01.धर्मोपदेशामृत-

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धर्मोपदेशामृत

प्रथम ही धर्म कितने प्रकार का है इस बात को बतलाते हैं।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

धर्मो जीवदया गृहस्थशमिनोर्भेदाद्द्विधा च त्रयं रत्नानां परमं तथा दशविधोत्कृष्टक्षमादिस्तत:।
मोहोद्भूतविकल्पजालरहिता वागङ्गसङ्गोज्झिता शुद्धानन्दमयात्मन: परिणतिर्धर्माख्यया गीयते।।७।।

अर्थ— समस्त जीवों पर दया करना इसी का नाम धर्म है अथवा एकदेश गृहस्थ का धर्म तथा सर्वदेश मुनियों का धर्म इस प्रकार उस धर्म के दो भी भेद हैं अथवा उत्कृष्ट रत्नत्रय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र ही धर्म है अथवा उत्तमक्षमा मार्दव आर्जव आदिक दश प्रकार भी धर्म है अथवा मोह से उत्पन्न हुवे समस्त विकल्पोंकर रहित तथा जिसको वचन से निरूपण नहीं कर सकते ऐसी जो शुद्ध तथा आनन्दमय आत्मा की परिणति उसी का नाम उत्कृष्ट धर्म है इस प्रकार सामान्यतया धर्म का लक्षण तथा भेद इस श्लोक में बतलाये गये हैं।।७।।

अब आचार्य चार श्लोकों में दया धर्म का वर्णन करते हैं।

आद्या सद्व्रतसञ्चयस्य जननी सौख्यस्य सत्सम्पदां मूलं धर्मतरोरनश्वरपदारोहैकनि:श्रेणिका।
कार्या सद्भिरिहाङ्गिषु प्रथमतो नित्यं दया धार्मिकै: धिङ्नामाऽप्यदयस्य तस्य च परं सर्वत्र शून्या दिश:।।८।।

अर्थ—जो समस्त उत्तम व्रतों के समूह में मुख्य है तथा सच्चे सुख और श्रेष्ठ संपदाओं की उत्पन्न करने वाली है और जो धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है (अर्थात् जिस प्रकार जड़ बिना वृक्ष नहीं ठहरता उस ही प्रकार दया बिना धर्म भी नहीं ठहर सकता) तथा जो मोक्षरूपी महल के अग्रभाग में चढ़ने के लिये सीढ़ी के समान है ऐसी धर्मात्मा पुरूषों को ‘‘समस्त प्राणियों पर दया’’ अवश्य करनी चाहिये किन्तु जिस पुरूष के चित्त में लेशमात्र भी दया नहीं है उस पुरूष के लिये धिक्कार है तथा समस्त दिशा उसके लिये शून्य है अर्थात् जो निर्दयी है उसका कोई भी मित्र नहीं होता।

संसारे भ्रमितश्चिरं तनुभृत: के के न पित्रादयो जातास्तद्वधमाश्रितेन खलु ते सर्वे भवन्त्याहता:।
नन्वात्मापि हतो यदत्र निहतो जन्मान्तरेऽपि ध्रुवं हन्तारं प्रतिहन्ति हन्त बहुश: संस्कारतो ना क्रुध:।।९।।

अर्थ—चिरकाल से संसार में भ्रमण करते हुवे इस दीन प्राणी के कौन—कौन माता पिता भाई आदिक नहीं हुवे ? अर्थात् सर्व ही हो चुके इसलिये यदि कोई प्राणी किसी जीव को मारे तो समझना चाहिये कि उसने अपने कुटुम्बी को ही मारा तथा अपनी आत्मा का भी उसने घात क्योंकि यह नियम है जो मनुष्य किसी दीन प्राणी को एक बार मारता है उस समय उसे मरे हुवे जीव के क्रोधादि की उत्पत्ति होती है तथा जन्मान्तर में उसका संस्कार बैठा रहता है इसलिये जिससमय कारण पाकर उस मृतप्राणी का संस्कार प्रकट हो जाता है उस समय वह हिंसक को (अर्थात् पूर्वभव में अपने मारने वाले जीव को) अनेक बार मारता है इसलिये ऐसे दुष्ट fहंसक के लिये धिक्कार हो।।९।।

त्रैलोक्यप्रभुभावतोऽपि सहजोऽप्येकं निजं जीवितं प्रेयस्तेन विना स कस्य भवितेत्याकांक्षत: प्राणिन:।
नि:शेषव्रतशीलनिर्मलगुणाधारात्ततो निश्चितं जन्तोर्जीवितदानतस्त्रिभुवने सर्वप्रदानं लघु।।१०।।

अर्थ—यदि किसी दरिद्री से भी यह बात कही जावे कि भाई तू अपने प्राण दे दे तथा तीन लोक की संपदा ले ले तब वह यही कहता है कि मैं ही मर जाऊंगा तो उस संपदा को कौन भोगेगा अत: तीनलोक की संपदा से भी प्राणियों को अपने प्राण प्यारे हैं। इसलिये समस्त व्रत तथा शीलादि निर्मलगुणों का स्थानभूत जो यह प्राणी का जीवितदान है उसकी अपेक्षा संसार में सर्वदान छोटे हैं यह बात भलीभांति निश्चित है।

भावार्थ—आहार, औषधि, अभय तथा शास्त्र इस प्रकार दान के चार भेद हैं उन सबमें अभयदान सबसे उत्कृष्ट दान माना गया है तथा अभयदान उस ही समय पल सकता है जब किसी जीव के प्राण न दुखाये जाये इसलिये इस उत्तम अभयदान के आकांक्षी मनुष्यों को किसी भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए।।१०।।


शार्दूलविक्रीडित छन्द

स्वर्गायाऽव्रतिनोेऽपि सार्द्र्मनस: श्रेयस्करी केवला सर्वप्राणिदया तया तु रहित: पापस्तपस्थोऽपि च।
तद्दानं बहु दीयतां तपसि वा चेत: स्थिरं धीयतां ध्यानञ्च क्रियतां जना न सफलं किञ्चिद्दयार्विजतम्।।११।।

अर्थ—चाहे मनुष्य अव्रती—व्रतरहित क्यों न होवे यदि उसका चित्त समस्त प्राणियों के प्राणों को किसी प्रकार दु:ख न पहुँचाना रूप दया से भीगा हुआ है तो समझना चाहिये कि उस पुरुष को वह दया स्वर्ग तथा मोक्षरूप कल्याण को देने वाली है किन्तु यदि किसी पुरुष के हृदय में दया का अंश न हो तो चाहे वह केसा भी तपस्वी क्यों न होवे तथा वह चाहे इच्छानुसार ही दान क्यों न देता हो अथवा वह कितना भी तप में चित्त को क्यों न स्थिर करता हो तथा वह कैसा भी ध्यानी क्यों न हो पापी ही समझा जाता है क्योंकि दयारहित कोई भी कार्य सफल नहीं होता।।११।।

अब आचार्य श्रावकधर्म का वर्णन करते हैं—

सन्त: सर्वसुरासुरेन्द्रमहितं मुक्ते: परं कारणं रत्नानां दधति त्रयं त्रिभुवनप्रद्योति काये सति।
वृत्तिस्तस्य यदन्नत: परमया भक्त्र्यािपताज्जायते तेषां सद्गृहमेधिनां गुणवतां धर्मो न कस्य प्रिय:।।१२।।

अर्थ—जिस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररुपी रत्नत्रय की समस्त सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र भक्ति से पूजन करते हैं तथा जो मोक्ष का उत्कृष्ट कारण है अर्थात् जिसके बिना कदापि मुक्ति नहीं हो सकती तथा जो तीन लोक का प्रकाश करने वाला है ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रय को देह की स्थिरता रहते—सन्ते ही मुनिगण धारण करते हैं तथा श्रद्धा, तुष्टि आदि गुणों कर संयुक्त गृहस्थियों के द्वारा भक्ति से दिये हुए दान से उन उत्तम मुनियों के शरीर की स्थिति रहती है इसलिये ऐसे गृहस्थों का धर्म किसको प्रिय नहीं है अर्थात् सब ही उसको प्रिय मानते हैं।।१२।।


स्रग्धरा छन्द


आराध्यन्ते जिनेन्द्रा गुरुषु च विनतिर्धार्मिकैः प्रीतिरुच्चै: पात्रेभ्यो दानमापन्निहतजनकृते तच्च कारुण्यबुद्धया।
तत्त्वाभ्यास: स्वकीयव्रतिरतिरमलं दर्शनं यत्र पूज्यं तद्गार्हस्थ्यं बुधानामितरदिह पुनर्द:खदो पोहपाश:।।१३।।

अर्थ—तथा जिस गृहस्थाश्रम में जिनेन्द्र भगवान की पूजा उपासना की जाती है तथा निग्र्रन्थगुरुओं की भक्ति सेवा आदि की जाती है और जिस गृहस्थाश्रम में धर्मात्मापुरुषों का परस्पर में स्नेह से वर्ताव होता है तथा मुनि आदि उत्तमादिपात्रों को दान दिया जाता है तथा दु:खी दरिद्रियों को जिस गृहस्थाश्रम में करुणा से दान दिया जाता है और जहाँ पर निरन्तर जीवादि तत्व का अभ्यास होता रहता है तथा अपने-अपने व्रतों में प्रीति रहती है और जिस गृहस्थाश्रम में निर्मल सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है वह गृहस्थाश्रम विद्वानों के द्वारा पूजनीक होता है किन्तु उससे विपरीत इस संसार में केवल दु:ख का देने वाला है तथा मोह का जाल है।।१३।।

अब आचार्य श्रावकों की ग्यारह प्रतिमाओं के नाम बताते हैं—

आदौ दर्शनमुन्नतं व्रतमित: सामायिकं प्रोषध्स्त्यागश्चैव सचित्तवस्तुनि दिवाभत्त तथा ब्रह्म च।
नारम्भो न परिग्रहोऽननुमतिर्नोद्दिष्टमेकादशस्थानानीति गृहिव्रते व्यसनितात्यागस्तदाद्य: स्मृत:।।१४।।

अर्थ—सबसे पहले जीवादि पदार्थों में शंकादि दोष रहित श्रद्धानरूपसम्यग्दर्शन का जिसमें धारण होवे उसको दर्शन प्रतिमा कहते हैं तथा २. अहिंसादि पांच अणुव्रत तथा दिग्व्रतादि तीन गुणव्रत और देशावकाशिकादि चार शिक्षाव्रत इस प्रकार जिसमें बारहव्रत धारण किये जावे वह दूसरी व्रत प्रतिमा कहलाती है तथा ३. तीनों कालों में समता धारण करना सामायिक प्रतिमा है और ४. अष्टमी आदि चारों पर्वों में आरम्भ रहित उपवास करना चौथी प्रोषधप्रतिमा है तथा ५. जिस प्रतिमा में संचित वस्तुओं का भोग न किया जाय उसको सचितत्याग नामक पांचवीं प्रतिमा कहते हैं। तथा ६. जिस प्रतिमा के धारण करने से आजन्म स्वस्त्री तथा परस्त्री दोनों का त्याग करना पड़ता है वह ब्रह्मचर्य नामक सातवीं प्रतिमा है तथा ८. किसी प्रकार धनादि का उपार्जन न करना आरम्भत्यागनामक आठवीं प्रतिमा है और ९. जिस प्रतिमा के धारण करते समय धनधान्य दासीदासादि का त्याग किया जाता है वह नवमी परिग्रहत्याग नामक प्रतिमा है तथा १०. घर के कामों में और व्यापार में (ऐसा करना चाहिये, ऐसा नहीं करना चाहिये) इत्यादि अनुमति का न देना अनुमति त्याग नामक दशमीप्रतिमा है तथा ग्यारहवींप्रतिमा उसको कहते हैं कि जहां पर अपने उद्देश्य से भोजन न किया गया हो ऐसे गृहस्थों के घर में मौन सहित भिक्षापूर्वक आहार करना —इस प्रकार ये ग्यारह व्रत (प्रतिमा) श्रावकों के हैं, इन सब व्रतों में भी प्रथम सप्तव्यसनों का त्याग अवश्य कर देना चाहिये क्योंकि व्यसनों के बिना त्याग किये एक भी प्रतिमा धारण नहीं की जा सकती।।१४।।


शार्दूलविक्रीडित छन्द

यत्प्रोक्तं प्रतिमाभिरेभिरभितो विस्तारिभि: सूरिभिज्र्ञातव्यं तदुपासकाध्ययनतो गेहिव्रतं विस्तरात् ।
तत्रापि व्यसनोज्झनं यदि तदप्यासूत्र्यतेऽत्रैवयत्तन्मूल: सकल: सतां व्रतविधिर्याति प्रतिष्ठां पराम् ।।१५।।

अर्थ—समन्तभद्र आदि बड़े—बड़े आचार्यों ने ग्यारह प्रतिमा तथा और भी गृहस्थों के व्रत अत्यन्त विस्तार के साथ अपने—२ ग्रन्थों में वर्णन किये हैं इसलिये उपासकाध्ययन से इनका स्वरूप विस्तार से जानना चाहिये और उन्हीं आचार्यों ने जूआ खेलना-१ मद्यपीना-२ मांस खाना-३ आदि सातों व्यसनों का भली भांति स्वरूप दिखाकर उनके त्याग की अच्छी तरह विधि बतलाई है तथा इस ग्रन्थ में भी उन सप्तव्यसनों के त्याग का वर्णन किया जायगा क्योंकि सप्तव्यसनों के त्याग से ही सज्जनों की व्रतविधि अत्यन्त प्रतिष्ठा को प्राप्त करती है बिना व्यसनों के त्याग के नहीं ।।१५।।


अनुष्टुप छन्द


द्यूतमांससुरावेश्याखेटचौर्यपराङ्गना:।
महापापानि सप्तेति व्यसनानि त्यजेद्बुध:।।१६।।

अर्थ—१. जूआ खेलना, २. मांस खाना, ३. मद्य पीना, ४. वेश्या के साथ उपभोग करना, ५. शिकार खेलना , ६. चोरी करना, ७. परस्त्री का सेवन करना— ये सात व्यसनों के नाम हैं तथा विद्वानों को इन व्यसनों का त्याग अवश्य करना चाहिये।।१६।।

आचार्य सप्तव्यसनों से उत्पन्न हुई हानि तथा सप्तव्यसनों के स्वरूप को पृथक् —२ वर्णन करते हैं । प्रथम ही दो श्लोकों में द्यूतनामक व्यसन का निषेध करते हैं।


मालिनी छन्द


भुवनमिदमकीर्तेश्चौर्यवेश्यादिसर्वव्यसनपतिरशेषापन्निधि: पापबीजम् ।
विषमनरकमार्गेष्वग्रयायीति मत्वा क इह विशदबुद्धिर्दयूतमङ्गीकरोति।।७।।

अर्थ—जो समस्त अपकीर्तिओं का घर है अर्थात् जिसके खेलने से संसार में अकीर्ति ही फैलती है तथा जो चोरी वेश्यागमन आदि बचे हुवे व्यसनो का स्वामी है (अर्थात् जिस प्रकार राजा के आधीन मंत्री आदि हुआ करते हैं उस ही प्रकार जूआ के आधीन समस्त बचे हुवे व्यसन हैं) और जो समस्त आपत्तियों का घर है तथा जिसके संबन्ध से निरंतर पाप की ही उत्पत्ति होती रहती है तथा जो समस्त नरकादिखोटी गतियों का मार्ग बतलाने वाला है ऐसे सर्वथा निकृष्ट जूआ नामक व्यसन को कौन बुद्धिमान अंगीकार कर सकता है ? अर्थात् कोई नहीं।।१७।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द


क्वाकीर्ति: क्व दरिद्रता क्व विपद: क्व क्रोधलोभादयश्चौर्यादिव्यसनं क्व व क्व नरके दु:खं मृतानां नृणाम् ।
चेतश्चेद् गुरूमोहतो न रमते द्यूते वदन्त्युन्नतप्रज्ञा यद्भुवि दुर्नयेषु निखिलष्वेतद्धुरि स्मर्यते।।१८।।

अर्थ—इस जूआ के विषय में बड़े—२ गणधरादिकों का यह कथन है कि मोह के उदय में मनुष्य की जूआ में प्रवृत्ति होती है यदि मनुष्य के मोह के उपशम होने से जूआ में प्रवृत्ति न होवे तो कदापि संसार में इसकी अकीर्ति नहीं फैल सकती है और न यह दरिद्री ही बन सकता है तथा न इसको कोई प्रकार की विपत्ति घेर सकती है और इस मनुष्य के क्रोध लोभादि की भी उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती तथा चोरी आदि व्यसन भी इसका कुछ नहीं कर सकते और मरने पर यह नरकादि गतियों की वेदना का भी अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि समस्तव्यसनों में जूआ ही मुख्य कहा गया है इसलिये सज्जनों को इस जूवे से अपनी प्रवृत्ति को अवश्य हटा लेना चाहिये।।१८।। आगे दो श्लोकों में मांस व्यसन का निषेध किया जाता है।


स्त्रग्धरा छन्द


बीभत्सुप्राणिघातोद्भवमशुचि कृमिस्थानमश्लाघ्यमूलं हस्तेनाक्ष्णापि शक्यं यदिह न महतां स्पृष्टुमालोकितुंच।
तन्मांसं भक्ष्यमेतद्वचनमपि सतां गर्हितं यस्य साक्षात्पापं तस्यात्र पुंसो भुवि भवति कियत्कागतिर्वा न विद्म :।।

अर्थ—देखते ही जो मनुष्यों को प्रबल घृणा का उत्पन्न करने वाला है तथा जिसकी उत्पत्ति दीन प्राणियों के मारने पर होती है और जो अपवित्र है तथा नाना प्रकार के दृष्टिगोचर जीवों का जो स्थान है और जिसकी समस्त सज्जन पुरूष निन्दा करते हैं तथा जिसको इस संसार में सज्जनपुरूष न हाथ से ही छू सकते हैं और न आंख से ही देख सकते हैं और ‘‘मांस खाने योग्य होता है’’ यह वचन भी सज्जनों को प्रबल घृणा का उत्पन्न करने वाला है ऐसे सर्वथा अपावन मांस को साक्षात् खाता है आचार्य कहते हैं हम नहीं जान सकते उस मनुष्य के कितने पापों का संसार में संचय होता है! तथा उसकी कौन सी गति होती है।।१९।।


शिखरिणी छन्द


गतो ज्ञाते: कश्चिद्वहिरपि न यद्येति सहसा शिरो हत्वा हत्वा कलुषितमना रोदिति जन:।
परेषामुत्कृत्य प्रकटितमुखं खादति पलं कले रे निर्विण्णा वयमिह भवच्चित्रचरित्रै:।।२०।।

अर्थ—यदि कोई अपना भाई पिता पुत्र आदि दैवयोग से (मरना तो दूर रहे) बाहर भी चला जावे तथा वह जल्दी लौट कर न आवे तो मनुष्य शिरकूट—२ कर रोता है तथा नाना प्रकार के मन में बुरे भावों का चिंतवन करता है किन्तु अपने कुटुम्बियों से भिन्न दूसरे जीवों के मांस को उपाट—२ कर खाता है तथा लेशमात्र भी लज्जा नहीं करता इसलिये आचार्य कहते हैं कि अरे कलिकाल तेरे नानाप्रकार के चरित्रों से हम सर्वथा विरक्त हैं, अर्थात् तेरे चरित्रों का हमको पता नहीं लग सकता।।२०।।

अब आचार्य दो श्लोकों में मदिरा का निषेध करते हैं।

मालिनी छन्द

सकलपुरुषधर्मभ्रंशकार्यत्रजन्मन्यधिकमधिकमग्रे यत्परे दु:खहेतु: ।
तदपि यदि न मद्यं त्यज्यते बुद्धिमद्भि: स्वहितमिहकिमन्यत्कर्म धर्माय कार्यम् ।।२१।।

अर्थ—यह मदिरा इस जन्म में समस्त पीने वाले प्राणियों के धर्म को मूल से खोने वाली है तथा परलोक में अत्यन्त तीव्र नाना प्रकार के नरकों के दु:खों की देने वाली है ऐसा होने पर भी यदि विद्वान् मद पीना न छोड़ें तो समझ लेना चाहिये कि उन मनुष्यों के द्वारा अपने हितकारी धर्म के लिये कोई भी उत्कृष्ट कार्य नहीं बन सका क्योंकि व्यसनी कुछ भी उत्तम कार्य नहीं कर सकते ।।२१।।

आस्तामेतद्यदिह जननीं वल्लभां मन्यमाना निन्द्याश्रेष्टा विदधति जना निस्त्रपा: पीतमद्या:।।
तत्राधिक्यं पथि निपतिपा यत्किरत्सारमेयाद्वक्त्रे मूत्रं मधुरमधुरं भाषमाणा: पिवन्ति।।२२।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि मदिरा के पीने वाले मनुष्य यदि निर्लज्ज होकर अपनी माता को स्त्री मानें तथा उसके साथ नाना प्रकार की खोटी चेष्टा करें तो यह बात तो कुछ बात नहीं किन्तु सब से अधिक बात यह है कि मद्य के नशे में आकर जब मार्ग में गिर जाते हैं तथा जिस समय उनके मुख में कुत्ते मूतते हैं उसको मिष्ट—२ कहते हुवे तत्काल गटक जाते हैं।

भावार्थ—जो मनुष्य मद्यपान करते हैं वे समस्त खोटी चेष्टा करते हैं तथा उनकी बुरी हालत होती है और उनको किसी प्रकार हित का मार्ग भी नहीं सूझता इसलिये विद्वानों को इस निकृष्ट मद्य से जुदा ही रहना चाहिये।।२२।।

अब आचार्य दो श्लोकों में वेश्या व्यसन का निषेध करते हैं।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

या: खादन्ति पलं पिवन्ति च सुरां जल्पन्ति मिथ्यावच: स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम् ।
नीचानामपि दूरवक्रमनस: पापात्मिका: कुर्वते लालापानमहर्निशं न नरकं वेश्यां विहायापरम् ।।२३।।

अर्थ—जो सदा मांस खाती हैं तथा जो निरन्तर मद्यपान करती हैं और जिनको झूठ बोलने में अंशमात्र भी संकोच नहीं होता तथा जिनका स्नेह विषयी मनुष्यों के साथ केवल धन के लिये है और जो द्रव्य तथा प्रतिष्ठा को मूल से उड़ाने वाली हैं अर्थात् वेश्या के साथ संयोग करने से धन तथा प्रतिष्ठा दोनों किनारा कर जाते हैं तथा जिनके चित्त में सदा छल कपट दगाबाजी ही रहती है और अत्यन्त पापिनी हैं तथा जो धन के लाभ से अत्यन्त नीचधीवर चमार चाण्डाल आदि की लार का भी निरन्तर पान करती हैं ऐसी वेश्याओं से दूसरा नरक संसार में है । यह बात सर्वथा झूठ है। भावार्थ—वेश्या ही नरक है।।२३।।

रजकशिलासदृशीभि: कुक्कुरकर्परसमानचरिताभि:।
गणिकाभिर्यदि सङ्ग: कृतमिह परलोकवार्ताभि:।।२४।।

अर्थ—जो वेश्या धोबी की कपड़े पछीटने की शिला के समान है अर्थात् जिसप्रकार शिला पर समस्त प्रकार के कपड़े लाकर पछीटे जाते हैं उसही प्रकार इस वेश्या के साथ भी समस्त निकृष्ट से निकृष्ट जाति के मनुष्य आकर रमण करते हैं अथवा दूसरा इसका आशय यह भी है कि जिस प्रकार शिला पर समस्त प्रकार के कपड़ों के मैल का संचय होता है उस ही प्रकार वेश्यारूपी शिला पर भी नाना जातियों के मनुष्य के वीर्यरूपी मैल का समूह इकट्ठा होता है तथा जो वैश्या कुलाओं के लिए कपाल के समान है अर्थात् जिस प्रकार मरे हुये मनुष्य के कपाल पर लड़ते लड़ाते नाना प्रकार के कुत्ते इकट्ठे होते हैं उस ही प्रकार इस वेश्या पर भी नाना जातियों के मनुष्य आकर टूटते हैं तथा नाना प्रकार के परस्पर में कलह करते हैं इसलिये ऐसी निकृष्ट वेश्याओं के साथ यदि कोई पुरूष संबन्ध करे तो समझ लेना चाहिये कि उसका परलोक उत्तम हो चुका।

भावार्थ—जो मनुष्य वेश्याओं के साथ संबन्ध करते हैं उनके इहलोक तथा परलोक दोनों सर्वथा बिगड़ जाते हैं।।२४।।

अब आचार्य दो श्लोकों में शिकार व्यसन का निषेध करते हैं।

यादुर्देहैकवित्ता वनमधिवसति त्रातृसंबन्धहीना भीतिर्यस्या: स्वभावाद्दशनधृततृणा नापराधं करोति।
वध्यालं सापि यस्मिन्ननुमृगवनितामांसपिण्डस्यलोभादाखेटेऽस्मिन् रतानामिहकिमुनकिमन्यत्रनो यद्विरूपम् ।।

अर्थ—जिस बिचारीमृगी के सिवाय देह के दूसरा कोई धन नहीं है तथा जो सदा वन में ही भ्रमण करती रहती है और जिसका कोई भी रक्षा करने वाला नहीं है तथा जिसको स्वभाव से ही भय लगता है तथा जो केवल तृण की ही खाने वाली है और किसी का जो लेशमात्र भी अपराध नहीं करती ऐसी भी दीन मृगी को केवल मांस टुकड़े के लोभी तथा शिकार के प्रेमी, जो दुष्टपुरूष बिना कारण मारते हैं उनको इस लोक में तथा परलोक में नाना प्रकार के विरूद्ध कार्यों का सामना करना पड़ता है अर्थात् इस लोक में तों वे दुष्ट पुरूष रोग शोक आदि दु:खों का अनुभव करते हैं तथा परलोक में उनको नरक जाना पड़ता है।।२५।।


मालिनी छन्द

तनुरपि यदि लग्ना कीटिका स्याच्छरीरे भवति तरलचक्षुव्र्याकुलो य: स लोेक: ।
कथमिह मृगयाप्तानन्दमुत्खातशस्त्रो मृगमकृतविकारं ज्ञातदु:खोऽपि हन्ति।।२६।।

अर्थ—आचार्य महाराज कहते हैं कि जो मनुष्य शरीर से किसी प्रकार कीड़ी आदि के संबन्ध हो जाने से ही अधीर होकर जहां तहां देखने लग जाता है (अर्थात् उसको वह चिंउटी आदि का संबन्ध ही पीड़ा का पैदा करने वाला हो जाता है) तथा जो दु:ख का भली भांति जानने वाला है वह मनुष्य भी शिकार में आनन्द मानकर निरपराध दीनमृग को हथियार उठाकर मारता है? यह बड़ा आश्चर्य है।

भावार्थ—बिना जाने किसी कार्य करने में आश्चर्य नहीं किन्तु जो भलीभांति अपने तथा परके दु:ख को जानता है फिर ऐसा दुष्टकाम करता है उसके लिये आश्चर्य है।।२६।।


शार्दूलविक्रीडित छन्द

यो येनैव हत: स हन्ति बहुशो हन्त्येव यैर्वञ्चियतो नूनं वञ्चयते स तानपि भृशं जन्मान्तरेऽप्यत्र च।
स्त्रीवालादिजनादपि स्फुटमिदं शास्त्रादपि श्रूयते नित्यं वञ्चनहिंसनोज्झनविधौ लोका: कुतो मुह्यते ।।

अर्थ—स्त्री बालक आदि से तथा शास्त्र से जब यह बात भलीभांति मालूम है कि जो प्राणी इस जन्म में एक बार भी दूसरे प्राणी को मारता है वह दूसरे जन्म में उस मरे हुवे प्राणी से अनन्त बार मारा जाता है तथाा जो मनुष्य इस जन्म में एक बार भी दूसरे प्राणी को ठगता है वह दूसरे जन्म में अनन्तबार उसी पूर्वभव में ठगे हुवे प्राणी से ठगाया जाता है फिर भी हे लोक तू दूसरे के ठगने में तथा मारने में छोड़ने में रात-दिन लगा रहता है यह बड़े आश्चर्य की बात है इसलिए भव्य जीवों को चाहिये कि वे ऐसे अनर्थक करने वाले दूसरे के मारने ठगने में अपने चित्तको न लगावे।।२७।।

और भी आचार्य चोरी कपट करने का दोष दिखाते हैं।

अर्थादौ प्रचुरप्रपञ्चरनैर्ये वञ्चयन्ते परान्नूनं ते नरकं व्रजन्ति पुरत: पापिव्रजादन्यत: ।
प्राणा: प्राणिषु तन्निवन्धनतया तिष्ठन्ति नष्टे धने यावान् दु:खभरो नरे न मरणे तावानिह प्रायश:।।२८।।

अर्थ—जो दुष्टमनुष्य नाना प्रकार के छल कपट दगाबाजी से दूसरे मनुष्यों को धन आदि के लिये ठगते हैं उनको दूसरे पापीजनों से पहिले ही नरक जाना पड़ता है क्योंकि (धनं वै प्राणा:) इस नीति के अनुसार मनुष्यों के धन ही प्राण हैं, यदि किसी रीति से उनका धन नष्ट हो जावे तो उनको इतना प्रबल दु:ख होता है कि जितना उनको मरते समय भी नहीं होता इसलिये प्राणियों को चाहिये कि वे प्राणस्वरूप दूसरे के धन को कदापि हरण न करे तथा न हरण करने का प्रयत्न ही करे।।२८।। परस्त्री सेवन में क्या—२ हानि है इस बात को आचार्य दो श्लोकों में दिखाते हैं।

चिन्ताव्याकुलताभयारतिमतिभ्रंशोऽतिदाहभ्रमक्षुत्तृष्णाहतिरोगदु:खमरणान्येतान्यहो आसताम् ।
यान्यत्रैव पराङ्गनाहतमतेस्तद्भूरिदु:खं चिरं श्वभ्रे भावि यदग्निदीपितपुर्लोहाङ्गनालिङ्गनात् ।।२९।।

अर्थ—जो मनुष्य परस्त्री के सेवन करने वाले हैं उनको इसी लोक में जो चिंता, व्याकुलता, भय, द्वेष, बुद्धि का भ्रष्टपना, शरीर का दाह, भूख, प्यास,रोग, जन्ममरण आदिक दु:ख होते हैं। वे कोई अधिक दु:ख नहीं किन्तु जिस समय उन परस्त्रीसेवी मनुष्यों को नरक मेंं जाना पड़ता है तथा वहां पर जब उनको परस्त्री की जगह लोह की पुतली से आलिंगन करना पड़ता है उस समय उनको अधिक दु:ख होता है।

भावार्थ—जो मनुष्य परस्त्री के सेवी हैं उनको निरंतर अनेक प्रकार की चिंता लगी रहती है, तथा उस स्त्री से मैं कैसे मिलूं कैसे उसको प्रसन्न करूं इस प्रकार उनको निरंतर आकुलता भी रहती है, और कोई हमें संभोग करते देख न लेवे तथा कोई मार न देवे, इस प्रकार का उनको सदा भय भी लगा रहता है तथा परस्त्री सेवन करने वाले मनुष्य की किसी के साथ प्रीति भी नहीं होती सबके साथ द्वेष ही रहता है तथा परस्त्रीसेवन करने वाले मनुष्य की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है क्योंकि उसको माता, बहिन, पुत्री आदि का कुछ भी ध्यान नहीं रहता तथा जो मनुष्य परस्त्री के विलासी हैं उनका शरीर सदा कामज्वर से संतप्त रहता है तथा परस्त्री सेवी पुरूषों को भूख प्यास आदि नाना प्रकार के दु:ख भी आकर सताते हैं और उनको अनेक प्रकार के गर्मी आदि प्राणघातक रोगों का भी सामना करना पड़ता है तथा अनेक प्रकार के दु:ख भी उन्हें भोगने पड़ते हैं और अंत में वे मर भी जाते हैं। ये तो इस भव के दु:ख हैं किन्तु जिस समय वे परभव में नरक जाते हैं तथा जिस समय उनको गरम की हुई लोह की पुतली चिपका दिया जाता है तथा कहा जाता है कि जिस प्रकार तुमने पूर्वभव में परस्त्री के साथ संभोग किया था वैसा ही यह स्त्री है इसके साथ भी वैसा ही संभोग करो तब उनको और भी अधिक दु:ख होता है इसलिये उत्तमपुरूषों को चाहिये कि वे किसी भी परस्त्री के साथ संबंध न करें।।२९।। और भी आचार्य उपदेश देते हैं।


शार्दूलविक्रीडित छन्द

धिक्तं पौरूषमासतामनुचितास्ताबुद्धयस्तेगुणा माभून्मित्रसहायसम्पदपि सा तज्जन्म यातु क्षयम् ।
लोकानामिह येषु सत्सु भवति व्यामोहमुद्रांकितं स्वेप्नेऽपि स्थितिलङ्घनात्परधनस्त्रीषु प्रसक्तं मन:।।३०।।

अर्थ—जिन पौरूष आदि के होते सन्ते अपनी स्थिति को उल्लंघन कर मोह से स्वप्न में भी परस्त्री तथा पर धन में मनुष्यों का मन आसक्त हो जावे ऐसे उस पौरूष के लिये धिक्कार हो तथा वह अनुचित बुद्धि भी दूर रहो तथा वे गुण भी नहीं चाहिये और ऐसी मित्रों की सहायता तथा संपत्ति की भी आवश्यकता नहीं।

भावार्थ—जागृत अवस्था की तो क्या बात! जिन पौरूष आदि के होते संते मनुष्यों का चित्त स्वप्न भी यदि परस्त्री में आसक्त हो जावे तो, ऐसे पौरूष आदि की कोई आवश्यकता नहीं इसलिये भव्यजीवों को कदापि परस्त्री में चित्त नहीं लगाना चाहिये।।३०।। अब आचार्य इस बात को दिखाते हैं कि किन—२ को क्या—२ जूआ आदि खेलने से हानि उठानी पड़ी।

द्यूताद्धर्मसुत: पलादिह बको मद्याद्यदोर्नन्दनाश्चारु: कामुकया मृगान्तकतया स ब्रह्मदत्तो नृप: ।
चौर्यत्वांच्छिवभूतिरन्यवनितादोषाद्दशास्यो हठादेकैकव्यसनोद्धता इति जना: सर्वैर्नं को नश्यति।।३१।

अर्थ—जूआ से तो युधिष्ठिरनामक राजा राज्य से भ्रष्ट हुए तथा उनको नाना प्रकार के दु:ख उठाने पड़े तथा मांस भक्षण से वक नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ तथा अंत में नरक गया और मद्य पीने से यदुवंशी राजा के पुत्र नष्ट हुवे तथा वेश्याव्यसन के सेवन से चारूदत्त सेठि दरिद्रावस्था को प्राप्त हुवे तथा और भी नाना प्रकार के दु;खों का उनको सामना करना पड़ा और शिकार की लोलुपता से ब्रह्मदत्त नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुवा तथा उसे नरक जाना पड़ा। तथा चोरी व्यसन से सत्यघोषनामक पुरोहित गोबर खाना सर्वधनहरण हो जाना आदि नाना प्रकार के दु:खों को सहनकर अंत में मल्ल की मुष्टि से मरकर नरक को गया। तथा परस्त्री सेवन से रावण को अनेक दु:ख भोगने पड़े तथा मरकर नरक गया आचार्य कहते हैं कि एक—२ व्यसन के सेवन से जब इन मनुष्यों की ऐसी बुरी दशा हुई तथा ये नष्ट हुवे तब जो मनुष्य सातों व्यसनों का सेवन करने वाला है वह क्यों नहीं नष्ट होगा ? इसलिये भव्यजीवों को चाहिये कि वे किसी भी व्यसन के फन्दे में न पड़े।।३१।।

नपरमियन्ति भवन्ति व्यसनान्यपराण्यपि प्रभूतानि।
त्यक्तवा सत्पथमपथप्रवृत्तय: क्षुद्रबुद्धीनाम् ।।३२।।

अर्थ—आचार्य महाराज और भी उपदेश देते हैं कि जिन व्यसनों का ऊपर कथन किया गया है वे ही व्यसन हैं ऐसा नहीं समझना चाहिये किन्तु और भी व्यसन हैं वे यही हैं अल्पबुद्धी मिथ्यादृष्टियों की श्रेष्ठ मार्ग को छोड़कर निकृष्ट मार्ग में प्रवृत्ति हो जाना इसलिये जीवों को चाहिये कि वे व्यसनों की रक्षा के लिये निकृष्ट मार्गों में प्रवृत्ति न करें।।३२।।

और भी आचार्य व्यसनों का दोष दिखाकर निषेध करते हैं।

सर्वाणि व्यसनानि दुर्गतिपथा स्वर्गापवर्गार्गला वज्राणि व्रतपर्वतेषु विषमा: संसारिणां शत्रव:।
प्रारम्भे मधुरेषु पाककटुकेष्वेतेषु सद्धीधनै: कर्तव्या न मतिर्मनागपि हितं वाञ्छद्भिरत्रात्मन:।।३३।।

अर्थ—जिन मनुष्यों की बुद्धि निर्मल है तथा जो अपनी आत्मा का हित चाहते हैं उनको कदापि व्यसनों की ओर नहीं झुकना चाहिये क्योंकि ये समस्तव्यसन दुर्गति को ले जाने वाले हैं तथा स्वर्ग मोक्ष के प्रतिबंधक हैं और समस्तव्रतों के नाश करने वाले हैं तथा प्राणियों के ये परम शत्रु हैं तथा प्रारंभ में मधुर होने पर भी अंत में कटुक है इसलिये इनसे स्वप्न में भी हित की आशा नहीं होती।।३३।। आचार्य और भी उपदेश देते हैं।

मिथ्यादृशां विसदृशां च पथच्युतानां मायाविनां व्यसनिनां च खलात्मनां च।
सङ्गं विमुञ्चत बुधा: कुरुतोत्तमानां मतिर्यदि समुन्नतमार्ग एव ।।३४।।

अर्थ—हे भव्यजीवो यदि तुम उत्तममार्ग में जाने के लिये चाहते हो तो तुम कदापि मिथ्यादृष्टि विपरीत बुद्धि मार्गभ्रष्ट छली व्यसनी दुष्टजीवों के साथ संबंध मत करो यदि तुमको संबंध ही करना है तो उत्तम मनुष्यों के साथ ही संबंध करो।

भावार्थ—जैसी संगति की जाती है उसी प्रकार के फल की प्राप्ति होती है यदि तुम मिथ्यादृष्टि आदि दुष्ट पुरूषों के साथ संगति करोगे तो तुमको कदापि उत्तममार्ग आदि की प्राप्ति नहीं हो सकती। यदि तुम उत्तम मनुष्यों की संगति करोगे तो तुमको नाना प्रकार के गुणों की तथा उत्तममार्ग की प्राप्ति होगी इसलिये यदि तुम उत्तम मार्ग की प्राप्ति करना चाहते हो तो तुमको उत्तम मनुष्यों की ही संगति करना चाहिये।।३४।।

स्न्निग्धैरपि व्रजत मा सह सङ्गमेभि: क्षुद्रै: कदाचिदपि पश्यत सर्षपाणाम् ।
स्नेहोऽपि सङ्गतिकृत: खलताश्रितानां लोकस्य पातयति निश्चितमश्रु नेत्रात् ।।३५।।

अर्थ—यह नियम है कि दुष्टपुरूष जब अपना काम निकालना चाहते हैं तब मीठे वचनों से ही निकालते हैं किन्तु आचार्य इस बात का उपदेश देते हैं कि दुष्टपुरूष चाहे जैसे सरल तथा मिष्टवादी क्यों न हो तो भी उनके साथ कदापि सज्जनों को संबंध नहीं करना चाहिये क्योंकि इस बात को प्रत्यक्ष देखो कि जब सरसों खलरूप में परिणत हो जाती है उस समय उससे निकला हुवा तेल आंखों में लगाते ही मनुष्यों को अश्रुपात करा देता है।

भावार्थ—खल का अर्थ खल भी होता है तथा दुष्ट भी होता है उसी प्रकार स्नेह का अर्थ प्रीति भी होता है तथा तेल भी होता है । जब तक सरसों अपने रूप में रहती है तब तक वह किसी का कुछ भी बिगाड़ नहीं करती किन्तु जिस समय उसकी खलस्वरूप पर्याय पलट जाती है उस समय उससे उत्पन्न हुवा तेल आंखों में लगाते ही मनुष्यों को अश्रुपात करा देता है। उसी प्रकार जब तक मनुष्य सज्जन रहते हैं तब तक तो वे किसी का कुछ भी बिगाड़ नहीं करते किन्तु जिस समय वे दुष्ट हो जाते हैं उस समय उनसे उत्पन्न हुई प्रीति मनुष्यों को नाना प्रकार के दु:खों का अनुभव कराती है इसलिये सज्जनों को चाहिये कि वे किसी भी दुष्ट के साथ संबंध न करें।।३५।।

कलावेक: साधुर्भवति कथमप्यत्र भवने सचाघात: क्षुद्रै: कथमकरूणैर्जीवति चिरम् ।
अतिग्रीष्मे शुष्यत्सरसि विचरच्चञ्चुरतया वकोटानांग्रे तरलशफरी गच्छति कियत् ।।३६।।

अर्थ—जिस समय ग्रीष्मऋतु में तालाबों का पानी सूख जाता है उस समय पानी के अभाव से ही बिचारी मछलियां मर जाती है यदि दैवयोग से दश पांच बच भी रहें तो लंबी चोंचों के धारी बगले उनको बात की बात में गटक जाते हैं इसलिये ग्रीष्मऋतु में मछलियों का नामनिशान दृष्टिगोचर नहीं होता उसी प्रकार प्रथम तो इस कलिकाल में सज्जन उत्पन्न ही नहीं होते यदि दैवयोग से एक दो उत्पन्न भी होते हैं तो दया रहित दुष्टपुरूषोें के फन्द में फंसकर अधिक समय तक जीने नहीं पाते इसलिये इस कलिकाल में प्राय: सज्जनों का अभावसा ही है।।३६।।

इह वरमनुभूतं भूरि दारिद्र्यदु:खं वरमतिविकराले कालवक्त्रे प्रवेश:।
भवतु वरमितोऽपि क्लेशजालं विशालं न च खलजनयोगाज्जीवितं वा धनं वा।।३७।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि संसार में दरिद्रता का दु:ख भोगना अच्छा है अथवा मर जाना अच्छा है वा और भी सांसारिक नाना प्रकार की पीड़ाओं का सहन करना उत्तम है किन्तु दुष्टजन के संबंध से जीना तथा दुष्टजन के साथ धन कमाना उत्तम नहीं।।३७।।

मुनिधर्म का कथन

आचारो दशधर्मसंयमतपोमूलोत्तराख्यागुणा: मिथ्यामोहमदोज्झनं शमदमध्यानप्रमादस्थिति:।
वैराग्यं समयोपवृंहणगुणा रत्नत्रयं निर्मलं, पर्य्यन्ते च समाधिरक्षपदानन्दाय धर्मो यते: ।।३८।।

अर्थ—जिनधर्म में दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तप आचार, वीर्याचार इस प्रकार पांच प्रकार के आचार तथा उत्तमक्षमा, उत्तममार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तमतप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य तथा उत्तमब्रह्मचर्य इस प्रकार का दश धर्म तथा बारह प्रकार का संयम तथा बारह प्रकार का तप और आठ प्रकार के मूलगुण तथा चौरासी लाख उत्तरगुण तथा मिथ्यात्व मोह मद का त्याग और शम दम ध्यान तथा प्रमाद रहित स्थिति और वैराग्य तथा जिन शासन की महिमा के बढ़ाने वाले अनेक गुण और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र स्वरूप निर्मलरत्नत्रय तथा अंत में समाधि विद्यमान हैं ऐसा मुनियों का धर्म अक्षयपद आनन्द के लिये है।।३८।।

स्वं शुद्धं प्रविहाय चिद्गुणमयभ्रान्त्याणुमात्रेऽपि यत् संबन्धाय मति: परे भवति तद्वंधाय मूढात्मन:।
तस्मात्त्याज्यमशेषमेव महतामेतच्छरीरादिकंं तत्कालादि विनादियुक्तित: इदं तत्त्यागकर्मव्रतम् ।।३९।।

अर्थ—अपने शुद्धचैतन्य को छोड़कर परमाणुमात्र पर पदार्थों में भी चैतन्य गुण के भ्रम से यदि मूढ़ पुरूषों की बुद्धि लग जावे तो उस बुद्धि से केवल कर्मबंध ही होता है इसलिये सज्जन पुरूषों को शरीर आदि के समस्तपदार्थों का अवश्य त्याग कर देना चाहिये यदि आयु: कर्म के प्रबल होने से शरीरादि का त्याग न हो सके तो शरीरादि के त्याग करने के लिये मुनिव्रत ही धारण करने योग्य है क्योंकि मुनिव्रत धारण करना ही शरीर आदि के त्याग की क्रिया है।।३९।।

मुक्तवा मूलगुणान्यतेर्विदधत: शेषेषु यत्रं परं दण्डो मूलहरो भवत्यविरतं पूजादिकं वाञ्छत:।
एकं प्राप्तमरे: प्रहारमतुलं हित्वा शिरश्छेदकं रक्षत्यङ्गुलिकोटिखण्डनकरं कोऽन्यो नरो बुद्धिमान्।।४०।।

अर्थ—युद्ध करते समय अनेक प्रकार के प्रहार होते हैं उनमें कई एक तो शिर के छेदने वाले होते हैं तथा कई एक अंगुलि के अग्रभाग के छेदने वाले होते हैं उनमें यदि कोई पुरूष शिर के छेदने वाले प्रहार को छोडकर अंगुली के अग्रभाग को छेदन करने वाले प्रहार से रक्षा करे तो उसका जिस प्रकार उससे रक्षा करना व्यर्थ है उसी प्रकार जो यति मूलगुणों को छोड़कर शेष उत्तरगुणों के पालन करने के लिये प्रयत्न करते हैं तथा निरंतर पूजा आदि को चाहते है उनको आचार्य मूलछेदक दण्ड देते हैं इसलिये मुनियों को प्रथम मूलगुणव्रत पालना चाहिये पीछे उत्तरगुणों का पालन करना चाहिये।।४०।।

आचेलक्य मूलगुण किसलिये पाला जाता है इस बात को आचार्य दिखाते हैं।

म्लाने क्षालनत: कुत: कृतजलाद्यारम्भत: संयमो नष्टे व्याकुलचित्तताथ महतामप्यन्यत: प्रार्थनम् ।
कौपीनेऽपि हृते परैश्च झटिति क्रोध: समुत्पद्यते तन्नित्यं शुचिरागहृच्छ्रमवतां वस्त्रं ककुम्मण्डलम् ।।४१।।

अर्थ—यदि संयमी वस्त्र रक्खे तो उसके मलिन होने पर धोने के लिये जल आदि का उनको आरंभ करना पड़ेगा और यदि जल आदि का आरम्भ करना पड़ा तो उनका संयम ही कहां रहा तथा यदि वह वस्त्र नष्ट हो गया तब उनके चित्त में व्याकुलता होगी तथा उसके लिये यदि वे किसी से प्रार्थना करेंगे तो उनकी अयाचक वृत्ति छूट जावेगी और वस्त्रों को छोड़कर यदि वे कौपीन [लँगोट) ही रक्खे तो भी उसके खोजने पर उनको क्रोध पैदा होगा इसलिये समस्तवस्त्रों का त्यागकर मुनिकेगणों का नित्य पवित्र राग का नाशक दिशा का मंडल ही वस्त्र है ऐसा समझना चाहिये।।४१।।

आचार्यवर लोचनामक मूलगुण को दिखाते हैं।

काकिण्या अपि संग्रहो न विहित: क्षौरं यया कार्यते चित्तक्षेपकृदस्रमात्रमपिवा तत्सिद्धये नाश्चितम् ।
हिंसाहेतुरहोजटाद्यपि तथा यूकाभिरप्रार्थनैर्वैराग्यादिविवर्धनाय यतिभि: केशेषु लोच: कृत:।।४२।।

अर्थ—मुनिगण अपने पास एक कौड़ी भी नहीं रखते जिससे कि वे दूसरे से मुंडन करा सके तथा मुंडन के लिये छुरा, कैची आदि अस्त्र भी नहीं रखते क्योंकि उनके रखने से क्रोधादि की उत्पत्ति से चित्त बिगड़ता है तथा वे जटा भी नहीं रख सकते क्योंकि जटाओं में अनेक जूं आदि जीवों की उत्पत्ति होती है इसलिये जटा रखने से हिंसा होती है तथा मुंडन कराने के लिये वे दूसरे से द्रव्य भी नहीं मांग सकते क्योंकि उनकी अयाचक वृत्ति का परिहार होता है इसलिये वैराग्य की अतिशय वृद्धि के लिये ही मुनिगण अपने हाथों से केशों को उपाटते हैं, इसमें अन्य कोई मानादि कारण नहीं है।।४२।।

अब आचार्य स्थितिभोजन नामक मूलगुण को बताते हैं।

यावन्मे स्थितिभोजनेऽस्ति दृढता पाण्योश्च संयोजने भुञ्जे तावदहंरहाम्यथ विधावेषा प्रतिज्ञा यते:।
कायेऽप्यस्पृहचेतसोऽन्त्यविधिषु प्रोल्लासिन:सन्मतेर्नह्येतेन दिविस्थितिर्न नरके सम्पद्यते तद्विना।।४३।।

अर्थ—जो मुनिगण अपने शरीर में भी ममत्वकार रहित है तथा समाधिमरण करने में उत्साही है तथा श्रेष्ठज्ञान के धारक हैं उनकी विधि में यह कड़ी प्रतिज्ञा रहती है कि जब तक हमारी खड़े होकर अहार लेने में तथा दोनों हाथों को जोड़ने में शक्ति मौजूद है तब तक हम भोजन करेंगे नहीं तो कदापि न करेंगे जिससे उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा उनको नरक नहीं जाना पड़ता किन्तु जो इस प्रतिज्ञा से रहित है उनको अवश्य नरक जाना पड़ता है।।४३।।

और भी आचार्य मुनिधर्म का वर्णन करते हैं।

एकस्यापि ममत्वमात्मवपुष: स्यात्संसृते: कारणं कोवाह्यर्थकथाप्रथीयसि तथाप्याराध्यमानेऽपि च ।
तद्वासां हरिचंद्रनेऽपि च सम:संश्लिष्टतोऽप्यङ्गतो भिन्नं स्वं स्वयमेकमात्मनि धृतं यास्यत्यजस्त्रं मुनि:।।

अर्थ—विस्तीर्णतप के आराधन करने पर भी यदि एक अपने शरीर में भी ‘‘ यह मेरा है’’ ऐसा ममत्व हो जावे तो वह ममत्व ही संसार में परिभ्रमण का कारण हो जाता है तब यदि शरीर से अतिरिक्त धनधान्य में ममता की जावेगी तो वह ममता क्या न करेगी ? ऐसा जानकर तथा चाहे कोई उनके शरीर में कुल्हाड़ी मारे चाहे उनके शरीर में चन्दन का लेप करे तो भी कुल्हाड़ी और चंदन में सम होकर मुनिगण क्षीरनीर के समान आत्मा शरीर का संबंध होने पर भी अपने में अपने से अपने को निरंतर भिन्न ही देखते हैं।।४४।।

शिखरिणी छन्द

तृृणं वा रत्नं वा रिपुरथ परं मित्रमथवा सुखं वा दु:खं वा पितृबनमदो सौधमथवा ।
स्तुतिर्वा निन्दा वा मरणमथवा जीवितमथ स्फुटं निग्र्रन्थानां द्वयमपि समं शान्तमनसाम् ।।४५।।

अर्थ—तथा उन शान्त रस के लोलुपी मुनियों के तृण तथा रत्न, मित्र और शत्रु, सुख तथा दु:ख , श्मशानभूमि और राज मन्दिर, स्तुति तथा निन्दा, मरण और जीवित दोनों समान है।

भावार्थ—जो मुनि परिग्रहकर रहित हैं तथा शान्त स्वरूप है वे तृण से घृणा भी नहीं करते हैं तथा रत्न को अच्छा भी नहीं समझते हैं और अपने हित के करने वाले को मित्र नहीं समझते हैं तथा अहित के करने वाले को वैरी नहीं समझते है तथा सुख होने पर सुख नहीं मानते हैं दु:ख होने पर दु:ख नहीं मानते हैं और श्मशान भूमि को बुरी नहीं कहते है तथा राजमन्दिर को अच्छा नहीं कहते हैं तथा स्तुति होने पर संतुष्ट नहीं होते हैं तथा निन्दा होने पर रूष्ट नहीं होते हैं तथा जीवित मरण को समान मानते हैं।।४५।।

वीतरागी इस प्रकार का विचार करते हैं।

वयमिह निजयूथभ्रष्टसारङ्गकल्पा: परपरिचयभीता: क्वापि किंचिच्चराम:।
विजनमधिवसामो न व्रजाम: प्रमादं सुकृतमनुभवामो यत्र तत्रोपविष्टा:।।४६।।

अर्थ—जिस प्रकार मृग अपने समूह से जुदा होकर तथा दूसरों से भयभीत होकर जहां तहां विचरता फिरता है तथा एकान्त में रहता है तथा प्रतिसमय प्रतिबुद्ध रहता है और जहां तहां बैठकर आनन्द भोगता है उसी प्रकार हमारे लिये भी वह कौन सा दिन आवेगा जिस दिन हम अपने कुटुम्बियों से जुदे होकर तथा फिर उन से परिचय न हो जावे इससे भयभीत होकर हम भी यहां वहां विचरेंगे तथा एकान्तवास में रहेंगे और प्रमादी न बनेेंगें , तथा जहां तहां बैठकर अपने आत्मानंद का अनुभव करेंगे।।४६।। और भी वीतरागी इस प्रकार भावना करते रहते हैं।

कति न कति न वारान् भूपतिर्भूरिभूति: कति न कति न वारानत्र जातोऽस्मि कीट: ।
नियममिति न कस्याप्यस्ति सौख्यं न दु:खं जगति तरलरूपे किं मुदा किं शुचा वा।।४७।।

अर्थ—इस संसार में कितनी—२ बार तो हम बड़ी—२ संपत्ति के धारी राजा न हो गये तथा कितनी—२ बार इसी संसार में हम क्षुद्र क्रीड़े न हो चुके इसलिये यही मालूम होता है कि चंचलरूप इस संसार में किसी का सुख तथा दु:ख निश्चित नहीं है अत: सुख और दु:ख के होने पर हर्ष और विषाद कदापि नहीं करना चाहिये।।४७।।

पृथ्वी छन्द

प्रतिक्षणमिदं हृदि स्थितमतिप्रशान्तात्मनो मुनेर्भवति संवर: परमशुद्ध हेतुर्ध्रुवं ।
रज:खलु पुरातनं गलति नो नवं ढौकते ततोऽपि निकटं भवेदमृतधाम दु:खोज्झितम् ।।४८।।

अर्थ—परमशांत मुद्रा के धारी मुनियों के इस प्रकार उपर्युक्त भावना करने से परम शुद्धि का करने वाला संवर होता है तथा उसके होते सन्ते जो कुछ प्राचीन कर्म आत्मा के साथ लगे रहते हैं तब गल जाते हैं तथा नवीन कर्मों का आगमन भी बंद हो जाता है तथा उन मुनियों के लिये समस्त प्रकार के दु:खों कर रहित मुक्ति भी सर्वथा समीप रह जाती है।।४८।।

और भी आचार्य मुनिधर्म की महिमा का वर्णन करते हैं।

शिखरिणी छन्द

प्रबोधो नीरन्ध्रं प्रवहणममन्दं पृथुतप: सुवायुर्यै: प्राप्तो गुरूगणसहाया: प्रणयिन: ।
कियन्मात्रस्तेषां भवजलधिरेषोऽस्य च पर: कियद्दूरे पार: स्फुरति महतामुद्यमवताम् ।।४९।।

अर्थ—जिन मुनियों के पास छिद्ररहित सम्यज्ञानरूपी जहाज मौजूद है, तथा अमन्द विस्तीर्ण तपरूपी पवन भी जिनके पास है तथा स्नेही बड़े—२ गुरू भी जिनके सहायी हैं उन उद्यमी महात्मा मुनियों के लिये यह संसाररूपी समुद्र कुछ भी नहीं है तथा इस संसाररूपी समुद्र का पार भी उनके समीप में ही है।

भावार्थ— जिस मनुष्य के पास छिद्ररहित जहाज तथा जहाज के लिये योग्य पवन तथा चतुर खेवटिया होते हैं वह मनुष्य बात की बात में समुद्र की चौरस को तय कर लेता है उसी प्रकार जो मुनि सम्यग्ज्ञान के धारक हैं तथा विस्तीर्ण तप के करने वाले हैं, और जिनके बड़े—२ गुरू भी सहायी हैं वे मुनि शीघ्र ही संसार समुद्र से तर जाते हैं तथा मोक्ष उनके सर्वथा समीप में आ जाती है।।४९।।

आचार्य मुनियों को शिक्षा देते हैं।

वसंततिलका छन्द

अभ्यस्यतान्तरदृशं किमु लोकभक्तया मोहं कृशीकुरूत किं वपुषा कृशेन।
एतद्द्वयं यदि न किं बहुभिर्नियोगै: क्लेशैश्च किं किमपरै: प्रचुरैस्तपोभि:।।५०।।

अर्थ—भो मुनिगण ? आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव करो लोक के रिझाने के लिये प्रयत्न मत करो तथा मोह को कृष करो शरीर के कृष करने में कुछ भी नहीं रक्खा है क्योंकि जब तक तुम इन दो बातों को न करोगे तब तक तुम्हारा यम नियम करना भी व्यर्थ है तथा तुम्हारा क्लेश सहना भी बिना प्रयोजन का है और तुम्हारे, नाना प्रकार के, किये हुवे तप भी व्यर्थ हैं।

भावार्थ—जब तक ज्ञाना नन्दस्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव न किया जायगा तथा मोह को कृष न किया जायगा तब तक बाह्य में तुम चाहे जितना यम नियम उपवास तप आदि करो सर्व तुम्हारे व्यर्थ हैं इसलिये सबसे प्रथम तुमको ज्ञानानन्दस्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव करना चाहिये पीछे इन बातों पर ध्यान देना चाहिये।।५०।।

और भी आचार्य मुनिधर्म के स्वरूप का वर्णन करते है।।

वंशस्थ छन्द

जुगुप्सते संसृतिमत्र मायया तितिक्षते प्राप्तपरीषहानपि।
न चेन्मुनिर्दुष्टकषायनिग्रहाच्चिकित्सति स्वान्तमघप्रशान्तये ।।५१।।

अर्थ—जो मुनि सर्वथा आत्मा के अहित करने वाले दुष्ट कषायों को जीतकर पापों के नाश के लिये अपने चित्त को स्वस्थ बनाना नहीं चाहता वह मुनि समस्त लोक के सामने कपट से संसार की निन्दा करता है तथा कपट से ही वह क्षुधा तृषा आदि बाईस परीषहों को सहन करता है।

भावार्थ—संसार का त्याग तथा परीषहों को जीतना उसी समय कार्यकारी माना जाता है जबकि कषायों का नाश होवे तथा चित्त स्वस्थ रहे किन्तु जिन मुनियों का चित्त कषायों के नाश होने से शुद्ध ही नहीं हुवा है वे मुनि क्या तो संसार का त्याग कर सकते हैं ? तथा क्या वे परीषहों को ही सहन कर सकते हैं ; यदि ये संसार की निन्दा करे तथा परीषहों का सहन भी करे तो उनका वह सर्वकार्य ढोंग से किया हुवा ही समझना चाहिये। इसलिये मुनियों को चाहिये कि वे प्रथम कषाय आदि को नाशकर चित्तको शुद्ध बना लेवे पीछे संसार की निन्दा तथा परीषहों का सहन करे।।५१।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

हिंसा प्राणिषु कल्मषं भवति सा प्रारम्भत: सोऽर्थत: तस्मादेव भयादयोऽपि नितरां दीर्घा तत: संसृति: ।
तत्रासातमशेषमर्थत इदं मत्वेति यस्त्यक्तवान् मुक्त्यर्थी पुनरर्थमाश्रिवता तेनाहत: सत्पथ: ।।५२।।

अर्थ—प्राणियों को मारने से पाप होता है तथा वह पाप आरंभ से होता है और वह आरंभ धन के होते संते होता है तथा धन के होते संते लोभ आदि की उत्पत्ति होती है और लोभ आदि के होने से दीर्घ संसार होता है तथा संसार से अनन्त दु:ख होते हैं इस प्रकार से सब बातें द्रव्य से होती हैं इस बात को जानकर मोक्ष के अभिलाषी मुनियों ने द्रव्य का त्याग कर दिया है किन्तु जिसने धन को आश्रयण किया है उसने सच्चे मार्ग का नाश ही कर दिया है ऐसा समझना चाहिये।।५२।।

दुर्ध्यानार्थमवद्यकारणमहो निर्ग्रन्थताहानये शय्याहेतुतृणाद्यपि प्रशमिनां लज्जाकरं स्वीकृतम् ।
यत्तत्किं न गृहस्थयोग्यमपरं स्वर्णादिकं साम्प्रतं निर्ग्रन्थेष्वपि चैतदस्ति नितरां प्राय: प्रवष्टि: कलि: ।।५३।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं निर्ग्रन्थमुनि शय्या के कारण यदि घास आदि को भी स्वीकार कर लें वह स्वीकार भी उनके खोटे ध्यान के लिये होता है तथा निन्दा का करने वाला और निर्ग्रन्थता में हानि पहुंचाने वाला होता है तथा लज्जा को करने वाला भी होता है तब वे निर्ग्रंथ यतीश्वर गृहस्थ के योग्य सुवर्ण आदि को कब रख सकते हैं ? यदि इस काल में निर्ग्रन्थ सुवर्ण आदि को रक्खे तो समझना चाहिये कि यह कलिकाल का ही महात्म्य है।।५३।।

आर्या छन्द

कादाचित्को बंध: क्रोधादे: कर्मण: सदा सङ्गात् ।
नात: क्वापि कदाचित्परिग्रहग्रहवतां सिद्धि: ।।५४।।


अर्थ—और भी आचार्य कहते हैं कि क्रोधादि कर्मों के द्वारा तो प्राणियों के कर्मों का बंध कभी—२ ही होता है किन्तु परिग्रह से प्रतिक्षण बंध होता रहता है अतएव परिग्रह धारियों को किसी काल में तथा किसी प्रदेश में भी सिद्धि नहीं होती। इसलिये भव्यजीवों को कदापि धनधान्य से ममता नहीं रखनी चाहिये।।५४।।

इंद्रवज्रा छन्द

मोक्षऽपि मोहादभिलाषदोषो विशेषतो मोक्षनिषेधकारी।
यतस्ततोऽध्यात्मरतो मुमुक्षुर्भवेत्किमत्र कृताभिलाष: ।।५५।।

अर्थ—स्त्री पुत्र आदि की अभिलाषा का करना तो दूर रहो यदि मोक्ष के लिये भी अभिलाषा की जावे तो वह दोषस्वरूप समझी जाती है तथा इसलिये वह मोक्ष की निषेध करने वाली होती है। इसीलिये जो मुनि अपनी आत्मा के रस में लीन हैं तथा मोक्ष के अभिलाषी हैं वे स्त्री पुत्र आदि में कब अभिलाषा कर सकते हैं। भावार्थ—मोह के उदय से ही पदार्थों में इच्छा होती है तथा जब तक मोह रहता है तब तक मोक्ष कदापि नहीं हो सकती इसलिये मोक्ष के लिये भी अभिलाषा करना दोष है अत: मोक्षाभिलाषी मुनियों को आत्म रस में ही लीन रहना चाहिये।।५५।।

पृथ्वी छन्द

परिग्रहवतां शिवं यदि तदानतल: शीतलो यदीन्द्रियसुखं सुखं तदिह कालकूट: सुधा ।
स्थिरा यदि तनुस्तदा स्थिरतरं तडिच्चाम्बरे भवेऽत्र रमणीयता यदि तदीन्द्रजालेऽपि च ।।५६।।

अर्थ—यदि परिग्रहधारियों को भी मुक्ति कही जावेगी तो अग्नि को भी शीतल कहना पड़ेगा तथा यदि इन्द्रियों से पैदा हुवे सुख को भी सुख कहोगे तो विष को भी अमृत मानना पड़ेगा और यदि शरीर को स्थिर कहोगे तो आकाश में बिजली को भी स्थिर कराना पड़ेगा तथा संसार में रमणीयता कहोगे तो इन्द्रजाल में भी रमणीयता कहनी पड़ेगी। इसलिये इसबात को मानो कि जिस प्रकार अग्नि शीतल नहीं होती उसी प्रकार परिग्रहधारियों को कदापि मुक्ति नहीं हो सकती और जिस प्रकार विष अमृत नहीं होता उसी प्रकार इन्द्रियसुख भी कदापि सुख नहीं हो सकता तथा जिस प्रकार बिजली स्थिर नहीं होती उसी प्रकार यह शरीर भी स्थिर नहीं हो सकता तथा जिस प्रकार इन्द्रजाल में रमणीयता नहीं होती उसी प्रकार संसार में भी रमणीयता नहीं हो सकती।।५६।।

मालिनी छन्द

स्मरमपि हृदि येषां ध्यानवन्हिप्रदीप्ते सकलभुवनमल्लं दह्यमानं विलोक्य।
कृतभिय इव नष्टास्ते कषाया न तस्मिन्पुनरपि हि समीयु: साधवस्ते जयन्ति।।५७।।

अर्थ—वे यतीश्वर सदा इसलोक में जयवंत है कि जिन यतीश्वरों के हृदय में ध्यानरूपी अग्नि के जाज्वल्यमान होने पर तीनों लोक के जीतने वाले कामदेवरूपी प्रबल योधा को जलते हुवे देखकर भयसेही मानों भागे गये तथा ऐसे भागे कि फिर न आ सके।

भावार्थ—जिन मुनियों के सामने कामदेव का प्रभावहत हो गया है तथा जो अत्यंतध्यानी है और कषायों कर रहित है उन मुनियों के लिये सदा मैं नमस्कार करता हूँ।।५७।।

अब आचार्य गुरूओं की स्तुति करते हैं।

उपेन्द्रवज्र छन्द

अनर्घ्यरत्नत्रयसम्पदोऽपि निर्ग्रन्थताया: पदमद्वितीयम् ।
जयन्ति शान्ता: स्मरवैरिवध्वा: वैघव्यदास्ते गुरवो नमस्या:।।५८।।

अर्थ—अमूल्य रत्नत्रयरूपी संपत्ति के धारी होकर भी जो निर्ग्रन्थ पद के धारक हैं तथा शान्तमुद्रा के धारी होने पर भी जो काम देव रूपी वैरी की स्त्री को विधवा करने वाले हैं ऐसे वे उत्तम गुरू सदा नमस्कार करने योग्य हैं।

भावार्थ—इस श्लोक में विरोधा भास नामक अलंकार है इसलिये आचार्य विरोधाभास को दिखाते हैं कि जिसके अमूल्य रत्नत्रय मौजूद है वह परिग्रह करके रहित कैसे हो सकता है। तथा जो शान्त है वह कामदेव की स्त्री को विधवा कैसे बना सकता है इसलिये ऐसे चमत्कारी गुरू सदा वन्दनीक ही है।

सारांश—जो रत्नत्रय के धारी हैं तथा निर्ग्रन्थ हैं और शान्त मुद्रा के धारक हैं तथा कामदेव के जीतने वाले हैं उन गुरूओं को सदा मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं।।५८।।

आचार्य परमेष्ठी की स्तुति

शार्दूलविक्रीडित छन्द

ये स्वाचारमपारसौख्यसुतरोर्वीजं परं पञ्चधा सद्वोधा: स्वयमाचरन्ति च परानाचारयन्त्येव च ।
ग्रंथग्रंथिविमुक्तमुक्तिपदवीं प्राप्ताश्च यै: प्रापितास्ते रत्नत्रयधारिण:शिवसुखं कुर्वन्तु न: सूरय: ।।५९।।

अर्थ—जो सद्ज्ञान के धारक आचार्य अपार जो सौख्यरूपी वृक्ष उसको उत्पन्न करने वाले पांच प्रकार के आचार को स्वयं आचारण करते हैं तथा दूसरों को आचरण कराते हैं तथा जहां पर किसी प्रकार के परिग्रह का लेश नहीं ऐसी मुक्ति को स्वयं जाते हैं और दूसरों को पहुंचाते हैं इसलिये इस प्रकार निर्मलरत्नत्रय के धारी आचार्यवर हमारे लिये मोक्ष सुख को प्रदान करो।।५९।।

वसंततिलका छन्द

भ्रान्तिप्रदेषु वहुवर्त्मसु जन्मकक्ष्ये पन्थानमेकममृतस्य परं नयन्ति ।
ये लोकमुन्नतधिय: प्रणमामि तेभ्यस्तेनाप्यहं जिगमिषुर्गुरूनायकेभ्य: ।।६०।।

अर्थ—इस संसार में भ्रम के करने वाले अनेक मार्गों में से जो गुरूलोक को सुख के देने वाले एक मोक्षमार्ग को ले जाते हैं तथा स्वयं उच्चज्ञान के धारक हैं ऐसे उन श्रेष्ठ गुरूओं को उसी मार्ग में जाने की इच्छा करने वाला मैं भी मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।।६०।।

उपाध्याय परमेष्ठी की स्तुति

शार्दूलविक्रीडित छन्द

शिष्याणामपहाय मोहपटलं कालेन दीर्घेण यज्जातं ‘ स्यात्पदलाञ्छितोज्वलवचो—दिव्याञ्चनेन ’ स्फुटम् ।
ये कुर्वन्ति दृशं परामतितरां सर्वावलोके क्षमां लोके कारणमन्तरेण भिषजस्ते पान्तुनोऽध्यापका:।।६१।।

अर्थ—जो उपाध्यायपरमेष्ठी अनादिकाल से लगे हुवे मोह के परदे को स्याद्वाद से अविरोधी ऐसे अपने उपदेशरूपी दिव्य अंजन से हटाकर शिष्यों की दृष्टि को अत्यंत निर्मल तथा समस्त पदार्थों के देखने में समर्थ बनाते हैं ऐसे बिना कारण के ही वैद्य वे उपाध्याय मेरी इस संसार में रक्षा करो।।६१।।

साधु परमेष्ठी की स्तुति

शार्दूलविक्रीडित छन्द

उन्मुच्यालयबंधलनादपि दृढात्कायेऽपि वीतस्पृहाश्चित्ते मोहविकल्पजालमपि यद्दुर्भेद्यमन्तस्तम: ।
भेदायास्य हि साधयन्ति तदहो ज्योतिर्जितार्कप्रभं ये सद्वोधमयं भवन्तु भवतां ते साधव: श्रेयसे।।६२।।

अर्थ—जो साधु परमेष्ठी अत्यन्तकठिन भी गृहरूपी बंधन से अपने को छुड़ाकर तथा अपने शरीर में भी इच्छारहित होकर कठिनता से भेदने योग्य ऐसे मोह से पैदा हुवे विकल्पों के समूह रूप भीतरी अंधकार के नाश करने के लिये सूर्य की प्रभा को भी नीची करने वाली सम्यग्ज्ञान रूपी ज्योति को निरन्तर सिद्ध करते रहते हैं। ऐसे उन साधु परमेष्ठी के लिये नमस्कार है अर्थात् वे मेरे कल्याण के लिये होवे।।६२।।

वीतराग की महिमा का वर्णन

वसंततिलका छन्द

वज्रे पतत्यपि भयद्रुतविश्वलोकमुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात् ।
बोधप्रदीपहतमोहमहान्धकारा: सम्यग्दृश: किमुत शेषपरीषहेषु।।६३।।

अर्थ—जिस वज्र के शब्द के भय से चकित होकर समस्तलोक मार्ग को छोड़ देते हैं ऐसे वज्र के गिरने पर भी जो शान्तात्मामुनि ध्यान से कुछ भी विचलित नहीं होते तथा जिन्होंने सम्यग्ज्ञानरूपीदीपक से समस्त मोहान्धकार को नाश कर दिया है और जो सम्यग्दर्शन के धारी हैं वे मुनि परीषहों के जीतने में कब चलायमान हो सकते हैं ? अर्थात् परीषह उनका कुछ भी नहीं कर सकते।।६३।।

ग्रीष्मऋतु में पर्वत के शिखर पर ध्यानीमुनीश्वरों की स्तुति—

प्रोद्यत्तिग्मकरोग्रतेजसि लसच्चण्डानिलोद्यद्दिशि स्फारीभूतसुतप्तभूमिरजसि प्रक्षीणनद्यम्भसि।
ग्रीष्मे ये गुरुमेधनीध्रशिरसि ज्योतिर्निधायोरसि ध्वान्तध्वंसकरं वसन्ति मुनयस्ते सन्तु न: श्रेयसे।।६४।।

अर्थ—जिस ग्रीष्म ऋतु में अत्यंत तीक्ष्ण धूप पड़ती है तथा चारों दिशाओं में भयंकर लू चलती है तथा जिस ऋतु में अत्यंत संताप का देने वाला गरम रेता फैला हुवा है तथा नदियों का पानी सूख जाता है ऐसी भयंकर ग्रीष्मऋतु में जो मुनि समस्त अन्धकार को नाश करने वाली सम्यग्ज्ञान रूपी ज्योति को अपने मन में रखकर अत्यंत ऊंचे पहाड़ की चोटी पर निवास करते हैं उन मुनियों के लिये मेरा नमस्कार हो अर्थात् वे मुनि मेरे कल्याण के लिये होवे।।६४।।

वर्षाकाल में वृक्षों के नीचे स्थित मुनियों की स्तुति

शार्दूलविक्रीडित छन्द

ते व: पान्तु मुमुक्षव: कृतरवेरब्दै रतिश्यामलै: शश्वद्वारि वमद्भिरब्धिविषयक्षारत्वदोषादिव।
काले मज्जदिले पतद्गिरिकुले ‘धावद्धुनीसंकुले’ झंझावातविसंस्थुले तरुतले तिष्ठन्ति ये साधव:।।६५।।

अर्थ—जिस वर्षा काल में काले—२ मेघ भयंकर शब्द करते हैं तथा समुद्र के क्षार दोष से ही मानो जो जहां तहां जल वर्षाते हैं तथा जिस काल में जमीन नीचे को धसक जाती है तथा पर्वतों से बड़े—२ पत्थर गिरते हैं तथा जल की भरी हुई नदियाँ सब जगह दौड़ती फिरती हैं तथा जो वर्षाकाल वृष्टिसहित पवन से भयंकर हो रहा है ऐसे भयंकर वर्षाकाल में जो मोक्षाभिलाषी मुनि वृक्षों के नीचे बैठ कर तप करते हैं उन मुनियों के लिये नमस्कार है अर्थात् वे मुनि मेरी रक्षा करो।।६५।।

शीतकाल में खुले हुवे मैदान में तप करने वाले यतीश्वरों की स्तुति

शार्दूलविक्रीडित छन्द

म्लायत्कोकनदे गलत्पिकमदे भ्रंश्यद्द्रुमौघच्छदे हर्षद्रोमदरिद्रके हिमऋतावत्यन्तदु:खप्रदे।
ये तिष्ठन्ति चतुष्पथे पृथुतप: सौधस्थिता: साधवो ध्यानोष्णप्रहितोग्रशीतविधुरास्ते मे विदध्यु:श्रियम् ।।६६।।

अर्थ— जिस शीतकाल में कमल कुम्हला जाते हैं तथा बन्दरों का मद गल जाता है और वृक्षों के पत्ते जल जाते हैं तथा जिस शीतकाल में वस्त्ररहित दरिद्रों के शरीर पर रोमांच खड़े हो जाते हैं और भी जो नानाप्रकार के दु:खों का देने वाला है ऐसे भयंकर शीतकाल में अत्यंत तपस्वी तथा ध्यानरूपी अग्नि से समस्त शीत को नाश करने वाले जो यतीश्वर खुले मैदान में निर्भयता से निवास करते हैं वे यतीश्वर मुझे अविनाशी लक्ष्मी प्रदान करो।।६६।।

और भी मुनिधर्म के स्वरूप को आचार्य दिखाते हैं।

वसंततिलका छन्द

कालत्रये वहिरवस्थितजातवर्षा शीतातपप्रमुखसंघटितोग्रदु:खे।
आत्मप्रबोधविकले सकलोऽपि कायक्लेशो वृथा वृतिरिवोज्झितशालिवप्रे।।६७।।

अर्थ—जो मुनि अपने आत्मज्ञान की कुछ भी परवा न कर बाहिर में रहकर वर्षा शीत गर्मी तीनों कालों में उत्पन्न हुवे दु:खों को सहन करते हैं उनका उस प्रकार का दु:ख सहना वैसा ही निरर्थक मालूम होता है जैसा कि धान्य के कट जाने पर खेत की बाड़ लगाना निरर्थक होता है इसलिये मुनियों को आत्मज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिये।।६७।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

सम्प्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणि स्तद्वाच: परमासतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिका:।
सद्ररत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तेषां समालंवनं तत्पूजा जिनवाचिपूजनमत: साक्षाज्जिन: पूजित:।।६८।।

अर्थ—यद्यपि इस समय इस कलिकाल में तीन लोक के पूजनीक केवली भगवान विराजमान नहीं हैं तो भी इस भरतक्षेत्र में समस्त जगत को प्रकाश करने वाली उन केवली भगवान की वाणी मौजूद हैं तथा उन वाणियों के आधार श्रेष्ठ रत्नत्रय के धारी मुनि हैं इसलिये उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती की पूजन है तथा सरस्वती की पूजन साक्षात्केवली भगवान की पूजन है ऐसा भव्यजीवों को समझना चाहिये।।६८।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

स्पृष्टा यत्र मही तदंघ्रिकमलैस्तत्रैति सत्तीर्थतां तेभ्यस्तेपि सुरा: कृताञ्ञलिपुटा नित्यं नमस्कुर्वते।
तन्नामस्मृतिमात्रतोऽपि जनता निष्कल्मषा जायते ये जैना यतयश्चिदात्मनिरता ध्यानं समातन्वते।।६९।।

अर्थ—जो यतीश्वर आत्मा में लीन होकर ध्यान करते हैं उन जैनयतीश्वरों के चरण कमलों से सृष्ट भूमि उत्तमतीर्थ बन जाती है तथा उन यतीश्वरों को हाथ जोड़ मस्तक नवाकर बड़े—२ देव आकर नमस्कार करते हैं तथा उनके स्मरण मात्र से ही जीवों के समस्त पाप गल जाते हैं इसलिये यतीश्वरों को सदा ध्यान में लीन रहना चाहिये।।६९।।

शार्दूलविक्रीडितछन्द

सम्यग्दर्शनवृत्तवोधनिचित: शान्त: शिवैषी मुनि: मन्दै: स्यादवधीरितोऽपि विशद: साम्यं यदालम्ब्यते।
आत्मा तैर्विहतो यदत्र विषमध्वान्तश्रितो निश्चितं सम्पातो भवितोग्रदु:ख नरके तेषामकल्याणिनाम् ।।७०।।

अर्थ—सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र का धारी तथा शांत और मोक्षाभिलाषी जो मुनि दुष्टों से अपमानित होकर भी स्वच्छ अंत:करण से समता को धारण करता है उसकी तो आत्मा शुद्ध ही होती है किन्तु जो उनकी निन्दा करने वाले हैं उन्होंने अपनी आत्मा का घात कर लिया क्योंकि वे दुष्ट कल्याणरहित पुरूष ऐसे नरक में गिरेंगे जो नरक भयंकर अंधकार से व्याप्त है। तथा कठिन दु:ख का स्थान है इसलिये मुनियों को चाहिये कि दुष्ट कैसी भी निंदा करें तो भी उनको समता ही धारण करनी योग्य है।।७०।।

स्रग्धराछन्द

मानुष्यं प्राप्य पुण्यात्प्रशममुपगता रोगवद्भोगजालं मत्वा गत्वा वनांतं दृशि विदि चरणे ये स्थिता: संगमुक्ता:।
कस्तोता वाक्पथातिक्रमणपटुगुणैरािंश्रतानांमुनीनांस्तोतव्यास्तेमहद्भिर्भुवि य इह तदंघ्रिद्वयेभक्तिभाज:।।

अर्थ—पुण्य योग से मनुष्य भव को पाय कर तथा शान्ति को प्राप्त होकर और भोगों को रोग तुल्य जानकर तथा वन में जाकर समस्त परिग्रह से रहित होकर जो यतीश्वर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र में स्थित होते हैं वचनागोचर गुणोंकर सहित उन मुनियों की प्रथम तो कोई स्तुति का करने वाला ही नहीं यदि कोई स्तुति कर सके भी तो वे ही पुरूष उनकी स्तुति कर सकते हैं जो उन मुनियों के चरण कमलों को आराधन करने वाले महात्मा पुरूष हैं।।७१।।

इस प्रकार धर्मोपदेशामृताधिकार में मुनिधर्म का वर्णन समाप्त हुवा।।

रत्नत्रयधर्म का कथन

शार्दूलविक्रीडित छन्द

तत्वार्थाप्ततपोभृतां यतिवरा: श्रद्धानमाहुर्दृशं ज्ञानं जानदनूनमप्रतिहतं स्वार्थावसन्देहवत्
चारित्रं विरति: प्रमादविलसत्कर्मास्रवाद्योगिनामेतन्मुक्तिपथस्त्रयं च परमोधर्मो भवच्छेदक:।।७२।।

अर्थ—गणधरादिदेव जीवादिपदार्थ तथा आप्त और गुरूओं पर श्रद्धान रखने को सम्यग्दर्शन कहते हैं। तथा जिसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं है तथा जो संशय रहित तथा पूर्ण है ऐसे ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं तथा प्रमादसहित कर्मों के आगमन के रूक जाने को सम्यक् चारित्र कहते हैं तथा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र ही मुक्ति का मार्ग है तथा संसार को नाश करने वाला परमधर्म है।।७२।।

मालिनी छन्द

हृदयभुवि दृगेकं वीजमुप्तंत्वशंकाप्रभृतिगुणसदम्भ: सारिणीसिक्तमुच्चै:
भवदवगमशाखश्चारित्रपुष्पस्तरूरमृतफलेन प्रीणयत्याशु भव्यम् ।।७३।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि अत:करणरूपी पृथ्वी में बोया हुआ तथा नि:शंकित आदि आठ गुणरूपी उत्तम जल की भरी हुई नलियों से सींचा हुवा सम्यग्दर्शनरूपी बीज सम्यग्ज्ञानरूपी शाखाओं का धारी तथा चारित्ररूपी पुष्प कर सहित वृक्षरूप में परिणत होकर शीघ्र ही भव्यजीवों को मोक्षरूपी फल से संतुष्ट करता है।।७३।। ।।और भी आचार्य रत्नत्रय की महिमा दिखाते हैं।।

दृगवगमचरित्रालंकृत: सिद्धिपात्रं लघुरपि न गुरु: स्यादन्यथात्वे कदाचित् ।
स्फुटमवगतमार्गो याति मन्दोऽपि गच्छन्नभिमतपदमन्यो नैव तूर्णोऽपि जन्तु:।।७४।।

अर्थ—जिसको मार्ग मालूम है ऐसा मनुष्य यदि धीरे—२ चले तो भी जिस प्रकार अभिमत स्थान पर पहुंच जाता है किन्तु जिसको मार्ग कुछ भी नहीं मालूम है वह चाहे कितनी भी जल्दी चले तो भी वह अपने अभिमत स्थान पर नहीं पहुंच सकता उसी प्रकार जो मुनि तप आदि का तो बहुत थोड़ा करने वाला है किन्तु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी है वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त हो जाता है किन्तु जो तप आदि का तो बहुत करने वाला है परन्तु सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय का धारी नहीं है, वह कितना भी प्रयत्न करे तो भी मोक्ष को नहीं पा सकता इसलिये मोक्षाभिलाषियों को सम्यग्दर्शनादि की सबसे अधिक महिमा समझनी चाहिये।।७४।।

मालिनी छन्द

वनशिखिनिमृतोऽन्ध: सञ्चरन्वाढमंघ्रिद्वितयविकलमूर्ति वीक्षमाणोऽपि खञ्ज:।
अपि सनयनपादोऽश्रद्दधानश्च तस्मादृगवगमचरित्रै: संयुतैरेव सिद्धि:।।७५।।

अर्थ—वन में अग्नि लगने पर उस वन में रहने वाला अंधा तो देख न सका इसलिये दौड़ता हुआ भी मर गया तथा दोनों चरणों का लूला लगी हुई अग्नि को देखता हुवा दौड़ न सकने के कारण तत्काल भस्म हो गया और आंख तथा पैर सहित भी आलसी इसलिये मर गया कि उसको अग्नि लगने का श्रद्धान ही नहीं हुवा इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि केवल सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान और केवल सम्यक्चारित्र मोक्ष के लिये कारण नहीं है किन्तु तीनों मिले हुवे ही हैं।।७५।।

भावार्थ—यद्यपि अंधे को अग्नि का श्रद्धान तथा आचरण था तो भी देखना रूपज्ञान न होने के कारण वह मर गया तथा पंगु को ज्ञान श्रद्धान होने पर दौड़ना रूप आचरण नहीं था इसलिये भस्म हो गया। आलसी को ज्ञान भी था और आचरण भी था किन्तु श्रद्धान नहीं था इसलिये वह जलकर मर गया यदि इन तीनों के पास तीनों चीजें होती तो उनमें से एक भी नहीं मरता इसलिये जुदे—२ सम्यग्दर्शन आदि केवल दु:ख ही के देने वाले हैं किन्तु तीनों मिले हुवे ही कल्याण के देने वाले हैं इसलिये भव्यजीवों को तीनों का ही आराधन करना चाहिये।।७५।।

मालिनी छन्द

बहुभिरपि किमन्यै: प्रस्तरै: रत्नसंज्ञैर्वपुषिजनितखेदैर्भारकारित्वयोगात् ।
हतदुरिततमोभिश्चारूरत्नैरनर्धै स्त्रिभिरपि कुरूतात्मालंकृतिं दर्शनाद्यै: ।।७६।।

अर्थ—संसार में यद्यपि रत्नसंज्ञा बहुत से पत्थरों की भी है किन्तु उनसे कुछ भी प्रयोजन नहीं क्योंकि वे केवल भार कारी होने के कारण शरीर को खिन्न करने वाले ही हैं इसलिये आचार्य उपदेश देते हैं कि हे मुनीश्वरो जो समस्त अंधकार के नाश करने वाले हैं तथा अमूल्य और मनोहर हैं ऐसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्ररूपी तीन रत्नों से ही अपनी आत्मा को शोभित करो ये ही वास्तविक रत्न है।।७६।।

जयति सुखनिधानं मोक्षवृक्षैकबीजं सकलमलविमुक्तं दर्शनं यद्विना स्यात् ।
मतिरपि कुमतिर्नु दुश्चरित्रं चरित्रं भवति मनुजजन्म प्राप्तमप्राप्तमेव ।।७७।।

अर्थ—जिस सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान कहलाता है चरित्र मिथ्याचारित्र कहलाता है प्राप्त हुवा भी मनुष्य जन्म न पाया हुवा सा कहलाता है ऐसा सुखस्वरूप तथा मोक्षरूपीसुख का देने वाला और निर्मल सम्यग्दर्शनरूपीरत्न सदा इस लोक में जयवंत है।।७७।।

आर्या छन्द

भवभुजगनागदमनी दु:खमहादावशमनजलवृष्टि: ।
मुक्तिसुखामृतसरसी जयति दृगादित्रयी सम्यक् ।।७८।।

अर्थ —संसाररूपी सर्प को नाश करने में नागदमती तथा दु:खरूपी दावानल के बुझाने के लिये जलवृष्टि और मोक्षरूपी सुखामृत की सरोवरी (तालाब) ऐसी समीचीन रत्नत्रयी सदा इस लोक में जयवंत है।।७८।।

अब आचार्य निश्चयरत्नत्रय का वर्णन करते हैं।

मालिनी छन्द

वचनविरचितैवोत्पद्यते भेदबुद्धिर्दृगवगमचरित्राण्यात्म: स्वं स्वरूपम्।
अनुपचरितमेतच्चेतनैकस्वभावं व्रजति विषयभावं योगिनां योगदृष्टे:।।७९।।

अर्थ—व्यवहारनय की अपेक्षा से ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र जुदे—२ मालूम पड़ते हैं निश्चयनय की अपेक्षा से इनमें किसी प्रकार का भेद नहीं है किन्तु ये तीनों आत्मस्वरूप ही हैं तथा समस्त लोकालोक को देखने वाले केवली भगवान् वास्तविक रीति से इन तीनों को चैतन्य से अभिन्न स्वरूप ही देखते हैं।।७९।।

उपेन्द्रवज्राछन्द

निरूप्य तत्त्वं स्थिरतामुपागता मति:सतां शुद्धनयावलम्बिनी।
अखण्डमेकं विशदं चिदात्मकं निरन्तरं पश्यति तत्परं मह:।।८०।।

अर्थ—जीवाजीवादि समस्त तत्वों को देखकर जिन सज्जनों की मति स्थिर हो गई है तथा शुद्धनय को आश्रयण करने वाली हो गई है वे ही मनुष्य निर्मल तथा उत्कृष्ट चित्स्वरूप ज्योति को देखते हैं।।८०।।

स्रग्धराछन्द

दृष्टिर्निर्णीतिरात्माह्वयविशदमहस्यत्र बोध: प्रबोध: शुद्ध चारित्रमत्र स्थितिरिति युगपद्वंधविध्वंसकारि।
बाह्यं बाह्यार्थमेव त्रितयमपि तथा स्याच्छुभोवाऽशुभोवा बंध: संसारमेवं श्रुतिनिपुणाधिय: साधवस्तं वदन्ति।।

अर्थ—आत्मारूपी निर्मल तेज में निश्चय (विश्वास) करना तो निश्चयसम्यग्दर्शन है तथा उसी तेज में जानपना निश्चय ज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान स्वरूप में स्थित रहना सम्यक्चारित्र है और इन तीनों की एकता कर्मबंध के नाश करने वाली है तथा इस निश्चयरत्नत्रय से जो बाह्य है सो बाह्य ही है और चाहे वह शुभ हो चाहे अशुभ हो बंध का ही कारण है तथा बंध का कारण होने से संसार का भी कारण है ऐसा श्रुतज्ञान के पारंगत आचार्य कहते हैं। इसलिये भव्यजीवों को निश्चयरत्नत्रय के ही लिये प्रयत्न करना चाहिये तथा व्यवहाररत्नत्रय को भी सर्वथा न छोड़कर निश्चय रत्नत्रय का साधक समझना चाहिये।।८१।।

।।इस प्रकार रत्नत्रय का वर्णन समाप्त हुआ।।

दशलक्षणधर्म का कथन

उत्तमक्षमाधर्म का स्वरूप

मालिनी छन्द

जडजनकृतबाधाक्रोधहासप्रियादावपि सति न विकारं यन्मनो याति साधो:
अमलविपुलचित्तौरुत्तमा सा क्षमादौ शिवपथपथिकानां सत्सहायत्वमेति।।८२।।

अर्थ— मूर्ख जनों कर किये हुवे बंधन हास्य आदि के होने पर तथा कठोर वचनों के बोलने पर जो साधु अपने निर्मल धीर वीर चित्त से विकृत नहीं होता उसी का नाम उत्तम क्षमा है तथा वह उत्तमक्षमा मोक्षमार्ग को जाने वाले मुनियों को सबसे प्रथम सहायता करने वाली है।।८२।।

वसंततिलका छन्द

श्रामण्यपुण्यतरुरत्र गुणौघशाखापत्रप्रसूननिचितोऽपि फलान्यदत्वा।
याति क्षयं क्षणत एव घनोग्रकोपदावानलात् त्यजत तं यतयोऽत्र दूरम् ।।८३।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि गुणरूपी जो शाखा पत्र फूल उन करके सहित ऐसा यह यतिरूपी वृक्ष है यदि इसमें भंयकर क्रोधरूपी दावानल प्रवेश कर जावे तो यह किसी प्रकार फल न देकर ही बात की बात में नष्ट हो जाता है इसलिये यतीश्वरों को चाहिये कि क्रोध आदि को वे दूर से ही छोड़ देवें।

भावार्थ—जिसवृक्ष पर नाना प्रकार की मनोहर शाखा मौजूद है तथा पत्र फूलों से भी जो शोभित हो रहा है और अल्पकाल में जिस पर फल आने वाले हैं ऐसे वृक्ष में यदि अग्नि प्रवेश कर जावे तो वह शीघ्र ही जल जाता है तथा उस पर किसी प्रकार का फल नहीं आता उसी प्रकार जो मुनि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र आदि गुणों कर सहित है किन्तु अभी तक उसके क्रोध मानादिक शान्त नहीं हुवे हैं ऐसे मुनि को कदापि स्वर्ग मोक्षादि की प्राप्ति नहीं हो सकती इसलिये मुनियों को चाहिये कि वे क्रोधादि को अपने पास भी न फटकने देवें।।८३।।

।।उत्तमक्षमाधारी इस प्रकार विचार करते हैं।।

तिष्ठामो वयमुज्वलेन मनसा रागादिदोषोज्झिता लोक: किञ्चिदपि: स्वकीयह्दये स्वच्छाचरो मन्यताम् ।
साध्या शुद्धिरिहात्मन: शमवतामत्रापरेण द्विषा मित्रेणापि किमु स्वचेष्टितफलं स्वार्थ: स्वयं लप्स्यते।।

अर्थ—रागद्वेषादि से रहित होकर हम तो अपने उज्जवल चित्त से रहेंगे स्वेच्छाचारी यह लोक अपने हृदय में चाहे हमको भला बुरा कैसा भी मानो क्योंकि सभी पुरूषों को अपने आत्मा की शुद्धि करनी चाहिये और इस लोक में बैरी अथवा मित्रों से हमको क्या है ? अर्थात् वे हमारा कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि जो हमारे साथ द्वेषरूप तथा प्रीतिरूप परिणाम करेगा उसका फल उसको अपने आप मिल जावेगा।।८४।। और भी उत्तम क्षमा वाला क्या चिन्तवन करता है इस बात को आचार्य दिखाते हैं

स्रग्धरा छन्द

दोषानाधुष्य लोके मम भवतु सुखी दुर्जनश्चेद्धनार्थी मत्सर्वस्वं गृहीत्वा रिपुरथ सहसा जीवितं स्थानमन्य:।
मध्यस्थस्त्वेवमेवाखिलमिह हि जगज्जायतां सौख्याराशिर्मत्तो मा भूदसौख्यं कथमपि भविन: कस्यचित्पूत्करोमि।।

अर्थ—मेरे दोषों को सबके सामने प्रकट कर संसार में दुर्जन सुखी होवे तथा धन का अर्थी मेरे समस्त धन आदि को ग्रहण कर सुखी होवे तथा बैरी मेरे जीवन को लेकर सुखी होवे और जिनको मेरे स्थान के लेने की अभिलाषा है वे स्थान लेकर आनन्द से रहें तथा जो रागद्वेष रहित मध्यस्थ होकर रहना चाहें वे मध्यस्थ रहकर ही सुख से रहें। इस प्रकार समस्त जगत सुख से रहो किन्तु किसी भी संसारी को मुझसे दु:ख न पहुंचे ऐसा मैं सबके सामने पुकार—२ कर कहता हूं।।८५।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

किं जानासि न वीतरागमखिलं त्रैलोक्यचूडामणिं किंतद्धर्ममुपाश्रितं न भवता किंवा न लोकोजड:।
मिथ्यादृग्भिरसज्जनै रपटुभि: किञ्चित्कृतोपद्रवाद्यत्कमार्जनहेतुमस्थिरतया बाधां मनोमन्यसे।।८६।।

अर्थ—मिथ्यादृष्टि दुर्जन मूर्ख जनों से किये हुवे उपद्रव से चंचल होकर कर्मों के पैदा करने में कारणभूत ऐसी वेदना का तू अनुभव करता है सो क्या ? हे मन तीन लोक के पूजनीक वीतरागपने को तू नहीं जानता है अथवा जिस धर्म को तूने आश्रयण किया है उस धर्म को तू नहीं जानता है अथवा यह समस्त लोक अज्ञानी जड़ है इस बात का तुझे ज्ञान नहीं है।

भावार्थ—तीन लोक के पूजनीक वीतराग भाव को जानता हुआ भी तथा सच्चे धर्म का अनुयायी होकर भी तथा समस्त लोक को जड़ समझता हुवा भी ‘‘हे मन’’ मिथ्यादृष्टियों से दिये हुवे दु:ख से दु:खित होता है यह बड़ा आश्चर्य है।।८६।।

मार्दव धर्म का वर्णन

वसंततिलका छन्द

धर्माङ्गमेतदिह मार्दवनामधेयं जात्यादिगर्वपरिहरमुषन्ति सन्त :।
तद्धार्यते किमु न वोधदृशा समस्तं स्वप्नेन्द्रजानसदृशं जगदीक्षमाणै:।।८७।।

अर्थ—उत्तम पुरूष जाति वल ज्ञान कुल आदि गर्वों के त्याग को मार्दव धर्म कहते हैं तथा यह धर्मों का अंगभूत है इसलिये जो मनुष्य अपनी सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से समस्त जगत को स्वप्न तथा इन्द्रजाल के तुल्य देखते हैं वे अवश्य ही इस मार्दवनामक धर्म को धारण करते हैं।।८७।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

कास्था,सद्मनि, सुन्दरेऽपि, परितो,दंदह्यमानेऽग्निभि: कायादौतुजरादिभि:प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम् ।
इत्यालोचयतो, हृदि, प्राशमिन: १ भास्वद्विवेकोज्वले गर्वस्यावसर: कुतोऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि।।८८।।

अर्थ—अत्यन्त मनोहर भी है किन्तु जिसके चारों तरफ अग्नि जल रही है ऐसे घर के बचने में जिस प्रकार अंशमात्र भी आशा नहीं की जाती उस ही प्रकार जो शरीर वृद्धावस्थाकर सहित है तथा प्रतिदिन एक अवस्था को छोड़कर दूसरी अवस्था को धारण करता रहता है वह शरीर सदाकाल रहेगा यह कब विश्वास हो सकता है ? इस प्रकार निरन्तर विवेक से अपने निर्मलहृदय में विचार करने वाले मुनि के समस्त पदार्थों में अभिमान करने के लिये अवसर ही नहीं मिल सकता इसलिये मुनियों को सदा ऐसा ही ध्यान करना चाहिये।।८८।।

आर्जव धर्म का वर्णन

हृदि यत्तद्वाचि वहि: फलित तदेवार्जवंभवत्येतत् ।
धर्माे निकृतिरधर्माे द्वाविह ‘‘सुरसद्मनरकपथौ’’।।८९।।

अर्थ—मन में जो बात होवे उस ही को वचन से प्रकट करना (ना कि मन में कुछ दूसरा होवे तथा वचन से कुछ दूसरा ही बोले) इसको आचार्य आर्जव धर्म कहते है तथा मीठी बात लगाकर दूसरे को ठगना इसको अधर्म कहते हैं और इसमें आर्जवधर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा अधर्म नरक को ले जाने वाला होता है इसलिये आर्जव धर्म के पालन करने वाले भव्य जीवों को , किसी के साथ माया से बर्ताव नहीं करना चाहिये।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

मायित्वं कुरुतेकृतं सकृदपिच्छायाविघातं गुणेष्वाजातेर्यमिनोऽर्जितेष्विह गुरुक्लेशै: १शमादिष्वलम ।
सर्वे तत्र यदासते विनिभृता: क्रोधादयस्तत्वतस्तत्पापं वत येन दुर्गतिपथे जीवश्चिरंभ्राम्यति।।९०।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि यदि एक बार भी किसी के साथ मायाचारी की जावे तो वह मायाचारी बड़ी कठिनता से संचयकिये हुवे अहिंसा सत्यादि मुनियों के गुणों को फीका बना देती है अर्थात् वे गुण आदरणीय नहीं रहने पाते और उस मायारूपी मकान में नाना प्रकार के क्रोधादि शत्रु छिपे हुवे बैठे रहते हैं और मायाचार से उत्पन्न हुवे पाप से जीव नाना प्रकार के दुर्गति मार्गों में भ्रमण करता फिरता है इसलिये मुनियों को माया अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये।।९०।।

सत्यधर्म का वर्णन

आर्या छन्द

स्वपरहितमेव मुनिभिर्मितममृतसमं सदैव सत्यं च।
वक्तव्यं वचनमथ प्रतिधेयं धीधनैर्मौनम् ।।९१।।

अर्थ—उत्कृष्टज्ञान के धारण करने वाले मुनियों को प्रथमतो बोलना ही नहीं चाहिये यदि बोले तो ऐसा वचन बोलना चाहिये जो समस्त प्राणियों के हित का करने वाला हो तथा परमित हो और अमृत के समान प्रिय हो तथा सर्वथा सत्य हो किन्तु जो वचन जीवों को पीड़ा देने वाला हो तथा कड़वा हो तो उस वचन की अपेक्षा मौन साधना ही अच्छा है।।९१।।

सति सन्ति व्रतान्येव सूनृते वचसि स्थिते |
भवत्याराधिता सद्भिःर्जगत्पूज्या च भारती ||९२||

अर्थ - जो मनुष्य सत्य वचन बोलने वाला है अर्थात सत्य व्रत का पालन करने वाला है उसके समस्त व्रत विद्यमान रहते हैं अर्थात् सत्य व्रत के पालन करने से ही वह समस्त व्रतों का पालन करने वाला हो जाता है और वह सत्यवादी सज्जन पुरुष तीन लोक की पूजनीक सरस्वती को भी सिद्ध कर लेता है ||९२||

भावार्थ - सरस्वती भी उसके आधीन हो जाती है |

शार्दूलविक्रीडित छन्द

आस्तामेतदमुत्र सुनृतवचा: कालेन यल्लप्स्यतेसद्भूपत्वसुरत्वसंसृतिसरित्पाराप्तिमुख्यं फलम् |
यात्प्राप्नोति यशः शशांकविशदं शिष्टेषु यन्मान्यतां यत्साधुत्वमिहैव जन्मनि परं तत्केन संवर्ण्यते ||९३||

अर्थ - तथा और भी आचार्य कहते हैं की सत्यवादी मनुष्य परभव में जाकर श्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा बनते हैं तथा इन्द्रादि फल को प्राप्त कर लेते हैं और सबसे उत्कृष्ट मोक्षरुपी फल को भी प्राप्त कर लेते हैं यह बात तो दूर रही किन्तु इसी भाव में वे चंद्रमा के समान उत्तमकीर्ति को पा लेते हैं तथा शिष्ट मनुष्य उनको बड़ी प्रतिष्ठा से देखते हैं और वे सज्जन कहे जाते हैं इत्यादि नाना प्रकार के उत्तम फल उनको मिलते हैं जोकि सर्वथा अवर्णने हैं | इसलिए सज्जनों को अवश्य ही सत्य बोलना चाहिए ||९३||

शौच धर्म का वर्णन

आर्या छन्द

यत्परदारार्थादिषु जन्तुषु निस्पृहमहिसकं चेत: ।
१दुर्भेद्यान्तमलहृत्तदेव शौचं परं नान्यत् ।।९४।।

अर्थ—जो परस्त्री तथा पराये धन में इच्छारहित है तथा किसी भी जीव के मारने की जिसकी भावना नहीं है और जो अत्यन्त दुर्भेद्य लोभ क्रोधादिमल का हरण करने वाला है ऐसा चित्त ही शौच धर्म है किन्तु उससे भिन्न कोई शौचधर्म नहीं है।

भावार्थ—गंगा आदि नदियों में स्नान भी किया तथा पुष्कर आदि तीर्थों में भी गये किन्तु मन लोभ आदि कर ही संयुक्त बना रहा तो कदापि शौचधर्म नहीं पल सकता इसलिये मन को सबसे पहले शुद्ध करना चाहिये।।९४।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

गंगासागर पुष्करादिषु सदा तीर्त्थेषु सर्वेष्वपि स्नातस्यापि न जायते तनुभृत: प्रायो विशुद्धि: परा।
मिथ्यात्वादिमलीमसं यदि मनो बाह्येऽतिशुद्धोदकैर्घौतं किं वहुशोऽपि शुद्ध्यति सुरापूरप्रपूर्णों घट:।।९५।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं जिस प्रकार अत्यन्तघृणित मद्य से भरा हुआ घड़ा यदि बहुत बार शुद्ध जल से धोया भी जावे तो भी वह शुद्ध नहीं हो सकता उस ही प्रकार जो मनुष्य बाह्य में गंगा पुष्कर आदि तीर्थों में स्नान करने वाला है किन्तु उसका अंत:करण नानाप्रकार के क्रोधादि कषायों से मलीमस है तो वह कदापि उत्कृष्ट शुद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता इसलिये मनुष्य को सबसे प्रथम अपने अंत: करण को शुद्ध करना चाहिये क्योंकि जब तक अंत:करण शुद्ध न होगा तब तक सर्व बाह्यक्रिया व्यर्थ हैं।।९५।।

संयमधर्म का वर्णन

आर्या छन्द

जन्तुकृपार्दितमनस: समितिषु साधो: प्रवर्तमानस्य ।
प्राणेन्द्रियपरिहार: संयममाहुर्महामुनय:।।९६।।

अर्थ—जिसका चित्त जीवों की दया से भीगा हुवा है तथा जो ईर्या, भाषा, एषणा आदि पांच समितियों का पालन करने वाला है ऐसे साधु के जो षट्काय के जीवों की हिंसा का तथा इन्द्रियों के विषयों का त्याग है उसी को गणधरादिदेव संयम धर्म कहते हैं।

भावार्थ—जब तक दया से चित्त भीगा न रहेगा तथा ईर्या भाषा एषणा आदि समितियों का पालन न किया जावेगा और समस्त जीवों की हिंसा का तथा इन्द्रियों के विषयों का त्याग न किया जावेगा तब तक कदापि संयमधर्म नहीं पल सकता इसलिये संयमियों को उपर्युक्त बातों पर विशेषतया ध्यान देना चाहिये।।९६।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

मानुष्यं किल दुर्लभं भवभृतस्तत्रापि जात्यादयस्तेष्वेवाप्तवच: श्रुति: स्थितिरतस्तस्याश्च दृग्बोधने।
प्राप्ते ‘ते’ अपि निर्मले अपि परं स्यातां न येनोज्झिते स्वर्मोक्षैकफलप्रदे स च कथं न शलाघ्यते संयम:।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि प्रथम तो इस संसाररूपी गहनवन में भ्रमण करते हुये प्राणियों को मनुष्य को ना ही अत्यन्त कठिन है किन्तु किसी कारण से मनुष्य जन्म प्राप्त भी हो जावे तो उत्तम ब्राह्मणादि जाति मिलना अति दु:साध्य है यदि किसी प्रबलदैवयोग से उत्तम जाति भी मिलजावे तो अर्हंत भगवान के वचनों का सुनना बड़ा दुर्लभ है यदि उनके सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त हो जावे तो संसार में अधिक जीवन नहीं मिलता यदि अधिक जीवन भी मिले तो सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होनी अति कठिन है यदि किसी पुण्य के उदय से अखण्ड तथा निर्मल सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति भी हो जावे तो उस संयमधर्म के बिना वे स्वर्ग तथा मोक्षरूपी फल के देने वाले नहीं हो सकते इसलिये सबकी अपेक्षा संयम अति प्रशंसनीय है अत: ऐसे संयम की अवश्य संयमियों को रक्षा करना चाहिये।।९७।।

तप धर्म का वर्णन

आर्या छन्द

कर्ममलविलयहेतोर्बोधदृशा तप्यते तप: प्रोक्तम्
तद्द्वेधा द्वादशधा जन्माम्बुधियानपात्रमिदम्।।९८।।

अर्थ—सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से भले प्रकार वस्तु के स्वरूप को जानकर ज्ञानावरणादि कर्ममल के नाश की बुद्धि से जो तप किया जाता है वही तप कहा गया है तथा वह तप मूल में बाह्य अभ्यन्तर भेद से दो प्रकार है और १.अनशन २. अवमौदर्य ३. वृत्तिपरिसंख्यान ४. रसपरित्याग. ५. विविक्तशय्यासन ६. कायक्लेश इस रीति से छ: प्रकार का बाह्य तथा १. प्रायश्चित २. विनय ३. वैयावृत्य ४. स्वाध्याय ५. व्युत्सर्ग ६. ध्यान इस प्रकार छ: प्रकार का अभ्यन्तर इस रीति से उस तप के बारह भी भेद हैं तथा वह तप संसाररूपी समुद्र से पार करने के लिये जहाज समान है अर्थात मोक्ष का देने वाला है।।९८।।

पृथ्वी छन्द

कषायविषयोद्भटप्रचुरतस्करौधो हठात्तप: सुभटताडितो विघटते यतो दुर्जय: ।
अतोहि निरुपद्रवश्चरति तेन धर्मश्रिया यति: समुपलक्षित: पथि विमुक्तिपुर्या: सुखम् ।।९९।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं यद्यपि क्रोधादिकषायरूपी उद्धत तथा प्रबल चौरों का समूह दुर्जय है अर्थात् साधारण रीति से जीतने में नहीं आ सकता तो भी जिस समय तपरूपी प्रबल योधा उसके सामने आता है उस समय उसकी कुछ भी तीन—पांच नहीं चलती अर्थात् बात की बात में वह जीत लिया जाता है इसलिये जो योगीश्वर तपरूपसुभट के साथ धर्म रूपी लक्ष्मी कर युक्त है वह मोक्षरूपी नगर के मार्ग में निरूपद्रव तथा सुख से चला जाता है।

भावार्थ—जिस प्रकार कोई मनुष्य विदेश को निकले तथा उसके पास लक्ष्मी भी हो किन्तु उसके पास कोई सुभट न हो तो वह बात की बात में भयंकर डाकुओं से लूट लिया जाता है परन्तु यदि उसके पास थोड़े से भी प्रबलयोधा होवें तो उसका डाकू कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते अर्थात् उन डाकुओं को योधा तत्काल में जीत लेते हैं उस ही प्रकार संसार में कषाय तथा विषयरूपी योधा यद्यपि अत्यन्त दुर्जय है किन्तु जिस मुनि के पास तप रूपी प्रबल सुभट मौजूद हैं उसका वे कुछ भी नहीं कर सकते तथा वे मुनि उपद्रवरहित सुख से मोक्ष को चले जाते हैं इसलिये मोक्षाभिलाषी मुनियों को तप सबसे प्रिय समझना चाहिए ||९९||

मन्दाक्रान्ता छन्द

मिथ्यात्वादेर्यदिह भविता दु:खमुग्नं तपोभ्यो जातं तस्मादुदककणिकैकेव सर्वाब्धिनीरात् ।
स्तोकं तेन प्रसभमखिलकृच्छ्रलब्धे नरत्वे यद्येतर्हि स्खलसि तदहो का क्षतिर्जीव ते स्यात् ।।१००।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि हे जीव जिस प्रकार समस्त समुद्र की अपेक्षा जल कण अत्यन्त छोटा होता है उस ही प्रकार तप के करने से बहुत थोड़े दु:ख का तुझे अनुभव करना पड़ता है किन्तु जिस समय मिथ्यात्व के उदय से तू नरक जावेगा उस समय तुझको नाना प्रकार के छेदन भेदन आदि असह्यदु:खों का सामना करना पड़ेगा तो भी तू न जाने तप से क्यों भयभीत होता है ? तथा तेरी तप के करने में क्या हानि है ?।।१००।।

त्यागधर्म का वर्णन—

शार्दूलविक्रीडित छन्द

व्याख्या या क्रियते श्रुतस्य यतये यद्दीयते पुस्तकं स्थानं संयमसाधनादिकमपि प्रीत्या सदाचारिणा।
स त्यागो वपुरादिनिर्ममतया नो किंचनास्ते यतेराकिंचन्यमिदं च संसृतिहरो धर्म:सतां सम्मत:।।१०१।।

अर्थ—शास्त्रों का भलीभांति व्याख्यान करना तथा मुनियों को पुस्तकें तथा स्थान और संयम के साधन पीछी कमण्डलु आदि का देना सदाचारियों का उत्कृष्ट त्याग धर्म है और मेरा कुछ भी नहीं है ऐसा विचार कर अत्यन्त निकट शरीर में भी ममता छोड़ देना आकिंचन्य नामक धर्म है तथा वह यति के होता है और वह समस्त संसार का नाश करने वाला है तथा समस्त श्रेष्ठ पुरूषों के द्वारा वह आदरणीय है।।१०१।।

अकिंचन्य धर्म का स्वरूप वर्णन—

शिखरिनी छन्द

विमोहा मोक्षाय स्वहितनिरताश्चारुचरिता गृहादि त्याक्तवा ये विदघति तपस्तेऽपि विरला:।
तपस्यंतोन्यस्मिन्नपि यमिनि शास्त्रादि ददतो सहाया: स्युर्ये ते जगति यमिनो दुर्लभतरा:।।१०२।।

अर्थ—जिनका सर्वथा मोह गल गया है तथा अपने आत्मा के हित में ही निरन्तर लगे रहते हैं और सुन्दर चारित्र के धारण करने वाले हैं तथा घर स्त्री पुत्रादि को छोड़कर मोक्ष के लिये तप करते हैं वे मुनि संसार में बिरले ही हैं तथा जो स्वत: अपने हित के लिये तप करने वाले हैं तथा दूसरे तपस्वियों के लिये जो शास्त्रादि का दान करते हैं और उनके सहायी भी हैं ऐसे योगीश्वर तो संसार के बीच में अत्यन्त ही दुर्लभ हैं अर्थात् बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।।१०२।।

परंमत्वा सर्वं परिहृतमशेषं श्रुतविदा वपु: पुस्ताद्यास्ते तदपि निकटं चेदिति मति:।
ममत्वा भावे तस्सदपि न सदन्यत्र घटते जिनेन्द्राज्ञाभंगो भवति च हठात कल्मषमृषे :।।१०३।।

अर्थ—समस्त शास्त्र के जानने वाले वीतराग ने अपनी आत्मा से समस्तवस्तु को भिन्न जानकर सबका त्याग कर दिया है यदि कहोगे कि सबको छोड़ते समय शरीर पुस्तकादि का क्यों नहीं त्याग किया तो उसका समाधान यही है कि उनकी शरीरादि में भी किसी प्रकार की ममता नहीं रही है इसलिये वे मौजूद भी नहीं मौजूद की तरह ही है अर्थात् मुनियों का शरीरादि बिना आयुकर्म के नाश हुवे छूट नहीं सकता यदि वे बीच में ही छोड़ देवे तो उनको प्राण घात करने के कारण हिंसा का भागी होना पड़ेगा इसलिये शरीरादि तो रहता है किन्तु वे शरीरादि में किसी प्रकार का ममत्व नहीं रखते परन्तु यदि वे शरीरादि में किसी प्रकार का ममत्व करे तो उनको जिनेन्द्र की आज्ञाभंगरूप महान दोष का भागी होना पड़े अर्थात् जब तक ममत्व रहेगा तब तक वे मुनि ही नहीं कहलाये जा सकते।।१०३।।

ब्रह्मचर्य धर्म का वर्णन

स्रग्धरा छन्द

यत्संगाधारमेतच्चलति लघु च यत्तीक्ष्णदु:खौघधारं मृत्पिण्डीभूतभूतं कृतवहुविकृतिभ्रान्ति संसारचक्रम् ।
ता नित्यं यन्मुमुक्षुर्यतिरमलमति: शान्तमोह: प्रपश्मेज्जामी: सवित्रीरिवहरिणदृशस्तत्परं ब्रह्मचर्यम् ।।

अर्थ—जिस प्रकार कुम्भकार का चाक जमीन के आधार से चलता है तथा उस चाक की तीक्ष्ण धारा रहती है और उसके ऊपर मिट्टी का पिण्ड भी रहता है तथा वह चाक नाना प्रकार के कुसूल स्थास आदि घट के विकारों को करता है उस ही प्रकार संसार रूपी चाक की आधार यह स्त्री है अर्थात् यह स्त्री न होती तो कदापि संसार में भटकना न फिरता तथा इस संसार रूपी चाक में अत्यंत तीक्ष्णदु:खों का समूह ही धार है अर्थात् संसार में नानाप्रकार के नरकादि दु:खों का सामना करना पड़ता है और इस संसार रूपी चाक के ऊपर नाना प्रकार के जीव जो हैं वे ही पिण्ड हैं तथा वह संसाररूपी चाक देव मनुष्यादि नानाप्रकार के विकार कराकर जीवों को भ्रमण कराने वाला है अत: स्त्री ही संसारचक्र की कारण है इसलिये जो मोक्ष का अभिलाषी मनुष्य उन स्त्रियों को माता बहिन पुत्री के समान मानता है उस ही के उत्कृष्ट धर्म का भलीभांति पालन होता है अत: ब्रह्मचारी मनुष्यों को चाहिये कि वे कदापि स्त्रियों के साथ सम्बन्ध न रक्खे।।१०४।।

अविरतमिह तावत्पुण्यभाजो मनुष्या हृदिविरचितरागा: कामिनीनां वसन्ति ।
कथमपि न पुनस्ता जातु येषां तदंघ्री: प्रतिदिनमतिनम्रास्तेऽपि नित्यं स्तुवन्ति ।।१०५।।

अर्थ—जो पुरूष निरन्तर स्त्रियों के हृदय में प्रीति उपजावने वाले हैं अर्थात् जिनको स्त्रियां चाहती हैं यद्यपि वे भी संसार में धन्य हैं परन्तु जिन मनुष्यों के हृदय में स्त्रियां स्वप्न में भी निवास नहीं करती वे उनसे भी अधिक धन्य हैं तथा उन वीतरागी पुरूषों के चरण कमलों को स्त्रियों के प्रियपात्र बड़े —२ चक्रवर्ती आदि भी शिर झुकाकर नमस्कार करते हैं इसलिये जिनपुरूषों को संसार में अपनी कीर्ति फैलाने की इच्छा है उनको कदापि स्त्रियों के जाल में नहीं फॅंसना चाहिये।।१०५।।

स्रग्धरा छन्द

वैराग्यत्यागदारुकृतरुचिरचना चारु निश्रेणिका यै: पादस्थानैरुदारैर्दशभिरनुगता निश्चलैज्र्ञानदृष्टे :।
योग्या स्यादारुरुक्षो: शिवपदसदनं गन्तुमित्येषु केषां नो धर्मेषु त्रिलोकीपतिभिरपि सदा स्तूयमानेषु हृष्टि:।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि जिसके इधर उधर वैराग्य तथा त्यागरूपी मनोहर काष्ट लगे हुवे हैं तथा जिसमें बड़े—२ मजबूत दशधर्मरूपी पादस्थान (दण्डे) मौजूद हैं ऐसी सीढ़ी मोक्षरूपी महल की चढ़ने की इच्छा करने वाले मनुष्य के चढ़ने के लिये योग्य है क्योंकि जो तीन लोक के पति इन्द्रादिकों से वन्दनीक हैं उन दशधर्मों के धारण करने में किस को हर्ष नहीं हो सकता है ? अर्थात् समस्त मोक्षाभिलाषी उनको हर्ष के साथ पाल सकते हैं।।१०६।।

।।इस प्रकार दशधर्म का निरूपण हो चुका।।

शुद्धात्मा की परणतिरूप धर्म का वर्णन

शार्दूलविक्रीडित छन्द

न:शेषामलशीलसद्गुणमयामत्यन्तसम्यस्थितां बंदे तां परमात्मन: प्रणयिनीं कृत्यान्तगां स्वस्थताम् ।
यत्रानन्तचतुष्टयामृतसरित्यात्मानमन्तर्गतं न प्राप्नोति जरादिदु:सहशिख: संसारदावानल:।।१०७।।

अर्थ—समस्तनिर्मलशीलगुणस्वरूप तथा सर्वथा समता रूप अवस्था में होने वाली और उत्कृष्ट आत्मा से प्रीति कराने वाली तथा जिसके होते सन्ते किसी प्रकार का कर्तव्य बाकी नहीं रहता ऐसी स्वस्थता को मैं नमस्कार करता हूँ जिस अनंतविज्ञानादि अनन्तचतुष्टयस्वरूप, स्वस्थतारूपी अमृतनंदी के भीतर रहे हुवे आत्मा को जरा आदि दु:सहशिखा को धारण करने वाला भी संसाररूपी बड़वानल प्राप्त नहीं हो सकता।

भावार्थ—जिस प्रकार कोई नदी के जल में प्रवेश कर जावे तो उसका भयंकर भी अग्नि कुछ भी नहीं कर सकती उसही प्रकार जो अनन्तचतुष्टयस्वरूप स्वस्थतारूपी अमृत नदी में प्रविष्ट है उसको असह्य भी संसाररूपी वड़वाग्नि अंशमात्र भी नहीं सता सकती।।१०७।।

आयातेऽनुभवे भवारिमथने निर्मुक्तमूत्र्याश्रये शुद्धेऽन्यादृशि सोमसूर्यहुतभुक्कान्तेरनन्तप्रभे।
यस्मिन्नस्तमुपैति चित्रमचिरान्नि:शेषवस्त्वन्तरं तद्वन्दे विपुलप्रमोदसदनं चिुद्रुपमेकं मह:।।१०८।।

अर्थ—समस्त कर्मादि वैरियों के नाश करने वाले तथा शरीरादि के आश्रयकर रहित अर्थात् जिसको किसी प्रकार के शरीर आदि का आश्रय नहीं है, और शुद्ध तथा दूसरे के प्रत्यक्ष के अगोचर तथा चन्द्रमा सूर्य और अग्नि से भी अनन्तगुणी प्रभा को धारण करने वाले जिस चैतन्यस्वरूप उत्कृष्टतेज के अनुभव होने पर बात की बात में समस्त पर पदार्थ अस्त हो जाते हैं ऐसे अनेक प्रकार के प्रमोद को पैदा करने वाले उस चैतन्यस्वरूप तेज को मैं शिर झुकाकर नमस्कार करता हूं।।१०८।।

जातिर्याति न यत्र यत्र च मृतो मृत्युर्जरा जर्जरा जाता यत्र न कर्मकायघटना नोवाग्रुजो व्याधय:
यत्रात्मैवपरं चकास्ति विशदं ज्ञानैकमूर्तिर्विभुर्नित्यं तत्पदमाश्रितो निरूपमा सिद्धा: सदा पान्तु व ।।

अर्थ—जहां पर न जन्म है, न मरण है, न जरा है, न कर्मों का तथा शरीर का सम्बन्ध है, न वाणी है और न रोग है तथा जहां पर निर्मल ज्ञान का धारण करने वाला और प्रभु आत्मा सदा प्रकाशमान है ऐसे उस अविनाशी पद में रहने वाले उपमारहित (अर्थात् जिनको किसी की उपमा ही नहीं दे सकते ऐसे) सिद्ध भगवान् मेरी रक्षा करो अर्थात् ऐसे सिद्धों का मैं शरण लेता हूं।।१०९।।

दुर्लक्ष्येपि चिदात्मनि श्रुतवलात्किंचित्स्वसंवेदनात् ब्रूूम: किंचिदिह प्रबोधनिधिभिग्र्राह्यं न किञ्चिच्छलम्
मोहे राजनि कर्मणामतितरां प्रौढेन्तराये रिपौ दृग्बोधावरणद्वये सति मतिस्तादृक्कुतो मादृशाम् ।।११०।।

अर्थ—जिस प्रकार अर्मूितक होने के कारण आकाश आदि किसी के देखने में नहीं आ सकते उस ही प्रकार यद्यपि यह आत्मा किसी के दृष्टिगोचर नहीं है तो भी उस चैतन्यस्वरूप आत्मा के स्वरूप को शास्त्र के बल से अथवा अपने अनुभव से मैं वर्णन करता हूं इसलिये बुद्धिमानों को इसमें किसी प्रकार की दगाबाजी नहीं समझनी चाहिये क्योंकि समस्तकर्मों का राजा मोहनीय और अत्यंतप्रबल अंतरायरूपी शत्रु तथा ज्ञानावरण दर्शनावरण अभी मेरी आत्मा के साथ लगे हुवे हैं इसलिये वास्तविक स्वरूप के कहने में मेरी बुद्धि कैसे प्रवीण हो सकती है ?

भावार्थ—वास्तविक रीति से आत्मा के स्वरूप का वर्णन अर्हन्त ही कर सकते हैं अल्पज्ञानी नहीं तथा अभी मैं अल्पज्ञानी हूं इसलिये मेरा कथन सर्वज्ञदेवप्रणीत शास्त्र के अनुसार होने के कारण तथा कुछ अनुभव से होने के कारण विद्वानों को अवश्य मानना चाहिये।।११०।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

विद्वन्मान्यतया सदस्यतितरामुद्दण्डवाग्डम्बरा: शृङ्गारादिरसै: प्रमोदजनकं व्याख्यानमातन्वते।
ये ते च प्रतिसद्म सन्ति बहवो व्यामोहविस्तारिणो येभ्यस्तत्परमात्मतत्त्वविषयं ज्ञानं तु ते दुर्लभा:।।

अर्थ—अपने को विद्वान् मानकर शृङ्गारादिरससहित नाना प्रकार के प्रमोदजनक व्याख्यानों को कहने वाले तथा सभा में व्यर्थ वचनों के आडम्बर को धारण करने वाले और मनुष्यों को सन्मार्ग के भुलाने वाले पुरूष संसार में प्रतिग्रह बहुत से मिलेंगे परन्तु जो परमात्मतत्त्व के ज्ञान के देने वाले हैं ऐसे मनुष्य बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।।१११।।

आपद्धेतुषु रागरोषनिकृतिप्रायेषु दोषेष्वलं मोहात्सर्वजनस्य चेतसि सदा सत्सु स्वभावादपि।
तन्नाशाय च संविदे च फलवत्काव्यं कवेर्जायते शृङ्गारादिरसं तु सर्वजगतो मोहाय दु:खाय च।।११२।।

अर्थ—समस्त मनुष्यों के चित्तों में नाना प्रकार के दु:ख देने वाले ऐसे राग द्वेष माया क्रोध लोभ आदि दोष स्वभाव से ही रहे आते हैं इसलिये जो कवि का काव्य उनको मूल में उड़ा देता है तथा सम्यग्ज्ञान का उत्पन्न करने वाला होता है वास्तव में वही कार्यकारी समझना चाहिये अर्थात् जिसमें वीतरागपने का वर्णन होवे वही काव्य फल के देने वाला है और शृंगारादिरस तो समस्तजगत को मोह के उत्पन्न करने वाले तथा दु:ख के देने वाले हैं इसलिये भव्यों को चाहिये कि वे वीतराग भाव को को दर्शाने वाले शास्त्रों का ही अभ्यास करें।।११२।।

वसंततिलका छन्द

कालादपि प्रसृतमोहमहांधकारे मार्ग न पश्यति जनो जगति प्रशस्ते।
क्षुद्रा:क्षिपन्ति दृशि दृ:श्रतिधूलिमस्य नस्यात्कथं गतिरनिश्चितदुष्पथेषु।।११३।।

अर्थअनादिकाल से फैले हुवे मोह रूपी महान् अन्धकार से व्याप्त इस जगत में बिचारे मोही जीव एक तो स्वयमेव ही श्रेष्ठमार्ग को नहीं देख सकते हैं यदि किसी रीति से देख भी सकें तो दुष्ट पुरूष और भी उनकी आंखों में शृंगारादिशास्त्र सुनाकर धूली डालते हैं इसलिये कहां तक वे जीव खोटे मार्ग में गमन नहीं कर सकते ?

भावार्थ—जिस प्रकार जात्यन्ध पुरूष को एक तो स्वयमेव ही मार्ग नहीं सूझता किन्तु उसकी आंखों में यदि धूलि डाल दी जावे तो और भी वह घबड़ाकर खोटे मार्ग में गिर पड़ता है उस ही प्रकार संसार में भ्रमण करते हुवे प्राणियों को एक तो मोह के उदय से स्वयं मार्ग नहीं सूझता परन्तु शृंगारादिरसों के सुनने से वे और भी खोटे मार्गों में गिरते हैं इसलिये भव्यजीवों को चाहिये कि वे कदापि शृंगारादिरूपशास्त्रों को न सुनें जिससे उनको खोटे मार्ग में न गिरना पड़े।।११३।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

विण्मूत्रकृमिसंकुले कृतघृणैरंत्रादिभि: पूरिते शुक्रासृग्वरयोषितामपि तनुर्मातु: कुगर्भेऽजनि।
सापि क्लिष्टरसादिधातुघटिता पूर्णा मलाद्यैरहो चित्रं चंद्रमुखीति जातमतिभिर्विद्वद्भिरावर्ण्यते ।।११४।।

अर्थ—यह स्त्री का शरीर विष्टा मूत्र तथा नाना प्रकार के कीड़ों कर व्याप्त और प्रबल घृणा को पैदा करने वाले आंत मांस आदि कर पूरित तथा वीर्य रक्त आदि से पुष्ट ऐसे खोटे माता के गर्भ से उत्पन्न हुवा है और स्वयं भी वह स्त्री नाना प्रकार के खोटे वीर्य रक्त आदि कर बनी हुई है तथा मल आदि से युक्त है तो भी नीच विद्वान कवि ऐसी स्त्री को चन्द्रमुखी कहते हैं यह बड़े आश्चर्य की बात है।।११४।।

शिखरिणी छन्द

कचा यूकावासा मुखमजिनवद्धस्थिनिचय: कुचौ मांसोच्छ्रायौ जठरमपि विष्टादिघटिका ।
मलोत्सर्गे यंत्रं जघनमवलाया: क्रमयुगं तदाधरस्थूणे किमिह किल रागाय महताम् ।।११५।।

अर्थ—स्त्री के केश तो जूवां के घर हैं मुख चर्म से वेष्टित हाड़ों का समूह है स्तन मांस के पिण्ड हैं उदर विष्टा आदि खराब चीजों का घर है योनि स्थान, मूत्र आदि के बहने का नाला है और दोनों चरण उस योनि स्थान के ठहरने के लिये खम्भों के समान हैं इसलिये ऐसी खराब स्त्री में विद्वान पुरूष कदापि राग नहीं कर सकते ।।११५।।

द्रुतविलम्बित छन्द

परमधर्मनदाज्जनमीनकान् शशिमुखीवडिशेनसमुद्धतान् ।
अतिसमुल्लसिते रतिमुर्मुरे पचति हा हतक:स्मरधीवर:।।११६।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि यह हिंसक कामदेवरूपीधीवर जीवरूप मछलियों को उत्कृष्ट धर्मरूपी तालाब से निकालकर स्त्रीरूपी मांस सहित कांटे पर लटकाकर अत्यंतप्रज्वलित संभोगरूपी भूभर में भूंजती है यह बड़े दु:ख की बात है।

भावार्थ—जिस प्रकार धीमर जिह्वाइन्द्रिय की लोभी मछलियों को मांस लिप्तकांटे से बाहर निकालकर भूभर में भूंजता है उसी प्रकार यह कामदेव भी जीवों को धर्म से हटाकर स्त्रियों के जाल में फंसा देता है इसलिये भव्य जीवों को चाहिये कि वे सर्वथा प्राणों के घात करने वाले इस कामदेव को अपने हृदय में फटकने तक न देवें।।११६।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

येनेदं जगदापदाम्बुधिगतं कुर्वीत मोहो हठात् येनैते प्रतिजन्तु हन्तुमनस: क्रोधादयो दुर्जया: ।
येन भ्रातरियं च संसृतिसरित् संजायते दुस्तरा स्तज्जानीहि समस्तदोषविषमं स्त्रीरूपमेतद्ध्रुवम् ।।११७।।

अर्थ—जिस स्त्री के रूप की सहायता से मोह, जबर्दस्ती मनुष्य को नाना प्रकार के दु:ख देता है तथा उसी रूप की सहायता से समस्त जीवों के नाशक क्रोधादि कषाय दुर्जय हो जाते हैं और उसी रूप की सहायता से संसार रूपी नदी तैरी नहीं जा सकती अर्थात् अथाह हो जाती है इसलिये आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भव्यो ! उस स्त्री को समस्त दोषों से भी भयंकर समझो।

भावार्थ—जितने भर संसार में दोष हैं वे किसी न किसी अहित को तो अवश्य ही करते हैं परन्तु स्त्री का रूप भयंकर अहित को करता है इसलिये हितैषियों को कदापि स्त्री के रूप में नहीं फंंसना चाहिये ।।११७।।

मोहव्याधभटेन संसृतिवने मुग्धेणवंधापदे पाशा: पंकजलोचनादिविषया: सर्वत्र सज्जीकृता: ।
मुग्धास्तत्र पतन्ति तानपि वरनास्थाय वांछन्त्यहो हा कष्ठं परजन्मनेऽपि न विद: क्वापीति धिङ् मूर्खताम्।।११८।।

अर्थ—इस संसारवन में भोले जीवरूपी मृगों को बांधकर दु:ख देने के लिये मोहरूपीसुभट चिड़िया मारने सब जगह लोचनादि विषयरूपी जाल फैला रखे हैं और उन विषयरूपी जालों को श्रेष्ठ मानकर भोले जीव उनमें आकर फंस जाते हैं यह बड़े दु:ख की बात है किन्तु आत्मा के स्वरूप को जानने वाले विद्वान् स्वप्न में भी उन जालों में नहीं फंसते और परलोक के लिये भी उन विषयों को हितकारी नहीं समझते इसलिये आचार्य कहते हैं कि मूर्खता के लिये धिक्कार है।

भावार्थ—जिस प्रकार चिड़ियामार कुछ चावल आदि डालकर वन में जाल बिछा देते हैं उसमें चावलों के लोलुपी नाना प्रकार के कबूतर आदि पक्षी फंस जाते हैं उस ही प्रकार संसार में मोह के उदय से मुग्धपुरूष विषयों में प्रवृत्त हो जाते हैं तथा नाना प्रकार के दु:खों को भोगते हैं किन्तु बुद्धिमान पुरूष विषयों के दु:खों को जानकर विषयों में नहीं फंसते हैं तथा उन विषयों की आकांक्षा भी नहीं करते इसलिये सदा सुखी रहते हैं अत: विद्वानों को विषयों की तरफ कदापि ऋजु नहीं होना चाहिये।।११८।

एतन्मोहठकप्रयोगविहितभ्रान्तिभ्रमच्चक्षुषा पश्यत्येषजनोऽसमंजसमसद्बुद्धिर्ध्रुवं व्यापदे।
अप्येतान्विषयाननन्तनरकक्लेशप्रदान स्थिरान् यच्छश्वत्सुखसागरानिव सतश्चेत: प्रियान्मन्यते ।।११९।।

अर्थ—यह कुबुद्धि मनुष्य मोहरूपी जो ठग उसके प्रयोग से उत्पन्न हुए भ्रम से, भ्रान्त जो नेत्र उससे विपरीत ही देखता है तथा विपरीत देखने से नाना प्रकार के दु:खों का अनुभव करता है तो भी अनन्त नरकों के दु:खों को देने वाले तथा बिजली के समान चंचल इन विषयों को स्थिर तथा निरन्तर सुख के देने वाले और चित्त को प्रिय मानता है।

भावार्थ—जिस प्रकार कोई बैरी किसी मनुष्य पर मंत्रादि का प्रयोग करता है तो उससे उसके नेत्र घूमने लग जाते हैं तथा वह नाना प्रकार की आपत्तियों को भोगता है उस ही प्रकार यह कुबुद्धिजन मोहरूपी बैरी के प्रयोग से विषयों में प्रवृत्त हो जाता है तथा समस्त चीजें उसको विपरीत ही सूझ निकलती हैं तथा उसी विपरीतता के सबब वह नानादु:खों को भोगता है तो भी विषयों को अच्छा मानता है यह कितने दु:ख की बात है।।११९।।

शार्दुलविक्रीडित छन्द

संसारेऽत्र घनाटवीपरिसरे मोहष्ठक: कामिनी क्रोधाद्याश्च तदीयपेटकमिदं तत्सन्निधौ जायते ।
प्राणी तद्विहितप्रयोगविकल: तद्वश्यतामागतो न स्वं चेतयते लभेत विपदं ज्ञातु: प्रभो: कथ्यताम् ।।१२०।।

अर्थ—इस संसाररूपी विस्तीर्ण वन में ठग तो मोह है और स्त्री तथा क्रोध मान माया आदि उसके पास प्राणियों को ठगने की सामग्री है, (अर्थात् स्त्री क्रोधादि कारणों से ही वह प्राणियों को ठगता है) तथा प्राणी उसके प्रयोग से विकल होकर उसके आधीन पड़े हुवे हैं और अपने स्वरूप को भी नहीं जानते हैं तथा नाना प्रकार की आपत्तियों को सहते हैं इसलिये ग्रन्थकार कहते हैं कि हे जीव तुझे उस ज्ञानानन्द स्वरूप आत्मा ही का अर्थात् श्री सर्वज्ञदेव का ही आश्रयण करना चाहिये।

भावार्थ—ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मा के आश्रयण करने पर प्रबल भी ठग मोह कुछ भी नहीं कर सकता है इसलिये भव्यजीवों को ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मा का ही आराधन करना चाहिये।।१२०।।

ऐश्वर्यादिगुणप्रकाशनतया मूढा हि ये कुर्वते सर्वेषां टिरिटिल्लितानि पुरत: पश्यन्ति नो व्यापद: ।
विद्युल्लोलमपि स्थिरं परमपि स्वं पुत्रदारादिकं मन्यन्ते यदहो तदत्र विषमं मोहप्रभो: शासनम् ।।१२१।।

अर्थ—मूढ़ पुरूष मैं लक्ष्मीवान् हूं तथा मैं ज्ञानवान हूं इत्यादि अपने गुणों को प्रकाशित करते हैं तथा समस्त पुरूषों के सामने नाना प्रकार की गालियों को बकते हैं किन्तु आने वाली नरकादि विपत्तियों पर कुछ भी ध्यान नहीं देते तथा बिजली के समान चंचल भी पुत्र स्त्री आदि को स्थिर मानते हैं और अपने से भिन्न भी उनको अपना मानते हैं इसलिये आचार्य कहते हैं कि मोहचक्रवर्ती की आज्ञा बड़ी कठोर है। भावार्थ—पर को अपना मानना तथा चंचल को स्थिर मानना और मत्त होकर व्यर्थ नाना प्रकार की खराब चेष्टा करना मोह के उदय से ही होता है इसलिये उत्तम पुरूषों को मोह के नाश करने के लिये अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।।१२१।।

शिखरिणी छन्द

व्कयाम: किंकुर्म: कथमिह सुखं किंनु भविता कुतोलभ्या लक्ष्मी: कइहनृपति: सेव्यत इति।
विकल्पानां जालं जडयति मन: पश्यत सतामपिज्ञातार्थानामिहमहदहो मोहचरितम् ।।१२२।।

अर्थ—हम कहां जावें क्या करें कैसे सुख हो किस रीति से लक्ष्मी मिले किस राजा की सेवा टहल करें इत्यादि नाना प्रकार के विकल्पों के समूह संसार में प्राणियों के उत्पन्न होते रहते हैं तथा भले प्रकार वस्तु के स्वरूप को जानने वाले भी मनुष्यों के मन को जड़ बना देते हैं यह प्रत्यक्ष गोचर है इसलिये ग्रन्थकार कहते हैं कि मोह का चरित्र बड़ा आश्चर्यकारी है।

भावार्थ—मोह के उदय से मनुष्यों को नाना प्रकार के नहीं करने योग्य भी काम करने पड़ते हैं इसलिये सबसे पहले मोह से मोह अवश्य तोड़ना चाहिये।।१२२।।

विहाय व्यामोहं धनसदनतन्वादिविषये कुरुध्वं तत्तूर्णं किमपि निजकार्यं वत बुधा:।
न येनेदं जन्म प्रभवति सुनृत्वादिघटना पुन: स्यान्नस्याद्वा किमपरवचोऽडम्बरशतै:।।१२३।।

अर्थ—आचार्य उपदेश देते हैं कि अरे बुद्धिमानों विशेष कहां तक कहें शीघ्र स्त्री पुत्र धन घर आदि पदार्थों से मोह छोड़कर ऐसा कोई काम करो जिससे तुमको फिर जन्म न धारण करना पड़े क्योंकि नहीं मालूम फिर उत्तमकुल जिन धर्म का शरण, निर्ग्रन्थ गुरू का उपदेश, आदि मिले या नहीं मिले।

भावार्थ—जिस प्रकार चौराहे पर चिन्तामणिरत्न की प्राप्ति दुर्लभ है उस ही प्रकार मनुष्य जन्म तथा जिनधर्म का शरण आदि मिलना दुर्लभ है इसलिये ऐसी अवस्था को पाकर ऐसा काम करना चाहिये जिससे तुमको इस पंच—परावर्तनरूप संसार में परिभ्रमण न करना पड़े नहीं तो हाथ मलते रह जाओगे कुछ भी नहीं मिलेगा।।१२३।।

स्रग्धरा छन्द

वाचस्तस्यप्रमाणा यइह जिनपति: सर्वविद्वीतरागो रागद्वेषादिदोषैरुपहतमनसो नेतरस्यानृतत्वात् ।
एतन्निश्चित्य चित्ते श्रयत वत बुधा विश्वतत्त्वोपलब्ध्यै मुक्तेर्मूलं तमेकं भ्रमति किमु बहुष्वंधवद्दुष्पथेषु।।

अर्थ— और भी आचार्य कहते हैं कि जो समस्त पदार्थों को अच्छी तरह जानने वाला है तथा वीतराग है और ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्मों से रहित है उस ही का वाक्य प्रमाण है किन्तु उससे विपरीत जो अल्पज्ञानी रागी आदि हैं उनका वचन असत्य होने से प्रमाण नहीं है ऐसा मन में ठान कर हे पंडितो केवलज्ञान की प्राप्ति के लिये मुक्ति के देने वाले उस अर्हन्तका ही आश्रयण करो क्यों व्यर्थ अंधे के समान जहां तहां खोटे मार्ग में गिरते फिरते हो।।१२४।।

वसन्ततिलका छन्द

य: कल्पयेत् किमपि सर्वविदोऽपि वाचि सन्दिह्य तत्वमसमञ्जसमात्मबुद्ध्या ।
खे पत्रिणां विचरतां सुदृशेक्षितानां संख्यां प्रति प्रविदधाति सवादमंध:।।१२५।।

अर्थ—जो मूढ़, सर्वज्ञ के वचन में भी सन्देह कर अपनी बुद्धि की गढ़ंत से अपरमार्थ भूत तत्वों की कल्पना करता है वह वैसा ही काम करता है कि जिस प्रकार अंधा मनुष्य आकाश में जाते हुवे पक्षियों की गिनती में अच्छे नेत्र वाले पुरूष के साथ विवाद करता है।

भावार्थ—जिसको यह भी पता नहीं है कि पक्षी कहां उड़ रहे हैं कहां नहीं, वह कैसे सूझते पुरूष के साथ पक्षियों की गिनती में विवाद कर सकता है उस ही प्रकार जिसको अंशमात्र भी विशेष ज्ञान नहीं वह सिवाय सर्वज्ञ की कृपा से कैसे वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जान सकता है इसलिये भव्यजीवों को सर्वज्ञ के वचन पर ही विश्वास करना चाहिये अल्पज्ञानियों के वचन पर कदापि नहीं।।१२५।।

इन्द्रवज्रा छन्द

उक्तं जिनैर्द्वादशभेदमङ्गं श्रुतं ततो बाह्यमनन्तभेदम् ।
तस्मिन्नुपादेयतया चिदात्मा तत: परं हेयतयाऽभ्यधायि।।१२६।।

अर्थ—श्रुत के दो भेद हैं एक अंगश्रुत और दूसरा बाह्यश्रुत । उनमें अंगश्रुत बारह प्रकार का जिनेंद्र भगवान ने कहा है तथा बाह्यश्रुत के अनन्त भेद कहे हैं परन्तु उन दोनों श्रुतों में ज्ञानदर्शनशाली आत्मा ही ग्राह्य (ग्रहण करने योग्य) कहा है किन्तु उससे जुदे समस्त पदार्थ हेय (त्यागने योग्य) कहे हैं।।१२६।।

अल्पायुषामल्पधियामिदानीं कुत: समस्तश्रुतपाठशक्ति:।
तदत्रमुक्ति प्रतिबीजमात्रमभ्यस्यतामात्महितं प्रयत्नात्।।१२७।।

अर्थ—इस पंचमकाल में ज्ञान आयु आदि के निरंतर क्षीण होने से मनुष्य अल्पायु तथा अल्पज्ञान के धारी रह गये हैं इसलिये वे समस्त श्रुत का अभ्यास नहीं कर सकते अत: जो पुरुष मोक्ष के अभिलाषी हैं उनको मुक्ति के देने वाले तथा आत्मा के हितकारी श्रुत का तो अवश्य ही बड़े प्रयत्न के साथ अभ्यास करना चाहिये।।१२७।।

स्त्रग्धरा छन्द

निश्चेतव्योजिनेन्द्रस्तदतुलवचसां गोचरेर्थे परोक्षे कार्य:सोऽपि प्रमाणं वदत किमपरेणात्र कोलाहलेन।
सत्यां छद्मस्थतायामिह समय पथस्वानुभूतिप्रबुद्धा भो भो भव्या यतध्वं दृगवमनिधावात्मनि प्रीतिभाज:।।

अर्थ—वर्तमानकाल में जिनेन्द्र है ऐसा विश्वास अवश्य करना चाहिये तथा जो पदार्थ सूक्ष्म तथा दूर होने के कारण दृष्टि गोचर नहीं है किंतु जिनेन्द्र ने उनका वर्णन अपनी दिव्यध्वनि से किया है तो वे भी अवश्य हैं ऐसा मानना चाहिये परन्तु जिनेन्द्र अथवा जिनेन्द्र के वचन में व्यर्थ संशय करना ठीक नहीं क्योंकि इस काल में समस्त जीव थोड़े ज्ञान के धारी हैं इसलिये आचार्य कहते हैं कि ‘‘जिन भगवान से कहे हुवे सिद्धांत मार्ग से स्वानुभव को प्राप्त कर सदा प्रबुद्ध, और अपनी आत्मा में प्रीति को भजने वाले , हे भव्यजीवों तुम सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र रूपी निधि में अवश्य यत्न करो।

भावार्थ—संसार में ये तीनों रत्न ही सारभूत पदार्थ हैं और इन ही में प्रयत्न करने में उत्तम सुख की प्राप्ति हो सकती है इसलिये भव्यजीवों को रत्नत्रय का आराधन अवश्य करना चाहिये।।१२८।।

तद्ध्यायत तात्पर्याजज्योति: सच्चिन्मयं विना यस्मात् ।
सदपि न सत्यति यस्मिन्निश्चितमाभासते विश्वम्।।१२९।।

अर्थ—जिस श्रेष्ठ तथा ज्ञानस्वरूप चैतन्य के बिना समस्त पदार्थ मौजूद भी नहीं मौजूद के समान हैं और जिस चैतन्य के होते सन्ते समस्त पदार्थों का प्रकट रीति से प्रतिभास होता है ऐसे ज्ञानस्वरूप आत्मारूपी ज्योति की भव्य जीवों को अवश्य आराधना तथा उपासना करनी चाहिये।

भावार्थ—यद्यपि संसार में अनेक पदार्थ हैं परंतु उन सबमें ज्ञानगुण का धारी आत्मा ही है तथा उस आत्मा के बिना समस्त जगत् शून्य है और उस आत्मा के होते सन्ते समस्त पदार्थों का भले प्रकार से ज्ञान होता है इसलिये भव्यजीवों को ऐसे सारभूत आत्मा का अवश्य ही ध्यान करना चाहिये।।१२९।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

अज्ञो यद्भवकोटिभि: क्षपयति स्वं कर्म तस्माद्बहु स्वीकुर्वन् कृतसंवर: स्थिमना ज्ञानी तु तत्तत्क्षणात्।
तीक्ष्णक्लेशहयाश्रितोऽपि हि पदं नेष्टं तप:स्यन्दनो नेयं तन्नयति प्रभुं स्फुटतरज्ञानैकसूतोज्झित:।।१३०।।

अर्थ—आचार्य कहते हैं कि अज्ञानी जीव कठोर तप आदि के द्वारा जितने कर्मों को करोड़ वर्ष में क्षय करता है उससे अधिक कर्मों को, स्थिरमन होकर संवर का धारी ज्ञानी जीव क्षण मात्र में क्षय कर देता है सो ठीक ही है क्योंकि जिस तप रूपी रथ में तीक्ष्णक्लेश रूपी घोड़ा लगे हुवे हैं किन्तु ज्ञानरूपी सारथी नहीं हैं तो वह तपरूपी रथ कदापि आत्मारूपी प्रभू को मोक्ष स्थान में नहीं ले जा सकता।

भावार्थ—जिस प्रकार किसी रथ में यद्यपि अच्छे—२ घोड़े मौजूद हैं किन्तु उन घोड़ों का चलाने वाला सारथी नहीं है तो कदापि वह रथ अपने में बैठने वाले पुरूष को यथेष्ट स्थान पर नहीं पहुंचा सकता उस ही प्रकार नाना प्रकार के दु:खों को सहनकर पंचाग्नि आदि तप भी किये परंतु वस्तु के यथार्थ स्वरूप को न जाना तो कदापि उत्तम सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती इसलिये भव्यों को चाहिये कि वे सम्यग्ज्ञानपूर्वक तप को करें तभी उनको उत्तम सुख की प्राप्ति हो सकती है।।१३०।।

स्त्रग्धरा छन्द

कर्माब्धौ तद्विचित्रोदयलहरिभरव्याकुले व्यापदुग्रभ्राम्यन्नकादिकीर्णे मृतिजननलसद्वाडवावर्तगर्ते।
मुक्त:शक्त्या हतांग:प्रतिगति स पुमान् मज्जनोन्मज्जनाभ्यामप्राप्यज्ञानपोतं तदनुगतिजड: पारगामी कथं स्यात्।।

अर्थ—ग्रन्थकार कहते हैं कि यह कर्म एक प्रकार का बड़ा भारी समुद्र है क्योंकि जिस प्रकार समुद्र अनेक लहरियों कर व्याप्त है उस ही प्रकार यह कर्म रूपी समुद्र भी अनेक उदयरूप लहरियों कर व्याप्त है तथा जिस प्रकार समुद्र में नाना प्रकार के भयंकर मगरमच्छादि हुवा करते हैं उस ही प्रकार इस कर्मरूपी समुद्र में भी इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग आदि नाना प्रकार की आपत्ति रूप मगर मच्छादि विद्यमान हैं तथा जिस प्रकार समुद्र में वड़वानल भमर गढ्ढे हुवा करते हैं उस ही प्रकार इस कर्मरूपी समुद्र में भी नाना प्रकार के जन्म मरण आदि बड़वानल भमर हैं इसलिये ऐसे भयंकर समुद्र में शक्तिहीन तथा अनादिकाल से सर्वत्र गोता खाता हुवा मनुष्य जब तक ज्ञानरूपी अनुकूल जहाज को न प्राप्त करेगा तब तक कदापि पार नहीं हो सकता।

भावार्थ—जिस प्रकार कोई शक्तिहीन मनुष्य मगरमच्छ आदि से भयंकर समुद्र में पड़ जावे तो वह नाना प्रकार के गोते खाता है किंतु यदि उसको जहाज मिल जावे तो वह शीघ्र ही पार हो जाता है उस ही प्रकार कर्म (जिसका दूसरा नाम संसार है) एक प्रकार का भयंकर समुद्र है इसमें जब तक जीव ज्ञानरूपी जहाज को प्राप्त नहीं करते तब तक नाना प्रकार की गतियों में भ्रमण करते हैं किन्तु जिस समय वे उस अनुकूल ज्ञानरूपी जहाज को पा लेते हैं तो वे बात की बात में संसाररूपी समुद्र से पार हो जाते हैं तथा फिर उनको संसार रूपी समुद्र में आना भी नहीं पड़ता इसलिये जिन जीवों को इस संसाररूपी समुद्र के पार करने की अभिलाषा है उनको अवश्य ही ज्ञानरूपी अखंड जहाज का आश्रय लेना चाहिये।।१३१।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

शश्वन्मोहमहान्धकारकलिते त्रैलौक्यसद्मन्यसौ जैनीवागमलप्रदीपकलिका न स्याद्यदि द्योतिका।
भावनामुपलब्धिरेव न भवेत् सम्यक्तदिष्टेतरप्राप्तित्यागकृते पुनस्तनुभृतां दूरे मतिस्तादृशी।।१३२।।

अर्थ—मोहरूपी गाढ़े अंधकार से व्याप्त इस तीनलोक रूपी मकान को प्रकाश करने वाला यदि यह भगवान् की वाणी रूप दीपक न होता तो इष्ट की प्राप्ति तथा अनिष्ट का त्याग तो दूर हो मनुष्यों को पदार्थों का भी ज्ञान न होता ।

भावार्थ—जिस प्रकार किसी अंधेरे मकान में बहुत सी वस्तुएं रखी हुई हैं यदि उन वस्तुओं का प्रकाश करने वाला उस मकान में दीपक न होगा तो उनमें से न तो लेने योग्य इष्ट वस्तुओं को ले ही सकते हैं और न छोड़ने योग्य चीजों को छोड़ ही सकते हैं उस ही प्रकार जब तक पदार्थों के स्वरूप भलीभांति न जानेंगे तब तक न तो ग्रहण करने योग्य वस्तुओं का ग्रहण ही कर सकते हैं और न त्यागने योग्य वस्तुओं का त्याग ही कर सकते हैं इसलिये सबसे पहले पदार्थ का स्वरूप जानना चाहिये उन पदार्थों का जानना (वर्तमान में केवली आदि के न होने के कारण) बिना जिनवाणी के हो नहीं सकता इसलिये भव्यजीवों को जिनवाणी माता का प्रीतिपूर्वक आश्रय करना चाहिये।।१३२।। आत्मा ही धर्म है इस बात को ग्रंथकार वर्णन करते हैं—

शान्ते कर्मण्युचितसकलक्षेत्रकालादिहेतौ लब्धे स्वास्थ्यं कथमपि लसद्योगमुद्राविशेषम् ।
आत्माधर्मो यदयमसुखस्फीतसंसारगर्ता दुद्धृत्य स्वं सुखमयपदे धारयत्यात्मनैव।।१३३।।

अर्थ—समस्त कर्मों के उपशम होने पर तथा द्रव्य क्षेत्र काल भावरूप योग्य सामग्री के मिलने पर जब यह आत्मा ध्यान में लीन होकर अपने स्वरूप का चिंतवन करता है उस समय नाना दु:खों के देने वाले संसाररूपी गड्ढे से छूटकर अपने से ही अपने को उत्तमसुख में पहुंचाता है इसलिये आत्मा से अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है।

भावार्थ—संसार के दु:खों से छुटाकर जो उत्तम सुख में ले जाता है उस ही का नाम धर्म है आत्मा भी अपने से अपने को उत्तम सुख में ले जाता है इसलिये आत्मा ही परम धर्म है अत: भव्यों को चाहिये कि वे अपनी आत्मा का ही चिंतवन करें।।१३३।।

आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन—

शार्दूलविक्रीडित छन्द

नो शून्यो न जडो न भूतजनितो नो कर्तृभावं गतो नैको न क्षणिको ना विश्वविततो नित्यो नचैकान्तत:।
आत्माकायमितिश्चिदेकनिलय: कर्ता च भोक्ता स्वयं संयुक्त: स्थिरताविनाशजननै: प्रत्येकमेकक्षणे ।।१३४।।

अर्थ—एकांत से न आत्मा शून्य है न जड़ है न पंचभूत से उत्पन्न हुआ है न कर्ता है न क्षणिक है न लोकव्यापी है न नित्य है किन्तु अपने शरीर के परिमाण है तथा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान आदि गुणों का आधार है और अपने कर्मों का कर्ता है और अपने ही कर्मों का भोक्ता है तथा एक ही क्षण में सदाकाल उत्पाद व्यय और ध्रौव्य इन तीनों धर्मोकर सहित है।

भावार्थ—इस श्लोक में ग्रंथकार ने नास्तिक आदि के सिद्धांत में एकांत से माना हुवा आत्मा का स्वरूप नहीं हो सकता यह बतलाकर जैन सिद्धांत के अनुसार असली आत्मस्वरूप का निरूपण किया है क्योंकि शून्यवादी का सिद्धांत है कि संसार में कोई वस्तु विद्यमान नहीं ये जितने भर स्त्री घर कपड़ा घड़ा आदि पदार्थ हैं समस्त भ्रमस्वरूप है इसलिये आत्मा भी कोई पदार्थ नहीं यह भी एक भ्रमस्वरूप ही है इसका आचार्य समाधान देते हैं कि ‘नो शून्य:’ अर्थात् तुमने जो एकांत से आत्मा को शून्य मान रक्खा है यह बात सर्वथा मिथ्या है क्योंकि मैं सुखी हूं तथा मैं दुखी हूं इत्यादि स्वसंवेदनप्रत्यक्ष से आत्मा प्रत्यक्ष सिद्ध है इसलिये सर्वथा शून्य न कहकर किसी रीति से आत्मा शून्य है किसी रीति से नहीं है ऐसा आत्मा का स्वरूप तुमको मानना चाहिये जब ऐसा मानोगे तो किसी प्रकार का दोष नहीं आ सकता क्योंकि पररूप की अपेक्षा से आत्मा की नास्ति अर्थात् शून्य है किन्तु स्वरूपादि की अपेक्षा से आत्मा विद्यमान ही है जिस प्रकार घट पट इन दोनों में ‘घटत्वेन रूपेण’ तो घट है परंतु ‘पटत्वेन रूपेण’ नहीं है क्योंकि घट का घटत्व ही स्वरूप है पटत्व स्वरूप नहीं किन्तु पररूप है उसी प्रकार आत्मा भी अपने आत्म स्वरूप तथा ज्ञानादिगुणों की अपेक्षा से मौजूद है परंतु पुद्गलत्व तथा स्पर्शादि की अपेक्षा से नहीं है क्योंकि आत्म के पुद्गलत्व तथा स्पर्शादिक स्वरूप नहीं पररूप है इसलिये इस रीति से कथंचित् आत्मा शून्य भी हो सकता है किन्तु सर्वथा नहीं।

तथा नैयायिक यह मानते हैं कि जब तक आत्मा संसार में रहता है तब तक तो ज्ञान सुख आदि के संबंध से यह ज्ञानी तथा चेतन कहा जा सकता है किन्तु जिस समय इसकी मोक्ष हो जाती है उस समय इस आत्मा के साथ किसी प्रकार के ज्ञान सुख आदि का संबंध नहीं रहता। उनका सिद्धान्त भी है कि ‘नवानामात्मविशेषगुणानामुच्छेद: पुरूषस्य मोक्ष इति’ अर्थात् बुद्धि सुख, दु;ख, इच्छा,द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार, ये आत्मा के नौ विशेषगुण हैं जिस समय ये नौ गुण आत्मा से जुदे हो जाते हैं उसी समय उस आत्मा की मोक्ष हो जाती है इसलिये मोक्षावस्था में आत्मा सर्वथा जड़ है उसका आचार्य समाधान देते हैं ‘नजड:’ अर्थात् तुमने तो एकान्त से आत्मा को जड़ मान रक्खा है वह सर्वथा असत्य है क्योंकि ज्ञान आदि गुण आत्मा से सर्वथा भिन्न स्वरूप नहीं है जिससे वे मोक्ष अवस्था में छूट जावे तथा ज्ञानगुण के छूटने से आत्मा सर्वथा जड़ रह जावे किन्तु कथंचित आत्मा जड़ है तथा कथंचित आत्मा चेतन भी है अर्थात् जब तक इस आत्मा के साथ कर्मों का संबंध रहता है उस समय तो इसको जड़ भी कह सकते हैं किन्तु जिस समय मोक्षावस्था में कर्मों का संबंध छूट जाता है उस समय यह चेतन है जड़ नहीं क्योंकि ज्ञानादि गुणों से आत्मा कोई जुदी वस्तु नहीं तथा ज्ञानादिगुण चेतन हैं और ज्ञानादि गुणों का जिस अवस्था में प्रकटीकरण हो जाता है वही वास्तविक मोक्ष कही गई है इसलिये सर्वथा जड़ कदापि आत्मा नहीं हो सकता।

तथा चार्वाक जिसको नास्तिक कहते हैं उसका सिद्धांत है कि आत्मा कोई भिन्न पदार्थ नहीं तथा आदि अन्त से रहित भी नहीं किन्तु जिस समय पृथ्वी जल तेज वायु इन चार भूतों का परस्पर में मेल होता है उस समय एक दिव्यशक्ति उत्पन्न हो जाती है वही आत्मा तथा चेतन नाम से पुकारी जाती है इसलिये जब आत्मा कोई वस्तु ही न ठहरा तो उसके आधीन जो स्वर्ग तथा मोक्ष आदि अवस्था मानी है वे सर्वथा झूठ है क्योंकि यदि वे होती तो प्रत्यक्ष देखने में आती तथा आत्मा भी आदि अंत कर रहित सिद्ध होता इसलिये यह देह ही आत्मा है तथा संसार में अच्छा—२ खाने को न मिलना यही नरक है तथा अच्छा—२ खाने को मिलना यही स्वर्ग है तथा मोक्ष है इसलिये जिसको स्वर्ग तथा मोक्ष के स्वरूप का अनुभव करना हो तो संसार में खूब कर्ज लेकर मिष्टान्न उड़ाना चाहिये क्योंकि जब यह देह (आत्मा) नष्ट हो जावेगा तो फिर लौटकर नहीं आवेगा जिससे वह लिया हुवा ऋण देना पड़े, इस सिद्धान्त का आचार्य खंडन करते हैं कि ‘नभूतजनित:’ अर्थात् जो तुम सर्वथा आत्मा को पृथ्वी आदि से पैदा हुवा मानते हो यह बात सर्वथा झूठ है क्योंकि अचेतन से चेतन की उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती आत्मा चेतन है पृथ्वी आदि अचेतन है वे किसी प्रकार आत्मा को उत्पन्न नहीं कर सकते—यदि ऐसा ही होवे तो रोटी आदि पदार्थों में पृथ्वी आदि का संबंध होते भी क्यों नहीं चेतन की उत्पत्ति होती दूसरे जिस समय बालक उत्पन्न होता है उस समय जब उसके मुख में स्तन दिया जाता है उस समय बिना ही सिखाये वह जन्मांतर के संस्कार से दूध पी लेता है सो कैसे ? क्योंकि तुम तो जन्मांतर मानते ही नहीं तथा अनेक मनुष्य पूर्वभव की वस्तुओं को स्मरण करते हुवे देखने में आते हैं अत: सिद्ध होता है कि आत्मा अवश्य अनादि अनन्त है इसलिये आत्मा कथंचित भूतजनित ही तुमको मानना चाहिये जब ऐसा मानोगे तो कोई दोष नहीं आ सकता क्योंकि संसार आत्मा का संबंध देह से अनादिकाल से चला आता है अर्थात् कोई अवस्था संसारी जीव की ऐसी नहीं जिस अवस्था में देह के साथ संबंध न होवे इसलिये देह आत्मा का कथंचित् अभेद होने से आत्मा भूतजनित भी है परन्तु देह रहित अवस्था में वह भूतजनित न होने से सर्वथा भूतजनित नहीं हो सकती।

और बहुत से मनुष्य इस आत्मा को कर्ता मानते हैं अर्थात् उनका सिद्धान्त है कि बिना ईश्वर के यह विचित्रजगत कदापि नहीं बन सकता इसलिये कोई न कोई इस जगत का कर्ता अवश्य होना चाहिये उनको आचार्य समझाते हैं कि ‘नोकर्तृभावंगत:’ अर्थात् यह कर्ता भी नहीं हो सकता क्योंकि यदि ईश्वर जगत का कर्ता माना जायेगा तो उसके ईश्वरत्व में हानि आवेगी क्योंकि यदि वह समस्त प्राणियों का पिता है तो उसको सबों पर समान दृष्टि रखनी चाहिये किन्तु देखने में आता है किसी के साथ उसका प्रेम पूर्वक बर्ताव होने से कोई राजा है तथा किसी के साथ उसका द्वेषपूर्वक बर्ताव होने से कोई अत्यंतदरिद्री है यदि कहोगे कि राजा तथा रंक होना यह अपने कर्मों के आधीन है तो कर्म को ही कारण मानना चाहिये ऐसे ईश्वर की मानने की क्या आवश्यकता है इत्यादि अनेक युक्तियों से ईश्वररूप आत्मा कदापि कर्ता नहीं बना सकता यदि किसी रीति से कर्ता मानो तो ठीक भी हो सकता है क्योंकि सर्व ही जीव अपने—२ कर्म तथा स्वरूप आदि के कर्ता हैं किंतु सर्वथा नहीं। तथा अनेक वादियों का यह कथन है कि आत्मा एकरूप ही है अनेक रूप नहीं उनकों आचार्य श्रेष्ठ मार्ग पर लाकर कहते हैं कि ‘नैक:’ अर्थात् आत्मा सर्वथा एकरूप नहीं किन्तु किसी रीति से एकरूप है तथा किसी रीति से अनेकरूप है अर्थात् अपने स्वरूप से तो एक रूप है किंतु अनेक धर्माें को धारण करता है इसलिये वह अनेक रूप भी है तथा बौद्ध आत्मा को क्षणिक ही मानते हैं अर्थात् उन का सिद्धांत है कि जितने भर संसार में पदार्थ हैं वे सब क्षणिक हैं इसलिये आत्मा भी क्षणिक ही है उनको आचार्य समझाते हैं कि ‘न क्षणिक:’ अर्थात् तुमने जो आत्मा को सर्वथा क्षणिक मान रक्खा है वैसा सर्वथा आत्मा क्षणिक नहीं है किन्तु प्रत्येक द्रव्य की क्षण—२ में पर्याय पलटती रहती है इसलिये तो आत्मा पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा से क्षणिक भी है किन्तु द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा से वह नित्य भी है इसलिये आत्मा को सर्वथा वैसा न मानकर किसी रीति से शून्य है किसी रीति से नहीं है ऐसा मानना चाहिये तथा शरीराकार प्रदेशी मानना चाहिये तथा ज्ञान का धारी मानना चाहिये और स्वयं करने वाला तथा भोगने वाला मानना चाहिये और उत्पाद आदि धर्मों का धारी मानना चाहिये इस ही प्रकार से आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो सकता है।।१३४।।

शार्दूलिविक्रीडित छन्द

व्कात्मा तिष्ठति कीदृश: स कलिता केनात्र यस्येदृशी भ्रान्तिस्तत्र विकल्पसंभृतमना य: कोऽपि स ज्ञायताम्।
किंचान्यस्य कुतोमति: परमियं भ्रान्ताऽशुभात्कर्मणो नीत्वानाशमुपायतस्तदखिलं जानाति ज्ञाता प्रभु:।।१३५।।

अर्थ—आत्मा का नहीं जानने वाला यदि कोई मनुष्य किसी को पूछे कि आत्मा कहां रहता है ? कैसा है? कौन आत्मा को भलीभांति जानता है तो उसको यही कहना चाहिये कि जिसके मन में कैसा है कहां है इत्यादि विकल्प उठ रहे हैं वही आत्मा है उससे अतिरिक्त कोई आत्मा नहीं है, क्योंकि जड़ में कैसा है कहां है इत्यादि कदापि बुद्धि नहीं हो सकती परन्तु अशुभ कर्म से जीवों की बुद्धि भ्रांत हो रही है इसलिये जब यह आत्मा उन कर्मों को मूल से नाश कर देता है उस समय आपसे आप ही यह अपने स्वरूप को तथा दूसरे पदार्थों को जानने लग जाता है इसलिये आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने के अभिलाषियों को तप आदि के द्वारा कर्मों के नाश करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।।१३५।।

आत्मा मूर्तिविवर्जितोऽपि वपुषि स्थित्वापि दुर्लक्ष्यतां प्राप्तोपि स्फुरति स्फुटं यदहमित्युल्लेखत: संततम् ।
तत्किं मुह्यत शासनादपि गुरोर्भ्रान्ति: समुत्सृज्यतामन्त: पश्यत निश्चलेन मनसा तं तन्मुखाक्षव्रजा:।।१३६।।

अर्थ—यद्यपि इस आत्मा की कोई मूर्ति नहीं है और यह शरीर के भीतर ही रहता है इसलिये इसको प्रत्यक्ष देखना अत्यंत कठिन है तो भी (अहंजानामि अहंकरोमि) मैं जानता हूं तथा मैं करता हूं इत्यादि प्रतीतियों से यह स्पष्ट रीति से जाना जाता है तथा गुरू आदि के उपदेश से भी भली भांति इसका ज्ञान होता है अत: ग्रन्थकार कहते हैं— हे भव्यजीवो मन को तथा इंद्रियों को निश्चल कर अपने अभ्यंतर में इस आत्मा का अनुभव करो क्यों व्यर्थ बाह्यपदार्थों में मोह करते हो।

भावार्थ—अनेक मत वाले इस बात को स्वीकार करते हैं कि आत्मा कोई पदार्थ नहीं क्योंकि यदि होता तो उसका प्रत्यक्ष भी होता उनको आचार्य समझाते हैं कि यद्यपि आत्मा में कोई प्रकार का स्पर्श रस आदिक नहीं है तथा वह देह के भीतर है इसलिये स्पष्ट रीति से यह देखने में नहीं आता तो भी मैं करता हूंं तथा मैं जानता हूं इन विकल्पों से आत्मा को हर एक जान सकता है इसलिये इसका अभाव नहीं । अत: भव्यजीवों को चाहिये कि इसका भलीभांति अनुभव करे तथा बाह्यपदार्थों से मोह को हटावे।।१३६।।

व्यापी नैव शरीर एव यदसावात्मा स्फुरत्यन्वहं भूतो नान्वयतो न भूतजनितो ज्ञानी प्रकृत्यायत: ।
नित्ये वा क्षणिकेऽथवा न कथमप्यर्थक्रिया युज्यते तत्रैकत्वमपि प्रमाणदृढया भेदप्रतीत्याहतम् ।।१३७।।

अर्थ—यह आत्मा निरंतर शरीर में ही रहा हुवा मालूम पड़ता है इसलिये तो व्यापक नहीं और स्वभाव से ही यह ज्ञानी है इसलिये यह पृथ्वी अप् तेज आदि पांचपदार्थों से भी पैदा हुवा नहीं मालूम होता तथा यह सर्वथा नित्य भी नहीं क्योंकि नित्य में किसी प्रकार का परिणाम नहीं हो सकता और आत्मा के तो क्रोधादि परिणाम भलीभांति अनुभव में आते हैं तथा यह आत्मा सर्वथा क्षणिक भी नहीं हो सकता क्योंकि प्रथमक्षण में उत्पन्न होकर यदि यह द्वितीय क्षण में नष्ट हो जावेगा तो किसी प्रकार की क्रिया इसमें नहीं हो सकती तथा आत्मा एक स्वरूप है यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि कभी क्रोधी कभी लोभी इत्यादि नाना पर्याय आत्मा मालूम की होती हैं।

भावार्थ—नैयायिकादि का सिद्धांत है कि आत्मा व्यापक है अर्थात् ऐसा कोई भी आकाश का प्रदेश नहीं है जहां पर यह आत्मा न हो— किन्तु आचार्य कहते हैं कि सिवाय शरीर के यह आत्मा और कहीं पर व्यापक नहीं यदि शरीर से जुदे स्थान में होता तो मालूम पड़ता इसलिये यह शरीर के समान परिणाम वाला ही है तथा नास्तिक इसको पृथ्वी आदि से ही उत्पन्न हुवा मानते हैं वह भी ठीक नहीं क्योंकि यह ज्ञानी है और पृथ्वी आदि जड़ है इसलिये जड़ से कदापि चेतन की उत्पत्ति नहीं हो सकती और सांख्य आदिक आत्मा को सर्वथा कूटस्थही मानते हैं सो भी ठीक नहीं क्योंकि सर्वथा नित्य में किसी प्रकार का परिणाम नहीं हो सकता किन्तु आत्मा का परिणामीपना तो भलीभाँति अनुभव में आता है तथा बौद्ध सर्वथा आत्मा को क्षणिक ही मानता है यह भी ठीक नहीं क्योंकि सर्वथा क्षणिक पक्ष में भी किसी प्रकार का परिणाम नहीं बन सकता और भी अनेक दोष आते हैं तथा अनेक सिद्धांतकार आत्मा को एकस्वरूप ही मानते है सो भी ठीक नहीं क्योंकि क्रोधी लोभी आदि अनेक भेदस्वरूप आत्मा अनुभव में आता है इसलिये आत्मा को किसी प्रकार से शरीर के परिमाण वाला तथा भूतों से नहीं उत्पन्न हुवा और किसी प्रकार से नित्य और क्षणिक तथा अनेक ही मानना चाहिये।।१३७।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

कुर्यात्कर्म शुभाशुभं स्वयमसौ भुंक्ते स्वयं तत्फलं सातासातगतानुभूतिकलनादात्मा नचान्यादृश:।
चिद्रूप: स्थितिजन्मभंगकलित : कर्मावृत: संसृतौ मुक्तौ ज्ञानदृगैकमूर्तिरमलस्त्रैलौक्यचूडामणि :।।१३८।।

अर्थ —ग्रन्थकार कहते हैं कि यह आत्मा शुभ तथा अशुभ कर्मों को निरन्तर करता रहता है तथा सातवेदनी और असात वेदनी कर्म के उदय से स्वयं उसका फल भोगता है किंतु अन्य कोई कर्ता तथा भोक्ता नहीं और यह आत्मा सदा चैतन्य स्वरूप है तथा उत्पाद व्यय ध्रौव्य तीनों धर्मों से सहित है और संसारावस्था में यह कर्मों कर सहित है परंतु मोक्ष अवस्था में इसके साथ किसी कर्म का संबंध नहीं तथा यह आत्मा सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान का धारक है और तीनों लोेक के शिखर पर विराजता है।।१३८।।

वसन्ततिलका छन्द

आत्मानमेवमधिगम्य नयप्रमाणनिक्षेपकादिभिरभिश्रयतैकचित्ता:।
भव्या यदीच्छत भवार्णवमुत्तरीतुमुत्तुङ्गमोहमकरोग्रतरंगभीमम् ।।१३९।।

अर्थ—फिर भी आचार्य उपदेश देते हैं— भव्यजीवो यदि तुम मोहरूपी मगर कर सहित तथा गंभीर संसाररूपी समुद्र को तरने की इच्छा करते हो तो एकचित्त होकर नय प्रमाण तथा नाम स्थापना आदि के द्वारा आत्मा को भलीभांति जानो और उस ही को आश्रय करो।

भावार्थ—सिवाय आत्मा के संसार में कोई भी वस्तु ग्राह्य नहीं इसलिए इस ही की तरफ भव्यों को अवश्य ऋजु होना चाहिये।।१३९।।

मालिनी छन्द

भवरिपुरिह तावद्दु:खदो यावदात्मंस्तवविनिहतधामा कर्मसंश्लेषदोष:।
स भवति किल रागद्वेषहेतोस्तदादौ झटिति शिवसुखार्थी यत्नतस्तौ जहीहि।।१४०।।

अर्थ—फिर भी आचार्य कहते हैं कि अरे आत्मा जब तक मेरे साथ समस्त तेज को मूल से उड़ाने वाला कर्मों का बंध लगा हुवा है तब तक तुझको यह संसाररूपी वैरी नाना प्रकार के दु:खों का देने वाला है तथा वह संसाररूपी वैरी राग द्वेष से उत्पन्न होता है इसलिये यदि तू मोक्ष सुख का अभिलाषी है तो शीघ्र ही रागद्वेष को त्याग कर जिससे तेरी आत्मा के साथ कर्म का बंध नहीं रहे तथा तुझे संसार का दु:ख न भोगना पड़े।।१४०।।

स्त्रग्धरा छन्द

लोकस्य त्वं न कश्चिन्न स तव यदिह स्वार्जितं भुज्यते क: संबन्धस्तेन सार्धं तदसतिसतिवा तत्र कौ रोषतोषौ।
कायेप्येवं जडत्वात्तदनुगतसुखादावपि ध्वंसभावादेवं निश्चित्य हंस स्ववलमनुसर स्थायि मापश्य पार्श्र्वम् ।।१४१||

अर्थ —भो आत्मन् न तो तू लोक का है न तेरा ही लोक है तथा तू ही शुभ अशुभ को उत्पन्न करता है तथा तू ही उसको भोगता है फिर इस लोक के साथ संबंध करना वृथा है तथा लोक के होते सन्ते दु:ख तथा लोक के होते संते संतोष करना भी व्यर्थ है और शरीर तो जड़ है इसलिये इसके नहीं होते संते क्रोध तथा इसके होते सन्ते संतोष करना भी बिना प्रयोजन का है तथा इंद्रिय आदि पदार्थों से उत्पन्न हुवा सुख विनाशीक है इसलिये इसके होते सन्ते रोष तथा इसके होते सन्ते संतोष मानना भी निष्प्रयोजन है इसलिये ऐसा भलीभांति विचारक तुझे अपना बल तो अनन्तज्ञानादिक है उसकी आराधना करनी चाहिये और तुझे अपने स्वरूप से दूर नहीं रहना चाहिये अर्थात् अपने अंतरंग में प्रवेश कर तुझे समस्त परिग्रह का त्याग कर देना चाहिये।

भावार्थ — स्त्री पुत्र कुटुंब शरीर इन्द्रिय सुख आदि में प्रीतिकर तथा अपने स्वरूप को भूलकर बहुत काल तक इस संसार में भ्रमण किया अब विषयों में आशाकर दीन की तरह तुझे जहां तहां डोलना ठीक नहीं इसलिये समस्त परिग्रह का नाशकर अपने स्वरूप में लीन हो अब अपने स्वरूप से दूर रहना भी ठीक नहीं।।१४१।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

आस्तामन्यगतौ प्रतिक्षणलसद्दु:खाश्रितायामहो देवत्वेऽपि न शान्तिरस्ति भवतो रम्येऽणिमादिश्रिया।
यत्तस्मादपि मृत्युकालकलयाधस्ताद्ध ठात्पात्यसे तत्तन्नित्यपदं प्रति प्रतिदिनं रे जीव यत्नं कुरु।।१४२।।

अर्थ —जहां पर प्रतिक्षण में दु:ख ही दु:ख है ऐसी नरक तिर्यंचादि गति तो दूर ही रहो परन्तु जहां पर सदा अणिमा महिमा आदिक लक्ष्मी निवास करती हैं ऐसी देवगति में भी तेरे लिये अंशमात्र भी सुख नहीं है क्योंकि वहां से भी तुझे मरण की बेला बलात्कारी से नीचे गिरा देती है अर्थात् मृत्यु के समय में स्वर्ग से भी नीचे गिरना पड़ता है इसलिये आचार्य कहते हैं हे जीव तुझे अविनाशी मोक्ष पद के लिये ही सर्वदा प्रयत्न करना चाहिये।

भावार्थ —सिवाय मोक्ष के कोई भी स्थान ऐसा नहीं जहां पर लेशमात्र भी सुख मिले इसलिये भव्यजीवों को जहां पर किसी प्रकार का क्लेश नहीं ऐसे मोक्षपद के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये।।१४२।।

यद्दृष्टं बहिरङ्गनादि सुचिरं तत्रानुरागो भवेत् भ्रान्त्या भूरि तथापि ताम्यसि ततो मुक्त्वा तदन्तर्विश।
चेतस्तत्र गुरो: प्रबोधवसते: किञ्चित्तदाकर्ण्यते प्राप्ते यत्र समस्तदु:खविरमाल्लभ्येत नित्यं सुखम् ।।१४३।।

अर्थ —आचार्य उपदेश देते हैं कि अरे मन चिरकाल से तूने बाह्य स्त्री आदि पदार्थों को देखा है इसलिये तेरा भ्रम से उनमें अनुराग होता है तथा उसी अनुराग से सदा तू दु:खित होता है इसलिये स्त्री आदि से राग छोड़कर तू अपने अंतरंग में प्रवेश कर तथा ज्ञान के सागर श्री परमगुरु से ऐसा कोई उपदेश सुन जिससे तेरे समस्त दु:खों का नाश हो जावे तथा तुझे अविनाशी मोक्षरूपी सुख की प्राप्ति हो जावे।

भावार्थ — बाह्य चीजों में अनुराग तथा ममता कर हे मन तूने बहुत से दु:खों को भोगा इसलिये अब अपने अंतरंग में प्रवेश कर, तथा श्री गुरू का उपदेश सुन, जिससे तुझको अविनाशी सुख की प्राप्ति होंवे।।१४३।।

पृथ्वी छन्द

किमाल कोलाहलैरमलबोधसम्पन्निधे: समस्ति किल कौतुकं किल तवात्मनो दर्शने ।
विरुद्धसकलेन्द्रियो रहसि मुक्तसंगग्रह: कियन्त्यपि दिनान्यत: स्थिरमना भवान् पश्यतु ।।१४४।।

अर्थ —आचार्य उपदेश देते हैं कि यदि तू समस्त निर्मल ज्ञान के धारी आत्मा के देखने की इच्छा करता है तो तुझे समस्त स्पर्शनादि इन्द्रियों को रोक कर तथा समस्त प्रकार के स्थान परिग्रह का नाश कर और कुछ दिन एकान्त में बैठकर तथा कुछ दिन स्थिर मन होकर उसको देखना चाहिये व्यर्थ कोलाहल करने में क्या रखा है ?

भावार्थ — जब तक इन्द्रियां बाह्य पदार्थों में फंसी रहेंगी तथा जब तक निरन्तर परिग्रह में ममता रहेगी और जब तक मन चंचल रहेगा तब तक कदापि आत्मा का स्वरूप देखने में नहीं आ सकता इसलिये जो भव्यजीव आत्मा के स्वरूप को देखना चाहते हैं उनको इन्द्रियों को रोकना चाहिये तथा परिग्रह का त्याग करना चाहिये और मन को निश्चल करना चाहिये तभी आत्मा का स्वरूप मालूम पड़ सकता है।।१४४।।

(जीव और मन का परस्पर में संवाद)

शार्दूलविक्रीडित छन्द

भोचेत: किमु जीव तिष्ठसि कथं चिंतास्थितं सा कुतो रागद्वेषवशाक्तयो: परिचय: कस्माच्च जातस्तव।
इष्टानिष्टसमागमादिति यदि स्वभ्रं तदावां गतौ नो चेन्मुञ्च समस्तमेतदचिरादिष्टादिसंकल्पनम् ।।१४५।।

अर्थ—जीव मन से पूछता है कि रे मन तू कैसे रहता है, मन उत्तर देता है कि मैं सदा चिंता मैं व्यग्र रहता हूं फिर जीव पूछता है कि तूझे चिंता क्यों है फिर मन उत्तर देता है कि मुझे राग द्वेष के सबब से चिंता है फिर जीव पूछता है कि तेरा इनके साथ परिचय कहां से हुवा फिर मन उत्तर देता है कि भली बुरी वस्तुओं के संबंध से राग द्वेष का परिचय हुआ है तब फिर जीव कहता है कि हे मन यदि ऐसी बात है तो शीघ्र ही भली बुरी वस्तुओं के संबंध को छोड़ो नहीं तो हम दोनों को नरक में जाना पड़ेगा।

भावार्थ—स्वभाव से न कोई वस्तु इष्ट है न अनिष्ट है इसलिये इष्ट तथा अनिष्ट में संकल्प कर रागद्वेष करना निष्प्रयोजन है क्योंकि रागद्वेष से केवल दु:ख ही भोगने पड़ते हैं इसलिये समस्त पर वस्तुओं को छोड़कर समता की धारण करनी चाहिये ऐसी अपने—२ मन को निरन्तर भव्य जीवों को शिक्षा देनी योग्य है।।१४५।।

ज्ञानज्योतिरुदेति मोहतमसो भेद: समुत्पद्यते सानन्दा कृतकृत्यता च सहसा स्वान्ते समुन्मीलति।
यस्यैकस्मृतिमात्रतोऽपि भगवानत्रैव, देहान्तरे देवस्तिष्ठति मृग्यतां स रभसादन्यत्र किं धावत।।१४६।।

अर्थ—आचार्य उपदेश देते हैं कि जिस एक आत्मा के स्मरण मात्र से सम्यग्ज्ञानरूपी तेज का उदय होता है तथा मोहरूपी अंधकार दूर हो जाता है और चित्त में नाना प्रकार का आनन्द होता है तथा कृतकृत्यता भी चित्त में उदित हो जाती है वही अनन्त शक्ति का धारक भगवान् आत्मा इस ही शरीर में निवास करता है उसको ढूंढो व्यर्थ क्या दूसरी जगह अज्ञानी होकर फिरते हो ?।।१४६।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

जीवाजीवविचित्रवस्तुविविधाकाराद्र्धिरूपादयो रागद्वेषकृतोऽत्र मोहवशतो दृष्टा: श्रुता: सेविता:।
जातास्ते दृढबंधनं चिरमतो दु:खं तवात्मन्निदं जानात्येव तथापि किं बहिरसावद्यापि धीर्धावति ।।१४७।।

अर्थ—फिर भी आचार्य महाराज उपदेश देते हैं कि अरे जीव इस संसार में चेतन अचेतन स्वरूप नाना प्रकार के पदार्थ तथा नाना प्रकार के आकार और भांति—२ की संपदा तथा रूप रस आदि सर्व मोह के वश से रागद्वेष को करने वाले हैं और मोह के वश से ही देखे गये हैं तथा सुने गये हैं और सेवन किये गये हैं और इस ही कारण मोह से चिरकाल पर्यंत वे सर्व पदार्थ तेरे दृढ़बंधन हुवे हैं तथा दृढ़बंधन से ही तुझे नाना प्रकार के दु:ख भोगने पड़े हैं ऐसा भलीभांति जानते हुवे भी तेरी बुद्धि बाह्य पदार्थों में दौड़ती है यह बड़े आश्चर्य की बात है।

भावार्थ—चेतन अचेतन स्त्री पुत्र कलत्र गृह धन धान्यादि बाह्य पदार्थों में मोह कर चिरकाल से तुझे नाना प्रकार के बंधनों में फंंसना पड़ा है तथा नाना प्रकार के दु:ख भी भोगने पड़े हैं ऐसा भली भांति तुझे ज्ञान है तो भी नहीं मालूम क्यों अब भी तेरी चित्तवृत्ति बाह्य पदार्थों में लगी हुई है इसलिये अब बाह्य पदार्थों से मोह छोड़कर तुझे अपने वास्तविक अनन्तविज्ञानादि स्वरूप का चिंतवन करना चाहिये।।१४७।।

अब आचार्य इस बात को दिखलाते हैं कि निम्नलिखित प्रकार से विचार करने पर किसी प्रकार संसार से भय नहीं हो सकता ।

भिन्नोऽहं वपुषो बहिर्मलकृतान्नानाविकल्पौघत: शब्दादेश्च चिदेकमूर्तिरमल: शान्त: सदानन्दभाक्।
इत्यास्था स्थिरचेतसो दृढतरं साम्यादनारम्भिण: संसाराद्भयमस्ति किं यदि तदप्यन्यत्र क: प्रत्यय:।।१४८।।

अर्थ — नाना प्रकार के विष्टा मूत्रादि मल के घर स्वरूप इस शरीर से मैं भिन्न हूं तथा मन में उठे हुवे नाना प्रकार के विकल्पों से भी मैं भिन्न हूं और शब्द रस आदि से भी मैं जुदा हूं तथा मेरी एक चैतन्यमयी मूर्ति है और मैं समस्तप्रकार के मल कर रहित हूं तथा क्रोधादि के अभाव से मैं सदा शांत हूं और सदाकाल आनंद का भजने वाला हूं इस प्रकार का जिसके मन में मजबूत श्रद्धान है तथा समता का धारी होने से जिसका समस्त प्रकार का आरम्भ छूट गया है ऐसे मनुष्य को किसी प्रकार संसार से भय नहीं हो सकता और जब उसको संसार ही भय का करने वाला नहीं तब उसको कोई वस्तु भय की करने वाली नहीं हो सकती।

भावार्थ — जिस मनुष्य के इस प्रकार के विचार करने से समस्त प्रकार से संसार का भय जाता रहा है उस पुरूष को और किसी वस्तु से भय नहीं हो सकता इसलिये भव्य जीवों को इस प्रकार विचार कर संसार से कदापि भयभीत नहीं होना चाहिये।।१४८।।

किंलोकेन किंमाश्रयेण किमथद्रव्येण कायेन किं किं वाग्भि: किमुतेन्द्रियै: किमसुभि: किंते विकल्पै: परै: ।
सर्वे पुद्गलपर्यया वत परे त्वत्त: प्रमत्तो भवन्नात्मन्नेभिरभिश्रयितिष्टातरामालेन किं बंधनम् ।।१४९।।

अर्थ —आचार्य फिर भी उपदेश देते हैं कि न तो तुझे लोक से प्रयोजन है न लोक के आश्रय से प्रयोजन है और न तुझे द्रव्य से प्रयोजन है न वाणी से प्रयोजन है तथा न तुझे स्पर्शनादि इन्द्रियों से प्रयोजन है न तुझे खोटे विकल्पों से प्रयोजन है क्योंकि ये समस्त पुद्गल द्रव्य की पर्याय है और तू चैतन्यस्वरूप है इसलिये ये तेरे स्वरूप से सर्वथा जुदे ही हैं अत: इन वस्तुओं में प्रमाद करता हुवा क्यों वृथा तू दृढ बंधन को बांधता है अर्थात् लोक आदि से ममता करने से तू बंधेगा ही छूटेगा नहीं।

भावार्थ —जिस प्रकार कोई चोर यदि पर के द्रव्य को चुराकर अपना कहने लगे तो वह कैद में जाकर नाना प्रकार के बंधन को प्राप्त होता है उसी ही प्रकार हे जीव यदि तू भी पर की चीज को अपनावेगा तो दृढबंधन तो प्राप्त होगा इसलिये तुझे परवस्तु को अपनी कदापि नहीं कहनी चाहिये किन्तु अपनी ज्ञान दर्शनादि वस्तुओं को ही अपनाना चाहिये।।१४९।।

अनुष्टुप् छन्द

सतताभ्यस्तभोगानामप्यसत्सुखमात्मजम् ।
अप्यपूर्वं सदित्यास्था चित्ते यस्य स तत्त्ववित् ।।१५०।।

अर्थ —जिस मनुष्य के चित्त में ऐसा विचार उत्पन्न हो गया है कि निरंतर भोगे हुवे भी भोगों से पैदा हुवा सुख अशुभ है तथा केवल आत्मा से उत्पन्न हुवा सुख अपूर्व तथा शुभ है वही पुरूष भले प्रकार तत्व का ज्ञाता है ऐसा समझना चाहिये किंतु उससे भिन्न विपरीत श्रद्धानी कदापि तत्त्वज्ञाता नहीं हो सकता।।१५०।।

पृथ्वी छन्द

प्रतिक्षणमयं जनो नियतमुग्रदु:खातुर: क्षुदादिभिरभिश्रयंस्तदुपशान्तयेऽन्नादिकम् ।
तदेव मनुते सुखं भ्रमवशाद्यदेवासुखं समुल्लसति कज्छाकारुजि यथा शिखिस्वेदनम् ।।१५१।।

अर्थ —ग्रन्थकार कहते हैं— जिस प्रकार खाज का रोगी मनुष्य अग्नि से खाज के सेकने में सुख मानता है परन्तु अग्नि से सेकना केवल दु:ख का ही देने वाला है उस ही प्रकार यह संसारी जीव जब क्षुधा तृषा आदि व्याधियों से पैदा हुवे दु:खों से अत्यन्त पीड़ित होता है तथा उसकी शांति के लिये अन्न जल का आश्रयण करता है उस समय यद्यपि वह अन्न जल आदि पदार्थ दु:ख स्वरूप हैं तो भी भ्रम से उनको सुख मानता है।

भावार्थ — जिस प्रकार अग्नि से सेकते समय खाज में सुख मालूम होता है किन्तु अंत में अत्यंत दु:ख ही भोगना पड़ता है उस ही प्रकार इन्द्रियों से उत्पन्न हुआ सुख यद्यपि थोड़े समय तक सुख है परन्तु अंत में दु:खदायी है इसलिये भव्य जीवों को इन्द्रियों के सुख की कदापि अभिलाषा नहीं करनी चाहिये किन्तु अविनाशी सुख के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये।।१५१।।

शार्दूलीवक्रीडित छन्द

आत्मा स्वं परमीक्ष्यते यदि समं तेनैव संचेष्टते तस्मा एव हितस्ततोऽपि च सुखी तस्यैव संबंधभाक् ।
तस्मिन्नेव गतो भवत्यविरतानन्दामृताम्भौनिधौ चान्यत्सकलोपदेशनिवहस्यैतद्रहस्यं परम् ।।१५२।।

अर्थ —जब यह आत्मा अपने स्वरूप को देखता है तो स्वयं अपने स्वरूप के साथ ही चेष्टा करता है तथा अपने स्वरूप के लिये ही हित स्वरूप बनता है तथा अपने से ही सुखी होता है तथा अपना ही संबंधी होता है तथा निरंतर जो आनन्द रूप अमृत उसका समुद्र स्वरूप जो अपना स्वरूप उसमें ही लीन होता है इस प्रकार समस्त प्रवृत्तियों की आत्मा में जो दृढ्स्थिति यही समस्त उपदेश का असली तात्पर्य है। इससे अतिरिक्त और कुछ नहीं है।।१५२।।

आर्या छन्द

परमानन्दाब्जरसं सकलविकल्पान्यसुमनसस्त्यक्तवा ।
योगी स यस्य भजते स्तिमितान्त: करणषट्चरण: ।।१५३।।

अर्थ —जिस योगी का निश्चल मनरूपी भ्रमर समस्त विकल्परूपी अन्य फूलों को छोड़कर उत्कृष्ट आनंद के धारी शुद्धात्मारूपी कमल के रस का सेवन करता है वही योगीश्वर पूजने योग्य है।

भावार्थ —जिस प्रकार भ्रमर संपूर्ण पुष्पों को छोड़कर कमल के रस को आस्वादन करता है उस ही प्रकार जो मुनि समस्त विकल्पों को छोड़कर शुद्धात्मा का आस्वादन करते हैं वे ही भव्य जीवों के पूजने योग्य हैं।।१५३।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

जायन्ते विरसा रसा विघटते गोष्ठीकथाकौतुकं शीर्यन्ते विषयास्तथा विरमति प्रीति: शरीरेऽपि च।
जोषं वागपि धारयत्यविरतानन्दात्मशुद्धात्मनाश्चिंतायामपि यातुमिच्छति समं दोषैर्मन: पञ्चताम् ।।१५४।।

अर्थ —आचार्य कहते हैं कि परमानंदस्वरूप शुद्धात्मा की प्राप्ति तो दूर ही रहो किंतु केवल उसकी चिंता करने पर ही शृंगारादि रस विरस हो जाते हैं स्त्री पुत्र आदि की गोष्ठी (सलाह) नष्ट हो जाती है और उनकी कथा और कुतर्क दूर भग जाते हैं तथा इंद्रियों के विषय भी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और स्त्री पुत्र आदि की प्राप्ति तो दूर ही रही शरीर में भी प्रीति नहीं रहती और वचन भी मौन को धारण कर लेता है और समस्त राग द्वेषादि दोषों के साथ मन भी विनाशक को प्राप्त हो जाता है इसलिये भव्यजीवों को चाहिये कि ये शुद्धात्मा की चिंता ही में निमग्न बने रहें।।१५४।।

"'आचार्य आत्मध्यान का वर्णन करते हैं

आत्मैक: सोपयोगोमम किेमपिततोनान्यदस्तीतिचिंताभ्यासास्ताशेषवस्तो: स्थितपरममुदायद्गतिर्नोविकल्पे।
ग्रामे वा कानने वा जनजनितसुखे नि:सुखे वा प्रदेशे साक्षादाराधना सा श्रुतविशदमतेर्बाह्यमन्यत्समस्तम् ।।

अर्थ —दर्शन ज्ञानमयी आत्मा ही एक मेरा है इससे भिन्न कोई भी वस्तु मेरी नहीं है इस प्रकार की चिंता से जिस मनुष्य के मन की परिणति बाह्यपदार्थों से सर्वथा छूट गई है तथा जिसकी शास्त्र के अभ्यास से बुद्धि निर्मल हो गई है और जो परमानंद का धारी है उस मनुष्य के मन की प्रवृत्ति का विकल्पों से हटजाना तथा गांव में अथवा वन में अथवा मनुष्यों को सुख के उपजाने वाले प्रदेश में अथवा दु:ख उपजावने वाले प्रदेश में भी मन का न जाना किंतु अपने आत्मा के अनुभव मे ही लीन होना यही उत्कृष्ट आराधना है परंतु इससे भिन्न सब बाह्य ह तथा सर्व त्यागने योग्य है।।१५५।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द

यद्यन्तर्निहितानि खानि तपसा बाह्येन किं फल्गुना नैवान्तर्निहितानि खानि तपसां बाह्येन किं फल्गुना।
यद्यं तर्वहिरन्यवस्तुतपसा बाह्येन किं फल्गुना नैवान्तर्वहिरन्यवस्तुविषया बाह्येन किं फल्गुना।।१५६।।

अर्थ —आचार्य फिर भी उपदेश देते हैं कि बाह्यवस्तु से जुदे होकर यदि इंद्रियों का शुद्धात्मा के साथ संबंध रहा तो बाह्य में तप करना व्यर्थ है और यदि इन्द्रियों का शुद्धात्मा के साथ संबंध न रहा तो भी तप करना व्यर्थ है और यदि अंतरंग अथवा बाह्य में अन्यपदार्थों की ममता बनी रही तो तप करना व्यर्थ है तथा यदि अंतरंग में तथा बाह्य में किसी पदार्थ से ममता नहीं रही तो भी तप करना व्यर्थ ही है।

भावार्थ — तप इन्द्रिय तथा पदार्थों में ममता के दूर करने के लिये किया जाता है यदि इंद्रियों का संबंध तथा पदार्थों में ममता बनी रही तोभी किया हुवा भी तप व्यर्थ ही है अर्थात् वह तप निष्प्रयोजन ही है यदि इंद्रियों का संबंध टूट गया तथा पदार्थो से ममता भी दूर हो गई तो भी तप करना व्यर्थ ही है जिनके नाश के लिये तप किया जाता है वे तो प्रथम से ही नष्ट हो चुकी इसलिये इंद्रियों का संबंध तथा पदार्थों में ममता दूर करने के लिये ही तप करना चाहिये।।

शुद्धं वागतिवर्तितत्त्वमितरद्वाच्यं च तद्वाचकं शुद्धादेशमिति प्रभेदजनकं शुद्धेतरत्कल्पितं ।
तत्राद्यं श्रयणीयमेव विदुषा शेषद्वयोपायत: सापेक्षा नयसंहति: फलवती संजायते नान्यथा।।१५७।।

अर्थ —ग्रंथकार कहते हैं कि शुद्धनय तो वचन के द्वारा कहा नहीं जा सकता किंतु व्यवहारनय ही वचन के द्वारा कहा जाता है तथा वह व्यवहारनय शुद्धनय को कहने वाला है इसलिये उसको शुद्धादेश शुद्धनय को कहने वाला भी कहते हैं और जो भेद को उत्पन्न कराने वाला है उसको अशुद्धनय कहते हैं इस रीति से शुद्ध शुद्धादेश तथा अशुद्ध के भेद से नय के तीन भेद हुवे उन तीनों में शुद्धनय जो है सो शुद्धादेश तथा अशुद्धनय के उपाय से होता है इसलिये विद्वानों को शुद्धनय का ही आश्रय करना चाहिये तथा यह नियम है कि आपस में एक दूसरे की अपेक्षा करने वाला ही नय का समूह कार्यकारी हो सकता है परन्तु एकान्त से भिन्न नहीं।

भावार्थ — यद्यपि शुद्धनय ही ग्रहण करने योग्य है तथापि व्यवहार बिना शुद्धनय कदापि नहीं हो सकता इसलिये व्यवहार से ही शुद्धनय का सिद्ध करना योग्य है क्योंकि व्यवहार की नहीं अपेक्षा करने वाला शुद्धनय कोई कार्यकारी नहीं तथा निश्चयनय की नहीं अपेक्षा करने वाला व्यवहारनय भी कोई प्रयोजन का नहीं है किंतु एक दूसरे की अपेक्षा करने वाला ही तप कार्यकारी है।१५७।।

फिर भी ग्रंथकार शुद्धात्मा का वर्णन करते हैं।

ज्ञानं दर्शनमप्यशेषविषयं जीवस्य नार्थान्तरं शुद्धादेशविवक्षया स हि ततश्चिद्रूप इत्युच्यते।
पर्यायैश्च गुणेश्च साधुविदिते तस्मिन् गिरा सद्गुरोर्ज्ञातं किं न विलोकितं न किमथ प्राप्तं न किं योगिभि:।।१५८||

अर्थ —यद्यपि व्यवहार नय से ज्ञानदर्शन आत्मा से भिन्न है तथापि शुद्धनय की विवक्षा करने पर समस्त पदार्थों को हाथ की रेखा के समान जानने वाला तथा देखने वाला ज्ञान तथा दर्शन आत्मा से कोई भिन्न वस्तु नहीं है किन्तु दर्शनज्ञान चेतना स्वरूप ही यह आत्मा है इसलिये जिन योगियों ने श्रेष्ठ गुरुओं के उपदेश से यदि गुण तथा पर्यायों सहित आत्मा को जान लिया तो उनने समस्त को जान लिया तथा सबको देख लिया तथा जो कुछ प्राप्त करने योग्य वस्तु थी उस सबको भी पा लिया।।१५८।।

भावार्थ —जिस पुरूष ने दर्शन ज्ञानस्वरूप आत्मा को गुणपर्यायों सहित जान लिया तो समझना चाहिये उसने सबको जान लिया तथा देख लिया।।१५८।।

यत्रान्तर्नं बहि:स्थितं न च दिशि स्थूलं न सूक्ष्मं पुमान्नैव स्त्री न नपुंसकं न गुरुतां प्राप्तं न यल्लाघवम् ।
कर्मस्पर्शशरीरगंधगणनाव्याहारवर्णोज्झितं स्वच्छं ज्ञानदृगेकमूर्तितदहं ज्योति: परं नापरम् ।।१५९।।

अर्थ —आत्मज्ञानी पुरूष इस प्रकार का विचार करता है कि न मैं भीतर हूं न बाहिर हूं न किसी दिशा में हूं न मोटा हूं न पतला हूं न पुरुष हूं न स्त्री हूं न नपुंसक हूं न भारी हूं न हलका हूं और न मेरा धर्म है न स्पर्श है न शरीर है न गंध है न संख्या है न शब्द है न वर्ण है तथा जो अत्यंत स्वच्छ तथा ज्ञान दर्शनमयी मूर्ति की धारक ज्योति है वही मैं हूं और उससे भिन्न कोई नहीं हूं।

भावार्थ — ज्ञानी पुरूष इस बात का विचार करता है कि स्थूल सूक्ष्मादिक तथा स्त्री पुरूष नपुंसकादिक तथा स्पर्श रस गन्धादिक सब पुद्गल के विकार हैं तथा मैं उनसे सर्वथा भिन्न हूं किन्तु मेरी एक ज्ञान दर्शनमयी ही मूर्ति है।।१५१।।

और भी आचार्य शुद्धात्मा का वर्णन करते हैं।

जानाति स्वयमेव यद्धि मनसश्चिद्रूपमानंदवत्प्रोच्छिन्ने यदनाद्यमंदमसकृन्मोहान्धकारे हठात् ।
सूर्याचन्द्रमसावतीत्य यदहो विश्वप्रकाशात्मकं तज्जीयात्सहजं सुनिष्कलमहं शब्दाभिधेयं मह:।।१६०।।

अर्थ —आनंद के धारी जिस चैतन्य रूपी तेज को अनादिकाल से विद्यमान तथा गाढ मोहरूपी अंधकार को तप के द्वारा सर्वथा नाशकर केवलज्ञान के धारी पुरूष अपने आप जान लेते हैं तथा तो चैतन्यरूपी तेज सूर्य चन्द्रमा के तेज को फीका करने वाला है तथा समस्त पदार्थों का भलीभांति प्रकाश करने वाला है और जिसका मैं (अहम्) इस शब्द से अनुभव होता है तथा जो स्वाभाविक है ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज सदा काल जयवन्त रहो।।१६०।।

ज्ञानी पुरूष इस प्रकार का भी विचार करता है

वसन्ततिलका छन्द

यज्जायते किमपि कर्मवशादसातं सातं च यत्तदनुयायि विकल्पजालम् ।
जातं मनागपि न यत्र पदं तदेव देवेन्द्रवन्दितमहं शरणं गतोऽस्मि ।।१६१।।

अर्थ —जिस मोक्ष पद में न तो कर्म के वश से साता होती है और न कर्म के वश से असाता होती है तथा न उन साता तथा असाता के अभाव जहां पर किसी प्रकार के विकल्प ही उठते हैं और जिस पद की बड़े—२ इंद्रादिक भी स्तुति करते हैं ऐसे मोक्षपद के शरण को मैं प्राप्त होना चाहता हूं।।१६१।।

आगे आचार्य और भी ज्ञानी के विचार को दिखाते हैं

शार्दूलविक्रीडित छन्द

धिक्कान्तास्तनमण्डलं धिगमलप्रालेयरोचि:करान् धिक्कर्पूरविमिश्रचंदनरसं धिक् ताञ्जलादीनपि ।
यत्प्राप्तं न कदाचिदत्र तदिदं संसारसंतापहृत् लग्नं चेदिति शीतलं गुरुवचो दिव्यामृतं मे हृदि।।१६२।।

अर्थ —संसार में यह बात भली भांति प्रचलित है तथा अज्ञानी मनुष्य इस बात को मानते भी हैं कि यदि किसी प्रकार का संताप हो जावे तो उस संताप प्राणी को स्त्री के स्तनों के स्पर्श से तथा चन्द्रमा की किरण आदि के सेवन से संताप को दूर कर देना चाहिये परंतु ज्ञानी मनुष्य इस बात को सर्वथा नहीं मानता तथा इससे विपरीत ही विचार करता है अर्थात् वह कहता है कि जिसकी कभी भी प्राप्ती नहीं हुई है तथा जो सब संसार के दु:खों को दूर करने वाला है और जो अत्यंत शीतल है ऐसा यदि गुरूओं का वचन मेरे मन में मौजूद है तो जिनको मनुष्य शीतल करने वाले कहते हैं ऐसे स्त्री के कुचों को धिक्कार हो तथा चंद्रमा की शीतल किरणों को धिक्कार रहो तथा कर्पूर मिले हुवे चंदन के रस को धिक्कार हो तथा जल आदि को भी धिक्कार हो।

भावार्थ — सिवाय गुरु के उपदेश के ये समस्त चीजें संताप ही की करने वाली हैं अंश मात्र भी शांति की करने वाली नहीं है इसलिये जो मनुष्य शांति के अभिलाषी हैं उनको गुरु के वचन का ही आश्रय लेना चाहिये।।१६२।।

अब आचार्य शुद्धात्मा की परिणतिस्वरूप धर्म में मग्न हुवे योगियों को नमस्कार करते हैं

जित्वा मोहमहाभटं भवपथे दत्तोग्रदु:खश्रमे विश्रान्ता विजनेषु योगिपथिका दीर्घे चरन्त: क्रमात् ।
प्राप्ता ज्ञानधनाश्चिरादभिमतं स्वात्मोपलं तिष्ठति नित्यानंदकलत्रसंगसुखिनो ये तत्र तेभ्यो नम:।।१६३।।

अर्थ — जो योगीश्वर रूप पथिक अत्यंत दु:ख को देने वाले संसाररूपी विशाल मार्ग में विचरते हुवे समस्त ज्ञानादिक धन को चुराने वाले मोह रूपी योधा को जीतकर निर्जन स्थान में विश्राम लेते हैं तथा जो ज्ञानरूपी धन के स्वामी हैं और जिसका कभी भी नहीं नाश होने वाला है ऐसा जो आत्मिक सुखरूपी स्त्री उसके संग से जो सदा सुखी है तथा अपने आत्मा के स्वरूप की जहां पर प्राप्ति होती है ऐसे स्थान में विराजमान हैं उन योगियों को मैं नमस्कार करता हूं।

भावार्थ —जिस प्रकार कोई धनयुक्त पथिक किसी बड़े मार्ग में मिले हुवे चोरों को जीतकर तथा अपने धन को बचाकर जब वांछित स्थान पर पहुंच जाता है तब वह अपनी स्त्री के साथ नाना प्रकार के भोगविलासों को करता हुवा सुख से रहता है उस ही प्रकार जिन योगिश्वरों ने संसाररूपी गहन मार्ग में रहने वाले तथा ज्ञानरूपी धन को चुराने वाले मोहरूपी ठग को जीतकर अपने ज्ञान धन की रक्षा की है तथा जो मोक्षरूपी स्त्री के साथ नाना प्रकार के सुखों का भोग करते हैं और अपने आत्मस्वरूप में लीन हैं ऐसे उन योगीश्वरों को मैं मस्तक नवाकर नमस्कार करता हूं।।१६३।।

धर्म की महिमा का तथा धर्म के उपदेश

स्रग्धरा छन्द
इत्यादिर्धर्म एष क्षितिपसुरसुखानघ्र्यमाणिक्यकोष: पायो दु:खनलानां परमपदलसत्सौधसोपानराजि:।
एतन्माहात्म्यमीश: कथयतिजगतांकेवलीसाध्वेधीति सर्वस्म्न्विाङ्येथस्मरति परमहोमादृशस्तस्यनाम।।

अर्थ — ग्रन्थकार कहते हैं कि पूर्व में जो दया आदिक पांच प्रकार का धर्म कहा है वह धर्म बड़े—२ चक्रवर्ती आदिक राजाओं के तथा इंद्र अहमिन्द्र आदि के सुख का देने वाला है तथा समस्त दु:खों को मूल से नाश करने वाला है और वह धर्म निर्वाणरूपी महल के चढ़ने के लिये पैड़ी के समान है अर्थात् जो मनुष्य धर्म को धारण करता है उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है । ऐसे उस धर्म के माहात्म्य को साक्षात्केवली अथवा समस्त द्वादशांग के पाठी गणधर ही वर्णन कर सकते हैं परन्तु मेरे समान मनुष्य तो केवल उसके नाम को ही स्मरण कर सकते हैं।

भावार्थ — धर्म ही महिमा का वर्णन सिवाय केवली अथवा गणधर देव के दूसरा कोई नहीं कर सकता।।१६४।। धर्म ही धारण करने योग्य है ऐसा उपदेश कहते हैं।


शार्दूलविक्रीडित छन्द
शश्वज्जन्मजरान्तकालविलसद्दु:खौघसारीभवत् संसारोग्रमहारुजोऽपहृतयेऽनन्तप्रमोदाय वै।
एतद्धर्मरसायनं ननु बुधा: कर्तुं मतिश्चेत्तदा मिथ्यात्वाविरतिप्रमादनिकर: क्रोधादि संत्यज्यताम् ।।१६५।।।

अर्थ —भो भव्य जीवो यदि तुम निरन्तर जन्म जरा मरण आदिक समस्त दु:खों को देने वाले संसाररूपी भयंकर रोगों को दूर करने के लिये धर्मरूपी रसायन का आश्रय लेना चाहते हो तथा अनन्त सुख की प्राप्ति के लिये भी धर्मरूपी रसायन का आश्रय करना चाहते हो तो मिथ्यात्व अविरति प्रमाद तथा क्रोधादि कषायों का सर्वथा त्याग करो।

भावार्थ — जब तक क्रोधादि कषायों का आत्मा के साथ संबंध रहेगा तब तक न तुम नाना दु:खों के देने वाले संसार रूपी महारोग का शमन कर सकते हो और न तुम अविनाशी सुख की तरफ झांक सकते हो इसलिये यदि तुम संसाररूपी महारोग के दूर करने की अभिलाषा करते हो तथा यदि तुम अविनाशी सुख को चाहते हो तो मिथ्यात्व आदि की तरफ झांक झांक करके भी न देखो।।१६५।।

अब आचार्य धर्म का दुर्लभपना दिखाते हैं।

नष्ट रत्नमिवाम्बुधौ निधिरिव प्रभ्रष्टद्दष्टेर्यथा योगो यूपशलाकयोश्च गतयो: पूर्वापरौ तोयधी।
संसारेऽत्र तथा नरत्वमसकृद्दु:खप्रदे दुर्लभं लब्धे तत्र च जन्म निर्मलकुले तत्रापि धर्मे मति:।।१६६।।

अर्थ —जिस प्रकार अथाह समुद्र में यदि रत्न गिर पड़े फिर उसका मिलना बहुत कठिन है तथा जैसे अंधे को निधि मिलना अत्यंत दुर्लभ है और जिस प्रकार समुद्र में किसी स्थान पर दो काष्ठ खण्डों को छोड़ देना उनमें एक को पूर्व दिशा की ओर बहा देना तथा दूसरे को पश्चिम दिशा की ओर को बहा देना फिर उनका उस ही स्थान पर मिलना दु:साध्य है उस ही प्रकार निरंतर नाना प्रकार के दु:खों के देने वाले इस संसार में मनुष्य जन्म का पाना बहुत कठिन है यदि दैवयोग से मनुष्य जन्म भी मिल जावे तो फिर उत्तम कुल मिलना अत्यन्त दुर्लभ है यदि किसी समय में उत्तमकुल की भी प्राप्ति हो जावे तो फिर धर्म में श्रद्धा होना अत्यंत दु:साध्य है इसलिये भव्यजीवों को ऐसे अत्यन्त दुर्लभ धर्म की अवश्य उपासना करनी चाहिये।।१६६।।

अब आचार्य इस बात को दिखाते हैं कि अत्यंत दुर्लभ धर्म आदिक वस्तु खोटे उपदेश से प्राणियों के व्यर्थ चली जाती है।

न्यायादंधकवर्तकीयकजनाख्यानस्य संसारिणां प्राप्तं वा बहुकल्पकोटिभिरिदं कृच्छ्रान्नरत्वं यदि।
मिथ्यादेवगुरूपदेशविषयव्यामोहनीचान्वयप्रायै: प्राणभृतां तदेव सहसा वैफल्यमागच्छति।।१६७।।

अर्थ — प्रथमतो मनुष्य जन्म पाना संसार में अत्यंत कठिन काम है दैवयोग से अंधे के हाथ में बटेर के समान करोड़ों कल्पों(कल्पकाल) के बाद यदि इस अत्यंत दु:साध्य मनुष्य जन्म की प्राप्ति भी हो जावे तो वह मनुष्य जन्म खोटे देव तथा खोटे गुरूओं के उपदेश से निष्फल चला जाता है तथा विषयों में आसक्तता से तथा व्यसनादिक नीचकार्य करने से भी वह बात की बात में व्यर्थ चला जाता है।

भावार्थ — बटेर एक जाति का अत्यंत चंचल पक्षी होता है वह चतुर से चतुर भी नेत्रधारियों के हाथ में बड़ी कठिनता से आता है फिर अंधे के हाथ में आना तो उसका अत्यन्त ही कठिन है यदि दैवयोग से वह अंधे के हाथ में आ जावे तो जिस प्रकार उसका आना बहुत कठिन समझा जाता है उस ही प्रकार यह मनुष्य जन्म है क्योंकि सबसे निकृष्ट निगोद राशि है उसमें से निकलकर बड़े पुण्य के उदय से यह जीव एकेंद्री होता है फिर दोइंद्री तेइंद्री चौइंद्री पञ्चेंद्री होता है फिर बड़े पुण्य के उदय से इस मनुष्य जन्म को धारण करता है किन्तु ऐसा भी कठिन वह मनुष्य जन्म खोटे देव तथा गुरू आदि के उपदेश आदि से व्यर्थ ही चला जाता है इसलिये भव्य जीवों को चाहिये कि ऐसे दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर वे खोटे देव की सेवा तथा खोटे गुरुओं के उपदेश का श्रवण न करे तथा विषयों में भी मग्न न रहें।।१६७।।

कुगुरु कुदेवादि की सेवा आदि के त्याग से ही मनुष्य जन्म सफल होता है ऐसा आचार्य वर्णन करते हैं।

वसंततिलका छन्द
लब्धे कथं कथमपीह मनुष्यजन्मन्यङ्गप्रसंगवशतो हि कुरु स्वकार्यम् ।
प्राप्तं तु कामपि गतिं कुमते तिरश्चां कस्त्वां भविष्यति विवोधायितुं समर्थ:।।१६८।।

अर्थ — हे भव्यजीव बड़े पुण्य कर्म के उदय से तुझे इस मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है इसलिये शीघ्र ही कोई अपने हित का करने वाला काम कर नहीं तो रे मूर्ख जिस समय तिर्यंच आदि खोटी गति को प्राप्त हो जावेगा तो वहां पर तुझे कोई समझा भी नहीं सकेगा।

भावार्थ — समझाने पर मनुष्य ही शीघ्र समझ सकता है पशु में यह शक्ति नहीं है जो समझाने पर समझ जावे इसलिये भव्यजीवों को मनुष्य जन्म में ही ऐसा काम करना चाहिये जिससे वे तिर्यंच आदि खोटी गति को न प्राप्त होवें तथा वहां पर वे नाना प्रकार के दु:ख न भोगें।।१६८।।

और भी आचार्य उपदेश देते हैं।

शार्दूलविक्रीडित छन्द
जन्म प्राप्य नरेषु निर्मलकुले क्लेशान्मते: पाटवं भक्तिंं जैनमते कथं कथमपि प्रागर्जिताच्छ्रेयस: ।
संसारार्णवतारकं सुखकरं धर्मं न ये कुर्वते हस्तप्राप्यमनर्घ्यरत्नमपि ते मुञ्चन्ति दुर्बुद्धय:।।१६९।।

अर्थ —जो मनुष्य अत्यन्त कठिन मनुष्य जन्म को पाकर तथा उत्तम कुल को पाकर तथा किसी प्रकार पूर्वकाल में उपार्जन किये हुवे पुण्य के उदय से जैन धर्म के भक्त भी होकर संसार समुद्र से पार करने वाले तथा नाना प्रकार के सुख के देने वाले धर्म की सेवा नही करते हैं वे मूर्ख हाथ में आये हुवे अमूल्य रत्न को छोड़ देते हैं।

भावार्थ — प्रथम तो रत्न की प्राप्ति ही अत्यन्त कठिन है यदि प्राप्त भी हो जावे तो उसको व्यर्थ फेंक देना सर्वथा मूर्खता है उस ही प्रकार उत्तम कुलादि को प्राप्त कर धर्म का न करना भी मूर्खता है इसलिये भव्य जीवों को धर्म की अवश्य उपासना करना चाहिये।।१६९।। जो मनुष्य अवसर पाकर भी धर्म नहीं करते हैं उनकी ग्रन्थकार निंदा करते हैं।

तिष्ठत्यायुरतीव दीर्घमखिलान्यङ्गानि दूरं दृढान्येषा श्रीरपि मे वशं गतवती किं व्याकुलत्वं मुधा।
आयत्यां निरवग्रहो गतवया धर्म करिष्ये भरादित्येवं वत चिंतयन्नपि जडो यात्यंतकग्रासताम् ।।१७०।।

अर्थ —अभी मेरी आयु बहुत है हाथ पैर नाक कान आदिक भी मजबूत हैं तथा लक्ष्मी मेरे विद्यमान हैं इसलिये व्यर्थ धर्मादि के लिये क्यों व्याकुल होना चाहिये किंतु इस समय तो आनंद से भोगों का भोगना चाहिये भविष्यत् काल में जिस समय वृद्ध हो जाऊंगा उस समय निश्चय कर अच्छी तरह धर्म का आराधन करूंगा इस प्रकार विचार करता ही करता मूर्ख मर जाता है इसलिये विद्वानों को चाहिये कि वे मृत्यु सदा शिर पर छाई हुई है इस भय से निरंतर धर्म की आराधना करें।।१७०।।

आर्या छन्द
पलितैकंदर्शनादपि सरति सतश्चित्तमाशु वैराग्यम् ।
प्रतिदिनमितरस्य पुन: सह जरया वद्र्धते तृष्णा।।१७१।।

अर्थ —जो पुरूष ज्ञानी हैं वे तो सफेद केश को देखते ही वैराग्य को प्राप्त होते हैं किंतु जो मनुष्य ज्ञानरहित हैं उनको तो जैसा—२ सफेद केशों का दर्शन होता जाता है वैसी वैसी ही उनकी तृष्णा और भी बढ़ती चली जाती है और उनको वैराग्य की बात भी बुरी लगती है।।१७१।।

तथा वे अज्ञानी पुरूष तृष्णा को इस प्रकार कहते हैं।

मन्दाक्रान्ताछन्द
आजातेर्नस्त्वमसि दयिता नित्यमासन्नगासि प्रौढास्याशे किमथ वहुना स्त्रीत्वमालम्बितासि ।
अस्मत्केशग्रहणमकरोदग्रतस्ते जरेयं मर्षस्येतन्मम च हतके स्नेहलाद्यापि चित्रम् ।।१७२।।

अर्थ — हे तृष्णे! आजन्म से तू हमारी प्रिया है और तू सदा हमारे पास रहने वाली है तथा तू प्रौढ़ा है और अधिक कहां तक कहा जाय तू साक्षात् हमारी स्त्री ही है परंतु अरे दुष्ट तेरे सामने भी इस जरा ने हमारे केश पकड़ लिये हैं तो भी तू सहन करती है फिर भी तो हमारी प्यारी है यह बड़े आश्चर्य की बात हैै।

भावार्थ — स्त्री का यह स्वभाव होता है कि यदि वह अपने बडी भारी ईर्षा करती है पति के साथ किसी दूसरी स्त्री को क्रीड़ा करती तथा रमण करती देख लेवे तो उससे बड़ी भारी ईर्षा करती है तथा तत्काल ही उसका पति के साथ संबंध छुड़ाने की चेष्टा करती है यदि संबंध न छूट सके तो प्रीति तो अवश्य ही छुड़ा देती है अतएव अज्ञानी पुरूष इस प्रकार तृष्णा को संबोधते हैं कि अतिप्रिये तृष्णे! इस जरा ने हमारे केश पकड़ लिये हैं तो भी तू कुछ नहीं कहती है अर्थात् तुझे इसका हमारे साथ संबंध छुटा देना चाहिये।।१७२।।

और भी आचार्य उपदेश देते हैं।

बसंतलिका छन्द
रज्रयते परिवृढोऽपि दृढोऽपि मृत्युमभ्येति दैववशत: क्षणतोऽत्र लोके।
तत्क: करोति मदमम्बुजपत्रवारिविन्दूपमैर्धनकलेवरजीविताद्यै:।।१७३।।

अर्थ —जो मनुष्य इस संसार में धनी हैं वह क्षणभर में रंक हो जाता है और जो रंक है वह पलभर में धनी हो जाता है तथा जो बलवान् दीखता है वह दैवयोग से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है इसलिये ऐसा कौन बुद्धिमान है जो ‘‘धन शरीर जीवन आदि को’’ कमल के पत्ते पर जल की बूंद के समान विनाशीक जानकर भी मद करे अर्थात् कोई भी मद नहीं कर सकता।।१७३।।

आगे आचार्य इस बात को दिखाते हैं कि स्त्री पुत्र आदिक यद्यपि विनाशीक है तो भी मोह से मालूम होते विपरीत ही है।

शार्दूलविक्रीडितछन्द
प्रातर्दर्भदलाग्रकोटिघटितावश्यायविन्दूत्करप्राया: प्राणधनांगजप्रणयिनीमित्रादयो देहिनाम्
अक्षाणां सुखमेतदुग्रविषवद्धर्मं विहाय स्फुटं सर्वं भङ्गुरमत्रदु:खदमहो: मोह: करोत्यन्यथा।।१७४।।

अर्थ —संसार में प्राणियों के प्राण हाथी, स्त्री,मित्र,पुत्र आदिक प्रात: काल में दर्भ के पत्ते के अग्रभाग पर लगे हुवे ओस के बूंद के समान चंचल हैं और इंद्रियों से उत्पन्न हुवे सुख भयंकर जहर के समान हैं तथा एक धर्म तो अविनाशीक तथा सुख का देने वाला है किन्तु धर्म से भिन्न समस्त वस्तु क्षणभर में विनाशीक है तथा दु:ख देने वाली है परन्तु यह मोह अन्यथा ही करता है अर्थात् जो वस्तु नित्य तथा सुख की देने वाली हैं वे मोह के उदय से अनित्य तथा दु:ख के देने वाली मालूम पड़ती हैं और जो वस्तु अनित्य तथा दु:ख के देने वाली है वे मोह के सवव नित्य तथा सुख की देने वाली जान पड़ती है।।१७४।।

अब आचार्य इस बात को दिखाते हैं कि जब तक काल सम्मुख नहीं आता तब तक समस्त पुरूषार्थ चलता है इसलिये काल रोकने का उपाय करना चाहिये।

तावद्वल्गति वैरिणां प्रति चमूस्तावत्परं पौरूषं तीक्ष्णस्तावदसिर्भुजौ दृढतरौ तावच्च कोपोद्गम: ।
भूपस्यापि यमो न यावददय: क्षुत्पीडित: सम्मुखं धावत्यन्तरिदं विचिन्त्य विदुषा तद्रोधको मृग्यते।।

अर्थ —जब तक क्षुधाकर पीड़ित यह निर्दयीकाल राजा के भी सामने नहीं पड़ता तब तक उस राजा की सेना भी जहां तहां उछलती फिरती है तथा उत्कृष्ट पौरूष भी मालूम पड़ता है तथा तब तक तलवार खूब शत्रुओं के नाश करने के लिये पैनी बनी रहती है तथा भुजा भी बलवान रहती है और कोप का भी उदय रहता है परन्तु जिस समय वह कालवली सामने पड़ जाता है तब ऊपर लिखी हुई बातों में से एक भी बात नहीं होती ऐसा भलीभांति विचार कर विद्वान् पुरूष उस काल के रोकने वाले को ढूंढ़ते हैं।

भावार्थ — इस कालवली को रोकने वाला मात्र एक जिनेन्द्र का धर्म ही है क्योंकि धर्मात्माओं का काल कुछ नहीं कर सकता इसलिये भव्य जीवों को चाहिये कि वे धर्म की आराधना करेंं ।।१७५।।

और भी आचार्य उपदेश देते हैं—

मालिनी छन्द
रतिजलरममाणो मृत्युकैवर्तहस्तप्रसृघनजरोरूप्रोल्लसज्जालमध्ये।
विकटमपि न पश्यत्यापदां चक्रमुग्रं भवसरसि वराको लोकमीनौघ एष:।।१७६।।

अर्थ — जिस प्रकार मल्लाकार बिछाये हुवे जाल में रहकर भी मछलियों का समूह जल में क्रीड़ा करता रहता है किंतु मारे जायेंगे इस प्रकार आई हुई आपत्ति पर कुछ भी ध्यान नहीं देता उस ही प्रकार यह लोकरूपी मीनों का समूह मृत्युरूपी मल्लाकर बिछाये हुवे प्रबल जरारूपी जाल में रहकर इंद्रियों के विषय में प्रीतिरूपी जो जल उसमें निरन्तर क्रीड़ा ही करता रहता है किन्तु आने वाली नरकादि आपत्तियों पर कुछ भी विचार नहीं करता।।१७६।।

धर्म से ही मृत्यु जीती जाती है इस बात को दिखाते हैं—

क्षुद्भुक्तेस्तृडपीह शीतलजलाद् भूतादिका मन्त्रत: सामादेरहितो गदाद्गदगृण: शांतिं नृभिर्नीयते
नो मृत्युस्तु सुरैरपीति हि मृते मित्रेऽपि पुत्रेऽपि वा शोको न क्रियते वुधै: परमहो धर्मस्ततस्तज्जय: ।।

अर्थ — मनुष्य क्षुधा को भोजन से, प्यास को शीतल जल के पीने से तथा भुतादिकों को मंत्र से तथा वैरी को साम दाम दण्डादिक से और रोग को औषधि आदि से शान्त कर लेते हैं परन्तु मृत्यु को देवादिक भी शान्त नहीं कर सकते इसलिये विद्वान् पुरूष मित्र तथा पुत्र के मर जाने पर भी शोक नहीं करते किन्तु वे उत्तम धर्म का ही आराधन करते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि उत्तम धर्म से ही मृत्यु का जय होता है।

भावार्थ — इस संसार में समस्त रोगादि की शान्ति के उपाय मौजूद हैं परन्तु मृत्यु की शान्ति का सिवाय धर्म के दूसरा कोई उपाय नहीं इसलिये विद्वानों को यदि मृत्यु से बचना है तो उनको अवश्य ही धर्म की आराधना करनी चाहिये।।१७७।।

आचार्य धर्म की ही महिमा का वर्णन करते हैं—

मंदाक्रांता छन्द
त्यक्त्वा दूरं विधरपयसो दुर्गतिक्लिष्टकृच्छ्रातृ लब्धानंदं सुचिरममरश्रीसरस्यां रमन्ते।
इत्येतस्या नृपपदसरस्यक्षयं धर्मपक्षा यान्त्येतस्मादपि शिवपदं मानसं भव्यहंसा:।।१७८।।

अर्थ —जिस प्रकार हंस नामक पक्षी खराब जल के भरे हुवे तालाब को छोड़कर निर्मल जल के भरे हुवे सरोवर में अपने पंखों के बल से चला जाता है तथा वहां पर चिरकाल तक आनंद से क्रीड़ा करता है तथा अपने पंखों के ही बल से उस सरोवर को छोड़कर दूसरे सरोवर को चला जाता है इस ही प्रकार क्रमश: नाना उत्तम सरोवरों के आनंद को भोगता—२ वही हंस मानस सरोवर को प्राप्त हो जाता है तथा वह वहां पर चिरकाल तक नाना प्रकार के आनन्दों का भोग करता है उस ही प्रकार ये भव्यरूपी हंस भी धर्मरूपी पंख के बल से दुखरूपी जल से भरे हुये दुर्गतिरूप तालाब को छोड़कर देवलोक संबंधी जो लक्ष्मीरूपी सरोवरी उसमें आनंद के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते हैं तथा उसको भी छोड़कर धर्म के ही बल से ही वे नाना प्रकार के चक्रवर्ती आदि राजाओं के पदरूपी सरोवर में क्रीड़ा करते हैं ‘‘ अर्थात् चक्रवर्ती आदि पद का भोग करते है’’ पीछे उससे विमुख होकर धर्म के बल से वे भव्यरूपी हंस मोक्षपदरूपी मानस सरोवर को प्राप्त हो जाते हैं इसलिये भव्यों को चाहिये कि वे ऐसे माहात्म्य सहित धर्म का सदा आराधन करें।।१७८।|

और भी धर्म के माहात्म्य को दिखाते हैं-

शार्दूलविक्रीडित छन्द
जायन्ते जिनचक्रवर्तिवलभृद् भोगीन्द्रकृष्णादयो धर्मादेव दिगङ्गनाङ्गविलसच्छश्वद्यशश्चन्दना:।
तद्धीना नरकादियोनिषु नरा दु:खं सहन्ते ध्रुवं पापेनेति विजानता किमिति नो धर्म: सता सेव्यते।।

अर्थ —जो मनुष्य धर्मात्मा हैं वे मनुष्य धर्म के बल से ही तीर्थंकर चक्रवर्ती बलभद्र धरणेन्द्र नारायण प्रतिनारायण आदि पद के धारी हो जाते हैं तथा उनकी कीर्ति समस्त दिशाओं में एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक फैल जाती है और जो धर्म से रहित हैं वे तो निश्चयकर नरकादि योनियों में नाना प्रकार के दु:खों को ही सहते हैं ऐसा जानते हुवे भी आचार्य कहते हैं कि विद्वान् मनुष्य धर्म की क्यों नहीं आराधना करते अर्थात् उनको अवश्य धर्म की आराधना करनी चाहिये।।१७९।।

धर्म की ही महिमा और दिखाते हैं—

स स्वर्ग: सुखरामणीयकपदं ते ते प्रदेश परा: सारा सा च विमानराजिरतुलप्रेंखत्पताकापटा:।
ते देवाश्चपदातय: परिलसत्तन्नंदनं तास्त्रिय: शक्रत्वं पदनिंद्यमेतदाखिलं धर्मस्य विस्फूर्जितम् ।।१८०।।

अर्थ — सुख तथा सुंदरता का अद्वितीय स्थान तो वह स्वर्ग तथा वे वे महामनोहर स्वर्गों के प्रदेश तथा जिनके ऊपर अनुपम पताका उड़ रही है ऐसे वे विमानों की पंक्ति और प्यादे स्वरूप वे देवता तथा वह मनोहर नन्दनवन और वे मनोहर देवांगना तथा वह अत्यन्त निर्मल इंद्रपना इत्यादि समस्त विभूति धर्म के ही महात्म्य से मिलती है इसलिये ऐसे पवित्र धर्म का आराधन भव्यजीवों को अवश्य करना चाहिये।१८०।।

और भी धर्म की महिमा ही का वर्णन करते हैं—

यत् षट्खण्डमही नवोरुनिधयो द्वि:सप्त रत्नानि यत्तुङ्गा यद्द्विरदा रथाश्च चतुराशीतिश्च लक्षाणि यत् ।
यच्चाष्टादश कोटयश्च तुरगा योषित्सहस्त्राणि यत् षट्युक्ता नवतिर्यदेकविभुता तद्धाम धर्मप्रभो: ।।

अर्थ —वह तोछै खंड की पृथ्वी और वे बड़ी —२ नौ निधि तथा वे समस्तसिद्धि के करने वाले चौदहरत्न और वे चौरासी लाख बड़े—२ हाथी तथा विमान के समान चौरासी लाख बड़े—२ रथ और वे अठारह करोड़ पवन के समान चंचल घोड़े तथा वे देवांगना के समान छानबे हजार स्त्रियां तथा वह इन समस्त विभूतियों का चक्रवर्तिपना इत्यादि समस्तविभूति धर्म के प्रताप से ही मिलती है। इसलिये भव्यजीवों को ऐसे धर्म की आराधना अवश्य करनी चाहिये।।१८१।।

धर्म की महिमा ही को और कहते हैं—

धर्मो रक्षति रक्षतो ननु हतो हन्ति ध्रुवं देहिनां हन्तव्यो न तत: स एव शरणं संसारिणां सर्वथा।
धर्म: प्रापयतीह तत्पदमपिध्यायन्ति यद्योगिनो धर्मात्सत्सुहृदस्ति नैव च सुखी नो पण्डिता धार्मिकात् ।।

अर्थ —धर्म की रक्षा होने पर तो धर्म प्राणियों की रक्षा करता है परन्तु नाश होने पर वह प्राणियों का भी नाश कर देता है इसलिये भव्यजीवों को कदापि धर्म का नाश नहीं करना चाहिये क्योंकि समस्त प्राणियों का सहायक धर्म ही है तथा जिस (मोक्ष) पद को योगीश्वर सदा ध्यान करते रहते हैं उस पद को भी देने वाला है इसलिये धर्म से बढ़कर कोई भी सच्चा मित्र नहीं है और धर्मात्मा पुरूष से अधिक कोई भी सुखी नहीं है।

भावार्थ — समस्त सुख तथा समस्त गुणों का कारण एक रक्षा किया हुवा धर्म ही है इसलिये जो पुरूष सुख के अभिलाषी हैं तथा गुणी बनना चाहते हैं उनको सबसे पहले धर्म की रक्षा करनी चाहिये।।१८२।।

और भी आचार्य उपदेश देते हैं—

नानायोनिजलौघलङ्घितदिशि क्लेशोर्मिजालाकुले प्रोद्भूताद्भुतभूरिकर्ममकरग्रासीकृतप्राणिनि।
दुष्पर्यन्तगंभीरभीषणतरे जन्माम्बुधौ मज्जतां नो धर्मादपरोऽस्ति तारक इहाश्रान्तं यतध्वं बुध:।।१८३।।

अर्थ —अनेक प्रकार की जो नरकादि योनि वे ही हुवाजल उससे जिसने समस्त दिशाओं को व्याप्तकर लिया है तथा नाना प्रकार के दु:खरूपी तरंगें जिसमें मौजूद हैं और उत्पन्न हुवे जो नाना प्रकार के शुभाशुभकर्म वे ही हुवे मगर उनके द्वारा जिसमे जीव खाये जा रहे हैं और न जिसका अंत है तथा जो गंभीर तथा भयंकर है ऐसे संसार रूपी समुद्र में डूबते हुवे जीवों को पार करने वाला एक धर्म ही है इसलिये विद्वानों को चाहिये कि वे सदा धर्मं के करने में ही प्रयत्न करें।

भावार्थ — जिस प्रकार जिस समुद्र का जल चारों दिशाओं में फैला हुवा है और जिसमें बड़ी—२ लहरें उठ रही हैं तथा भयंकर नाके जिसमें दीन प्राणियों को खारहे हैं और जिसका अंत नहीं है तथा गंभीर और भयंकर है ऐसे समुद्र के बीच में पड़ा हुवा मनुष्य बिना किसी जहाज आदि के नहीं तर सकता। उस ही प्रकार इस संसाररूपी समुद्र में डूबे प्राणी भी बिना धर्म के सहारे किसी प्रकार नहीं तर सकते क्योंकि यह संसाररूपी समुद्र भी नाना प्रकार की योनिरूपी जल से समस्त दिशाओं को व्याप्त करने वाला है तथा इसमें भी नाना प्रकार के दु:खरूपी तरंगें मौजूद हैं और कर्मरूपी मगरों से सदा इसमें भी जीव खाये जाते हैं तथा इस संसाररूपी समुद्र का अंत भी नहीं है तथा गंभीर और भयंकर भी है इसलिये विद्वानों को सदा धर्म में ही यत्न करना चाहिये।।१८३।।

और भी आचार्य धर्म की महिमा का वर्णन करते हैं—

जन्मोच्चै: कुल एव सम्पदधिके लावण्यवारां निधिर्नीरोगं वपुरायुरादि सकलं धर्माद्ध्रुवं जायते।
सा न श्रीरथवा जगत्सु न सुखं तत्तेन शुभ्रा गुणायैरुत्कण्ठितमानसैरिव नरो नाश्रीयते धार्मिक:।।

अर्थ —संपदाकर अधिक उत्तमकुल में जन्म तथा लावण्य और निरोग शरीर तथा आयु आदि समस्त बात निश्चय से धर्म के प्रताप से ही मिलती हैं। और वह कोई लक्ष्मी नहीं है जो एकदम आकर धर्मात्मा पुरूष का आश्रय न ले तथा वह उत्तम सुख तथा वे निर्मल गुण भी संसार के भीतर कोई नहीं है जो धर्मात्मा पुरूष को स्वयमेव आकर आश्रय न करें।

भावार्थ — धर्मात्मा पुरूष को उत्तम से उत्तम लक्ष्मी तथा श्रेष्ठ से श्रेष्ठ सुख और समस्त निर्मल गुणों की प्राप्ति होती है इसलिये जो पुरूष इन बातों को चाहते हैं उनको भलीभांति धर्म का आराधन करना चाहिये।।१८४।

और भी धर्म की महिमा ही का वर्णन किया जाता है।

भृङ्गा पुष्पितकेतकीमिव मृगा वन्यामिव स्वस्थलीं नद्य: सिन्धुमिवाम्बुजाकरमिव श्वेतच्छदा: पक्षिण:।
शौर्यत्यागविक्रमयश: सम्पत्सहायादय: सर्वे धार्मिकमाश्रयन्ति न हितं धर्मं विना किञ्चन।।१८५।।

अर्थ —जिस प्रकार भौंरा स्वयमेव आकर फूली हुई केतकी का आश्रय कर लेता है तथा जिस प्रकार मृग वन में अपने रहने के स्थान को स्वयमेव जाकर आश्रय कर लेते हैं तथा जिस प्रकार नदी स्वयमेव समुद्र को प्राप्त हो जाती है और जिस प्रकार हंस नामक पक्षी मानसरोवर को स्वयमेव प्राप्त कर लेते हैं उस ही प्रकार वीरत्व दान विवेक विक्रम कीर्ति सम्पत्ति सहाय आदिक वस्तु स्वयमेव धर्मात्मा को आकर आश्रय कर लेते हैं, किन्तु धर्म के बिना कोई भी वस्तु नहीं मिलती इसलिये जो मनुष्य वीरत्वादि वस्तुओं को चाहते हैं उनको चाहिये कि वे निरंतर धर्म करें जिसमेंं उनको बिना परिश्रम से वे वस्तु मिल जावें।।१८४।।

और भी आचार्य उपदेश देते हैं—

सौभागीयसि कामिनीयसि सुतश्रेणीयसि श्रीयसि प्रासादीयसि चेत्सुखीयसि सदा रूपीयसि प्रीयसि।
यद्वानन्तसुखामृताम्बुधिपरस्थानीयसीह ध्रुवं निर्धूताखिलदु:खदापदि सुहृद्धर्मे मतिर्धार्यताम् ।।१८६।।

अर्थ —जो तुम सौभाग्य की इच्छा करते हो और कामिनी की अभिलाषा करते हो तथा बहुत से पुत्रों के प्राप्त करने की इच्छा करते हो और जो यदि तुम्हारे उत्तम लक्ष्मी के प्राप्त करने की इच्छा है वा उत्तम मकान पाने की इच्छा है अथवा यदि तुम सुख चाहते हो तथा उत्तम रूप के मिलने की इच्छा करते हो और समस्त जगत के प्रिय बनना चाहते हो अथवा जहां पर सदा अविनाशी सुख की राशि मौजूद है ऐसे उत्तम मोक्षरूपी स्थान को चाहते हो तो तुम नाना प्रकार के दु:खों को देने वाले आपत्तियों के दूर करने वाले जिन भगवान के बताये हुवे धर्म में ही अपनी बुद्धि को स्थिर करो (धर्म का ही आराधना करो)।

भावार्थ — सर्व संपदा तथा सुख का देने वाला तथा समस्त आपदा तथा दु:खों को दूर करने वाला एक सच्चा धर्म ही है इसलिये भव्यजीवों को दृढ़ता से इसी को धारण करना चाहिये।।१८६।।

और भी आचार्य धर्म की महिमा को दिखाते हैं—

वसंततिलका छन्द
दूरादभीष्टमभिगच्छति पुण्ययोगात्पुण्याद्विना करतलस्थमपि प्रयाति।
अन्यत् परं प्रभवतीह निमित्तमात्रं पात्रं बुधा: भवत निर्मलपुण्यराशे: ।।१८८।।

अर्थ —पुण्य के उदय से दूर रही हुई भी वस्तु अपने आप आकर प्राप्त हो जाती है विंâतु जब पुण्य का उदय नहीं रहता तब हाथ में रक्खी हुई भी वस्तु नष्ट हो जाती है यदि पुण्य पाप से भिन्न कोई दूसरा पदार्थ सुख दु:ख का देने वाला है तो एक निमित्तमात्र है अर्थात् पुण्य—पाप ही सुख—दु:ख का देने वाला है इसलिये ग्रंथकार कहते हैं कि भव्यजीवों को चाहिये कि वे निर्मल पुण्य के पात्र बनें।

भावार्थ — संसार में यह बात बहुधा सुनने में आती है कि वह मनुष्य तथा वह देव मुझे सुख का देने वाला है तथा मेरा भला करने वाला है और वह मनुष्य मुझे दु:ख का देने वाला है तथा मेरा बुरा करने वाला है । आचार्य कहते हैं कि यह सब कहना व्यर्थ ही है क्योंकि सुख तथा दु:ख का देने वाला अथवा भला—बुरा करने वाला एक पुण्य तथा पाप ही है इसलिये यदि तुम सुख की इच्छा करते हो अथवा अपना भला चाहते हो तो तुमको विशेष रीति से पुण्य का आराधन करना चाहिये।।१८८।।

और भी पुण्य की महिमा का वर्णन करते हैं—

शार्दूलविक्रीडित छन्द
कोप्यंधोऽपि सुलोचनोऽपि जरसा ग्रस्तोऽपि लावण्यवान् निष्प्राणोऽपि हरिर्विरूपतनुरप्यापुष्यते मन्मथ :
उद्योगोज्झितचेष्टितोऽपि नितरामालिङ्ग्यते च श्रिया पुण्यादन्यदपि प्रशस्तमखिलं जायेत यद्दुर्घटम् ।।१८९।।।

अर्थ —पुण्य के उदय से अंधा भी सुलोचन कहलाता है तथा पुण्य के ही उदय से रोगी भी रूपवान कहलाता है और निर्बल भी पुण्य के उदय से सिंह के समान पराक्रमी कहा जाता है तथा पुण्य के ही उदय से बदसूरत भी कामदेव के समान सुन्दर कहा जाता है तथा पुण्य के ही उदय से आलसी को भी लक्ष्मी अपने आप आकर वर लेती है विशेष कहां तक कहा जाय जो उत्तम से उत्तम वस्तु संसार में दुर्लभ कही जाती हैं वे भी पुण्य के ही उदय से सब सुलभ हो जाती हैं अर्थात् वे बिना परिश्रम के ही प्राप्त हो जाती हैं इसलिये भव्यजीवों को सदा पुण्य का ही आराधन करना चाहिये।।१८९।।

==अब आचार्य इस बात को दिखाते हैं कि जो मनुष्य पुण्यरहित हैं उनको पाप के उदय से क्या—क्या दु:ख भोगने पड़ते हैं-==

वंधस्कन्धसमाश्रितं सृणिभिदामारोहकाणामरपृष्टे भारसमर्पणं कृतवतां संचालनं ताडनम् ।
दुर्वाचं वदतामपि प्रतिदिनं सर्वं सहन्ते गजा निर्धाम्नां वलिनोऽपि यत्तदखिलं दुष्टो विधिश्चेष्टते ।।१९०।।।

अर्थ —यद्यपि महावत की अपेक्षा हाथी बलवान होते हैं तो भी महावत उनको बांधते हैं तथा उनके ऊपर चढ़ते हैं और उनमें अंकुश भी मारते हैं तथा उनकी पीठ पर बोझा भी लादते हैं और उनको अपनी इच्छानुसार चलाते हैं तथा और भी ताड़ना करते हैं और प्रतिदिन उनको गाली भी देते है और उन हाथियों को ये सब बातें सहन भी करनी पड़ती हैं इस ही प्रकार उत्तम पुरूषों पर नीच पुरूष भी अपना प्रभाव डालते हैं इसलिये आचार्य कहते हैं ये समस्त चेष्टायें दुष्ट काम की हैं अर्थात् पाप के द्वारा ही ये सब बातें होती हैं इसलिये भव्यों को चाहिये कि वे सदा पुण्य का ही उपार्जन करें तथा पाप का नाश करें।।१९०।।

आचार्य और भी धर्म का महिमा का वर्णन करते हैं—

सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते सम्पद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते रिपु:।
देवा यान्ति वशं प्रसन्नमनस: किं वा बहु ब्रूमहे धर्मो यस्य नमौऽपि तस्य सततं रत्ने: परैर्वर्षति।।१९१।।।

अर्थ —जो मनुष्य धर्मात्मा है उनके धर्म के प्रभाव से भयंकर सर्प भी मनोहर हार बन जाते हैं तथा पैनी तलवार भी उत्तम फूलों की माला बन जाती है और धर्म के प्रभाव से ही प्राणघातक विष भी उत्तम रसायन बन जाता है तथा धर्म के ही महात्म्य से वैरी भी प्रीति करने लग जाता है और प्रसन्नचित्त होकर देव धर्मात्मा पुरूष के आधीन हो जाते हैं। ग्रन्थकार कहते हैं कि विशेष कहां तक कहा जाय जिस मनुष्य के हृदय में धर्म है अर्थात् जो मनुष्य धर्मात्मा है उनके धर्म के प्रभाव से आकाश से भी उत्तम रत्नों की वर्षा होती है इसलिये भव्य जीवों को धर्म से कदापि विमुख नहीं होना चाहिये।।१९१।।

धर्म की महिमा का और भी वर्णन किया जाता है—

उग्रग्रीष्मरविप्रतापदहनज्वालाभितप्तश्चलन् य: पित्तप्रकृतिर्मरौ मृदुतर: पान्थो यथा पीडित:।
तद्राग्लब्धहिमाद्रिकुञ्जरचितप्रोद्दामयन्त्रोल्लसद्धारावेश्मसमो हि संसृतिपथे धम्मो भवेद्देहिनाम् ।।१९२।।।

अर्थ —जो वटोही ग्रीष्मकाल में भयंकर सूर्य की संतापरूपी अग्नि की ज्वालाओं से अत्यंत तप्तायमान है और पित्त प्रकृतिवाला है तथा कोमल शरीर का धारी है और मारवाड़ की भूमि में गमन करने वाला है अतएव जो अत्यन्त दु:खित है यदि वह दैवयोग से हिमालय पर्वत की गुफा में बने हुवे फुवारों सहित मनोहर धारागृह(फव्वारों सहित घर) को पा लेवे तो वह परमसुखी होता है उस ही प्रकार जो जीव अनादिकाल से इस संसार में जन्म मरण आदि दु:खों को सहता है तथा निरंतर नरकादि योनियों में भ्रमता है यदि वह भी धारागृह के समान इस धर्म को संसार में पा लेवे तो सुखी हो जाता है अर्थात् शान्ति का अनुभव करने लग जाता है इसलिये जो मनुष्य शान्ति को चाहने वाले हैं उनको अवश्य धर्म का ही आराधन करना चाहिये।।१९२।।

आचार्य और भी धर्म की महिमा का वर्णन करते हैं—

संहारोग्रसमीरसंहतिहतप्रोद्भूतनीरोल्लसत्तुङ्गोर्मिभ्रमितोरुनक्रमकरग्राहादिभिर्भीषणे।
अम्भोधौ विवुधोग्रवाडवशिखिज्वालाकराले पतञ्जन्तो:खेऽपिविमानमाशु कुरुते धर्म: समालम्बनम् ।।।

अर्थ —जो समुद्र प्रलयकाल में उठा हुवा जो भयंकर पवन का समूह उससे उछलता हुवा जो जल उसकी जो ऊंची—२ तरङ्गें उनमें भ्रमण करते हुवे जो नाके मगरमच्छ आदि जलजीव उनसे भयंकर हो रहा है तथा जो तीक्ष्ण बड़वानल की ज्वाला से भी भयंकर है ऐसे समुद्र में गिरते हुवे प्राणी को धर्म नहीं गिरने देता है तथा आकाश में भी विमान रचकर शीघ्र ही अवलंबन देता है।

भावार्थ — मनुष्य कैसी भी विपत्ति क्यों न आई होवे यदि वह धर्मात्मा है तो उसको धर्म के प्रभाव से सब विपत्ति पल भर में दूर हो जाती है इसलिये जो मनुष्य दु:खों से छूटना चाहते हैं उनको सदा धर्म का आराधन करना चाहिये।।१९३।।

और भी धर्म की महिमा को कहते हैं—

स्त्रग्धरा छन्द
उह्यन्ते ते शिरोभि: सुरपतिभिरपि स्तूयमाना: सुरौघैर्गीयन्ते किन्नरीभिर्ललितपदलसद्गीतिभिर्भक्तिरागात् ।।
बंभ्रम्यन्ते च तेषां दिशिदिशिविशदा: कीर्तय: कानवास्याल्लक्ष्मीस्तेषु प्रशस्ता विदधति मनुजा ये सदा धर्ममेकम् ।।।

अर्थ —जो मनुष्य सदा एक धर्म को ही धारण करते हैं अर्थात् जो धर्मात्मा हैं उनको इन्द्र भी मस्तक पर धारण करते हैं तथा बड़े—२ देव उनकी स्तुति करते हैं और उन धर्मात्मा पुरूषों के गुण बड़ी शांति से किन्नरीजाति की देवी गाती है तथा उन धर्मात्मापुरूषों की कीर्ति समस्त दिशाओं में फैल जाती है और उन धर्मात्मा पुरूषों को उत्तम-से-उत्तम लक्ष्मी की भी प्राप्ति होती है इसलिये भव्यजीवों को ऐसा महिमायुक्त धर्म अवश्य धारण करने योग्य है।।१९४।।

आचार्य और भी धर्म की महिमा दिखाते हैं—

शार्दूलविक्रीडित छन्द
धर्म: श्रीवशमन्त्र एष परमो धर्मश्चकल्पद्रुमो धर्म: कामगवीप्सितप्रदमणिर्धर्म: परं दैवतम् ।
धर्म: सौख्यपरं परामृतनदीसम्भूतिसत्पर्वतो धर्मो भ्रातरूपास्यतां किमपरै: क्षुद्रैरसत्कल्पनै:।।१९५।।।

अर्थ —समस्त प्रकार की लक्ष्मी को देने वाला होने के कारण यह धर्म लक्ष्मी के वश करने को मंत्र के समान है तथा यह धर्म वांछित चीजों का देने वाला कल्पवृक्ष है और धर्म ही कामधेनु है तथा धर्म ही समस्त चिन्ताओं को पूर्ण करने वाला चिंतामणि रत्न है और धर्म ही उत्कृष्ट देवता है और धर्म ही उत्कृष्ट सुखों की राशिरूपी जो अमृत नदी उसके उत्पन्न कराने में पर्वत के समान है अर्थात् जिस प्रकार हिमालय आदि पहाड़ों से नदियां उत्पन्न होती हैं उस ही प्रकार धर्म से भी सुखों की परंपरारूप नदी की उत्पत्ति होती है (सुख मिलता है)। इसलिये आचार्य उपदेश देते हैं कि अरे भाइयों व्यर्थ नीच कल्पनाएँ करके क्या ? केवल धर्म ही का सेवन करो जिससे तुम्हारे सर्वकार्य सिद्ध हो जावें।।१९५।।

और भी आचार्य धर्म की महिमा का वर्णन करते हैं—

आस्तामस्यविधानत: पथि गतिर्धर्मस्य वार्तापि यै: श्रुत्वा चेतसि धार्यते त्रिभुवने तेषां न का: सम्पद:।
दूरे सज्जलपानमज्जनसुखं शीतै: सरोमारुतै: प्राप्तं पद्मरज: सुगन्धिभिरपि श्रान्तं जनं मोदयेत् ।।१९६।।।

अर्थ —धर्म के मार्ग में विधिपूर्वक गमन करना तो दूर रहो किंतु जो धर्म की बातों के प्रेमी मनुष्य केवल उसको सुनकर धारण कर लेते हैं उनके भी तीन लोक में समस्त संपदाओं की प्राप्ति होती है जिस प्रकार शीतल जल के पीने का सुख तथा स्नान करने का सुख तो दूर ही रहो अर्थात् उससे तो शांति होती ही है किंतु जो तालाब की वायु कमलों की रजकर सुगन्धित हो रही है तथा शीतल है उससे उत्पन्न हुवा जो सुख वह भी थके हुवे मनुष्य को शान्त कर देता है इसलिये भव्य जीवों को सदा धर्म का ही आश्रय लेना चाहिये।।१९६।।

अब आचार्य अंत मंगल में अपने गुरू का स्मरण करते हैं—

वसंततिलका छन्द
यत्पादपंकजरजोभिरपि प्रणामाल्लग्नै: शिरस्यमलबोधकलावतार:।
भव्यात्मनां भवति तत्क्षणमेव मोक्षं स श्री गुरूर्दिशतु मे मुनि ‘‘वीरनन्दी‘‘।।१९७।।।

अर्थ —जिन वीरनंदी गुरु के प्रणामपूर्वक मस्तक में लगाये हुवे चरण कमलों के रजों से ही भव्य जीवों को बात—की बात में निर्मल ज्ञान की प्राप्ति होती है वे श्री वीरनन्दी मुनि मेरे गुरू मुझे मोक्ष देवो।

भावार्थ — उत्तम गुरु ही मोक्ष दे सकते हैं इसीलिये ग्रन्थकार ने वीरनन्दी मुनि से ही मोक्ष की याचना की है।।१९७।।

अधिकार को समाप्त करते हुवे आचार्य और भी उपदेश देते हैं—

दत्तानन्दमपारसंसृतिपथश्रान्तश्रमच्छेदकृत् प्रायो दुर्लभमत्रकर्णपुटकैर्भव्यात्मभि: पीयताम् ।
निर्यातं मुनिपद्मनन्दिवदनप्रालेयरश्मे: परं स्तोकं यद्यपि सारताधिकमिदं धर्मोपदेशामृतम् ।।१९८।।।

अर्थ —जो धर्मोपदेशरूपी अमृत पीने पर उत्तम आनंद का देने वाला है और जो संसाररूपी जो अपार मार्ग उसमें थके हुवे जो प्राणी उनकी थकावट को दूर करने वाला है तथा जो पुण्यहीन पुरूषों को अत्यन्त दुर्लभ है और जो पद्मनन्दि मुनि के मुखचन्द्रमा से निकला हुवा है ‘‘ अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा से अमृत निकलता है उस ही प्रकार पद्मनन्दी मुनि के मुखचन्द्र से भी धर्मोपदेशरूपी अमृत निकला है’’ यद्यपि वह धर्मोपदेशामृत शब्दों से थोड़ा वर्णन किया गया है तो भी सार से अधिक है ऐसा वह धर्मोपदेशामृत भव्यों को अवश्य पीना चाहिये।।१९८।।

इस प्रकार पद्मनन्दी आचार्यकृत पद्मनन्दिपंचविंशतिका नामकग्रन्थ में धर्मोपदेशामृत नामक प्रथम अधिकार समाप्त हुवा।