(२२) सीता की अग्नि परीक्षा

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सीता की अग्नि परीक्षा

      श्री रामचन्द्र अपने सिंहासन पर आरूढ़ हैं। सुग्रीव, हनुमान, विभीषण आदि आकर नमस्कार कर निवेदन करते हैं -

      ‘‘प्रभो! सीता अन्य देश में स्थित है उसे यहाँ लाने की आज्ञा दीजिए।’’ रामचन्द्र गर्म निःश्वास लेकर कहते हैं -

      ‘‘बंधुओं! यद्यपि मैं उसके विशुद्ध शील को जानता हूँ फिर भी लोकापवाद से त्यक्त हुई सीता का मुख मैं कैसे देख सकूँगा?

      हाँ, यदि वह अपने सतीत्व का विश्वास जनता को करा सके तो आप ला सकते हैं।’’

      राम की आज्ञा पाते ही हनुमान आदि पुंडरीकपुर पहुँचकर सीता के महल में प्रवेश करते हैं। पुष्पांजलि बिखेर कर सीता को प्रणाम कर वार्तालाप करते हैं। सीता रो पड़ती हैं और कहती हैं -

      ‘‘दुर्जनों के वचन रूपी दावानल से जले हुए मेरे अंग इस समय क्षीरसागर के जल से भी शांत नहीं हो रहे हैं।’’

      ‘‘हे मनस्विनि! हे भगवति! आप शोक छोड़ो और मन को प्रकृतिस्थ करो। हम लोगों ने ऐसा कह रखा है कि भरत क्षेत्र में जो भी सीता की निंदा करे उसे मार डाला जाये और जो सीता के गुणों का कीर्तन करे उसके घर रत्न वर्षा की जाये। हे दे वि! कृषक भी धान्य राशि में आपकी स्थापना करते हैं उनका कहना है कि इससे धान्य अधिक पैदा होता है।’’

      पुनः हनुमान कहते हैं -

      ‘‘हे वैदेहि! यह पुष्पक विमान श्रीराम ने भेजा है अतः अब पति की आज्ञा का पालन करो, उठो और शीघ्र ही अयोध्या चलो।’’

      सीता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू सहित अयोध्या के लिए प्रस्थान कर देती हैं। अयोध्या में प्रवेश करते ही जय - जयकार और प्रशंसा को सुनते हुए वे राजभवन में प्रवेश करती हैं। श्रीराम को नमस्कार कर पास में खड़ी हो जाती हैं। उस समय राम सोचते हैं -

      ‘‘अहो! यह कैसी धृष्टा है कि जो वन में छोड़ी जाने पर भी आज यहाँ आकर मेरे सन्मुख खड़ी है। यह बड़ी निर्लज्ज है।’’ पुनः कहते हैं -

      ‘‘हे सीते! सामने क्यों खड़ी है? दूर हट, मैं तुझे देखने को समर्थ नहीं हूँ। तू रावण के भवन में कई मास तक रही फिर भी तुझे ले आया, क्या यह सब मेरे लिए उचित था?’’

      ‘‘हे राम! आपके सदृश निष्ठुर दूसरा कोई नहीं है। जिस प्रकार कोई साधारण मनुष्य उत्तम विद्या का तिरस्कार करता है। वैसे ही आप मेरा तिरस्कार कर रहे हो। हे कुटिल हृदय! दो हला के बहाने वन में भेजकर मुझ गर्भिणी का छोड़ना क्या तुम्हें उचित था? यदि मैं वहाँ कुमरण को प्राप्त होती तो इससे तुम्हें क्या लाभ मिलता? केवल मेरी दुर्गति ही तो होती? यदि मेरे प्रति आपका किंचित भी सद्भाव था तो मुझे आर्यिकाओं की वसतिका के पास क्यों नहीं छुड़वाया था? वास्तव में अनाथ और अत्यन्त दुःखी को एक जिन-शासन ही परम शरण है। हे देव! अधिक कहने से क्या? इस दशा में भी आप प्रसन्न होइए, मुझे आज्ञा दीजिए मैं क्या करूँ?....’’

      इतना कहकर सीता रो पड़ती है। तब राम शांतचित्त हो कहते हैं -

      ‘‘हे देवि! मैं तुम्हारे निर्दोष शील को जानता हूं फिर भी तुम लोकापवाद को प्राप्त हुई हो अतः इस कुटिलचित्त प्रजा को विश्वास दिलाओ।’’

      ‘‘ठीक है, मैं पाँच प्रकार की दिव्य शपथों में से आप जो कहिए उसे देने के लिए तैयार हूूँ। हे राम! मैं कालकूट विष को पी सकती हूँ, मैं तुला पर चढ़ सकती हूूँ, अथवा अग्नि में प्रवेश कर सकती हूँ।’’

      कुछ क्षण राम विचार कर कहते हैं -

      ‘‘हाँ, ठीक है, अग्नि में प्रवेश करो।’’

      सीता प्रसन्न हो कहती हैं -

      ‘‘ठीक है, मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी।’’

      इतना सुनते ही हनुमान, विभीषण, लव-कुश आदि काँप उठते हैं। लव कहता है-

      ‘‘ओह! माता ने मृत्यु स्वीकार कर ली है।’’ कुश कहता है - ‘‘भाई! जो गति माता की होगी वही अपनी होगी।’’

      उस समय सिद्धार्थ क्षुल्लक अपनी भुजा ऊपर उठाकर श्रीराम से कहते हैं -

      ‘‘हे राम! मेरु पाताल में प्रवेश कर सकता है, समुद्र सूख सकते हैं किन्तु सीता के शील में कुछ भी चंचलता नहीं आ सकती है। मैं विद्याबल से समृद्ध हूँ तीनों काल में मेरु की वंदना करके आता हूँ । पाँचों मेरुओं के समस्त शाश्वत जिन प्रतिमाओं की मैंने वंदना की है। हे रामचन्द्र! मैं जोर देकर कहता हूँ कि सीता के शील में किंचित भी कमी हो तो वह मेरी वंदना निष्फल हो जाये। मैंने वस्त्रखंड धारण कर कई हजार वर्ष तक तपश्चरण किया है सो मैं उस तप की शपथ पूर्वक कहता हूँ कि ये दोनों कुमार तुम्हारे ही पुत्र हैं। इसलिए हे बुद्धिमन राम! इस भयंकर अग्नि में सीता को प्रवेश न कराइये।’’

      क्षुल्लक की बात सुनकर आकाश में स्थित विद्याधर और भूमिगोचरी राजा लोग जोर-जोर से आवाज लगाते हुए कहने लगे -

      ‘‘बहुत अच्छा कहा, बहुत अच्छा कहा, हे देव! प्रसन्न होओ, प्रसन्न होओ, हे नाथ! हे राम! हे राम! सीता महासती, महासती है आप मन में भी अग्नि का विचार मत करो।’’

      उस समय तीव्र शोक से सभी लोग जोर-जोर से रोने लगते हैं -

      तब राम सबकी उपेक्षा करते हुए कहते हैं -

      ‘‘हे मानवों! यदि इस समय आप लोग दया करने में तत्पर हैं तो पहले अपवाद क्यों किया था?’’

      उसी समय राम किंकरों को आज्ञा दे देते हैं। सेवकगण दो पुरुष प्रमाण गहरी और तीन सौ हाथ प्रमाण चौड़ी चौकोर बावड़ी खोद कर उसमें अगुरु, चंदन आदि की बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ लेकर भर देते हैं और अग्नि प्रज्ज्वलित कर देते हैं। अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को देखकर सारी अयोध्यापुरी ही अश्रुओं की वर्षा से दुर्दिन उपस्थित कर देती है।

      श्रीराम अग्नि की लपटों को देखकर व्याकुल हो उठते हैं और सोचने लगते हैं-

      ‘‘ओह! मैंने यह क्या कर डाला? यह मालती के पुष्प सदृश कोमलांगी अग्नि का स्पर्श होते ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगी। हाय! पुनः गुणों की पुंज शील शिरोमणि इस कांता का मुख कमल मैं कैसे देख सकूँगा? इसके वियोग में मैं अब कैसे जीवित रह सकूंगा? निश्चिन्त हृदया सीता ने भी ऐसे मरना कैसे स्वीकृत कर लिया है? ओह!....वह क्षुल्लक भी अब चुपचाप है अतः इसे रोकने के लिए अब मैं क्या बहाना करूँ?.....’’ पुनः सोचते हैं -

      ‘‘अथवा जिनका जैसा मरण निश्चित है वैसा ही होगा। उसे अन्यथा करने में कौन समर्थ है?’’ पुनः उठती हुई ज्वालाओं की भीषण गर्मी को देखते हुए सोच रहे हैं -

      ‘‘अरे! दुष्ट रावण ने इसे लंका में मृत्यु के घाट क्यों नहीं उतार दिया था?.....जब वन में छोड़ी गई थी तभी इसे किसी हिंसक पशु ने क्यों नहीं खा लिया था?....अब मैं इसकी ऐसी दशा कैसे देख सकूँगा?.....’’

      राम चिंतातुर हो रहे हैं। लक्ष्मण, हनुमान आदि अश्रु की बूँदें गिरा रहे हैं। लव-कुश मूर्च्छित हो-होकर गिर रहे हैं किन्तु सीता किसी की परवाह न कर वहाँ आती हैं और प्रसन्नमना हुई खड़ी हो जाती हैं। क्षणभर के लिए कायोत्सर्ग करती हैंं पुनः श्री जिनेन्द्रदेव की स्तुति करती हैं -

      ‘‘ऋषभ आदि चौबीस तीर्थंकरों को मेरा नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो, श्री मुनिसुव्रतनाथ को बारम्बार नमस्कार हो, सर्व जन हितैषी, प्राणिवत्सल आचार्य , उपाध्याय और साधुओं को मेरा मन-वचन-काय से बारम्बार नमस्कार हो।’’

      पुनः श्री रामचन्द्र को नमस्कार करके कहती हैं -

      ‘‘हे अग्निदेवते! राम के सिवाय यदि स्वप्न में भी मैंने किसी अन्य पुरुष को मन से भी चाहा हो तो तू मुझे भस्मसात् कर दे अन्यथा तू शीतल हो जा।’’

      इतना कह कर वह उस अग्नि कुंड में कूद पड़ती है।

      इसी बीच सर्वत्र हाहाकार मच जाता है।‘‘अरे रे रे! क्या हुआ? क्या हुआ? हे जिनशासन देवते।’’.....इसी बीच वहीं अयोध्या के महेंद्रोदय उद्यान में सकलभूषण केवली के केवलज्ञान उत्सव को मनाने के लिए इन्द्रगण आ रहे थे। इस दृश्य को देखते ही इन्द्र ने मेषकेतु देव को कहा कि -

      ‘‘जाओ, जाओ! शीघ्र ही शील का माहात्म्य दिखाकर सीता की रक्षा करो।’’

      वह देव निमिष मात्र में उस अग्नि की बावड़ी को जल से लबालब भर देता है। जल बावड़ी से ऊपर आकर चारों तरफ फ़ैल जाता है। लोग डूबने लगते हैं। उधर सीता जल के मध्य सहस्र-दल कमल के ऊपर सिंहासन में विराजमान हैं। जल बढ़ता ही चला जा रहा है। लोग जोर-जोर से आवाज लगाते हैं -

      ‘‘हे देवि! रक्षा करो, रक्षा करो। हे मान्ये! हे सरस्वती! हे महाकल्याणि! हे लक्ष्मी! हे सर्व प्राणिहितैषिणि! रक्षा करो। हे महा पतिव्रते! हे मुनिमानस निर्मले! दया करो, दया करो!

      वह जलरूपी वधू जब अपने तरंगरूपी हाथों से श्रीराम के चरण युगल का स्पर्श कर लेती है तब वह उसी क्षण सौम्य दशा को प्राप्त हो जाती है। तब जल को रुका हुआ देख सभी जनता सुखी हो जाती है। उस बावड़ी में चारों तरफ कमल खिल रहे हैं। सीता के दोनों तरफ देवियाँ चंवर ढोर रही हैं। महिलाएँ सीता के शील की प्रशंसा करते हुए और तरह-तरह से आशीर्वाद देते हुए नहीं अघाती हैं। दे वतागण दुंदुभि बाजे बजा रहे हैं, पुष्प वर्षा रहे हैं। किन्नरियाँ नृत्य कर रही हैं और मधुर गीत गा रही हैं। आकाश से, भूतल से सब ओर से एक ही ध्वनि आ रही है -

      ‘‘हे जनकनंदिनी, हे शीलशिरोमणि! तुम्हारी जय हो, जय हो। हे बलभद्र श्रीराम की पट्टरानी! तुम्हारी जय हो, जय हो।’’

      माता के स्नेह से खिंचे हुए लव-कुश जल में तैरते हुए वहाँ आकर सीता को प्रणाम करते हैंं। वह बेटों के मस्तक पर हाथ फिराकर अनेक आशीर्वाद देती हैं पुनः दोनों पुत्र सीता के आजू-बाजू में खड़े हो जाते हैं। उसी समय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बहुत भारी अनुराग से युक्त हो सीता के समीप आते हैं और कहते हैं -

      ‘‘हे देवि! प्रसन्न होओ, तुम सभी लोक में पूजित कल्याणवती हो। हे सति! मेरा सब दोष क्षमा करो, पुनः आगे फिर कभी भी मैं ऐसा अपराध नहीं करूँगा। हे प्राणवल्लभे! तुम आठ हजार रानियों की भी परमेश्वरी हो और तो क्या अब मुझ पर भी तुम अनुशासन करो। हे कान्ते! जो-जो स्थान तुम्हें प्रिय हों मुझे आज्ञा देवो, मैं तुम्हारे साथ वहाँ - वहाँ विचरण करते हुए इच्छानुसार क्रीड़ा करूँगा। हे प्रशंसनीय मनस्विनि! मैं इस समय दोष सागर में निमग्न हूँ अतः तुम्हारे समीप आया हूँ सो क्रोध का परित्याग करो और प्रसन्न होओ।’’

      तब सीता कहती हैं -

      ‘‘हे नाथ! आप इस तरह विषाद क्यों कर रहे हैं? मैं किसी पर भी कुपित नहीं हूँ । इसमें न तुम्हारा ही कुछ दोष था न देश के अन्य लोगों का। यह तो मेरे पूर्व संचित कर्म का ही विपाक था जो मैंने भोगा है। हे बलदे व! मैंने तुम्हारे प्रसाद से देवों के समान अनुपम भोग भोगे हैं। इसलिए अब उनकी इच्छा नहीं है। अब तो मैं वहीं कार्य करूँगी कि जिससे पुनः मुझे स्त्री पर्याय प्राप्त न हो। अब मैं समस्त दुःखों का क्षय करने के लिए जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करूँगी.....।’’

      इतना कहते हुए सीता कोमल हाथों से अपने काले- काले केश उखाड़कर राम के सम्मुख डाल देती हैं। उन केशों को देख रामचन्द्र धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं और मूर्च्छित हो जाते हैं। जब तक रामचन्द्र सचेत हों तब तक सीता शीघ्र ही उद्यान में जाकर सकलभूषण केवली यहाँ पृथ्वीमती आर्यिका के पास दीक्षा ले लेती हैं।

      इधर रामचन्द्र शीतोपचार से जब होश में आते हैं तब वे मोह और शोक में पागल हो बकने लगते हैं -

      ‘‘ओह! मेरी प्राण वल्लभा सीता कहाँ गई? यदि उसे दीक्षा ही दिलाना था तो देवों ने ऐसा उसका प्रातिहार्य क्यों किया? मैं देखता हूँ उसे कौन ले जाता है? मैं देवों को भी अदेव कर दूँगा।’’

      उस समय लक्ष्मण उन्हें संभाल कर अनेक उपाय से सांत्वना दे रहे हैं। पुनः सभी लोग महेन्द्रोदय उद्यान में पहुँचते हैं। वहाँ सर्वभूषण केवली के समवसरण में प्रवेश कर शांत हो जाते हैंं। वंदना, पूजा, स्तुति करके सीता को भी नमस्कार कर सब अपने-अपने कोठे में बैठ जाते हैंं। तब ‘अभयनिनाद’ नामक महामुनि भगवान् से प्रश्न करते हैं -

      ‘‘हे भगवन्  ! संसार में यह जीव क्यों भ्रमण कर रहा है?’’

      ‘‘हे भव्यजीवों! संसार का मूल कारण मोह ही है जब तक यह जीव इसके वश में है तभी तक संसार है।’’

      इत्यादि प्रकार से दिव्य उपदेश सुनकर सभी लोग अपने-अपने भव-भवान्तर पूछते हैं। अनन्तर कृतांतवक्त्र सेनापति श्रीराम से कहता है -

      ‘हे नाथ! अब मैं इस अनादि संसार से निकलना चाहता हूँ। अतः मुझे दीक्षा के लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।’

      रामचन्द्र अनेक उपायों से भी जब उसे नहीं रोक पाते हैं। तब कहते हैं -

      ‘‘भद्र! यदि तुम इस जन्म से निर्वाण प्राप्त न कर सको और देव होवो तो जब कभी मैं संकट में होऊँ तो मुझे सम्बोधन अवश्य करना। यदि तुम मेरा किंचित भी उपकार मानते हो तो यह प्रतिज्ञा करो।’’

      ‘‘जैसी आपकी आज्ञा, मुझे यह सहर्ष स्वीकृत है।’’

      इतना कहने के बाद राम से आज्ञा प्राप्त कर वह सेनापति दिगम्बर मुनि हो जाता है। केवली भगवान् का विहार हो जाता है। तत्पश्चात् रामचन्द्र यथाक्रम से आर्यिकाओं की वंदना करते हुए सीता के समीप पहुँचते हैं तब उनका हृदय फटने लगता है वे बोलते हैं -

      ‘‘ओह! मेरी भुजाओं का आलिंगन प्राप्त करने वाली यह सीता इस कठोर आर्यिका व्रत को कैसे पालेगी? मेघ की गर्जना से भी डरकर जो मुझे चिपट जाती थी वह वनों में सिंह, व्याघ्र के भयंकर शब्द कैसे सुनेगी? नीरस आहार कैसे करेगी? और कंकरीली पृथ्वी पर कैसे सोयेगी? मैंने यह क्या किया? विवेक शून्य हो लोकापवाद के डर से मैंने ऐसी सती सीता को कैसे खो दिया?’’

      जैसे-तैसे अश्रु रोककर स्वाभाविक दृष्टि से सीता के पास जाकर भक्ति और स्नेह से युक्त हो ‘वंदामि’ कहकर नमस्कार करते हैं और कहते हैं -

      ‘‘हे भगवति! तुम धन्य हो, तुमने संसार समुद्र से पार होने के लिए जिन मार्ग का आश्रय ले लिया है। एक मैं हूँ जो मोह में फँसा हूँ । हे शान्ते! गार्हस्थ्य जीवन में मेरे द्वारा ज्ञात-अज्ञात में जो भी अपराध हुआ हो उसे क्षमा करो। हे मनस्विनि! इस समय मेरे विषाद युक्त मन को भी आप आनंदित कर रही हैं आप मेरे द्वारा भी पूज्यता को प्राप्त हो गई हैं।’’

      लक्ष्मण, लव-कुश आदि भी नमस्कार करते हैंं। वियोग के दुःख से व्याकुल हुए पुत्रों को आगे कर श्रीराम वापस अयोध्या में प्रवेश कर रहे हैं-उस समय प्रजा के लोग अनेक प्रकार से वार्तालाप कर रहे हैं -

      ‘‘हे भाई! सीता के बिना राम शोभा नहीं पा रहे हैं।’’

      ‘‘अरे! राम ने सीता को कैसे गंवा दिया?’’

      ‘‘ओह! सीता ने यह क्या किया? उसका ऐसा कठोर हृदय कैसे हो गया।’’

      ‘‘अरे! राम को ऐसी कठोर परीक्षा लेना उचित था क्या?’’

      ‘‘बहन! सर्वप्रथम राम को गर्भिणी हालत में उसे वन में नहीं भेजना था।’’

      ‘‘हाँ बहन! उसी समय इन्होंने ‘यह अग्नि परीक्षा’ क्यों नहीं ले ली थी?’’

      ‘‘इसी का नाम संसार है। अरे! जब सीता को पूर्व संचित कर्म भोगना ही था तो राम को भी उस समय ऐसी बुद्धि कैसे आती? क्या तुमने नहीं सुना? केवली भगवान् ने बताया है कि इस सीता के जीव ने पूर्व भव में किसी मुनि-आर्यिका को झूठा दोष लगाया था पुनः प्रायश्चित्त भी किया था किन्तु गुरु-निंदा का पाप बिना भोगे नहीं छूटता है।’’

      ‘‘हाँ, हाँ, बहन! इसलिए सती सीता को इस पर्याय मेंअपवाद का दुःख सहना पड़ा।’’

      ‘‘ओह! देखो! अपने दूध से पुष्ट किये इन लव-कुश को छोड़ कर सीता ने कैसे दीक्षा ले ली?’’

      ‘‘बहन! उसने बहुत ही अच्छा किया है स्त्री पर्याय से छूटने का एक यही उपाय है।’’

      सीता घोर तपश्चरण करते हुए अपने जीवन के बासठ वर्ष व्यतीत कर देती हैं। अंत में तैंतीस दिन की सल्लेखना लेकर मरण करके स्त्री पर्याय को छेदकर अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र हो जाती हैं। वहाँ पर वह इन्द्र आज भी दिव्य सुखों का अनुभव कर रहा है।