02.गतिमार्गणा अधिकार

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गतिमार्गणा अधिकार

अथ गतिमार्गणाधिकार:

संप्रति गतिमार्गणायां नरकगतिजीवानां स्वामित्वनिरूपणाय सूत्रद्वयं अवतार्यते—
गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरईओ णाम कधं भवदि ?।।४।।
णिरयगदिणामाए उदएण।।५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—गत्यनुवादेन नरकगतौ नारको जीवः केन कारणेन भवति ? इति पृच्छासूत्रमिदं वर्तते।
एतत्पृच्छासूत्रं किन्निबंधनं अस्ति ?
एतत्सूत्रं नयसमूहस्याधारेण रचितं अस्ति। यदि एक एव नयो भवेत् तर्हि संदेहोऽपि नोत्पद्येत, किंतु नयाः बहवः सन्ति तेन संदेहः समुत्पद्यते। कस्य नयस्य विषयमाश्रित्य स्थितनारकः अत्र परिगृहीतोऽस्ति ? अतएव नयानामभिप्रायोऽत्र उच्यते। तद्यथा—
कमपि पापजनसमागमं क्रियमाणं नरं दृष्ट्वा नैगमनयेन भण्यते यत् एषः पुरुषः नारकः इति। यदा कश्चित् पुरुषः कोदण्डकांडगृहीतहस्तः मृगानां मृग्यमाणः भ्रमति तदा व्यवहारनयेन कथ्यते—सः नारको भवति। ऋजुसूत्रनयस्य वचनं-यदा आखेटस्थाने स्थित्वा कश्चित् मृगं हन्ति पापी तदा स भवति नारकः। शब्दनयस्य वचनं-यदा जंतु प्राणेभ्यः वियोजितः तदा सः हिंसाकर्मणा संयुक्तः नारकी भवति। समभिरूढनयं एवं भणति-यदा कश्चित् नरकगतिकर्मबंधकः तदा नारककर्मणा संयुक्तः सः नारको भवति। यदा स एव मनुष्यः तिर्यङ् वा नरकगतिं संप्राप्य नरकगतौ दुःखं अनुभवति तदैव स नारको जीवो भवति एवं एवंभूतो नयो निगदति।
एतत् सर्वनयविषयं नारकसमूहं बुद्ध्या कृत्वा नारको नाम कथं भवतीति पृच्छा कृता अस्मिन् सूत्रे इदं ज्ञातव्यं।
अथवा नाम-स्थापना-द्रव्य-भावभेदेन नारकाः चतुर्विधा भवन्ति। ‘नारकशब्दः’ नामनारको भवति। ‘सः एषः’ इति बुद्ध्या अर्पितस्य अर्पितेन एकत्वं कृत्वा सद्भावासद्भावस्वरूपेण स्थापितं स्थापनानारकी भवति। नारकप्राभृतज्ञायकोऽनुपयुक्तः आगमद्रव्यनारकी। अनागमद्रव्यनारकस्त्रिविधः-ज्ञायकशरीर-भावि-तद्व्यतिरिक्तभेदेन। ज्ञायकशरीरं भावि नारको ज्ञातः। तद्व्यतिरिक्तनोआगमद्रव्यनारको द्विविधः-कर्मनोकर्मभेदेन। कर्मनारको नाम नरकगतिसहगतकर्मद्रव्यसमूहः। पाशपंजरयंत्रादीनि नोकर्मद्रव्याणि नारकभावकारणानि नोकर्मद्रव्यनारको नाम। नारकप्राभृतज्ञायकः उपयुक्तः आगमभावनारको नाम। नरकगतिनामकर्मप्रकृत्युदयेन नरकभावमुपगतः नोआगमभावनारको नाम। एतन्नारकसमूहं बुद्ध्या कृत्वा नारको नाम कथं भवति इति पृच्छा कृता।
अथवा नारको नाम जीवः किमौदयिकेन भावेन, किमौपशमिकेन, किं क्षायिकेण, किं क्षायोपशमिकेन, किं पारिणामिकेन भावेन भवतीति बुद्ध्या कृत्वा नारको नाम कथं भवतीति पृच्छासूत्रमवतीर्णं ।
अस्यैव संदेहस्य निराकरणार्थं उत्तरसूत्रमवतीर्णमस्ति।
एवंभूतनयविषयेण औदयिक-नोआगमभावनिक्षेपेण नरकगतिनामकर्मणः उदयेन नारको जीवो भवति इति ज्ञातव्यं।
संप्रति तिर्यग्गतिजीवानां स्वामित्वप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते—
तिरिक्खगदीए तिरिक्खो णाम कधं भवदि ?।।६।।
तिरिक्खगदिणामाए उदएण।।७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—अत्रापि नयान् निक्षेपान् औदयिकादिपंचविधभावांश्चाश्रित्य पूर्वमिव संदेहस्योत्पत्तिं निरूप्य समाधानं विधेयं। तिर्यग्गतिनामकर्मोदयेन उत्पन्नपर्यायपरिणते जीवे तिर्यगभिधानव्यवहार-प्रत्यययोरुपलंभात्।
संप्रति मनुष्यगतिस्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते—
मणुसगदीए मणुसो णाम कधं भवदि ?।।८।।
मणुसगदिणामाए उदएण।।९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—अत्रापि पूर्ववत् नयनिक्षेपादिभिः संदेहोत्पत्तिः प्ररूपयितव्या। मनुष्यगतिनाम-कर्मोदयजनितपर्यायपरिणतजीवे मनुष्याभिधानव्यवहार-प्रत्यययोरुपलंभात्।


अथ गतिमार्गणा अधिकार

अब गतिमार्गणा में नरकगति के जीवों के स्वामित्व का निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

गतिमार्गणानुसार नरकगति में नारकी जीव किस कारण से होते हैं ?।।४।।

नरकगति नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव नारकी होते हैं।।५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति में नारकी जीव किस कारण से उत्पन्न होते हैं ? ऐसा यह पृच्छासूत्र है।

शंका-यह प्रश्नात्मक सूत्र किस आधार से रचा गया है ?

समाधान-यह प्रश्नात्मक सूत्र नयसमूह के आधार से रचा गया है। यदि एक ही नय होता, तो कोई संदेह भी उत्पन्न नहीं होता। किन्तु नय अनेक हैं इसलिए संदेह उत्पन्न होता है कि किस नय के विषय का आश्रय लेकर स्थित नारकी जीव का यहाँ ग्रहण किया गया है ? यहाँ पर नयों का अभिप्राय बतलाते हैं। वह इस प्रकार है-

किसी मनुष्य को पापी लोगों का समागम करते हुए देखकर नैगम नय से कहा जाता है कि यह पुरुष नारकी है। जब वह मनुष्य धनुष बाण हाथ में लेकर मृगों को ढूंढता हुआ भ्रमण करता है। तब व्यवहारनय से कहते हैं कि नारकी है। ऋजुसूत्र नय का वचन है कि जब कोई आखेट-शिकार स्थान में स्थित होकर मृगों पर आघात करता है तब वह नारकी कहलाता है। शब्दनय का वचन है कि जब जन्तु को प्राणों से रहित कर देता है, तब वह हिंसा कर्म से सहित नारकी कहलाता है। समभिरूढ़ नय का वचन इस प्रकार है, जब कोई जीव नरकगति नाम कर्म का बंध करके नारक कर्म से संयुक्त हो जाता है, तभी वह नारकी कहा जाता है। जब वही मनुष्य या तिर्यंच जीव नरकगति को प्राप्त होकर नरक के दु:ख अनुभव करने लगता है, तभी वह नारकी है, ऐसा एवंभूत नय कहता है।

इन समस्त नयों के विषयभूत नारकी समूह का बुद्धि से विचार करके ही ‘नारकी जीव किस प्रकार होता है’, यह प्रश्न किया गया है। ऐसा इस सूत्र में जानना चाहिए।

अथवा नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के भेद से नारकी चार प्रकार के होते हैं। ‘‘नारकी शब्द’’ नाम नारकी होता है। ‘वह यह है’ ऐसा बुद्धि से विवक्षित नारकी का विवक्षित बुद्धि के साथ एकत्व करके सद्भाव और असद्भाव स्वरूप से स्थापित करना स्थापना नारकी कहलाता है। नारकी संबंधी प्राभृत का जानने वाला किन्तु उसमें अनुपयुक्त जीव आगम द्रव्य नारकी है। ज्ञायक शरीर, भव्य और तद्व्यतिरिक्त के भेद से अनागम द्रव्य नारकी तीन प्रकार का है। ज्ञायक शरीर और भावि ज्ञात हैं। कर्म और नोकर्म के भेद से तद्व्यतिरिक्त नोआगम द्रव्य नारकी दो प्रकार का है। नरकगति नामकर्म के साथ प्राप्त हुए कर्मद्रव्य समूह को कर्म नारकी कहते हैं। पाश, पंजर, यंत्र आदि नोकर्मद्रव्य जो नारक भाव की उत्पत्ति में कारणभूत होते हैं, वे नोकर्म द्रव्य नारकी हैं। नारकियों संबंधी प्राभृत का जानकर और उसमें उपयोग रखने वाला जीव आगम भाव नारकी है। नरकगति नामकर्म की प्रकृति के उदय से नरकावस्था को प्राप्त हुआ जीव नोआगम भाव नारकी है। इस नारकी समूह का विचार करके ‘नारकी जीव किस प्रकार होता है’ यह प्रश्न किया गया है।

अथवा, ‘क्या नारकी औदयिक भाव से होता है, क्या औपशमिक भाव से, क्या क्षायिकभाव से, क्या क्षायोपशमिक भाव से अथवा क्या पारिणामिक भाव से होता है ? ऐसा बुद्धि से विचार कर ‘नारकी जीव किस प्रकार होता है ? यह पृच्छा सूत्र अवतीर्ण हुआ है। इस संदेह को दूर करने के लिए आचार्य ने अगला सूत्र कहा है।

एवंभूत नय के विषयरूप औदयिक नोआगमभाव निक्षेप के द्वारा नरकगतिनामकर्म के उदय से नारकी जीव होता है, ऐसा जानना चाहिए।

अब तिर्यंचगति के जीवों का स्वामित्व बतलाने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में जीव तिर्यंच किस कारण से होता है ?।।६।।

तिर्यंचगति नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव तिर्यंच होता है।।७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ भी नय, निक्षेप और औदयिकादि पाँच प्रकार के भावों का आश्रय लेकर पूर्वोक्त विधि के समान संदेह की उत्पत्ति का प्ररूपण करके समाधान करना चाहिए। क्योंकि तिर्यंचगति नाम कर्म के उदय से उत्पन्न हुई पर्याय से परिणत जीव के तिर्यंच संज्ञा का व्यवहार और ज्ञान पाया जाता है।

अब मनुष्यगति के जीवों का स्वामित्व बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में जीव मनुष्य किस कारण से होता है ?।।८।।

मनुष्यगति नामप्रकृति के उदय से जीव मनुष्य होता है।।९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ भी पहले के समान नय-निक्षेपादिरूप से संदेह की उत्पत्ति का प्ररूपण करके समाधान करना चाहिए, क्योंकि मनुष्यगति नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई पर्याय से परिणत जीव के मनुष्य संज्ञा का व्यवहार और ज्ञान पाया जाता है।

देवगतिस्वामित्वनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते—

देवगदीए देवो णाम कधं भवदि ?।।१०।।

देवगदिणामाए उदएण।।११।।
सिद्धांतचिंतामणिटीकादेवगतिनामकर्मोदयजनिताणिमादिपर्यायपरिणतजीवे देवाभिधानव्यवहार-प्रत्यययोरुपलंभात्।
अतो विशेषःउच्यते-नरकतिर्यङ्मनुष्यदेवगतयो यदि केवलाः उदयमागच्छन्ति तर्हि नरकगत्युदयेन नारकः, तिर्यग्गत्युदयेन तिर्यङ्, मनुष्यगत्युदयेन मनुष्यः, देवगत्युदयेन देवः इति वक्तुं युक्तं, किंतु अन्याः अपि प्रकृतयः तत्र उदयमागच्छन्ति ताभिर्विना नरकतिर्यङ्मनुष्यदेव-गतिनाम्नां उदयानुपलंभात्।
तद्यथा—नारकाणां पंच उदयस्थानानि भवन्ति-एकविंशति-पंचविंशति-सप्तविंशति-अष्टाविंशति-एकोनत्रिंशदिति। २१-२५-२७-२८-२९। तत्र एकविंशति प्रकृत्युदयस्थानमुच्यते-नरकगति पंचेन्द्रियजाति-तैजसकार्मणशरीरवर्णगंधरसस्पर्श-नरकगति प्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-त्रस-बादर-पर्याप्त-स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-दुर्भग-अनादेय-अयशःकीर्ति-निर्माणनामानि इति एतावतीः प्रकृतीः गृहीत्वा एकविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। अत्रभंगःएक एव (१) ।
इदमुदयस्थानं कस्य भवति ?
विग्रहगतौ वर्तमानस्य नारकस्य भवति।
तत्कियच्चिरं कालं भवति ?
जघन्येन एकसमयः, उत्कर्षेण द्वौ समयौ।
तत्र नारकाणां इदं पंचविंशतिप्रकृतिस्थानं। एता एव प्रकृतयः। केवलं आनुपूर्विप्रकृतिमपनीय वैक्रियिकशरीर-हुंडकसंस्थान-वैक्रियिकशरीरांगोपांग-उपघात-प्रत्येकशरीरनामानि पूर्वोक्तप्रकृतिषु प्रक्षिप्ते पंचविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति।
एतत्स्थानं कस्य भवति ?
शरीरगृहीतनारकस्य भवति।
तत् कियच्चिरं कालं भवति ?
शरीरं गृहीतप्रथमसमयमादिं कृत्वा यावत् शरीरपर्याप्त्यपूर्णचरमसमय इति अंतर्मुहूर्तमिति उक्तं भवति। भंगौ अपि पूर्वोक्तभंगेन सह द्वौ (२) ।
परघातमप्रशस्तविहायोगतिं च पूर्वोक्तपंचविंशतिप्रकृतिषु प्रक्षिप्ते सप्तविंशतिप्रकृतीनामुदयस्थानं भवति।
तत् कदा भवति ?
शरीरपर्याप्तिनिर्वर्तितप्रथमसमयमादिं कृत्वा यावदानापानपर्याप्त्यपूर्णचरमसमय इति एतस्मिन् काले भवति।
तत् कियच्चिरं ?
जघन्येनोत्कर्षेणापि अन्तर्मुहूर्तं। अत्र भंगसमासः त्रयः सन्ति (३)।
पूर्वोक्तसप्तविंशतिप्रकृतिषु उच्छ्वासप्रकृतिप्रक्षिप्ते अष्टाविंशतिप्रकृतीनामुदयस्थानं भवति।
एतत्स्थानं कुत्र भवति ?
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तप्रथमसमयमादिं कृत्वा यावत् भाषापर्याप्तेरपूर्णचरमसमय इति एतस्मिन् काले इदं स्थानं भवति।
तत् कियच्चिरं ?
जघन्येनोत्कर्षेण अन्तर्मुहूर्तं। अत्र भंगसमासश्चत्वारः (४)।
पूर्वोक्ताष्टाविंशतिप्रकृतिषु दुःस्वरे प्रक्षिप्ते एकोनत्रिंशत्प्रकृतीनामुदयस्थानं भवति। एतदपि भाषापर्याप्तेः पर्याप्तकस्य प्रथमसमयमादिं कृत्वा यावत् स्वस्वात्मनः आयुःस्थितिचरमसमयः इति एतस्मिन् काले भवति।
एतत् कियच्चिरं ?
जघन्येन दशवर्षसहस्राणि अंतर्मुहूर्तोनानि, उत्कर्षेण अन्तर्मुहूर्तोनत्रिंशत्सागरोपमाणि। अत्र भंगसमासः पंच (५)।
एवं नरकगतौ स्थितनारकाणां उदयस्थानं नामकर्मणां कथितं ।
तिर्यग्गतौ एकविंशति-चतुर्विंशति-पंचविंशति-षड्विंशति-सप्तविंशति-अष्टाविंशति-एकोनत्रिंशत्-त्रिशंत्-एकत्रिंशत् इति नव उदयस्थानानि।।२१।२४।२५।२६।२७।२८।२९।३०।३१।
संप्रति सामान्येन एकेन्द्रियाणां एकविंशति-चतुर्विंशति-पंचविंशति-षड्विंशति-सप्तविंशति-इति पंचोदयस्थानानि।
आतपोद्योतयोरनुदयेन एकेन्द्रियस्य सप्तविंशतिप्रकृतिस्थानेन विना चत्वारि उदयस्थानानि। आतपोद्योतयोरुदयेन सहितेन एकेन्द्रियस्य पंचविंशतिस्थानेन विना चत्वारि उदयस्थाननि भवन्ति। तत्र आतपोद्योतयोरुदयविरहितैकेन्द्रियस्य भण्यमाने तिर्यग्गति-एकेन्द्रियजाति-तैजस-कार्मणशरीर-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-स्थावर प्रकृतयः, बादर-सूक्ष्मयोरेकतरं पर्याप्तापर्याप्तयोरेकतरं स्थिरास्थिरं शुभाशुभं दुर्भगं अनादेयं यशःकीर्ति-अयश:कीत्र्योरेकतरं निर्माणं एतासां एकविंशतिप्रकृतीनां उदयः विग्रहगतौ वर्तमानस्य एकेन्द्रियस्य भवति।
कियच्चिरं भवति ?
जघन्येन एकसमयः उत्कर्षेण त्रयः समयाः। अत्र अक्षपरावर्तं कृत्वा भंगा उत्पादयितव्या। तत्र अयशःकीत्र्युदयेन चत्वारो भंगाः। यशःकीत्र्युदयेन एकश्चैव, सूक्ष्मापर्याप्ताभ्यां सह यशःकीत्र्तेरुदयाभावात्। यशःकीत्र्या सह सूक्ष्मापर्याप्तयोरुदयाभावात् वा। तेनात्र भंगाः पंचैव भवन्ति (५)।
पूर्वोत्तैकविंशतिप्रकृतिषु आनुपूर्विप्रकृतिमपनीय औदारिक शरीरं, हुंडकसंस्थानं, उपघातं-प्रत्येक-साधारणशरीरयोरेकतरं प्रक्षिप्ते चतुर्विंशतिप्रकृतीनां उदयस्थानं भवति।
तत्कुत्र भवति ?
गृहीतशरीरप्रथमसमयादारभ्य यावत् शरीरपर्याप्तेः अपूर्णचरमसमयः इति एतस्मिन् स्थाने भवति।
कियच्चिरं एतत्स्थानं ?
जघन्येनोत्कर्षेण अन्तर्मुहूर्तं। अत्र अयशःकीत्र्युदयेन सह अष्टौ भंगाः। यशःकीत्र्या उदयेन एकश्चैव।
कुतः ?
यशःकीत्र्या सह सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारणानां उदयाभावात्। तेन सर्वभंगसमासो नव (९) ।
पुनः अपर्याप्तमपनीय शेषचतुर्विंशतिप्रकृतिषु परघाते प्रक्षिप्ते पंचविंशतिप्रकृतीनामुदयस्थानं भवति। अत्र भंगा अयशःकीत्र्युदयेन चत्वारः। अपर्याप्तप्रकृतेरुदयाभावात्। यशःकीत्र्युदयेन एकश्चैव। तेन सर्वभंग-समासः पंच (५) । एतत्स्थानं शरीरपर्याप्तिगत प्रथमसमयमादिं कृत्वा यावत् आनापानपर्याप्तेः अपूर्णचरमसमयः इति। जघन्येनोत्कर्षेण अन्तर्मुहूर्तं। तस्यैव आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य पूर्वोक्तपंचविंशतिप्रकृतिषु उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते षड््विंशतिप्रकृतीनामुदयस्थानं भवति।
एतत्कस्य ?
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य ।
कियच्चिरं ?
जघन्येन अंतर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण अंतर्मुहूर्तोन-द्वाविंशतिवर्षसहस्राणि। अत्र भंगाः पूर्ववत् पंचैव भवन्ति (५)।
अत्रपर्यंतं आतपोद्योतविरहितैकेन्द्रियस्य उदयस्थानानि कथितानि।
अधुना आतपोद्योतयोरुदयसहितस्यैकेन्द्रियस्य उच्यते-एकविंशतिचतुर्विंशतिप्रकृतिउदयस्थानयोः पूर्ववत् प्ररूपणा कर्तव्या। केवलं द्वयोः अपि उदयस्थानयोः यशःकीत्र्ययशःकीत्र्युदयेन द्वौ द्वौ एव भंगौ भवतः। किंच एषां जीवानां आतपोद्योतोदयभाविनौ स्तः, तेषां सूक्ष्मापर्याप्तसाधारणानां उदयाभावात्। पुनः एतौ द्वौ भंगौ पूर्वोक्तैकविंशति-चतुर्विंशतिप्रकृति-उदयस्थानयोः भंगेषु लभ्येते इति तौ अपनेतव्यौ।
पुनः शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तकस्य परघाते आतपोद्योतयोरेकतरं च पूर्वोक्तचतुर्विंशतिप्रकृतिषु प्रक्षिप्ते पंचविंशतिप्रकृतिस्थानमुल्लंघ्य षड्विंशतिप्रकृतिस्थानमुत्पद्यते।
एतत्स्थानं कस्य ?
शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य।
कियच्चिरं भवति ?
जघन्येनोत्कर्षेणापि अंतर्मुहूर्तं। अत्र भंगाश्चत्वारो भवन्ति। एते चत्वारो भंगाः प्रथमषड्विंशतिभंगेषु प्रक्षिप्ते नव भंगाः भवन्ति। तस्यैव आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य षड्विंशतिप्रकृतिषु उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते सप्तविंशतिप्रकृतीनामुदयस्थानं भवति। अत्र भंगाश्चत्वारश्चैव।
एवं समस्तानामेकेन्द्रियाणां सर्वभंगसमासः द्वात्रिंशत् भवन्ति (३२)।
अधुना विकलत्रयजीवानां उदयस्थानं कथ्यते-
विकलेन्द्रियाणां सामान्येन एकविंशति-षड्विंशति-अष्टाविंशति-एकोनत्रिंशत्-त्रिंशत्-एकत्रिंशदिति षडुदयस्थानानि। २१।२६।२८।२९।३०।३१।
उद्योतोदयविरहितविकलेन्द्रियस्य पंचैवोदयस्थानानि भवन्ति। एकत्रिंशत्प्रकृत्युदयस्थानाभावात्। उद्योतोदयसंयुक्तविकलेन्द्रियस्यापि पंचैवोदयस्थानानि, परघातोद्योताप्रशस्तविहायोगतीनामक्रमप्रवेशेण अष्टाविंशतिस्थानानुपपत्तेः।
विकलेन्द्रियेषु तावत् उद्योतोदयविरहितद्वीन्द्रियस्य उदयस्थानान्युच्यते-एकविंशतिउदयस्थानं—तिर्यग्गति-द्वीन्द्रियजाति-तैजस-कार्मणशरीर-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-त्रसबादराः पर्याप्तापर्याप्तयोरेकतरं, स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-दुर्भग-अनादेयाः, यशःकीत्र्ययशःकीत्र्योंरेकतरं, निर्माणनाम चैतासां प्रकृतीनां एकं स्थानं भवति।
एकविंशतिस्थानं कस्येदं ?
विग्रहगतौ वर्तमानस्य द्वीन्द्रियस्येति।
तत् कियच्चिरं ?
जघन्येन एकसमयः, उत्कर्षेण द्वौ समयौ। यशःकीत्र्युदयेन सह एको भंगः, अपर्याप्तोदयेन सह यशःकीर्तेरुदयाभावात्। अयशःकीत्र्युदयेन सह द्वौ भंगौ, पर्याप्तापर्याप्तयोरुदयाभ्यां सह अयशःकीत्र्युदयस्य संभवोपलंभात्। अत्र सर्वभंगसमासः त्रयः (३)।
एतासु एकविंशतिप्रकृतिषु आनुपूर्विप्रकृतिमपनीय गृहीतशरीरप्रथमसमये औदारिकशरीर-हुंडकसंस्थान-औदारिकशरीरांगोपांग-असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन-उपघात-प्रत्येकशरीरप्रकृतिप्रक्षिप्तेषु षड्विंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। अत्र भंगसमासस्त्रयः(३)।
शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य पूर्वोक्तप्रकृतिषु अपर्याप्तमपनीय परघाताप्रशस्तविहायोगत्योः प्रक्षिप्तयोः अष्टाविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। अत्र यशःकीत्र्युदयेन एको भंगः, अयशःकीत्र्युदयेनापि एक एव, प्रतिपक्षप्रकृतीनामभावात्। अत्र सर्वभंगौ द्वौ एव (२)।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य पूर्वोक्तप्रकृतिषु उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। अत्रापि भंगौ द्वौ एव (२)। भाषापर्याप्तेः पर्याप्तकस्य पूर्वोक्तप्रकृतिषु दुःस्वरे प्रक्षिप्ते त्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। अत्र भंगौ द्वौ चैव (२)।
संप्रति उद्योतोदयसंयुक्तद्वीन्द्रियस्य भण्यमाने एकविंशति-षड्विंशतिप्रकृतिस्थाने यथा पूर्वं कथिते तथा वक्तव्ये। पुनः षड्विंशतिप्रकृतिस्थानस्योपरि परघातोद्योताप्रशस्तविहायोगतिषु प्रक्षिप्तासु एकोनत्रिंशत्प्रकृतेः स्थानं भवति। यशःकीत्र्युदयेन एको भंगः, अयशःकीत्र्युदयेन एकः। अत्र भंगसमासःद्वौ (२)।
पुनः एतयोद्र्वयोः प्रथमैकोनत्रिंशत्प्रकृतिकोदयस्थानसंबंधिद्वयभंगप्रक्षिप्तयोः चत्वारो भंगा भवन्ति। आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते त्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। अत्रापि भंगौ द्वौ। एतेषु प्रथमत्रिंशत्प्रकृतिस्थानभंगेषु प्रक्षिप्तेषु चत्वारो भंगा भवन्ति। भाषापर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य दुःस्वरे प्रक्षिप्ते एकत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। अत्र भंगौ द्वौ। सर्वभंगसमासः अष्टादश।
अधुना त्रयाणां विकलेन्द्रियाणां भंगसमासमिच्छामः इति अष्टादशसु त्रिगुणितेषु चतुःपंचाशत् भंगाः भवन्ति। (५४)।
अत्र स्वामित्वादिविकल्पा नारकाणामिव वक्तव्याः। केवलं द्वीन्द्रियादीनां त्रिंशत्-एकत्रिंशत्प्रकृतिकोदय-स्थानयोः कालः जघन्येन अन्तर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण यथाक्रमेण द्वादशवर्षाणि, एकोनपंचाशत्रात्रिंदिवानि, षण्मासाः अन्तर्मुहूर्तोना। एतत्पर्यंतं विकलत्रयाणां जीवानां उदयस्थानानि निरूपितानि भवन्ति।

अब देवगति का स्वामित्व निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में जीव देव किस कारण से होता है ?।।१०।।

देवगति नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव देव होता है।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्योंकि देवगति नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई अणिमादिक पर्याय से परिणत जीव के देव संज्ञा का व्यवहार और ज्ञान पाया जाता है।

अब यहाँ विशेष कहते हैं-नरक, तिर्यंच मनुष्य और देव में गतियाँ यदि केवल उदय में आती हो, तो नरक गति के उदय से नारकी, तिर्यंचगति के उदय से तिर्यंच, मनुष्यगति के उदय से मनुष्य और देवगति के उदय से देव होता है, ऐसा कहना उचित है। किन्तु अन्य प्रकृतियाँ भी वहाँ उदय में आती हैं, जिनके बिना नरक, तिर्यंच मनुष्य और देवगति नामकर्मों का उदय पाया नहीं जाता है।

वह इस प्रकार है-नारकी जीवों के पाँच उदय स्थान होते हैं-ये इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस (२१, २५, २७, २८, २९) प्रकृतियों संबंधी हैं। इनमें इक्कीस प्रकृतियों के उदयस्थान को कहते हैं। वह इस प्रकार है-१. नरकगति, २. पंचेन्द्रियजाति, ३. तैजस शरीर, ४. कार्मणशरीर, ५. वर्ण, ६. गंध, ७. रस, ८. स्पर्श, ९. नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, १०. अगुरुलघुत्व, ११. त्रस, १२. बादर, १३. पर्याप्त, १४. स्थिर, १५. अस्थिर, १६. शुभ, १७. अशुभ, १८. दुर्भग, १९. अनादेय, २०. अयशकीर्ति और २१. निर्माण, नाम वाली प्रकृतियों को लेकर इक्कीस प्रकृतियों संबंधी पहला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग एक ही हुआ।

शंका-यह इक्कीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान किसके होता है ?

समाधान-विग्रहगति में विद्यमान नारकी जीव के यह इक्कीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह उदयस्थान कितने काल तक रहता है ?

समाधान-यह उदयस्थान कम से कम एक समय और अधिक से अधिक दो समय तक रहता है। उन नारकियों का यह पच्चीस प्रकृतियों वाला दूसरा उदयस्थान है, उस स्थान में यही प्रकृतियाँ हैं। इतनी विशेषता है कि पूर्वोक्त इक्कीस प्रकृतियों में से नरकगति आनुपूर्वी को छोड़कर वैक्रियिक शरीर, हुण्डकसंस्थान, वैक्रियिकशरीराङ्गोपाङ्ग, उपघात और प्रत्येक शरीर इन पाँच प्रकृतियों को मिला देने से पच्चीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह पच्चीस प्रकृतियों वाला उदय स्थान किसके होता है ?

समाधान-जिस नारकी जीव ने शरीर ग्रहण कर लिया है, उसके यह पच्चीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह उदयस्थान कितने काल तक रहता है ?

समाधान-शरीरग्रहण करने के प्रथम समय से लेकर शरीरपर्याप्ति अपूर्ण रहने के अंतिम समय पर्यन्त अर्थात् अन्तर्मुहूर्त काल तक यह उदयस्थान रहता है। पूर्वोेक्त एक भंग के साथ अब दो भंग (२) हो गये।

पूर्वोेक्त पच्चीस प्रकृतियों में परघात तथा अप्रशस्तविहायोगति मिला देने पर सत्ताईस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह सत्ताईस प्रकृतियों वाला उदयस्थान किस काल में होता है ?

समाधान-शरीरपर्याप्ति रचित हो जाने के प्रथम समय से लेकर आनप्राणपर्याप्ति-स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति के अपूर्ण रहने के अंतिम समय पर्यन्त इस काल में यह सत्ताईस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-वह कितने काल तक होता है ?

समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट रूप से अन्तर्मुहूर्त काल तक होता है। यहाँ तक के सब भंगों का जोड़ तीन (३) हुआ।

पूर्वोक्त सत्ताईस प्रकृतियों में उच्छ्वास को मिला देने पर अट्ठाईस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह अट्ठाईस प्रकृतियों वाला उदयस्थान किस काल में होता है ?

समाधान-आनप्राणपर्याप्ति के पूर्ण हो जाने के प्रथम समय से लेकर भाषापर्याप्ति अपूर्ण रहने के अंतिम समय तक इस काल में होता है।

शंकावह कितने काल तक होता है ?

समाधान-जघन्य और उत्कृष्टरूप से अन्तर्मुहूर्त काल तक होता है।

यहाँ तक के सब भंगों का जोड़ चार (४) हुआ।

पूर्वोक्त अट्ठाईस प्रकृतियों में दुस्वर को मिला देने पर उनतीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है। यह भी भाषापर्याप्ति पूर्ण करने के प्रथम समय से लेकर अपनी-अपनी आयु स्थिति के अंतिम समय पर्यन्त के काल में होता है।

शंका-यह कितने काल तक होता है ?

समाधान-जघन्य से अन्तर्मुहूर्त कम दश हजार वर्ष और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त कम तेतीस सागरोपमप्रमाण होता है। यहाँ तक सब भंगों का योग पाँच (५) हुआ।

इस प्रकार नरकगति में स्थित नारकियों के उदयस्थान नामकर्म को कहा गया है।

तिर्यंचगति में इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस ये नौ उदयस्थान होते हैं (२१, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३०, ३१)। अब सामान्यत: एकेन्द्रिय जीवों के इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईय ये पाँच उदयस्थान होते हैं। आतप और उद्योत इन दो प्रकृतियों के उदय के बिना एकेन्द्रिय जीव के सत्ताईस प्रकृतियों वाले स्थान से रहित शेष चार उदयस्थान होते हैं। आतप और उद्योत के उदय सहित एकेन्द्रिय जीव के पच्चीस प्रकृतियों वाले स्थान से रहित शेष चार उदयस्थान होते हैं। उनमें आतप और उद्योत से रहित एकेन्द्रिय जीव के उदयस्थान कहने पर तिर्यंचगति१, एकेन्द्रियजाति२, तैजस३ और कार्मणशरीर४, वर्ण५, रस६, गंध७, स्पर्श८, तिर्यंचगति-प्रायोग्यानुपूर्वी९, अगुरुलघु१०, स्थावर११, बादर और सूक्ष्म इन दोनों में से कोई एक प्रकृति१२, पर्याप्ति और अपर्याप्त में से कोई एक १३स्थिर१४ और अस्थिर१५, शुभ१६ और अशुभ१७ दुर्भग१८, अनादेय१९, यशकीर्ति और अयशकीर्ति में से कोई एक२० और निर्माण२१, इन इक्कीस प्रकृतियों का उदय विग्रहगति में वर्तमान एकेन्द्रिय जीव के होता है।

शंका-यह इक्कीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान कितने काल तक रहता है ?

समाधान-जघन्यत: एक समय और उत्कृष्ट से तीन समय तक यह उदयस्थान रहता है। यहाँ अक्षपरावर्तन करके भंग निकालना चाहिए। उनमें अयशकीर्ति के उदय के साथ (बादर-सूक्ष्म और पर्याप्त-अपर्याप्त के विकल्प से) चार भंग होते हैं। यशकीर्ति के उदय के साथ एक ही भंग होता है, क्योंकि सूक्ष्म और अपर्याप्त के साथ यशकीर्ति के उदय का अभाव है, अथवा यों कहो कि यशकीर्ति के साथ सूक्ष्म और अपर्याप्त प्रकृतियों का उदय नहीं होता है। इस कारण इस उदयस्थान में पाँच ही (५) भंग होते हैं।

पूर्वोक्त इक्कीस प्रकृतियों में से आनुपूर्वी को छोड़कर औदारिकशरीर, हुंडकसंस्थान, उपघात तथा प्रत्येक और साधारण शरीरों में से कोई एक इन चार को मिला देने पर चौबीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान हो जाता है।

शंका-यह चौबीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान कहाँ होता है ?

समाधान-शरीरग्रहण करने के प्रथम समय से लेकर शरीरपर्याप्ति अपूर्ण रहने के अंतिम समय तक के स्थान में यह उदयस्थान होता है।

शंका-यह उदयस्थान कितने काल तक होता है ?

समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक होता है। यहाँ अयशकीर्ति के उदयसहित (बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त और प्रत्येक साधारण के विकल्प से) आठ भंग होते हैं। यशकीर्ति के उदयसहित एक ही भंग है।

प्रश्न-ऐसा क्यों ?

उत्तर-क्योंकि यशकीर्ति के साथ सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण, इन प्रकृतियों का उदय नहीं होता। इस प्रकार इस स्थान में सब भंगों का योग नौ (९) हुआ।

पूर्वोक्त उदयस्थान की प्रकृतियों में से अपर्याप्त को छोड़कर शेष चौबीस प्रकृतियों में परघात को मिला देने पर पच्चीस प्रकृतियों वाला उदय स्थान होता है। यहाँ पर अयशकीर्ति के उदय के साथ (बादर-सूक्ष्म और प्रत्येक साधारण के विकल्प से) चार भंग होते हैं, क्योंकि यहाँ पर अपर्याप्त का उदय नहीं होता। यशकीर्ति के उदयसहित पूर्ववत् एक ही भंग होता है। इससे भंगों का योग पाँच (५) हुआ। शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने के प्रथम समय से लेकर आनप्राणपर्याप्ति अपूर्ण रहने के अंतिम समय तक के स्थान में यह उदयस्थान होता है। जघन्य और उत्कृष्ट से इस उदयस्थान का काल अन्तर्मुहूर्त है। श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए उसी जीव के पूर्वोक्त पच्चीस प्रकृतियों में उच्छ्वास के मिला देने पर छब्बीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह छब्बीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान किसके होता है ?

समाधान-स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए एकेन्द्रिय जीव के यह छब्बीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है।

शंका-यह उदयस्थान कितने काल तक रहता है ?

समाधान-जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त से कम बाईस हजार वर्ष तक यह उदयस्थान रहता है। यहाँ भंग पूर्ववत् पाँच ही (५) होते हैं।

यहाँ तक आतप और उद्योत से रहित एकेन्द्रिय जीवों के उदयस्थान कहे गये हैं।

अब आतप और उद्योत नामकर्म की प्रकृतियों के साथ होने वाले एकेन्द्रिय के उदयस्थानों को कहते हैं-इनमें इक्कीस और चौबीस प्रकृतियों वाले उदयस्थानों की पूर्ववत् प्ररूपणा करनी चाहिए। विशेषता केवल इतनी है कि उक्त दोनों उदयस्थानों के यशकीर्ति और अयशकीर्ति प्रकृतियों के उदय सहित केवल दो-दो ही भंग होते हैं, क्योंकि जिन जीवों के आतप और उद्योत का उदय होने वाला है, उनके सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीर इन प्रकृतियों का उदय नहीं होता है। किन्तु ये दो-दो भंग पूर्वोक्त इक्कीस व चौबीस प्रकृति संबंधी उदयस्थानों में पाये जाते हैं। अत: उन्हें निकाल देना चाहिए।

पुन: शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के परघात तथा आतप और उद्योत इन दोनों में से कोई एक, इस प्रकार दो प्रकृतियों को पूर्वोक्त चौबीस प्रकृतियों में मिला देने पर पच्चीस प्रकृतियों वाले उदयस्थान का उल्लंघन कर छब्बीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान उत्पन्न होता है।

शंका-यह छब्बीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान किसके होता है ?

समाधान-शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए एकेन्द्रिय जीव के होता है।

शंका-यह छब्बीस प्रकृतियों वाले उदयस्थान का समय कितना है ?

समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल है। यहाँ यशकीर्ति-अयशकीर्ति तथा आतप-उद्योत के विकल्प से चार भंग है। इन चार भंगों को प्रथम छब्बीस प्रकृतियों वाले उदयस्थान संबंधी पाँच भंगों में मिला देने पर नौ भंग होते हैं। श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए उसी एकेन्द्रिय जीव के उक्त छब्बीस प्रकृतियों में उच्छ्वास को मिला देने पर सत्ताईस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है। यहाँ यशकीर्ति-अयशकीर्ति और आतप-उद्योत के विकल्प से चार ही भंग हैं।

समस्त एकेन्द्रिय जीवों के उदयस्थान संबंधी भंगों का योग बत्तीस (३२) होता है।

अब विकलत्रय जीवों के उदयस्थान कहते हैं-विकलेन्द्रिय जीवों के सामान्यत: इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतियों के संबंध से छह उदयस्थान होते हैं। २१, २६, २८, २९, ३०, ३१।

उद्योत के उदय से रहित विकलेन्द्रिय जीव के पाँच उदयस्थान होते हैं, क्योंकि उनके इकतीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान नहीं होता। उद्योत के उदय सहित विकलेन्द्रिय के भी पाँच ही उदयस्थान होते हैं, क्योंकि उसके परघात, उद्योत और प्रशस्त विहायोगति इन तीन प्रकृतियों का एक साथ प्रवेश होने के कारण अट्ठाईस प्रकृतियों वाले उदयस्थान की उत्पत्ति नहीं बनती है।

अब विकलेन्द्रियों में पहले उद्योतोदय से रहित द्वीन्द्रिय जीव के उदयस्थान कहते हैं, उनमें यह इक्कीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान है-तिर्यंचगति१, द्वीन्द्रिय जाति२, तैजस३ और कार्मणशरीर४, वर्ण५, गंध६, रस७, स्पर्श८, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी९, अगुरुलघु१०, त्रस११, बादर१२, पर्याप्त और अपर्याप्त में से कोई एक१३ स्थिर१४, अस्थिर१५, शुभ१६, अशुभ१७, दुर्भग१८, अनादेय१९, यशकीर्ति और अयशकीर्ति में से कोई एक२० और निर्माण२१ इन इक्कीस प्रकृतियों का एक उदयस्थान होता है।

शंका-यह इक्कीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान किस जीव के होता है ?

समाधान-यह उदयस्थान विग्रहगति में वर्तमान द्वीन्द्रिय जीव के होता है।

शंका-यह उदयस्थान कितने काल तक होता है ?

समाधान-जघन्य से एक समय उत्कृष्ट से दो समय तक रहता है। यशकीर्ति के उदय के साथ एक ही भंग होता है, क्योंकि अपर्याप्तप्रकृति के उदय के साथ यशकीर्ति का उदय नहीं होता है। अयशकीर्ति के उदय सहित दो भंग होते हैं, क्योंकि पर्याप्त और अपर्याप्त के उदय के साथ अयशकीर्ति का उदय होना संभव है। इस प्रकार यहाँ सब भंगों का योग तीन (३) हुआ।

इन इक्कीस प्रकृतियों मेें से आनुपूर्वी को निकालकर शरीर ग्रहण करने के प्रथम समय में औदारिकशरीर, हुंडकसंस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, उपघात और प्रत्येकशरीर, इन छह प्रकृतियों को मिला देने पर छब्बीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंगों का योग पूर्वोक्तानुसार ही तीन (३) होता है।

शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए द्वीन्द्रिय जीव के पूर्वोक्त छब्बीस प्रकृतियों में से अपर्याप्त को निकालकर परघात और अप्रशस्त विहायोगति मिला देने पर अट्ठाईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ यशकीर्ति के उदयसहित एक ही भंग है और अयशकीर्ति के उदय सहित भी एक ही भंग है, क्योंकि यहाँ भी प्रतिपक्षी प्रकृतियों का अभाव है। यहाँ सब भंग केवल दो (२) हैं।

स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए द्वीन्द्रिय जीव के पूर्वोक्त अट्ठाईस प्रकृतियों में उच्छ्वास के मिला देने पर उनतीस प्रकृति के उदयस्थान होते हैं। यहाँ भी दो ही (२) भंग होते हैं। भाषापर्याप्ति से पर्याप्त हुए द्वीन्द्रिय जीव के पूर्वोक्त उनतीस प्रकृतियों में दुस्वर के मिला देने पर तीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भी दो ही (२) भंग होते हैं।

अब उद्योत के उदय सहित द्वीन्द्रिय जीव के उदयस्थान कहने पर इक्कीस और छब्बीस प्रकृति वाला उदयस्थान तो जैसे पहले कहे आये हैं, उसी प्रकार कहना चाहिए। फिर छत्तीस के ऊपर परघात, उद्योत अप्रशस्तविहायोगति इन तीन को मिला देने पर उनतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यशकीर्ति के उदय सहित एक भंग होता है और अयशकीर्ति के उदय सहित एक, इस प्रकार यहाँ भंगों का योग दो (२) होता है।

फिर इन दो भंगों में पूर्वोक्त उनतीस प्रकृति वाले उदयस्थान संबंधी दो भंगों को मिला देने पर चार (४) भंग होते हैं। स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति पर्याप्त हुए द्वीन्द्रिय जीव के पूर्वोक्त उनतीस प्रकृतियों में उच्छ्वास और मिला देने पर तीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भी भंग दो ही (२) हैं, इनमें प्रथम तीस प्रकृति वाले उदयस्थान संबंधी दो भंगों को मिला देने पर चार (४) भंग होते हैं। भाषापर्याप्ति से पर्याप्त हुए द्वीन्द्रिय जीव के पूर्वोक्त प्रकृतियों में दुस्वर प्रकृति के मिला देने पर इकतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग दो (२) होते हैं। सब भंगों का योग अठारह (१८) होता है।

अब हमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय इन तीनों विकलेन्द्रिय जीवों के उदयस्थानों के भंगों का समास हम चाहते हैं। अतएव अठारह को तीन से गुणा कर देने पर चौवन (५४) भंग हो जाते हैं।

यहाँ स्वामित्व आदि के विकल्प जैसे नारकी जीवों की प्ररूपणा में पहले कह आये हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कहना चाहिए। विशेषता केवल इतनी है कि द्वीन्द्रियादि जीवों के तीस और इकतीस प्रकृति वाले उदयस्थानों का काल जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त कम क्रमश: बारह वर्ष, उनंचास रात्रि-दिवस और छह मास होता है। अर्थात् तीस और इकतीस प्रकृति वाले उदयस्थानों का जघन्यकाल तो तीनों विकलेन्द्रिय जीवों के अन्तर्मुहूर्त ही होता है किन्तु उत्कृष्ट काल द्वीन्द्रियों के अन्तर्मुहूर्त कम बारह वर्ष, तीन इन्द्रिय जीवों के अन्तर्मुहूर्त कम उनंचास रात्रि-दिन और चार इन्द्रिय जीवों के अन्तर्मुहूर्त कम छह मास होता है। यहाँ तक विकलत्रय जीवों के उदयस्थान कहे गये हैं।

अधुना पंचेन्द्रियतिरश्चां उदयस्थानानि उच्यन्ते-

पंचेन्द्रियतिरश्चः सामान्येन एकविंशति-षड्विंशति-अष्टाविंशति-एकोनत्रिंशत्-त्रिंशत्-एकत्रिंशत् इति षडुदयस्थानानि भवन्ति। २१।२६।२८।२९।३०।३१।

उद्योतोदयविरहित पंचेन्द्रियस्य तिरश्चः पंच उदयस्थानानि भवन्ति। तत्र एकत्रिंशत्प्रकृतिकस्थानस्य उदयाभावात्। उद्योतोदयसंयुक्तपंचेन्द्रियतिरश्चोऽपि-पंचैवोदयस्थानानि भवंति, तत्राष्टविंशतिप्रकृतिकस्थानोदया-भावात्।
उद्योतोदयविरहितपंचेन्द्रियतिरश्चः भण्यमाने तत्र इदमेकविंशतिप्रकृतेः उदयस्थानं भवति-तिर्यग्गति-पंचेन्द्रियजाति-तैजस-कार्मणशरीर-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-त्रस-बादरप्रकृतयः पर्याप्तापर्याप्तयोरेकतरं, स्थिरास्थिरं, शुभाशुभं, सुभग-दुर्भगयोः एकतरं, आदेयानादेययोरेकतरं, यशःकीत्र्ययशः कीत्र्योरेकतरं निर्माणनाम च एतासां एकविंशतिप्रकृतीनामेकं स्थानं भवति। अत्र पर्याप्तोदयेन सुभगदुर्भग-आदेयानादेययशःकीत्र्ययशःकीर्तिनाम-षडयुगलैः अष्टौ भंगा भवन्ति, अपर्याप्तोदयेन एक एव भंग:। कुतः ? सुभग-आदेय-यशः कीर्तिभिः सह एतस्योदयाभावात्। सर्वभंगसमासो नव (९)।
जीवेन शरीरे गृहीते आनुपूर्विप्रकृतिमपनीय औदारिकशरीरं षट्संस्थानानां एकतरं औदारिकशरीरांगोपांगं षण्णां संहननानामेकतरं उपघातं प्रत्येकशरीरं इति एतेषु कर्मसु प्रक्षिप्तेषु षड्विंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। अत्र पर्याप्तोदयेन सुभगदुर्भग-आदेयानादेय-यशःकीत्र्ययशःकीर्ति-षट्संस्थान-षट्संहननानां विकल्पैः अष्टाशीत्यधिकद्विशतभंगा भवन्ति। अपर्याप्तोदयेन एकश्चैव।
कुतः ? शुभप्रकृतिभिः सह अपर्याप्तस्योदयाभावात्। अत्र सर्वभंगसमासः एकादशोनत्रिशतमात्रो भवति (२८९)।
अत्र भंगविषयनिश्चयसमुत्पादनार्थं एताः गाथाः ज्ञातव्या: सन्ति। तद्यथा—
संखा तह पत्थारो परियट्टण णट्ठ तह समुद्दिट्ठं ।
एदे पंचवियप्पा ट्ठाणसमुक्कित्तणे णेया।।१।।
सव्वे वि पुव्वभंगा उवरिमभंगेसु एक्कमेक्केसु।
मेलंति त्ति य कमसो गुणिदे उप्पज्जदे संखा।।२।।
पढमं पयडिपमाणं कमेण णिक्खविय उवरिमाणं च।
पिंडं पडि एक्केके णिक्खित्ते होदि पत्थारो।।३।।
णिक्खत्तु विदियमेत्तं पढमं तस्सुवरि विदियमेक्केक्कं।
पिंडं पडि णिक्खित्ते एवं सेसा वि कायव्वा।।४।।
पढमक्खो अंतगओ आदिगदे संकमेदि विदियक्खो।
दोण्णि वि गंतूणंतं आदिगदे संकमेदि तदियक्खो।।५।।
सगमाणेण विहत्ते सेसं लक्खित्तु पक्खिवे रूवं।
लक्खिज्जंते सुद्धे एवं सव्वत्थ कायव्वं।।६।।
संठाविदूण रूवं उवरीदो संगुणित्तु सगमाणे।
अवणेज्जोणंकिदयं कुज्जा पढमंतियं जाव१।।७।।
शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य अपर्याप्तमपनीय परघातः द्वयोविर्हायोगत्योरेकतरे च प्रक्षिप्ते अष्टाविंशति-प्रकृतिस्थानं भवति। अत्र भंगाः षड्सप्तत्यधिकाः पंचशताः भवन्ति। (५७६)।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति, भंगा अत्र तावन्त एव (५७६)।
 भाषापर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य सुस्वर-दुःस्वरयोः एकतरे प्रक्षिप्ते त्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। एकादशशतानि द्वापंचाशदधिकानि। (११५२)।
उद्योतोदयसंयुक्तपंचेन्द्रियतिरश्चः एकविंशति-षड्विंशतिस्थाने पूर्वमिव वक्तव्ये स्तः। पुनः शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य पंचेन्द्रियतिरश्चः पूर्वोक्तषड्विंशतिप्रकृतिषु परघातः उद्योतः प्रशस्ताप्रशस्तविहायोगत्योरेकतरं च प्रविष्टेषु कर्मसु एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। भंगाः पंचशतानि षट्सप्तत्यधिकानि (५७६)।
पुनः एतेषु प्रथमैकोनत्रिंशत्सु भंगेषु प्रक्षिप्तेषु सर्वभंगप्रमाणं एकादश-शतानि द्वापंचाशदधिकानि भवन्ति।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते त्रिंशत्प्रकृतेरुदयस्थानं भवति। अत्र षट्सप्तत्यधिकपंच-शतानि भंगा: संति। पुनः एतेषु प्रथमत्रिंशत्भंगेषु शुद्धेषु अष्टाविंशत्यधिक सप्तदशशतानि भंगाः सर्वे त्रिंशत्-प्रकृतिस्थानसंबंधिनः भवन्ति (११५२±५७६·१७२८)।
भाषापर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य सुस्वरदुःस्वरयोरेकतरे मेलिते एकत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। भंगाः एकादश-शतानि द्वापंचाशदधिकानि (११५२) ।
एवं पंचेन्द्रियतिरश्चां सर्वभंगसमासः चतुःसहस्र-नवशत-षड् भवन्ति। सर्वतिरश्चां सर्वभंगाः पंचसहस्राणि अष्टन्यूनानि (४९९२)।
पंचेन्द्रियतिरश्चामुदयस्थानानां स्वामित्वं कालश्च पूर्ववत् वक्तव्यः। केवलं त्रिंशत्-एकत्रिंशत्प्रकृत्योः कालः जघन्येन अंतर्मुहूर्तमुत्कर्षेण अंतर्मुहूर्तोनानि त्रीणि पल्योपमानि।
इत्थं तिरश्चां उदयस्थानानि भंगाश्च ज्ञातव्या भवन्ति।
अधुना मनुष्याणां उदयस्थानान्युच्यन्ते—
मनुष्याणां सामान्येन एकादशोदयस्थानानि-विंशति-एकविंशति-पंचविंशति-षड्विंशति-सप्तविंशति-अष्टाविंशति-एकोनत्रिंशत्-त्रिंशत्-एकत्रिंशत्-नव-अष्टौ इति भवन्ति। २०।२१।२५।२६।२७।२८।२९।३०। ३१।९।८।
सामान्यमनुष्याः विशेषमनुष्याः विशेषविशेषमनुष्याः इति मनुष्याणां त्रयो भेदाः भवन्ति।
सामान्यमनुष्याणां भण्यमाने तत्र इदं एकविंशतिप्रकृतेः स्थानं कथ्यते—मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-तैजस-कार्मणशरीर-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-त्रस-बादराः, पर्याप्ता-पर्याप्तयोरेकतरं स्थिरास्थिरं शुभाशुभं सुभगदुर्भगयोरेकतरं आदेयानादेययोरेकतरं यशःकीत्र्ययशःकीत्र्यो-रेकतरं निर्माणनाम च एतासां प्रकृतीनामेकमुदयस्थानं। पर्याप्तोदयेन अष्टौ भंगाः, अपर्याप्तोदयेन एकः, तेषां समासः नव (९)।
गृहीतशरीरस्य मनुष्यानुपूर्विप्रकृतिमपनीय औदारिकशरीरं, षट्संस्थानानामेकतरं औदारिकशरीरांगोपांगं षण्णां संहननानामेकतरं उपघातं प्रत्येकशरीरं च गृहीत्वा प्रक्षिप्तेन षड्विंशतेः स्थानं भवति। भंगाः एकादशोन- त्रिशतमात्राः भवन्ति (२८९) ।
शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य अपर्याप्तमपनीय परघातः प्रशस्ताप्रशस्तविहायोगत्योरेकतरं च गृहीत्वा प्रक्षिप्ते अष्टाविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। भंगाः चतुर्विंशत्यूनाः षट्शतमात्राः (५७६)।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासं गृहीत्वा प्रक्षिप्ते एकोनत्रिंशत्स्थानं भवति। भंगास्तावन्त एव (५७६)।
भाषापर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य सुस्वरदुःस्वरयोरेकतरे प्रक्षिप्ते त्रिंशत्स्थानं भवति भंगा:, अष्टचत्वारिशदूनाः द्वादशशतमात्राः (११५२)।
संप्रति आहारशरीरोदयवतां विशेषमनुष्याणां भण्यमाने तेषां पंचविंशतिः सप्तविंशतिः अष्टाविंशतिः एकोनत्रिंशदिति चत्वारि उदयस्थानानि।२५।२७।२८।२९।
प्रथमतस्तावत्-मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-आहार-तैजस-कार्मणशरीर-समचतुरस्रसंस्थान-आहारशरीरांगोपांग-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-अगुरुलघुक-उपघात-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिर-अस्थिर-शुभ-अशुभ-सुभग-आदेय-यशःकीर्ति-निर्माणनामानि एतासां पंचविंशतिप्रकृतीनामुदयस्थानमेकं भवति। भंगः एकः (१)।
शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य परघात-प्रशस्तविहायोगत्योः प्रक्षिप्तयोः सप्तविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। भंगः एकः (१)।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासे मेलिते अष्टाविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। भंगःएक: (१)।
भाषापर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य सुस्वरे प्रक्षिप्ते एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। भंगः एकः (१)। सर्वभंगसमासः चत्वारः (४)।
विशेषविशेषमनुष्याणां पंचविंशतिप्रकृतिस्थानं मुक्त्वा दशोदयस्थानानि भवन्ति ।२०।२१।२६ ।२७।२८।२९।३०।३१।९।८।
प्रथमतस्तावत् विंशतिप्रकृतिस्थानं कथ्यते-मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-तैजस-कार्मणशरीर-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-अगुरुलघुक-त्रस-बादर-पर्याप्त-स्थिर-अस्थिर-शुभ-अशुभ-सुभग-आदेय-यशःकीर्ति-निर्माणनामानि एतासां विंशतिप्रकृतीनां प्रतर-लोकपूरणसयोगिकेवलिभगवतामुदयो भवति। भंगः एक: (१)। यदि तीर्थकरस्तर्हि तीर्थकरोदयेन एकविंशतिप्रकृतिस्थानं भवति। भंग: एक:(१)। कपाटं गतस्य एताश्चैव प्रकृतयः।
अत्र औदारिकशरीरं-समचतुरस्रसंस्थानं, तीर्थकरोदयविरहितानां षण्णां संस्थानानामेकतरं औदारिक-शरीरांगोपांग-वङ्काऋषभसंहनन-उपघात-प्रत्येकशरीरं च गृहीत्वा षट्विंशतिप्रकृतिस्थानं सप्तविंशतिप्रकृतिस्थानं वा भवति।भंगाः द्वयोरपि षट् एकश्च ६।१।
तीर्थकरप्रकृत्युदयेन वा अनुदयेन वा दण्डगतस्य परघातं प्रशस्ताप्रशस्तविहायोगत्योरेकतरं च गृहीत्वा प्रक्षिप्ते अष्टाविंशतिप्रकृतेर्वा एकोनत्रिंशत्प्रकृतेर्वा स्थानं भवति। विशेषेण तु तीर्थकराणां प्रशस्तविहायोगतिरेका एवोदेति। भंगा अष्टाविंशतेः द्वादश, एकोनत्रिंशतः एकः ।१२।१।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासे प्रक्षिप्ते विशेष-विशेषमनुष्याणां पूर्वोक्ताष्टाविंशति-एकोन-त्रिंशतोः क्रमशः एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं त्रिंशत्प्रकृतिस्थानं वा भवति। भंगा एकोनत्रिंशतः द्वादश, त्रिंशत्प्रकृतेः एकः ।१२।१।
भाषापर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य सुस्वरदुःस्वरयोः एकतरे प्रविष्टे त्रिंशत् एकत्रिंशद् वा स्थानं भवति। भंगाः त्रिंशत्स्थानस्य षट्संस्थान-प्रशस्ताप्रशस्तविहायोगति-सुस्वरदुःस्वरविकल्पैः चतुर्विंशतिर्भवति, एकत्रिंशत्स्थानस्य एकः।२४।१। तीर्थकराणां दु:स्वर-अप्रशस्तविहायोगत्योरुदयाभावात्।
तीर्थकराणामुदयागतैकत्रिंशत्प्रकृतीनां नामनिर्देशः क्रियते-
मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-औदारिक-तैजस-कार्मणशरीर-समचतुरस्रशरीरसंस्थान-औदारिक-शरीरांगोपांग-वङ्काऋषभसंहनन-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-प्रशस्त-विहायोगति-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिर-अस्थिर-शुभ-अशुभ-सुभग-सुस्वर-आदेय-यशःकीर्ति-निर्माण-तीर्थकराणि कर्माणि इति एताःएकत्रिंशत्प्रकृतयः उदयं प्रयान्ति। एतस्य कालः जघन्येन वर्षपृथक्त्वं, तीर्थकरप्रकृत्युदयसहितसयोगिजिनविहारकालस्य सर्वजघन्यस्यापि वर्षपृथक्त्वस्य न्यूनस्यानुपलंभात्। उत्कर्षेण अन्तर्मुहूर्ताभ्यधिकगर्भादि-अष्टवर्षेण न्यूनं पूर्वकोटिप्रमाणम्। शेषाणां स्थानानां कालः ज्ञात्वा वक्तव्यः।
संप्रति अयोगिभगवतां भण्यमाने—मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-त्रस-बादर-पर्याप्त-सुभग-आदेय-यशःकीर्ति-तीर्थकरमिति एताः नव प्रकृतयः। भंगः एकः (१)। तीर्थकरविरहिताः अष्टौ प्रकृतयः। भंग एक: (१) ।
एवं मनुष्याणां सर्वभंगसमासः द्वाविंशत्यूनसप्तविंशतिशतमात्राः भवन्ति। द्विसहस्र-षट्शत-अष्टषष्टिमात्राः इति (२६६८)।
तात्पर्यमेतत्-सामान्यमनुष्याणां भंगा: द्विसहस्र-षट्शत-द्विप्रमाणाः, विशेषमनुष्याणां चत्वारः, विशेषविशेष-मनुष्याणां द्वाषष्टि: (२६०२±४±६२·२६६८)।
अधुना देवगतौ देवानां उदयस्थानानि कथ्यन्ते—
देवगतौ एकविंशतिः पंचविंशतिः सप्तविंशतिः अष्टाविंशतिः एकोनत्रिंशत् इति पंचोदयस्थानानि भवन्ति। २१।२५।२७।२८।२९।
तत्रेदं एकविंशतेः उदयस्थानं—देवगति-पंचेन्द्रियजाति-तैजस-कार्मणशरीर-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-त्रस-बादर-पर्याप्त-स्थिर-अस्थिर-शुभ-अशुभ-सुभग-आदेय-यशःकीर्ति- निर्माणमिति एतासां प्रकृतीनां एकं स्थानंं। भंगः एकः (१)।
शरीर गृहीते देवगत्यानुपूर्विप्रकृतिमपनीय वैक्रियिकशरीर-समचतुरस्रसंस्थान-वैक्रियिकशरीरांगोपांग-उपघात-प्रत्येकशरीरेषु प्रविष्टेषु पंचविंशतिप्रकृतेः स्थानं भवति। भंगः एक (१)।
शरीरपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य परघात-प्रशस्तविहायोगत्योः प्रक्षिप्तयोः सप्तविंशतिप्रकृतेः स्थानं भवति। भंगः एकः (१)।
आनापानपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य उच्छ्वासः प्रविष्टः। इदं अष्टाविंशतिप्रकृतेः स्थानं। भंगः एकः (१)।
भाषापर्याप्तेः पर्याप्तकस्य सुस्वरे प्रविष्टे एकोनत्रिंशत्प्रकृतेः स्थानं भवति। भंग एकः (१)।
एतत्कियच्चिरं ?
भाषापर्याप्तेः पर्याप्तकस्य प्रथमसमयप्रभृति यावत् आयुःचरमसमयः इति। तस्य प्रमाणं जघन्येन अंतर्मुहूर्तोनदशवर्षसहस्राणि, उत्कर्षेण अंतर्मुहूर्तोनत्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि। अत्र सर्वभंगसमासः पंच (५)।
चतुर्गतिभंगसमासः सप्तसहस्र-षट्शत-सप्ततिप्रमाणं (७६७०)।
तस्मात् एतत्कथनेन तु नरकगति-तिर्यग्गति-मनुष्यगति-देवगतीनामुदयेन नारकः तिर्यङ् मनुष्यः देवो भवतीति न घटते ?
नैतद् वक्तव्यं, विषमोऽयं उपन्यासः।
कुतः ?
नरकगत्यादिचतुर्गत्युदयानामिव शेषकर्मोदयानां तत्राविनाभावानुपलंभात्। उत्पन्नप्रथमसमयादारभ्य यावत्, चरमसमयः इति यस्याः प्रकृतेः नियमेन उदयो भूत्वा विवक्षितगतिं मुक्त्वा अन्यत्र उदयाभावनियमो दृश्यते, तस्याःप्रकृतेः उदयेन नारकः तिर्यङ् मनुष्यः देवः इति निर्देशः क्रियते, अन्यथा अनवस्थादोषः आपतति।
तात्पर्यमेतत्-मनुष्यगत्युदयेनैव मनुष्यो भवति अन्यासां प्रकृतीनां पूर्वोक्तकथितानां च, तथा यदि मनुष्यगत्युदयो न भवेत् तदा अन्यासां भवेदपि उदयः किंतु मनुष्यो न भवितुमर्हति अतएव विषमा अर्थापत्तिः वर्तते अत्र।
अधुना सिद्धिगतिप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते—
सिद्धिगदीए सिद्धो णाम कधं भवदि ?।।१२।।
खइयाए लद्धीए।।१३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—अत्रापि पूर्ववत् नयनिक्षेपान् उदयादिपंचभावान् वा आश्रित्य चालना कर्तव्या। अस्यायमर्थः—एवंभूतनयापेक्षया अष्टकर्माणि निर्मूल्य ये महापुरुषाः नित्याः निरञ्जनाः सिद्धाः कृतकृत्याः बभूवुः, त एव सिद्धिगतौ सिद्धाः कथ्यन्ते। कर्मणां निर्मूलक्षयेण उत्पन्नपरिणामः क्षयो भवति, तस्य लब्धिः क्षायिकलब्धिः, एतस्या निमित्तेन जीवः सिद्धो भवति।
सिद्धिगतौ अन्येऽपि सत्त्वप्रमेयत्वादयः परिणामाः सन्ति, तैः किन्न सिद्धः भवति ?
न, यदि ते परिणामाः सिद्धत्वस्य कारणं, तर्हि सर्वे जीवाः सिद्धाः भवेयुः, तेषां सत्त्वप्रमेयत्वादीनां सर्वजीवेषु संभवोपलंभात् तस्मात् क्षायिकलब्ध्याः सिद्धो भवति इति ज्ञातव्यं।
तात्पर्यमेतत्-अद्यप्रभृति पुरा पंचनवत्यधिकपंचविंशतिशततमवर्षेभ्यः पूर्वं अस्मिन् जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रस्य आर्यखंडे विदेहदेशे कुंडलपुरे राजासिद्धार्थस्य महाराज्ञीत्रिशला अन्तिमतीर्थकरं भगवन्तं महावीरस्वामिनं प्रासूत।
तस्यैव वद्र्धमानस्य भगवतोऽद्य जन्मजयंतीं संपूर्णभारतदेशे विदेशेष्वपि च सर्वे जैनधर्मानुयायिनः महामहोत्सवैः सम्मानयन्ति, अस्याः भारतस्य राजधान्याः आरभ्य सर्वत्र देशे विदेशे च ग्रामे नगरे च प्रभावनां कुर्वन्ति। अहिंसाप्रधानजिनधर्मस्य जयकारमपि कुर्वन्ति।
उक्तं च श्री यतिवृषभाचार्येण तिलोयपण्णत्ति ग्रंथे-
सिद्धत्थरायपियकारिणीिंह, णयरम्मि कुण्डले वीरो।
उत्तरफग्गुणिरिक्खे, चित्तसियातेरसीए उप्पण्णो।।५४९।।
(चउत्थो महाधियारो, पृ. २१०)
उक्तं च षट्खण्डागमग्रंथेऽपि-
‘‘आषाढ जोण्ण पक्खछट्ठीए कुण्डलपुरणगराहिवणाहवंशसिद्धत्थणिंरदस्स तिसिलादेवीए गब्भमागंतणेसु तत्थ अट्ठदिवसाहिय णवमासे अच्छिय चइत्तसुक्खपक्खतेरसीए उत्तराफग्गुणी गब्भादो णिक्खंतो।’’
ईदृशाय वद्र्धमान-सन्मति-वीर-महावीर-महतिमहावीरपंचनामधारिणे श्रीमहावीरस्वामिने मे नित्यं नमोऽस्तु।
असौ भगवान् महावीरस्वामी सर्वत्र देशे राज्ये राष्ट्रे सुखं शांतिं समृद्धिं च वितरतु। शासकगणाः भगवन्महावीरस्वामिनः प्रसादात् धर्मनिष्ठाः भवन्तु, सुखिनः समृद्धिशालिनश्च भवन्तु इति भावना भाव्यते मया अद्य पवित्रदिवसे ‘‘पाश्र्वविहार’’ नामकालोनीमध्ये भगवतः पार्श्वनाथतीर्थकरस्य छत्रच्छायायामिति।
एवं प्रथमेऽधिकारे नरकादिगतिषु सिद्धिगतौ चापि बंधकानां स्वामित्वनिरूपणपरत्वेन त्रयोदशसूत्राणि गतानि।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धान्तचिंतामणि-
टीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।


अब पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों के उदयस्थान कहते हैं-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच के सामान्य से इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृति वाले छह उदयस्थान होते हैं। २१, २६, २८, २९, ३०, ३१।

उद्योत के उदय से रहित पंचेन्द्रिय तिर्यंच के पाँच उदयस्थान होते हैं, क्योंकि उसके इकतीस प्रकृतियों का उदय नहीं होता। उद्योत के उदय सहित पंचेन्द्रिय तिर्यंच के भी पाँच ही उदयस्थान होते हैं, क्योंकि उसके अट्ठाईस प्रकृति वाले उदयस्थान नहीं होता।

अब उद्योत के उदय से रहित पंचेन्द्रिय तिर्यंच के उदयस्थान कहने पर उनमें यह इक्कीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है-तिर्यंचगति, पंचेन्द्रियजाति, तैजस और कार्मणशरीर, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, तिर्यंचगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, त्रस, बादर, पर्याप्त और अपर्याप्त में से कोई एक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग और दुर्भग में से कोई एक, आदेय और अनादेय में से कोई एक, यशकीर्ति और अयशकीर्ति में से कोई एक और निर्माण, इन इक्कीस प्रकृतियों का एक ही स्थान होता है। यहाँ पर्याप्त के उदय सहित (सुभग-दुर्भग आदेय-अनादेय और यशकीर्ति-अयशकीर्ति विकल्पों से) आठ भंग होते हैं। अपर्याप्त के उदय सहित केवल एक ही भंग है, क्योंकि सुभग, आदेय और अयशकीर्ति प्रकृतियों के साथ अपर्याप्त का उदय नहीं होता। इन सब भंगों का योग नौ (९) है।

जीवों के द्वारा शरीर ग्रहण कर लेने पर आनुपूर्वी को निकालकर औदारिकशरीर, छह संस्थानों में से कोई एक संस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, छह संहननों में से कोई एक संहनन, उपघात और प्रत्येक शरीर इन छह कर्मों को मिला देने पर छब्बीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ पर्याप्त के उदय सहित (सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीर्ति, छह संस्थान और छह संहनन, इनके विकल्पों से २²२²२²६²६·२८८) दो सौ अठासी भंग होते हैं। अपर्याप्त के उदय सहित एक ही भंग है, क्यों ? क्योंकि शुभ प्रकृतियों के साथ अपर्याप्त का उदय नहीं होता। यहाँ सब भंगों का योग ग्यारह कम तीन सौ अर्थात् दो सौ नवासी (२८९) होता है।

यहाँ भंगों के विषय में निश्चय उत्पन्न कराने के लिए ये गाथाएँ जानने योग्य हैं। जैसे-

गाथार्थ-संख्या, प्रस्तार, परिवर्तन, नष्ट और समुद्दिष्ट इन पाँच विकल्पों का कथन समुत्कीर्तन में जानना चाहिए।।१।।

सभी पूर्ववर्ती भंग उत्तरवर्ती प्रत्येक भंग में मिलाये जाते हैं, अतएव उन भंगों को क्रमश: गुणित करने पर सब भंगों की संख्या उत्पन्न होती है।।२।।

पहले प्रकृति प्रमाण को क्रम से रखकर अर्थात् उसकी एक-एक प्रकृति अलग-अलग रखकर एक-एक के ऊपर उपरिम प्रकृतियों के पिंडप्रमाण को रखने पर प्रस्तार होता है।।३।।

दूसरे प्रकृतिपिंड का जितना प्रमाण है उतने बार प्रथम पिंड को रखकर उनके ऊपर द्वितीय पिंड को एक-एक करके रखना चाहिए। इस निक्षेप के योग को प्रथम समझ कर और अगले प्रकृतिपिंड को द्वितीय समझ कर तत्प्रमाण इस नये प्रथम निक्षेप को रखकर जोड़ना चाहिए। आगे भी शेष प्रकृति पिंडों को इसी प्रक्रिया से रखना चाहिए।।४।।

प्रथम अक्ष अर्थात् प्रकृति विशेष जब अन्त तक पहुँचकर पुन: आदि स्थान पर आता है, तब दूसरा प्रकृति स्थान भी संक्रमण कर जाता है अर्थात् अगली प्रकृति पर पहुँच जाता है और जब ये दोनों स्थान अंत को पहुँचकर आदि को प्राप्त हो जाते हैं, तब तृतीय अक्ष का भी संक्रमण होता है।।५।।

जो उदय स्थान जानना अभीष्ट हो, उसी स्थान संख्या को पिंडमान से विभक्त करें। जो शेष रहे, उसे अक्षस्थान समझे। पुन: लब्ध में एक अंक मिलाकर दूसरे पिंडमान का भाग देवें और फिर लब्ध में एक अंक न मिलावें। इस प्रकार समस्त पिंडों द्वारा विभाजन क्रिया करने से उद्दिष्ट स्थान निकल आता है।।६।।

एक अंक को स्थापित करके आगे के पिंड का जो प्रमाण हो, उससे गुणा करें और लब्ध में से अनंकित को घटा दें। ऐसा प्रथम पिंड के अंत तक करते जावें। इस प्रकार उद्दिष्ट निकल आता है।।७।।

शरीरपर्याप्ति को पूर्ण करने वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंच के पूर्वोक्त छब्बीस प्रकृतियों वाले उदयस्थानों में से अपर्याप्त को निकालकर तथा परघात और दो विहायोगतियों में से कोई एक इन दो प्रकृतियों के मिला देने पर अट्ठाईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग (सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, अयशकीर्ति-यशकीर्ति, छह संस्थान तथा प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति, इन विकल्पों के भेद से) पाँच सौ छियत्तर (५७६) होते हैं।

स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए पंचेन्द्रिय तिर्यंच के पूर्वोक्त प्रकृतियों में उच्छ्वास प्रकृति के मिला देने से उनतीस प्रकृति वाला उदय स्थान होता है, यहाँ भंग उतने ही अर्थात् पाँच सौ छियत्तर (५७६) ही हैं।

भाषा पर्याप्ति से पर्याप्त हुए पंचेन्द्रिय तिर्यंच के पूर्वोक्त उनतीस प्रकृति में सुस्वर और दुस्वर में से कोई एक-एक प्रकृति के मिला देने से तीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ (सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीर्ति, छह संस्थान, छह संहनन, प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति और सुस्वर-दुस्वर इनके विकल्प से) भंग ग्यारह सौ बावन (११५२) हो जाते हैं।

उद्योत के उदय सहित पंचेन्द्रिय तिर्यंच के इक्कीस और छब्बीस प्रकृति वाला उदय स्थान पूर्वोक्त प्रकार से ही करना चाहिए। पुन: शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए पंचेन्द्रिय तिर्यंच के उक्त छब्बीस प्रकृतियों में परघात, उद्योत और प्रशत-अप्रशस्त विहायोगतियों में से कोई एक इस प्रकार तीन प्रकृतियों के मिला देने पर उनतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीर्ति, छह संस्थान, छह संहनन और प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति, इनके विकल्प से) भंग पाँच सौ छियत्तर होते हैं (५७६)।

पुन: इन भंगों को पूर्वोक्त उनतीस प्रकृति के उदयस्थान संबंधी भंगों में मिला देने पर उनतीस प्रकृति वाले उदयस्थानों के सब भंगों का योग (५७६±५७६·११५२) ग्यारह सौ बावन होता है।

स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए पंचेन्द्रिय तिर्यंच के पूर्वोक्त उनतीस प्रकृतियों में उच्छ्वास के मिला देने पर तीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग (पूर्वोक्त प्रकार से) पाँच सौ छियत्तर होते हैं (५७६)। पुन: इन भंगों में पूर्वोक्त तीस प्रकृति वाला उदयस्थान संबंधी ११५२ भंग मिला देने पर तीस प्रकृति वाले उदयस्थानसंबंधी सब भंगों का योग (११५२±५७६·१७२८) सत्तरह सौ अट्ठाईस होता है।

भाषापर्याप्ति से पर्याप्त हुए पंचेन्द्रिय तिर्यंच के पूर्वोक्त तीस प्रकृति वाले उदयस्थान में सुस्वर और दुस्वर में से कोई एक मिला देने पर इकतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ (सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीर्ति, छह संस्थान, छह संहनन, प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति और सुस्वर-दुस्वर के विकल्पों से) ग्यारह सौ बावन (११५२) भंग होते हैं।

इस प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के समस्त भंगों का योग चार हजार नौ सौ छह होता है (४९०६) एवं सभी तिर्यंचों के आठ कम पाँच हजार अर्थात् चार हजार नौ सौ बानवे (४९९२) भंग होते हैं।

इस प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के उदयस्थानों के स्वामित्व और काल का कथन पहले के समान अर्थात् जैसा नारकियों के उदयस्थानों की प्ररूपणा में कह आये हैं उसी प्रकार कहना चाहिए। यहाँ विशेषता इतनी है कि तीस और इकतीस उदयस्थानों का जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कम तीन पल्योपम है।

इस प्रकार तिर्यंचों के उदयस्थान और भंग जानने योग्य होते हैं।

अब मनुष्यों के उदयस्थान कहे जाते हैं- मनुष्यों के सामान्यत: बीस, इक्कीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस, नौ और आठ प्रकृति वाले ग्यारह उदयस्थान होते हैं। २०, २१, २५, २६, २७, २८, २९, ३०, ३१, ९, ८।

सामान्य मनुष्य, विशेष मनुष्य, विशेष-विशेष मनुष्य, इस प्रकार मनुष्यों के तीन भेद होते हैं।

सामान्य मनुष्यों के कथन करने पर वहाँ यह प्रथम इक्कीस प्रकृतियों वाला उदयस्थान कहते हैं-मनुष्यगति१, पंचेन्द्रियजाति२, तैजस३ और कार्मणशरीर४, वर्ण५, गंध६, रस७, स्पर्श८, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी९, अगुरुलघु१०, त्रस११, बादर१२, पर्याप्त और अपर्याप्त में से कोई एक१३, स्थिर१४, अस्थिर१५, शुभ१६, अशुभ१७, सुभग और दुर्भग में से कोई एक१८, आदेय और अनादेय में से कोई एक१९, यशकीर्ति और अयशकीर्ति में से कोई एक२० और निर्माण२१, इन प्रकृतियों का एक उदयस्थान होता है। पर्याप्त प्रकृति के उदय से सहित (सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय और यशकीर्ति-अयशकीर्ति के विकल्पों से) आठ भंग होते हैं। अपर्याप्त प्रकृति के उदय सहित एक भंग है (क्योंकि सुभग, आदेय और यशकीर्ति साथ अपर्याप्तप्रकृति का उदय नहीं होता) पर्याप्त और अपर्याप्त के भंगों का योग नौ (८±१·९) होता है।

शरीर ग्रहण करने वाले मनुष्य के पूर्वोक्त इक्कीस प्रकृतियों में से मनुष्यानुपूर्वी को निकालकर औदारिकशरीर, छह संस्थानों में से कोई एक, औदारिक शरीरांगोपांग, छह संहननों में से कोई एक, उपघात और प्रत्येक शरीर, इस प्रकार छह प्रकृतियों के मिला देने पर छब्बीस प्रकृति वाला उदयस्थान हो जाता है। यहाँ भंग (पर्याप्त के उदय सहित सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, यशकीति-अयशकीर्ति, छह संस्थान और छह संहनन के विकल्पों से २²२²२²६²६·२८८ और अपर्याप्त के उदय सहित भंग १ इस प्रकार) दो सौ नवासी भंग (२८९) होते हैं।

शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए मनुष्य के पूर्वोक्त छब्बीस प्रकृतियों में से अपर्याप्त को निकालकर परघात तथा प्रशस्त और अप्रशस्त विहायोगतियों में से कोई एक ऐसी दो प्रकृतियों को मिला देने पर अट्ठाईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीर्ति, छह संस्थान, छह संहनन और प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति इनके विकल्पों से २²२²२²६²६²२·५७६ या चौबीस कम छह सौ अर्थात् पाँच सौ छिहत्तर होते हैं।

स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्त हुए मनुष्य के पूर्वोक्त अट्ठाईस प्रकृतियों में उच्छ्वास को लेकर मिला देने पर उनतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग पूर्वोक्त प्रकार पाँच सौ छियत्तर ही हैं (५७६)।

भाषापर्याप्ति से पर्याप्त हुए मनुष्य के पूर्वोक्त उनतीस प्रकृतियों में सुस्वर और दुस्वर में से कोई एक मिला देने पर तीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग (पूर्वोक्त विकल्पों के अतिरिक्त सुस्वर-दु:स्वर के विकल्प से हुए भंगों के गुणा कर देने पर २²२²२²६²६²२²२·११५२) ग्यारह सौ बावन- अड़तालीस कम बारह सौ भंंग हैं।

अब आहारकशरीर के उदय वाले विशेष मनुष्यों के कथन करने पर उनके पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृति वाले चार उदयस्थान होते हैं। २५, २७, २८, २९।

उनमें से सर्वप्रथम ज्ञातव्य है कि-मनुष्यगति१, पंचेन्द्रियजाति२, आहारक३, तैजस४, और कार्मण५ शरीर समचतुरस्रसंस्थान६, आहारकशरीरांगोपांग७, वर्ण८, गंध९, रस१०, स्पर्श११, अगुरुलघु१२, उपघात१३, त्रस१४, बादर१५, पर्याप्त१६, प्रत्येकशरीर१७, स्थिर१८, अस्थिर१९, शुभ२०, अशुभ२१, सुभग२२, आदेय२३, यशकीर्ति२४ और निर्माण२५, इन पच्चीस प्रकृतियों का एक उदयस्थान होता है। यहाँ भंग एक ही है (१)। शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए उक्त विशेष मनुष्य के पूर्वोक्त पच्चीस प्रकृतियों में परघात और प्रशस्त विहायोगति के मिला देने पर सत्ताईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग एक है (१)।

आनापान-स्वासोच्छ्वासपर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के उच्छ्वास के मिला देने पर अट्ठाईस प्रकृतियों का भंग स्थान होता है। यहाँ भंग एक (१) है। भाषा पर्याप्ति से पर्याप्त हुए विशेष मनुष्य के पूर्वोक्त अट्ठाईस प्रकृतियों में सुस्वर के मिला देने पर उनतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ भंग एक है (१)। इस प्रकार विशेष मनुष्य के चारों उदयस्थानों संबंधी सब भंगों का योग चार (४) होता है।

विशेष-विशेष मनुष्यों के पूर्वोक्त ग्यारह उदयस्थानों में से पच्चीस प्रकृति वाले एक उदयस्थान को छोड़कर शेष दस उदयस्थान होते हैं। २०, २१, २६, २७, २८, २९, ३०, ३१, ९, ८ होता है।

उनमें से सर्वप्रथम बीस प्रकृतियों का स्थान कहा जाता है-मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, तैजस और कार्मण शरीर, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, अगुरुलघुक, त्रस, बादर, पर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, आदेय, यशकीर्ति और निर्माण इन बीस नामकर्म की प्रकृतियों का उदय प्रतर और लाकपूरण समुद्घात करने वाले सयोगिकेवली के होता है। यहाँ भंग एक है (१)। यदि वह सयोगिकेवली तीर्थंकर हों, तो उनके पूर्वोक्त बीस प्रकृतियों के अतिरिक्त तीर्थंकर प्रकृति के उदय सहित इक्कीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। भंग एक (१)। कपाट समुद्घात को करने वाले विशेष-विशेष मनुष्य के भी ये ही प्रकृतियाँ उदय में आती हैं।

यहाँ विशेषता केवल यह है कि उनके औदारिकशरीर और समचतुरस्रसंस्थान होता है। तीर्थंकर प्रकृति के उदय से रहित उनके छह संस्थानों में से कोई एक, औदारिक शरीरांगोपांग, वङ्काऋषभनाराचसंहनन, उपघात और प्रत्येक शरीर इन प्रकृतियों को ग्रहण कर लेने से छब्बीस या सत्ताईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। यहाँ छब्बीस प्रकृति वाले उदयस्थान में छह भंग तथा सत्ताइस प्रकृति वाले में एक भंग होगा। ६। १।

तीर्थंकर प्रकृति के उदय से रहित उनके छब्बीस प्रकृतियों में परघात और प्रशस्त व अप्रशस्त विहायोगति में से कोई एक प्रकृति को ग्रहण कर मिला देने पर अट्ठाईस प्रकृति वाले तथा तीर्थंकर प्रकृति के उदय सहित सत्ताईस प्रकृतियों में उक्त दो प्रकृतियों के मिला देने पर उनतीस प्रकृति दंडसमुद्घातगत केवली का उदय स्थान होता है। विशेषता यह है कि तीर्थंकरों के केवल एक प्रशस्त विहायोगति ही उदय में आती है। इस प्रकार अट्ठाईस प्रकृतिक उदयस्थान के (छह संस्थान और प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति के विकल्पों से) बारह भंग होते हैं और उनतीस प्रकृति वाले उदयस्थान का विकल्प रहित केवल एक ही भंग है। (१२, १)।

पूर्वोक्त विशेष-विशेष मनुष्य के आनप्राण पर्याप्ति से पर्याप्त हुए उक्त अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतियों में उच्छ्वास के मिला देने पर क्रमश: उनतीस व तीस प्रकृतिक उदयस्थान होता है। इनके भंग पहले के समान उनतीस प्रकृतिक उदयस्थान के बारह और तीस प्रकृतिक उदयस्थान का केवल एक है (१२, १)।

उसी विशेष-विशेष मनुष्य के भाषा पर्याप्ति से पर्याप्त हुए पूर्वोक्त उनतीस व तीस प्रकृतियों में सुस्वर और दुस्वर में से कोई एक के मिला देने पर क्रमश: तीस और इकतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। तीस प्रकृतिक उदयस्थान के भंग छह संस्थान, प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति और सुस्वर दुस्वर के विकल्पों से चौबीस होते हैं (२४) तथा इकतीस प्रकृतियों वाले उदयस्थान का भंग केवल मात्र एक होता है (१)। क्योंकि तीर्थंकरों के दुस्वर और अप्रशस्त विहायोगति (तथा प्रथम संस्थान को छोड़कर शेष पाँच संस्थानों) का उदय नहीं होता है।

उन तीर्थंकरों के उदय में आने वाली इकतीस प्रकृतियों का नाम निर्देश करते हैं- मनुष्यगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक३, तैजस४ और कार्मणशरीर५, समचतुरस्र संस्थान६, औदारिकशरीरांगोपांग७, वङ्काऋषभनाराचसंहनन८, वर्ण९, गंध१०, रस११, स्पर्श१२, अगुरुलघुक१३, उपघात१४, परघात१५, उच्छ्वास१६, प्रशस्तविहायोगति१७, त्रस१८, बादर१९, पर्याप्त२०, प्रत्येकशरीर२१, स्थिर२२, अस्थिर२३, शुभ२४, अशुभ२५, सुभग२६, सुस्वर२७, आदेय२८, यशकीर्ति२९, निर्माण३० और तीर्थंकर३१ ये इकतीस प्रकृतियाँ तीर्थंकर के उदय में आती हैं। इस उदयस्थान का जघन्यकाल वर्ष पृथक्त्व है, क्योंकि तीर्थंकर प्रकृति के उदय वाले सयोगि जिनका विरहकाल सबसे जघन्य भी वर्ष पृथक्त्व से कम नहीं पाया जाता। इस उदयस्थान का उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त से अधिक गर्भ से लेकर आठ वर्ष से कम एक पूर्वकोटि है। शेष उदयस्थानों का काल जानकर कहना चाहिए।

अब अयोगकेवली भगवान के उदयस्थान कहते हैं-मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशकीर्ति और तीर्थंकर ये नव प्रकृतियाँ ही अयोगीकेवली के उदय होती हैं। यहाँ भंग एक (१) है। इन्हीं नौ प्रकृतियों में से तीर्थंकर प्रकृति से रहित आठ प्रकृति का उदयस्थान होता है। यहाँ भी भंग (१) है।

इस प्रकार मनुष्यों के उदयस्थानों संबंधी समस्त भंगों का योग बत्तीस कम सत्ताईस सौ अर्थात् दो हजार छह सौ अड़सठ या छब्बीस सौ अड़सठ (२६६८) होता है।

तात्पर्य यह है कि-सामान्य मनुष्यों की भंग संख्या दो हजार छह सौ दो (२६०२) प्रमाण है, विशेष मनुष्यों की संख्या चार (४) है और विशेष-विशेष मनुष्यों की भंग संख्या बासठ (६२) है। इस प्रकार कुल मिलाकर दो हजार छह सौ अड़सठ (२६६८) भंग संख्या है।

अब देवगति में देवों के उदयस्थान कहते हैं-देवगति में इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृति वाले पाँच उदयस्थान होते हैं। उनमेें इक्कीस प्रकृति वाला उदयस्थान इस प्रकार है-देवगति१, पंचेन्द्रियजाति२, तैजस३, कार्मण शरीर४, वर्ण५, गंध६, रस७, स्पर्श८, देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी९, अगुरुलघु१०, त्रस११, बादर१२, पर्याप्त१३, स्थिर१४, अस्थिर१५, शुभ१६, अशुभ१७, सुभग१८, आदेय१९, यशकीर्ति२०, और निर्माण२१, इन इक्कीस प्रकृतियों का एक उदयस्थान होता है। भंग एक (१) है।

शरीर के ग्रहण करने पर देवगति में आनुपूर्वी को निकालकर वैक्रियिकशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, उपघात और प्रत्येक शरीर इन पाँच प्रकृति के मिला देने पर पच्चीस वाला प्रकृति उदयस्थान होता है। भंग एक (१) है।

शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त हुए देव के पूर्वोक्त पच्चीस प्रकृतियों में परघात और प्रशस्त विहायोगति, इन दो प्रकृतियों के मिला देने पर सत्ताईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। भंग एक है (१)।

आनप्राणपर्याप्ति से पर्याप्त हुए देव के पूर्वोक्त सत्ताईस प्रकृतियों में उच्छ्वास प्रकृति और प्रविष्ट हो जाती है। उस समय अट्ठाईस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। भंग एक है (१)।

भाषापर्याप्ति से पर्याप्त हुए देव के पूर्वोक्त अट्ठाईस प्रकृतियों में सुस्वर के प्रविष्ट हो जाने पर उनतीस प्रकृति वाला उदयस्थान होता है। भंग एक है (१)।

शंका-इस उनतीस प्रकृतियों वाले उदयस्थान का काल कितना है ?

समाधान-भाषा पर्याप्ति से पर्याप्त देव के प्रथम समय से लेकर आयु का अंतिम समय आने तक इस उदयस्थान का काल है। इस काल का प्रमाण जघन्य से अन्तर्मुहूर्त से हीन दश हजार वर्ष और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त कम तेंतीस सागरोपम प्रमाण है। यहाँ देवों के पाँचों उदयस्थानों के समस्त भंगों का योग पाँच हुआ है (५)।

चारों गतियों के उदयस्थानों के भंगों का योग सात हजार छह सौ सत्तर (७६७०) होता है।

शंका-इस प्रकार चूँकि एक-एक गति के साथ अनेक कर्म प्रकृतियों का उदय पाया जाता है, अतएव केवल नरकगति के उदय से ही जीव नारकी होता है। तिर्यंचगति के उदय से ही तिर्यंच होता है, मनुष्यगति के उदय से ही मनुष्य होता है और देवगति के उदय से ही देव होता है यह कथन घटित नहीं होता ?

'समाधान'-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह उपन्यास विषम है।

शंका-क्यों ?

समाधान-क्योंकि, नरक आदि चार पर्यायों के प्राप्त होने में जिस प्रकार नरकगति आदि चार प्रकृतियों के उदय का क्रमश: अविनाभावी संबंध है, वैसा शेष कर्मों के उदयों का वहाँ अविनाभावी संबंधी नहीं पाया जाता है। उत्पन्न होने के प्रथम समय से लगाकर पर्याय के अंतिम समय तक जिस प्रकृति का नियम से उदय होकर विवक्षित गति के सिवाय अन्यत्र उदय न होने का नियम देखा जाता है, उसी कर्मप्रकृति के उदय से नारकी तिर्यंच, मनुष्य और देव होता है ऐसा निर्देश किया गया है, अन्यथा अनवस्था उत्पन्न हो जायेगी। तात्पर्य यह है कि-मनुष्यगति के उदय से ही जीव मनुष्य होता है और अन्य प्रकृतियों के उदय का कथन पूर्व में किया है तथा मनुष्यगति का उदय यदि न होवे, तब अन्य प्रकृतियों का उदय हो भी जावें किन्तु तब भी वह जीव मनुष्य नहीं हो सकता है, इसलिए यहाँ विषम अर्थापत्ति समझना चाहिए।

अब सिद्धिगति के प्रतिपादन हेतु प्रश्नोत्तररूप में दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सिद्धिगति में जीव सिद्ध किस कारण से होते हैं ?।।१२।।

क्षायिक लब्धि के कारण जीव सिद्ध होते हैं।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ भी पूर्व के समान नय और निक्षेप से अथवा उदय आदि पाँच भावों का आश्रय लेकर चालन करना चाहिए-कथन करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि-एवंभूत नय की अपेक्षा आठों कर्मों का निर्मूल नाश करके जो महापुरुष नित्य, निरंजन, सिद्ध, कृतकृत्य हो चुके हैं वे ही सिद्धिगति को प्राप्त करके ‘‘सिद्ध’’ भगवान कहे जाते हैं। कर्मों के क्षय से उत्पन्न होने वाले परिणामों को क्षय कहते हैं और उसी की लब्धि क्षायिक लब्धि कहलाती है, उस क्षायिक भाव के कारण जीव सिद्ध होते हैं।

शंका-सिद्धिगति में सत्व, प्रमेयत्व आदि अन्य परिणाम भी होते हैं, उनसे सिद्ध होते हैं, ऐसा क्यों नहीं कहते ?

समाधान-नहीं, क्योंकि यदि वे सत्व-प्रमेयत्व आदि परिणाम सिद्धत्व के कारण होवें, तो सभी जीव सिद्ध हो जावेंगे, क्योंकि उनका अस्तित्व सभी जीवों में पाया जाता है इसलिए क्षायिक लब्धि से सिद्ध होते हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि-आज से पच्चीस सौ पंचानवे (२५९५) वर्ष पूर्व इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में आर्यखण्ड के बिहार प्रांत के कुण्डलपुर नगर में राजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला ने अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर को जन्म दिया था। उन्हीं वर्धमान भगवान की जन्मजयंती आज सम्पूर्ण भारतदेश में तथा विदेशों में भी सभी धर्मानुयायी महामहोत्सव के साथ मना रहे हैं तथा भारत की राजधानी दिल्ली से प्रारंभ करके देश-विदेश में एवं ग्राम-नगर में प्रभावना कर रहे हैं। इस धर्मप्रभावना के साथ अहिंसामय जिनधर्म की जयकार भी करते हैं। श्री यतिवृषभाचार्य ने तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में कहा है-

गाथार्थ-महाराजा सिद्धार्थ और प्रियकारिणी के यहाँ कुण्डलपुर नगर में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन वीर भगवान का जन्म हुआ था।।५४९।।

षट्खण्डागम ग्रंथ में भी कहा है- आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन कुण्डलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला देवी के गर्भ में आकर वहाँ से आठ दिन अधिक नौ मास व्यतीत होने पर चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में जन्म लिया।

ऐसे वद्र्धमान-सन्मति-वीर-महावीर और महतिमहावीर इन पाँच नामधारी श्री महावीर स्वामी को मेरा नित्य नमस्कार होवे।

वे भगवान् महावीर स्वामी देश-राज्य-राष्ट्र में सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि को प्रदान करें। भगवान महावीर स्वामी के प्रसाद से सभी शासकगण धर्मनिष्ठ होवें, सुखी और समृद्धिशाली होवें, यही मैं आज दिल्ली की पाश्र्वविहार कालोनी में भगवान पाश्र्वनाथ तीर्थंकर की छत्रछाया में भावना भाती हूँ। अर्थात् सन् १९९७ में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी (२० अप्रैल) वीर निर्वाण संवत् २५२३ में महावीर जयंती के दिन पाश्र्वविहार-दिल्ली में इस प्रकरण को लिखते समय यहाँ महावीर स्वामी का नामस्मरण किया गया है। आज भगवान महावीर को जन्म लेकर २५९५ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में नरकादि गतियों में एवं सिद्धिगति में बंधकों का स्वामित्व निरूपण करने वाले तेरह (१३) सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।