002.आद्य वक्तव्य

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आद्य वक्तव्य

षट्खंडागम ग्रंथ की सिद्धांतचिन्तामणिटीका
—गणिनी आर्यिका ज्ञानमती
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षट्खंडागम सूत्र ग्रंथ का एवं उसकी धवला टीका का स्वाध्याय मैंने कई बार किया उसमें बहुत से ऐसे सैद्धान्तिक और गणित के प्रकरण हैं जो कि अतीव क्लिष्ट हैं उन विषयों में मेरी भी प्रगति नहीं है। इसी हेतु से कई बार मन में आया कि इस महान् सूत्रग्रंथ की धवला टीका के जो सरल अंश हैं उन्हें उद्धृत करके अल्पज्ञानी-साधु-साध्वियों व प्रबुद्ध श्रावकों के लिए भी षट्खंडागम का ज्ञान कराया जावे। तथा च अपने ज्ञान के क्षयोपशम को भी वृद्धिंगत किया जाये। यह भावना वर्षों से चल रही थी कि इसी मध्य आर्यिका चंदनामती ने भी प्रार्थना की कि—‘‘माताजी! अब आप षट्खण्डागम ग्रंथ पर कुछ कार्य कीजिए।’’ उनके आग्रह से भावना और बलवती हुई। इसी के फलस्वरूप मैंने अपने ६२वें जन्मदिवस पर जबकि जम्बूद्वीप का द्वितीय बार पंचवर्षीय महामहोत्सव हस्तिनापुर में मनाया जा रहा था और भगवान श्री शांतिनाथ का सुमेरु पर्वत की पांडुकशिला पर १००८ कलशों से महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम चल रहा था। उसी समय षट्खंडागम के प्रथमखंड की सिद्धांतचिन्तामणि नाम की टीका लिखने का भाव बनाया और उसी दिन आश्विन शुक्ला १५, शरदपूर्णिमा दिनाँक-८-१०-१९९५ को प्रात: ११.२५ पर मंगलाचरण लिखकर टीका लिखने का सूत्रपात किया।

ॐ नम: सिद्धेभ्य:

षट्खण्डागम:
अस्यान्तर्गत:
जीवस्थान-नाम-प्रथमखण्डागम:
अस्यापि प्रथम प्रकरण-सत्प्ररूपणाया:
सिद्धांतचिन्तामणिनामधेया टीका
मंगलाचरणम्
सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य, सर्वांस्त्रैलोक्यमूद्र्धगान्।
इष्ट: सर्वक्रियान्तेऽसौ, शान्तीशो हृदि धार्यते।।१।।

तीन लोक के मस्तक पर विराजमान ऐसे सर्वसिद्धों को सिद्धि के लिए नमस्कार करके जो सम्पूर्ण क्रियाओं के अंत में इष्ट हैं ऐसे शांतिनाथ भगवान को हम हृदय में धारण करते हैं। अर्थात् मुनियों की अष्टमी पर्व, नंदीश्वर पर्व आदि क्रियाओं के अंत में शांतिभक्ति का पाठ किया जाता है और श्रावकों की भी नित्य-नैमित्तिक पूजाओं के अंत में शांतिपाठ पढ़ा जाता है। इस प्रकार शांतिनाथ भगवान् की भक्ति मुनि और श्रावक की भक्ति-पूजा क्रियाओं के अंत में पढ़ी जाती है ऐेसे शान्तिनाथ भगवान को यहाँ टीका के प्रारंभ में हृदय में विराजमान किया गया है।

अनंतर तीन काल के अनंत अर्हंतों को, चौबीस तीर्थंकरों को और सीमंधर स्वामी आदि बीस तीर्थंकरों को नमस्कार करके भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान ऐसे चार-चार कल्याणकों से पवित्र हस्तिनापुर तीर्थ को नमस्कार किया है। पुन: अठारह महाभाषा और सात सौ लघु भाषा से समन्वित ऐसी द्वादशांगमयी श्रुतदेवी को हृदय में अवतरित किया है।

युग की आदि में हुए श्री ऋषभसेन गणधर गुरु से लेकर पंचम काल के अंत में हुए श्रीवीरांगज मुनि को नमस्कार किया है कि जिनके प्रसाद से आज तक भी सिद्धांतज्ञान दिख रहा है। इसके बाद श्रीपुष्पदंताचार्य को और श्रीभूतबलि को नमस्कार किया है कि जिन्होेंने ‘षट्खंडागम ग्रंथ’ को इस भूतल पर अवतीर्ण किया है—लिखा है। पुन: श्रीवीरसेन स्वामी के उपकार का स्मरण किया है कि जिन्होंने इस षट्खंडागम ग्रंथ की ‘धवला’ नामकी टीका लिखकर भव्यजीवों के अंत:करण को उज्ज्वल कर दिया है।

इस बीसवीं शताब्दी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागरजी उनके प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागर आचार्य को नमस्कार करके ‘मेरे आर्यिका दीक्षा के गुरु ‘ज्ञानमती’ नाम देने वाले श्री वीरसागर जी आचार्य है’ ऐसा ध्वनित किया है। पुन: युग की आदि में हुर्इं ब्राह्मी-आर्यिका जो कि प्रथम गणिनी थीं उनसे लेकर पंचमकाल के अंत में होने वाली ‘सर्वश्री’ आर्यिका तक सभी आर्यिकाओं को ‘वंदामि’ करके ग्यारह अंग की पाठी ऐसी ‘सुलोचना’ संयतिका—आर्यिका की वंदना की है।

पुन: षट्खण्डागम नाम के सिद्धांतग्रंथ को भक्तिपूर्वक बार-बार नमस्कार करके इनमें से प्रथमखंड की टीका लिखने की प्रतिज्ञा की गई है। उस प्रथमखंड में भी जो प्रथम अंश सत्प्ररूपणा है उसकी टीका लिखने में कहा है कि इसमें मैंने धवला टीका के अंशों को निकाल-निकाल कर अपने में ज्ञान ऋद्धि को प्रगट करने के लिए इस टीका को सरल बना दिया है। अर्थात् धवला टीका के सरल-सरल अंशों को मैं इसमें उद्धृत करूँगी ऐसा स्पष्ट किया है।

अनंतर मैंने ‘चंदनामती’ आर्यिका को ‘‘ज्ञानवृद्धिं क्रियात्’’ ऐसा आशीर्वाद दिया है कि वर्तमान में जिनकी प्रार्थना से मैंने यह टीका लिखना प्रारंभ किया है। पुन: मैंने प्रार्थना की है—

शारदे! तिष्ठ मच्चित्ते, यावन्न पूर्णमायुयात्।

प्रारब्धकार्यमेतद्धि, तावच्छत्तिंकं च देहि मे।।

हे शारद मात:! आप मेरे हृदय में तब तक विराजमान रहो कि जब तक प्रारंभ किया गया मेरा यह लेखन कार्य पूर्ण न हो जावे और तब तक मुझे शक्ति भी प्रदान करो।

अनंतर-सत्रहवें काव्य को लिखा है—

इन्द्रवज्रा छंद—

सिद्धान्तचिंतामणिनामधेया, सिद्धांतबोधामृतदानदक्षा।
टीका भवेत्स्वात्मपरात्मनो हि, कैवल्यलब्ध्यै खलु बीजभूता।।१७।।

यह जो ‘सिद्धांतचिंतामणि’ नामकी टीका है वह सिद्धांतज्ञानरूपी अमृत को देने में कुशल है, यह टीका अपनी आत्मा में और अन्य पाठकों की आत्मा में केवलज्ञान को उत्पन्न करने के लिए बीजभूत होवे ऐसी प्रार्थना की गई है।

यहाँ तक १७ काव्यों में इस टीका का मंगलाचरण किया गया है। इसके अनंतर टीका लिखने में भूमिका लिखी है—

‘अथ सर्वेषां अंग-पूर्वाणामेकदेशज्ञानवत: श्रुतज्ञानस्याविच्छिन्नतां चिकीर्षो: महाकारुणिकस्य भगवत: श्रीधरसेनाचार्यस्य मुखकमलादधीत्य सिद्धांतज्ञौ श्रीपुष्पदंत-भूतबलि-आचार्यौ.........।’

सम्पूर्ण अंग और पूर्वों के एकदेशज्ञाता, श्रुतज्ञान को अविच्छिन्न बनाने की इच्छा रखने वाले महाकारुणिक भगवान श्रीधरसेनाचार्य हुए हैं उनके मुखकमल से पढ़कर सिद्धांतज्ञानी श्रीपुष्पदंत और श्रीभूतबलि आचार्य हुए हैं। उन्होंने ‘अग्रायणीय पूर्व’ नामक द्वितीय पूर्व के ‘चयनलब्धि’ नामक पाँचवी वस्तु के ‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’ नामक चौथे अधिकार से निकले हुए जिनागम को छह खण्डों में विभाजित करके ‘षट्खंडागम’ यह सार्थक नाम देकर सिद्धांतसूत्रों को लिपिबद्ध किया है।

छह खण्ड के नाम—

१. जीवस्थान

२. क्षुद्रकबंध

३. बंधस्वामित्वविचय

४. वेदना खण्ड

५. वर्गणाखण्ड और

६. महाबंध ये नाम हैं।

इनमें से पाँच खण्डों में कुल छह हजार आठ सौ इकतालीस (६८४१) सूत्र हैं और छठे खण्ड में तीन हजार सूत्र हैं। वर्तमान में मुद्रित—छपी हुई सोलह पुस्तकों में पाँच खण्ड माने गये हैंं। उनके सूत्रों की गणना छह हजार आठ सौ इकतालीस है (६८४१)।

पाँच खण्डों में विभाजित सूत्र संख्या—प्रथम खंड में दो हजार तीन सौ पचहत्तर सूत्र हैं (२३७५)। दूसरे खंड में पंद्रह सौ चौरानवे (१५९४)। तृतीय खंड में तीन सौ चौबीस (३२४)। चतुर्थ खण्ड में पंद्रह सौ पच्चीस (१५२५)। पाँचवें खण्ड में एक हजार तेईस (१०२३)। सूत्र हैं।

मुद्रित सोलह पुस्तकों में पाँच खंडों का विभाजन—छपी हुई प्रथम से लेकर छह पुस्तकों तक प्रथम खंड है। सातवीं पुस्तक में द्वितीय खण्ड है। आठवीं पुस्तक में तृतीय खण्ड है। नवमी से लेकर बारहवीं पुस्तकों तक चार पुस्तकों में चतुर्थ खण्ड है और तेरहवीं पुस्तक से लेकर सोलहवीं तक चार पुस्तकों में पाँचवां खण्ड है।

प्रथम खण्ड के विषय—प्रथम खण्ड में आठ अनियोगद्वार हैं एवं अंत में एक चूलिका अधिकार है इस चूलिका में भी नव भेद हैं।

आठ अनियोगद्वार के नाम—

१. सत्प्ररूपणा

२. द्रव्यप्रमाणानुगम

३. क्षेत्रानुगम

४. स्पर्शनानुगम

५. कालानुगम

६. अन्तरानुगम

७. भावानुगम

८. अल्पबहुत्वानुगम।

चूलिका के नाम भेद—

१. प्रकृतिसमुत्कीर्तन चूलिका,

२. स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका,

३. प्रथममहादण्डक,

४. द्वितीयमहादण्डक,

५. तृतीय महादण्डक,

६. उत्कृष्टस्थितिबंध,

७. जघन्यस्थितिबंध,

८. सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका और

९. गत्यागती चूलिका।

मुद्रित छह पुस्तकों में यह प्रथम खण्ड विभाजित है—प्रथम पुस्तक मेें सत्प्ररूपणा है, द्वितीय पुस्तक में आलाप अधिकार नाम से इसी सत्प्ररूपणा का विस्तार है। तृतीत पुस्तक में द्रव्यप्रमाणानुगम है। चतुर्थ पुस्तक में क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम और कालानुगम का वर्णन है। पंचम पुस्तक में अंतरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम हैं। छठी पुस्तक में नौ चूलिकायें हैं।

सिद्धांतचिंतामणि टीका—

मैंने आश्विन शुक्ला पूर्णिमा, ८ अक्टूबर १९९५ को मंगलाचरण लिखकर इस षट्खंडागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में भी प्रथम अवयवभूत सत्प्ररूपणा की टीका लिखने का संकल्प किया। इस टीका में ४ पेज तक ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय और सूत्र संख्या द्वारा भूमिका बनाई। पुनश्च आगे महामंत्र जो कि अपराजित णमोकार मंत्र है और इस ‘षट्खंडागम’ ग्रंथ का मंगलाचरण है उसे लिखकर उसकी व्याख्या लिखना शुरू किया।

यह मेरे द्वारा लिखी जा रही टीका का आधार श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा विरचित धवला टीका ही प्रमुख है। इस टीका के सरल अंशों को भी अपनी भाषा में सरल करने का प्रयास किया गया है तथा अन्य अनेक ग्रंथों के उदाहरण भी लिये गये हैं। इसमें णमोकार मंत्र के अक्षर, पद, मात्रा आदि का वर्णन करके यह द्वादशांग का सारभूत है ऐसा भी अन्य ग्रंथों के आधार से सिद्ध किया है। इस मंगलाचरण में नाम, स्थापना आदि निक्षेप भी घटित किये हैं। यह मंत्र अनादिनिधन है ऐसा भी अन्य ग्रंथ के आधार से प्रगट किया है।

पुन: ग्रंथ के लिए निमित्त, हेतु, कर्ता आदि का सुंदर विवेचन है। इसमें भगवान महावीर स्वामी को अर्थकर्ता सिद्ध करके भगवान की दिव्य-ध्वनि से प्रगट ग्यारह अंग, चौदह पूर्वों के नाम व संक्षिप्त लक्षण दिये गये हैं। ग्रंथकर्ता श्री गौतम स्वामी नाम से प्रसिद्ध जो कि इन्द्रभूति प्रथम गणधर हुए हैं उनका भी वर्णन है।

अनंतर श्रुतदेवी का भी लक्षण प्रतिष्ठा ग्रंथ आदि के आधार से दिया है। इसके बाद श्रुतावतार की अर्थात् षट्खंडागम के उत्पत्ति की कथा संक्षेप में दी गई है। जो कि इस प्रकार है—

सौराष्ट्र देश में ऊर्जयंतपर्वत के पास गिरिनगर की चन्द्रगुफा में निवास करने वाले अष्टांगमहानिमित्त पारंगत श्री धरसेनाचार्य ने एक बार मन में चिंतन किया कि ‘‘आगे अंग श्रुतज्ञान का विच्छेद हो जायेगा।’’ अत: किसी भी उपाय से उस अंग श्रुतज्ञान की रक्षा का प्रयत्न करना चाहिए। उसी समय पंचवर्षीय साधु सम्मेलन में सम्मिलित दक्षिणदेशवासी आचार्यों के पास में एक पत्र भेजा। उस लेख को पढ़कर उन आचार्यों ने दो योग्य मुनि उस आन्ध्र देश से सौराष्ट्रदेश में भेजा। इन आचार्य धरसेन को अग्रायणीयपूर्व की पंचम वस्तु के चतुर्थ महाकर्म प्रकृतिप्राभृत का ज्ञान था। इन्होंने अपनी आयु अल्प जानकर दो मुनि अपने पास भेजने के लिए पत्र लिखा था और एक ब्रह्मचारी के हाथ भेजा था।

जब ये दोनों मुनि वहाँ पहुँचने वाले थे तभी आचार्यप्रवर श्रीधरसेन जी को पिछली रात्रि में स्वप्न हुआ कि दो शुभ्र वृषभ मेरी तीन प्रदक्षिणा देकर मेरे चरणों में नमन कर रहे हैं। यद्यपि स्वप्न का फल योग्य शिष्यों का मिलना समझ चुके थे फिर भी उन दोनों के आने के बाद उनकी परीक्षा के लिए गुरुदेव ने दोनों को एक-एक विद्यायें देकर भगवान नेमिनाथ की सिद्धभूमि पर बैठकर विद्या सिद्ध करने का आदेश दिया। गुरु की आज्ञा से वे दोनों विद्या सिद्ध करने हेतु मंत्र जपने लगे। जब विद्या सिद्ध हो गई तब उनके सामने दो देवियाँ प्रगट हो गर्इं। उनमें से एक देवी कानी थी और दूसरी देवी के बड़े-बड़े दाँत थे। इन दोनों मुनियों ने चिंतन किया कि देवियों के ये वास्तविक रूप नहीं हैं कुछ न कुछ हमारे मंत्रों में दोष हैं।

चिंतन करके मंत्र के व्याकरण शास्त्र से दोनों ने मंत्र शुद्ध किए। एक मुनि के मंत्र में एक अक्षर कम था और दूसरे मुनि के मंत्र में एक अक्षर अधिक था। तब उन दोनों मुनियों ने मंत्र शुद्ध करके जपना प्रारंभ किया। अनंतर सुंदर वेषभूषा में वे दोनों देवियाँ अपने सुंदर रूप में प्रगट हुर्इं और कहा—

‘‘आज्ञा दीजिये! क्या करना है ?’’

तभी दोनों मुनियों ने कहा—हमें आपसे कोई भी कार्य नहीं है। केवल गुरु की आज्ञा से हमने ये मंत्र जपे हैं। तब वे देवियाँ अंतर्हित हो गर्इं। इन दोनों ने जाकर गुरुवर्य श्री धरसेनाचार्य को सारा वृतान्त सुना दिया।

आचार्य श्री प्रसन्न हुए और इन दोनों मुनियों को शुभ मुहूर्त में श्रुत विद्या का अध्ययन कराना प्रारंभ कर दिया। इन्होेंने विनयपूर्वक गुरु से श्रुतज्ञान प्राप्त कर लिया। तब श्री धरसेनाचार्य ने अपनी आयु को अल्प जान इन दोनों का विहार करा दिया। ये दोनों महासाधु देवों द्वारा पूजा को प्राप्त होकर गुरु की आज्ञा से वहाँ से चलकर ‘अंकलेश्वर’ ग्राम में आये और वहीं चातुर्मास स्थापित किया।

तदनंतर बड़े मुनि श्री पुष्पदंताचार्य अपने भानजे जिनपालित को साथ लेकर उन्हें मुनि बनाकर ‘वनवास’ नाम के देश को चले गये और भूतबलि नाम के दूसरे आचार्य तमिल देश को चले गये। श्री पुष्पदंताचार्य ने जिनपालित मुनि को सत्प्ररूपणा के एक सौ सतहत्तर सूत्रों को लिखकर पढ़ाये और उन्हें देकर भूतबलि आचार्य के पास भेज दिया। इन्होंने भी अपने सहपाठी गुरु भाई पुष्पदंताचार्य के अभिप्राय को जानकर और उनकी आयु भी अल्प जानकर विचार किया कि—‘महाकर्मप्रकृतिप्राभृत’ श्रुतज्ञान की परम्परा चलती रहे इसका अंत न हो जाये ‘‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ को आदि लेकर षट्खंडागम ग्रंथ की रचना पूरी की और ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन इस ग्रंथ की चतुर्विध संघ ने पूजा की थी तभी से श्रुतपंचमी पर्व चला आ रहा है। ये पुष्पदंत और भूतबलि दोनों आचार्य इस षट्खंडागम ग्रंथ के कत्र्ता माने गये हैं।

इस ग्रंथ के सत्प्ररूपणा के एक सौ सतहत्तर सूत्र जो कि षट्खंडागम पुस्तक प्रथम में छपे हैं वे श्री पुष्पदंताचार्य द्वारा विरचित है और शेष सभी सूत्र मुद्रित तीसरी पुस्तक से लेकर महाबंध तक श्री भूतबलि आचार्य द्वारा विरचित हैं। छपी हुई दूसरी पुस्तक में सूत्र नहीं हैं केवल सत्प्ररूपणा से संदर्भित आलाप अधिकार है जो कि धवला टीकाकार श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा विरचित है।

षट्खंडागम की टीकायें—

पुनश्च इस षट्खंडागम ग्रंथ पर छह टीकायें लिखी गर्इं हैं। उनके नाम—श्रीकुन्दकुन्ददेव ने तीन खंडों पर टीका लिखी, जिसका नाम ‘परिकर्म’ था यह १२००० श्लोकप्रमाण थी। श्रीशामकुंडाचार्य ने ‘पद्धति’ नाम से टीका लिखी जो संस्कृत, प्राकृत और कन्नड़ मिश्र थी ये पाँच खण्डों पर थी और १२००० श्लोकप्रमाण थी। श्री तुम्बुलूर आचार्य ने ‘चूड़ामणि’ नाम से टीका लिखी। छठा खण्ड छोड़कर षट्खंडागम और कषायप्राभृत दोनों सिद्धान्त ग्रंथों पर यह ८४००० श्लोक प्रमाण थी। श्री समंतभद्र स्वामी ने संस्कृत में पाँच खण्डों पर ४८००० श्लोक प्रमाण टीका लिखी। श्री वप्पदेव सूरि ने ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’ नाम से टीका पाँच खण्डों पर और कषायप्राभृत पर लिखी यह ६०००० श्लोकप्रमाण थी। यह प्राकृत में थी। पुन: श्रीवीरसेन आचार्य ने छहों खण्डों पर प्राकृत-संस्कृत मिश्र ‘धवला’ नाम से टीका लिखी, यह ७२००० श्लोकप्रमाण है।

वर्तमान में ऊपर कही हुई पाँच टीकायें उलपब्ध नहीं हैं, मात्र श्रीवीरसेनाचार्य कृत ‘धवला’ टीका ही उपलब्ध है जिसका कि हिन्दी अनुवाद होकर छप चुका है। इस ग्रंथ को ताड़पत्र से लिखा कर और हिन्दी अनुवाद कराकर छपवाने का श्रेय चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज को है उनकी कृपा प्रसाद से हम सभी इस ग्रंथ के मर्म को समझने में सफल हुए हैं। पुन: ‘जीवस्थान’ नाम के इस प्रथम खण्ड में जो आठ अनियोगद्वार और नव चूलिकायें हैं वे कहाँ-कहाँ से निकली हैं इसका उपसंहार किया है।

जीवस्थान के विषय का उपसंहार—

द्वादशांग में बारहवाँ अंग दृष्टिवाद नाम का है। इसके पाँच भेदों में पूर्वगत नाम से चौथा भेद है। उन चौदह पूर्वों में अग्रायणीय नाम से दूसरा पूर्व है। इस अग्रायणीय पूर्व के चौदह अर्थाधिकार हैं। उनमें से ‘चयनलब्धि’ नाम से पाँचवी वस्तु यहाँ ग्रहण की गई है। इस चयनलब्धि के भी बीस अधिकार हैं। इन्हें ‘प्राभृत’ भी कहते हैं। इनमें चौथा भेद ‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’ है। इस प्राभृत के चौबीस अर्थाधिकारों में ‘बंधन’ नाम का छठा अधिकार है। इस ‘बंधन’ अधिकार के चार भेदों में से यहाँ पर बंधक और बंधविधान ये अधिकार ग्रहण किये गये हैं। इस बंध के ग्यारह अनियोग द्वारों में से ‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ नाम से पाँचवाँ अनियोगद्वार यहाँ लिया गया है। आगे बंधविधान के भेद-प्रभेदों से भावानुगम आदि अनियोग द्वार लिये गये हैं।

इस प्रकार इस ‘जीवस्थान’ नाम के प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अंतरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम ये आठ अनियोग द्वार हैं और नव चूलिकायें हैं।

मैंने सरल संस्कृत भाषा में यह ‘सिद्धांतचिंतामणि’ नाम की टीका लिखी है। मात्र ४८ पेज तक हस्तिनापुर में टीका लिखी थी कि अकस्मात् माँगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की ओर विहार करने का निर्णय कर दिया। मन में कुछ दु:ख हुआ कि मेरा यह महान ज्ञानवर्धन का कार्य मार्ग में वैâसे होगा? कब होगा? और क्या होगा? किन्तु आज मुझे स्वयं आश्चर्य हो रहा है कि—

मगसिर शु. षष्ठी, वीर सं. २५२२, दि. २७-११-१९९५ को मैंने हस्तिनापुर से मंगलविहार किया और अगले दिन २८-११-१९९५ को मवाना में ही प्रात: टीका लिखना प्रारंभ किया। मार्ग में भी कभी प्रात: कभी सायं मेरी लिखाई चलती रही है कभी-कभी विशेष प्रभावना के कार्यों से लिखाई बंद हुई है। प्रथम सत्प्ररूपणा अधिकार की टीका मैंने पिड़ावा (राजस्थान) में पूर्ण की है।

यहाँ सोलहों पुस्तकों के लेखन व समापन की तिथियाँ प्रस्तुत की जा रही हैं, जिसे पढ़कर आप स्वयं समझ सकेगे कि कौन सा ग्रंथ कब लिखा गया है तथा इस चार्ट से आपको यह भी ज्ञात हो जायेगा कि धवला टीका वाले षट्खण्डागम ग्रंथ एवं मेरे द्वारा लिखित सिद्धांतचिंतामणि टीका समन्वित षट्खण्डागम ग्रंथों में विषय विभाजन का अंतर किस प्रकार से है—


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इस प्रकार मैंने षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड की छह पुस्तकों की टीका अपनी कर्मभूमि तीर्थक्षेत्र हस्तिनापुर में प्रारंभ करके यात्रा के मध्य में अपनी दीक्षाभूमि माधोराजपुरा (राजस्थान) में लगभग अठारह मास में पूर्ण की है। मुझे प्रसन्नता तो हुई है साथ ही आश्चर्य भी हुआ है कि यह लगभग ९०० पेज की संस्कृत टीका कैसे लिखी गई है। इसे मैं सरस्वती देवी की विशेष कृपा ही समझती हूँ।

इसके बाद भी मेरा लेखन निरन्तर जारी रहा और ४ अप्रैल सन् २००७ (वैशाख कृ. दूज) को अपने ५२वें आर्यिका दीक्षा दिवस पर पूरे सोलह ग्रंथों के ६८४१ सूत्रों की संस्कृत टीका ३१०७ पृष्ठों में लिखकर पूर्ण की और हृदय में असीम आल्हाद का अनुभव किया।

मार्ग के विहार में टीका लिखने में मुझे बहुत ही नििंश्चतता रही है। जहाँ भी जैन समाज के ग्राम या शहर आये प्रवेश करके सभा का कार्यक्रम रखा गया, अधिकांश स्थानों पर पहुँचते ही मंगलाचरण के पश्चात् मैं कोई नयी योजना देती, आर्यिका चंदनामती जी शीघ्र ही अपने प्रवचन में उस पर प्रकाश डालतीं और क्षुल्लक मोतीसागर जी तत्क्षण ही समाज के दो-तीन वरिष्ठ व्यक्तियों से परामर्श करके न्यौछावर राशि निर्धारित करके घोषणा करते थे और तभी दस, पंद्रह मिनटों में योजना सफल हो जाती और मध्यान्ह में शिलान्यास कराकर संघ का विहार हो जाता। इसी बीच मैं सभा में भी अपना लेखन-कार्य करती रहती थी।

सभा संचालन एवं नूतन योजना को मूर्तरूप देने के कार्य में मुझे कुछ चिन्ता नहीं करनी पड़ती। यही कारण है कि मेरी टीका का कार्य अल्प समय में निर्विघ्न सम्पन्न हुआ है। इसीलिए आर्यिका चंदनामती और क्षुल्लक मोतीसागर को मेरा बहुत-बहुत मंगल आशीर्वाद है चूँकि उनका इस लेखन कार्य में बहुत ही बड़ा सहयोग रहा है।

साथ ही संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहनें आगे का सर्वे करके मेरे पहुँचने से पहले ही मेरे बस्ते को लेकर आगे पहुँच जातीं और मेरे पहुँचते ही मुझे लिखने का सामान दे देतीं इससे मेरा समय व्यर्थ नहीं जाता था। इसीलिए उन संघस्थ ब्र.कु.बीना, कु. आस्था आदि को भी बहुत-बहुत आशीर्वाद है।


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