप से संताप को प्राप्त हो रहा था।

      साहसगति को मारने वाला कौन होगा? इस बात को समझने की उत्कंठा से हम तीनों ‘मनोनुगामिनी’ नामक उत्तम-विद्या सिद्ध करने के लिए यहाँ आई थीं। दुष्ट अंगारक ने यह अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी और भाग गया। आज हमें यहाँ बारहवाँ दिन है। जो विद्या छः महीने से भी अधिक दिनों में सिद्ध होने वाली थी वह आज आपके निमित्त से हमें सिद्ध हो गई है और आज इन मुनियों को यहाँ पर आकर ध्यानस्थ हुए आठ दिन हुए हैंं। यदि आप उपसर्ग निवारण न करते तो मेरे निमित्त से ये महामुनि भी अग्नि में भस्मसात् हो जाते।

      ‘हे भ्रातः! आपने आज हम तीनों पर व जैन शासन पर महान् उपकार किया है।’

      इन बातों के मध्य ही विद्याधर राजा गंधर्व भी अपनी रानी आदि सहित वहाँ आ जाते हैं। पुनः हनुमान साहसगति को मारने वाले रामचन्द्र की सारी घटना उन सबको सुना देते हैं। सुनते ही राजा गन्धर्व व कन्याओं के हर्ष का पार नहीं रहा। हनुमान के कहे अनुसार वे सब किष्किंधपुर पहुँचते हैं। राम के साथ तीनों कन्याओं का पाणिग्रहण संस्कार हो जाता है। राजा गंधर्व राम की आज्ञा में रहते हुए अपने को पुण्यशाली मानते हैं किन्तु रामचन्द्र सीता के बिना दशों दिशाओं को शून्य सा ही अनुभव करते हैंं।

      इधर हनुमान वहाँ से चलकर त्रिकूटाचल के सन्मुख पहुँचते हैं। सेना की गति अकस्मात् रुकती हुई देखकर पता लगाते हैं। मायामयी कोट की रचना समझकर अपनी सेना को आकाश में ही रोककर गदा को हाथ में लेकर मायामयी पुतली के मुख में घुस जाते हैं और उसे तीक्ष्ण नखों के द्वारा चीर डालते हैं। उस समय आशालिक विद्या चट-चट शब्द करते हुए पलायमान हो जाती है।

      यन्त्रमय कोट को नष्ट होता हुआ देख, उसके रक्षक राजा वज्रमुख सेना सहित आ जाते हैं। भयंकर युद्ध के मध्य श्रीशैल उस वज्रमुख का शिर काटकर नीचे गिरा देते हैं। पिता की मृत्यु से कुपित हुई लंकासुन्दरी हनुमान के साथ घमासान युद्ध करती है। बहुत कुछ समय के बाद युद्ध करते-करते श्रीशैल के मन में उस कन्या के प्रति अनुरागभाव जाग्रत हो जाता है। उसी क्षण वह कन्या भी श्रीशैल के प्रति मुग्ध हो जाती है। तब वह अपने नाम से अंकित एक बाण छोड़ती है। गोद में आये हुए बाण को हाथ में लेकर उसके पत्र को श्रीशैल बाँचते हैं -

      ‘हे नाथ! जो मैं अगणित देवों के द्वारा भी जीती नहीं जा सकती थी सो मैं, इस समय आपके मोहनीय काम बाणों से पराजित हो चुकी हूँ।

      इतना पढ़ते ही श्रीशैल अपने रथ से उतरकर आगे बढ़ते हैं और शीध्र ही उस लंकासुन्दरी को अपने हृदय से लगाकर गाढ़ आलिंगन कर लेते हैं। कुछ एक क्षण लंकासुन्दरी श्रीशैल के स्पर्शजन्य सुख का अनुभव करती है। पुनः उसके नेत्रों से अविरल अश्रु की धारा बह चलती है। पिता की मृत्यु से वह शोक से विह्वल हो जाती है। तब हनुमान समझाते हैं -

      ‘हे सौम्यमुखि! शोक छोड़ो, अपने अश्रुओं को रोको। सनातन क्षत्रिय धर्म की यही रीति है कि राज्य कार्य में अपना सर्वस्व समर्पित कर देना। तुम्हारे पिता भी वीरगति को प्राप्त हुए हैं। हे प्रिय! यह आर्तध्यान समाप्त करो। युद्ध में किसी के द्वारा किसी का मरण यह तो एक निमित्त मात्र है। वास्तव में जिसकी जैसी होनहार होती है वह होकर ही रहती है।’

      अनेक सम्बोधन को प्राप्त कर लंकासुन्दरी शांत हो जाती है। उनकी आज्ञा से आकाश में ही सुन्दर नगर बन जाता है। कुछ समय विश्राम कर हनुमान वहाँ से चलने को उद्यत होते हैं तब लंका सुन्दरी कहती है-

      ‘नाथ! अब रावण का आपके प्रति पहले जैसा सौहार्द नहीं है अतः आप सावधान होकर जाइये।’

      हनुमान कहते हैं -

      ‘‘हे सुमुखि! तुम धैर्य को धारण करो मैं यथायोग्य ही सब कार्य करूँगा।

      हनुमान सीता के दर्शन की उत्सुकता को मन में लिए हुए लंका में प्रवेश करते हैं। पहले वे विभीषण के महल में प्रवेश करते हैं। कुशल समाचार के अनन्तर सीता संबंधी चर्चा चलती है। हनुमान कहते हैं -

      ‘अहो! जैसे पर्वत नदियों का मूल है वैसे ही राजा भी सभी मर्यादाओं का मूल है यदि राजा स्वयं अनाचार में प्रवृत्त हो तो प्रजा क्या करेगी?’

      विभीषण ने कहा -

      ‘बन्धुवर! मैंने तो बहुत कुछ समझा लिया है। क्या करूँ समझ में कुछ नहीं आता है। आज सीता को आहार छोड़े हुए ग्यारहवां दिन है फिर भी लंकाधिपति को विरति नहीं है। ओह!......’

      विभीषण की बात सुनते ही दया से आद्र्र हो हनुमान प्रमदवन में पहुँचते हैं। नन्दन वन के सदृश उद्यान की शोभा देखते ही बनती है किन्तु हनुमान उस समय पूâलों की सुगंधि और मयूरों की नृत्यकला की तरफ दृष्टिपात न करते हुए सीधे वहाँ पहुँचते हैं कि जहाँ रामदेव की सुन्दरी सीता कृश शरीर हुई अपने कपोलों पर हाथ रखकर चिंतित मुद्रा में बैठी हैं। विचार करते हैं -

      ‘‘ओहो! ऐसा रूप क्या देव अप्सरा में संभव है?...त्रिखंडाधिपति रावण इस रूप सौंदर्य से ही शायद पागल हो रहा है। फिर भी उसे यह तो सोचना ही था कि परस्त्री अग्नि की कणिका के समान है। अहो!......इस समय यह दुःख रूपी सागर में निमग्न है।’

      ऐसा सोचते हुए हनुमान सीता की गोद के वस्त्र पर श्री रामचन्द्र की अँगूठी छोड़ देते हैं। उस मुद्रिका को देखकर सीता सहसा मुस्करा उठती है और उसके सारे शरीर में रोमांच हो जाता है।

      सीता को प्रसन्नमना देखकर वहाँ पर खड़ी हुई विद्याधरियाँ रावण तक समाचार पहुँचा देती हैं। मन्दोदरी आकर बोलती हैं -

      ‘‘हे बाले! आज तूने हम सभी पर बहुत बड़ा अनुग्रह किया है। अब तू शोक रहित हो त्रिखंडाधिपति चक्रवर्ती रावण की सेवा करके अपने यौवन को सार्थक कर।’’

      तब सीता कुपित होकर कहती है -

      ‘‘हे विद्याधरि! आज तो मेरे पतिदेव का समाचार मुझे प्राप्त हुआ है इसलिए मैं तुझे प्रसन्न दिख रही हूँ ......। जान पड़ता है कि अब तेरी माँग का सिन्दूर जल्दी ही धुलने वाला है।’’

      इतना सुनते ही सब विद्याधरियाँ एक साथ कोलाहल करके बोलती हैं -

      ‘‘अरे दुष्टे! ऐसा लगता है कि क्षुधा से पीड़ित हो तुझे वायु रोग हो गया है कि जिससे तू बक रही है।’’

      उस समय सीता कहती है -

      ‘‘आज इस समय इस समुद्र के मध्य महान संकट में कष्ट को प्राप्त हुई ऐसी मैं, सो मेरा कौन स्नेही उत्तम बंधु यहाँ आया है?’’

      उस समय हनुमान तत्क्षण ही सीता के निकट पहुँचकर अंजलि जोड़कर नमस्कार करते हुए कहते हैं -

      ‘‘हे मातः! मैं श्री रामचन्द्र के द्वारा भेजा गया पवनंजय का पुत्र हनुमान हूँ। हे पतिव्रते! तुम्हारे विरह रूपी सागर में डूबे हुए राम स्वर्ग के सदृश वैभव से युक्त महल में भी रति को प्राप्त नहीं हो रहे हैं.....।’’

      इत्यादि वचनों को सुन सीता परमप्रमोद को प्राप्त होती है। पुनः विषाद से खिन्नमना हो बोलती है -

      ‘‘हे भाई! इस दुःखावस्था में निमग्न आज इस समय मैं तुझे क्या दूँ? तूने मेरा जो आज उपकार किया है....उसके प्रतिफल में मैं....।’’

      इसी बीच में हनुमान कहते हैं -

      ‘‘मातः! आपके दर्शनों को प्राप्त कर मैं सब कुछ प्राप्त कर चुका हूँ।’’

      पुनः सीता पूछती है -

      ‘‘हे भद्र! तुम यहाँ वैâसे आये हो? क्या सच में यह अँगूठी तुम्हें मेरे स्वामी ने दी है अथवा कहीं उनकी अँगुली से गिर कर तुम्हें मिल गई है। हे भाई! सच-सच कहो?’’

      इतना सुनकर हनुमान लक्ष्मण के सूर्यहास खड्ग की प्राप्ति से लेकर तब तक के हुए सारे समाचारों को सुना देता है। सीता पतिदेव के सर्व समाचारों को जानकर विश्वास को प्राप्त होती हुई एक क्षण के लिए हर्ष भाव को धारण करती है। पुनः तत्क्षण ही अश्रु से नेत्रों को पूरित कर करुण विलाप करने लगती है।

      हनुमान उसे तरह-तरह से सान्त्वना देते हैं पुनः निवेदन करते हैं -

      ‘‘हे मातः! चूँकि शरीर को धारण करने से ही आप पुनः रामचन्द्र के दर्शन प्राप्त कर सकोगी और अपने प्राणों की रक्षा के साथ-साथ ही उनके प्राणों की रक्षा कर सकोगी।अतः मेरी प्रार्थना स्वीकार करके और अपने पतिदेव कीआज्ञा को शिरोधार्य करते हुए अब आप भोजन ग्रहण करो। हे देवि! यह समुद्र सहित पृथ्वी रामदेव के शासन में हैअतः यहाँ का अन्न छोड़ने के योग्य नहीं है....।’’

      इत्यादि अनुनय विनय के पश्चात् सीता आहार ग्रहण के लिए स्वीकृति दे देती है। तब हनुमान ‘इरा’ नाम की कुलपालिक को आहार वस्तु लाने के लिए आदेश देते हैं। सीता स्नानादि क्रिया से निवृत्त हो अतिथियों के समागम का चिंतवन करते हुए महामंत्र का स्मरण करती है। पुनः जो यह नियम लिया था कि -

      ‘जब तक पतिदेव का समाचार नहीं मिलेगा, तब तक आहार नहीं लूँगी।’ इस नियम को धीरता से समाप्त करती है।

      तब जिसके हृदय में भाई का स्नेह उमड़ रहा है ऐसे हनुमान स्वयं आगे होकर ‘इरा देवी’ के द्वारा लाये गये उत्तम-उत्तम पदार्थों से सीता को पारणा कराते हैं। अनन्तर भोजन के बाद सीता जब कुछ विश्राम कर लेती है तब हनुमान उनके पास पहुँच कर कहते हैं -

      ‘हे देवि! हे पवित्रे! हे गुणभूषणे! अब आप मेरे कंधे पर चढ़ो, मैं अभी समुद्र लांघकर तुम्हें श्री राम के दर्शन कराये देता हूँ।’

      तब सीता कहती है -

      ‘‘भाई! स्वामी की आज्ञा के बिना इस तरह जाना योग्य नहीं है इसलिए प्राणनाथ ही स्वयं यहाँ आकर मेरा उद्धार करेंगे।’’ पुनः कहती है -

      ‘‘हे भद्र! अब तू जल्दी कर और जब तक रावण के द्वारा तुझे कोई उपद्रव नहीं होता है तब तक ही तू शीघ्र जाकर मेरे स्वामी को मेरा समाचार विदित करा दे।’’

      पुनः अपने मस्तक का चूड़ामणि उतार कर हनुमान को देते हुए कहती है -

      ‘‘इस भूषण को दे करके तुम श्री रामचन्द्र को मेरे विषय में सब कुछ स्पष्ट कहना, भाई! तुम उन्हें यह भी कहना कि आपने जब दण्डक वन में चारण मुनियों कोआहार दिया था उस समय गृद्ध पक्षी ने मुनि के चरणोदक से अपने को एक विलक्षण ही बना लिया था......।’’

      इत्यादि अनेक स्मृतियों को सीता बताती है कि जिन्हें सुनकर रामचन्द्र को पूर्ण विश्वास हो जाये कि सीता अभी जीवित है और मेरे वियोग से दुःख समुद्र में डूब रही है।अनंतर हनुमान को विदा कर पति की मुद्रिका को अपनी अंगुली में पहनकर इतनी संतुष्ट होती है कि मानों साक्षात् आज पति का समागम ही प्राप्त हुआ है।

      हनुमान बार-बार सीता को प्रणाम कर वहाँ से चल देते हैं। पुष्पोद्यान से बाहर निकलते समय रावण की आज्ञा से कुछ किंकर दौड़कर उन्हें घेर लेते हैं। तमाम सेना इकट्ठी हो जाती है। शस्त्रों से सहित योद्धाओं को पराजित करते हुए हनुमान कुछ ही क्षणों में उस उद्यान का सर्वनाश कर देते हैं। बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ कर फेंक देते हैं और योद्धाओं को चूर-चूर कर देते हैं। अनन्तर चिरकाल तक युद्ध करने के बाद ‘इन्द्रजीत’ हनुमान को नागपाश में बाँध लेता है। उस समय यद्यपि हनुमान नागपाश से छूट कर भाग सकते थे किन्तु फिर भी रावण से वार्तालाप के लिए उत्सुक होते हुए वैसे ही बंधन से बंधे रावण के पास लाये जाते हैं। रावण कहता है -

      ‘‘अरे रे! दुष्ट! तुझे धिक्कार है। अरे! जिनसे तूने वृद्धि को प्राप्त किया था आज उन्हीं के साथ शत्रु भाव को प्राप्त होता हुआ तू मूढ़ भूमिगोचरियों का दूत बनकर यहाँ मेरे सामने आया है। अरे! मैं तो तेरा मुख भी नहीं देखना चाहता हूँ, तू निर्लज्ज है, कृतघ्नी है, पापी है......।’’

      हनुमान कहते हैं -

      ‘‘बहुत कहने से क्या, हे विद्याधराधिपते! अभी तो तुम सावधान होवो और पतिव्रता सीता को श्रीराम से मिलाओ, उनसे सौहार्दभाव स्थापित करके चिरकाल तक अपने चक्ररत्न का उपभोग करो।’’

      रावण कुपित हो कहता है -

      ‘‘बस, बस, रहने दे, अपनी विद्वत्ता को रहने दे, आज मुझे मालूम पड़ रहा है कि तू पवनंजय का पुत्र नहीं हैअन्यथा ऐसी चेष्टा नहीं करता।’’

      उस समय हनुमान भी क्रोध के आवेश में गरजकर कहते हैं -

      ‘‘रावण! निश्चित ही तेरी मृत्यु लक्ष्मण के हाथ से होने वाली है ऐसा दिख रहा है। अब तू अपनी कीर्ति पताका को नष्ट कर अपकीर्ति की ध्वजा को चिरकाल के लिए सारे विश्व के ऊपर फहराने को उद्यत हुआ है। जभी तो परस्त्री में लंपट बन रहा है।’’

      इत्यादि वार्तालापों के अनन्तर रावण कहता है -

      ‘‘मंत्रियों! तुम लोग इसे साँकल से बाँधकर धूलि से धूसरित कर घर-घर में घुमाओ और इसके आगे ढोल बजता जाये जोकि सबको सूचित करता जाये कि -

      देखो! देखो! आज यह भूमिगोचरियों का दूत बनकर यहाँ आया है और स्वामी की अवज्ञा से ऐसे अपमान को प्राप्त कराया गया है।’’

      इसी क्रोध से लाल हो हनुमान नागपाश के बंधन को ध्वस्त कर निकल पड़ते हैं। अपने पैरों के आघात से इन्द्रभवन के समान रावण के उस सुवर्णमयी कोट को चूर-चूर कर डालते हैं। पुनः प्रसन्न हुए आकाश मार्ग से चले जाते हैं। उधर सीता भी हनुमान के पराक्रम को सुनती हुई पुष्पांजलि बिखेरकर उनके गमन की मंगलकामना करती हुई कहती हैं -

      ‘‘हे पुत्र! तेरे समस्त ग्रह मंगलकारी हों, तू विघ्नों को नष्ट कर शीघ्र ही अपने मनोरथ सफल कर।’’

      ‘‘हनुमान कुछ ही समय में श्रीराम के पास पहुँचकर प्रणाम करते हैं-राम सहसा उठ कर उसका गाढ़ आलिंगन कर लेते हैं और प्रसन्न हो पुनः पुनः पूछते हैं -

      ‘हनुमान् ! क्या सच में तुमने मेरी प्रिया देखी है? क्या वह जीवित है?......क्या वह संकट में भी अपने प्राणों को धारण किए हुए है?.....’’

      हनुमान कहते हैं -

      ‘‘ हे प्रभो! यह चूड़ामणि उन्होंने दिया है, वे केवल आपका ही मात्र ध्यान कर रही हैं। रो-रो कर उन्होंने अपने नेत्र लाल कर लिए हैं। प्रभो! ग्यारहवें दिन आपका समाचार पाकर ही उन्होंने मेरी अतीव प्रार्थना से भोजन ग्रहण किया है।’’

      अनेक प्रकार से वार्तालाप के बाद रामचन्द्र सभी विद्याधरों के साथ मंत्रणा करके युद्ध के लिए प्रस्थान की तैयारी करने में लग जाते हैं।