(२०) सीता निर्वासन-लव व कुश का जन्म

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सीता निर्वासन-लव व कुश का जन्म एवम विवाह

      श्रीरामचन्द्र अपने सिंहासन पर विराजमान हैं। सखियों सहित सीता वहाँ आकर विनय पूर्वक नमस्कार कर यथोचित आसन पर बैठ जाती हैं पुनः निवेदन करती हैं -

      ‘‘हे नाथ! रात्रि के पिछले प्रहर में आज मैं ने दो स्वप्न देखे हैं सो उनका फल आपके श्रीमुख से सुनना चाहती हूँ।’’

      ‘‘कहिए प्रिये! वो स्वप्न कौन-कौन से हैं?’’ ऐसा राम पूछते हैं।

      ‘‘प्रथम ही मैंने दो अष्टापद अपने मुख में प्रविष्ट होते देखे हैं। हे नाथ! पुनः मैंने देखा है कि मैं पुष्पक विमान के शिखर से नीचे गिर पड़ी हूँ।’’

      तब राम कहते हैं -

      ‘‘हे प्रिये! अष्टापद युगल को देखने से तुम शीघ्र ही युगल पुत्र को प्राप्त करोगी.....।’’ पुनः राम किंचित विराम लेते हैं कि सीता संदिग्ध हो पूछती हैं -

      ‘‘स्वामिन् ! द्वितीय स्वप्न का फल.....।’’

      ‘‘सुन्दरि! यद्यपि पुष्पक विमान से गिरना अच्छा नहीं है फिर भी चिंता की बात नहीं है क्योंकि शांति कर्म तथा दान करने से पाप ग्रह शांति को प्राप्त हो जाते हैं।’’

      सीता हर्ष एवं विषाद को धारण करती हुई वहाँ से आ जाती हैंं और धर्मकार्य में तत्पर हो जाती हैं।

      इधर बसंत ऋतु सर्वत्र अपना प्रभाव फैला रही है। कुछ समय बाद सीता को गर्भ के भार से भ्रांत देख रामचन्द्र पूछते हैं -

      ‘‘हे कांते! तुम्हें क्या अच्छा लगता है? सो कहो मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। तुम ऐसी म्लानमुख क्यों हो रही हो?’’

      सीता कहती है -

      ‘‘हे नाथ! मैं पृथ्वी तल पर स्थित अनेक चैत्यालयों के दर्श न करना चाहती हूँ । पंच वर्णमय रत्नों की प्रतिमाओं की वंदना करके रत्न और सुवर्णमयी पुष्पों से उनकी पूजा करना चाहती हूँ । हे देव! इसके सिवाय और मेरी कुछ भी इच्छा नहीं है।’’

      इतना सुनते ही रामचन्द्र हर्षितमना द्वारपालिनी को आदेश दे देते हैं -

      ‘‘हे कल्याणि! अविलम्ब ही अयोध्या के जिन मंदिरों को एवं निर्वाण क्षेत्रों के जिन मंदिरों को नाना उपकरणों से विभूषित करो और उत्तम पूजन सामग्री तैयार कराओ।’’

      पुनः श्रीराम सीता के साथ उत्तम हाथी पर सवार हो समस्त परिजनों को साथ लेकर बड़े वैभव के साथ उद्यान में जाते हैं। वहाँ पर सरोवर में चिरकाल तक क्रीड़ा कर अपने हाथों से सुन्दर पूâल तोड़कर और दिव्य सामग्री लेकर सीता के साथ मिलकर जिनेन्द्रदेव के बिम्बों की महापूजा करते हैं। आठ हजार रानियों से घिरे राम सर्वत्र पुण्य तीर्थों की वंदना कराते हुए और सीता के साथ जिन पूजा को करते हुए सीता का दोहला पूर्ण करते हैं।

      कुछ दिन बाद सीता की दार्इं आँख फड़कने से वह चिंतातुर हो उठती हैं। तब गुणमाला आदि रानियाँ उसे शांति विधान आदि कार्यों के लिए प्रेरणा देती हैें। सीता कोषाध्यक्ष को बुलाकर कहती हैं -

      ‘‘हे भद्र! आज से प्रत्येक जिनालय में महामहिम पूजन शुरू करा दो और किमिच्छक दान देना प्रारंभ कर दो।’’

      ‘‘जो आज्ञा महारानी जी’’ ऐसा कहकर वह भद्रकलश कोषाध्यक्ष दूध, दही आदि से श्री जिनदेव का महाभिषेक प्रारंभ करा देता है और दान देना भी शुरू कर देता है।

      इधर सीता दान आदि क्रियाओं में आसक्त हैं। उधर द्वारपाल से आज्ञा लेकर अयोध्या के कुछ प्रमुख लोग राज-दरबार में आते हैं। यद्यपि ये लोग रामचन्द्र के तेज के सामने कुछ भी कहने में असमर्थ हो जाते हैं फिर भी बार- बार राम द्वारा सान्त्वना दी जाने पर जैसे-तैसे एक विजय नामक मुखिया हाथ जोड़कर निवेदन करता है -

      ‘‘हे नाथ! हे पुरुषोत्तम! मेरी कहने की इच्छा व शक्ति न होते हुए भी मैं लाचार हो निवेदन कर रहा हॅूं। हे राम! इस समय समस्त प्रजा मर्यादा से रहित हो रही है। तरुण पुरुष किसी की स्त्री का हरण कर लेते हैं पुनः उसके पति उसे वापस लाकर घर में रख लेते हैं और आपका उदाहरण सामने रखते हैंं। स्वामिन् ! जिधर देखो उधर एक ही चर्चा सुनने में आती है कि सर्वशास्त्रज्ञ महाविद्वान् महाराजा श्री रामचन्द्र रावण के द्वारा हरी गई सीता को वापस कैसे ले आये? हे देव! यदि आपके राज्य में यह एक दोष न होता तो यह राज्य इन्द्र के साम्राज्य को भी निलंबित कर देता।’’

      इतना सुनते ही राम अवाक् रह जाते हैं -

      ‘ओह! यह दारुण संकट कैसा?......’’

      रामचन्द्र प्रजा को सान्त्वना देकर विदा करते हैं और आप स्वयं लक्ष्मण आदि प्रधान पुरुषों को बुला लेते हैं और कहते हैं -

      ‘‘भाई! सीता के प्रति जनता अपवाद की चर्चा कर रही है। ओह!......एक ओर लोक निंदा और दूसरी ओर निकाचित स्नेह। भाई ! मैं इस समय गहरे संकट में आ फंसा हूँ ।’’

      लक्ष्मण इतना सुनते ही क्रोध से तमतमा उठते हैं -

      ‘‘अरे! महासती सीता के बारे में कौन अपनी जिह्वा खोल सकता है? मैं उसकी जिह्वा के सौ-सौ टुकड़े कर दूँगा। सीता के प्रति द्वेष करने वालों को मैं आज ही यमराज के मुख में पहुँचा दूँगा।’’

      रामचन्द्र कहते हैं -

      ‘‘हे सौम्य! शांत होओ और मेरी बात सुनो! मैं सीता के स्नेह में अपने उज्ज्वल रघुवंश को मलिन नहीं कर सकता हूँ। अतः सीता का त्याग करना ही श्रेयस्कर है।’’

      ‘‘हे राम! लोकापवाद के भय से आप पवित्र शीलशिरोमणि सीता को न छोड़िये।’’

      ‘‘लक्ष्मण! मैंने जो निर्णय ले लिया वही होगा।’’

      ‘‘भाई! आप यह क्या कह रहे हो?’’

      इसी बीच राम कृतांतवक्त्र सेनापति को बुलाकर आदेश दे देते हैं -

      ‘‘सेनापते! तुम शीघ्र ही निर्वाण क्षेत्र की वंदना के बहाने सीता को कहीं घोर महाअटवी में छोड़कर आ जाओ।’’

      ‘जो आज्ञा स्वामिन्!’ इतना कहकर सेनापति चल देता है।

      अनेक रानियों और सखियों की प्रार्थना को ठुकरा कर सीता यही कहती है -

      ‘‘बहनों! पतिदेव की यही आज्ञा है कि मैं अकेली ही तीर्थवंदना के लिए जाऊँ अतः तुम सब क्षमा करो और वापस जाओ।’’

      सिद्धों को नमस्कार कर सीता रथ में बैठ जाती हैं और रथ द्रुतगति से चल पड़ता है। मार्ग में कुछ क्षेत्रों की वंदना कराकर सेनापति निर्जन वन में रथ लेकर पहुँचता है और वहाँ पर उतर कर आँखों से अविरल अश्रु धारा की वर्षा करते हुए कहता है -

      ‘‘हे स्वामिनि! चूँकि आप रावण द्वारा हरी गई थीं इस कारण लोग आपका अवर्णवाद कर रहे हैं। यह बात रामचन्द्र को विदित हो चुकी है अतः अपकीर्ति के डर से उन्होंने दोहलापूर्ति के बहाने तुम्हें यहाँ निर्जन वन में छोड़ आने को मुझे आदेश दिया है।

      इतना सुनते ही सीता अकस्मात् शोक से मूर्च्छित हो जाती है। होश आने पर कहती है -

      ‘‘हे सेनापते! तुम मुझे कुछ पूछने के लिए एक बार श्री राम का दर्शन करा दो।’’

      ‘‘हे देवि! मुझे बस इतनी ही आज्ञा है। अब मैं कुछ भी करने में असमर्थ हूँ। हाय! इस किंकरता को धिक्कार हो! सौ-सौ बार धिक्कार हो जो कि मुझे आज यह अधर्म कार्य करने का अवसर आया है।’’

      पुनः रोते हुए टूटे-फूटे अक्षरों में सीता कहती है -

      ‘‘हे सेनापते! तुम जाकर श्रीराम से मेरा एक समाचार अवश्य कह देना कि जैसे आपने लोकापवाद के डर से मुझे छोड़ दिया है वैसे ही सम्यग्दर्शनरूपी रत्न को, जैन धर्म को न छोड़ देना।’’

      इधर सेनापति नमस्कार कर चला जाता है। उधर सीता करुण क्रंदन करते हुए विलाप करती है -

      ‘‘हे देव! आपने मुझे धोखा क्यों दिया?

      अरे दुर्दैव! तुझे मेरी दशा पर दया नहीं आई? ओह! मैंने पूर्वजन्म में क्या पाप किया था? क्या किसी मुनि को झूठा दोष लगाया था?.....हाय मातः! यह क्या हुआ? मैं कहाँ जाऊँ? क्या करूँ? किसकी शरण लूँ? हे नाथ! आप कैसे निष्ठुर हो गये? ऐसा ही करना था तो आपने युद्ध में असंख्य प्राणियों का सं हार कर मेरी रक्षा क्यों की थी?.....अरे भक्त लक्ष्मण! हे मात अपराजिते! हे भाई भामंडल! हे पुत्र हनुमान! तुम सब आज ऐसे कैसे हो गये हो? ओह! विधाता तू कितना निष्ठुर है......?’’

      उधर कृतांतवक्त्र के समाचार से रामचन्द्र एक बार आहत हो उठते हैं, मूर्च्छित हो जाते हैं पुनः सचेत हो कुछ संतोष को धारण करते हुए अपने राज कार्य में लग जाते हैं।

      अकस्मात् राजा वज्रजंघ के कुछ लोग सीता के सामने आकर पूछते हैं -

      ‘‘हे देवि! आप कौन हो? और यहाँ ऐसी अवस्था में क्यों बैठी हो?’’

      उन्हें देखते ही सीता घबराकर उन्हें अपने आभूषण देने लगती है। इसी बीच राजा वज्रजंघ आ जाते हैं और पूछते हैं -

      ‘‘हे भगिनि! तुम कौन हो? किस निर्दयी ने तुम्हें यह वन दिखाया है? डरो मत, कहो, कहो। मैं तुम्हारा भाई हूँ।’’

      सीता अश्रु रोककर कहती है -

      ‘‘हे भाई! मैं राजा जनक की पुत्री, भामंडल की बहन, राजा दशरथ की पुत्रवधू और श्री रामचन्द्र की रानी सीता हूँ ।’’

      पुनः धीरे-धीरे वह दशरथ की दीक्षा से लेकर अपने दोहदपूर्ति तक सारे समाचार सुना देती है। राजा वज्रजंघ कहते हैं -

       ‘‘बहन! संसार में कर्मों की ऐसी ही विचित्र गति है अतः धैर्य धारण करो और मेरे साथ चलो, तुम मेरी धर्म बहन हो।’’

      ‘‘हाँ! तुम मेरे भाई हो, सच में तुम पूर्वभव में मेरे भाई रहे होंगे अन्यथा इस निर्जन वन में मेरे सहायक कैसे बनते?’’

      वज्रजंघ सीता को साथ लेकर पुण्डरीकपुर में आ जाते हैं। कुछ ही दिनों में श्रावणमास की पूर्णिमा के दिन सीता युगल पुत्रों को जन्म देती है। उनके नाम अनंगलवण और मदनाँकुश रखे जाते हैं। वे बालक दूज के चन्द्रमा की तरह कला, गुण और शरीर से बढ़ते हुए सीता के शोक कोभुला देते हैं। एक समय ‘सिद्धार्थ’ नामक क्षुल्लक राजा वज्रजंघ के यहाँ आते हैं। वे इन दोनों बालकों को समस्त शास्त्र और शस्त्र कला में निष्णात कर देते हैं। वे क्षुल्लक प्रतिदिन तीनों कालों में मेरुपर्वत की वंदना करते रहते हैंं। दोनों भाई लवण और अंकुश सूर्य के तेज और प्रताप कोभी लल्जित करते हुए यौवन अवस्था में प्रवेश करते हैं।

      एक बार पृथिवीपुर के राजा पृथु के दरबार में दूत प्रवेश करता है और आज्ञा पाकर निवेदन करता है -

      ‘‘महाराज’’! राजा वज्रजंघ ने सीता के पुत्र लवण कोअपनी पुत्री शशिचूला देना निश्चित किया है अब वे अंकुश के लिए आपकी पुत्री कनकमाला को चाहते हैं, क्योंकि वे दोनों का विवाह एक साथ......।’’

      बीच में ही बात काटकर राजा पृथु कहते हैं -

       ‘‘अरे दूत! चुप रह। वर के नव गुण कहे हैं-कुल, शील, धन, रूप, समानता, बल, अवस्था, देश और विद्या। इनमें से सर्वप्रथम कुल गुण ही प्रधान है और जिसमें वह नहीं है उसे अपनी कन्या देना भला कैसे संभव है?’’

      दूत वापस जाकर राजा वज्रजंंघ को सर्व समाचार दे देता है। राजा वज्रजंघ पृथिवीपुर पर चढ़ाई करके उसे घेर लेते हैं। समाचार विदित होते ही लव-कुश भी आ जाते हैंऔर युद्ध में ललकार कर कहते हैं -

      ‘‘अरे पृथु! ठहर, क्यों भागता है? आज हम दोनों तुझे युद्ध में ही अपने कुल का परिचय करायेंगे।’’

      पृथु वापस मुड़कर क्षमा याचना करते हुए उन दोनों की प्रशंसा करते हैं और सम्मान के साथ नगर में प्रवेश कराते हैं।

      अनंतर राजा पृथु की पुत्री और तमाम से ना प्राप्त कर ये वीर अन्य तमाम दे शों को जीतने के लिए निकल पड़ते हैं। कुछ दिनों बाद दिग्विजय करके आते हुए वीर पुत्रों को देखकर वीरसू माता सीता हर्ष से फूल जाती हैं। इधर वज्रजंघ भी अपनी पुत्रियों का विवाह वीर लवण के साथ सम्पन्न कर देते हैं।