(२१) पुत्र मिलन

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राम-लक्ष्मण व लव-कुश के युद्धोपरान्त पिता-पुत्र मिलन

      रत्नजटित सिंहासन पर लव-कुश विराजमान हैं। नारद प्रवेश करते हैं, देखते ही दोनों वीर उठकर खड़े होकर विनय सहित घुटने टेक कर उन्हें नमस्कार कर उच्च आसन प्रदान करते हैं। प्रसन्न मुद्रा में स्थित नारद कहते हैं -

      ‘‘राजा राम और लक्ष्मण का जैसा वैभव है सर्वथा वैसा ही वैभव आप दोनों को शीघ्र ही प्राप्त हो।’’

      वे वीर पूछते हैं -

      ‘‘भगवन् ! ये राम-लक्ष्मण कौन हैं? वे किस कुल में उत्पन्न हुए हैं?’’

      आश्चर्यमय मुद्रा को करते हुए कुछ क्षण स्तब्ध रहकर नारद कहते हैं -

      ‘‘अहो! मनुष्य भुजाओं से मेरु को उठा सकता है, समुद्र को तैर सकता है किन्तु इन दोनों के गुणों का वर्णन नहीं कर सकता है। यह सारा संसार अनंतकाल तक अनंत जिह्वाओं के द्वारा भी उनके गुणों को कहने में समर्थ नहीं है। फिर भी मैं उसका नाममात्र ही तुम्हें बता देता हूँ। सुनो, अयोध्या के इक्ष्वाकुवंश के चन्द्रमा दशरथ के पुत्र श्री राम और लक्ष्मण हैं। ...दशरथ की दीक्षा के बाद भरत का राज्याभिषेक होता है और राम-लक्ष्मण, सीता वन को चले जाते हैं। वहाँ रावण सीता को हर ले जाता है पुनः रामचन्द्र, हनुमान, सुग्रीव आदि के साथ रावण को मार कर सीता वापस ले आते हैं। अयोध्या मेंआकर पुनः राज्य-संचालन करते हैं।

      श्रीराम के पास सुदर्शन चक्र है तथा और भी अनेक रत्न हैं जिन सबकी एक-एक हजार देव सदा रक्षा करते रहते हैंं। उन्होंने प्रजा के हित के लिए सीता का परित्याग कर दिया है ऐसे राम को इस संसार में भला कौन नहीं जानता है?’’

      यह सब सुनकर अंकुश पूछता है -

      ‘‘हे ऋषे! राम ने सीता किस कारण छोड़ी सो तो कहो, मैं जानना चाहता हूँ।’’

      नारद एक क्षण आकुल हो उठते हैं पुनः अश्रुपूर्ण नेत्र होकर कहते हैं -

      ‘‘जो जिनवाणी के समान पवित्र हैं ऐसी सीता का पता नहीं किस जन्म के पाप का उदय हो आया कि जनता के मुख से उसका अपवाद सुन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने गर्भवती अवस्था में ही उसे वन में भेज दिया। ओह!...पता नहीं आज वह जीवित है या नहीं?.....’’

      इतना कहते हुए नारद का कंठ रुंध जाता है और वो आगे बोल नहीं पाते हैं। पुनः हँसते हुए अंकुश कहते हैं -

      ‘‘हे ब्रह्मचारिन् ! भयंकर वन में सीता को छोड़ते हुए राम ने कुल के अनुरूप कार्य नहीं किया। अहो! लोकापवाद के निराकरण के अनेक उपाय हो सकते हैं पुनः उन्होंने सीता को ऐसा कष्ट क्यों दिया?’’ लवण कुमार पूछते हैं -

      ‘‘हे मुने! कहो अयोध्या यहाँ से कितनी दूर है।’’

      ‘‘अयोध्या यहाँ से ६० योजन दूर है।’’

      ‘‘ठीक है, हम राम-लक्ष्मण को जीतने के लिए प्रस्थान करेंगे।’’

      लव-कुश राजा वज्रजंघ से कहकर सिंधु, कलिंग आदि देश में दूत भेजकर राजाओं को बुलाकर प्रस्थान की भेरी बजवा देते हैं। राम के प्रति चढ़ाई सुन सीता रोने लगती है। यह देख सिद्धार्थ क्षुल्लक कहते हैं -

      ‘‘नारद ऋषे! आपने यह क्या किया? ओह! आपने कुटुम्ब में ही भेद डाल दिया।’’ नारद कहने लगे -

      ‘‘मैंने तो मात्र राम-लक्ष्मण की चर्चा की थी।....फिर भी डरो मत, कुछ भी बुरा नहीं होगा।’’

      दोनों वीर माता को रोती हुई देखकर पूछते हैं -

      ‘‘हे अम्ब! क्यों रो रही हो? अविलम्ब कहो, किसने तुम्हें शोक उत्पन्न कराया है? कौन यमराज का ग्रास बनना चाहता है?’’

      सीता धैर्य का अवलम्बन लेकर कहती है -

      ‘‘पुत्रों! आज मुझे तुम्हारे पिता का स्मरण हो आया है इसलिए अश्रु आ गये हैं।’’

      आश्चर्य चकित हो दोनों बालक पूछते हैं -

      ‘‘मातः! हमारे पिता कौन हैं? और वे कहाँ हैं?’’

      तब सीता सोचती है अब रहस्य छिपाने का समय नहीं है और वह स्पष्टतया कहती है -

      ‘‘प्यारे बेटे! ये राम ही तुम्हारे पिता हैं और वह सीता मैं ही हूँ। राजा वज्रजंघ भामंडल के समान मेरा बंधु हुआ हैऔर मेरे गर्भ से तुम दोनों वीर जन्मे हो। आज तुम्हारी रणभेरी सुन कर मैं घबरा रही हूँ। बेटे! क्या मैं पति की अमंगलवार्ता सुनूँगी? या तुम्हारी? या देवर की?.....’’

      सर्व वृत्तांत सुनकर लव-कुश के हर्ष का पार नहीं रहता है। वे कहने लगते हैं -

      ‘‘अहो! तीन खण्ड के स्वामी बलभद्र श्रीरामचन्द्र के हम सुपुत्र हैं।’’ पुनः माता से कहते हैं -

      ‘‘मातः! मैं वन में छोड़ी गई हूँ’’ तुम ऐसा विषाद अब मत करो। तुम शीघ्र ही राम-लक्ष्मण का अहंकार खण्डित देखो।’’

      सीता विह्वल हो कहती है -

      ‘‘प्यारे पुत्रों! पिता के साथ विरोध करना ठीक नहीं है अतः तुम दोनों बहुत ही विनय के साथ जाकर उनका दर्शन करो, यही बात न्यायसंगत है।’’

      दोनों वीर कहते हैं -

      ‘‘हे मातः! आज वे हमारे शत्रुस्थान को प्राप्त हैं उन्होंनेअकारण ही आपका तिरस्कार किया है अतः हम उनसे यह दीन वचन नहीं कह सकते हैं कि हम आपके पुत्र हैं। अब तो संग्राम में ही परिचय होगा। संग्राम में ही हम लोगों को मरण भी इष्ट है किन्तु माता के अपमान को सहन कर जीवित रहना हमें इष्ट नहीं है।’’

      सीता और सिद्धार्थ उन पुत्रों को तरह-तरह से समझा रहे हैं किन्तु वे युद्ध के लिए कमर कस चुके हैं। सिद्धों की पूजा कर माता को सान्त्वना देते हुए नमस्कार करते हैं -

      ‘‘बेटे! जिनेन्द्रदेव सर्वथा तुम्हारी रक्षा करें और परस्पर में मंगलक्षेम होवे।’’

      माता के शुभाशीष को प्राप्त कर वे प्रस्थान कर देते हैंं। इधर सिद्धार्थ और नारद शीघ्र ही भामण्डल को खबर भेज देते हैंं। राजा जनक के साथ भामण्डल वहाँ आते हैं। वंâठ फाड़-फाड़कर रोती हुई सीता को सान्त्वना देकर विमान में बिठाकर युद्ध स्थल में आते हैं। आकाश मार्ग में विमान को ठहरा कर दोनों का संग्राम देख रहे हैं। हनुमान को भेद मालूम होते ही वह भी लव-कुश की सेना में आ जाता है।

      आपस में दिव्य शस्त्रों द्वारा घोर युद्ध चल रहा है। राम के साथ लवण कुमार और लक्ष्मण के साथ अंकुश भिड़े हुए हैं। एक दूसरे को ललकार रहे हैंं। रामचन्द्र कभी पराजित होते हैं तो लज्जित हो जाते हैं, हँसकर पुनः शस्त्र प्रहार करते हैं। इधर लव-कुश जानते हैं कि ये मेरे पिता और चाचा हैंअतः संभव कर प्रहार करते हैं किन्तु राम-लक्ष्मण को विदित न होने से वे शत्रु मानकर ही प्रहार कर रहे हैं -

      राम-लक्ष्मण सोच रहे हैं -

      ‘‘क्या कारण है? कि जो मेरे अस्त्र-शस्त्र निष्फल ही होते जा रहे हैं और शरीर में भी शिथिलता आ रही है?’’

      ‘‘क्या कहॅूं भाई? मेरी भी यही स्थिति है कुछ समझ में नहीं आता है कि क्या करना है?’’

      पुनः कुछ सोचकर युद्ध का अंत करने के लिए लक्ष्मण चक्ररत्न का स्मरण करते हैं और उसे घुमाकर अंकुश के ऊपर छोड़ देते हैं। वह अंकुश के पास पहुँचकर निष्प्रभ हो जाता है पुनः वापस लक्ष्मण के हस्ततल में आ जाता है। कई बार चक्ररत्न का वार होने पर भी जब वह निष्फल हो जाता है तब इधर अंकुश कुमार अपने धनुष दण्ड को ऐसा घुमाते हैं कि वह चक्र की शंका उत्पन्न कर देता है। राम - लक्ष्मण कहने लगते हैं -

      ‘‘क्या बात है? केवली भगवान् के वचन असत्य हो जायेंगे क्या? जान पड़ता है कि ये दोनों दूसरे ही बलभद्र और नारायण उत्पन्न हुए हैं।’’

      लक्ष्मण को लज्जित और निश्चेष्ट देख नारद की सम्मति से सिद्धार्थ क्षुल्लक वहाँ आकर कहते हैं -

      ‘‘हे देव! नारायण तो तुम्हीं हो, जिन शासन की कही बात अन्यथा कैसे हो सकती है? भाई! ये दोनों कुमार सीता के लव-कुश नाम के दो पुत्र हैं कि जिनके गर्भ में रहते हुए उसे वन में छोड़ दिया गया था।’’

      इतना सुनते ही लक्ष्मण के हाथ से शस्त्र और कवच गिर जाते हैं और राम तो धड़ाम से पृथ्वी तल पर गिर मूर्च्छित हो जाते हैं। शीतोपचार से सचेत होते ही राम - लक्ष्मण पुत्रों से मिलने के लिए आगे बढ़ते हैं। उधर लव- कुश भी रथ से उतर कर पिता के सम्मुख बढ़ते हैं। दोनों ही वीर पिता के चरणों में गिर नमस्कार करते हैं और श्रीराम अपनी भुजाओं से उन्हें उठाकर हृदय से लगा ले ते हैं। तत्पश्चात् लक्ष्मण भी उनका आलिंगन करते हैं। भामण्डल भी उन्हें छाती से चिपकाकर मस्तक पर हाथ फिराते हैं। वहीं युद्ध स्थल में ही पिता-पुत्र के मिलन की प्रसन्नता में मंगलबाजों की ध्वनि हो ने लगती है। पिता-पुत्र का मिलन होते ही सीता संतुष्ट चित्त हुई अपनी पुत्र-वधुओं के साथ पुण्डरीकपुर चली जाती है। रामचन्द्र दोनोें पुत्रों और भाई के साथ अपने पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या में प्रवेश करते हैं उस समय के दृश्य को देखने के लिए वहाँ की प्रजा, महिलाएं और बालक - बालिकाएं तो पागलवत् चेष्टा करते ही हैं आश्चर्य यह कि वृद्ध लोग भी धक्का-मुक्की को सहन करते हुए प्राणों की परवाह न करके उनके दर्शनों के लिए पागल हो जाते हैं।

      कोई महिला आँख का अंजन ललाट में लगाकर दौड़ आती है तो कोई दुपट्टी को पहन कर और लहँगा को ओढ़कर चल देती है। कोई अपने बच्चे को छोड़कर किसी अन्य के बालक को ही लेकर चल पड़ती है, तो कोई पति को आधा भोजन परोस कर ही भाग आती है। हल्ला-गुल्ला से उत्पन्न हुआ शब्द भूतल और आकाश मंडल को एक कर देता है।

      ‘‘अरे वृद्धे! हट, हट, मुझे भी देखने दे। तू यहाँ से चली जा अन्यथा गिरकर मर जायेगी।’’

      ‘‘अरे, रे, रे! मातः! मैं गिर गई, कोई मुझे सहारा दे दो।’’

      ‘‘सरको, सरको, जरा दूर हटो, मुझे भी देखने दो।’’

      ‘‘हाँ, हाँ देखो, जो ये रामचन्द्र जी के अगल-बगल में बैठे हैं वे ही सीता के पुत्र लव-कुश हैं।’’

      ‘‘बहन! कौन तो लव है और कौन कुश है? दोनों तो एक सरीखे हैं।’’

      ‘‘बहन! देखो ना, इन दोनों का मुख कमल श्रीरामचन्द्र जैसा ही है।’’

      ‘‘हाँ बहन देखो, इतना भयंकर युद्ध करने के बाद भी दोनों अक्षत शरीर हैं। बड़े पुण्यशाली हैं ये।’’

      ‘‘ओहो! कितने सुन्दर हैं ये बालक।’’

      ‘‘कहीं इन्हें नजर न लग जाये, अतः इनके ऊपर ये सरसों के दाने बिखेर दे।’’

      ‘‘अरी माँ! तू यहाँ भीड़ में क्यों आ गई ? क्या मरना है?’’

      ‘‘अरी बेटी! मुझे भी जरा देख लेने दे।’’

      ‘‘हाँ, हाँ ले आजा, मैंने तो दर्शन कर लिये।’’

      ‘‘अरी सखी! मैं एक बार इन दोनों का चेहरा और देख लूं।’’

      ‘‘अरी पगली! तू तोे बहुत देर से देख रही है। अब दूसरों को भी दर्शन कर लेने दे।’’

      रामचन्द्र-महल में पहुँचकर स्नान आदि से निवृत्त हो दोनों पुत्रों के साथ भोजन करते हैं। पुनः राजा वज्रजंघ को बुलाकर सम्मानपूर्वक कहते हैं -

      ‘‘आप मेरे लिए भामण्डल के समान हैं। अहो! संकट में सती सीता के भाई बनकर आपने हमारा बहुत बड़ा उपकार किया है कि जिससे इन पुत्रों के मुख कमल को मैं देख सका हूँ।’’

      अयोध्या में सर्वत्र खुशियाँ मनाई जा रही हैं। मंगलवाद्य, तोरण, बंदनवार और फूलों से अयोध्या एक अपूर्व ही शोभा को धारण कर रही है।