(२६) राम को केवलज्ञान व निर्वाण

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राम को केवलज्ञान व निर्वाण

      सीता का जीव प्रतीन्द्र अपने अवधिज्ञान से उन्हें देखकर स्नेह से आद्र्र हो वहाँ आता है और सोचता है कि ‘‘मैं इन्हें ध्यान से विचलित कर दूं तो ये मोक्ष न जाकर स्वर्ग में आ जावेंगे। यहाँ पर हमारे से मित्रता को प्राप्त होंगे। चिरकाल तक हम दोनों मेरु, नन्दीश्वर आदि की वंदना कर पुनः मत्र्यलोक में जन्म लेकर एक साथ निर्वाण प्राप्त करेंगे।’ ऐसा सोचकर वहाँ आकर अपना सीता का रूप बनाकर उन्हें विचलित करने के लिए अनेक उपाय करता है, अनेक स्त्रियों को बनाकर उनके द्वारा गीत, नृत्य, हाव-भाव का प्रदर्शन कराते हुए ध्यान में विघ्न डालना चाहता है किन्तु महामना राम सुमेरु के समान अचल हैं।

      वे ध्यान के प्रभाव से घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तब स्वर्ग में सौधर्म इन्द्र आदि के आसन कम्पित होते ही सब एक साथ वहाँ आ जाते हैं। आकाश में अधर समवसरण की रचना हो जाती है। श्रीराम केवली भगवान् उसमें कमलासन पर अन्तरिक्ष में विराजमान हैं। चारण ऋद्धिधारी मुनि आदि सभा में आ जाते हैं। बारह कोठों में सब यथा योग्य बैठ जाते हैं। उस समय यह सीता का जीव प्रतीन्द्र भी बार-बार नमस्कार कर प्रभु से अपने अपराध क्षमा करता हुआ प्रार्थना करता है -

      ‘हे नाथ! मुझ दुर्बुद्धि के द्वारा किया हुआ दोष क्षमा कीजिए, प्रसन्न होइये और मुझे भी कर्मों का अन्त प्रदान कीजिए।’’

      मुनिराज की दिव्यध्वनि खिरती है -

      ‘‘हे सुरेन्द्र! राग छोड़ो, वैराग्य से ही मुक्ति होती है और रागी मनुष्य संसार में डूब जाता है। जिस प्रकार कंठ में शिला को बांधकर नदी नहीं तिरी जा सकती है उसी प्रकार राग-स्नेह से संसार नहीं पार किया जा सकता है। जो गुरुओं के कहे अनुसार प्रवृत्ति करता है वही संसार का अंत कर सकता है।’’

      दिव्य उपदेश को सुनकर प्रतीन्द्र पूछता है -

      ‘‘भगवन् ! दशरथ आदि भव्य जीव कहाँ गये हैं? सभी मुझे बताओ।’’

      दिव्य वाणी खिरती हैै -

      ‘‘हे सुरेन्द्र! दशरथ आनत स्वर्ग में देव हुए हैं। कौशल्या आदि माताएं, जनक और कनक आनत स्वर्ग में ही देव हुए हैं। लव-कुश निर्वाण को प्राप्त करेंगे, भरत भी मोक्ष पधारेंगे और तुम्हारा भाई भामंडल उत्तर कुरु भोगभूमि में आर्य हुआ है। हनुमान, सुग्रीव आदि भी इसी भव में मोक्ष जायेंगे।

      ‘‘हे नाथ! मुझे निर्वाण की प्राप्ति कब होगी?’’

      ‘‘सीतेन्द्र! रावण और लक्ष्मण नरकधरा से निकलकर विदेह क्षेत्र मे भाई-भाई होंगे पुनः देव होकर राजपुत्र होंगे पुनः स्वर्ग जायेंगे। तू स्वर्ग से आकर भरत क्षेत्र में चक्ररत्न नाम का चक्रवर्ती होगा तब रावण-लक्ष्मण के जीव वहाँ से आकर इन्द्ररथ और मेघरथ नाम के तुम्हारे पुत्र होंगे। रावण का जीव तीर्थंकर होगा तब तुम अनुदिश से आकर उनके प्रथम गणधर होवोगे और निर्वाण को प्राप्त करोगे। पुष्कर द्वीप के विदेह क्षेत्र में लक्ष्मण का जीव तीर्थंकर और चक्रवर्ती होकर निर्वाण को प्राप्त करेगा। मैं भी आज से सात वर्ष के बाद निर्वाण धाम को प्राप्त करूँगा।’’

      आगामी भवों को सुनकर सीतेन्द्र बहुत ही प्रसन्न हो जाता है। वह पुनः तृतीय नरक में जाकर रावण और लक्ष्मण के जीव को देखता है। शंबूक असुरकुमार देव हुआ था सो वहाँ लक्ष्मण के विरुद्ध प्रेरणा दे देकर रावण को लड़ा रहा है। सीतेन्द्र कहता है -

      ‘‘रे रे पापी शंबूक! तू यह क्या कर रहा है? अरे देख! वैर का फल कितना कटु होता है? अब तो अधर्म को छोड़ और धर्म की शरण ले।’’ पुनः नारकियों को सम्बोधन करते हुए कहता है-

      ‘‘अरे नारकियों! धर्म के बिना तुम लोग यहाँ आये हो अतः अब पाप से डरो। जिनेन्द्रदेव के द्वारा कथित सम्यक्त्व को ग्रहण करो।’’

      रावण और लक्ष्मण के जीव पूछते हैं -

      ‘‘आप कौन हैं?’’ सीतेन्द्र कहता है -

      ‘‘मैं सीता का जीव प्रतीन्द्र हूँ। तुम्हें मैं यहाँ से निकालकर अभी ऊपर ले चलता हूँ।’’

      यह कहकर जैसे ही इन्द्र उन दोनों को उठाता है वे नवनीत के समान पिघल जाते हैं पुनः उनका शरीर बन जाता है। जब लाखों उपाय के बाद भी वह इन्द्र उन्हें ऊपर लाने के लिए समर्थ नहीं होता है तब कहता है -

      ‘‘हे भव्यों! अब यहाँ पर तुम सम्यक्त्व रत्न को ग्रहण करो वही तुम्हें उत्तम गति में ले जाने में समर्थ है। हम तो क्या साक्षात् जिनेन्द्र भी तुम्हें यहाँ से आयु पूरी हुए बगैर अन्यत्र ले जाने के लिए समर्थ नहीं हैं।’’

      दो नों नारकी सम्यक्त्व ग्रहण कर लेते हैं और कहते हैं -

      ‘‘हे देवेन्द्र! जाओ जाओ, तुम स्वर्गों के सुख का अनुभव करो। अब हमें श्री जिनेन्द्रदेव की ही शरण है जब हम यहाँ से निकलेंगे तब जिनदेव कथित धर्म को ही धारण करेंगे।’’

      उस समय सीतेन्द्र केवली भगवान् द्वारा कहे गये आगामीभवों को उन्हें सुना देता है और कहता है -

      ‘‘हे रावण! जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसका बलात् उपभोग नहीं करूँगा इस प्रतिज्ञा के निभाने से तूने मेरे साथ बलात्कार नहीं किया था इसी स्नेह से मैं आज यहाँ आकर तेरा हित करने में तत्पर हुआ हूँ।’’

      पुनः पुनः लक्ष्मण को सम्बोधन कर उसके गुणों का स्मरण करता हुआ वह देवेन्द्र अपने स्थान को चला जाता है।

      राम की आयु सत्रह हजार वर्ष की थी और शरीर की ऊँचाई ६४ हाथ प्रमाण थी। मुनि होने के बाद पच्चीस वर्ष पूर्ण होने पर वे योगों का निरोध करते हैं और अघातिया कर्मों का भी अंत करके शाश्वत सिद्धक्षेत्र को प्राप्त कर लेते हैं। वहाँ पर वे अनंत-अनंत काल तक परमानंदमय अव्याबाध सुख का अनुभव करते रहेंगे। भगवान् श्रीरामचन्द्र इस संसार में अब कभी भी पुनर्भव धारण नहीं करेंगे ऐसे महामना श्रीरामचन्द्र का मर्यादाशील आदर्श जीवन सभी पाठकजनों को मर्यादा पालन करने रूप आदर्श-जीवन की चिरकाल तक प्रेरणा देता रहेगा।