02.इन्द्रियमार्गणाधिकार

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इन्द्रियमार्गणाधिकार

अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन द्वादशसूत्रैः एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे इन्द्रियमार्गणाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्येन एकेन्द्रियाणामन्तरकथनत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियाणामन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘बादरएइंदिय-’’ इत्यादिना त्रीणिसूत्राणि। तत्पश्चात् तृतीयस्थले सूक्ष्मैकेन्द्रियाणामन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘सुहुमे-’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं चतुर्थस्थले द्वीन्द्रियादि-पंचेन्द्रियान्तानामन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘बीइंदिय-’’ इत्यादिसूत्रत्रयं इति समुदायपातनिका।
संप्रति इंद्रियमार्गणायां एकेन्द्रियाणामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
इंदियाणुवादेण एइंदियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।३५।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।३६।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमसहस्साणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।३७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियाणां जीवानां अंतरं कियत्कालपर्यन्तं भवति, इति पृच्छासूत्रमवतार्य जघन्योत्कृष्टाभ्यामंतरं प्रतिपादितमत्र ।
कश्चिदाह-एकबारपृच्छायाश्चैव सकलार्थप्ररूपणायाः संभवात् किमर्थं पुनः पुनः पृच्छा क्रियते ?
आचार्यो ब्रूते-नेमानि पृच्छासूत्राणि, कितु आचार्याणामाशंकितवचनाानि उत्तरसूत्रोत्पत्तिनिमित्तानि, ततो न दोषोऽस्ति ।
जघन्येनान्तरं क्षुद्रभवग्रहणकालमात्रं। उत्कर्षेण-एकेन्द्रियेभ्यो निर्गतः त्रसकायिकेषु एव भ्रमन् पूर्वकोटि- पृथक्त्वाधिक-द्विसागरोपमसहस्रमात्रत्रसस्थितेः उपरि तत्रावस्थानं न करोतीति तस्योत्कृष्टांतरं ज्ञातव्यं।
एवं प्रथमस्थले सामान्येनैकेन्द्रियाणामन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना बादरैकेन्द्रियजीवानामंतरनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
बादरएइंदिय-पज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।३८।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।३९।।
उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा।।४०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-बादरैकेन्द्रियेभ्यो निर्गत्य सूक्ष्मैकेन्द्रियेषु असंख्यातलोकमात्रकालादुपरि अवस्थानाभावात्।
भवतु नाम एतदन्तरं बादरैकेन्द्रियाणां, न तेषां पर्याप्तानामपर्याप्तानां च, सूक्ष्मैकेन्द्रियेषु अविवक्षितबादरै-केन्द्रियेषु च परिभ्रमतः पूर्वोक्तान्तरात् अत्यधिकान्तरं लभ्यते ?
भवतु नाम, पूर्वोक्तान्तरात् एतस्यान्तरस्य अत्यधिकत्वं, तह्र्यपि एतेषामन्तरकालः पूर्वोक्तान्तरकाल इव असंख्यातलोकमात्र एव, नानन्तः, अनंतान्तरोपदेशाभावात् बादरैकेन्द्रियाणां जीवानामिति ।
एवं द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियपर्याप्तापर्याप्तानां अंतरकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इदानीं सूक्ष्मैकेन्द्रियाणामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
सुहुमेइंदिय-पज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।४१।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।४२।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पि-णीओ-उस्सप्पिणीओ।।४३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूक्ष्मैकेन्द्रियेभ्यो निर्गतस्य बादरैकेन्द्रियेषु चैव भ्रमतः बादरैकेन्द्रियस्थितेरुपरि अवस्थानाभावात्। तेषां पर्याप्तापर्याप्तानामपि एतस्मादन्तरादधिकमन्तरं भवति, अविवक्षितसूक्ष्मैकेन्द्रियेष्वपि संचारोपलंभात्। कितु तह्र्यपि अंगुलस्य असंख्यातभागमात्रं एवान्तरं भवति, अन्योपदेशाभावात्।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मानां एकेन्द्रियाणां अंतरकथनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
द्वीन्द्रियादिपंचेन्द्रियान्तानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
बीइंदिय-तीइंदिय-चउिंरदय-पंचिंदियाणं तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्ताण-मंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।४४।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।४५।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।४६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सू्रत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। विवक्षितेन्द्रियेभ्यो निर्गतस्य अविवक्षितेन्द्रियादिषु आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनकालप्रमाणं परिवर्तने विरोधाभावात्।
एवं चतुर्थस्थले द्वीन्द्रियादिजीवानां अंतरनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां इंद्रियमार्गणानाम
द्वितीयोऽधिकारः समाप्तः।

अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में बारह सूत्रों के द्वारा एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य से एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर बतलाने हेतु ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘बादरएइंदिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘सुहुमे’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में दो इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘बीइंदिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब इन्द्रियमार्गणा में एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणानुसार एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।३५।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण काल तक एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर होता है।।३६।।

उत्कृष्ट से पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक दो हजार सागरोपमप्रमाण काल तक एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर होता है।।३७।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'इन्द्रिय मार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है इस प्रकार का पृच्छा सूत्र अवतरित करके यहाँ उनका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादित किया गया है।

यहाँ कोई शंका करता है कि- एक बार पृच्छा से ही समस्त अर्थ का प्ररूपण होना संभव होने से, फिर बार-बार यह पृच्छा क्यों की जाती है ?

आचार्य इस शंका का समाधान करते हैं कि- ये पृच्छासूत्र नहीं है, किन्तु आचार्यों के आशंकात्मक वचन हैं, जो अगले सूत्र की उत्पत्ति के निमित्त के रूप में कहे गये हैं, इसलिए कोई दोष नहीं है।

जघन्य से इनका अन्तर क्षुद्रभवग्रहण काल मात्र है। उत्कृष्टरूप से-एकेन्द्रिय जीवों में से निकलकर त्रसकायिक जीवों में ही भ्रमण करने वाले जीव के पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक दो हजार सागरोपमप्रमाण स्थिति से ऊपर त्रसकायिकों में रहने का अभाव है, यह उनका उत्कृष्ट अन्तर जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य से एकेन्द्रियों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब बादर एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त व बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।३८।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणमात्र काल तक उक्त एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर होता है।।३९।।

उत्कृष्ट से बहुत असंख्यात लोकप्रमाण काल तक उक्त एकेद्रिय जीवों का अन्तर होता है।।४०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-बादर एकेन्द्रिय जीवों में से निकलकर सूक्ष्म एकेन्द्रियों में बहुत असंख्यात लोक प्रमाण काल से ऊपर रहना संभव नहीं है। अर्थात् वहाँ उनके अवस्थान का अभाव पाया जाता है।

शंका-यह बहुत असंख्यात लोकप्रमाण काल का अन्तर बादर एकेन्द्रिय सामान्य जीवों का भले ही हो, परन्तु यह अन्तर पृथक्-पृथक् बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकों व अपर्याप्तकों का नहीं हो सकता, क्योंकि सूक्ष्म एकेन्द्रियों में तथा अविवक्षित पर्याप्त या अपर्याप्त बादर एकेन्द्रियों में परिभ्रमण करने वाले उसके पूर्वोक्त अन्तर से अधिक बड़ा अन्तरकाल प्राप्त होता है ?

समाधान-पूर्वोक्त अन्तर से यह पर्याप्तक व अपर्याप्तकों का अलग-अलग अन्तर काल अधिक बड़ा भले ही हो, पर तो भी इन पर्याप्त व अपर्याप्त एकेन्द्रिय बादर जीवों का अन्तर पूर्वोक्त अन्तरकाल के समान असंख्यात लोकप्रमाण रहता है। अनन्त नहीं होता है, क्योंकि बादर एकेन्द्रिय जीवों के अनन्त कालप्रमाण अन्तर का उपदेश नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक और अपर्याप्तक जीवों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।४१।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक सूक्ष्म एकेन्द्रिय व उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर होता है।।४२।।

उत्कृष्ट से असंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल प्रमाण सूक्ष्म एकेन्द्रिय व उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर होता है, जो अंंगुल के असंख्यावें भाग प्रमाण होता है।।४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूक्ष्म एकेन्द्रियों में से निकलकर बादर एकेन्द्रियों में ही भ्रमण करने वाले जीव के बादर एकेन्द्रिय की स्थिति से ऊपर वहाँ रहने का अभाव है। उक्त जीवों के पर्याप्त व अपर्याप्त का अलग-अलग अन्तर यद्यपि पूर्वोक्त प्रमाण से अधिक होता है, फिर भी उन जीवों का अविवक्षित सूक्ष्म एकेन्द्रियों में भी संचार पाया जाता है। किन्तु फिर भी अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण ही अन्तर होता है, क्योंकि इस प्रमाण से अधिक प्रमाण का अन्य कोई उपदेश नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब दो इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों का तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।४४।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक द्वीन्द्रियादि जीवों का अन्तर होता है।।४५।।

उत्कृष्ट से अनन्त काल तक उक्त द्वीन्द्रियादि जीवों का अन्तर होता है, जो असंख्यात पुद्गल परिवर्तन के बराबर होता है।।४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। विवक्षित इन्द्रियों वाले जीवों में से निकलकर अविवक्षित एकेन्द्रिय आदि जीवों में आवली के असंख्यातवें भाग पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक भ्रमण करने में कोई विरोध नहीं आता है।

इस तरह से चतुर्थ स्थल में दो इंद्रिय आदि जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।