बीस तीर्थंकर स्तुति

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बीस तीर्थंकर स्तुति

-पंचचामर छंद-

जयो जयो जयो जिनेन्द्र इंद्रवृंद बोलते।

त्रिलोक में महागुरू सु आप नाम तोलते।।
सुधन्य धन्य धन्य आप साधुवृंद बोलते।
जिनेश आप भक्त ही तो निज किवाड़ खोलते।।१।।
समोसरण में आपके महा विभूतियाँ भरीं।
अनेक ऋद्धि सिद्धियाँ सुआप पास में खड़ीं।।
अनंत अंतरंग गुण समूह आप में भरे।
गणीन्द्र औ सुरेन्द्र चक्रि आप संस्तुती करें।।२।।
हरिन्मणी के पत्र पद्मराग के सुपुष्प हैं।
अशोक वृक्ष देखते समस्त शोक अस्त हैं।।
अनेक देववृंद पुष्पवृष्टि आप पे करें।
सुगंध वर्ण-वर्ण के सुमन खिले-खिले गिरें।।३।।
जिनेश आपकी ध्वनी अनक्षरी सुदिव्य है।
समस्त भव्य कर्ण में करें सुअर्थ व्यक्त हैं।।
न देशना कि चाह है न तालु ओंठ पुट हिलें।
असंख्य जीव के धुनी से चित्तपद्मिनी खिलें।।४।।
सुचामरों कि पंक्तियाँ ढुरें सुसूचना करें।
नमें तुम्हें सुभक्त वे हि ऊध्र्व में गमन करें।।
सुसिंह पीठ आपका अनेक रत्न से जड़ा।
विराजते सुआप हैं अत: महत्त्व है बढ़ा।।५।।
प्रभासुचक्र कोटि सूर्य से अधिक प्रभा धरे।
समस्त भव्य के उसी में सात भव दिखा करें।।
सुदेव दुंदुभी सदा गंभीर नाद को करें।
असंख्य जीव का सुचित्त खींच के वहाँ करें।।६।।
सफेद छत्र तीन जो जिनेश शीश पे फिरें।
प्रभो त्रिलोकनाथ आप सूचना यही करें।।
सुप्रातिहार्य आठ ये हि बाह्य की विभूतियाँ।
सुरेश ने रचे तथापि आप पुण्य राशियाँ।।७।।
प्रभो तुम्हीं महान मुक्ति वल्लभापती कहे।
प्रभो तुम्हीं प्रधान ईश सर्व विश्व के कहे।।
प्रभो तुम्हें सदा नमें सु भक्ति आप में धरें।

अनंतकाल तक वहीं अनंत सौख्य को भरें।।८।।

-गीता छंद-

मैं विहरमाण जिनेन्द्र बीसों, का सदा वंदन करूँ।

प्रभु भक्ति से निज के गुणों का, नित्य संवद्र्धन करूँ।।
इस लोक के सुख भोग कर, फिर सर्व कल्याणक वरूँ।
स्वयमेव केवल ‘‘ज्ञानमति’’ हो, मुक्ति लक्ष्मी वश करूँ।।९।।
तुम गुण सूत्र पिरोय स्रज, विविधवर्णमय फूल।

धरें कंठ उन ‘‘ज्ञानमति’’, लक्ष्मी हो अनुकुल।।१०।।