002.जयपुर (खानिया) चातुर्मास सन् १९५६-५७

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जयपुर (खानिया) चातुर्मास सन् १९५६-५७

समाहित विषयवस्तु

१. माधोराजपुरा से विहार-जयपुर जैन नगर।

२. जयपुर में चातुर्मास।

३. चूलगिरि में साध्वी संघ में अध्यापन।

४. स्वयं भी न्याय-साहित्य का अध्ययन।

५. चातुर्मास अनंतर सम्पूर्ण नगर उपकृत हुआ।

६. ज्ञानार्णव पर सुंदर संस्कृत टीका लिखी।

७. खानिया चातुर्मास-१९५७

८. गुरु आदेश से लघु संघ बनाकर विहार।

९. गुरु अस्वस्थता श्रवणकर जयपुर आगमन।

१०. गुरु वियोग-शिवसागर जी आचार्य बने।

काव्य पद

जल का एक नाम है जीवन, जीवन है चलने का नाम।

प्रतिपल आगे बढ़ते रहना, है असली जीवन पहचान।।
रुकने से जीवन मर जाता, बढ़ने से आती है जान।
इसीलिये जल-जीवन दोनों, सदा-सतत रहते गतिमान।।३०४।।

साधुचरण जीवन प्रतीक है, रुकने का नहिं लेते नाम।
आज यहाँ तो कल वहाँ है, सुबह यहाँ होती वहाँ शाम।।
सकल जिनालय करी वंदना, श्रीजिनवर को किया नमन।
आचार्य श्रीवीरसागर संघ, पूर्व क्षेत्र तज किया गमन।।३०५।।

माधोराजपुरा से चलकर, आचार्य संघ जयपुर आया।
जयपुर निकट क्षेत्र चूलगिरि, सबके मन अतिशय भाया।।
आचार्यश्री से किया निवेदन, जयपुर जैन समाज सकल।
चातुर्मास प्रवास यहीं कर, करें हमारा जन्म सफल।।३०६।।

चिंतन किया संघ अनुरूपी, सब सुविधायें प्राप्त यहाँ।
जिज्ञासु-विद्वान् गुणीजन, नर-नारी उपलब्ध यहाँ।।
सुंदर मंदिर, जिनप्रतिमायें, रम्य प्रकृति की गोद यहाँ।
ज्ञान-ध्यान-तप-साधन करने, है सब कुछ उपयुक्त यहाँ।।३०७।।

जयपुर जैन नगर की जनता, किया निवेदन बार हजार।
श्रीफल अरपे चरण कमल में, खोले पूर्ण हृदय के द्वार।।
तब बोले आचार्यश्री यों, तुम्हें लगी है सच्ची प्यास।
अत: तुम्हें आशीष हमारा, यहीं पै होगा चतुर्मास।।३०८।।

श्री आर्यिका ज्ञानमती का, आचार्य संघ सह हुआ गमन।
धर्मप्रचार कर नगर-ग्राम में, पहुँचीं चूलगिरि प्रांगण।।
पुष्प जहाँ पर भी जाता है, हो जाता सुरभित वातास।
ज्ञानमती का तीव्र क्षयोपशम, हर मन भरता ज्ञानप्रकाश।।३०९।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती यहाँ, साध्वी संघ किया पाठन।
गोम्मटसार, न्याय दीपिका, परीक्षा मुख का अध्यापन।।
इनकी सुंदर पाठन शैली, लख हर्षित आचार्यश्री।
प्रमुदित मन सब से कहते थे, नव सूरज आभा बिखरी।।३१०।।

पंडित लालाराम शास्त्री, अति विनम्र, अतिशय विद्वान्।
पंडितजी श्री खूबचंद जी, को था प्रखर न्याय का ज्ञान।।
आचार्यश्री से प्राप्त अनुज्ञा, मिला उभय-वात्सल्य उदार।
चरित चन्द्रप्रभ, प्रमेय कमल का, ज्ञानमती पाया उपहार।।३११।।

आचार्यश्री वीरसागर के, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित।
अनुशासित संयम चर्चा ने, चुरा लिया जयपुर का चित्त।।
चातुर्मास हुआ निष्ठापित, चूलगिरी को किया नमन।
नगर जिनालय वंदन करने, सकल संघ ने किया गमन।।३१२।।

नगर गुलाबी जयपुरवासी, फूले नहीं समाये थे।
झूम-झूम कर नाचे गाये, रोम-रोम हर्षाये थे।।
बहुतों के नयनों से प्रकटी, स्वच्छ-शुभ्र-मोती-माला।
अहो भाग्य है, पुण्योदय जो, मिला हमें अवसर आला।।३१३।।

सज्जित हुए गली चौराहे, चौक, अल्पना, वंदनवार।
हर जिनमंदिर, जिनप्रतिमा को, किये संघ ने नमन हजार।।
जिस कॉलानी या कि नगर में, आचार्य संघ के पड़ें चरण।
वहाँ-वहाँ अमृत वर्षा से, आया था असमय श्रावण।।३१४।।

जहाँ-जहाँ संघ पधराता, बढ़ जाता था आकर्षण।
भीड़ उमड़ पड़ती थी करने, नई आर्यिका के दर्शन।।
सुदर्शनीय व्यक्तित्व आपका, नवदीक्षा, अल्पायु रही।
लेकिन चर्या, ज्ञान-ध्यानमय, आगम के अनुकूल रही।।३१५।।

आचार्यश्री शुभचंद्र रचित है, श्री ज्ञानार्णव नामक ग्रंथ।
द्वादशानुप्रेक्षा का वर्णन, किया सुटीका गुरु निग्र्रंथ।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती को, अतिशय भाया वह वर्णन।
संस्कृत टीका लिखी आपने, अर्पित की गुरुराज चरण।।३१६।।

गुरुवर बोले अति सुंदर, यह प्रथम प्रयास तुम्हारा है।
ज्ञान सूर्य बनकर के चमको, शुभ आशीष हमारा है।।
हर श्रावक को मिला सु-अवसर, आचार्यसंघ देना आहार।
उपदेशामृत पान किया सब, वैयावृत्ति मिला उपहार।।३१७।।

नगर जिनालय वंदन करके, जयपुर हुआ विराजित संघ।
लूण्यापाण्या के जिनमंदिर, मुनि प्रवास का रहा प्रसंग।।
फिर खजांची की नशिया में, हुये महत्तम आयोजन।
सिद्धचक्र मंडल विधान की, हुई महोत्सव-सह पूजन।।३१८।।

सन् उन्नीस सत्तावन में भी, हुआ खानिया चातुर्मास।
जैन समाज जयपुर के उर में, छाया अतिशय हर्ष हुलास।।
गुरुवर की पावन छाया में, चउविध संघ विराज रहा।
चातुर्मास में ज्ञानमती के, ज्ञान का वहाँ प्रकाश रहा।।३१९।।

आचार्यश्री महावीर कीर्तिजी, संघ सहित पधराये यहाँ।
जो सौभाग्य मिला जयपुर को, औरों को उपलब्ध कहाँ।।
उभय संघ सानिध्य प्रदान कर, ज्ञानमती मन कुंज खिले।।
स्वाध्याय जिज्ञासा तृप्ति, के अवसर पर्याप्त मिले।।३२०।।

तदनतर आचार्यश्री ने, किया प्रभावना का सुविचार।
आदेश दिया तब साधु-साध्वी, संघ बनाकर करें विहार।।
आस-पास के नगर-गाँव जा, धर्म-आचरण-उपदेशैं।
अपने चिन्तन चर्या द्वारा, आर्षमार्ग को संपोषैं।।३२१।।

शिरोधार्य करके गुरु आज्ञा, ज्ञानमती जी किया विहार।
बगरू-झाग-मोजमा-चोरु, किया संघ-सह धर्मप्रचार।।
साधु-साध्वी कर अध्यापन, किया ज्ञान का उद्योतन।
पुन: गुरु अस्वस्थ जानकर, वापस जयपुर किया गमन।।३२२।।

चातुर्मासिक मध्यकाल ही, गुरुवियोग अवसर आया।
आचार्यश्री वीरसागर ने, देवलोक में पद पाया।।
आश्विन वदी अमावस्या को, समाधिपूर्ण हुआ अवसान।
श्री मुनिवर शिवसागर जी को, आचार्यपट्ट कर दिया प्रदान।।३२३।।

लख वियोग आचार्यश्री का, सकल संघ में छाया शोक।
पर विचार कर वस्तु तत्त्व को, सब क्रमश: हो गये विशोक।।
आना-जाना जीवन का क्रम, यह तो यात्रा है अनबार।
अब प्रसंग को छोड़ यहीं पर, चलें तीर्थराज गिरनार।।३२४।।