(२३) लक्ष्मण की मृत्यु

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लक्ष्मण की मृत्यु - राम का मोह

       देवों की सभा लगी हुई है। सौधर्म इन्द्र अपने सिंहासन पर आरूढ़ हैं। अर्हंतदेव की भक्ति का उपदेश दे रहे हैं। उपदेश के अनन्तर इन्द्र चिंता निमग्न हो सोच रहे हैं -

      ‘‘अहो! यहाँ की आयु पूर्ण कर मैं मनुष्य पर्याय कब प्राप्त करूँगा? तप के द्वारा कर्मों को नष्ट कर जिनदेव की गति को कब प्राप्त करूँगा?’’

      यह सुन एक देव बोलता है -

      ‘‘जब तक यह जी व स्वर्ग में रहता है तभी तक उसके ऐसे भाव होते हैं किन्तु जब मनुष्य पर्याय को पा ले ते हैं तो भोगों में निमग्न हो सब कुछ भूल जाते हैं। यदि विश्वास नहीं है तो ब्रह्मलोक से च्युत हुए श्री रामचन्द्र को क्यों नहीं देख लेते?’’

      तब इन्द्र कहते हैं -

      ‘‘सच में सभी बंधनों में स्नेह का बंधन अत्यन्त दृढ़ है। जो हाथ-पैरों से बँधा है वह तो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है किन्तु स्नेह बंधन से बँधा हुआ प्राणी मोक्ष नहीं प्राण देकर भी उनका कार्य करना चाहता है और पलभर भी जिसके दूर होने पर राम बेचैन हो उठते हैं। अहो! उन दोनों का स्नेह अपूर्व ही है।’’

      सभा विसर्जित हो जाती है। रत्नचूल और मृगचूल नाम के दो देव इन दोनों के स्नेह की परीक्षा के लिए अयोध्या आ जाते हैं। राम के भवन में दिव्य माया से रुदन मचा देते हैं और विक्रिया से बनाये हुए मंत्री पुरोहित आदि को लक्ष्मण के पास भेज देते हैंं वे वहाँ पहुँच कर कहते हैं -

      ‘‘हे नाथ! राम की मृत्यु हो गई।’’

      इतना सुनते ही लक्ष्मण के मुख से निकलता है -

      ‘‘हाय! यह क्या.....’’ इस अर्ध वाक्य के उच्चारण के साथ ही साथ वे सिंहासन पर बैठे ही बैठे प्राण रहित हो जाते हैं। सहसा लक्ष्मण की मृत्यु देख दोनों देव आश्चर्य और विषाद से युक्त हो चुपचाप अपने स्थान को चले जाते हैं। उधर लक्ष्मण की स्त्रियाँ आकर इस दुर्घटना से छाती पीट-पीट कर रोने लगती हैं। राम को समाचार मिलते ही वे वहाँ आ जाते हैं। वे लक्ष्मण को निश्चेष्ट देख रहे हैं यद्यपि लक्ष्मण में मृतक के चिह्न दिख रहे हैं फिर भी राम स्नेह से परिपूर्ण हो उन्हें जीवित ही समझ रहे हैं। उनका बार-बार आलिंगन करते हुए कहते हैं -

      ‘‘हे भाई! क्या कारण है? तुम क्यों ऐसे हो रहे हो, बोलो - बोलो, मेरे से वार्तालाप करो, बोलो तुम्हें किसने सताया है?’’

      लक्ष्मण की ऐसी दशा देख राम बार-बार मूर्च्छित हो जाते हैं। वैद्यों के द्वारा परीक्षा हो जाने पर भी वे उसे मृतक नहीं मान रहे हैंं। मोह और शोक में पागल हो रोते हैं, विलाप करते हैं और तो क्या उस मृत शरीर को नहलाते हैं, वस्त्र पहनाते हैं और भोजन खिलाने की कोशिश करते हैं। इस दृश्य को देख अति दुःखी हो लव - कुश अनेक उपाय से पिता को समझाने का पुरुषार्थ करते हैं। अंत में असफल हो जाते हैं तब विरक्तमना हुए पिता को नमस्कार कर वन में जाकर अमृतस्वर महामुनि के समीप दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं।

      राम पुत्रों की दीक्षा का समाचार सुनकर अतीव दुःखी हुए लक्ष्मण से कहते हैं -

      ‘‘हे लक्ष्मण! जल्दी उठो, चलो चलें, जब तक लव- कुश दीक्षा नहीं ले लेते हैं उन्हें समझाकर वापस ले आवें।....’’

      ‘‘हे भाई! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?’’ कुछ क्षण बाद कहते हैं -

      ‘‘देख! अब मैं अकेला हूँ तू मुझे जल्दी से अपने मन की बात बता दे।’’

      समाचार को प्राप्त करते ही विभीषण आदि राजा आकर समझाते हैं -

      ‘‘प्रभो! यह मृतक शरीर है इसे छोड़ो, इसका दाह संस्कार करो।’’

      राम कहते हैं -

      ‘‘अरे दुष्टों! तुम मेरे प्यारे भाई को मरा समझ रहे हो? जावो, जावो।’’ पुनः आप स्वयं भाई को कंधे पर ले कर वन में चले जाते हैं। सभी विद्याधर किंकर्तव्यविमू़ढ हैं कि क्या करना चाहिए? श्री राम की इस पागल जैसी स्थिति में एक दिन कम ६ मही ने व्यतीत हो जाते हैं। तब अकस्मात् आसन के कम्पित होने से दो देव स्वर्ग से वहाँ आते हैं और वे विपरीत क्रियायें प्रारंभ करते हैं। एक देव मनुष्य के वेष में सूखे वृक्ष को सींच रहा है, दूसरा दो मृतक बैलों के कंधों पर हल रखकर पत्थर पर बीज बोने का प्रयत्न करने लगता है। पुनः एक मनुष्य मटकी में जल डालकर मथने लगता है तो दूसरा घानी में रेत डालकर पेलना शुरू कर दे ता है।

      तब राम कहते हैं -

      ‘‘अरे मूर्खों ! इस सूखे ठूँठ को क्यों सींच रहे हो? अहो! इन मृतक बैलों पर हल रखने से क्या होगा? पत्थर पर बीज उगेंगे क्या? कहीं पानी से मक्खन निकलता है? अरे बालक, बालू से कहीं तेल निकलता है?’’ तब वे कहते हैं -

      ‘‘हे नाथ! आप भी तो मृतक कलेवर को लिए घूम रहे हो।’’ राम कुपित होकर कहते हैं -

      ‘‘अरे, अरे! तुम पुरुषोत्तम लक्ष्मण को मृतक क्यों कह रहे हो?’’

      राम आगे बढ़ जाते हैं तब एक देव अपने कंधे पर मृतक शरीर को लेकर उनके आगे-आगे हो लेता है। तब पुनः राम कहते हैं -

      ‘‘अरे रे! आप इस मुर्दे को कंधे पर क्यों रखे हुए हैं?’’

      तब वह वृद्ध कहता है -

      ‘‘आज आपको देखकर हम लोगों को बहुत ही प्रेम हो रहा है क्योंकि समान में ही प्रेम होता है। स्वामिन्! हम सब पिशाचों के आप सर्वप्रथम मनोनीत महाराजा हैं।’’

      इन वचनों के निमित्त से राम का मोह शिथिल हो जाता है और वे सोचने लगते हैं -

      ‘‘ओह! कहाँ मैं विद्वत् शिरोमणि राम? और कहाँ मेरी यह चेष्टा? धिक्कार हो इस मोह को!’’

      राम के मोह को शिथिल हुआ देख दोनों देव अपने सुन्दर रूप में हो जाते हैं। तब राम पूछते हैं -

      ‘‘हे महानुभावों! आप कौन हैं?’’ दोनों परिचय देते हैं -

      ‘‘हे नाथ! हम जटायु पक्षी के जीव हैं और यह कृतांतवक्त्र सेनापति का जीव है। हे देव! इतने दिन से आप पर विपत्ति आई थी किन्तु हम अज्ञानियों को पता ही नहीं था। हे राम! जब आपकी विपत्ति का अन्त आ गया तब आपके कर्मोदय ने मुझे इस ओर ध्यान दिलाया है।’’

      ‘‘अहो भद्र पुरुषों! तुम दोनों ने इस समय मेरा बहुत बड़ा उपकार किया है।’’

      अनन्तर राम सर्व परिजनों के साथ सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण का दाह संस्कार कर देते हैं।