02.मुनिधर्म प्रश्नोत्तरी

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मुनिधर्म

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प्रश्न ५०—मुनिधर्म का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—जिस धर्म में ५ प्रकार के आचार, दश धर्म, १२ प्रकार का संयम, बारह प्रकार का तप, आठ प्रकार के मूलगुण तथा चौरासी लाख उत्तरगुण, मिथ्यात्व—मोह—मद का त्याग, शम दम ध्यान, प्रमाद रहित स्थिति, वैराग्य, जिनशासन की महिमा को बढ़ाने वाले अनेक गुण, सम्यग्दर्शनादि स्वरूप, निर्मल रत्नत्रय तथा अंत में समाधि विद्यमान है वह मुनिधर्म है।

प्रश्न ५१—पांच प्रकार का आचार कौन सा है ?
उत्तर—दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार यह ५ प्रकार का आचार है।

प्रश्न ५२—आचेलक्य मूलगुण किसलिए पाला जाता है ?
उत्तर—संयमी द्वारा वस्त्र रखने पर उसके मलिन होने पर धोने के लिए जल आदि का आरम्भ करना पड़ेगा जिससे संयम नहीं रह जाएगा, यदि वस्त्र नष्ट हो गया तो आकुलता होगी और किसी से मांगने पर अयाचक वृत्ति नष्ट हो जाएगी और यदि वस्त्रों को छोड़कर लंगोटी मात्र भी रखें तो खो जाने पर क्रोध होगा इसलिए मुनिगण समस्त वस्त्रों का त्यागकर दिशारूपी वस्त्र ही धारण करते हैं।

प्रश्न ५३—लोच नामक मूलगुण का अर्थ क्या है ?
उत्तर—मुनिगण अपने पास न तो द्रव्य रख सकते हैं और न ही किसी से मांग सकते हैं इसलिए वे न तो किसी का मुंडन करा सकते हैं और न खुद का ही करा सकते हैं, मुंडन हेतु छुरा, कैची आदि अस्त्र भी नहीं रखते और जटा भी नहीं रख सकते क्योंकि जटाओं में जूं आदि जीवों की उत्पत्ति होने से हिंसा होती है।उनकी अयाचक वृत्ति के परिहार और वैराग्य की अतिशय वृद्धि के लिए वे अपने हाथों से केशलोंच करते हैं।

प्रश्न ५४—स्थितिभोजन मूलगुण क्या बताता है ?
उत्तर—जो मुनि शरीर से ममता रहित हो समाधिमरण करने में उत्साही हैं, श्रेष्ठ ज्ञान के धारक हैं, उनकी विधि में यह कड़ी प्रतिज्ञा रहती है कि जब तक खड़े होकर आहार लेने की तथा दोनों हाथों को जोड़ने की शक्ति मौजूद है तब तक भोजन करेंगे अन्यथा नहीं, जिससे इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

प्रश्न ५५—मुनिगण किस प्रकार से वैरागी होते हैं ?
उत्तर—उन मुनियों के लिए तृण तथा रत्न, मित्र तथा शत्रु, सुख तथा दु:ख, श्मशान भूमि और राजमंदिर, स्तुति तथा निन्दा, मरण और जीवन दोनों समान हैं।

प्रश्न ५६—वीतरागी हमेशा क्या चिंतन करते हैं ?
उत्तर—वीतरागी सदैव एकान्त में रहकर आत्मा का चिंतन करते हैं, संसार के सुख—दु:ख में उन्हें हर्ष—विषाद नहीं होता है, परम शांत मुद्रा के धारी उन मुनियों के परम शुद्धि का करने वाला संवर होता है जिससे मुक्तिलक्ष्मी उनके समीप आ जाती है।

प्रश्न ५७—आचार्यों ने मुनियों के लिए क्या शिक्षा दी है ?
उत्तर—आचार्यों के अनुसार जब तक ज्ञानानन्द स्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव नहीं किया जाएगा तथा मोह को कृष नहीं किया जाएगा तब तक बाहर में कितना भी यम, नियम, उपवास, तप किया जाए सर्वथा व्यर्थ है इसलिए मुनियों को पहले ज्ञानानन्द स्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव करना चाहिए।

प्रश्न ५८—मुनिगण कितने परीषहों को सहन करते हैं ?
उत्तर—२२ परीषह।

प्रश्न ५९—मुनि द्रव्य अर्थात् धन क्यों नहीं रख सकते हैं ?
उत्तर—प्राणियों को मारने से पाप होता है और वह पाप आरम्भ से होता है, आरम्भ धन के कारण होता है, धन आने पर लोभ आदि की उत्पत्ति होती है जिससे संसार दीर्घ होता है और इस संसार में अनंत दुख होते हैं, इस प्रकार सभी बातें द्रव्य से ही होती हैं, मोक्ष के अभिलाषी मुनिगण इसीलिए द्रव्य का त्याग करते हैं।

प्रश्न ६०—इतना जानते हुए भी यदि वे द्रव्यादि रखते हैं तब उन्हें कैसा समझना चाहिए ?
उत्तर—इतना जानते हुए भी यदि वे द्रव्यादि रखते हैं तो मानो उन्होंने सच्चे मार्ग का ही नाश कर दिया।

प्रश्न ६१—क्या परिग्रह हितकारी होता है ?
उत्तर—क्रोधादि कर्मों के द्वारा तो प्राणी के कर्मों का बन्ध कभी—कभी होता है किन्तु परिग्रह से प्रतिक्षण बंध होता है अत: परिग्रहधारियों को किसी काल में तथा किसी प्रदेश में सिद्धि नहीं होती है।

प्रश्न ६२—क्या मुनि को मोक्ष की अभिलाषा करनी चाहिए ?
उत्तर—नाहीं, क्योंकि मोह के उदय से ही पदार्थों में इच्छा होती है तथा जब तक मोह रहता है तब तक मोक्ष कदापि नहीं हो सकता इसलिए मोक्ष के लिए भी अभिलाषा करना दोष है अत: मोक्षाभिलाषी मुनियों को आत्म रस में ही लीन रहना चाहिए।

प्रश्न ६३—क्या परिग्रहधारी को भी मुक्ति हो सकती है ?
उत्तर—नहीं, जिस प्रकार अग्नि शीतल नहीं हो सकती उसी प्रकार परिग्रहधारी को मुक्ति नहीं हो सकती है।

प्रश्न ६४—क्या इन्द्रिय सुख ही सच्चा सुख है ?
उत्तर—जिस प्रकार विष अमृत नहीं हो सकता है उसी प्रकार इन्द्रिय सुख भी कदापि सुख नहीं हो सकता है।

प्रश्न ६५—क्या यह शरीर सदैव स्थिर रहेगा ?
उत्तर—नहीं, जिस प्रकार बिजली स्थिर नहीं रहती उसी प्रकार यह शरीर भी स्थिर नहीं रह सकता है।

प्रश्न ६६—क्या यह संसार वास्तव में रमणीय है ?
उत्तर—जिस प्रकार इन्द्रजाल में रमणीयता नहीं होती उसी प्रकार इस संसार में रमणीयता नहीं है अर्थात् यह संसार क्षणभंगुर है।

प्रश्न ६७—आचार्यों ने किस प्रकार के गुरुओं की स्तुति की है ?
उत्तर—जो रत्नत्रय के धारी हैं, निग्र्रंथ हैं, शान्त मुद्रा के धारक हैं तथा कामदेव के जीतने वाले हैं, उन गुरुओं को आचार्यों ने मस्तक झुकाकर नमस्कार किया है।

प्रश्न ६८—किस प्रकार के आचार्य परमेष्ठी स्तुत्य हैं ?
उत्तर—जो सद्ज्ञान के धारी हैं, स्वयं पंचाचारों का पालन करते हैं और दूसरे से पलवाते हैं, जिनके परिग्रह का लेशमात्र भी नहीं है, जो स्वयं मुक्ति का वरण करते हैं और दूसरों को भी वहां पहुंचाते हैं ऐसे निर्मल रत्नत्रय के धारी आचार्य परमेष्ठी स्तुत्य हैं।

प्रश्न ६९—उपाध्याय परमेष्ठी की स्तुति करते हुए आचार्य क्या कहते हैं ?
उत्तर—जो उपाध्याय परमेष्ठी अनादिकाल से लगे हुए मोहरूपी परदे को स्याद्वादमयी उपदेश रूपी दिव्य अंजन से हटाकर शिष्यों की दृष्टि को अत्यन्त निर्मल तथा समस्त पदार्थों के देखने में समर्थ बनाते हैं वे सदैव स्तुत्य हैं।

प्रश्न ७०—उन्हें किसकी उपमा दी गई है ?
उत्तर—उन्हें अकारण वैद्य की उपमा दी गई है।

प्रश्न ७१—साधु परमेष्ठी कैसे होते हैं ?
उत्तर—जो साधु अत्यन्त कठिन गृहबन्धन से स्वयं को छुड़ाकर, शरीर से निर्मोही होकर, मोह से पैदा हुए विकल्प समूह को नष्टकर सम्यग्ज्ञान रूपी ज्योति को सिद्ध करते हैं वे साधु परमेष्ठी नमस्कार के योग्य हैं।

प्रश्न ७२—वीतरागी साधु की महिमा बताइये ?
उत्तर—जिस वङ्का के शब्द के भय से चकित होकर समस्त लोक मार्ग को छोड़ देते हैं ऐसे वङ्का के गिरने पर जो शान्तात्मा मुनि ध्यान से जरा भी विचलित नहीं होते, सम्यग्दर्शन के धारी हैं और सम्यग्ज्ञान से समस्त मोहान्धकार का नाश करते हैं, परीषहों को सहने में दृढ़ हैं वे वीतरागी हैं।

'प्रश्न ७३—क्या रत्नत्रयधारी मुनि और सरस्वती की पूजन करनी चाहिए ?
' उत्तर—शास्त्रानुसार इस कलिकाल में त्रिलोकपूज्य केवली भगवान नहीं हैं तो भी उनकी वाणी मौजूद है तथा उन वाणियों के आधार श्रेष्ठ रत्नत्रयधारी मुनि हैं इसलिए उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती की पूजन है तथा सरस्वती की पूजन साक्षात् केवली भगवान की पूजन है।

प्रश्न ७४—निंदा करने वालों के प्रति मुनियों के कैसे भाव होने चाहिए ?
उत्तर—रत्नत्रयधारी, शांत और मोक्षाभिलाषी मुनि दुष्टों के द्वारा अपमानित होकर भी स्वच्छ अंत:करण से समता भाव धारण करता है।

प्रश्न ७५—निंदक को मुनिनिन्दा का क्या फल मिलता है ?
उत्तर—मुनिनिन्दा करने वाले अपनी आत्मा का घात कर दु:ख से परिपूर्ण नरक में चले जाते हैं।