(१६) राम व लक्ष्मण का राज्याभिषेक

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राम व लक्ष्मण का राज्याभिषेक

      राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न माताओं और अपनी-अपनी स्त्रियों के मन को आह्लादित करते हुए धर्म चर्चा में तत्पर हैं। बलभद्र और नारायण के प्रभाव से जो वैभव प्रगट हुआ है उसका वर्णन कौन कर सकता है? अयोध्या नगरी में निवास करने वालों की संख्या कुछ अधिक सत्तर करोड़ है। राम की गोशाला में एक करोड़ से अधिक गायें कामधेनु के समान दूध देने वाली हैं। नंद्यावर्त नाम की उनकी सभा है और हल, मूसल, रत्न तथा सुदर्शन नाम का चक्ररत्न है। उस समय वहाँ पर जैसी सुवर्ण और रत्नों की राशि थी शायद वैसी तीन लोक में भी अन्यत्र उपलब्ध नहीं थी।

      रामचन्द्र ने हजारों चैत्यालय बनवाये और बड़े-बड़े महाविद्यालयों का निर्माण कराया जिनमें भव्यजीव नित्य ही पूजा-विधान महोत्सव किया करते हैं और विद्यालयों में बालक-बालिकाएं सर्वतोमुखी शिक्षा ग्रहण कर अपना बाल्य जीवन सफल बना रहे हैं। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि अयोध्या नगरी के सभी नर-नारी महान् पुण्य का संचय करने ही यहाँ आये हैं। किमिच्छकदान में जब किसी से कहा जाता है कि ‘जो चाहो-सो ले जावो’ तब वह यही कहता है कि मेरे यहाँ कोई स्थान खाली ही नहीं है। सर्वत्र सुर्वण और रत्नों के ढेर रखे हुए हैं।

      इतना सब कुछ होते हुए और डेढ़ सौ स्त्रियों के बीच में रहते हुए भी भरत सोच रहे हैं -

      श्रीमान् बलभद्र रामचन्द्र जी भी अब घर आ चुके हैंअब मुझे जैसे भी बने वैसे आत्महित के साधन में लगना है। कैकेयी भरत को विरक्तमना देख पुनः व्याकुल हो जाती है और राम से निवेदन करती है कि आप जैसे बने वैसे इन्हें रोको। रामचन्द्र भरत से कहते हैं -

      ‘‘बंधुवर! पिता ने जगत् का शासन करने के लिए आपका राज्याभिषेक किया था इसलिए हम लोगों के भी आप स्वामी हो। यह सुदर्शन चक्र, ये सब विद्याधर तुम्हारी आज्ञा में तत्पर हैं। मैं स्वयं तुम्हारे ऊपर छत्र लगाता हूँ, शत्रुघ्न चमर ढोरेगा और लक्ष्मण तेरा मंत्री रहेगा।’’ भरत हाथ जोड़कर कहते हैं-‘‘हे देव! अब आप मुझे क्यों रोक रहे हो? मैं अब संसार के परिभ्रमण से पूर्णतया ऊब चुका हूँ। अब मुझे तपोवन में प्रवेश करने दीजिए।’’

      तब पुनः रामचन्द्र कहते हैं -

      ‘‘यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो पुनः मैं पूर्ववत् वन में चला जाऊँगा।’’

      अनेक वार्तालाप के अनन्तर रामचन्द्र के नेत्र में अश्रु आ जाते हैं। भरत सिंहासन से उठ खड़े हो जाते हैं और रोती हुई माता को समझा रहे हैं कि इसी बीच राम की आज्ञा से सीता, विशल्या आदि सभी स्त्रियाँ आ जाती हैं एवं भरत को घेरकर उनसे वन क्रीड़ा के लिए अनुरोध करती हैं -

      ‘‘हे देवर! हम लोगों पर प्रसन्नता कीजिए हम लोग आप के साथ वन क्रीड़ा करना चाहती हैं।’’

      भरत दाक्षिण्यवश उन सबकी बात मान लेते हैं। वन में जाकर सरोवर में स्नान आदि करके कमल तोड़कर उनसे जिनेन्द्रदेव की पूजा करते हैंं। पुनः हजारों भावजों और डेढ़ सौ स्त्रियों के बीच भरत सुखपूर्वक बैठे हुए हैं। इसी बीच त्रिलोकमंडन नाम का महागजराज आलान बंधन को तोड़कर महा-उपद्रव करता हुआ उसी तरफ आ जाता है। श्रीरामचन्द्र आदि उसे रोकने के लिए तत्पर हो जाते हैं किन्तु वह भरत को देखते ही एकदम शांत हो विनय से पास में बैठ जाता है। उसे तत्काल जातिस्मरण हो जाने से वह शोक से आक्रान्त हो जाता है।

      भरत उस गजराज पर सवार हो सर्व-परिजन के साथ अपने महल में आते हैं। उधर सर्वत्र हाथी विषयक ही चर्चा चल पड़ती है।

      राजसभा में राजा रामचन्द्र के समीप महावत आदि प्रमुख जन आकर निवेदन करते हैं -

      ‘‘देव! आज चौथा दिन है, त्रिलोकमंडन हाथी ने एक ग्रास भी नहीं लिया है वह सूंड पटकता है और सूं-सूं कर रहा है। हम लोग अनुनय, विनय, सेवा, शुश्रूषा, औषधि आदि सभी उपाय करके हार चुके हैं। अब आपको निवेदन करना ही हमारा कर्तव्य शेष रहा है। अब आपको जो उचित जँचे सो कीजिए।’’

      हाथी का ऐसा समाचार सुनकर राम-लक्ष्मण भी चिंतित हो जाते हैं -

      ‘‘अहो! क्यों तो वह बंधन तोड़कर बाहर आया? क्योंभरत को देखकर शांत हुआ? और क्यों पुनः भोजन पान छोड़ बैठा है? क्या कारण है?’’

      सभा विसर्जित हो जाती है। उधर देशभूषण-कुलभूषण केवली विहार करते हुए वहाँ आ जाते हैं। देवों द्वारा निर्मित दिव्यगन्धकुटी में विराजमान भगवान का दर्शन करने के लिए सभी राजा-प्रजा वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। श्रीराम भी दर्शन करके अपने कोठे मेेंं बैठकर हाथी के भवांतर को कहने के लिए प्रार्थना करते हैं। भगवान् की दिव्य देशना खिरती है -

      ‘‘रामचन्द्र! भगवान् ऋषभदेव के समय दीक्षित हुए चार हजार राजाओं में सूर्योदय और चन्द्रोदय नाम के दो भाई भी दीक्षित हो गये थे। वे मरीचि के शिष्य पारिव्राजक हो गये थे। असंख्य भवोें तक परिभ्रमण करते हुए पुनः सूर्योदय का जीव मृदुमति मुनि हो गया। एक समय गुणनिधि मुनि की पर्वत पर देवों ने पूजा की, अनन्तर वे आकाश से विहार कर गये तब मृदुमति मुनि वहाँ चर्या के लिए आये, उन्हें देखकर श्रावकों ने कहा, ‘‘आप की देव भी पूजा करते हैं अतः आप धन्य हैं।’’ इतना सुनकर मृदुमति ने सोचा, ‘‘यदि मैं कहूँगा कि मैं वह मुनि नहीं हूँ , तो ये लोग ऐसी पूजा नहीं करेंगे।’’ अतः मौन से रहकर उसने आत्म वंचना कर ली। समाधि से मरकर ब्रह्मोत्तर स्वर्ग में दिव्य सुख भोग कर उस मायाचारी के पाप से यह त्रिलोकमंडन नाम का हाथी हो गया है और चन्द्रोदय का जीव कभी चक्रवर्ती का पुत्र अभिराम हुआ। पिता के अति आग्रह से दीक्षा न ले सका अतः वह घर में ही तीन हजार स्त्रियों के बीच रह कर पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए पक्ष, मही ने आदि में पारणा करता था। इस तरह चौंसठ हजार वर्ष तक उसने असिधारा व्रत का पालन किया पश्चात् समाधि से मर कर ब्रह्मोत्तर स्वर्ग में देव हुआ। वहाँ दोनों देव परस्पर में परम प्रीति को प्राप्त थे। आज वह चन्द्रोदय तो भरत है और यह सूर्योदय का जीव हाथी है। भरत को देखकर इसे जातिस्मरण हो जाने से यह शोक से आक्रांत हो रहा है। इतना सुनने के बाद हाथी ने भी सम्यग्दर्शन और अणुव्रत को ग्रहण कर लिया। भरत भी हाथ जोड़कर विनय करते हैं -

      ‘‘हे भगवन् ! अब मुझे संसार समुद्र से पार करने वाली जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान कीजिए।’’

      इतना कहकर वे वस्त्राभूषणों का त्याग करके केशलोंच करके निर्ग्रन्थ दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं। भरत के अनुराग से प्रेरित हो कुछ अधिक एक हजार राजा भी राज्यलक्ष्मी का परित्याग कर मुनि दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं। कैकेयी को शोक से विह्लल देख राम-लक्ष्मण बहुत समझाते हैं किन्तु वह निर्मल सम्यक्त्व को ग्रहण कर तीन सौ स्त्रियों के साथ पृथ्वीमती आर्यिका के पास आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर लेती हैं।

      अनन्तर राम-लक्ष्मण भरत के गुणों का स्मरण कर उद्विग्न हो उठते हैंं। इसी बीच राजा लोग अमात्य सहित आकर प्रार्थना करते हैं -

      ‘‘हे नाथ! हम विद्वान हों या मूर्ख। हम लोगों पर प्रसन्न होइये। हे पुरुषोत्तम! अब आप राज्याभिषेक की स्वीकृति दीजिए।’’

      राम कहते हैं -

      ‘‘हे महानुभावों! जहाँ राजाओं का राजा लक्ष्मण मेरे चरणों का सेवक है वहाँ हमें राज्य की क्या आवश्यकता है? अतः आप लोग उन्हीं का राज्याभिषेक करो।’’ इतना सुनकर लोग लक्ष्मण के पास पहुँचते हैं तब लक्ष्मण स्वयं उठकर राम के पास आते हैं और राज्याभिषेक का कार्यक्रम शुरू हो जाता है। महान वैभव के साथ अनेक राजागण सुवर्ण कलशों से राम और लक्ष्मण का बलभद्र और नारायण के पद पर महाराज्याभिषेक करते हैं। पुनः सीता देवी और विशल्या का भी राज्याभिषेक सम्पन्न होता है। सीता को आठ हजार रानियों में पट्टमहिषी का पट्ट बाँधा जाता है और विशल्या को सत्रह हजार रानियों में पट्टरानी घोषित किया जाता है। उस समय श्री रामचन्द्र विभीषण, हनुमान, सुग्रीव आदि को यथायोग्य राज्य प्रदान करते हैं और शत्रुघ्न को उसी की इच्छानुसार मथुरा का राज्य दे देते हैं।

      उस रामराज्य में प्रजा स्वर्ग सुख का अनुभव कर रही है। उस नगरी में सब मिलाकर साढ़े चार करोड़ राजकुमार हैं जो अपनी कुमार क्रीड़ा से सबका मन हरण कर रहे हैं, सोलह हजार मुकुटबद्ध राजा श्रीराम और लक्ष्मण के चरणों की सेवा कर रहे हैं।