(१२) राम रावण युद्ध प्रारम्भ व लक्ष्मण हुए मूर्च्छित

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राम रावण युद्ध प्रारम्भ

      मगसिर वदी पंचमी के दिन सूर्योदय के समय अनेक विद्याधरों के साथ महाराजा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र लक्ष्मण के साथ प्रयाणकालिक बाजे बजवाकर प्रस्थान कर देते हैं। उस काल में उत्तम-उत्तम शकुनों से उन सबका उत्साह द्विगुणित होता जा रहा है। निग्रंथ मुनिराज सामने आ रहे हैं, आकाश में छत्र फिर रहा है, घोड़ों की गंभीर हिनहिनाहट फैल रही है, घंटों की मधुर ध्वनि हो रही है एवं दही से भरा हुआ कलश सामने आ रहा है। विद्याधरों के प्रमुख राजा सुग्रीव, हनुमान, शल्य, दुर्मषण, नल, नील आदि अपनी-अपनी सेनाओं के साथ चल रहे हैं। निमिषमात्र में ये सब वेलन्धर पर्वत से आगे बढ़ते हुए हंसद्वीप में पहुँच जाते हैंऔर भामंडल की प्रतीक्षा करते हुए वहाँ ठहर जाते हैं। शत्रु की सेना को निकट आती हुई सुनकर अर्धचक्री रावण भी मंत्रणा करके युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहते हैं। उस समय विभीषण आकर कहते हैं -

      ‘‘हे प्रभो! आपकी कीर्ति कुन्द पुष्प के समान उज्जवल है। अतः हे परमेश्वर! परस्त्री के निमित्त इस कीर्ति को मलिन मत कीजिए। हे स्वामिन् ! श्रीराम यहाँ पधारे हैं सो आप उनका सम्मान कर सीता को उन्हें सौंप दीजिए।’’ पिता के अभिप्राय को जानने वाला इन्द्रजीत विभीषण को तर्जित कर कहता है -

      ‘‘हे भद्र! तुमसे किसने पूछा है? तुम्हें यहाँ इस समय बकवास करने का क्या अधिकार है? तुम कायर हो, चुपचाप अपने घर में बैठो।’’ बीच में ही बात काटकर विभीषण कहता है -

      ‘‘अरे बालक! तू रावण का नामधारी पुत्र है किन्तु वास्तव में शत्रु है। अरे मूढ़! जब तक लक्ष्मण आकर इस लंका नगरी को ध्वस्त नहीं करता है और रावण को धराशायी नहीं करता है तब तक तू पिता के लिए हितकर उपाय सोच....’’ इत्यादि वार्तालापों के प्रसंग में रावण क्रोध में लाल होकर उठकर ख़डा हो जाता है और म्यान से तलवार निकाल लेता है। इधर विभीषण भी वज्रमयी खंभा उखाड़कर सामने हो जाता है। युद्ध के लिए उद्यत देख मंत्रीगण शीघ्र ही इन दोनों भाइयों को रोक लेते हैं और जैसे-तैसे शांत करने की कोशिश करते हैं। पुनः आवेश में भरा हुआ रावण कहता है -

      ‘‘इस दुष्ट विभीषण को यहाँ से शीघ्र ही निकाल दिया जाये। मेरे नगर में इसके रहने से भला क्या लाभ है? यहाँ रहते हुए यदि इसको मैं मृत्यु को प्राप्त न कराऊँ तो मैं रावण ही नहीं कहलाऊँ।’’ तब विभीषण कहता है -

      ‘‘क्या मैं रत्नश्रवा का पुत्र नहीं हूँ? मैं भी इस नगरी मेंअब एक क्षण नहीं रहना चाहता हूँ। ओह!....जहाँ राजा ही परस्त्रीलंपट हो वहाँ रहना क्या उचित है?’’ इतना कहकर वे वहाँ से चल पड़ते हैं और हंसद्वीप में पहुँचकर अपनी कुछ अधिक तीस अक्षौहिणी प्रमाण सेना वहाँ ठहरा देते हैं और स्वयं रामचन्द्र के दर्शन हेतु पहुँचते हैं। रामचन्द्र के यहाँ जब यह समाचार पहुँचता है तब सभी लोग काँप उठते हैं। लक्ष्मण अपनी दृष्टि सूर्यहास खड्ग की ओर डालते हैं तो श्रीराम वज्रावर्त धनुष का स्पर्श करते हैं। इसी बीच विभीषण द्वारा भेजा हुआ द्वारपाल श्रीराम के पास पहुँचकर दोनों भाई के बीच हुए विवाद को स्पष्ट कर देता है पुनः निवेदन करता है -

      ‘‘हे नाथ! विभीषण आपकी शरण में आया है अतःआप उसे आश्रय दीजिए।’’ दूत के मधुर वाक्यों को सुनकर रामचन्द्र कुछ क्षण के लिए उसे अन्यत्र बिठाकर आप मंत्रियों व हनुमान आदि विश्वस्त जनों के साथ मंत्रणा करते हैं - मतिकांत मंत्री कहता है - ‘‘हो सकता है, रावण ने इसे छल से भेजा हो, क्योंकि राजाओं की कूटनीति विचित्र ही होती है।’’ तब मतिसागर मंत्री कहता है -

      ‘‘मैंने अनेक बार यह बात सुनी है कि विभीषण सदैव धर्म का ही पक्ष लेता है। अतः भाई-भाई में विरोध हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।’’ इत्यादि मंत्रणा के बाद रामचन्द्र विभीषण को अन्दर आने की आज्ञा दे देते हैं। विभीषण निकट आकर हाथ जोड़कर रामचन्द्र को प्रणाम करते हुए कहते हैं -

      ‘‘हे प्रभो! मेरा यही निश्चय है कि इस जन्म में मेरे स्वामी आप हैं और परजन्म में श्री जिनेन्द्रदेव।’’ जब विभीषण निश्छलता की शपथ ग्रहण कर लेते हैं तब रामचन्द्र कहते हैं -

      ‘‘हे विभीषण! मैं निःसंदेह तुम्हें लंका का अधिपति बनाऊँगा।’’ इन सब शुभ वातावरण के मध्य ही भामंडल भीअपनी विशाल सेना सहित वहाँ आ जाते हैं और सब मिलकर लंका के निकट पहुँच जाते हैं। वहाँ पर बीस योजन प्रमाण भूमि में युद्धस्थल निर्धारित किया जाता है। उधर से रावण भी युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। मारीचि, सिंहजवन, स्वयंभू आदि अनेक विद्याधर अधिपति चल पड़ते हैं। उस समय अपशकुन होने लगते हैं। पक्षी पंख फैलाकर फड़फड़ाने लगते हैं। महा भयंकर शब्द होने लगता है। अनेक अपशकुनों को देखकर मंदोदरी रावण को बहुत कुछ समझाती है किन्तु वह दुराग्रही अपने हठ को नहीं छोड़ता है। उस समय लंका नगरी से सब मिलकर साढ़े चार करोड़ कुमार युद्ध के लिए बाहर निकल पड़ते हैं। युद्ध प्रारंभ हो जाता है उधर इन्द्रजीत, मेघवाहन, कुम्भकर्ण, मय विद्याधर आदि प्रमुख हैं तो इधर सुग्रीव, हनुमान, भामंडल, विभीषण आदि प्रमुख हैं। इन लोगों में दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार चल रहे हैं। इन्द्रजीत वरुण अस्त्र छोड़कर सर्वदिशाओं को मेघ समूह से व्याप्त कर देता है तो सुग्रीव पवन बाण चलाकर मेघ को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। मेघवाहन आग्नेयबाण से अग्नि प्रज्जवलित करता है तो हनुमान वरुण अस्त्र से उसे बुझा देते हैं। कई दिनों तक भयंकर युद्ध के चलने से असंख्य प्राणियों का संहार हो जाता है। इसी मध्य विभीषण देखते हैं कि मेघवाहन और इन्द्रजीत ने सुग्रीव और भामंडल को नागपाश से वेष्टित कर लिया है। वे निश्चेष्ट पड़े हैं। उस समय की दयनीय दशा को देखकर लक्ष्मण श्रीराम से कहते हैं -

      ‘‘हे नाथ! हे विद्याधरों के स्वामी! सुग्रीव और भामंडल जैसे महाशक्तिशाली विद्याधर भी रावण के पुत्रों द्वारा जहाँ नागपाश से बाँध लिए गये हैं तब हमारे और आपके द्वारा क्या रावण जीता जा सकता है?’’ इतना सुनते ही राम कुछ स्मरण करते हुए कहते हैं -

      ‘‘भाई! उस समय देशभूषण-कुलभूषण मुनियों का उपसर्ग दूर करने पर हम लोगों को जो वर प्राप्त हुआ था उसका स्मरण करो......।’’ उसी समय राम के स्मरण मात्र से महालोचन नामधारी गरुड़ेन्द्र का आसन कंपायमान हो जाता है। वह अवधिज्ञान से सर्व वृत्तान्त समझकर चिंतावेग नाम के देव को वहाँ भेजता है। देव उनके समक्ष उपस्थित होकर विनयपूर्वक सर्व संदेश सुनाकर श्री राम के लिए सिंहवाहिनी एवं लक्ष्मण को गरुडवाहिनी विद्या प्रदान करता है। पुनः वारुणास़्त्र, आग्नेयास्त्र, वायव्यास्त्र आदि हजारों देवोपनीत शस्त्र देकर राम के लिए छत्र, चामर आदि विभूति, अनेक विद्या रत्न और हल तथा मूसल नामक शस्त्र देता है एवं लक्ष्मण के लिए विद्युत्वक्त्र नाम की गदा प्रदान करता है। दोनों भाई इन महान् दिव्य अस्त्र-शस्त्र आदि को प्राप्त करके उस देव का सन्मान करके उसे विदा कर देते हैं पुनः आप दोनों मिलकर जिनेन्द्रदेव की महापूजा करते हैं।अनन्तर युद्धस्थल में पहुँचकर गरुड़वाहिनी विद्या के प्रयोग से भामंडल आदि को नागपाश बंधन से मुक्त कर देते हैं। कुछ क्षण बाद सुग्रीव आदि विद्याधर विस्मययुक्त हो राम लक्ष्मण से पूछते हैं-‘‘हे नाथ! जो विपत्ति के समय कभी भी देखने में नहीं आई थीं ऐसी ये अद्भुत विभूतियाँ आज आपके पास कहाँ से प्राप्त हुई हैं। ये दिव्यवाहन, दिव्यास्त्र, छत्र, चामर, ध्वजाएंऔर विविध रत्न आपको कहाँ से मिले हैं?’’ श्रीराम कहते हैं -

      ‘‘हे बंधु! यह सर्व विभूति गुरुभक्ति के प्रसाद रूप में हमें गरुड़ेन्द्र के द्वारा प्राप्त हुई है।’’ इतना कहकर वे देशभूषण-कुलभूषण के उपसर्ग निवारण से उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति होना अनन्तर गरुड़ेन्द्र द्वारा संतुष्ट होकर वर माँगने की प्रेरणा करना इत्यादि समाचार सुना देते हैं। तब सभी लोग गुरुभक्ति और जिनेन्द्रभक्ति के माहात्म्य की चर्चा करते हुए राम-लक्ष्मण की अतिशय प्रशंसा करते हैं और उनकी सब प्रकार से पूजा करते हैं। पुनरपि युद्ध प्रारंभ हो जाता है। कभी रावण की सेना पराजित होती है तो कभी वानरवंशियों [१] की सेना परास्त हुई दिखने लगती है। किसी समय भामण्डल, लक्ष्मण आदि भानुकर्ण और इन्द्रजित को नागपाश से वेष्ठित करके अपने रथ में उन्हें डाल देते हैं। इस घटना से कुपित हो रावण विभीषण को ललकारता है और शक्ति नामक शस्त्र को उठाता है। इसी बीच विभी षण को जै से-तैसे अलग कर लक्ष्मण मध्य में आ जाते हैं। वह रावण उसी पर शक्ति का प्रहार कर देते हैं। बस, देखते ही देखते लक्ष्मण मूर्च्छित हो पृथ्वी तल पर गिर जाते हैं। उन्हें ऐसा देख श्रीराम तीव्र शोक को रोककर रावण से भिड़ जाते हैं। यद्यपि राम छह बार रावण को धनुष रहित और रथ रहित कर देते हैं तथापि उसे पराजित नहीं कर पाते हैं तब वे आश्चर्य चकित हो कहते हैं -

      ‘‘जब तू इस तरह भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ है तब तू अल्पायुष्क नहीं यह निश्चित है। ओह! पूर्व पुण्य तेरी रक्षा कर रहा है। हे विद्याधर राज! सुन! मैं तुझसे कुछ कहता हूँ । जिस मेरे प्राण प्यारे भाई को तूने घायल किया है वह मरने के सन्मुख है, यदि तू अनुमति दे तो मैं उसका मुख देख लूँ ?’’ तब प्रसन्न हो रावण कहता है -

      ‘एवमस्तु’ और लंका की ओर चला जाता है। उस दिन युद्ध विराम ले लेता है।

  1. सुग्रीव आदि विद्याधर की ध्वजाओं में वानर का चिन्ह होने से वे वानरवंशी कहलाते थे।